Author Topic: Fairs & Festivals Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध त्यौहार एवं मेले  (Read 81907 times)

पंकज सिंह महर

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Re: FAMOUS FESTIVALS & MELAS OF UTTARAKHAND !!
« Reply #50 on: November 02, 2007, 03:18:34 PM »
२६. विजयादशमी

आश्विन शुल्क दशमी को कुमाऊँ में 'दसाई' कहते हैं। नवदुर्गाओं का विसर्जन इस दिन किया जाता है। देवी-दनताओं को हरेला चढ़ा, फिर तिलक लगाते तथा अपने सिर में हरेला रखते हैं। बहन-बेटियाँ भी तिलक (टीका) करती हैं। नवरात्रियों में बहुत स्थानों में रामलीलाएँ होती हैं। दशहरे का मेला होता हैं।

यह क्षत्रियों का प्रधान त्यौहार है। चंद-राज्य के समय अश्व-पूजा, गज-पूजा, शस्रास्र, छत्र, चामर, मुकुट आदि राज-चिन्हों की पूजा होती थी।



२७. कोजागर

आश्विन शुल्क पूर्णिमा को छोटी दीवाली मानी जाती है। स्रियाँ व्रत रखती हैं। रात्रि में लक्ष्मी-पूजा होती है। दीवाली जलाते हैं। पकवान, मिष्ठान नैवेध लगाकर खाते हैं। द्यूत की कुप्रथा का श्रीगणेश भी इसी दिन से प्रारंभ होता है।


२८. दीपोत्सव

कार्तिक कृष्ण ११ को हरिदीप, त्रयोदशी को यमदीप, चतुर्दशी को शिवदीप जलाया जाता है। तुलार्क पर्यन्त आकाश-दीप जलाने की प्रथा है। 



२९. नरक चतुर्दशी

चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्दशी के उषाकाल में तैलाभ्यंगपूर्वक तप्तोदक (गरम पानी) से स्नान करने की विधि तथा प्राचीन रीति है। हल्की मृत्तिका, अपामार्ग तथा कटुतुम्बी को सिर पर उतारा जाता है। साम्प्रत में छोटे-छोटे असंस्कारी बच्चों को नरहर स्नान कराके पुरानी र बरती जाती है। नरक यातना की निवृत्ति के निमित्त नरक चतुर्दशी स्नान होता है।



३०. दीपमालिका या दिवाली

कार्तिक कृष्ण ३० महालक्ष्मी-पूजा का भारत व्यापी त्यौहार है। सायंकाल में दीपमालिका (रोशनी या दीवाली) की जाती है। यह वैश्यों का मुख्य त्यौहार माना जाता है। लक्ष्मी का व्रत, पूजा और उपासना इसमें मुख्य है। जुये की कुप्रथा कुमाऊँ में खूब प्रचलित हैं। रावण को मारकर जब भगवान रामचंद्र अयोध्या लौटे थे, उसकी यादगार में यह उत्सव मनाया जाता है।



३१. यम द्वितीया

कार्तिक शुल्क २ को मनाई जाती है। भ्रातृ-टीका या भैया दूज नाम से प्रसिद्ध है। यमराज अपनी बहन यमुना के हाथ का भोजन इसी दिन ग्रहण करते है, ऐसी पौराणिक कथा है। अत: बहन के यहाँ भोजन करने की रीति प्रचलित है। भगिनी टीका भी करती है। चिउड़े सिर पर चढ़ाये जाते हैं। 'सिंङ्ल' एक प्रकार का पकवान विशेष इन दिनों बहुत बनाते हैं।


पंकज सिंह महर

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Re: FAMOUS FESTIVALS & MELAS OF UTTARAKHAND !!
« Reply #51 on: November 02, 2007, 03:20:22 PM »
३२. गोवर्धन प्रतिपदा

कार्तिक शुक्ल १ को भगवान कृष्णचंद्र ने गोवर्धन-पर्वत उठाकर इन्द्र के कोप से गोकुल की रक्षा की थी। इन्द्र-मख के बदले गोवर्धन और गोधन की पूजा जारी की, तब से यह गौ-पूजा उत्मव होता है। गाय-बच्छियों को पुष्प-माला पहनाकर तिलक लगाते हैं। गो-घास देकर पूजा आरती करते हैं। खीर, माखन, दही, दूध का नैवेध लगता है। भगनान श्रीकृष्ण की भी पूजा होती है। इस दिन कहीं-कहीं जैसे पाटिया में 'बगवाल' भी होती है।
 


