Author Topic: Enrich Your Knowledge On Uttarakhand - उत्तराखंड के बारे संक्षिप्त जानकारी  (Read 78281 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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गढ़वाल मैं जन-जागरण के प्रथम ब्यक्ति

०१-प्रथम अंग्रेजी पड़ने वाला गढ़वाली   पंडित लक्छमी दत नैथानी
०२-प्रथम इन्ट्रेन्स उत्तीर्ण गढ़वाली        पंडित आत्माराम गैरोला
०३-प्रथम अंडरग्रेज्वेत (इंटरमीडीइट)   पंडित गोविन्द प्रसाद घिल्डियाल
०४-प्रथम एडवोकेट हाईकोर्ट               पंडित तारादत गैरोला
०५-प्रथम यल यल बी                       पनदिर विर्ज्मोहन चंदोला
०६-प्रथम बी यस सी                         पंडित अनुसूया प्रसाद घिल्डियाल
०७-प्रथम एसी जूनियर इंजिनीअर       पंडित कुलानंद बड़थ्वाल
०८-प्रथम रेंजर                               पंडित सदानंद गैरोला
०९-प्रथम कानूनगो                          पंडित शालिग्राम वैष्णव
                                                   पंडित तारादत खंडूरी
१०-प्रथम अंग्रेजी कवी                     बी डी काला(सुमाडी )

Risky Pathak

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Uttarakhand Land Records

Here you can find records of lands in different villages under different tehsils in all districts

You can find here
==>Village Code for different villages
==>Brief information about each village
==>Type of land etc.

http://gov.ua.nic.in/devbhoomi/default.aspx?flag=true

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Bhai yeh link nahi chal raha hai.

Uttarakhand Land Records

Here you can find records of lands in different villages under different tehsils in all districts

You can find here
==>Village Code for different villages
==>Brief information about each village
==>Type of land etc.

http://gov.ua.nic.in/devbhoomi/default.aspx?flag=true

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Shani Temple in Kharsali, Near Yamonitri - Uttarkashi

पुराणों में उल्लेख है कि भगवान श्रीकृष्ण की आठ पटरानियों में कालिंदी यमुनाजी भी हैं। मां यमुनाजी के भाई शनिदेव का अत्यंत प्राचीनतम मंदिर खरसाली में विराजमान है।




Devbhoomi,Uttarakhand

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हिमालय क्षेत्र में शंकर के मंदिरों की गिनती करना कठिन कार्य है। यहां भगवान शंकर से जुड़ी अनेकों कथाएं आज भी प्रचलित हैं।

 मान्यता है कि भगवान शंकर ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में पार्वती से विवाह किया था। खास बात यह है कि मंदिर में जल रही अखंड अग्निज्योत को भगवान शिव व पार्वती के विवाह वेदी की अग्नि ही माना जाता है। बताया जाता है कि यह अग्नि त्रेतायुग से जल रही है। यही वजह है कि हर वर्ष यहां सैकड़ों जोड़े विवाह बंधन में बंधते हैं।

त्रेतायुग में संपन्न हुए शिव व पार्वती के विवाह का स्थल जिले का सीमांत गांव त्रियुगीनारायण मंदिर आज भी श्रद्धा व भक्ति के अटूट आस्था का केंद्र है। रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग पर सोनप्रयाग से 12 किमी मोटरमार्ग का सफर तय कर यहां पहुंचा जाता है। मंदिर क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर शिव और पार्वती की शादी के साक्ष्य स्पष्ट नजर आते है। यहां पर आज भी अग्नि कुंड के साथ अखण्ड ज्योति, धर्म शिला मौजूद है।

 शादी के दौरान देवताओं ने विभिन्न शक्तियों से वेदी में विवाह अग्नि पैदा की थी, जिसे धंनजय नाम दिया गया। यह अग्नि आज भी निरंतर जल रही है। इस अग्नि की राख को आज भी लोग अपने घरों में ले जाते हैं, जिसे शुभ माना जाता है। वेद पुराणों के उल्लेख के अनुसार यह मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है, जबकि केदारनाथ व बदरीनाथ द्वापरयुग में स्थापित हुए।

 यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर विष्णु भगवान ने वामन देवता का अवतार लिया था। पौराणिक उल्लेख के अनुसार बलि को इन्द्रासन पाने के लिए सौ यज्ञ करने थे, इनमें 99 यज्ञ वह पूरे कर चुका था, लेकिन सौवें यज्ञ से पूर्व विष्णु भगवान ने वामन अवतार लेकर उसे रोक दिया और बलि का यज्ञ संकल्प भंग हो गया। इस दिन से यहां भगवान विष्णु की वामन के रूप में पूजा होती है।

