Author Topic: Flora Of Uttarakhand - उत्तराखंड के फल, फूल एव वनस्पति  (Read 231265 times)

Bhishma Kukreti

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सोनपाठा   कृषिकरण/ वनीकरण से स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Broken Bone Tree, Midnight Horror tree Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण - 54
Medicinal Plant Community Forestation -54

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति -158
Medical Tourism Development Strategies -158
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 261
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -261

आलेख : विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम - Oroxylum indicum
संस्कृत /आयुर्वेद नाम -श्योनाक
सामान्य   नाम - सोनपाठा
आर्थिक उपयोग ---
सब्जी व कई भोज्य पदार्थ अवयव

-----औषधि उपयोग ---
 
 रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं

जड़ें

पत्तियां

छाल

फूल

फल

बीज
रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है
अतिसार
आमवात
मूत्राशय शोथ
अपाचन
स्वास , कफ सर्दी जुकाम , सरदर्द
हड्डी दर्द
दस्त।  पेचिस
मुख कैंसर आदि में संसार के कुछ भागों में प्रयोग
त्वचा
रक्तशोधक
बाम का अवयव

दशमूलारिष्ट व च्यवनप्राश में अवयव
बाजार में उपलब्ध औषधि

पादप वर्णन
यह जाती खतरे में है
समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  - हिमायी श्रेणियों की घाटी में , 500 -900 , भारत में सर्व्रत्र , गदन किनारे , धुपेली पसंद
तापमान अंश सेल्सियस - 20 -35
वांछित जलवायु वर्णन -पर्वततल  घाटी
वांछित वर्षा mm- 850 -1300
वृक्ष ऊंचाई मीटर -9 -15 , कहीं  कहीं 50 भी
तना गोलाई सेंटी मीटर - 40 से 50
छाल -मटमैला भूरा
टहनी -लम्बी
पत्तियां -लम्बे
पत्तियां आकार , लम्बाई X चौड़ाई cm और विशेषता - युगल एक मीटर
फूल आकार व विशेषता -
फूल रंग -सफेद -बैंगनी  रात को चमगादड़ों को आकर्षित करने हेतु खिलते हैं
फल रंग -मटमैले टांटी या फली
फल आकार व विशेषता
टांटी तलवारनुमा
फूल आने का समय - जुलाई -अगस्त
फल पकने का समय - दिसंबर मार्च
बीज निकालने का समय -टांटी फटने से पहले
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं - एक साल


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -
बांछित मिट्टी प्रकार pH आदि -तकरीबन सभी मिटटी
वांछित तापमान विवरण - धुपेला स्थान
बीज बोन का समय - मार्च और सिंचाई प्रबंधन सही
बीजों को मंतत पानी में 24 घंटे हेतु भिगोना आवश्यक
नरसरी में बोते समय बीज अंतर -  पॉलीथिन बैग में अन्यथा जुताई हेतु गेंहू जैसे खेत त्यार करना होता है ,, गड्ढे 60 x 60 x 60 cm
मिटटी में  बीज कितने गहरे डालने चाहिए - 6 cm गहराई  व दूरी दो  मीटर , रोपण हेतु दूरी दो मीटर
अंकुरण प्रतिशत 80 -90 , 18 -20 दिनों में अंकुरण आ जाते हैं , सिचाई सालभर में छह से आठ किन्तु ग्रीष्म में अधिक
क्या कलम से वृक्ष लग सकते हैं ? हाँ किन्तु बीज भी  सही हैं
क्या वनों में सीधे बीज या पके फल छिड़के जा सकते हैं ? हाँ गोबर गोले बनाकर अधिक  उत्पादक हो सकते हैं /अथवा  कटे-पके फलों व बीजों को नदी या गदनों में बहा देना श्रेयकर
वयस्कता समय वर्ष - तीन साल में फूल आने लगते हैं पांच साल में बीज
कृषिकरण लाभकारी
 