३३. हरिबोधिनी ११

यह व्रत भी भारत व्यापी है। हरिशयनी को सोये हुए भगवान हरिबोधिनी को जगाते हैं। इस दिन व्रत होता है, तथा द्वादशी के दिन चातुर्मास्यके व्रतों का उद्यापन किया जाता है।
 


३४. वैकुण्ठ १४

कार्तिक शुक्ल पक्ष में होती है, प्राय: विधवा स्रियाँ व हरिभक्त लोग इस दिन उपवास, व्रत करते हैं। गणानाथ में बड़ा मेला होता है। पुत्र-कामनावाली स्रियाँ रात-भर दोनों हाथों में दीपक लेकर खड़ी रहती है।
 


३५. कार्तिकी पौर्णमासी

गंगा स्नान का पर्व माना जाता है। इस दिन गंगा-स्नान तथा वस्रदान का माहात्म्य समझा जाता है।
 


३६. भैरवाष्टमी

मार्गशीर्ष कृष्ण ८ को काल भैरव की पूजा होती है। बड़े (भले) खाने का महात्म्य है। बड़े (भले) बनाकर काल भैरव की पूजा होती है, और वे बड़े भैरव के वाहन काले कुत्ते को खिलाये जाते हैं।



पंकज सिंह महर

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« Reply #52 on: November 02, 2007, 03:27:19 PM »
३७. मकर-संक्रान्ति

इसको उत्तरायणी भी कहते हैं। इस दिन से उत्तरायण का प्रवेश होता है। प्रयाग में यह पर्व माघ-मेला कहा जाता है। बागेश्वर में बड़ा मेला होता है। वैसे गंगास्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं।

कुमाऊँ में इस त्यौहार को 'घुघुतिया' भी कहते हैं। गुड़ मिलाकर आटे को गूँथते हैं फिर एक पक्षी विशेष की आकृति बना घी में पकवान बनाकर उसकी माला गुँथते हैं। माला में नारंगी फल भी आदि भी लगाते हैं। वे मालाएँ बच्चों के गले में पहनाई जाती है। वे सुबह उठकर माला पहन 'काले-काले' कहकर कौवों को बुलाते हैं। पकवान माला से तोड़कर उसे खिलाते हैं। यह प्रथा कुमाऊँ से अन्यत्र देखने में नहीं आती। यह यहाँ का प्राचीन त्यौहार ज्ञात है। 


३८. संकष्टहर व्रत

माघ कृष्ण चतुर्थी को गणेशजी का व्रत पूजन करते हैं।



३९. वसन्त पंचमी

माघ शुल्क पंचमी को श्रीपंचमी भी कहते हैं। इस दिन जौ की पत्तियाँ केतों से लेकर देवी-देवताओं को चढ़ाते तथा हरियाले की भाँति सिर पर रखते हैं। बहन-बेटियाँ भी टीका करती है। पीले रुमाल व वस्र रँगाये जाते हैं। आज से होली गाने लगते हैं। नृत्य एनं गीत का चलन भी है।


४०. भीष्माष्टमी

भाद्र शुल्काष्टमी को शुर-शय्या में पड़े हुए देवव्रत राजर्षि भीष्मपितामह ने प्राण-त्याग किया था। यह उनका श्राद्ध दिवस है। इस पुण्य तिथि को उनका तपंण किया जाता है। इस भीष्म-तपंण कहते हैं।


४१. शिवरात्रि

फाल्गुन कृष्ण १४ को शिवशंकर का व्रत सारे भारतवर्ष में होता है। इस दिन व्रत रखते हैं, और यत्र-तत्र नदियों में गंगा स्नान को स्री पुरुष जाते हैं। कुमाऊँ में कैलाश, जागीश्वर, वागीश्वर, सोमेश्वर, विभांडेश्वर, चित्रेश्वर, रामेश्वर,
भिकियासैणां, चित्रशिला आदि में मेले होते हैं।


