Author Topic: Cereals Of Uttarakhand - उत्तराखंड मे पैदा होने वाले खाद्यान  (Read 40441 times)

Bhishma Kukreti

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         जातक कथाओं में उत्तराखंडी भोजन व भोज्य पदार्थ वर्णन


                  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास --7 

           

                        History of Gastronomy in Uttarakhand -7   
                   
                        आलेख :  भीष्म कुकरेती

   जातक कथाएँ बुद्ध से संबंधित कथाएं हैं जो 300 BC से 400 BC तक लिपि बद्ध hoti  रहीं हैं।
यद्यपि जातक कथाओं में उत्तराखंड संबंधी  वर्णन कम मिलता है फिर भी जो भी विषय हैं वे बुद्ध काल व तत्पश्चात उत्तराखंड के सामजिक व सांस्कृतिक वातावरण के लिए सहायक सामिग्री के रूप में  होता है।  जातक कथाओं में अधिकतर वर्णन उत्तराखंड के भाभर का मिलता है
                   
                       जातक कथाओं में उत्तराखंड की वनस्पतियाँ
 
वृक्ष - महावेस्सन्तरजातक में धव , अश्वकर्ण खदिर , शाल , फन्दन , मालुव, कुटज सलल , नीप , पद्मिनी वन्य वृक्षों का वर्णन मिलता है।
फल - भाभर के वनों के आम प्रसिद्ध थे . कोल , भल्लाटक , बेले, गुलर , कैथ , जामुन , फल सर्वत्र उपलब्ध थे।
कंद मूल - आलू जैसा कोई मूल, कलंब , बिलाली , तल्ल्क कंद मूल मुख्य थे।
अनाज - धान , मूंग तिल , तंदुल अदि
दूध - गाय व भैंस
शहद  का वर्णन काफी मिलता है
भोजन बनाने के लिए आग का प्रयोग की बाते कहीं गईं हैं। 
पशु
जंगली हिंस्र पशु - बाघ ,हाथी , भालू , भेड़िया  , गीदड़ , वन कुत्ते
अन्य जंगली पशु -बंदर , गैंडा
शिकार योग्य पशु - वन गाय -बैल , वन भेद -बकरियां , सूअर , खरगोश , तरह तरह के मृग , चमर गाय
उत्तराखंड में पाई जाने वाले  पक्षियों का जिक्र भी जातक कथाओं में मिलता है। 
जातक कथाओं में उत्तराखंड में आखेट का भी वर्णन मिलता है

मनुष्य मांश भक्षण का भी वर्णन मिलता है।

    नमक और छौंका  लगना

झंगोरा व मंडुए आदि की लपसी का वर्णन मिलता है।
उत्तराखंड संबंधी जातक कथाओं में कहा  गया है की तपस्वी बिना नमक और बगैर छोंके का भोजन करते थे. याने कि नमक के अतिरिक्त छौंके का प्रचालन इस युग में हो चुका था। 


Reference-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 

Copyright @ Bhishma  Kukreti 11  /9/2013

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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )




             उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास --6 

             महाभारतीय कुलिंद जनपद में  भोजन,कृषि व कृषि , रसोई  यंत्र भाग -2

                        History of Gastronomy in Uttarakhand -6   
                   
                        आलेख :  भीष्म कुकरेती
   
                 उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में जौ  की खेती का  भारत में इतिहास

 
 इतिहासकार मानते हैं कि जौ का जन्म  भारत में नही हुआ बल्कि मेसोपोटामिया जौ का मूल स्थान है।  हड्डपा संस्कृति काल में भारत में जौ का प्रयोग हो   चुका था।  वैदिक काल  में जौ देव पूजा में भी काम आने  लगा था।
  मेहरगढ़ में जौ की खेती के सात से छह आठ हजार साल पहले के अवशेस मिले हैं। इसी काल में इरान में भी जौ की खेती के अवशेस मिले हैं अत:  सकता है कि भारत में जौ और गेंहू की खेती छ से सात हजार साल पहले  शुरू हो चुकी थी।
गुजरात में ग्रामीण सहकारी स्तर  पर जौ , गेंहू आदि की खेती के चार हजार साल पहले के प्रमाण मिले हैं।
चूँकि संस्कृति प्रसार  भी गति पूर्वक होता था तो कह सकते हैं कि महाभारत काल  (1400 BC )भारत में जौ की खेती होती थी ।  महाभारत काल में उत्तराखंड में भी  की उसी भांति होती थी जैसे अन्य क्षेत्रों में होती थी।                               
               गेंहू की खेती का उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में भारत में इतिहास 
 गेंहू का मूल भी भारत में  बल्कि भूमध्य सागरीय क्षेत्र है।
ऋग्वेद या यजुर्वेद में गोधुम; शब्द नही मिलता है।
गोधुम ; का वर्णन यजुर्वेद संहिता और ब्राह्मण में अवश्य मिलता है।
इतिहासकार चमन लाल के अनुसार रंगपुर और प्रभास सोमनाथ (गुजरात ) में पूर्व  हडप्पा संस्कृति में जंगली गेंहू होने  के सूत्र मिले हैं।
पांच हजार साल पहले गेंहू का प्रयोग शुरू हुआ था।  उस समय के गेंहू  से   भूसे को निकालना सरल नही था. केवल भूनकर  ही भूसे को दाने से अलग किया जाता था.
महाभारत के समय गेंहू की खेती होनी शुरू हो गयी थी।


                    कोदा /मंडुये  की खेती का उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में भारत में इतिहास

 कोदा  (मंडुआ ) का जन्म पूर्वी अफ्रीका में भी मना जाता है।  और कुछ इतिहासकार हिमालय की पहाड़ियों में भी मंडुआ  का जन्म मानते हैं। जहां  तक Elusine coracana का संबंध है इसका जन्म पूर्वी अफ्रिका में माना जाता है।  Paspalum scrobiculatum (Koda Millet ) का जन्म स्थल  हिमालय को माना जाता है.  दक्षिण के कर्नाटक क्षेत्र को  भी रागी (फिंगर मिलेट ) का जन्म स्थल माना जाता है या कहें तो रागी की कृषि कर्नाटक में प्राचीन काल से होती थी।
 इसमें संदेह नही कि महाभारत काल में कोदा उत्तराखंड का महत्व पूर्ण भोजन रहा होगा

                             झंगोरा की खेती का उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में भारत में इतिहास

झंगोरा या सवैया मिलेट  भारत में में प्राचीन काल  में पाया गया है।  झंगोरा का जन्म स्थान भारतीय प्राय द्वीप  माना गया है।  यह  मान लेने में कोई हर्ज नही कि   महाभारत काल में उत्तराखंड में झंगोरा का प्रयोग हो चुका था। 

                                  कौणी  की खेती का उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में भारत में इतिहास

जंगली कौणी का कृषि करण भारत में ही हुआ और यह निश्चित है कि महाभारत काल में उत्तराखंड में कौणी  की खेती होती थी। 

                               भांग की खेती का उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में भारत में इतिहास


 भांग का जन्म मध्य एसिया बताया जाता है और तत्पश्चात सभी क्षेत्रों में फैली . चीन में आठ हजार साल पहले भाग के बीजों से तेल निकाला जाता था।  इतिहासकार कहते हैं कि भांग की खेती से ही कृषि का प्रारम्भ हुआ।  चीन की प्राचीन वैदिकी और भारत की प्राचीन वैदिकी में भांग का उल्लेख मिलता है। अत : यह माना जा सकता है कि महाभारत काल में भांग का उपयोग उत्तराखंड में रेशों , नशे व तेल के लिए होता था।

                        सिल्ल बट्ट से पिसाई होती थी
छ हजार साल पहले मानव गेंहू आदि पीसने की कला जान चुका था। 
  ऐसा लगता है कि महाभारत काल में अनाजों की पिसाई सिल्ल बट्ट से होती रही होगी।   चक्की का प्रयोग चिन्ह हरप्पा संस्कृति में मिलते हैं   तो हो सकता है कि महाभारत काल में चक्की भी उत्तराखंड मी आ चुकी होगी         

Reference-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 

Copyright @ Bhishma  Kukreti 76/9/2013

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                   महाभारतीय कुलिंद जनपद में  भोजन,कृषि व कृषि , रसोई  यंत्र


                        History of Gastronomy in Uttarakhand -5 
                        उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ---5
                        आलेख :  भीष्म कुकरेती
        महाभारत में उत्तराखंड  पर्वतीय उपत्यका का नाम कुलिंद जनपद था।  सुबाहू कुलिंद जनपद का सबसे प्रतापी राजा थे।
 महाभारत में उत्तराखंड के वर्णन में निम्न वनस्पतियों और प्राणियों का वर्णन मिलता है -
                 खाद्य देने वाले वनस्पति व वृक्ष
उत्तराखंड में महाभारत काल में अम्बाडा , अंजीर , अनार , आम, आंवला , इंगुद ,कटहल, कैथ , खजूर , गंभीरी , गुलर , जामुन , तेंदू ,तेन्दुल, नीम्बू , बहेड़ा , बरगद, बेर , बेल, भिलावा (Semecarpus anacardium ), मोच (केला ) , सेमल फलदार वृक्ष सामन्य रूप से मिलते थे।
तिमल, हिसर भी होते थे
                देहरादून की शाली या धान उस समय भी प्रसिद्द्ध  था।
उत्तराखंड से अनाज निर्यात भी होता था
                  बड़े जल कलस
महाभारत में बद्रिकाश्रम में विशाल जल कलस का वर्णन  है
थालियाँ और कटोरियाँ कांसे की बनी होती थीं।
              मांस भोजन
शिकार   रोज कर्म क्रम था . भोज में भी  परोसा जाता था।
               पशु
गाय , भैंस , कुत्ते जंगली भी थे और पाले भी थे।
,मृग  सूअर , गधे , घोड़े भी थे
 बानर,शेर , चमर गाय , हाथी आदि जानवरों का जिक्र भी उत्तराखंड सम्बन्धित महाभारत के अध्यायों में मिलता है.
            पक्षी
गौरैया, कादम्ब , कारंडव , कुक्कुट , कुरर , क्रौंच , चक्रवाक , चातक , जल कुकुट , पुष्प कोकिल , प्रियक, बक , प्लव, भृंगराज , मदगु , सारस और हंस भी थे।
               शहद
उत्तराखंड से शहद निर्यात होता था।  और यह मिष्ठान निर्माण का एक माध्यम भी रहा होगा
             तिमल -बेडु से मिस्ठान 
तिमल बेदु का वर्णन है।  इस तरह खा जा सकता है कि बेडु -तिमल से मीठा पाया जाता था।
             सुक्सा
सुक्सा याने सुखाकर सब्जी या फलों को सुरक्षित करना।  सुक्सा विधि इस समय प्रचलित हो चुकी थी। 


              जातीय भोजन /वर्गानुसार भोजन
 इस युग में उत्तराखंड में जातीय विभाजन  नींव पद चुकी थी और भोजन बनाने की शैली में जातीय  अंतर होगा। 
विदुर नीति में कहा गया है कि श्रमिक तीखा, तेल युक्त खाना खाता है और उच्च पदेन व्यक्ति कम  तीखा भोजन करता है।

                     अल्पहारी
 महाभारत (संक्षिप्त महभा. गीता प्रेस पृष्ठ 502 ) में विदुर  धृतराष्ट्र को जब ज्ञान नीति सुनाते हैं कहते हैं कि थोड़ा भोजन करने वालों को निम्न सुख - आरोग्य ,आयु, बल , सुख तो मिलते ही हैं तथा ' यह अत्यंत खाऊ ' की उपाधि नही पाता। विदुर नीति में नमक , पका हुआ भोजन , दूध  , दही ; मधु , घी , तेल, तिल मांस , फल ,मूल ,  कपड़ा।  गंध गुड सभी चीजें बेचने योग्य नही हैं।
         व्रत के भोजन
विदुर नीति में कहा गया है कि जल , मूल , फल , दूध , घी , ब्राह्मण इच्छा पूर्ति , गुरु का वचन और औषध व्रत नाशक नही होते हैं।
      चूंकि महाभारत काल में ही उत्तराखंड पर पांडवों और कौरवों का प्रभाव रहा है अत: खान पण के मामले में महभारत में भोजन विषयी कई बातें   उत्तराखंड में भी लागू होती थीं।       

 
 
Reference-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population



Copyright @ Bhishma  Kukreti 76/9/2013

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                  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ---4

                       वेदों में वर्णित कृषि, कृषि औजार, अनाज       


                        आलेख :  भीष्म कुकरेती
 वैदिक योद्धाओं और पर्वतीय योद्धाओं में यद्ध हुए।  अत> वैदिक संस्कृति का प्रभाव हिमालयी क्षेत्र पर लगातार होता  रहा था 
                    वेदों में वर्णित कृषि और अनाज इस परकार हैं
 ऋग्वेद तक भारतवासी कृषि को अपना चुके थे।
भूमि कृषि और अरण्य (जंगल ) में बती थी।
क्षेत्र (खेतों ) में कृशीवल (किसान ) खेती करते थे।
खाद  का उपयोग शुरू हो चुका था और कूल का उपयोग हो चुका था ।
मैदानों में कई जोड़ी बैलों से हल खींचने (लांगुल , सीर ) का वर्णन है।
शतपथ ब्राह्मण में जोतने , बोने काटने और पशुओं से दाईं करने का वर्णन हाई।
फसल को दाथी (दात्र ) से काटकर पुलों (पर्ष ) में बांधा जाता था और  खलियानों (खल ) में पटका जाता था।  मांडने के बाद चलनी (तितौ )या शूप (शूर्प ) से त्रिण व भूसे (तुष ) को अनाज से अलग किया जाता था। (ऋग्वेद ).