मंदिर के प्रबंधक परशुराम गैरोला बताते हैं कि आज भी इस मंदिर के प्रति लोगों में भारी श्रद्धा है। वर्ष भर बड़ी संख्या में भक्त आकर मंदिर के दर्शन करते हैं। भगवान शिव व पार्वती का विवाह स्थल होने के कारण त्रियुगीनारायण का विवाह कामना रखने वाले युगलों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। हर साल यहां सैकड़ों की संख्या में जोड़े विवाह करते हैं। ऐसा ही एक जोड़ा है ललित मोहन रयाल व रुचि का। ये दोनों पीसीएस अधिकारी हैं।

ललित मोहन रयाल वर्तमान में अल्मोड़ा जिले में एसडीएम के पद पर तैनात हैं। श्री रयाल बताते हैं कि वह इस स्थान से इतना प्रभावित हुए कि वैवाहिक जीवन यहीं से शुरू करने का फैसला किया।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुमा उनी भाषा के आदि कवि लोक रतन पन्त जी थे !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढ़वाली में गीता का अनुवाद करने वाले पहले विद्वान् पंडित उमाकांत नैथानी, डॉक्टर नन्द किशोर दौदियाल लता तथा आत्माराम दुदपुड़ी थे!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नागों की भूमि यानी नागणी


चम्बा (टिहरी गढ़वाल)। देवभूमि उत्तराखंड में पर्वतों से लेकर घाटियों तक हर जगह की अपनी अलग-अलग विशेषता व ऐतिहासिक महत्व है। अधिकांश जगहों के नाम वहां की परंपराओं, मान्यताओं, कार्यो के कारण पड़े हैं। नागणी भी ऐसी जगह है, जिसे नागों की भूमि कहा जाता है। यहां कृषि कार्य तभी निर्विघ्न संपन्न होते हैं, जब नागदेवता का स्मरण कर रोट भेंट किया जाता है।

जनपद के चम्बा प्रखंड के अंतर्गत नागणी क्षेत्र की एक विशेष पहचान है। इसे वर्तमान में भले ही जनांदोलनों की कर्मभूमि के रूप में जाना जाता हो, लेकिन पौराणिक मान्यताओं व बुजुर्गो के अनुसार नागणी को नागों की भूमि भी कहा जाता है। कहा जाता है कि एक समय था जब इस क्षेत्र में भारी संख्या में नागों का वास था, तभी यहां का नाम नागणी पड़ा। नागणी बड़े भू-भाग में फली समतल जगह है। यहां सिंचित खेती की जाती है। मध्य में हेंवल नदी बहती है। माना जाता है कि कई दशक पूर्व तक यहां भारी संख्या में नाग रहते थे, जिस कारण लोगों को यहां कृषि कार्य करने में दिक्कतें आती थी। हालांकि नागों ने कभी किसी को काटा नहीं, लेकिन लोग डर के मारे अकेले खेतों में नहीं जाते थे। अंत में किसानों ने यहां नाग देवता और भूम्याल देवता की पूजा शुरू की। उसके बाद धान गेंहू, की बुवाई या रोपाई जैसे कृषि कार्य शुरू करने से पूर्व उनका स्मरण कर रोट भेंट चढ़ाना शुरू किया। तब से नाग सिर्फ कभी-कभी दिखाई देते हैं। भूलवश किसी किसान ने स्मरण कर रोट भेंट नहीं चढ़ाया, तो उन्हें खेतों में छोटे-छोटे नाग ही दिखाई देंगे। हालांकि यह किसी को काटते नहीं है फिर भी यह अपशगुन माना जाता है। यदि किसी ने उन्हें मारने का प्रयास किया, तो वे बड़ी संख्या में यह प्रकट हो जाते हैं। नागणी के पास पहाड़ी पर एक गुफा है। कहा जाता है कि काफी पहले नागराजा अर्थात् नागों के राजा इसी गुफा में रहते थे और नीचे स्थित खेतों की निगरानी करते थे। सिंचाई के समय वे खेतों में निगरानी के लिए आते थे। नागणी के शूरवीर सिंह, कुंदन सिंहलाल, बलवंत सिंह आदि का कहना है कि नई पीढ़ी के लाग इसे न माने लेकिन यही हकीकत है।

नागणी में भंडारगांव, नारंगी, बसाल, स्यूंटा, छोटा स्यूटा आदि गांव के लोगें के सिंचित खेत है। बात सिर्फ कृषि कार्य की नहीं है नागणी में खेती के अलावा नहर, मकान आदि भी बनाना होता है, तो नाग देवता का स्मरण जरूरी है तभी वह कार्य निर्विघ्न संपन्न हो सकता है।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6222423.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Keshorai Math is an ancient shrine situated at Pauri, in Pauri Garhwal District of Uttaranchal. This stone temple bears a great significance for its architectural beauty. According to the inscriptions found on stone of the main door, the temple is built around 1682 AD by a person named Keshorai.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Gaadu ka Ghada
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This is word related to make-up of Badrinath Bhagwan. This is basically a peacher where “Til” oil is kept for Badrinath and is used after opening the Badrinath Dham for litting the Diya etc.

 

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