४२. होली

फाल्गुन सुदी ११ को चीर-बंधन किया जाता है। कहीं-कहीं ८ अष्टमी कोचीर बाँधते हैं। कई लोग आमलकी ११ का व्रत करते हैं। इसी दिन भद्रा-रहित काल में देवी-देवताओं में रंग डालकर पुन: अपने कपड़ों में रंग छिड़कते हैं, और गुलाल डालते हैं। छरड़ी पर्यन्त नित्य ही रंग और गुलाल की धूम रहती है। गाना, बजाना, वेश्या-नृत्य दावत आदि समारोह से होते हैं। गाँव में खड़ी होलियाँ गाई जाती हैं। नकल व प्रहसन भी होते हैं। अश्लील होलियों तथा अनर्गल बकवाद की भी कमी नहीं रहती। कुमाऊँ में यह त्यौहार ६-७ दिन तक बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। सतराली, पाटिया, गंगोली, चम्पावत, द्वाराहाट आदि की होलियाँ प्रसिद्ध हैं। गाँवों में भी प्राय: सर्वत्र बैठकें होती हैं। मिठाई व गुड़ बाँटा जाता है। चरस व भांग की तथा शहरों में कुछ-कुछ मदिरा की धूम रहती है। फाल्गुन सदी १५ को होलिका दहन होता है। दूसरे दिन प्रतिपदा का छरड़ी मनाई जाती है। घर-घर में घूमकर होलिका मनाकर सायंकाल को रंग के कपड़े बदलते हैं। धन भी एकत्र करते हैं, जिसका देहातों में भंड़ारा होता है।
 

४३. टीका २

चैत कृष्ण २ को दम्पति-टाका कहलाता है। जिस प्रकार 'वसंत, हरेला, दशाई व बगवाली' को भ्रातृ-भार्गनी का टीका होता है, उसी प्रकार इस दिन स्री-पुरुषों का टीका होता है। भावज या साली को भी टीका भेंट दी जाती है।

इन व्रतों के अलावा एकादशी - व्रतप्रति पक्ष में किये जाते हैं। हरिशयनी, हरिबोधिनी, आमलकी ये मुख्य व्रत हैं। इन एकादशियों का तथा चातुर्मास्य की एकादशियों का व्रत प्राय: बहुत लोग करते हैं। स्रियाँ जागरण, कथा-श्रवण करती हैं। निराहार-फलाहार दोनों प्रकार के व्रत होते हैं। कोई-कोई पकवान खाते हैं। एकादशी को चावल वर्जित होते हैं।
 

वारों का व्रत - 

रविवार को सूर्य-व्रत होता है। पौष मास में अधिक लोग रविवार को व्रत तथा सूर्य पूजा करते हैं। लवण-रहित पकवान खाते हैं। सोमवार शिव का व्रत स्रियाँ करती हैं। श्रावण, माघ तथा वैशाख में इसका अधिक प्रचार होता है। पूरी, रोटी अथवा फलाहार भोजन होता है। भौमवार को मंगल का व्रत होता है। लवण-रहित अन्न भोजन करने की विधि है।

इन व्रतों को उद्यापन भी होते हैं। उद्यापन के बाद व्रत करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। इनके अलावा स्रियाँ कात्तिक-स्नान, तथा लक्षवर्तिका, तुलसी-विवाह आदि-आदि भी यदा-कदा किया करती है।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: FAMOUS FESTIVALS & MELAS OF UTTARAKHAND !!
« Reply #53 on: November 03, 2007, 01:39:51 PM »


A video of Devi Dura Mela..

http://www.youtube.com/watch?v=vPdTGcRRMk8

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: FAMOUS FESTIVALS & MELAS OF UTTARAKHAND !!
« Reply #54 on: November 10, 2007, 12:39:05 PM »
Uttaraini Fair: This fair is organized every year, at the time of 'Makar Sankranti', in Bageshwar around the Bagnath temple complex. One of the major fairs of the Kumaon region, Uttarani has mythical, religious, cultural, commercial as well as historical significance.

Being situated at the confluence of the rivers Sarayu and Gomti, Bageshwar is considered to be the 'Kashi' of the north.

