Author Topic: It Happens Only In Uttarakhand - यह केवल उत्तराखंड में होता है ?  (Read 33057 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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संग्राली गांव में कंडार देवता का राजJun 28, 10:23 pm

उत्तरकाशी। पहाड़ में सदियों से चली आ रही मान्यताएं आज भी जिंदा है। इसका जीता जागता उदाहरण प्राचीन संग्रामी गांव में देखने को मिलता है। यहां पंडित की पोथी, डाक्टर की दवा और कोतवाल का डंडा यहां काम नहीं आता है। गांव में कंडार देवता का आदेश ही सर्वमान्य है।

देवभूमि उत्तराखंड के उत्तर में उत्तरकाशी के निकट वरुणावत पर्वत के शीर्ष पर बांयी ओर संग्राली गांव में कंडार देवता का प्राचीन मंदिर आस्था और विश्वास का केंद्र ही नहीं, बल्कि एक न्यायालय भी है। इस न्यायालय में फैसले कागजों में नहीं होते और न ही वकीलों की कार्यवाही होती है। यहां फैसला देवता की डोली सुनाती है। संग्राली गांव के लोग जन्मपत्री, विवाह, मुंडन, धार्मिक अनुष्ठान, जनेऊ समेत अन्य संस्कारों की तिथि तय करने के लिए पंडित की तलाश नहीं करते। कंडार देवता मंदिर के पंचायती प्रांगण में जमा होकर ग्रामीण डोली को कंधे पर रख कंडार देवता का स्मरण करते हैं। इस दौरान डोली के डोलने से इसका अग्रभाग जमीन का स्पर्श करता है। इससे रेखाएं खिंचने लगती हैं। इन रेखाओं में तिथि व समय लिख जाता है। आस्था है कि जन्म कुंडली भी जमीन पर रेखाएं खींचकर डोली स्वयं ही बना देती है। कई ऐसे जोड़ों का विवाह भी कंडार देवता करवा चुका है, जिनकी जन्मपत्री को देखने के बाद पंडितों ने स्पष्ट कह दिया था कि विवाह हो ही नहीं सकता। मात्र यहीं नहीं बल्कि गांव में जब कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है तो उसे उपचार के लिए कंडार देवता के पास ले जाया जाता है। सिरर्दद, बुखार, दांत दर्द तो ऐसे दूर होता है जैसे पहले रोगी को यह दर्द था ही नहीं।

गांव में झगड़ा होने पर कंडार के प्रांगण में पंचायत बैठती है और डोली से न्याय मांगा जाता है। डोली तत्काल दोषी को दंडित करते हुए न्याय सुनाती है और उसे पूरा गांव स्वीकार करता है। पंचायत चुनाव में इस गांव के प्रधान सुख शर्मा का चयन कंडार देवता ने स्वयं किया। इससे पहले के प्रधान भी देवता ने स्वयं ही चुने थे। प्रधान के काम में गड़बड़ हुई तो उसे दंड देने का अधिकार भी देवता को ही होता है। गांव में आज तक कभी पुलिस का हस्तेक्षप ही नहीं हुआ।

गांव के बुजुर्ग महिमा नंद भट्ट, चन्द्र मोहन भट्ट, ज्योति प्रसाद नैथानी, परमानंद, शिवानंद भट्ट समेत अन्य कहते हैं कि कंडार सब जानता है। वे कहते हैं कि पंडित, डाक्टर और पुलिस की कोई आवश्यकता ही नहीं है। ये सब कार्य उनका देवता स्वयं ही कर देता है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5580770.html