                                 अनाज
पहले पहल अनाज में केवल जौ (यव ) की खेती होती थी।
बाद में धान , मूंग , उड़द , तिल  , अणु , खल्व , मसूर नीवार आदि की खेती प्रारम्भ हुयी
साल भर में दो खेती होने लगी थी
सत्तू का प्रयोग भी शुरू हो चुका था। 

               फल
फलों में कर्कन्धु (एक प्रकार का खजूर ) , कुवल , बेर का नाम आता है

          पशु धन
 गएँ आदि दूध, दही घी के लिए पाली जाने लगी थी और खाद के लिए भी
दुग्ध पदार्थ और मांस का बाहुल्य खाने में था
गोठ या गौशाला तरह की शैली शुरू हो चुकी थी
भेड़  का मांस रुचिकर माना  जाता था।

 औजार
 वैदिक संस्कृति ताम्र युग की संस्कृति थी   संस्कृति की  थी।  बाण , गदा , फरसा , बसूला आदि औजार निर्माण  होते थे।

            अन्न , मांश को भून कर खाया जाता था।  पीस कर भी भोजन करने  आ चुकी थी
बर्तनों की कमी थी तो पत्तों पर खाना बनाया जाता था।    उत्तराखंड में वैदिक संस्कृति या परवर्ती वैदिक संस्कृति के चिन्ह जैसे ढुंगळ संस्कृति , उमी संस्कृति, पत्तों के अन्दर या बांस के अंदर मच्छी पकाना संस्कृति आज भी ज़िंदा है


Reference-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population



Copyright @ Bhishma  Kukreti  6/9/2013


 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )         


                             उत्तराखंड में लौह संस्कृति में कृषि , कृषि  भोजन (1700 -300BC )


                                       उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ---3

                                    आलेख :  भीष्म कुकरेती


             उत्तराखंड के पूर्वी भागों में महा समाधियाँ मिली हैं जो इंगित  कि लौह हथियार का प्रयोग लौह कल में शुरू हो गया याने  कि लौह उपकरण के कई उपयोग व कृषि विकसित ह रही थी ।
 उत्तराखंड महाभारत युग में लौह उपकरणों का मुख्य निर्यातकर्ता था ।  निकलता है कि जंगली जौ , जंगली गहथ आदि की कृषि सुगम होने लगी थी ।
 कोल जाती ने कृषि विकसित की हुई थी और कुदाल फावड़े से कृषि की शुरवात हो चुकी थी । इसके अतिरिक्त हल -लान्गुल जैसे उपकरण बना लिए थे ।
घास , फूस , मिटटी -पत्थर की झोपड़ियां बनने भी शुरू हो चुकी थी । और शायद इसी वक्त उत्तराखंड में छन्न संस्कृति की शुरुवात भी इसी काल में हो चुकी थी ।
भारत में बाण , लकुट , धनुष , बरछे , खुकरी, तलवार, घोड़े की लगाम , छेनी   उपलब्ध थे जो  लिए सुभीते वाले उपकरण थे । इसके अतिरिक्त कुल्हाड़ी , हंसिया (दाथी ), छेनी  भी विकसित हो चुकी थी ।

पहाड़ी ढालों  पर दीवाल (पगार ) चिनने के प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी और गद -गदन या नदियों के किनारे क्यारी बनाने की संस्कृति भी विकसित हो चुकी थी ।
 जहां तक भारत का प्रश्न है उस समयज जौ , गेंहू , धान , जंगली भिन्डी , बाजरा, ज्वार, सरसों , दालें  मुख्य भोज्य पदार्थ थे अत : उत्तराखंड में गेंहू को छोड़ बाकी सभी खाद्य पदर्थ प्रयोग होते थे ।
इस तरह उत्तराखंड में जौ , जंगली भिन्डी , बाजरा, ज्वार, सरसों , दालें भोजन थे और गेंहू धान मैदानी भाग में रहे होंगे ।
अनाज का उपयोग आग में भूनकर अधिक होता रहा होगा ।
इस युग तक नीम्बू , केला, सेमल, कद्दू के खेती भी सीख चुका था ।
पक्षियों में कुक्कुट , मोर, हाथी , घोड़ों  , बैल , भैंसों को पालतू बनाना सीख चुका था ।
मछली  व शहद भोजन के अंग बन चुके थे ।
मृग , जंगली चकोर , गौरया आदि भी भोज्य पशु -पक्षी  थे ।
जंगल से औषधियों का ज्ञान भी यहाँ हो चुका था और विशेस्य्गाता हासिल कर चुके थे ।
बीसवीं सदी से पहले गढवाल -कुमाऊं में कई वनस्पतियों का उपयोग भोज्य पदार्थ रूप में होता था जो ब्रिटिश काल में समाप्त भी हो गया जैसे सेमल के कच्चे घोघाओं की सब्जी । ऐसी वनस्पतियों का उपयोग आग आने के बाद या धातु युग में शुरू हुआ


Reference-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)

Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India



                       उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ---2
                         उत्तर प्रस्तर संस्कृति में मानव जीवन में क्रान्ति
                       

                                    आलेख :  भीष्म कुकरेती


  ऊत्तर प्रस्तर युग में कृषि विकास के साथ मैदानों में स्थायी व्स्तियाँ बसने लगे  का विकास ने खेती को बढ़ावा दिया । नदी घाटियों में गाँव और नगर बसने लगे । किन्तु पहाड़ों में जहां पशु चारण  और कृषि का अन्वेषण हुआ वहां पहाड़ी निवासी चरागाहों , पशु पालन और ढलानों में कटील खेतों से चिपके रहे (डबराल , उ, का -इतिहास २ ) ।
नदी-घाटियों  के निवासियों ने लकड़ी , घास, आखेट हेतु पहाड़  निवासियों पर हमला करना शुरू किया और  प्रस्तर उपकरण युग से कलहों और युद्ध का जन्म हुआ ।
जहां वनों के कटान से मैदानी हिस्सों में खेती अधिक विकसित हुयी वहीं पहाड़ों में चिरकाल तक वनों पर   रहा और आज भी बगैर वनों के पहाड़ी जीवन की कल्पना नही की जा सकती है ।
मांस , मच्छली , और कंद मूल के साथ दूध मक्का , जौ धान की खेती भी इसी युग की देन  है
 इतिहास कार डा डबराल व डा नौटियाल का कथन है कि अभीष्ट  अवशेषों के न मिलने से उत्तराखंड में कृषि इतिहास खोजने में दिक्कत आती हैं ।
ऐसा मना जाता है कि झेलम से यमुना हिमालय घाटी तक कोल मुंड की मूल जाती आ बसी थी और कोल मुंड मूल समाज ने हिमालय में उत्तर पत्थर  उपकरणों का विकास भी किया और प्रसार भी किया ।

   
                                उत्तराखंड में ताम्र उपकरण संस्कृति व कृषि -भोजन (3500-2500BC)

                 उपकरण स्वमेव ही कृषि विकास का इतिहास भी बताते हैं ।  बहादराबाद हरिद्वार में ताम्र उपकरण स्स्न्कृति के औजार मिले हैं जैसे फरुशा , भाले , बरछे , छल्ले आदि और गढ़वाल में हरिद्वार से 70 मील दूर धनपुर, डोबरी , पोखरी और कुमाऊं में गंगोली , सीरा  अदि जगहों में ताम्बे की खाने होने से सिद्ध होता है कि पहाड़ों में ताम्बा बनाने व औजार /हथियार बने होंगे ।
औजार याने कृषि में विकास या युद्ध विकास और फिर अंदाजा लगा जाता है कि किस तरह कृषि में विकास हुआ होगा ।
डा नौटियाल गढ़वाल -कुमाऊं में Pale -red -grey ware संस्कृति पाए जाने और जंगली बैलों , पालतू सुअर और पालतू घोड़ों के अवशेष मिलने से यह पता लगता है कि कई जानवरों का पालतू करण हो चुका होगा। इस युग में उत्तराखंड में भी अन्न भंडारीकरण , कृषि उपकरण में सुधार से कृषि को नई शक्ति मिली होगी ।
शायद इस युग या इससे पहले के युग में पत्थर का पयाळु (पथर की गहरी थाली )  व लकड़ी के वर्तन अधिक बने होंगे ।
 मौर्य और गुप्त काल में उत्तराखंड से घोड़े निर्यात होते थे जिससे पता चलता है कि घोड़ो की नस्ल के बारे में मनुष्य समझने लगा होगा ।
पेड़ों से औषधि का ज्ञान भी इसी युग में अधिक हुआ होगा
मोहनजो दाडो सभ्यता हरियाणा -सहारनपुर में विकसित हो चुकी तो इस सभ्यता के कई उपकरण व कृषि विज्ञानं ज्ञान हिमालय में भी पंहुचा ही होगा ।

 
शेष  -- उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास भाग … 3  में
Copyright @ Bhishma  Kukreti  23/8 /2013
Reference-
Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts
Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170


 ( उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में ताम्र युग में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )   

                                 उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास

                                    आलेख :  भीष्म कुकरेती


                                      प्रस्तर  युग में   उत्तराखंड में कृषि व भोजन (Food and Agriculture in Stone Age)



                                                      आदि प्रस्तर युग में भोज्य पदार्थ भोजन विधि

                        प्रस्तर युग के उपकरणों से पता चलता है कि हिम युग अंत के पश्चात उत्तराखंड में मानव विचरण शुरू हो गया था । गंगाद्वार (हरिद्वार ) के समीप आदि प्रस्तर युग के फ्लेक , स्क्रैपर्स , चौप्र्स आदि के निसान मिले हैं । यह सिद्ध होता है कि सोन -मानव टोली हिमालय की कम ऊँची पहाड़ियों (जम्मू से नेपाल तक ) विचरण करती थीं ।
              इस युग में मांस , कंद -मूल -फल भोज्य पदार्थ थे
   अनुमान है कि सोन मानव युग में मनुष्य ने शिला -चौपर्स या गंडासा जैसा उपकरण बनाना सीख लिया था  । वर्तमान गंडासे जैसा शिला उपकरण से मांस , कंद -मूल -फल काटा जा सकता था । मांस या कंद-मूल की  छोटी छोटी बोटियाँ काटने के लिए शिला गंडासे पर दांत नुमा शिला दराती भी थीं ।
  आखेट हेतु इस युग का मानव एक जगह नही रुकता था । उत्तराखंड में सोन मानव कौन से पशुओं और वनस्पतियाँ को खाता था  यह पूर्णत: नही पता है ।
डा के . पी . नौटियाल , सकलानी व विनोद नौटियाल का लेख

                                                   मध्य प्रस्तर  युग में भोज्य पदार्थ भोजन विधि

१५००० साल पहले के इस युग में कास्ट , अस्थि व पत्थर उपकरण प्रयोग में थे और इन उपकरणों में निखार आ गया था । अब ये उपकरण अधिक हल्के, कलापूर्ण  व सुडौल बनने लगे थे जो कि उस समय के भोजन खाने की विधि पर प्रकाश डालते हैं ।
  चकमक पत्थर की समझ से मानव को आग के लाभ मिलने लगे थे । यही समय था जब मांस को भुनकर खाने की शुरुवात हुयी ।

                                              उत्तराखंड में प्रस्तर छुरिका -संस्कृति और मानव भोजन

      इतिहास कार डा शिव प्रसाद डबराल लिखते हैं कि हरिद्वार के पास डा यज्ञ दत्त शर्मा को प्रस्तर उपकरनो के साथ ऐसी शिलाएं भी मिली   जो  उत्तराखंड में प्रस्तर छुरिका -संस्कृति होने के संकेत देते हैं ।  इस संस्कृति युग में भी आखेट व पशु भक्षण आदि मानव भोजन था   । गुफाओं व पर्ण कुटीरों में रहने का अर्थ है कि मनुष्य भोजन भंडारीकरण भी करता होगा । 
          इस समय का मानव आखेट संस्कृति से आगे नही बढ़ पाया  था   ।
                    प्रस्तर छुरिका -संस्कृति में यहाँ के मनुष्य का भोजन वनैले गाय , बैल , भैस , घोड़े , भेद -बकरियां , हिरन चूहे , मछली व घड़ियाल का मांस था ।
  कंद मूल फल जो पाच जाता हो  होगा ।

                                                  उत्तराखंड में उत्तर प्रस्तर संस्कृति और मानव भोजन


                     उत्तर प्रस्तर संस्कृति याने १५०००-से ५५०० वर्ष पूर्व के संस्कृति में मानव सभ्यता में कई परिवर्तन आये ।

                                     उत

Bhishma Kukreti

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                                        उत्तराखंड  परिपेक्ष में  प्याज का इतिहास
                                     History of Onion   (Alium cipa )  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -   1

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand     -1                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --25                                                History of Agriculture Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 25
                                                     आलेख :  भीष्म कुकरेती
   
इतिहासकार बताते हैं कि प्राचीनतम मानव जंगली  प्याज का सेवन करता था।
इरान -पश्चमी पाकिस्तान में शायद सबसे पहले प्याज का कृषिकरण (5000 BC) हुआ।
इजिप्ट /मिश्र में पिरामिड में मृत राजा (1160 BC ) के मुंह में प्याज पाया गया है।
प्याज को संस्कृत में पलांडू कहते हैं और सुश्रवा के वैदकी ग्रन्थ में पलांडू नाम प्याज के  प्रयोग हुआ है।
संस्कृत में प्याज के कई नकारात्मक नाम भी हैं बताते हैं कि भारत में प्राचीन काल अथवा वैदिक काल से ही बहस  रही है कि प्याज सेवन सही है  गलत।

मौर्य काल में (300 BC -75 AD ) लिखे गए कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में प्याज का नाम नही है, कौटिल्य ने  मूल भोज्य  वनस्पति को , पिंडालुका (अरबी ) व वज्रकंद कहा है।
उत्तराखंड में प्याज और लहसून प्राचीन काल से ही अंग रहा है

आइन -ए -अकबरी (सत्तरहवीं सदी ) में भी प्याज का जिक्र है।

प्याज  आधुनिक राजनीति को भी प्रभावित करने में सक्षम है।

Copyright @ Bhishma  Kukreti  28/9/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Om Prakash , 2005, Cultural History of India

Potato in The Indian Economy


xx xx

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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

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                                   उत्तराखंड  परिपेक्ष में  मर्सू/चुआ  /केदारी चूहा/चौली का इतिहास
                                     History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  अनाजों  का  इतिहास - 

                                  History of Cereals  Agriculture and food in Uttarakhand                           
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --24                                                History of Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 24
                                                     आलेख :  भीष्म कुकरेती


 मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना /राजगिरा उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण अनाज व साग माना जाता था व कहीं कहीं आज भी मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना एक महत्वपूर्ण अनाज है जैसे पांडूकेश्वर जैसे क्षेत्र।
उत्तराखंड में मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना  शायद सबसे आधुनिक अपनाया अनाजों में से एक अनाज है।
मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना  खेती  का आरम्भ मध्य अमेरिका में 6000 साल पहले हो चुका था।  मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना मध्य अमेरिका में एक धार्मिक अनाज भी था।  जब स्पेनी मध्य अमेरिका पंहुचे और उन्होंने मध्य  लोगों पर जोर जबरदस्ती कर मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना खेती बंद करवा दी।
सोलहवीं सदी  में मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना यूरोप पंहुचा।  ब्रिटिश राजा के उद्यान में मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना फूल के रूप सन 1595 में उगाने के रिकॉर्ड मिलते हैं।
जहां  एसिया का प्रश्न है मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना  आदि देशों में अठारवीं सदी अंत में ही पंहुचा होगा। नेपाल व उत्तराखंड में उन्नीसवीं सदी के मध्य या अंत में ही मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना का प्रचलन शुरू हुआ ।
ऐसा लगता है कि मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना के गढ़वाल प्रवेश में तिब्बत या मरछ्या कौम का कुछ ना कुछ हाथ है तभी  गढ़वाली में मरसू /मार्सू बोला जाता है (छ शब्द से स शब्द बदला होगा , छ।  ख और स में भेद भी नही पाया जाता था ) याने कि वह अनाज जिसे मार्छ्या /मर्छ्या उगाते हैं।
मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना /राजगिरा उगाने के लिए कोई अधिक ताम -झाम  करना नही पड़ता है अत: मर्सू /चौली /केदारी चूहा या चुवा /रामदाना /राजगिरा के प्रवेश करते ही उत्तराखंड में इसकी खेती  प्रसिद्ध हो गयी हो गयी होगी ।
स्वतन्त्रता से पहले गढ़वाल के लोग मर्सू दुगड्डा (ढाकर )  जाते थे और बदले में दुकानदार से लूण -गुड लेते थे.

Copyright @ Bhishma  Kukreti  28/9/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Notes on History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Pithoragarh Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Champawat Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Bageshwar Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Almora Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Nainital Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Udham Singh Nagar Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Haridwar Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Pauri Garhwal ,Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Uttarkashi  Garhwal ,Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Tehri Garhwal ,Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Dehradun Garhwal ,Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Chamoli Garhwal ,Uttarakhand;History of  Amaranth  (Amarathus virdi and A.caudetus)   in Rudraprayag Garhwal ,Uttarakhand;



                                   उत्तराखंड  परिपेक्ष में  ओगल/ओगळ   /कोटू /फाफड़ा का इतिहास
                                     History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  अनाजों  का  इतिहास - 

                               History of Cereals  Agriculture and food in Uttarakhand                           
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --23                                                History of Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 23
                                                     आलेख :  भीष्म कुकरेती



 ओगल कभी उत्तराखंड की मुख्या फसल  होती थी ।
ओगल से आटा बनता है।  ओगल पुरे हिमालय क्षेत्र में हरी सब्जी के काम आता है।
ओगल/ओगळ  घरेलु उपचार में औषधीय प्रयोग में भी आता है जैसे खून की कमी होम पर लोहे की कढाई में पत्तों को उबालकर   रोगी को देना।  पुराने कब्ज दूर करने हेतु भी ओगल काम आती है।
ओगल /ओगळ में रूटीन paye jane के कारण ओगल बहुत उपयोगी है।
ओगल /ओगळ के फूलों से नेक्टर मिलता है जिसे शहद की मक्खियाँ  पसंद करती हैं और एक विशेष लाभदायी शहद भी  प्राप्त किया जाता है।
ओगल /ओगळ की पत्तियों से खाद भी बनती है और बंजर भूमि के सुधारी करण  काम भी ओगल आती थी।
लेकिन इस लेखक का अनुभव है कि उन्नीसवीं - बीसवीं सदी में ओगल /ओगळ को दरकिनार कर दिया गया था
ओगल /ओगळ के पत्तों से कपड़े भी रंगे जाते थे।
ओगल/ओगळ या कोटू /फाफड़ा का कृषिकरण लगभग 6000 -5000 वर्ष पहले चीन के  दक्षिण यूनन या सिचुइन या पूर्वी तिब्बत में शुरू हुआ।  ओगल का चीनी नाम तिब्बती -वर्मी भाषा में  है .
कुछ वैज्ञानिक पश्चमी तिब्बत को ओगल /ओगळ या कोटू /फाफड़ा के कृषिकरण  का  मानते हैं। भारत में ओगल/ओगळ ने या ओगल/ओगळ  पश्चिम तिब्बत से या पूर्वी तिब्बत से वर्मा , फिर उत्तर पूर्वी प्रदेश , नेपाल हुयी  उत्तराखंड , हिमाचल , कश्मीर पंहुची।
शायद यह भी हो सकता है कि ओगल/ओगळ या कोटू /फाफड़ा पूर्वी तिब्बत -वर्मा सीमा से  आसाम -मेघालय -अरुणाचल प्रदेश -भूटान में फैला हो और ओगल या कोटू /फाफड़ा ने कश्मीर , हिमाचल, उत्तराखंड  में पश्चिम तिब्बत के रस्ते प्रवेश किया होगा .
महाभारत और अशोक काल में उत्तराखंड से यदि शहद निर्यात होता था और जिसकी बड़ी मांग थी तो मेरा अनुमान है कि उत्तराखंड में ओगल/ओगळ   /कोटू /फाफड़ा की खेती 3000 साल  चुकी होगी।  ओगल/ओगळ   /कोटू /फाफड़ा से मधुमक्खियों को रिझाया जाता है और वै  मधुमक्खियाँ ओगल/ओगळ   /कोटू /फाफड़ा के पराग चूस कर एक विशिष्ठ शहद बनाती हैं.
 ब्रिटिश काल या उससे पहले उत्तराखंड में मकई /मुंगरी की खेती को जनता से अधिक प्रोत्साहन मिला. और शायद ओगल/ओगळ   /कोटू /फाफड़ा की खेती पीछे होती गयी।
आज आवश्यकता है कि ओगल/ओगळ   /कोटू /फाफड़ाको सरकारी और सामजिक प्रोत्साहन मिले। ओगल/ओगळ   /कोटू /फाफड़ा में कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन , वसा , फाइबर और राख  मात्रा में मिलता है।




Copyright @ Bhishma  Kukreti  27/9/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds
P.S.Mehta, K.S.Negi, S.N. Ojha,2010,Nativa Plant genetic resources and traditional food of Uttarakhand Himalaya ...Indian Journal Of Natural Products and Resources, Vol 1(1) March 2010 page 89-96
K.S.Negi and R.D Gaur, 1994 Principal Wild Food Plants of Western Himalaya , Indian Forester
Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
Y .L .Nene ,2006, Indian Pulses Through Millenia, Asian Agri-History, Vol.10,No.3 (179-200)
K.T. Achaya, 1998, A Historical Dictionary of Indian Food
Michael Matern , A.A.Reddy   Commercial Cultivation and Profitability in  2007, Lentil: An ancient Crop for Modern Time (edited by Shyam S. Yadav et all)
Danial Zohary et all, 2012, Domestication of Plants in old World: The Origin and Spread ....
Deka R.R. & Sarkar C.R.1990, Nutrient Composition and Anti Nutritional factors of Dolichos lablab,Food Chemistry Vol 38
Mehra K.L, 2000, History of Crop Cultivation in Prehistoric India (In Ancient and Medieval History of Indian Agriculture..)
A. D'  Andrea et All, Early Domesticated Cowpea from central Ghana
William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
Helaine Selin , 2008, Encyclopedia of History of Science, Technology and Medicines
Watt, G. 1889, Dictionary of Economic Products of India
J.Janick,G.Caneva, 2004,The First Images of Maize in Europe
Amaranth:Modern Prospects for an Ancient Crop, National Research Council (US) s
G.J.H. Grubeen , 2004, Vegetables
Advances in Buckwheat Research (held at University of Agriculture, Prague August 2004)
Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
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Notes on History of Gastronomy in Uttarakhand; History of Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Notes on History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Pithoragarhh Uttarakhand ;History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Champawat ,Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Bageshwar ,Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Almora, Uttarakhand ;History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Nainital Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Ranikhet ,Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Udham Singh nagar Uttarakhand ;
History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Haridwar Garhwal, Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Chamoli Garhwal, Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Uttarkashi Garhwal, Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Pauri Garhwal, Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Tehri i Garhwal, Uttarakhand ; History of  Buckwheat (Fagopyrun esculentum)  in Dehradun Garhwal, Uttarakhand ;






                उत्तराखंड  परिपेक्ष में  मकई /मक्का /मुंगरी का इतिहास

                                        उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  अनाजों  का  इतिहास - 

                               History of Cereals  Agriculture and food in Uttarakhand                           
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --22                                                History of Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 22
                                                     आलेख :  भीष्म कुकरेती


मकई का मूलस्थान मैक्सिको को का बालसास नदी तट  है. टियोसिंटे घास के विकास से मकई का करीब 9 000 साल पहले मैक्सिको   क्षेत्र में कृषिकरण हुआ   ।
चूंकि मकई का जलवायु अनुकूलन सरल है , मकई  भूमि की आवश्यकता कम ही पडती है इसलिए सम्पूर्ण अमेरिका व कैरिबियन क्षेत्र में मकई /मुंगरी एक विशेष व महत्वपूर्ण अनाज  है। माया  संस्कृति में मकई /मुंगरी देव तुल्य है।  पशिम अफ्रीका ने  2000  पहले मैक्षिको से या इस क्षेत्र से  मकई कृषि जान ली थी।
यूरोप में सन 1515 -1517 की जिवोवानी की पेंटिंग से पता चलता है कि यहाँ मकई  पंहुच चुकी थी। वैज्ञानिक जैसे सी रिबौर्ग भी मानते हैं कि कोलम्बस मकई को 1493 सन में वेस्ट इंडीज से स्पेन लाया।
भारत व एसिया में मकई कोलम्बस अमेरिका अन्वेषण से पहले से थी या कोलम्बस -अमेरिका अन्वेषण के पश्चात् मकई का प्रवेश भारत में हुआ पर अभी भी विवाद है।
किन्तु सर्व जन सम्मत विचार है कि करीब सोलहवीं सदी में स्पेनी और पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा मकई श्री लंका , दक्षिण भारत व बंगलादेश के तटों पर पंहुची। मक्का /मकई /मुंगरी के खेती का प्रसार अठारवीं सदी व में उनीसवीं सदी में हुआ।  मक्का शब्द अरबी शब्द है जो मक्का के नाम से निकला है।
इस तरह उत्तराखंड में मक्का /मकई /मुंगरी सोलहवीं सदी अंत या सत्रहवीं सदी के प्राम्भ  में ही पंहुची होगी।  अनुकूलन का समय व उस समय के कृषि प्रचार प्रसार की स्थितियों पर नजर मारें तो कह सकते हैं कि वास्तव में उत्तराखंड की पहाड़ियों में अंग्रेजी शासन के बाद ही सही माने में मकई /मक्का /मुंगरी कृषि विकास हुआ होगा और मक्का /मकई /मुंगरी इस तरह का अन्न  हो गया कि कोई उत्तराखंडी सोच नही सकता कि मकई /मक्का /मुंगरी का मूलस्थान उत्तराखंड  भारत नही है और मक्का /मकई /मुंगरी अनाज उत्तराखंड के लिए नवीनतम अनाजों में से एक अनाज है।


Copyright @ Bhishma  Kukreti  25/9/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds
P.S.Mehta, K.S.Negi, S.N. Ojha,2010,Nativa Plant genetic resources and traditional food of Uttarakhand Himalaya ...Indian Journal Of Natural Products and Resources, Vol 1(1) March 2010 page 89-96
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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

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                                   उत्तराखंड  परिपेक्ष राजमा /लुब्या  इतिहास
                                     History of Kidney Beans (Phaseolus vulgaries )  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  दालों /दलहन का  इतिहास -भाग 10 

                               History of Pulses Agriculture and food in Uttarakhand Part-10                           
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --21                                                History of Gastronomy in Uttarakhand 21
                                                     आलेख :  भीष्म कुकरेती


  बीन्स या राजमा या लुब्या /छीमी 150  में उगाया जाता है जाता है ।
  मध्य व लैटिन अमेरिका में लुब्या /राजमा या बीन्स का इतिहास 11000  पुराना है।
पेरू व मैक्सिको में किडनी बीन्स का कृषि इतिहास 7000 साल पुराना है।
पुरानी दुनिया को किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या कोलम्बस अमेरिका की खोज के बाद ही पता चला।
स्पेनी घुमन्तु अन्वेषक  किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या को पन्द्रहवीं सदी में स्पेन लाये।
 स्पेनी व पुर्तगाली व्यापारियों  अफ्रिका व एसिया वासियों को किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या का   ज्ञान कराया।
इसका अर्थ हुआ कि भारत में वास्को दा  गामा के भारत आगमन (1498 AD एवं 1502 ) के बाद ही भारत में किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या का प्रवेश हुआ होगा।
सबसे पहले किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या का प्रवेश दक्षिण भारत में हुआ।
 प्राचीन काल ही नही आज भी नये बीज को अनुकूलन में समय लगता है।  अत किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या को भारत में कृषि लायक होने में समय अवश्य लगा होगा।
धीरे धीरे यह पता लगा कि हिमालयी पहाड़ियाँ किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या खेती के अनुकूल हैं।
इन तथ्यों से पता चलता है कि उत्तराखंड में सत्तरहवीं सदी से पहले किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या नही आया होगा और फिर धीरे धीरेकिडनी बीन्स /राजमा /लुब्या खेती ने पग पसारे होंगे।  इसका सीधा अर्थ थ हुआ कि  अठारवीं सदी से ही किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या खेती ने उत्तराखंड में प्रमुखता पाई होगी।
कुछ क्षेत्रीय अपवाद छोड़कर स्वतन्त्रता से पहले किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या गढ़वाल -कुमाऊं में प्रथम श्रेणी की दाल नही मानी गयी।  यद्यपि किडनी बीन्स /राजमा /लुब्या का बहुपयोग अवश्य होता था जैसे दाल  , भरी रोटियाँ या स्वाळ बनाना , बुखण प्रयोग आदि।
स्वतन्त्रता से पहले शादियों में या तो उड़द की दाल बनती थी या साबुत तोर की दाल बनती थी। 




