Author Topic: Exclusive Information on Uttarakhand - उत्तराखंड के बारे एक्सक्लूसिव जानकारी  (Read 9704 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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बलि को सौंप दिया पाताल लोक,भगवान विष्णु की स्थली त्रियुगीनारायण
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विष्णु भगवान ने राजा बलि को दिए थे वामन रूप में दर्शन

-त्रियुगीनारायण में वर्षो से आयोजित होता है वामन द्वादशी मेला

रुद्रप्रयाग, : तीन लोक के सम्राट बनने की इच्छा से राजा बलि ने त्रियुगीनारायण में यज्ञ किए, लेकिन भगवान विष्णु ने समय रहते ऐसी लीला रची कि वह बलि पाताल लोक का राजा बन गया और उसी समय से यहां वामन द्वादशी मेला आयोजित होता आ रहा है।

केदारघाटी के अंतर्गत भगवान विष्णु की स्थली त्रियुगीनारायण में वर्षो से आयोजित होता आ रहा वामन द्वादशी मेला क्षेत्रीय लोगों की आस्था से जुड़ा है। यह मेला सम्राट बलि को विष्णु भगवान द्वारा पाताल लोक का राजा बनाए जाने के अवसर पर होता है। साथ ही मेले में नि:संतान दंपतियों को भी पुत्र प्राप्ति की आलौकिक शक्ति प्रदान होती है। देवभूमि उत्तराखंड में आयोजित होते आ रहे विभिन्न पौराणिक मेलों में वामन द्वादशी धार्मिक एवं पर्यटन मेला का अपना अलग महत्व है। मान्यता है कि जब महाबलि सम्राट बलि पृथ्वी लोक में मजबूत शासक के रूप में स्थापित हो गए तो उन्होंने तीनों लोक का राजा बनने के लिए यज्ञ शुरू कर दिया। इसके लिए उन्हें 100 यज्ञ करने थे, जब वह 99 यज्ञ पूरे कर चुके थे, तब सभी देवगण भगवान विष्णु के पास आए तथा स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया। विष्णु ने वामन रूप में अवतरित होकर बलि को दर्शन दिए तथा भिक्षा में तीन पग जमीन मांगी। इसमें पहले पग में देव लोक, दूसरे पग में पृथ्वी नाप ली। जब तीसरे पग के लिए बलि के पास जगह नहीं बची तब बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और उस पर पग रखने को कहा। भगवान विष्णु का पांव बलि के सिर पर पड़ते ही वह सीधे पाताल लोक पहुंच गए तथा यहां का राजा बन गया। इसी दिन से त्रियुगीनारायण में वामन द्वादशी मेले का आयोजन होता आ रहा है।

मेला समिति के अध्यक्ष दीनमणि गैरोला बताते हैं कि मेले को लेकर यह भी आस्था है कि यहां पर मेले के दिन नि:संतान दंपति रात्रि भर हाथ में दीपक लिए भगवान वामन की पूजा करते हैं, जिससे उन्हें संतान प्राप्ति होती है। इस वर्ष भी पंद्रह सिंतबर से मेला शुरू हो चुका है। पांच दिन तक चलने वाले इस मेले का समापन उन्नीस सितंबर को होगा। मेले में 18 सितंबर को वामन भगवान के जन्म के साथ ही नि:संतान दंपतियों का जागरण तथा 19 सितंबर को भगवान वामन के थाल दर्शन एवं नारायण व क्षेत्रपाल के दर्शन होंगे, जो नि:संतान दंपतियों को पुत्र प्राप्ति के लिए फल वरदान के रूप में वितरित करेंगे।

Devbhoomi,Uttarakhand

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आतापी-वातापी दैत्य
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महर्षि अगस्त्य जब इस स्थान यानी अगस्त्यमुनि रुद्रप्रयाग  पर वास कर रहे थे तो उस क्षेत्र में आतापी तथा वातापी नामक दो दैत्य भाइयों ने अत्यंत आतंक फैला रखा था। वे रुप बदलकर ऋषियों को भोजन के बहाने बुलाते थे, एक भाई सूक्ष्मरुप धारणकर भोजन में छिपकर बैठ जाता था एवं दूसरा भोजन परोसता था।

 भोजन सहित असुर को निगल लेने के बाद दूसरा उसे आवाज देता था तथा वह पेट फाड़कर बाहर आ जाता था तथा दोनों मिलकर ऋषि को मारकर खा जाते थे। सभी लोग इन राक्षसों से तंग आ चुके थे तथा उन्होंने महर्षि अगस्त्य से इन दोनों से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना की।