The Bagnath temple, built on the banks right where the two rivers meet is venerated by all. During the final days of 'poush maas', followers from all over the Kumaon and Garhwal region come to this fair, spend the night listening to 'bhajan-kirtan' and bathe in the holy water of the rivers in the morning before they go and pray at the temple.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: FAMOUS FESTIVALS & MELAS OF UTTARAKHAND !!
« Reply #55 on: November 16, 2007, 12:42:43 PM »
कुमाऊँ के कुछ अन्य प्रसिद्ध मेले

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१. कालसन का मेला - कालसन का मेला नैनीताल जनपद के टनकपुर के पास सूखीढ़ाँग व श्यामलाताल की पावन भूमि में प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है । यह स्थान टनकपुर से २६ कि.मी. की दूरी पर है । कालसन के बारे में स्थानीय लोगों में तरह-तरह की किवदन्तियाँ प्रचलित हैं । कहा जाता है कि कालसन का मंदिर कभी अन्नापूर्णा शिखर के पास शारदा नदी के किनारे बना हुआ था जिसे बाद में ग्रामवासियों ने सुरक्षा की दृष्टि से निगाली गाँव के पास स्थानान्तरित कर दिया । जहाँ पर ग्रामवासियों ने कालसन देवता को स्थानान्तरित किया था, ग्रामवासियों की श्रद्धा के वशीभूत होकर कालसन भी वहीं श्यामवर्णी लिंग रुप में प्रकट हो गये परन्तु अपनी प्राचीन जगह में उन्होंने लोगों द्वारा अर्पित फल-फूल और सामान को पत्थरों के ढ़ेर में बदल दिया । कहा जाता है कि कालसन देवता महाकाली के उपासक थे ।

वर्तमान में यहाँ देवता थान में धनुषवाण, त्रिशुल आदि का ढेर है । सम्भवत: यह ढेर यहाँ इन वस्तुओं को देवता को अपंण करने की परम्परा के कारण है । इन त्रिशुलों में लोग दीप जलाते हैं तथा काले रंग का वस्र भी बाँधते हैं । उत्तराखंड के अन्य मन्दिरों की तरह यहाँ भी घंटियाँ, ध्वजा आदि चढ़ाने की परम्परा है । भूत, प्रेत आदि बाधाओं से पीड़ित व्यक्ति यहाँ ईलाज के लिए भी लाये जाते हैं ।

पूर्णिमा को यहाँ मेला लगता है । इस मेले में लोग कालसन देवता से मनौतियाँ मनाने, अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रार्थना करने आते हैं तथा देवता को नारियल इत्यादि अर्पित करते हैं । पहले यह मेला एक हफ्ते तक चलाता था ।

२. हरेला मेला - हरेला पर्व के अवसर पर भीमताल में लगने वाला हरेला मेला भी कभी इस क्षेत्र का प्रसिद्ध मेला था । कहा जाता है कि यह मेला इतिहास प्रसिद्ध मेला रहा है जिसमें कभी पचास हजार से अधिक लोग भाग लेते थे । पहले यह मेला हरियाली खेत में लगता था । तब इस मेले की अवधि सात दिन की होती थी । सन् १९७० के बाद यह मेला रामलीला मैदान में लगने लगा है । एक आध बार यह मेला भीमताल झील के किनारे भी आयोजित किया गया है । पूर्व में यह मेला सांस्कृतिक और व्यापारिक दोनों ही दृष्टियों से सम्पन्न था । तब इस मेले में कपड़ों की दूकानें, मिठाईयाँ, रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं आदि की खरीद फरोख्त होती थी । भगनौल, झोड़े आदि गीतों की हुड़के की थाप पर स्वर लहरियाँ गूँजती थी । अब तो इस मेले की भी चमक फीकी पड़ती जा रही है ।

इन मेलों के अतिरिक्त भी कुमाऊँ अंचल में अनेक मेले लगते हैं । इनमें दारमा क्षेत्र में व्यासपट्टी के लोग प्रतिवर्ष भद्रपद की पूर्णिमा के अवसर पर महर्षि व्यास की अर्चना करते हैं । मनीला के मैदान में इस अवसर पर विशेष आयोजन किया जाता है । दरकोटा और जलथ देवी के मेले भी बहुत प्रसिद्ध हैं । गुम देश में चैतोगा नाम से विख्यात मेला लगता है ।

मानेश्वर का मेला धार्मिक मनौती मानने के लिए प्रसिद्ध है । यह स्थान चम्पावत के पास है । गढ़केदार में लगने वाले मेले में कार्तिक मास में नि:संतान महिलायें जागेश्वर की ही तरह रातभर जलता दीपक हाथ में लेकर शिव अर्चन करती हैं । धार्मिक विश्वास है कि रातभर हाथ में दीपक लेकर पूजन करने से शिव प्रसन्न होते हैं तथा सन्तान प्राप्त होती है । गिर के कौतिक नाम से प्रसिद्ध मेला तल्ला सल्ट क्षेत्र में लगता है । उत्तरायणी के दिन सम्पन्न होने वाले इस मेले में नजदीकी गाँव रोग खेल खेलते हैं ।