पंकज सिंह महर

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चिलचिलाती धूप और उमस भरी गर्मी में एक ओर लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं तो दूसरी ओर एक ऐसा गांव भी है, जो अपने लिए नहीं, बल्कि प्यासे बेजुबानों (जंगली जानवरों) के लिए भी चिंतित है। यहां के ग्रामीणों ने अपने गांव के आसपास के जंगल में सूख चुके जोहड़ों (तालाब) को पानी से भरने का बीड़ा उठाया है। रोजाना टैंकरों से तालाबों में पानी डाला जा रहा है, जिसमें प्रतिदिन लगभग तीन हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। ये पैसा किसी फंड से नहीं, बल्कि पशु प्रेमी अपनी जेब से दे रहे हैं। पशु प्रेम क्या होता है, यह देखना है तो देहरादून के सहसपुर विकासखंड की छरबा ग्राम पंचायत में आइये। यहां चिलचिलाती धूप में ग्रामीण एक मिशन को अंजाम दे रहे हैं। मिशन जंगली जानवरों की प्यास बुझाना है। दरअसल, कालसी वन प्रभाग की चौहड़पुर रेंज में ग्राम पंचायत छरबा के आसपास घना जंगल है। इस जंगल के बीचोबीच तीन तालाब (लाट का जोहड़, साहब का जोहड़ व लंबी जोहड़) हैं। वर्षो से ये तालाब मवेशियों और जंगली जानवरों की प्यास बुझाते रहे हंै। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहली बार गर्मी का ऐसा कहर बरपा है कि तीनों जोहड़ सूख गए। करीब दस दिन पूर्व गांव के ग्राम प्रधान रूमीराम जायसवाल ने लाट के जोहड़ के पास कुछ प्यासे बंदरों को गीली मिट्टी चूसते हुए देखा तो उन्हें लगा कि इन बेजुबानों की पीड़ा समझने वाला कोई नहीं है। दूसरे ही दिन उन्होंने गांव के कुछ लोगों को यह वाकया सुनाया और निर्णय लिया गया कि जोहड़ों की सफाई कर उन्हें रोजाना टैंकरों से पानी ले जाकर भरा जाएगा। पिछले एक सप्ताह से गांव के लोग रोजाना टैंकरों से जोहड़ों को भर रहे हैं, जिसमें लगभग तीन हजार रुपये रोजाना खर्च हो रहा है। पड़ोस की ग्राम पंचायत होरावाला के प्रधान मोहन लाल भी अपने गांव के कुछ लोगों के साथ इस मिशन से जुड़ चुके हैं और तन, मन, धन से अभियान में सहयोग कर रहे हैं।

Sunder Singh Negi/कुमाऊंनी

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बहुत खुब पंकजदा

इसी को कहते है कि अपने लिए जिये तो खाक जिये जरा दुसरो के लिए जी कर तो देखो।

पंकज सिंह महर

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(खटीमा, ऊधमसिंहनगर)
चकरपुर स्थित ऐतिहासिक बनखंडी महादेव शिवमंदिर का शिवलिंग महाशिवरात्रि पर्व पर सात रंग बदलता है। इसके दर्शन से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इसी आस्था व विश्वास के चलते ही शिवरात्रि पर मंदिर में मत्था टेकने वालों भक्तों का सैलाब उमड़ता है। आसपास क्षेत्रों के साथ ही पड़ोसी देश नेपाल के लोग भी जलाभिषेक करने यहां पहुंचते है।
इस शिव मंदिर के बारे में कई मान्यताएं प्रचलित है। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना थारु जनजाति द्वारा वर्ष 1830 में की गई थी। शिव भक्तों द्वारा एक शिवलिंग को नर्मदा से चकरपुर क्षेत्र के गांव नौगंवनाथ में स्थापित करने के लिए ले जाया जा रहा था। इसी दौरान यह शिवलिंग जंगल के रास्ते में गिर गया। जब लोग नौगांवनाथ गांव पहुंचे तो शिवलिंग को न पाकर भौचक्के रह गए। बताते हैं कि बाद में गांव वासियों ने शिवलिंग की खोजबीन शुरू कर दी। जिस जगह पर शिव मंदिर स्थापित है। वहां गांव वालों को शिवलिंग पड़ा हुआ मिला। लोगों ने जब शिवलिंग को उठाने की कोशिश की तो वह उठने के बजाए जमीन में और धंसने लगा। नौगंवानाथ में जहां शिवलिंग को स्थापित करने के लिए भूमि चयन की गई थी। वहां गुरु गोरखनाथ मंदिर की स्थापना की गई। इस मंदिर के बारे में यह बताया जाता है कि चकरपुर क्षेत्र में रहने वाले थारु जनजाति के एक किसान की गाय पास के ही जंगल में चरने जाती थी। एक स्थान पर खड़ी होकर वह खुद ही दूध देने लगती थी। यह विचित्र समाचार पाते ही एक दिन लोगाें ने गाय का पीछा किया तो वह यह नजारा देखकर हैरत में पड़ गए। उस स्थान की सफाई करने पर वहां एक शिवलिंग दिखाई पड़ा। धीरे-धीरे लोगों ने इस शिवलिंग की पूजा शुरू कर दी। महाशिवरात्रि पर लाखों लोग यहां शीश नवांने आते है। बताया जाता है कि जब रोहिणी नक्षत्र में शिवरात्रि पड़ती है तो यह शिवलिंग सात रंग बदलता है। मंदिर के पुजारी बाबा पुष्कर गिरी बताते है कि उन्होंने स्वयं शिवलिंग के तीन रूप देखे है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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This is unique system and is observed in Uttarakhand only.
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देव स्तुति के साथ होती है धान की रोपाई===============================