 मुनि जी इन राक्षसों के यहाँ भोजन करने गये, जब पहला राक्षस भोजन सहित पेट में चला गया तो मुनि जी ने मन्त्र पढ़कर उसे जठराग्नि से पेट में ही जला दिया (अगस्त्य मुनि पूर्वजन्म में जठराग्नि रुप में थे)। जब दूसरे राक्षस के पुकारने पर भी वह वापस न आया तो वह राक्षस अपने असली रुप में आकर मुनि जी से युद्ध करने लगा। यह युद्ध बहुत दिनों तक चला, राक्षस अत्यन्त बलवान था तथा मुनि जी थक गये।

 तब उन्होंने देवी का स्मरण किया, देवी कूर्मासना (स्थानीय बोली में कुमास्योंण) रुप में प्रकट हुयी। जिस स्थान पर देवी प्रकट हुयी वहाँ वर्तमान में कूर्मासना मन्दिर है। देवी नें दैत्य का सिल्ला नामक स्थान पर वध किया, वहाँ पर वर्तमान में स्थानेश्वर महादेव का मन्दिर है जिसमें राक्षसी कुण्ड बना है।[

विनोद सिंह गढ़िया

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[justify]बैसी यानी देव अवतरण की अलौकिक गाथा

ढोल की गर्जना, नगाड़ों की अंतर्मन को झंकृत करती टंकार। धूणी (एक किस्म का अग्निकुंड) के चारों तरफ दुलैंच यानी विशेष गद्दी में बैठे तपस्वियों के शरीर पर आ ान के साथ लोक देवताओं का अवतरण। यही है कौतुहल से भरी देवभूमि की पारंपरिक व धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ी बैसी, जो देव अवतरण की अलौकिक गाथा और उत्तराखंडी सांस्कृतिक विरासत को खुद में समेटे है। दरअसल, केदारखंड व मानसखंड के लोक देवताओं के आ ान की पौराणिक परंपरा बैसी का आयोजन श्रावण मास में ही होता है। चूंकि देवभूमि के समस्त लोक देवता मसलन, न्याय देवता गोलज्यू महाराज, गंगनाथ, शैम आदि का निवास स्थान हिमालय माना जाता है, लिहाजा साझ की गोधुली बेला पर दास व डंगरिए (देवदूतों के रूप) ढोल व नगाड़ों की मिश्रित गर्जना व टंकार की झंकृत करने वाली धुन के बीच वीर गाथा के जरिए आ ान करते हैं। खास प्रांगण पर चारों तरफ लोक देवताओं के अवतरण को दुलैंच यानी विशेष गद्दी बिछी होती है। इसमें अक्षत, पुष्प एवं भेंट रखी जाती है। वीर रस की हुंकार जब चरम पर पहुंचती है तो देवों का अवतरण दुलैंच पर बैठे तपस्वियों के शरीर पर होने लगता है। खास बात है, दास व डंगरिए इस बीच लोक देवताओं के शौर्य, पराक्रम, अन्याय के खिलाफ जंग, कठिन परिश्रम आदि का बखान करते हैं। देवअवतरण पूर्ण होने पर फिर दौर शुरू होता दीन-दुखियों की फरियाद सुनने का। आसमान को छूती लपटों वाली धुणी में तप कर लाल हुआ चिमटे को लोक देवता का अवतारी चाट कर या शरीर पर पीट शांत करता है। यह सब हैरतअंगेज होता है। अंगारों पर चलना और उन्हें निगल जाना तो और भी भयंकर। मगर इससे अवतारी को तनिक भी क्षति नहीं पहुंचती। 22 दिन की घोर तपस्या यानी बैसी के अंतिम दिन लोक देवताओं को पुन: हिमालय के लिए रवाना किया जाता है।

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=14&edition=2011-08-12&pageno=7

Hisalu

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वनरावतों के समाज में नहीं आते ‘पितर’