३. जिया रानी का मेला - रानी बाग - उत्तरायणी में ही प्रतिवर्ष रानीबाग में
इतिहास प्रसिद्ध बीरांगना जिया रानी के नाम पर जिया रानी का मेला लगता है । रानीबाग, काठगोदाम से पाँच कि.मी. दूर अल्मोड़ा मार्ग पर बसा है । रानीबाग में कव्यूरी राजा धामदेव और ब्रह्मदेव की माता जियारानी का बाग था । कहते हैं कि यहाँ जिया रानी ने एक गुफा में तपस्या की थी । रात्रि में जिया रानी का जागर लगता है । कव्यूरपट्टी के गाँव से वंशानुगत जगरियें औजी, बाजगी, अग्नि और ढोलदमुह के साथ कव्यूरी राजाओं की वंशावलि तथा रानीबाग के युद्ध में जिया रानी के अद्भूत शौर्य की गाथा गाते हैं । जागरों में वर्णन मिलता है कि कव्यूरी सम्राट प्रीतमदेव ने समरकंद के सम्राट तैमूरलंग की विश्वविजयी सेना को शिवालिक की पहाड़ी में सन् १३९८ में परास्त कर जो विजयोत्सव मनाया उसकी छाया तथा अनगूंज चित्रश्वर रानीबाग के इस मेले में मिलती है । जिया रानी इस वीर की पत्नी थीं ।

उत्तरायणी के अवसर पर यहाँ एक ओर स्नान चलता है तो दूसरी ओर जागर, बैर इत्यादि को सुनने वालों की भीड़ रहती है ।



अन्य ऐतिहासिक मेले एवं पर्व -

उपरोक्त अति प्रसिद्ध मेलों के अतिरिक्त भी कुमाऊँ में स्थान-स्थान पर मेलों एवं उत्सवों का आयोजन होता है । इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -

१. शिवरात्रि शिवमंदिर 

सोमेश्वर (अल्मोड़ा)
देवस्थल - अल्मोड़ा
पाताल देवी - अल्मोड़ा
जागनाथ - जागेश्वर - अल्मोड़ा
बागनाथ - बागेश्वर


२. मकर संक्रांति

कपिलेश्वर पट्टी बिसोद
पंचेश्वर पट्टी सौं - पिथौरागढ़


३. कार्तिक पूर्णिमा

पिनाकेश्वर पट्टी बीरारो
शिखर भनार - दानपुर


४. मेष संक्रांति

बेतालेश्वर - अल्मोड़ा
वृद्ध केदार - अल्मोड़ा


५. मिथुन चतुर्दशी

भीमेश्वर - भीमता (नैनीताल)


६. फागुन चतुर्दशी

पाताल भुवनेश्वर पट्टी बड़ाऊ (पिथौरागढ़:
पावनेश्वर - डीडीहाट (पिथौरागढ़)
बैजनाथ - जनपज अल्मोड़ा
गणनाथ - अल्मोड़ा
श्रावण चतुर्दशी - जागेश्वर - अल्मोड़ा
बागनाथ - बागेश्वर


७. भादों तृतीया

थल केदार (पिथौरागढ़)


८. भादों चतुर्दशी

भागलिंग (पिथौरागढ़)


९. कर्क संक्रांति

बालेश्वर मंदिर - चम्पावत


१०. आषाढ़ सप्तमी

घटकू (पिथौरागढ़)


११. नागपंचमी

उग्र रुद्र, नाकुरी (पिथौरागढ़)


१२. आषाढ़ तथा चैत्र अष्टमी

दूनागिरी
नैथाना देवी - जनपद अल्मोड़ा


१३. कृष्ण जन्माष्टमी - मिरतोला - अल्मोड़ा

 

 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dawrahat Ka Mela bhi bahut prasidh hai.