गरुड़ (बागेश्वर)। देवभूमि उत्तराखंड के बारे में एक कहावत प्रचलित है कि जितने कंकर उतने शंकर। यहां कदम कदम पर स्थानीय देवी देवताओं के छोटे-बडे़ मंदिर है तो विभिन्न स्थानों में ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व के विशाल मंदिर। हर कार्य को धर्म व आध्यात्म से जोड़ लेना यहां के निवासियों की आदत में शामिल है। खेती को भी यहां के काश्तकार पवित्र धार्मिक भाव से करते हैं। देवी देवताओं की स्तुति के साथ धान की रोपाई की इसी विधा को 'हुड़किया बौल'कहा जाता है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति विश्व में अपना अलग स्थान रखती है। लोकगीत झोड़ा, छपेली, चांचरी, न्यौली, भ्वींन आदि में स्थानीय देवी देवताओं की स्तुति का जिक्र मिलता है। प्रत्येक कार्य को धार्मिक भाव तथा आपसी प्रेम व सौहार्द के रूप में करने वाले पहाड़ के लोग पारंपरिक खेती को भगवान का वरदान समझकर करते है। हुड़किया बौल भी इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है। धान की रोपाई, घास की कटाई व मडुवे की गुड़ाई में स्थानीय महिला व पुरुष किसान देवी देवताओं की स्तुति करते हुए कार्य करते है। इस विधा में हुड़के की थाप में गायक पहले गाता है फिर इसी लाइन को रोपाई करने वाली महिलाएं दोहराती है। 'सुफल है जाया पंचनाम देवा हो..' गाकर सभी देवताओं के आह्वान के साथ रोपाई शुरू की जाती है। बैजनाथ की उपजाऊ भूमि पर कत्यूरी शासक राजा विरम की कहानी हुड़किया बौल में कही जाती है। तैलीहाट गांव में बैजनाथ की राजधानी हुआ करती थी। राजा विरम की रिश्तेदारी गेवाड़के कठैत क्षत्रिय लोगों के यहां थी। कहा जाता है कि एक बार बैजनाथ में अपनी जमीन में रोपाई के लिए विरम ने गेवाड़ से रिश्तेदारों को बुलाया। रोपाई के लिए आई एक सुंदर महिला ने राजा का मन मोह लिया। रोपाई के बाद सारी महिलाएं वापस चली गयीं लेकिन राजा के मन में उस खूबसूरत महिला की तस्वीर घर कर गयी। जब राजा को उस महिला की याद ज्यादा ही सताने लगी तो एक दिन वह घोड़े में सवार होकर गेवाड़ जाने लगा। कत्यूर घाटी के द्यौनाई पहुंचते ही थकान के मारे घोड़ा रुक गया। मनाने के बाद भी जब घोड़ा आगे नहीं बढ़ा तो क्रोधित राजा ने घोड़े का सिर कलम कर दिया और पैदल ही गेवाड़ चला गया। इस स्थान पर आज भी शिला क रूप में प्रमाण मौजूद है। महिला के प्रेम में पागल राजा विरम को उस महिला से मिलने से पूर्व ही षडयंत्र के तहत मौत के घाट उतार दिया गया। इस कथा के बाद गायक एकदम क्रम बदलते हुए गायन में झटका मारते हुए महिलाओं से सबक लेने तथा सचेत होने की प्रेरणा देता है। आज भी हुड़किया बौल के साथ धान की रोपाई करने की परंपरा प्रचलित है। स्थानीय किसान शिव सिंह बोरा कहते है कि हुड़किया बौल धार्मिक के साथ साथ ग्रामीणों के आपसी प्रेम व सौहार्द का भी प्रतीक है। युवा पीढ़ी इससे अनभिज्ञ है। इस सांस्कृतिक, ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए संस्कृति प्रेमियों को आगे आना होगा।[/b][/b][/size]

Source : http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5614748.html[/color]

हेम पन्त

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Source : Dainik Jagran 22 July 2009

पुरोला (उत्तरकाशी)। मंदिर में चोरी के इरादे से गए दो युवक मंदिर प्रांगण में बेहोश हो गए। ग्रामीणों ने दोनों पर पकड़कर राजस्व पुलिस के हवाले कर दिया।