       
                                             



Copyright @ Bhishma  Kukreti  25/9/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds
P.S.Mehta, K.S.Negi, S.N. Ojha,2010,Nativa Plant genetic resources and traditional food of Uttarakhand Himalaya ...Indian Journal Of Natural Products and Resources, Vol 1(1) March 2010 page 89-96
K.S.Negi and R.D Gaur, 1994 Principal Wild Food Plants of Western Himalaya , Indian Forester
Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
Y .L .Nene ,2006, Indian Pulses Through Millenia, Asian Agri-History, Vol.10,No.3 (179-200)
K.T. Achaya, 1998, A Historical Dictionary of Indian Food
Michael Matern , A.A.Reddy   Commercial Cultivation and Profitability in  2007, Lentil: An ancient Crop for Modern Time (edited by Shyam S. Yadav et all)
Danial Zohary et all, 2012, Domestication of Plants in old World: The Origin and Spread ....
Deka R.R. & Sarkar C.R.1990, Nutrient Composition and Anti Nutritional factors of Dolichos lablab,Food Chemistry Vol 38
Mehra K.L, 2000, History of Crop Cultivation in Prehistoric India (In Ancient and Medieval History of Indian Agriculture..)
A. D'  Andrea et All, Early Domesticated Cowpea from central Ghana
William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
Helaine Selin , 2008, Encyclopedia of History of Science, Technology and Medicines
Watt, G. 1889, Dictionary of Economic Products of India




Notes on History of Gastronomy in Uttarakhand; History of Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड म

Bhishma Kukreti

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                                             उत्तराखंड परिपेक्ष में  गाजर , शिमला मिर्च का इतिहास
                                     History /Origin /introduction of  Carrot and  Bell Pepper   in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 16

                                     History of Vegetables  Agriculture and Food in Uttarakhand -16                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --40                                         History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 40

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती


गाजर के बीजों का  उपयोग 2000 BC  से होता आ है।  लाल गाजर सबसे पहले अफगानिस्तान , कश्मीर में 1100 इ में सबसे पहले प्रकाश में आया। 
जहां तक शिमला मिर्च का प्रश्न है शिमला मिर्च  स्थान मैक्षिको है।
स्पेनी व्यापारी 1493 इ में शिमला मिर्च को मक्सिको से स्पेन लाये  और फिर  बाद यूरोप में  शिमला मिर्च की   खेती शुरू हुयी
ब्रिटिश ने सबसे पहले शिमला मिर्च को उनीसवीं सदी में शिमला में उगाया। इसी लिए इस सब्जी को शिमला मिर्च कहते हैं। ऐसा लगता है शिमला मिर्च का हिमाचल में प्रवेश  तुरंत बाद देहरादून की पहाड़ियों में खेती शुरू हुयी होगी।
उत्तराखंड के भाभर , तराई और मैदानी क्षेत्रों में गाजर -शिमला मिर्च उगाये  जाते हैं। पहाड़ी हिस्सों में गाजर -शिमला मिर्च उगाने का अभी भी कम प्रचलन है।


Copyright @ Bhishma  Kukreti  24/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds
P.S.Mehta, K.S.Negi, S.N. Ojha,2010,Nativa Plant genetic resources and traditional food of Uttarakhand Himalaya ...Indian Journal Of Natural Products and Resources, Vol 1(1) March 2010 page 89-96
K.S.Negi and R.D Gaur, 1994 Principal Wild Food Plants of Western Himalaya , Indian Forester
Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
Y .L .Nene ,2006, Indian Pulses Through Millenia, Asian Agri-History, Vol.10,No.3 (179-200)
K.T. Achaya, 1998, A Historical Dictionary of Indian Food
Michael Matern , A.A.Reddy   Commercial Cultivation and Profitability in  2007, Lentil: An ancient Crop for Modern Time (edited by Shyam S. Yadav et all)
Danial Zohary et all, 2012, Domestication of Plants in old World: The Origin and Spread ....
Deka R.R. & Sarkar C.R.1990, Nutrient Composition and Anti Nutritional factors of Dolichos lablab,Food Chemistry Vol 38
Mehra K.L, 2000, History of Crop Cultivation in Prehistoric India (In Ancient and Medieval History of Indian Agriculture..)
A. D'  Andrea et All, Early Domesticated Cowpea from central Ghana
William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
Helaine Selin , 2008, Encyclopedia of History of Science, Technology and Medicines
Watt, G. 1889, Dictionary of Economic Products of India
J.Janick,G.Caneva, 2004,The First Images of Maize in Europe
Amaranth:Modern Prospects for an Ancient Crop, National Research Council (US) s
G.J.H. Grubeen , 2004, Vegetables
Advances in Buckwheat Research (held at University of Agriculture, Prague August 2004)
Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
Om Prakash , 2005, Cultural History of India

B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

xx xx

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )



                                            उत्तराखंड  परिपेक्ष में शलजम  का इतिहास
                                     History /Origin /introduction of  Turnip (Brassica rapa)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 15

                                     History of Vegetables  Agriculture and Food in Uttarakhand -15                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --39                                         History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 39

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती

शलजम के  जन्मस्थली के बारे में वैज्ञानिकों में सहमती नही है।  किन्तु इस बात पर सहमती अवश्य है कि शलजम का जन्मस्थान मेडिटेरीयन भूभाग से  पकिस्तान तक हो सकता है और 2000 BC से पहले शलजम का जन्म हो चुका था । वैज्ञानिक साबेरिया को भी शलजम का जन्मस्थान मानते है। सिकन्दर साहित्य (300 BC  )में शलजम का उल्लेख मिलता है। संस्कृत में इसे शिखामूल कहते हैं।
ऐसा लगता है   की शलगम  का उपयोग भारत में 1500 BC में  हो चुका था। इस समय भारत में शलजम का उपयोग तिलहन के लिए होता था।
उत्तराखंड में भी शलजम सिकन्दर युग से पहले उगाया  जाता होगा. शायद पंजाब क्षेत्र से शलजम का ज्ञान उत्तराखंड के मैदानी निवासियों को हुआ होगा।
पहाड़ों में शलजम नही उगाया जाता  है या बहुत कम ही उगाया जाता है . हो सकता है कि बड़े मूला के विकास के बाद शलजम की अहमियत पहाड़ों में कम हो गयी होगी।  या यह भी हो सकता है कि शलजम की आयु कम होने से शलजम की खेती नही की गयी होगी।   मैदानी , भाभर व तराई क्षेत्र में  शलजम की  बड़ी मात्रा में खेती होती है। 

Copyright @ Bhishma  Kukreti  23/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
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Mehra K.L, 2000, History of Crop Cultivation in Prehistoric India (In Ancient and Medieval History of Indian Agriculture..)
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Amaranth:Modern Prospects for an Ancient Crop, National Research Council (US) s
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B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )



                                     उत्तराखंड  परिपेक्ष में  भिन्डी का इतिहास
                                     History /Origin /introduction of Okra  ( Abelmoschus esculentus)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 15

                                     History of Vegetables  Agriculture and Food in Uttarakhand -15                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --39                                         History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 39

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती

 भिंडी यद्यपि पहाड़ों में अवश्य बोई जाती थी किन्तु अधिक मात्रा में नही।
उत्तराखंड के पहाड़ों व बहुत समय में मैदानों में उसी सब्जी को अधिक महत्व दिया जाता रहा है जिसका सुक्सा बन सके अथवा आप अधिक दिन तक खराब ना हो जैसे कद्दू या मूला।
भिन्डी के मूल स्थान के बारे में वैज्ञानिकों में मतभेद है।  कुछ भोज्य भिन्डी के मूल स्थान इथोपिया क्षेत्र  पूर्वी अफ्रिका को  मूल स्थान मानते हैं। 14000 वर्ष पूर्व मिश्र व नील नदी के किनारे भिंडी की खेती होती थी  वहां से भारत भिंडी पंहुची।
कुछ भारत को या वर्मा आदि के क्षेत्र को भिंडी का मूल स्थान मानते हैं।
यदि भारत मूल स्थान है तो जंगली भिंडियों की प्रजाति आदि के कारण उत्तर प्रदेश भिन्डी का मूल स्थान माना जा सकता है. जंगली भिंडियों के उगने से कहा जा सकता है कि उत्तराखंड-नेपाल का  तराई वाला क्षेत्र और उत्तरी उत्तर प्रदेश भिंडी का मूल स्थान हो सकता है या यहाँ से भिंडी का वितरण या विवधीकरण हुआ।
कौटिल्य के अर्थ शास्त्र में भिन्डी का उल्लेख है।  संस्कृत साहित्य में भिंडी को बेंडकाय  , टिंडीशा या गन्धमूल कहा गया है (K.V.Peter and Abraham, 2007,  Biodiversity in Horticulture Crops, page 149)


Copyright @ Bhishma  Kukreti  21/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )



                                       उत्तराखंड  परिपेक्ष में   फूल गोभी का इतिहास
                                     History /Origin /introduction of  Cauliflower (Brassica oleracea and variants)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 14

                                     History of Vegetables  Agriculture and Food in Uttarakhand -14                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --38                                         History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 38

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती





 फूल गोभी अधिकतर उत्तराखंड के मैदानी भागों में उगाई जाती है। 
 फूल गोभी का जन्मस्थान एसिया माइनर या साइप्रस क्षेत्र है । मेडिटेरियन  क्षेत्र में फूल गोभी की खेती 2500 सालो से हो  रही थी ।   इटली में फूल गोभी का  में कृषिकरण अधिक हुआ हुआ।  सोलहवीं सदी में फूल गोभी  यूरोपीय क्षेत्र में प्रचलित हुयी।

भारत में  अंग्रेजों द्वारा  सन 1822 में गोभी उगाना शुरू किया। स्वरुप एवं चटर्जी के अनुसार भारत में पहली बार ब्रिटिश संस्थान Kew के डा जेनसन  द्वारा  बोटनिकल गार्डन सहरानपुर व मसूरी में  फूल  गोभी उगाई गयी ।   फिर भारत के कई हिस्सों में मई जून में गोभी के  बीज बोये गये और  पाया कि इंग्लैण्ड से लाये बीज भारत में उग सकते हैं।  सन 1822 से  आज तक फूल गोभी में   कई तरह के वैज्ञानिक विकास किये गए हैं । 

यदि ईस्ट इंडिया के ब्रिटिश अधिकारियों ने सहारनपुर व मसूरी में फूल गोभी सन 1822 में उगाना शुरू किया तो सन 1823  में अवस्य ही देहरादून में भी फूल गोभी उगाई गयी होगी। 



Copyright @ Bhishma  Kukreti  18/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
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K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
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William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
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Amaranth:Modern Prospects for an Ancient Crop, National Research Council (US) s
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Advances in Buckwheat Research (held at University of Agriculture, Prague August 2004)
Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
Om Prakash , 2005, Cultural History of India

B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

xx xx

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )
History /Origin /introduction of  Cauliflower   in Uttarakhand;History /Origin /introduction of  Cauliflower   in Mussurie Uttarakhand;History /Origin /introduction of  Cauliflower   in Dehradun Uttarakhand;History /Origin /introduction of  Cauliflower   in Garhwal Uttarakhand;History /Origin /introduction of  Cauliflower   in kumaon,Uttarakhand;History /Origin /introduction of  Cauliflower   in Uttarakhand, Himalaya;History /Origin /introduction of  Cauliflower   in Uttarakhand North India;History /Origin /introduction of  Cauliflower   in Uttarakhand south Asia


                                       उत्तराखंड  परिपेक्ष में टमाटर   का इतिहास
                                     History of Tomato ( Licopersicon esculentum) in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 13

                                  History of Vegetables  Agriculture and Food in Uttarakhand -13                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --37                                         History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 37

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती


  सन उनीस सौ पिचहतर तक पहाड़ी उत्तराखंड में टमाटर की फसल कम ही उगाई जाती थी।  टमाटर की खेती आज भी मैदानी व भाभर क्षेत्र में  महत्वपूर्ण खेती मानी जाती है।  पहले पहल पहाड़ों में छोटे छोटे  टमाटर की जाती उगाई जाती थी।
वस्तुतः टमाटर  मूल स्थान पश्चिमी -दक्षिण अमेरिका   है जहां 5000 BC में टमाटर  कृषिकरण शुरू हुआ।
स्पेनी अन्वेषक हेमन कोर्टस 1521 इश्वी में टमाटर को स्पेन लाये।  यहाँ से टमाटर यूरोपीय देशों में फैला।  यूरोप में टमाटर के रंग और अन्य कारणों से टमाटर को जल्दी स्वीकृति नही मिली। इटली  रिसिपी साहित्य पुस्तक (1692 इ ) में टमाटर का उल्लेख है। सत्रहवीं सदी में ही टमाटर को भोज्य पदार्थ के रूप में यूरोप में स्वीकृति मिली। 
दक्षिण अमेरिका में स्पेनी राज्य  बाद टमाटर का प्रवेश वेस्ट इंडीज में हुआ।  जहां से टमाटर फिलीपाइन पंहुचा और फिर दक्षिण  एशियाई देशों में पंहुचा।
जहां तक भारत का प्रश्न है, पुर्तगालियों द्वारा टमाटर का प्रवेश भारत में हुआ।  पुर्तगाली कब और कहाँ पहले पहल टमाटर को भारत लाये जैसे प्रश्न का उत्तर अभी तक नही मिल पाया है।
हालांकि असलीमाने में भारत में टमाटर खाने का प्रचलन ब्रिटिश काल से ही शुरू हुआ।
टमाटर को अभी भी बंगाली में बिलायती बेगून  कहा जाता है।
टमाटर उन्नीसवीं सदी में भारत में यूरोपीय लोगों के लिए उगाया जाता था।  उस समय टमाटर के प्रजाति आज के मुकाबले कहीं अधिक खट्टी व कसैली थी।
सर जॉर्ज वाट (1889 )  लिखा है कि भारत में टमाटर की खेती अधिकाँशतः ब्रिटिश लोगों के लिए की जाती है। वाट लिखते हैं कि बंगाली टमाटर के खट्टे पन  के लिए ही टमाटर का उपयोग करते हैं। याने कि टमाटर को भारत में इसके खट्टेपन के लिए ही प्रोत्साहन मिला होगा। 
इस लेखक के अनुमान से उत्तराखंड में टमाटर के खेती देहरादून में  ही 1815  -1830 ई के बाद शुरू हुआ होगा ।  नैनीताल , पौड़ी, लैंसडाउन , रानीखेत में शायद ब्रिटिश अधिकारियों लिए टमाटर उगाया  जाता रहा होगा।
उत्तराखंड के  पहाड़ों में बीसवीं सदी में ही टमाटर का प्रचलन शुरू हुआ होगा।  मैदानी भागों में आम जनता के मध्य बीसवीं सदी में ही टमाटर की खेती शुरू हुयी। 
आज उत्तराखंड के पहाड़ी गाँव में भी टमाटर के खेती होती है। 