डीडीहाट। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष सबसे पवित्र माना जाता है, लेकिन हिंदू होने के साथ-साथ हर परंपरा और संस्कृति को मानने वाला समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जिनके लिए पितृपक्ष मायने नहीं रखता। या यूं कहें कि ये श्राद्ध करते ही नहीं। यह वर्ग है आदम जनजाति के वनरावत। इस वर्ग की मान्याता भले वर्षों पुरानी हो सकती है, मगर इन्हें पितरों से मुंह फेरने वाला भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि जब परिवार में किसी की मौत होती है तो क्रियाकर्म करने वाला कई दिनों तक अंधेरे कमरे में रहता है। सूर्य की किरण तक वहां नहीं पहुंचती।
इसके बाद ये पीपलपानी भी उतनी ही श्रद्धा से करते हैं। कुलेख, औलतड़ी, खिरद्वारी सहित आधा दर्जन से अधिक गांवों में इनकी संख्या 732 हैं। उनकी कई मान्यताएं और परंपराएं हिंदुओं से मिलती हैं। आमतौर पर वे आठूं के अलावा अन्य त्योहार नहीं मनाते। आठूं को वे बिरुड़ी और नए कपड़े पहनते हैं। लेकिन श्राद्ध को ये समाज नहीं मानता। वे सिर्फ श्राद्ध की अमावास्या को पूड़ी और अन्य पकवान बनाते हैं और इसको स्वयं खाते हैं।
52 साल के केशर सिंह रावत (वनराजि कहते हैं श्राद्ध को नहीं मनाने की परंपरा नई नहीं है। इसे उनके बुजुर्ग भी नहीं मनाते थे। और वे इसका ही अनुसरण कर रहे हैं। पर बुजुर्ग क्यों नहीं मनाते थे? ये वह नहीं जानते। 43 वर्षीय दीपा देवी, 36 साल के शंकर रावत और 50 वर्ष के जगत सिंह रावत का कहना है कि वे श्राद्ध को नहीं पहचानते। उनके पूर्वजों ने कभी इसे नहीं मनाया। माना जाता है कि श्राद्ध नहीं मनाने के पीछे सामाजिक कारण के अलावा उनका पिछड़ापन भी बड़ा कारण हो सकता है। ये लोग आर्थिक रूप से बेहद कमजोर थे। मुख्य रूप से आजीविका के लिए जंगल से जुड़े कामों पर आश्रित थे। ज्यादातर वक्त जंगल और इसके आसपास रहने की वजह से श्राद्ध की जानकारी उन्हें नहीं थी।


श्राद्ध को नहीं मानती यह जनजाति
पिथौरागढ़ और चंपावत में वनरावतों की संख्या महज 732
ऐसे होता है अंतिम संस्कार
वनरावत अंतिम संस्कार को पूरी तरह हिंदू रीतिरिवाज से मनाते हैं। इस दौरान वे बेहद सख्त नियमों का पालन करते हैं। कमरे को अंधेरा रखते हैं। यहां तक कि कमरे में सूर्य की रोशनी भी नहीं पहुंचने देते। क्रिया में बैठा शख्स किसी अन्य के हाथ की कोई भी चीज ग्रहण नहीं करता। एक वक्त भोजन होता और वह भी खुद का बनाया हुआ। पानी की व्यवस्था भी वह अंधेरे में ही करते हैं।

brijeshhcr

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[justify]उत्तराखंड के रेडियो [/justify]
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१- हेंवलवाणी चम्बा - पुरे भारत का  गढ़वाली भाषा का पहला रेडियो
२- कुमाऊँ वाणी नैनीताल - उत्तराखंड का दूसरा रेडियो
३- ख़ुशी रेडियो मंसूरी
४- रेडियो जिंदगी देहरादून
५- रेडियो जनवाणी पंतनगर [/b][/size]

brijeshhcr

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Radio Henvalvani
The roots of Henvalvani Community Radio, Chamba, were laid in September 2001 when a group of young rural youth came together in an attempt to find a distinct voice of their own. The Himalaya Trust, an NGO based in Dehradun conducted a radio training with the group, teaching them basics of recordings, specially focused on highlighting the needs of their local communities. For the groups members, making topical programs and airing them back in the hill villages in their vicinity was a first step towards an information revolution, and they have never looked back since.

Not having any steady platform to air back their programs from, initially Henvalvani (or the voice of Henval, a name derived from the valley where the initiative is located) used to narrowcast its programs, its members traveling from village to village encouraging people to come and listen, contribute or join in the discussions. Recently, Henvalvani has also begun to broadcast some of its programs on satellite radio World Space (Asiadev channel) and has distributed digital radio sets to some villages in an attempt to build steady listenership (this was done through collaboration with another development agency). The All India Radio, Najibabad has also aired some of their community- based programs, thus ensuring a larger reach to the group. In 2006, Henvalvani set up its own low cost studio in Chamba and today about twelve young members work out of this space.
Since its inception, Henvalvani has worked on various kinds of programs, all contextual and community centric in nature like awareness campaigns, programs promoting local talents or documenting traditional practices, environmental history and people’s movements in the valley, health capsules, stories of migration to the cities and so on. In partnership with a local NGO of the area,
ASTHA, Henvalvani has also organized community melas and youth programs, in an attempt to bring together diverse voices of the hills on one common platform.
Its members have participated in several trainings and meetings on community media in and outside of India. Committed to spreading the community media movement in the country, some of its members have also shared their own skills and knowledge with communities elsewhere by conducting trainings and workshops for other radio enthusiasts.