बाईस गांवों के ईष्ट बिणासू मात्री देवी मन्दिर मोरी पर्वत क्षेत्र के सटूड़ी में स्थित है। यहां वर्षो से दान के रूप में मौजूद 20 किलो सोना और चांदी को चुराने के उद्देश्य से दो नेपाली युवक रविवार की रात मन्दिर में गए, लेकिन मंदिर परिसर में पहुंचते ही दोनों बेहोश होकर गिर गए। जानकारी के मुताबिक ग्रामीणों ने मंदिर परिसर में दो युवको को बेहोशी की हालत में पड़ा पाया। ग्रामीणों ने पानी के छींटे मार कर दोनों युवकों को जगाया। उन्होंने ग्रामीणों को बताया कि मन्दिर में रखे सोना-चांदी को चुराने के इरादे से वे आए थे। ग्रामीणों ने दोनों को पकड़कर राजस्व पुलिस के हवाले कर दिया।


मंदिर में नहीं लगता कभी ताला

पुरोला। मोरी प्रखंड के पंचगाई पटटी के 22 गांव की ईष्ट देवी मात्री देवी का मन्दिर ग्राम सटूडी गांव से 4 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगलों के बीच स्थित है। मंदिर में कभी भी ताला नहीं लगाया जाता है। मन्दिर में 22 गांव के श्रद्घालु प्रति वर्ष मेलों-त्योहारों के समय मन्नतें मांगते हुए गहने चढ़ाते है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देवीधुरा - STONE PELTING BATTLE -CHAMPAWAT DISTRICT OF UK
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यह जगह चम्पावत से 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह खूबसूरत जगह वराही मंदिर के नाम से जानी जाती है। यहां बगवाल के अवसर पर दो समूह आपस में एक दूसरे पर पत्थर फेकते हैं। यह अनोखी परम्परा रक्षा बन्धन के अवसर की जाती है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देवप्रयाग

अलकनंदा तथा भगीरथी नदियों के संगम पर देवप्रयाग नामक स्थान स्थित है । इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है । यह समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है । देवप्रयाग की ऋषिकेश से सडक मार्ग दूरी ७० किमी० है । गढवाल क्षेत्र मे भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है ।  । देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है । देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं देते, जो की एक आश्चर्य की बात है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मद्महेश्वर: यहां होती है शिव की नाभि पूजा

हिमालय पर्वत की श्रंखलाओं की गोद में अनेक तीर्थ स्थल है जो कि श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था के केंद्र है इन्हीं पंचकेदारों में से एक द्वितीय केदार के नाम से प्रसिद्ध भगवान मद्महेश्वर जहां शिव के नाभि की पूजा होती है। मान्यता है कि स्वर्ग लोक से कामधेनु गाय रोज यहां दूध चढ़ाती थी। आज भी यहां गाय के खुर व स्तन विद्यमान है। गत रविवार को द्वितीय केदार के कपाट खुलने के बाद यहां भगवान के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है।

हिमालय के चौ-खम्बा पर्वत की गोद में समुद्र तल से 9700 फिट की ऊंचाई पर स्थित भगवान मद्महेश्वर का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था का केन्द्र बिन्दु है। मान्यता है कि भोले को यह स्थान काफी प्रिय था, विवाह कि बाद भगवान शिव ने अधिक समय यहीं पर बिताया था। इसे गुप्त तीर्थ के नाम भी जाना जाता है। किवदंती है कि जो भी नि:संतान दंपति पुत्ररत्न की प्राप्ति के लिए यहां पर भगवान की मन से पूजा करता है उसे इच्छित फल की प्राप्ति होती है। पांडवों ने स्वर्गारोहण के समय पंचकेदारों की स्थापना की। कहा जाता है कि स्वर्ग लोक से कामधेनु गाय नित्य यहां दूध चढ़ाती थी। वर्तमान में यहां गाय के खुर व स्तन भी विद्यमान है। यहां श्वेत भैरव निरन्तर भोले की रक्षा करते है। पुराणों के अनुसार मद्महेश्वर तीर्थ में गौड़ देश का स्वाधी ब्राह्मण अपने समस्त पित्रों के कल्याणार्थ तीन रात्रि जागरण करने के पश्चात पूजा अर्चना कर लौट रहा था कि उन्हें मार्ग में एक विशाल विकराल राक्षस दिखाई दिया जिसकी जंघाओं से सैकड़ों कृमि निकल रहे थे यह देखकर उक्त ब्राह्मण भयभीत हो गया। घबराए हुए व कुछ भी न बोल सका, वह राक्षस भी ब्राह्मण की एकटक देखने लगा वह बोला कि में समझ रहा हूं कि मेरे कुछ पाप तुम्हारे दर्शनों से दूर हो गए है देखते-देखते ही वह स्वस्थ हो गया। ठंड अधिक होने के कारण नवम्बर में भगवान मद्महेश्वर के कपाट छ: माह के लिए बंद कर दिए जाते है। भगवान की डोली ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ पहुंचती है तथा यहां पर विश्व विख्यात धार्मिक मद्महेश्वर मेले का आयोजन होता है। गत रविवार को कपाट खुलने के बाद भगवान मद्दमहेश्वर के दर्शनों के लिए देश-विदेश के श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना शुरू हो गया है। भगवान मद्दमहेश्वर की पैदल यात्रा कठिन होने के बावजूद भी यहां पहुंचने पर श्रद्धालुओं को असीम शांति की अनुभूति होती है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड में एक ऐसा भी गाँव है जहा नही होते है पंचायत चुनाव
हिमाच्छादित गगनचुम्बी पर्वत श्रृंखलाओं से बीच चीन की सीमा से सटा भारत का एक गांव माणा आज भी अपनी पारंपरिक ओर प्राकृतिक विरासत को संजोए हुए है। समूचे देश में भले ही छोटे-छोटे चुनाव में प्रत्याशियों के बीच कांटे की टक्कर होती हो मगर यहां आज तक ग्राम पंचायत के लिए वोट नहीं डाले गए। सुनने में जरूर अटपटा लगता है कि विगत 100 साल से यहां ग्राम के मुखिया निर्विरोध चुनते आ रहे हैं।