यह लेख औषधि पादप कृषिकरण /वनीकरण हेतु जागरण हेतु लिखा गया है अतः  विशषज्ञों , कृषि विद्यालय व कृषि विभाग की राय अवश्य लें

कृपया इस लेख का प्रिंट आउट ग्राम प्रधान व पंचायत को अवश्य दें


Copyright@ Bhishma Kukreti , 2018 , kukretibhishma@gmail.com

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 शहतूत   कृषिकरण  से  स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Mulberry Tree Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण -55
Medicinal Plant Community Forestation -55

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति -159
Medical Tourism Development Strategies -159
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 262
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -262

आलेख : विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम -Morus alba
संस्कृत /आयुर्वेद नाम -तूतः
सामान्य   नाम -शहतूत
आर्थिक उपयोग ---
रेशम उद्यम
रेशे

-----औषधि उपयोग ---
 
 रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं

जड़ें

पत्तियां

छाल

फूल

फल

बीज
रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है

 दांत दर्द , गिंगिविटीज़
कब्ज
कफ , जुकाम
खरास निरोधक
शक़्कर रोग रोकथाम
त्वचा कृमि नाशक
जोड़ दर्द में
बाजार में उपलब्ध औषधि

पादप वर्णन

समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  -0 -3300 तक
तापमान अंश सेल्सियस - 23 -29
वांछित जलवायु वर्णन - शुष्क किन्तु छाया बर्दास्त क्र  लेता है
वांछित वर्षा mm- सामन्य पहाड़ी क्षेत्र उपलब्ध
वृक्ष ऊंचाई मीटर - 15 तक
तना गोलाई सेंटी मीटर -  60

पत्तियां आकार , लम्बाई X चौड़ाई cm और विशेषता - ३०  लम्बी गोल पर कटे हुए
फूल आकार व विशेषता -
फूल रंग -सफेद
फल रंग -भूरे लाल
फल आकार व विशेषता
बीज /गुठली विशेषता, आकार , रंग -
फूल आने का समय - मार्च मई
फल पकने का समय जुलाई
बीज निकालने का समय -जुलाई
बीज/गुठली  कितने समय तक अंकुरण हेतु क्रियाशील हो सकते हैं - तुरंत सही 


संक्षिप्त कृषिकरण विधि -
बांछित मिट्टी प्रकार pH आदि - 4 . 8 से 8

कैम्फर में बीज बिगिकर बिखेर दिए जाते हैं और बीजों के ऊपर सुखी मिट्टी   , राख की पतली तह डाली जाती है। 9 -14  दिनों में अंकुरण आ जाती है जब अंकुर 1. 5 मीटर तक बड़ी हो तो तो रोपण किया जाता है।
नरसरी स्थान छायादार या धुपेली - धुपेली
क्या कलम से वृक्ष लग सकते हैं ? हाँ , टहनी में कली सहित काटकर जमीन में गाढ़ देने से कलम उग जाती हैं।  जड़ों से भी कलम उगाई जाती हैं

वयस्कता समय वर्ष -
 
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मुलेठी कृषिकरण  से  स्वास्थ्य पर्यटन विकास

Liquorice Shrub Plantation for Medical Tourism Development

औषधि पादप वनीकरण -56
Medicinal Plant Community Forestation -56

उत्तराखंड में चिकत्सा पर्यटन  रणनीति -160
Medical Tourism Development Strategies -160
उत्तराखंड पर्यटन प्रबंधन परिकल्पना - 263
Uttarakhand Tourism and Hospitality Management -263

आलेख : विपणन आचार्य भीष्म कुकरेती

लैटिन नाम - Glycyrhiza glabra
संस्कृत /आयुर्वेद नाम -यष्टिमधु
सामान्य   नाम - मुलेठी
आर्थिक उपयोग ---
पान , तम्बाकू में उपयोग
मिष्ठान अवयव