Copyright @ Bhishma  Kukreti  17 /10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
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Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
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T.R.Goplakrishna, 2007, Vegetable Crops

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Notes on History of Tomato; History of Tomato in Garhwal;History of Tomato in Pauri  Garhwal;History of Tomato in Chamoli Garhwal;History of Tomato in Rudraprayag Garhwal;History of Tomato in Tehri Garhwal;History of Tomato in Uttarkashi Garhwal;History of Tomato in Dehradun Garhwal;History of Tomato in Haridwar Garhwal;History of Tomato in Kumaon ;History of Tomato in Pithoragarh Kumaon ;History of Tomato in Champawat Kumaon ;History of Tomato in Bageshwar Kumaon ;History of Tomato in Nainital Kumaon ;History of Tomato in Almora Kumaon ;History of Tomato in Udham Singh Nagar Kumaon ;History of Tomato in Ranikshet Kumaon ;History of Tomato in Dwarhat Kumaon ;
History of Tomato in Uttarakhand context; History Tomato Asian country


                                      उत्तराखंड  परिपेक्ष में  बैंगन /भट्टा  का इतिहास
                                     History of Brinjal /Eggplant (Solanum melongena)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 12

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand -12                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --36                                         History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 36

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती

भट्टा /बैंगन का जन्मस्थल भारत को माना जाता है किन्तु बैंगन की  जाती का जन्मस्थल अफ्रिका को भी माना  जाता है।

भट्टा का सर्वप्रथम उल्लेख संस्कृत साहित्य में मिलता है। प्राचीन  संस्कृत (300 BC ) में बैंगन के लिए 33 नाम मिलते हैं जिनमे वर्त्त्का , भंटकी और नटिंगन नाम अधिक प्रयोग हुए हैं Swarup 1995 )। वर्तकु   संस्कृत पूर्व कोल -मुंड  भाषाई शब्द है। बुद्ध एवं जैन साहित्य में भी बैंगन का उल्लेख है।  बैंगन संस्कृत नाम वतीं + गनह से  पैदा हुआ है  (Ramesh Bhat and S Vasanthi ,2008)।
विद्वान् बी.  एन आचार्य के अनुसार बैगन का उल्लेख रामायण और महाभारत में हुआ है।
वृक्षवेड में बैगन की कई जातियों का वर्णन मिलता है।
आठवीं सदी के कश्यप के कृषि सूत्र में बैंगन के लाभ हानि पर चर्चा हुयी है।
जैन एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणो के लिए बैंगन ताज्य था.
चीनी यात्री झेंग हे ने 1402 में बंगाल में बैगन के उपयोग का विवरण दिया है।
इसी तरह सोलहवीं सदी में पुर्गाली यात्री ने कर्णाटक में बैगन कृषि का उल्लेख किया है।
आईने -ए -अकबरी में भी बैगन का उल्लेख है।
सोलहवीं सदी के बंगाली साहित्य 'चान्दिमंगला ' में बैंगन का उल्लेख हुआ है।
चौथी शताब्दी के चीनी साहित्य में बैगन कृषि व बैगन के बारे में विवरण मिलता है।
सातवीं सदी के प्राचीन अरबी साहित्य और नवीं सदी के अफ्रीकी साहित्य में बैंगन का विवरण मिलता है। 
इन तथ्यों से साफ़ पता चलता है कि बैगन का ज्ञान उत्तराखंड में हजारो साल से था।  किन्तु बैगन ब

Bhishma Kukreti

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                              उत्तराखंड  परिपेक्ष में  बैंगन /भट्टा  का इतिहास
                                     History of Brinjal /Eggplant (Solanum melongena)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 12

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand -12                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --36                                         History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 36

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती

भट्टा /बैंगन का जन्मस्थल भारत को माना जाता है किन्तु बैंगन की  जाती का जन्मस्थल अफ्रिका को भी माना  जाता है।

भट्टा का सर्वप्रथम उल्लेख संस्कृत साहित्य में मिलता है। प्राचीन  संस्कृत (300 BC ) में बैंगन के लिए 33 नाम मिलते हैं जिनमे वर्त्त्का , भंटकी और नटिंगन नाम अधिक प्रयोग हुए हैं Swarup 1995 )। वर्तकु   संस्कृत पूर्व कोल -मुंड  भाषाई शब्द है। बुद्ध एवं जैन साहित्य में भी बैंगन का उल्लेख है।  बैंगन संस्कृत नाम वतीं + गनह से  पैदा हुआ है  (Ramesh Bhat and S Vasanthi ,2008)।
विद्वान् बी.  एन आचार्य के अनुसार बैगन का उल्लेख रामायण और महाभारत में हुआ है।
वृक्षवेड में बैगन की कई जातियों का वर्णन मिलता है।
आठवीं सदी के कश्यप के कृषि सूत्र में बैंगन के लाभ हानि पर चर्चा हुयी है।
जैन एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणो के लिए बैंगन ताज्य था.
चीनी यात्री झेंग हे ने 1402 में बंगाल में बैगन के उपयोग का विवरण दिया है।
इसी तरह सोलहवीं सदी में पुर्गाली यात्री ने कर्णाटक में बैगन कृषि का उल्लेख किया है।
आईने -ए -अकबरी में भी बैगन का उल्लेख है।
सोलहवीं सदी के बंगाली साहित्य 'चान्दिमंगला ' में बैंगन का उल्लेख हुआ है।
चौथी शताब्दी के चीनी साहित्य में बैगन कृषि व बैगन के बारे में विवरण मिलता है।
सातवीं सदी के प्राचीन अरबी साहित्य और नवीं सदी के अफ्रीकी साहित्य में बैंगन का विवरण मिलता है। 
इन तथ्यों से साफ़ पता चलता है कि बैगन का ज्ञान उत्तराखंड में हजारो साल से था।  किन्तु बैगन बहुत कम मात्रा में उत्तराखंड की पहाड़ियों में उगाया जाता रहा है शायद इसके पीछे इस  लोक कथन का हाथ हो ," अदा रोग भट्टा पूरो रोग खट्टा ".

Major Reference for Brinjal,
Ramesh V Bhat and V . Vasanti , 2008, Antiquity of the Cultivation and Uses of Brinjal in India , Asian Agri-History , Vol 12

Copyright @ Bhishma  Kukreti  10/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
Om Prakash , 2005, Cultural History of India

B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

xx xx

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )
History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant;History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant in Garhwal;History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant in Kumaon;History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant in Haridwar;History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant in Uttarakhand;History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant in Himalaya;History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant In India;History , origin , domestication of Brinjal/Eggplant in Asia;










                         उत्तराखंड  परिपेक्ष में   मीठा करेला     का इतिहास

                     मीठा करेला का जन्म स्थान दक्षिण अमेरिका का पेरू  3000 साल पहले से मानव इसे प्रयोग में लाता रहा है।  मीठा करेला शायद सत्रहवीं सदी में  अठारहवीं सदी में भारत पंहुचा।  भारत में हिमालय के पहाड़ियों में वरसात में उगाया जाता है।  उत्तराखंड में अंग्रेजों  के आने के बाद ही मीठा करेला का प्रवेश निश्चित होता है।
                     उत्तराखंड  परिपेक्ष में  कडुआ करेला  का इतिहास

कडुआ करेला का जन्म स्थान निश्चित नही हो सक रहा है। 
                             
अधिकतर वैज्ञानिक भारत को कडुआ करेला का जन्मस्थान मानते हैं और वर्मा के आस पास जगह को कडुआ करेले का जन्म स्थान भी मानते हैं .
ऋग्वेद में कडुआ करेला का जिक्र है (डा अचया ).
आयुर्वेद में भी करेला उपयोग का वर्णन है
उत्तराखंड में भी हजारों सालों से करेला उगता आया है। 




Copyright @ Bhishma  Kukreti  9/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
Anup Mishra , Agriculture in Chalolithic Age in North-Central India
Mahabharata
All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
Lallan Ji Gopal (Editor), 2008,  History of Agriculture in India -1200AD
K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
Steven A .Webber and Dorien Q. Fuller,  2006, Millets and Their Role in Early Agriculture. paper Presented in 'First Farmers in Global Prospective' , Lucknow 
Joshi A.B.1961, Sesamum, Indian central Oil Seeds Committee , Hyderabad
Drothea Bradigian, 2004, History and Lore of Sesame , Economic Botany vol. 58 Part-3
Chitranjan  Kole , 2007  ,  Oilseeds
P.S.Mehta, K.S.Negi, S.N. Ojha,2010,Nativa Plant genetic resources and traditional food of Uttarakhand Himalaya ...Indian Journal Of Natural Products and Resources, Vol 1(1) March 2010 page 89-96
K.S.Negi and R.D Gaur, 1994 Principal Wild Food Plants of Western Himalaya , Indian Forester
Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
Y .L .Nene ,2006, Indian Pulses Through Millenia, Asian Agri-History, Vol.10,No.3 (179-200)
K.T. Achaya, 1998, A Historical Dictionary of Indian Food
Michael Matern , A.A.Reddy   Commercial Cultivation and Profitability in  2007, Lentil: An ancient Crop for Modern Time (edited by Shyam S. Yadav et all)
Danial Zohary et all, 2012, Domestication of Plants in old World: The Origin and Spread ....
Deka R.R. & Sarkar C.R.1990, Nutrient Composition and Anti Nutritional factors of Dolichos lablab,Food Chemistry Vol 38
Mehra K.L, 2000, History of Crop Cultivation in Prehistoric India (In Ancient and Medieval History of Indian Agriculture..)
A. D'  Andrea et All, Early Domesticated Cowpea from central Ghana
William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
Helaine Selin , 2008, Encyclopedia of History of Science, Technology and Medicines
Watt, G. 1889, Dictionary of Economic Products of India
J.Janick,G.Caneva, 2004,The First Images of Maize in Europe
Amaranth:Modern Prospects for an Ancient Crop, National Research Council (US) s
G.J.H. Grubeen , 2004, Vegetables
Advances in Buckwheat Research (held at University of Agriculture, Prague August 2004)
Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
Om Prakash , 2005, Cultural History of India

B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )





                                        उत्तराखंड  परिपेक्ष में  चचिंडा व गुदड़ी / तोरई   का इतिहास
                                     History of Snake Gourd (Trichosanthes anguina) Ridge Gourd  (Luffa acutangula /cylindrika) Etc   in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास - 10

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand -10                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --34                                                History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 34

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती


 चचिंडा  व तोरई (गुदड़ी ) का जन्म भारत में हुआ और  उपयोग दस हजार वर्ष पहले  चुका था।

चचिंडा का जन्म हिमालय की पहाड़ियों की तलहटियों में हुआ (E.L. Harvey et all, 2006)।
इसी तरह वैज्ञानिकों का अनुमान है कि तोरई गुदड़ी का भी जन्म हिमालय के ढलानों या मध्य भारत की पहाड़ियों में या पूर्वी भारत में हुआ (E.L. Harvey et all, 2006)। 
भारत में ही दोनों सब्जियों का कृषिकरण हुआ।

चचिंडा और गुदड़ी/तोरई  उत्तराखंड में भी हजारों सालों से रही हैं और शायद उत्तराखंड में इनका कृषि करण धातु युग से  पहले ही हो चुका होगा .
आयुर्वेद में इन दोनों का वैकल्पिक प्रयोग का उल्लेख है याने किन सब्जियों के शरीर को लाभ का उल्लेख हुआ है ।
कश्यप के कृषिसूत्र  (800 AD ) में चचिंडे और तोरई की जातियों का जिक्र है ।


 Copyright @ Bhishma  Kukreti  8/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
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K.K Nautiyal History of Agriculture in Garhwal , an article in History of Agriculture in India -1200AD
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Gopinath Mohanty et all, 2007, Tappasu Bhallika of Orissa : Their Historicity and Nativity
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Michael Matern , A.A.Reddy   Commercial Cultivation and Profitability in  2007, Lentil: An ancient Crop for Modern Time (edited by Shyam S. Yadav et all)
Danial Zohary et all, 2012, Domestication of Plants in old World: The Origin and Spread ....
Deka R.R. & Sarkar C.R.1990, Nutrient Composition and Anti Nutritional factors of Dolichos lablab,Food Chemistry Vol 38
Mehra K.L, 2000, History of Crop Cultivation in Prehistoric India (In Ancient and Medieval History of Indian Agriculture..)
A. D'  Andrea et All, Early Domesticated Cowpea from central Ghana
William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
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Watt, G. 1889, Dictionary of Economic Products of India
J.Janick,G.Caneva, 2004,The First Images of Maize in Europe
Amaranth:Modern Prospects for an Ancient Crop, National Research Council (US) s
G.J.H. Grubeen , 2004, Vegetables
Advances in Buckwheat Research (held at University of Agriculture, Prague August 2004)
Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
Om Prakash , 2005, Cultural History of India

B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष में  तुमड़ी/लौकी   का इतिहास
                                     History of Bottle Gourd  (Lagenaria siceraria)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -  9

