Author Topic: It Happens Only In Uttarakhand - यह केवल उत्तराखंड में होता है ?  (Read 33623 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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यहाँ पीठ करके होती है भगवान् की पूजा
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उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में एक एसे देवता का मंदिर है जिनकी पूजा उनकी ओर पीठ करके होती है ! यहाँ के कस्बेनुमा गाव नैटवाड में भगवान् पोखूवीर का मंदिर है ! यह जगह दिल्ली से ४५० किलोमीटर दूर ओर देहरादून से २०० किलोमीटर दूर पुरोला बालक में मशहूर हरकी दूंन टंक पर सिथित है !

इस पूरे क्षेत्र में पोखूवीर उत्तराखंड के एक एनी देवता गोलू या ग्वाल देवता (गुरील) की तरह न्याय के देवता के रूप में प्रसिद्ध है !

हलाकि कुछ लोगो का मानना है की पोखूवीर देवता के दर्शन से अनिष्ट होता है इसीलिए उस स्थानीय देवता की मूर्ती को ओर पीठ करके पूजा की जाती है ! लोगो का मानना है की जब लोगो को अदालतों या पंचायतो से न्याय नहीं मिलता है तो वे पोखूवीर से गुहार लगाते है! माना जाता है कि अन्यायी या दोषी होता है उसके तुरुंत अनिष्ट हो जाता है !

पोखूवीर से जुडी कुछ दंत कथाये !
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एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में किरमिर दानव ने पूर क्षेत्र में उत्पात मचाया हुवा था! जनता को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए राजा दुर्योधन ने उनसे युद्घ किया और उसे परास्त कर उसका सर काट दिया!  किरमिर दानव का का सिर टॉस नदी मे फैक दिया ! लेकिन किरमिर दानव का सिर नदी कि दिशा में बहने के बजाय उल्टा बहने लगा और रुपिन नदी और भराटसर (विराटसर) झील से तो सुपिन स्वर्ग रोहणी हिम शिखरों से निकलती है !

राजा दुयोधन ने किरमिर दानव के कटे सिर को नैटवाड में स्थापित कर वहां उसका मंदिर बनाया !

दूसरी कथा
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किरमिर या किलबिल दानव दरअसल महाभारत का वभरुवाहन था जिसका कि चालाकी से भगवान् श्री कृषण ने वध कर दिया था! इस क्षेत्र कि खासियत है कि इस इलाके में कौरवो कि पूजा कि जाती है तो मसाली गाव में  पांडवो कि पूजा की जाती है!

नैटगाड़ से २ किलोमीटर कि दूरी पर है देवरा गाव में राजा कर्ण का मंदिर! नैटवाड से १४ किलोमीटर की दूरी पर है सौड़ गाव जहाँ दुर्योधन की पूजा कि जाती है !

सूपिन नदी के किनारे नैट वाड से १२ किलोमीटर कि दूर पर सिथित है सांकरी गाव में लकडी का भैरव का मंदिर है !

Information Taken from : Janam Bhoomi Uttaranchal Weekly Magzine Mumbai.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Competition for Climbing on Pine Tree During Nanda Devi Fair
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In Rath Area (Paithani) of Pauri Garwal, there is competition organized on climbing Pine Tree during Nanda Devi festival in Bageli Village.

This competition starts with proper ritual pooja path.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नवरात्र में रियासत के राजा देते थे रक्त 

उत्तरकाशी। टिहरी रिसायत के राजा कभी उज्जवला देवी मंदिर में भैंसे व बकरे की बलि दिया करते थे। वर्ष 1920 में बाड़ाहाट के लोगों के विरोध के बाद राजा को बलि बंद करनी पड़ी। अब मंदिर में श्रीफल की बलि दी जाती है।

गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर उजेली की शुरूआत में ही उज्जवला देवी का प्रसिद्ध मंदिर है और इसी मंदिर के नाम पर उजेली की स्थापना हुई है। उजेली एक बड़े भू-भाग में बसा हुआ है और यहां मात्र साधु ही रहते हैं। 150 साधु इस क्षेत्र में देवताओं की पूजा-अर्चना व उपासना में लीन नजर आते है। उज्जवला देवी मंदिर का इतिहास कुमाऊ नरेश कनक पाल व अजयपाल के समय से मिलता है। श्रीनगर से तब राजा दर्शन के लिए उत्तरकाशी आया करते थे। 28 दिसंबर 1815 में टिहरी नरेश सुदर्शन शाह ने टिहरी को राजधानी बनाया और तब मंदिर की व्यवस्था के लिए डंगवाल पंडितों को मंदिर की जिम्मेदारी सौंपी गई। टिहरी नरेश ने टिहरी रियासत में बलि पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन उज्जवला देवी मंदिर में राजा स्वयं बलि दिया करते थे। राजा के प्रतिनिधि उज्जवला देवी पहुंचकर काली चक्र की पूजा के बाद बलि देते थे। मंदिर यज्ञ शाला के पास चक्र वर्तमान में भी मौजूद है। 1920 में बाड़ाहाट के लोगों ने बलि का विरोध किया और विरोध के बाद बलि बंद कर दी गई। बाड़ाहाट के लोग फसल काटने से पहले देवी की पूजा-अर्चना नवा-अन्न अर्पित कर करते थे। वर्तमान में भी कई लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं। शक्ति मंदिर के महंत मुरारी लाल भट्ट बताते हैं कि उज्जवला देवी के पूजन और दर्शन से निश्चित तौर पर मनोकामना पूर्ण होती है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5813149.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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त्रेतायुग से प्रज्ज्वलित है यहां 