-----औषधि उपयोग ---
 
 रोग व पादप अंग जो औषधि में उपयोग होते हैं

जड़ें /राइजोम तना
तना

पत्तियां

रोग जिनके निदान में पादप उपयोगी है
पेट दर्द
 गले की खरास
कफ , जुकाम
दूर दृष्टि दोष मायोपिया
कब्ज
आंत घाव
मुख दुर्गंध आदि
गंजापन
त्वचा घाव
कॉर्न
डाइबिटीज


पादप वर्णन
मुलेठी एक मीटर ऊंचा झड़ी नुमा पादप है जिस पर नीले रंग के फूल आते हैं तना टहनी लाभकारी होते हैं
समुद्र तल से भूमि ऊंचाई मीटर  - शुष्क , जहां दलदल न हो , घाटियों में
५०० से १००० mm वर्षा
तापमान शीत 5 अंश सेल्सियस व ग्रीष्म 50 अंश सेल्सियस तक
मुलेठी के बीजों से खेती नहीं होती जैसे अदरक , हल्दी
मुलेठी के राइजोम जिन पर २ ३ कलियाँ हों काट लिया जाता है और गेंहू जैसे जुते  खेतों में कलमें ६ सेंटीमीटर गहरे व 60 =75 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाई जाती हैं।  खाद , ३० ४५ दिन  सिंचाई का इंतजाम आवश्यक, इसके जड़े समांतर फैलते हैं अतः  जमीन की जुताई गहरी होनी चाहिए
वयस्कता समय वर्ष - ३ - ४ साल में जड़े /राइजोम तना प्रयोगशील
उत्तराखंड में नयार , हिंवल , गदन घाटियों में राइजोम कलम लगाए जा सकते हैं सामजिक वानिकी रूप में वनों में जहां सिचाई प्रबंधन हो में भी कलमे लगाई जा सकती हैं
 
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          उत्तराखंड में लीची का  प्रवेश   (इतिहास) 
           History of Litchi i Introduction in Uttarakhand     
     
          उत्तराखंड परिपेक्ष में  का भारत में फलों का इतिहास -2
                   History Aspects of  Fruits in India in context Uttarakhand  -2

           उत्तराखंड परिपेक्ष में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास -105   

       History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  referring  Uttarakhand -105