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand -9                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --33                                                History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 33

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती


लौकी या तुम्बी का उपयोग मनुष्य कृषि यूग से भी पहले करता था।
लौकी को मनुष्य भंडारीकरण हेतु उपयोग करता था.
लौकी का उपयोग 10000  वर्षों से हो रहा है
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि लौकी का जन्मस्थल अफ्रिका है और कुछ भारत को लौकी का जन्मस्थल मानते हैं।
लौकी 5000 वर्ष पहले अमेरिकी द्वीप पंहुच चुकी थी।
दक्षिण पूर्व एसिया में लौकी भारत से ही पंहुची।
संस्कृत में लौकी को तुम्ब या क्षीर तुम्ब कहते हैं। ऋग्वेद में लौकी का वर्णन मिलता है (Anne Harwood ,2008 )
उत्तराखंड में भी लौकी 5000 -8000 साल पहले पंहुच चुकी थी। या हो सकता है लौकी का जन्म उत्तराखंड के नजदीक ही हुआ होगा !
तुमड़ी का उपयोग भण्डार हेतु वर्तन के रूप में 1950  होता रहा है।
  उत्तराखंड सबंधी बुद्ध साहित्य में तुंब /तुम्बरी का जिक्र है।

आयुर्वेद में लौकी उपयोग का वर्णन है।
जॉर्ज वाट (1889 ) ने भारत में लौकी कृषि का वर्णन किया है।
उत्तराखंड में लौकी को तुमड़ी कहते हैं।



Copyright @ Bhishma  Kukreti  7/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
B.K G Rao, Development of Technologies During the  Iron Age in South India
V.D Mishra , 2006, Prelude Agriculture in North-Central India (Pragdhara ank 18)
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K.T. Achaya, 1998, A Historical Dictionary of Indian Food
Michael Matern , A.A.Reddy   Commercial Cultivation and Profitability in  2007, Lentil: An ancient Crop for Modern Time (edited by Shyam S. Yadav et all)
Danial Zohary et all, 2012, Domestication of Plants in old World: The Origin and Spread ....
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William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
Helaine Selin , 2008, Encyclopedia of History of Science, Technology and Medicines
Watt, G. 1889, Dictionary of Economic Products of India
J.Janick,G.Caneva, 2004,The First Images of Maize in Europe
Amaranth:Modern Prospects for an Ancient Crop, National Research Council (US) s
G.J.H. Grubeen , 2004, Vegetables
Advances in Buckwheat Research (held at University of Agriculture, Prague August 2004)
Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
Om Prakash , 2005, Cultural History of India

B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )
History of Bottle Gourd in Uttarakhand; History of Bottle Gourd in Garhwal, Uttarakhand; History of Bottle Gourd in Kumaon Uttarakhand; History of Bottle Gourd in Dehradun Uttarakhand;History of Bottle Gourd in Haridwar Uttarakhand;History of Bottle Gourd in Uttarakhand, North India;History of Bottle Gourd in Uttarakhand, South Asia;History of Bottle Gourd in Uttarakhand, Asian continent ;


                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष में  कद्दू /खीरा   का इतिहास
                                     History of Pumpkin  (Cucurbita moschata  )in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -  8

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand 8                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --32                                                History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 32

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती

   गढ़वाली में कद्दू    (Cucurbita moschata  )  खीरा कहते हैं।  और एक समय कद्दू का अत्यंत महत्व था।
किन्तु कद्दू भारत में सोलहवीं सदी के समय या सत्रहवीं सदी में ही आया।
कद्दू (Cucurbita moschata  ) का मूल स्थान दक्षिण अमेरिका का मैक्सिको (5000 BC ) व पेरू क् (3000 BC ) क्षेत्र  है।
कद्दू स्पेनी अन्वेषकों द्वारा गल्फ व वेस्ट इंडीज के समुद्री किनारे पंहुचा व एसिया से 1688 में यूरोप पंहुचा।
भारत में कद्दू शायद गल्फ देशों सेसत्रहवीं सदी में ही पंहुचा और  धीरे धीरे अठारवीं सदी में कद्दू का प्रसार हुआ।
एक युरोपियन यात्री की पुस्तक से पता चलता है कि बंगाल में आलू और कद्दू पुर्तगाली व्यापारी लाये किन्तु आलू खेती का प्रसार तेजी से हुआ और कद्दू का प्रसार मंथर गति से हुआ।
उन्नीसवीं सदी के प्रथम वर्षों या अठारवीं सदी के अंत में कद्दू ने उत्तराखंड में प्रवेश पाया होगा और अंग्रेजी शासन समय में ही कद्दू का प्रसार उत्तराखंड में तेजी से हुआ होगा।
चूँकि कद्दू का फल अधिक दिनों तक टिका रहता है तो कद्दू की खेती को महत्व मिलना लाजमी था। 


Copyright @ Bhishma  Kukreti  6 /10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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All Vedas
Inquiry into the conditions of lower classes of population
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Deka R.R. & Sarkar C.R.1990, Nutrient Composition and Anti Nutritional factors of Dolichos lablab,Food Chemistry Vol 38
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William  Shurtleff , Akiko Aoyagi 2010, History of Soyabeans and Syfood in South Asia / Indian subcontinent (1665-)
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Permindar Ratan and Priti Kothiyal, 2001, Fagopyrun esculentum , Moench (common buckwheat) edible plants of Himalayas : A review,Asian Journal of Pharmacy and Life Science (Vol-1)
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B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

xx xx

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )
History of Pumpkin in Uttarakhand; History of Pumpkin in Pithoragrh Uttarakhand; History of Pumpkin in Bageshwar Uttarakhand;History of Pumpkin in Champawat Uttarakhand; History of Pumpkin in Nainital Uttarakhand; History of Pumpkin in Almora Uttarakhand;History of Pumpkin in Udham singh nagar Uttarakhand;History of Pumpkin in Pauri Garhwal Uttarakhand; History of Pumpkin in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Pumpkin in Rudraprayag Garhwal Uttarakhand; History of Pumpkin in Tehri Garhwal Uttarakhand;History of Pumpkin in Uttarkashi Garhwal Uttarakhand;History of Pumpkin in Dehradun Garhwal Uttarakhand; History of Pumpkin in Haridwar  Uttarakhand;






                                              उत्तराखंड  परिपेक्ष में  कखड़/कखड़ी /खीरा   का इतिहास
                                     History of Cucumber (Cucumis  sativus  )in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -  7

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand  7                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --31                                                History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 31

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती

 ककड़ी को  हिंदी में खीरा कहते हैं।
ककड़ी गढवाल -कुमाऊं में  महत्वपूर्ण जायज फसल है।
ककड़ी के बारे कहा जाता है कि ककड़ी का जन्म 10000 साल पहले हिमालय की ढलानों में हुआ था।
 कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि बर्मा के हिमालय क्षेत्र में ककड़ी का जन्म हुआ तो कुछ का मानना है कि पश्चमी हिमालय में ककड़ी /खीरा का जन्म हुआ।
गंगा के तट पर ककड़ी का कृषिकरण की बात होती है।
भारत में 3000 साल पहले से ककड़ी का उपयोग होता आ रहा है। भारत से चीन में ककड़ी पंहुची। चीन से रेशम पथ से मिश्र , रोम ग्रीस आदि में पंहुची।   चीन में ३ BC पहले ही ककड़ी उपयोग शुरू हुआ। वहीं से अन्य दक्षिण एशियाई देशों में ककड़ी प्रसिद्ध हुयी
यदि बर्मा में ककड़ी का जन्म होता तो अवश्य ही ककड़ी भारत के अन्य भागों से पहले चीन पंहुच जाती। . इसका सीधा सधा अर्थ है कि ककड़ी का जन्म पश्चिमी मध्य हिमालय ( उत्तराखंड व हिमाचल  ) में हुआ और गंगा नदी के किनारे कहीं कृषिकरण शुरू हुआ।
गढ़वाल -कुमाऊं में भी बर्मा की भाँती जंगली ककड़ी (इलाड़ु ) मिलती है।
चाणक्य (321 BC ), के अर्थ शास्त्र में ककड़ी का उल्लेख हुआ है।  कश्यप की रचनाओं (500 AD )  चिरभिता कहा गया है।







Copyright @ Bhishma  Kukreti  5 /10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)
B.Chandrasekaran et all, 2010 ,A Text Book of Agronomy

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastrono

Bhishma Kukreti

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                                              उत्तराखंड  परिपेक्ष में   मूला /मूली का इतिहास
                                     History of Radish (Raphanus sativus  )in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -  6

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand   6                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --30                                                History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 30

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती

मूली या मूला एक प्राचीनतम भोज्य पदार्थ है।
मूली व  सबंधी वनस्पति चूँकि जंगली आकार में नही मिलती हैं अत : अभी तक वैज्ञानिक यह पता  असफल हैं कि वास्तव में मूली का मूलस्थान कहाँ है।
कहा जाता है कि मूली का अलग अलग स्थानों में उगी या दो जातियों के मिश्रण से मूली का जन्म हुआ।
इस तरह मूली का  भारत या पूर्व दक्षिण एसिया व भूमध्य सागर -कैप्सियन सागर के पास आलग तरह से जन्म हुआ।
मिश्र में मूली 5 000 हजार साल पहले भोज्य पदार्थ बन चुकी थी। क्योंकि पिरामिडों की दीवालों में मूली के चित्र मिले हैं।
चीन में भी मूली 2000 साल पहले से भोज्य पदार्थ बन चुकी थी।
भारत में भी मूली 2500 पहले भोज्य पदार्थ बन चुकी थी।  आयुर्वेद में मूली का उल्लेख हुआ है.
उत्तराखंड में मूली या तो भारत के उस स्थान से आई जहां इसका उद्गम रहा होगा अथवा सदूर पूर्व दक्षिण एसिया,  बंगाल, नेपाल होते हुए उत्तराखंड आई और यहाँ या उत्तर पूर्वी हिमालय में मूला का आकार लेकर उत्तराखंड पंहुची ।
अथवा दक्षिण चीन से तिबत होते हुए उत्तराखंड पंहुची।
यह निश्चित मान सकते है कि मूला ने उत्तराखंड में 2000 साल पहले  डेरा डाल  दिया होगा।


Copyright @ Bhishma  Kukreti  4 /10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)

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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Notes on History of radish in Garhwal, History of radish in Kumaon , History of radish in Dehradun; History of radish in Haridwar ; History of radish in Uttarakhand ;History of radish in North India;History of radish in India; History of radish in South Asia

                                              उत्तराखंड  परिपेक्ष में   जिमीकंद/सोरण  का इतिहास
                                     History of Elephant Foot Yam  (Amorphophallus campanulatus )in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -  5

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand   5                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --29                                                History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 29

                                                          आलेख :  भीष्म कुकरेती
 
जिमीकंद उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में  खाया जाता था।  अब मैदानों से पहाड़ी इलाकों में भी  बननी शुरू हो गयी है।
जिमीकंद की खेती देहरादून , हरिद्वार , उधाम सिंह नगर और भाभर इलाके में स्तर पर होती है।
 जिमीकंद का जन्मस्थल पूर्वी दक्षिण एसिया के मलेसिया क्षेत्र है . जंगली जिमीकंद हजारो साल पहले इन क्षेत्रों में पाया जाता था। भारत में जिमीकंद कई हजार साल पहले आ चुका था। ए.  वी . सम्भमूर्ति और सुब्रमनियम मानते हैं कि जिमीकंद भारत में जन्मा वनस्पति है।
हो सकता है कि जिमीकंद का खाद्य उपयोग भारत में हुआ हो।

वैदिक भारतीय जिमीकंद का उपयोग करते थे।  संस्कृत में जिमीकंद के कई नाम हैं जैसे आलू , सुकन्दिन , कंठाल सुरःण , अर्साघना  आदि ।
जिमीकंद का आयुर्वेद में स्वास , आंतो व पेट की बीमारियों की दवाइयों में उपयोग होता था।
निघन्टू साहित्य में भी जमीकंद का उल्लेख मिलता है।


Copyright @ Bhishma  Kukreti  3 /10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


                 
                                     उत्तराखंड  परिपेक्ष में तैड़ू /रतालू   का इतिहास
                                     History of Tarur (Dioscorea belophylla, D.deltodia ) and White Yam  (D. rotunda)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -  4

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand   4                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --28                                                History of Agriculture Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 28
                                           आलेख :  भीष्म कुकरेती
   दुनिया में तैड़ू /रतालू की पैदावार सभी कंद मूल (Tubers and Bulbs ) में उत्पादन में चौथे नम्बर पर आता है।
तैड़ू /रतालू या Dioscorea की 600 species हैं।
तैड़ू /रतालू लाखों साल पहले इस धरती पर आ चुका था. कुछ वैज्ञानिक पश्चिम अफ्रिका व कुछ पूर्वी दक्षिण एसिया को तैड़ू /रतालू का जन्म स्थल मानते हैं।
पश्चिम अफ्रीका में  मनुष्य 50000 BC में तैड़ू /रतालू का उपयोग करते थे।
3000 BC पहले अफ्रिका और दक्षिण एसिया में कृषिकरण शुरू हुआ और भारत में 2000 BC पहले तैड़ू /रतालू की खेती शुरू हो चुकी थी । .
उत्तराखंड में भी मानव तैड़ू /रतालू का उपयोग  खाद्य पदार्थ के रूप में 2000 BC शुरू कर चुका होगा।
तैड़ू /रतालू की सैकड़ों जातियां हैं। संस्कृत या आयुर्वेद में तैड़ू /रतालू को आलूका , कास्टआलुका ,हस्त्यालुका आदि कहा गया है
उत्तराखंड में तैड़ू /रतालू जाड़ों व शिव रात्रि की एक महत्वपूर्ण सब्जी रही है किंतु उत्तराखंड में तैड़ू /रतालू की खेती नही की जाती और तैड़ू /रतालू के लिए जगंल पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
गढ़वाली में रतालू का नाम तैड़ू  क्यों पड़ा इस पर अभी खोज होनी बाकी है।
मेरा एक विचार है कि तैड़ू का नामकरण खस काल, महाभारत काल या प्रस्तर कुलिंद काल  में होगा।
किन्तु फिर प्रश्न उठता है कि अन्य प्राचीनतम खाद्य पदार्थों या अनाजों के खस कालीन या कुलिन्दकालीन या कैंत्युरी कालीन नाम गुम  कैसे हो गए ?
 