Henvalvani got its broadcasting license in 2012 and has been on air since March 3rd 2012..

Reaching out- Overview of Henvalvani’s Activities
Collaboration with the Himalaya Trust, Dehradun
Since 2001, Henvalvani has worked in close association with the Himalaya Trust, an NGO based in Dehradun. This partnership has borne many successful results- over 25 radio programs, community centric research projects, trainings and workshops to name a few.                                                 
The group also worked on the Oral Testimony Project (supported by PANOS, South Asia) in tandem with the Himalaya Trust. Through the Trust, the group also got an opportunity to work on Ethnographic Action Research program of UNESCO in 2004-05 through which a few group members researched on specific community contexts (caste discrimination, alcoholism, use of traditional medicines etc.) and culled out effective radio content from their collected data.

Awareness programs to encourage people to vote in the Panchayat Elections
In February- March 2003, Henvalvani collaborated with Mountain Forum CASA to inform people how to caste their votes during the upcoming Panchayat elections. This was a pertinent campaign because many in the villages do not caste their votes, as they are intimidated or ignorant of the process. Henvalvani worked in 2 blocks- Narendra Nagara and Chamba, covering 53 villages, spreading the message and urging people to vote. The radio programs elaborated on various important facets- how to make informed choices, the color of the ballots, the procedure of voting etc. Henvalvani narrowcast these programs by conducting meetings in the villages and through face-to-face discussion with the community members.
DRIP Awareness Program- NABARD       
From January to February 2004, NABARD commissioned Henvalvani to make programs on the successful implementation of its DRIP scheme in the Tehri Garhwal district. The group made two 15 minute programs each which it narrwocast in 15 villages to spread the message of the scheme and encourage people to seek help from NABARD.

Radio Programs for CBED, Pithoragarh, Kumaon
In August 2004, Henvalvani, along with its counterpart in Kumaon, Pradeep Community Radio, was commissioned by Canadian agency CBED to make radio programs highlighting the small scale successful enterprises set up people in rural areas. Exploring this theme, the group made 5 radio programs profiling distinct and innovative low cost enterprises started by individuals in the hills. These programs were broadcast from the All India Radio, Najibabad and later on the World Space Radio as well.
Public Service Announcement (PSA) on HIV/AIDS awarded
On the occasion of World AIDS Day in 2004, One World South Asia along with BBC World Trust Service organized a competition to select best audio/video PSAs on HIV/AIDS from across the world. Henvalvani won the third position in the competition where more than 200 participants took part from all over the world.
Campaign against Alcoholism
For Nasha Mukti Kendra Nijaat Kendra, a De-addiction Rehabilitation Center in Dehradun, Henvalvani made two programs in October 2005. The programs spoke about the ill effects of alcohol and inspired people to get rid of this addiction and move towards a healthy life. These programs were narrowcast in the listening clubs of Henvalvani in various villages of the area.
Awarded for best community related content
In the year 2006, Henvalvani Community Radio was awarded the Manthan A.I.F award for producing best community centric content from all over India. The award was given by Infotech, Prasar Bharti and Digital Empowerment Foundation.
Organization of Sports Events
In partnership with the Nehru Yuva Kendras (a wing of the Department of Sports and Youth Affairs, Government of India) Henvalvani organized district and block level sports competitions in the Tehri Garhwal District. These events were not just restricted to sports but workshops and meetings were conducted simultaneously to talk about youth related issues such as employment opportunities, character building and so on.
Awareness Campaign on Food and Drug Safety
Health and Family Welfare Department of Government of India, Lady Irwin College in New Delhi and Henvalvani conducted an extensive campaign in the Tehri district highlighting the benefits of food and drug safety. Henvalvani carried out baseline surveys to understand care- seeking behavior of people in rural hill villages where they worked on a sample size of 22 villages. Wall painting, street plays and radio programs were also done exploring the concerned themes and to spread the message around. The group also organized meetings and discussions with eminent people in the area.
Zariyein III- A Community Art project on the Tehri Dam

In 2008,Henvalvani collaborated with Frame Works Research and Media Collective (based in New Delhi) on community art project that tried to document the history of the old Tehtown, now swept away by the Dam. Byinteracting with inhabitants of the old town and some present generation peowho had only heard of the town, group members culled out audiovisual testimonies (using photographs and video) encapsulating the memories attached to old Tehri. An installation piece was worked out with which the groups traveled to four different locationsTehri district, eliciting people’s responses and reactions to their work.