कुमाऊँ के कुछ अन्य प्रसिद्ध मेले

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१. कालसन का मेला - कालसन का मेला नैनीताल जनपद के टनकपुर के पास सूखीढ़ाँग व श्यामलाताल की पावन भूमि में प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है । यह स्थान टनकपुर से २६ कि.मी. की दूरी पर है । कालसन के बारे में स्थानीय लोगों में तरह-तरह की किवदन्तियाँ प्रचलित हैं । कहा जाता है कि कालसन का मंदिर कभी अन्नापूर्णा शिखर के पास शारदा नदी के किनारे बना हुआ था जिसे बाद में ग्रामवासियों ने सुरक्षा की दृष्टि से निगाली गाँव के पास स्थानान्तरित कर दिया । जहाँ पर ग्रामवासियों ने कालसन देवता को स्थानान्तरित किया था, ग्रामवासियों की श्रद्धा के वशीभूत होकर कालसन भी वहीं श्यामवर्णी लिंग रुप में प्रकट हो गये परन्तु अपनी प्राचीन जगह में उन्होंने लोगों द्वारा अर्पित फल-फूल और सामान को पत्थरों के ढ़ेर में बदल दिया । कहा जाता है कि कालसन देवता महाकाली के उपासक थे ।

वर्तमान में यहाँ देवता थान में धनुषवाण, त्रिशुल आदि का ढेर है । सम्भवत: यह ढेर यहाँ इन वस्तुओं को देवता को अपंण करने की परम्परा के कारण है । इन त्रिशुलों में लोग दीप जलाते हैं तथा काले रंग का वस्र भी बाँधते हैं । उत्तराखंड के अन्य मन्दिरों की तरह यहाँ भी घंटियाँ, ध्वजा आदि चढ़ाने की परम्परा है । भूत, प्रेत आदि बाधाओं से पीड़ित व्यक्ति यहाँ ईलाज के लिए भी लाये जाते हैं ।

पूर्णिमा को यहाँ मेला लगता है । इस मेले में लोग कालसन देवता से मनौतियाँ मनाने, अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रार्थना करने आते हैं तथा देवता को नारियल इत्यादि अर्पित करते हैं । पहले यह मेला एक हफ्ते तक चलाता था ।

२. हरेला मेला - हरेला पर्व के अवसर पर भीमताल में लगने वाला हरेला मेला भी कभी इस क्षेत्र का प्रसिद्ध मेला था । कहा जाता है कि यह मेला इतिहास प्रसिद्ध मेला रहा है जिसमें कभी पचास हजार से अधिक लोग भाग लेते थे । पहले यह मेला हरियाली खेत में लगता था । तब इस मेले की अवधि सात दिन की होती थी । सन् १९७० के बाद यह मेला रामलीला मैदान में लगने लगा है । एक आध बार यह मेला भीमताल झील के किनारे भी आयोजित किया गया है । पूर्व में यह मेला सांस्कृतिक और व्यापारिक दोनों ही दृष्टियों से सम्पन्न था । तब इस मेले में कपड़ों की दूकानें, मिठाईयाँ, रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं आदि की खरीद फरोख्त होती थी । भगनौल, झोड़े आदि गीतों की हुड़के की थाप पर स्वर लहरियाँ गूँजती थी । अब तो इस मेले की भी चमक फीकी पड़ती जा रही है ।

इन मेलों के अतिरिक्त भी कुमाऊँ अंचल में अनेक मेले लगते हैं । इनमें दारमा क्षेत्र में व्यासपट्टी के लोग प्रतिवर्ष भद्रपद की पूर्णिमा के अवसर पर महर्षि व्यास की अर्चना करते हैं । मनीला के मैदान में इस अवसर पर विशेष आयोजन किया जाता है । दरकोटा और जलथ देवी के मेले भी बहुत प्रसिद्ध हैं । गुम देश में चैतोगा नाम से विख्यात मेला लगता है ।

मानेश्वर का मेला धार्मिक मनौती मानने के लिए प्रसिद्ध है । यह स्थान चम्पावत के पास है । गढ़केदार में लगने वाले मेले में कार्तिक मास में नि:संतान महिलायें जागेश्वर की ही तरह रातभर जलता दीपक हाथ में लेकर शिव अर्चन करती हैं । धार्मिक विश्वास है कि रातभर हाथ में दीपक लेकर पूजन करने से शिव प्रसन्न होते हैं तथा सन्तान प्राप्त होती है । गिर के कौतिक नाम से प्रसिद्ध मेला तल्ला सल्ट क्षेत्र में लगता है । उत्तरायणी के दिन सम्पन्न होने वाले इस मेले में नजदीकी गाँव रोग खेल खेलते हैं ।