                                                 
Copyright @ Bhishma  Kukreti  1/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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B.N.Shrivastava ,Potato in The Indian Economy , International Potato Center
Pushkar Nath, 1969,  Potato in India
Roots and Tuber Crops , 2010 (edited by:J.E.Bradshaw)

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Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


                 

                                       उत्तराखंड  परिपेक्ष में पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी   का इतिहास
                                     History of Elephant Ear Yam (Colocasia esculenta) Or Taro  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -   3

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand   3                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --27                                                History of Agriculture Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 27
 

                                                  आलेख :  भीष्म कुकरेती


पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण भोजन रहा है।  पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी के उत्तराखंड में कई उपयोग हैं। पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी के   ट्यूबर से विभिन्न सब्जियां व पत्तों से भी विभिन्न तरकारियाँ उत्तराखंड में बनती हैं।
पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी का मूल स्थान जम्बूद्वीप के मलय (बंगलादेश -मायनार -मलेसिया के बीच का स्थान ) स्थान को माना जाता है।  शायद भारत के दक्षिण पूर्व में 10000 वर्ष पहले पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी का उपयोग शुरू हो चुका था. यद्यपि इस सिद्धांत के वरोध में एकाद सवाल उठते हैं किन्तु अभी तक ठोस आधार नही मिले हैं।  पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी में जलन पैदा करने वाले रसायन (किंक्वाळी ) इसका का उपयोग केवल आगके बाद  ही शुरू हुआ होगा।
ऐसा लगता है कि उत्तर प्रस्तर उपकरण युग में कहीं 6000 BC में पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी उत्तराखंड में आ चुका था और यह कंद मूल वर्ग में एक महत्व पूर्ण खाद्य पदार्थ हो चुका होगा।
डा डबराल डा मजूमदार व पुसलकर का सन्दर्भ देकर लिखते हैं कि कंद -मूल फलों में और साग सब्जियों में से प्याज , बथुआ , हल्दी , कचालू (पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी) , नासपती , अंगूर , अंजीर  आदि बनैले रूप में हिमालय की ढालों पर इनमे से कुछ को उगाने का श्रेय भी उसी मानव को मिलना चाहिए।
संस्कृत में पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी को आलू (कंद -मूल ) के श्रेणी में रखा गया है और कच्च भी कहा गया है।  याने कि पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी का उपयोग वैदिक काल से पहले हो चुका था।
आइन -ए -अकबरी में भी कचालू का उल्लेख मिलता है।
गढ़वाल में पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी संबंधी एक लोक  गाथा है जिसमे भगवान निरंकार पिंडाळु  /घुइंया / अरवी /अरबी को श्राप देते हैं कि अरबी पर किंक्वाळी (कच्ची सब्जी या गरम गर्म सब्जी में गले में जलन ) हो जायं। 


Copyright @ Bhishma  Kukreti  1/10/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )



                                       उत्तरी व पूर्वी भारत में उत्तराखंड  से आलू की खेती शुरू हुयी

                                       उत्तराखंड  परिपेक्ष में  अल्लु /आलू  का इतिहास
                                     History of Potato   ( Solanum Tubersum )   in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  सब्जियों  का  इतिहास -   2

                                  History of Vegetables  Agriculture and food in Uttarakhand    2                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --26                                                History of Agriculture Gastronomy, food, recipes  in Uttarakhand 26
                                                     आलेख :  भीष्म कुकरेती
   
आलू भारत में एक ऐसी सब्जी है कि जिसके बगैर रसोई घर के बारे में भारतीय सोच ही नही सकता है।  किन्तु आलू का इतिहास भारत में तीन चार सौ साल ही पुराना है।
आलू का मूल स्थान  अमेरिका महाद्वीप के दक्षिण  पेरू है।  अनुमान है कि पेरू या आस पास 8000 -5000 BC  में आलू का उगाना शुरू हो गया था.
सोलहवीं सदी के मध्य स्पेनी लोग आलू को यूरोप लाये और फिर यूरोप में आलू का प्रसार हुआ ।
सत्तरहवीं सदी के प्रारम्भ में पुर्तगाली व्यापारी आलू को सूरत बन्दरगाह पर लाये।  दक्षिण भारत व पश्चिम भारत में सामन्य भासा में आलू को बटाटा (पोटेटो का अपभ्रंश ) कहते है. पश्चिम भारत में आलू को पहले बटाटा सुरता कहते हैं और सूरत से ही आलू गोवा गया।
इडवार्ड टेरी ने 1615 में अजमेर में असफ खान  द्वारा सर थॉमस रो को  भोज में  आलू परोसने की बात लिखी है (A Voyage to East India 1655) )।
आम भारतीय भाषाओं में आलू जमीन के नीचे उगे बल्ब को कहते हैं।    सुरपाल द्वारा नागरी लिपि में लिखत  प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'वृक्षआयर्वेद 'में आलू का उल्लेख मिलता है (नलनी साधले , 1996 )
पहले पहल आलू के प्रति आम हिन्दुओं में  विरोध जैसा व्यवहार था।  आज भी आम जैन समाज आलू (जमीन के नीचे का कंद )  नही खाता है।
फ्रायर ने गार्डन ऑफ कर्नाटक (1875 ) पुस्तक में   कर्नाटक के उद्यानों व खेतों में आलू उगाने का उल्लेख किया है।
तामिल नाडू में आलू की खेती 1882 ई से  प्रारम्भ हुयी।
 

                 देहरादून से उत्तरी भारत में आलू कृषि प्रारम्भ !

मसूरी या अन्य पहाड़ियों में मेजर यंग ने अठारवीं सदी के प्रारम्भ शायद 1823 ई से पहले   आलू की खेती प्रारम्भ की और देखते देखते 1828 तक उत्तराखंड की पहाड़ियों , पंजाब और हिमाचल आदि में आलू की खेती र्प्सिध हो चली।
आसाम में 1830 ई में डेविड स्कॉट ने आलू की खेती प्रारम्भ की।
बंगाल में बोटनिकल गार्डन दार्जिलिंग में इंग्लैण्ड से लाये गये आलू बीज सन 1879 में बोये गए। 




Copyright @ Bhishma  Kukreti  30/9/2013


                                   References   Dr. Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas 1- 9 Parts Dr K.K Nautiyal et all , Agriculture in Garhwal Himalayas in History of Agriculture in India page-159-170
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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


Bhishma Kukreti

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                                      उत्तराखंड  परिपेक्ष में  तिमल /गूलर   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास                                                   
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan Fig (Ficus auriculata)  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास -28

                                     History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -28                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --68                                          History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -68


                                                                आलेख :  भीष्म कुकरेती


 
उत्तराखंडी नाम - तिमल।  तिमलु
हिंदी नाम व अन्य नाम -गूलर , धूसी , तिरमाड , तिमल ,त्रेमबेल
जन्मस्थान - इस प्रजाति का जन्मस्थल हिमालय है।  जब कि आम गूलर का जन्म पश्चमी एसिया  हुआ।  गूलर ही  पहला फल हैं जिसका उपयोग प्रथम बार मनुष्य ने किया।  उत्तराखंड  गूलर ऐसा फल है जिसे मनुष्य ने सबसे पहले उपयोग किया।
रहन सहन - गूलर जंगल में भी हो सकता है किन्तु खेतों में जुताई -निराई -गुड़ाई से मिट्टी के सहलाने के कारण हवादार मिट्टी से गूलर खेतों में अधिक फलता फूलता है। हिमालय में 1500 मीटर की ऊंचाई तक गूलर पैदा होता है। ऊंचाई 3 -10 मीटर तक भी जा सकती है।

                तिमल की सब्जी

कच्चे फलों को चार भागों में या दो भागों काटकर उसके अंदर फूलों को खुरच दिया जाता है ।
इन कटे फलों को छांछ में आठ दस मिनट उबाला जाता है।  फिर उबले तिमल को अलग से साफ़ पानी में कुछ देर उबाला जाता है।
फिर उबले तिमलु को गरम  पानी से उतार कर ठंडा किया जाता है।
गरम कढ़ाई में तेल गरम कर तेल में जख्या , भांग , धनिया की बीज छौंका जाता है।  फिर लहसुन , एक कटे प्याज को थींचे अदरक के साथ छौंकते हैं और फिर उबले तिमल के कटे फलों को छौंका जाता है।  फिर मसाला नमक मिलाकर पकाया जाता है। तिमल से तरीदार सब्जी कम ही बनती देखि सुनी है।

                अन्य उपयोग

तिमल के फल तो काम आते ही हैं तिमल के पत्ते चारे  के  रूप में उपयोगी पेड़ है।
लकड़ी का बहु उपयोग होता है।
वैदकी में भी तिमल का उपयोग होता है।
 
Copyright @ Bhishma Kukreti  27 /11/2013 Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;  ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )



                                      उत्तराखंड  परिपेक्ष में  बांस   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास                                                   
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Male Bamboo  (Dendrocalamus strictus) in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास -27

                                     History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -27                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --67                                          History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -67


                                                                आलेख :  भीष्म कुकरेती


उत्तराखंडी नाम -बांस
नेपाली नाम -कबान बांस
हिंदी नाम -बांस
संस्कृत नाम -वावंस
जन्मस्थल -भारत , महाभारत  ( विराट पर्व व कुरुक्षेत्र युद्ध )में बांस का उल्लेख है और उत्तराखंड परिपेक्ष में कीचक वेणु के रूप में वांस का उल्लेख हुआ है। वंसलोचन का उल्लेख आयुर्वेदिक पुस्तकों में हुआ है।  कालिदास ने उत्तराखंड में बांस का उल्लेख किया है। 
रहन सहन - 8 से 16 मीटर ऊंचा , 2 .5 से 8 cm गोलाई ,

                नईपत्र [कलियों व नई जड़ों की भाजी


बांस के रेशे खतरनाक ढंग से चुभने के कारण भोज्य पदार्थों में कम ही प्रयोग होता है।
नई नई पत्तियों की कलियों व नई जड़ों को काटकर संग्रह कर , खुरच कर साफ़ कर क्र धोया जाता है और फिर  एक इंच लम्बे में काटा जाता है।
इन कटी पत्तियों की कलियों व कोमल जड़ों को छांछ में उबाला जाता है और फिर पानी से साफ़ कर साफ़ पानी में नमक के साथ फिर उबाला जाता है।  मैदानों में बांस -कलियों को  चूने के पानी में उबाला जाता है।
जब बांस की कलियाँ कोमल हो जाय तो उन्हें  धनिया बीज या भांग बीज व जख्या के साथ छौंका जाता है।  फिर कटा धनिया , थोड़ा सा मसाले के साथ कुछ देर तक पकाया जाता है। हरा धनिया , हरी मिर्च काटकर सब्जी में छिड़ककर उतार दिया जाता है।  वास्तव में बांस की सब्जी सलाद के रूप में ही प्रयोग होती  है।
यह कभी कमजोर दिनों की सब्जी थी।

               बहुपयोगी बांस

उत्तराखंड सहित भारत में बांस के बगैर जिंदगी सोची ही नही जा सकती थी।  धार्मिक अनुष्ठानों सहित फर्नीचर आदि मी बांस उपयोगी है।
बांस का औषधीय उपयोग भी है।


Copyright @ Bhishma Kukreti  25 /11/2013 Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;  ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

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                            उत्तराखंड  परिपेक्ष में कंडाळी /सिशुना/ बिच्छू घास     की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास                                                   
                            History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास -26

                                     History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -26                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --66                                          History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -66


                                                                आलेख :  भीष्म कुकरेती


उत्तराखंडी नाम - कंडाळी /कनाली ,सिशुना
नेपाली  नाम - सिशुना हिंदी नाम - बिच्छू घास
रहन सहन - पाकिस्तान से नेपाल व चीन की हिमालयी क्षेत्र में पाये जाना वाला पौधा।  1000 से 4500 मीटर की ऊंचाई पर 1 . 5 मीटर ऊंचा पौधा।  इसके तने पर झीस होते हैं।
कंडाळी में केरोटीन (विटामिन A ), विटामिन C, प्रोटीन, खनिज  बहुतायत से पाया जाता है।
                         कंडाळी  की हरी सब्जी
कंडाळी को केवल जाड़ों में खाया जाता है। 
कंडाली के कोमल डंठल -पत्तियों को काट कर  लाया जाता है।  कपड़े की सहायता बिच्छू घास को पकड़कर   से जलती आग में घुसाकर एकदम से निकाला जाता है जिससे झीस जल जायं।
फिर कंडाली की हरी सब्जी वैसे  ही बनायी  जाती है जैसे पालक / राइ की सब्जी बनाई जाती है।
किन्तु बिच्छू घास का उत्तराखंड करी /तरीदार साग के रूप में  अधिक उपयोग होता है।
पहले बिच्छू घास की हरी सब्जी जैसे तेल में हींग के साथ भूना जाता है फिर उसमे चार पांच घंटे भीगे झंगोरा /चावल /गहथ को पीसकर बने पेस्ट को मिलाया जाता है।  ग्राम मसाले व अन्य मसालों को मिलर पानी के साथ पकाया जाता है।
                  अन्य उपयोग
बिच्छू घास से रेशे मिलते  हैं रस्सियां भी बनाई जाती हैं।
बिच्छू घास का औषधीय उपयोग भी है। Copyright @ Bhishma Kukreti  24 /11/2013 Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;  ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Uttarakhand Context , Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens )in Pauri Garhwal, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Chamoli Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables  in Rudraprayag Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens )in Tehri Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible  vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens )  in Uttarkashi, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables   Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Pithoragarh,Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens )in Almora, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens )in Bageshwar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Nainital, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Champawat , Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Haridwar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens ) in Dehradun Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Himalayan Nettle  (Urtica ardens )  in Udham Singh Nagar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;







                             उत्तराखंड  परिपेक्ष में  कंड्या, बण ओगळ   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास                                                   
                            History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास -25