चीन की सीमा से कुछ मील की दूरी पर बसा माणा देश का आखिरी गांव है।

हिन्दू आस्था के केन्द्र बदरीनाथ धाम से मात्र तीन किमी पैदल चलने के बाद पड़ने वाले इस गांव में नैसर्गिक सुन्दरता का अकूत खजाना है। माणा में ख्ेाती भी होती है और मंदिरों में पूजा भी। यहां का जीवन सोंधी खुशबू को समेटे है। नई बात यह है कि भोटया जनजाति के लगभग 300 परिवारों वाले इस गांव में प्रधान का चुनाव वोट डालकर नहीं होता। वर्ष 1962 के चीन युद्ध के बाद माणा को 1988 में नोटिफाईड एरिया बदरीनाथ से सम्बद्ध किया गया था। 1989 में पंचायत का दर्जा मिलने के बाद से आज तक यहां के निवासी अपने प्रधान का चयन आपसी सहमति से करते आ रहे हैं। यहां पहले प्रधान राम सिंह कंडारी से लेकर निवर्तमान ग्राम प्रधान पीताम्बर सिंह मोल्फा निर्विरोध चुने गए। यहां की आजीविका आलू की खेती,भेड़, बकरी पालन है। 1785 की जनसंख्या वाले छोटे से गांव में चंडिका देवी, काला सुन्दरी, राज-राजेश्वरी,भुवनेश्वरी देवी,नन्दा देवी,भवानी भगवती व पंचनाग देवता आदि के मन्दिरों में भोटया जनजाति की उपजातियों के लोगों का अधिकांश समय अपनी-अपनी परम्परा निभाने व धार्मिक अनुष्ठान में बीतता है। माणा में वन पंचायत भी गठित है जिसका विशाल क्षेत्रफल लगभग 90 हजार हेक्टेअर तक फैला है। यहां मौजूद भगवान बद्रीनाथ के क्षेत्रपाल घण्टाकर्ण देवता का मन्दिर अपनी अलग पहचान रखता है। कई खूबियों के बावजूद यहां भी कुछ कष्ट हैं। बद्रीनाथ के कपाट बन्द होने से कपाट खुलने तक पर यह पूरा क्षेत्र सेना के सुपुर्द रहता है। इस कारण ग्रामीणों को शीतकाल के 6 माह अपना जीवन सिंह धार, सैन्टुणा, नैग्वाड़, घिंघराण,नरौं, सिरोखुमा आदि स्थानों पर बिताना पड़ता है। दूसरी विडंबना यह है इन्टर तक के विद्यार्थी छह माह की शिक्षा माणा में लेते हैं और छह माह 100 किमी दूर गोपेश्वर के विद्यालयों में। यहां टेलिफोन, बिजली और पानी जैसी सुविधा तो हैं उपचार कराने को अस्पताल नहीं। ग्राम प्रधान पीताम्बर सिंह मोल्फा ने बताया कि देश-विदेश से बदरीनाथ पहुंचने वाले कई अति विशिष्ट व्यक्ति और मंत्रीगण माणा को देखने तो आते हैं लेकिन गांव के विकास को वादों के अलावा कुछ नहीं देते। देश विशेष पहचान रखने वाले इस गांव को अभी भी विकास का इंतजार है।

courtsey : जागरण न्यूज़

 

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