३. जिया रानी का मेला - रानी बाग - उत्तरायणी में ही प्रतिवर्ष रानीबाग में
इतिहास प्रसिद्ध बीरांगना जिया रानी के नाम पर जिया रानी का मेला लगता है । रानीबाग, काठगोदाम से पाँच कि.मी. दूर अल्मोड़ा मार्ग पर बसा है । रानीबाग में कव्यूरी राजा धामदेव और ब्रह्मदेव की माता जियारानी का बाग था । कहते हैं कि यहाँ जिया रानी ने एक गुफा में तपस्या की थी । रात्रि में जिया रानी का जागर लगता है । कव्यूरपट्टी के गाँव से वंशानुगत जगरियें औजी, बाजगी, अग्नि और ढोलदमुह के साथ कव्यूरी राजाओं की वंशावलि तथा रानीबाग के युद्ध में जिया रानी के अद्भूत शौर्य की गाथा गाते हैं । जागरों में वर्णन मिलता है कि कव्यूरी सम्राट प्रीतमदेव ने समरकंद के सम्राट तैमूरलंग की विश्वविजयी सेना को शिवालिक की पहाड़ी में सन् १३९८ में परास्त कर जो विजयोत्सव मनाया उसकी छाया तथा अनगूंज चित्रश्वर रानीबाग के इस मेले में मिलती है । जिया रानी इस वीर की पत्नी थीं ।

उत्तरायणी के अवसर पर यहाँ एक ओर स्नान चलता है तो दूसरी ओर जागर, बैर इत्यादि को सुनने वालों की भीड़ रहती है ।



अन्य ऐतिहासिक मेले एवं पर्व -

उपरोक्त अति प्रसिद्ध मेलों के अतिरिक्त भी कुमाऊँ में स्थान-स्थान पर मेलों एवं उत्सवों का आयोजन होता है । इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -

१. शिवरात्रि शिवमंदिर 

सोमेश्वर (अल्मोड़ा)
देवस्थल - अल्मोड़ा
पाताल देवी - अल्मोड़ा
जागनाथ - जागेश्वर - अल्मोड़ा
बागनाथ - बागेश्वर


२. मकर संक्रांति

कपिलेश्वर पट्टी बिसोद
पंचेश्वर पट्टी सौं - पिथौरागढ़


३. कार्तिक पूर्णिमा

पिनाकेश्वर पट्टी बीरारो
शिखर भनार - दानपुर


४. मेष संक्रांति

बेतालेश्वर - अल्मोड़ा
वृद्ध केदार - अल्मोड़ा


५. मिथुन चतुर्दशी

भीमेश्वर - भीमता (नैनीताल)


६. फागुन चतुर्दशी

पाताल भुवनेश्वर पट्टी बड़ाऊ (पिथौरागढ़:
पावनेश्वर - डीडीहाट (पिथौरागढ़)
बैजनाथ - जनपज अल्मोड़ा
गणनाथ - अल्मोड़ा
श्रावण चतुर्दशी - जागेश्वर - अल्मोड़ा
बागनाथ - बागेश्वर


७. भादों तृतीया

थल केदार (पिथौरागढ़)


८. भादों चतुर्दशी

भागलिंग (पिथौरागढ़)


९. कर्क संक्रांति

बालेश्वर मंदिर - चम्पावत


१०. आषाढ़ सप्तमी

घटकू (पिथौरागढ़)


११. नागपंचमी

उग्र रुद्र, नाकुरी (पिथौरागढ़)


१२. आषाढ़ तथा चैत्र अष्टमी

दूनागिरी
नैथाना देवी - जनपद अल्मोड़ा


१३. कृष्ण जन्माष्टमी - मिरतोला - अल्मोड़ा

 

 


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आस्था का प्रतीक है मंसार मेलाNov 23, 02:22 am

पौड़ी गढ़वाल। पौड़ी से करीब बीस किमी दूर सितोनस्यूं पट्टी के फलस्वाड़ी गांव में प्रतिवर्ष दीपावली के बाद द्वादशी को लगने वाला सीता माता का पौराणिक मेला आज भी हजारों लोगों की आस्था व विश्वास का प्रतीक बना हुआ है।