Trainings and Workshops condected by Henvalvani   


• In 2008, Henvalvani conducted a radio-training workshop in 6 Government Intermediate Colleges in the Chamba block of the Tehri District where 26-30 students were trained on various facets of radio programming. At the end of the training, students were given assistance to make their own radio programs that Henvalvani then played back to various village communities.

•The radio groups also helped in training of Dhadkan Community Radio, Shivpuri, Madhya Pradesh on programming, content generation and editing in a workshop organized by UNICEF and the Ford Foundation , in 2008.

•In a hands-on training program organized by the Himalaya Trust in Kumaon, Henvalvani trained 20 new members of a local community radio, Pradeep in 2008. They also trained some school students and madetwo radio programs of half an hour each, to explicate the process better to the new learners.

•From 8th-12th December 2008, Henvalvani gave radio training to 80 students in Bhuvaneshwari Mahila Ashram, Gairsaint in Chamoli district of Garhwal under the program- Unique Media Approach For New Generation, UMANG.
• In a workshop titled, Lab to Land, Henvalvani was invited to give trainingon setting up low cost studio and radio programming in the Barefoot College, Tilonia, Rajasthan, which had representatives of 32 renowned civil society organizations as participants. The event was organized by Digital Empowerment Foundation, New Delhi.
•Kumaonvani, a new community radio group, were also given training by
experienced members of Henvalvani in Mukteshwar, Kumaon in early 2009.

• 4 students of the Lady Irwin College, New Delhi received a 6 day radio training in Henvalvani where they made two half an hour programs eachat the end of their workshop.



Trainings/meetings/workshops attended by Henvalvani
• Initial training on community radio conducted by the Himalaya Trust- October 2001
• Workshop on community radio held in Katmandu, Nepal organized by UNESCO- December 2002.
• World Summit Information Society,, Tunisia, North Africa- November 2005
• Digital Story Telling workshop organized in Bangalore by UNESCO and Queensland University of Technology, Australia.
• Skill building workshop of community radio groups by UNICEF IN Orcha, Madhya Pradesh- February 2009.
• A five day training on community radio organized by Panos South Asia in Guwahati- November 2009

Members of Henvalvani
The membership of the community radio group is fluid yet ever increasing in number. Since this is a community driven initiative, people are free to join and leave as per their will, but have to substantially contribute to the radio station in a constructive way during their sojourn. Since its inception in 2001, two members have remained a constant in the group, while others have joined in to learn new skills, contribute to the content and move to build on their knowledge in various ways. The membership of the group remains young and vibrant consisting of students, young teachers, shop owners, singers and other young professionals from within the local communities who give voluntary time and energy to their community radio. Currently there are about 12 regular Henvalvani members involved with radio, the youngest being in class 12th. From time to time, other civil society organizations, media and research groups/individuals as well as academic institutions from across the world have stepped in to collaborate with Henvalvani, thus taking its vision forward.   

Pawan Pathak

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कौन हैं वनरावत
कंदराओं में रहने वाले और लोगों को देखकर भागने वाले वनरावतों के पूर्वज धरम सिंह, दीपा सिंह, लाटा सिंह और फुंटा सिंह वर्ष 1950 के करीब जंगल से निकलकर अस्कोट से 7 किमी दूर जमतड़ी के कंतोली तोक में रहने लगे। 1962 के बंदोबस्त में इन चारों लोगों के नाम 110 नाली जमीन दर्ज हुई। जागरूकता के अभाव में अब भी यह जमीन उन्हीं चारों पूर्वजों के नाम दर्ज है। किसी भी वारिस ने जमीन अपने नाम कराने का प्रयास नहीं किया। इस समय कंतोली में वनरावतों के 32 परिवार रहते हैं।
•105 जनसंख्या वाले इस गांव के वनरावत खेती, लकड़ी चिरान, घास काटने का काम करते हैं। 16 लोग सीमा सड़क संगठन में मजदूरी करते हैं, जिनमें कुछ महिलाएं भी शामिल हैं। जिले में कंतोली के अलावा किमखोला, कूटाचौरानी, गाणागांव, औलतड़ी, मदनपुरी में वनरावत हैं। इनकी कुल आबादी 800 के करीब है।


Source-
http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150921a_001115003&ileft=732&itop=37&zoomRatio=130&AN=20150921a_001115003

 

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