                        आलेख : भीष्म कुकरेती


उत्तराखंडी नाम - लीची
हिंदी नाम - लीची
सामान्य अंग्रेजी नांम  लीची
Botanical Name - Litchi chinesis
जन्म मूल स्थान -    क्वांगतुंग , ग्वांगडोंग  दक्षिण चीन -             महाद्वीप - एशिया
फल की भारत व उत्तराखंड यात्रा - लीची  का मूल स्थान दक्षिण पूर्व चीन माना जाता है।  हाँ कुल सम्राट के समय  (140 - 86 ईशा पूर्व ) में लीची का विवरणमिलता है व लीची के बारे में  1059   में पहली बार सन Tsai Hsiang
ने लिखित प्रकाश डाला।  जबकि वॉल्ट्न स्विंगलर का मानना है कि किन्ही चीनी विद्वान् ने 1056  में ही प्रथम बार लीची विवरण प्रकाशित किया।
    लीची को चीन से  बर्मा व भारत के उत्तर पूर्व में  आने में  सैकड़ों साल लगे और कहा जाता है कि लीची  सत्रहवीं सदी में म्यानमार व ( उत्तर पूर्व भारत )  में पंहुची यानी लीची का उत्पादन सत्रहवीं सदी  में शुरू हुआ।  और बंगाल तक आते आते लीची को सौ साल लगे।  याने बंगाल में लीची का उत्पादन अठारहवीं सदी में शुरू हुआ।  1870 में मौरिसिस पंहुची। 
    बंगाल  ( पश्चिम  भाग )  में शायद 1780    प्रवेश किया।  सहारनपुर से लीची ने 1883  में  फ्लोरिडा प्रवेश किया ।  वहां से 1897 में कैलिफोर्निया पंहुची या उगाना शरू हुआ।  जब 1883  में सहारनपुर से लीची फ्लोरिडा पंहुची तो इसका अर्थ है कि 1883  तक लीची  का  सहारनपुर देहरादून व  भाबर में भली भांति उत्पादन शुरू हो गया था।  सहारनपुर, देहरादून , गढ़वाल व कुमाऊं में सन 1750 से 1815 तक राजनैतिक व सामाजिक उथल पुथल का युग था याने उस काल में बंगाल या बिहार से लीची सहारनपुर अथवा  देहरादून बिलकुल नहीं पंहुची  होगी।  ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद ही लीची ने देहरादून व सहारनपुर प्रवेश किया होगा।  संभवतया ब्रिटिश सैनिक अधिकारियों (सहारनपुर व देहरादून सैनिक छावनियां थीं )  द्वारा ही सहरानपुर व देहरादून में लीची का उत्पादन शुरू हुआ होगा।   अधिक संभावना यह है कि लीची का उत्पादन देहरादून व सहारनपुर में 1857  के बाद ही शुरू हुआ  होगा क्योंकि तब तक सहारनपुर व देहरादून में  अंग्रेजों के लिए तथाकथित अराजक स्थिति  नहीं रही होगी। 
     यह बताना कठिन है कि लीची का उत्पादन देहरादून व सहारनपुर में एक साथ शुरू हुआ या अलग अलग समय।  देहरादून ब्रिटिश काल  सहारनपुर रेंज में आता था तो देहरादून में लीची उत्पादन भी हुआ तो भी नाम  आता रहा होगा। 
उत्तराखंड में लीची लगभग 20 मैट्रिक टन  प्रतिवर्ष पैदा होती है और भारत में सबसे कम पैदावार , उत्पादकशीलता का प्रदेश भी  उत्तराखंड ही है
शुरू से ही लीची उत्तराखंड में रसूखदारों का फल में गिनती होती आयी है।  लीची का पेड़ आकर्षक व फल लाभकारी होते हैं।  लीची में पर्याप्त मात्रा में विटामिन्स , लवण , खनिज ,  पाए जाते हैं  से  लाभ में लीची कामगर साबित हुयी है।  आयु प्रभाव  बालों की सुरक्षा  , तवचा  को चमक देने, ब्लड प्रेसर को स्थिर करने , हड्डी की शक्ति बढ़ाने आदि  में प्रयोग होती है।     
  लीची हेतु गर्म व विशेष मिटटी की आवश्यकता होने के कारण लीची देहरादून , भाबर ,  उगाया जाता है पहाड़ों में कृषकों ने लीची उगाने की कम ही प्रयोग किये।  किन्तु सन 2000 के लगभग , सत्यप्रसाद बड़थ्वाल ने गंगा तट पर बसे गाँव  में खंड , दाबड़ (बिछला , पौड़ी गढ़वाल, गंगा से 1000 फ़ीट ऊंची भूमि )  ) में लीची उगाना शुरू किया। 
-
संदर्भ - डा  इंदु  मेहता , - 2017 लीची - द क्वींस ऑफ  फ्रूट्स , जर्नल ऑफ़ ह्यूमनटीज ऐंड   साइंस , वॉलयूम 22 इस्यु 9
Copyright @ Bhishma Kukreti  25 /1/2014

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      उत्तराखंड परिपेक्ष में अमरुद (पेरू) का इतिहास

उत्तराखंड परिपेक्ष में  का भारत में फलों का इतिहास -2
          History Aspects of  Fruits in India in context Uttarakhand -2

       उत्तराखंड परिपेक्ष में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास -107   


      History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  referring  Uttarakhand -1057