                                     History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -25                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --65                                          History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -65


                                                                आलेख :  भीष्म कुकरेती


उत्तराखंडी नाम - कंड्या , झमकारा , बन ओगळ
नेपाली नाम -बन फापर
रहन सहन - पकिस्तान से लेकर भारतीय हिमालयी क्षेत्र , नेपाल, भूटान , वर्मा -वियतनाम तक व चीनी हिमालय में 1200 -3000 मीटर तक की ऊंचाई में पानी के निकट व नमी वाले क्षेत्र में उगता है। इसका पौधा एक मीटर से दो मीटर तक ऊंचा होता है।
कंड्या में कई प्रोटीन खासकर रूटीन पाया जाता है।

         कंड्या/झमकारा  की सब्जी

                        सामग्री
कटे कंड्या की पत्तियां व डंठल - 250 ग्राम
नमक -स्वादानुसार
कडुवा तेल -एक से दो चमच तक
छौंका लगाने के लिए - चमच जीरा या जख्या
पिसा धनिया -पौण से एक चमच
पिसी हल्दी -पाव चमच
पिसा लाल मिर्च -आधा चमच
हरी मिर्च -दो कटी मिर्च
मध्यम आकार का टमाटर -बारीक कटा  एक
लहसुन , प्याज व अदरक -पेस्ट स्वादानुसार

                         कंड्या की सब्जी बनाने कि विधि
कढ़ाई में तेल गर्म होने दें।  गरम तेल में जख्या को तड़कने दें , लहसुन लहसुन , प्याज व अदरक के पेस्ट को थोड़ी देर भूनें फिर टमाटर डालें व कटी पत्तियों व कटे डंठल डालें व  मिनट बाद नमक सहित मसाले डालें। आठ -दस मिनट तक पकाएं। कटी हरी मिर्च डालकर उतार दें।
बण ओगल का कपिलु /फाणु याने सूप भी बनाया जाता है।
बीजों  से आटा भी बन सकता है।
बीजों  को भिगाकर स्प्राउट जैसे भी प्रयोग होता है।

                                बन ओगल के औषधीय उपयोग

बन ओगल के औषधीय उपयोग भी हैं।  रक्त चाप बढ़ाने हेतु प्रयोग होता है। , सर्प दंस व कीड़ों के काटने , त्वचा जलन , स्त्रियों के माहवारी आदि में बणओगळ का औषधीय उपयोग होता है।


Copyright @ Bhishma Kukreti  23 /11/2013 Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;  ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )
Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )  in Uttarakhand Context , Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys ) in Pauri Garhwal, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )  in Chamoli Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )  in Rudraprayag Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )  in Tehri Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible  vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )   in Uttarkashi, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys ) in Pithoragarh,Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables in Almora, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )   in Bageshwar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )  in Nainital, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )   in Champawat , Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys ) in Haridwar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys ) in Dehradun Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Perennial Buckwheat (Fagophyrum dibotrys )   in Udham Singh Nagar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;






                             उत्तराखंड  परिपेक्ष में  बरमाउ /बरमौ की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास                                                   
                            History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra )  in Uttarakhand context

                                           उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास -24

                                     History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -24                       
         
                                              उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --64                                          History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -64


                                                                आलेख :  भीष्म कुकरेती

  उत्तराखंडी नाम - बमराउ /बमरौ
नेपाली नाम साग
कश्मीरी नाम -छतर /चतर
बिमराउ का जन्मस्थल हिमालय की पहाड़ियां हैं।
रहन सहन  - हिमालय के पकिस्तान से कश्मीर , हिमाचल , उत्तराखंड , भूटान ,  नेपाल और चीनी हिमालय तिब्बत तक के क्षेत्र में 3400-4000  मीटर ऊंचाई  में पाया जाता है अधिकतर भोजपत्र के जंगलों में उगता है. फूल गोभी व राई के परिवार का सदस्य है।  बिमरौ की ऊंचाई 1. 8 मीटर तक जाती है।
 
उत्तराखंड में बमराउ की प्रजाति खतरे में है।  किन्तु अब कुछ परिवार बमराउ को घरों /सग्वडो में उगाने लगे हैं।
 बमराउ की पत्तियों की सब्जी उसी तरह बनाई जाती है जैसे पालक की हरी सब्जी बनायी जाती है।
बमराउ की पत्तियों को धुंवा देकर सुक्सा बनाया जाता है जड़ों की सब्जी के लिए उपयोग होता है।

बमराउ के जड़ों का बुखार व मलेरिया रोग में औषधीय उपयोग होता है।
 
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Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables  Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Uttarakhand Context , Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Pauri Garhwal, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra )  in Chamoli Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra )  in Rudraprayag Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables  Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Tehri Garhwal Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible  vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Uttarkashi, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables in Pithoragarh,Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra )  in Almora, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Bageshwar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Nainital, Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; History /Origin /introduction of wild edible vegetables in Champawat , Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context; Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Haridwar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Dehradun Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;Notes on History /Origin /introduction of  wild edible vegetables Ruga Sag / Barmau (Megacarpaea polyandra ) in Udham Singh Nagar Uttarakhand, Middle Himalaya , North India, South Asia  context;


Bhishma Kukreti

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उत्तराखंड  परिपेक्ष में  चाउ मिन / चाउ में (Chow  Mein )   भोजन व खानपान   इतिहास

                                             

                                     History of Chinese Food Chau Mein  Food in Uttarakhand - 41    A                     
         
                    उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   41 A

                     History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -  71
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      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )

 यद्यपि उत्तराखंड में मारछा अथवा भोटिया जाति हजराओं सालों से रहती आयी है और वे 'चाउ में' खाते ही रहे होंगे किन्तु गैर मार्छा  लोगों ने कुछ वर्षों पहले चाउ में चखा भी नहीं होगा।  आज उत्तराखंड में चाउ मिन एक स्थानीय  भोजन बन ही चुका है। अति स्थानीय सड़कों पर चाय वाले भी चाउ मिन बेचते पाए जाते हैं।  यह फास्ट फ़ूड आज क्रेज बन चुका है।
     1974  में उत्तराखंड में चीनी भोजन मुझे देहरादून के नेपाली व क्वालिटी होटल में सुनने मिला था।  तो शायद चीनी भोजन मसूरी व नैनीताल में भी मिलता रहा होगा.
       कहा जाता है भारत में चीनी भोजन 1778  से कोलकत्ता में बनना शुरू हुआ था।  भारत में चीनी भोजन की शुरुवात कोलकत्ता से ही शुरू हुआ।  फिर मुंबई या दिल्ली जैसे शहरों में भी शुरू हुआ।  1992 तक बड़े शहरों में सभ्रांत होटलों में ही चीनी भोजन मिल पता था।  तब आम होटलों के बोर्डों पर नहीं लिखा होता था पंजाबी , साउथ इंडियन और चाइनीज डिशेज।  आज तो उत्तराखंड में सामन्य होटलों के साइन बोर्डों में लिखा होता है चाइनीज भोजन मिलेगा।  वास्तव में चाइनीज फ़ूड को आम लोगों तक प्रसारित करने का श्रेय नेस्ले कम्पनी द्वारा टू मिनट्स नोड्यूल्स के विज्ञापनों को जाता है।  आम लोग नोड्यूल्स के स्वाद से परिचित हुए और उनकी जिव्हा अन्य चीनी भोजन के बारे में उत्सुक हुई तो चीनी भोजन आज भारत ही नहीं दुनिया के हर कोने में मिल जाता है।  उत्तराखंड अपवाद नहीं है।
      1992 के बाद छोटे शहरों में चीनी भोजन ने पाँव पसारने शुरू किया और मेट्रो शहरों में तो कोने ओने में चाइनीज कॉर्नर खुलने लग गए थे।  मुंबई व अन्य शहरों में नेपाली चीनी बनकर चीनी भोजन खिलाने लगे।
      बहुत से चीनी भोजन वास्तव में वास्तविक चीनी भोजन है ही नहीं बल्कि मूल चीनी भोजन का भारतीयकरण है जैसे मंचूरियन , चिल्ली चिकन , मंचाऊ सूप ,स्प्रिंग रोल्स, सेजवान , फ्राइड राय और चाउ मिन  या चौ मिन।  जी हाँ भारतीय चाउ  मिन निखालिस चीनी 'चाउ में' का भारतीय रूप है।
      चाउ /चौ कार्थ है घुमाना या घूमा कर फ्राई करना और में (मिन ) का अर्थ है नोड्यूल्स।
      चीन में चाउ में बनाते समय नोड्यूल्स को भूना नहीं जाता बल्कि पानी में उबाल कर पानी निथार  कर उसमे ऊपर से हरा सलाद , व अंडे डाले जाते हैं  सोया सॉस आवश्यक अंग है।  किन्तु भारत में कढ़ाई में भून कर उसमे सब्जी व भारतीय मसाले मिलाकर  बनाये जाता है। अधिकाँशतह  देखा गया है कि भारत में सोया सौस  की जगह कैच अप प्रयोग होता है।
     उत्तराखंड में भी नेस्ले के टू मिनट्स नोड्यूल्स के प्रचार के बाद चाउ मिन को प्रसारित होने में सरलता हुयी।  शायद सन  2000 के बाद उत्तराखंड में चाउ मिन का भयंकर क्रेज बढ़ा और आज चाउ मिन छोटे छोटे बजार में भी उपलब्ध है। ग्रामीण बजार से प्लास्टिक की थैलियों में भरकर चाउ मिन घर ले जाते हैं और फिर से गरम कर कहते हैं। हॉस्टलों में तो चाउ मिन खाना एक आवश्यकता सी बन गयी है।  उत्तराखंड में चाउ मिन कुछ अधिक तरीदार होता है।   

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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

Bhishma Kukreti

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    उत्तराखंड  परिपेक्ष में  गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan  Common Cockscom, Celosia argentea  in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 34

        History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -    34                   
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   75

          History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -75
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      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
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वनस्पति शास्त्रीय नाम -Celosia argentea
सामन्य अंग्रेजी नाम -Common Cockscom, Quail    Grass
संस्कृत नाम -सीतावर्क

नेपाली नाम -सिताभारका
उत्तराखंडी नाम - गदिरा
पौधा - वास्तव में यह एक खर पतवार है जो एक क्षेत्र में फ़ायदाबंद होता है तो दूसरे क्षेत्र में फसल के लिए आक्रमणकारी खर पतवार सिद्ध हो जाता है। 1000 मीटर  , 1600 मीटर  (नेपाल व उत्तराखंड ) से 3000  मीटर ऊंचाई वाले स्थानों में पाया जाता है। अफ्रीका में इसे खेतों के मींडों में अन्य परजीवियों से बचाने लगाया जाता है।  गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका बहुशाखीय पौधा 40 से 200 सेंटीमीटर ऊँचा हो सकता है।  गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका चटकीले लाल या गुलाबी फूलों से पहचाना जाता है।  सफेद फूल भी चटकीले आकर्षक होते हैं।
जन्मस्थल संबंधी सूचना - वनस्पति -
वनस्पति शास्त्रियों में जन्म स्थल के बारे में एक मत नहीं है। कोई अफ्रीका को और कोई भारत  व भारतीय उपमहाद्वीप को गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका जन्मस्थल मानते हैं. प्राचीन चीनी भेषक साहित्य मेंगदिरा /सीतावर्क /सिताभारका वर्णन मिलता है। प्राचीन चीनी पुस्तकों में   गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका को भुकमरी का खाद्य पदार्थ में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
यह पौधा सभी महाद्वीपों में पाया जाता है । अफ्रीका के कई देशों में खेती की जाती है। 
औषधीय उपयोग - गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका के भिभिन्न भागों से फोटोफोबिया , सरदर्द , त्वचा , घाव , दस्त , श्वेत प्रदर बीमारियों में औषधि उपयोग होता है। डाइबिटीज उपचार हेतु बीजों से दवाई बनाई जाती है
 भोजन उपयोग -
गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका में कैल्सियम , फॉस्फोरस
गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका की पत्तियों व डंठल से स्वादिष्ट , पौष्टिक तरकारी व सूप , फाणु , कपिलू बनाया जाता है जो पौष्टिक होता है।  फूलों से भी तरकारी बनती है।

गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका से हरी  सब्जी , फाणु , कपिलू  ऐसे ही बनाया जाता है जैसे कि पालक या मर्सू से बनाया जाता है। गदिरा /सीतावर्क /सिताभारका को  अन्य सब्जियों के साथ भी पकाया जा सकता है।


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 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )


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  उत्तराखंड  परिपेक्ष में   कंडारा   की सब्जी ,औषधीय व अन्य   उपयोग और   इतिहास

                                                 
          History /Origin /introduction, Food uses , Economic Uses of  Himalayan Wallich's Thistle  , Cirsium walichii in Uttarakhand context

          उत्तराखंड  परिपेक्ष  में  जंगल से उपलब्ध सब्जियों  का  इतिहास - 35

              History of Wild Plant Vegetables ,  Agriculture and Food in Uttarakhand -      35                 
         
           उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास --   76

   History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -76
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      आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
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वनस्पति शास्त्रीय नाम - Cirsium walichii
सामन्य अंग्रेजी नाम -Wallich's Thistle
संस्कृत नाम -
हिंदी नाम - बूंगसी
नेपाली नाम -थकाल , काँटा
उत्तराखंडी नाम -कंडारा
यह पौधा हिमालय में अफगानिस्तान से भूटान व चीनी हिमालय में पाया जाता है।  इसका असहय निकलता है कि कंडारा का जन्मस्थल हिमलाय है।
  कंडारा एक बहुशाखीय पौधा है जो 4 से 10 फ़ीट तक ऊंचा तक जाता है। पत्तियों के किनारे  कंटीली होती हैं कंडारा 1200 से 3300 मीटर ऊंचे  स्थलों में उगता है।
---------कंडारा का भोजन उपयोग -
      कंडारा की जड़ों/ ट्यूबर  को छीलकर सब्जी बनाई जाती है जैसे अरबी या पिंडालू की सब्जी बनाई जाती है.
इसके फूलों से सेपल , पेटल निकालकर फूल के आधार को भूख में जंगलों में खाया जाता है



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