इस मेले का मुख्य आकर्षण सीता माता का प्रतीक मानी जाने वाली वह शिला (लोड़ी) है जो विधिवत पूजा-अर्चना के बाद खुदाई के उपरांत दिखाई पड़ती है। किवदंती है कि भगवान राम ने लोक लच्चा से परेशान होकर लक्ष्मण को माता सीता को वन में छोड़ने के निर्देश दिए थे। लक्ष्मण सीता को लेकर जैसे ही सितोनस्यूं घाटी के फलस्वाड़ी गांव में पहुंचे सीता ने कुपित होकर धरती माता से निवेदन किया कि वह उन्हे अपने अंदर समां लें। लक्ष्मण ने जब यह दृश्य देखा तो वह भी चकित रह गए। उन्होंने माता सीता का अंतिम बचाव करने की कोशिश की लेकिन उनके हाथ माता सीता की चोटी ही आई। आज भी मंसार मेले में क्षेत्र के हजारों श्रद्धालु पहुंचे तथा उन्होंने सीता माता का प्रतीक माने जाने वाले शिला (लोड़ी) के निकलने का घंटों इंतजार किया। अंत में श्रद्धालुओं की मुराद पूरी हुई और सभी ने इस शिला के दर्शन कर पूजा-अर्चना के साथ मन्नतें भी मांगी। फलस्वाड़ी गांव से एक दिन पहले गांव वाले निशाण (ध्वज) लेकर देवल गांव स्थित लक्ष्मण जी के मंदिर में पहुंचते है जहां से दूसरे दिन कुछ अन्य निशाणों के साथ ढोल-दमाऊ व गाजे-बाजे के साथ ग्रामीण मेले में फलस्वाड़ी पहुंचते है। गांव वाले ही उस स्थल का चयन करते है जहां पर सीता माता का प्रतीक मानी जाने वाली शिला जमीन में समाई होती है। इसके बाद बिना किसी हथियार के लकड़ी व हिरन के सींगों की सहायता से मिट्टी को खोदकर इस शक्ति शिला को खोजा जाता है। शिला नजर आते ही देवल मंदिर के पुजारी शिला की पूजा-अर्जना करते है। उसके बाद श्रद्धालु शिला के दर्शन करते है। इसके साथ ही सीता माता की चोटी का प्रतीक मानी जाने वाली बाबल घास से बनाई गई चोटी को श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है, जिसे क्षेत्रवासीे घर लाकर उसे अपने अन्न-धन के भण्डार में रखते है। देवल मंदिर के पुजारी विनोद कुमार पाडे का कहना है कि इस शिला की तीन दिनों तक फलस्वाड़ी गांव के ब्राह्मण विधिवत पूजा-अर्चना करते है, जिससे यह शिला पुन: जमीन में समा जाती जाती है। इस पूरे मेले में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जिन खेतों में यह मेला लगता है वहां पर इन दिनों उग चुकी गेहूं की फसल श्रद्धालुओं के खेलने-कूदने से पूरी तरह खराब हो जाती है लेकिन गांव वालों का कहना है कि कुछ ही महीनों बाद इन्हीं खेतों में गेहूं की सबसे अच्छी फसल लहलहाती नजर आती है जिसे क्षेत्रवासी सीता माता की ही शक्ति मानते है।

पंकज सिंह महर

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दोस्तो,
विमाण्डेश्वर महादेव (द्वाराहाट) में विषुवत संक्रान्ति को लगने वाले मेले के बारे में गोपाल दा का यह गाना सुनिये,  "ऎलखेते विखौती मेरी दुर्गा हरा गै"

 http://www.youtube.com/watch?v=06YLCfwSXpg

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सेम-मुखेम मेले में उमड़े श्रद्धालुNov 27, 02:09 am

लम्बगांव (टिहरी गढ़वाल)। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सेम-मुखेम नागराजा मंदिर में श्रद्धालुओं ने दर्शन किए।

तीन वर्ष में लगने वाला मेला पूजा-अर्चना के साथ शुरू हो गया है। मेले में टिहरी, उत्तरकाशी और पौड़ी जिले से हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर दर्शन किए। इस अवसर पर क्षेत्रीय विधायक विजय पंवार ने कहा कि मेले हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं जिन्हे और प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सेम-मुखेम को पांचवें धाम का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास किए जा रहे है तथा इसके विकास के लिए योजना बनाई गई है। सेम-मुखेम नागराजा मेले में स्वास्थ्य विभाग ने चार दिवसीय स्वास्थ्य शिविर लगाया है। पहले दिन विभिन्न रोगियों का स्वास्थ्य परीक्षण कर किया गया। साथ ही लोगों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भी दी जा रही है।

 

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