                    आलेख :  भीष्म कुकरेती

उत्तराखंडी नाम - अमरुद
संस्कृत नाम - कोई नहीं
हिंदी नाम - अमरुद (कहीं कहीं महराष्ट्र आदि में पेरू भी कहा जाता है
सामन्य अंग्रेजी नांम -Guava
Botanical Name - Psidium  guajava
जन्म मूल स्थान -        मैक्सिको      महाद्वीप   मध्य अमेरिका
फल की यात्रा -   बहु स्वास्थ्यबर्धी , लाभकारी , उष्णकटबंधीय  अमरुद  का मूल जन्म स्थल मैक्सिको  से  मध्य अमेरिका  तक है।  सैकड़ों साल तक अमरुद  मूल स्थान से वेस्ट इंडीज टापुओं में प्रवेश कर फलता फूलता रहा।  पुरानी दुनिया से अमरुद का परिचय पुर्तगाली या स्पेनी   व्यापारियों ने कराया।
   रिकॉर्ड अनुसार सबसे पहले किताबी परिचय स्पेनी घुमकड़ इतिहासकार ओवीडो ने कराया (1514 -1557  हैती की यात्रा ) हिस्ट्री ऑफ इंडीज  (1526 ) में  ओवीडो ने  अमरुद वनस्पति का वृत्तांत दिया और इस फल को गुआयाबो नाम दिया।     अधिकतर इतिहासकार व वनस्पति शास्त्री मानते हैं कि  अमरुद का पेड़ स्पेनिश द्वारा  सत्रहवीं सदी अंत में प्रशांत  महासागर  रस्ते से भारत लाया गया।  जब कि एक स्रोत्र बताते हैं कि स्पेनी प्रसांत महासगरीय द्वीपों में ले गए और पुर्तगाली भारत लाये।  यदि प्रशांत महासागरीय द्वीप से अमरुद पेड़ भारत लाया गया तो कोलकत्ता या बंगाल ही वः जगह होगी जहां अमरुद पेड़ आया या दक्षिण भारत।  वैसे  आईने अकबरी अनुवाद में भी अमरुद का नाम आता है किन्तु वह  फल गुआवा(अमरुद ) नहीं अपितु नासपाती रहा होगा।  अमरुद उत्पादन हेतु बहुत कम मेहनत लगती है जिसके कारण अमरुद को भारत के सभी क्षेत्रों में प्रसारित होने में समय नहीं लगा 
 अमरुद जल्दी फैलने वाला व सभी तरह की मिट्टी में उग जाता है और फलता फूलता है तो अमरुद को उगाने कोई दिक्क्त न आयी होगी और समाज ने स्वतः ही अपना लिया होगा।  उत्तराखंड के बारे में अमरुद प्रवेश पर कोई जानकारी नहीं मिलती।  अतः अंदाज लगाना ही पड़ेगा कि अमरुद को देहरादून , सहारनपुर, पीलीभीत  आदि स्थलों में पंहुचने में डेढ़ सौ साल लगे ही होंगे याने ब्रिटिश राज युग में ही अमरुद का अवतरण उत्तराखंड में हुआ होगा  अमरुद उत्पादन हेतु बहुत कम मेहनत लगती है जिसके कारण अमरुद को प्रसारित होने में समय नहीं लगा 

   सबसे पहले अमरुद का  उत्पादन भाबर , देहरादून ,  उधम सिंह नगर में ही  शुरू हुआ होगा  और शायद ब्रिटिश राज में प्रसार हुआ होगा।  किन्तु ब्रिटिश गजेटों में अमरुद का नाम मुझे पढ़ने को नहीं मिला।  हो सकता है ब्रिटिश काल में अमरुद फल का महत्व उत्तराखंड में जमा भी  नहीं रहा होगा (नगण्य ) . स्वतंत्रता उपरान्त भी देहरादून में जंगल में अमरुद अधिक उगते थे।  (जैसे कांवली गाँव में गुरुराम राय की बागवानी जो जंगल ही जैसा था  में अमरुद बहुतायत में उगते थे )
   पहाड़ों में गर्म जगहों में 3000 - 4500  फ़ीट तक भी अमरुद उगते हैं किन्तु उत्पादनशीलता कम ही होती है।  बारामासा फल देने वाला पेड़ अमरुद कच्चे पके फल , जाम , आइसक्रीम , अन्य बिवरेजेज में उपयोग होता और फलों का राजा कहलाने लायक है।   
   


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