रुद्रप्रयाग। हिमालय को भगवान शंकर का वास माना गया है। यही कारण है कि यहां के कण-कण में श्रद्धालु भगवान शंकर का रूप देखते है और उनकी पूजा करते हैं। हिमालय क्षेत्र में शंकर के मंदिरों की गिनती करना कठिन कार्य है। यहां भगवान शंकर से जुड़ी अनेकों कथाएं आज भी प्रचलित हैं। मान्यता है कि भगवान शंकर ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में पार्वती से विवाह किया था। खास बात यह है कि मंदिर में जल रही अखंड अग्निज्योत को भगवान शिव व पार्वती के विवाह वेदी की अग्नि ही माना जाता है। बताया जाता है कि यह अग्नि त्रेतायुग से जल रही है। यही वजह है कि हर वर्ष यहां सैकड़ों जोड़े विवाह बंधन में बंधते हैं।

त्रेतायुग में संपन्न हुए शिव व पार्वती के विवाह का स्थल जिले का सीमांत गांव त्रियुगीनारायण मंदिर आज भी श्रद्धा व भक्ति के अटूट आस्था का केंद्र है। रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग पर सोनप्रयाग से 12 किमी मोटरमार्ग का सफर तय कर यहां पहुंचा जाता है। मंदिर क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर शिव और पार्वती की शादी के साक्ष्य स्पष्ट नजर आते है। यहां पर आज भी अग्नि कुंड के साथ अखण्ड ज्योति, धर्म शिला मौजूद है। शादी के दौरान देवताओं ने विभिन्न शक्तियों से वेदी में विवाह अग्नि पैदा की थी, जिसे धंनजय नाम दिया गया। यह अग्नि आज भी निरंतर जल रही है। इस अग्नि की राख को आज भी लोग अपने घरों में ले जाते हैं, जिसे शुभ माना जाता है। वेद पुराणों के उल्लेख के अनुसार यह मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है, जबकि केदारनाथ व बदरीनाथ द्वापरयुग में स्थापित हुए। यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर विष्णु भगवान ने वामन देवता का अवतार लिया था। पौराणिक उल्लेख के अनुसार बलि को इन्द्रासन पाने के लिए सौ यज्ञ करने थे, इनमें 99 यज्ञ वह पूरे कर चुका था, लेकिन सौवें यज्ञ से पूर्व विष्णु भगवान ने वामन अवतार लेकर उसे रोक दिया और बलि का यज्ञ संकल्प भंग हो गया। इस दिन से यहां भगवान विष्णु की वामन के रूप में पूजा होती है। मंदिर के प्रबंधक परशुराम गैरोला बताते हैं कि आज भी इस मंदिर के प्रति लोगों में भारी श्रद्धा है। वर्ष भर बड़ी संख्या में भक्त आकर मंदिर के दर्शन करते हैं। भगवान शिव व पार्वती का विवाह स्थल होने के कारण त्रियुगीनारायण का विवाह कामना रखने वाले युगलों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है। हर साल यहां सैकड़ों की संख्या में जोड़े विवाह करते हैं। ऐसा ही एक जोड़ा है ललित मोहन रयाल व रुचि का। ये दोनों पीसीएस अधिकारी हैं। ललित मोहन रयाल वर्तमान में अल्मोड़ा जिले में एसडीएम के पद पर तैनात हैं। श्री रयाल बताते हैं कि वह इस स्थान से इतना प्रभावित हुए कि वैवाहिक जीवन यहीं से शुरू करने का फैसला किया।



Source : http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5844335.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Source : Dainik Hindustan

पूरे देश में दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है लेकिन पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में कुछ जगहों पर यह त्योहार एक माह बाद मार्गशीर्ष (अगहन) मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में इस दीवाली को (देवलांग) के नाम से जाना जाता है।

देशवासी जब कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली का जश्न मनाने में मशगूल रहते हैं तब टिहरी गढवाल और उत्तरकाशी के रवांई और देहरादून जिले के जौनसार बावर क्षेत्र के लोग सामान्य दिनों की तरह अपने कामधंधों में लगे रहते हैं। उस दिन वहां कुछ भी नहीं होता। इसके ठीक एक माह बाद मार्गशीर्ष (अगहन) अमावस्या को वहां दीवाली मनाई जाती है,जिसका उत्सव चार-पांच दिन तक चलता है।

इन क्षेत्रों में दीवाली का त्योहार एक माह बाद मनाने का कोई ठीक इतिहास तो नहीं मिलता है लेकिन इसके कुछ कारण लोग बताते हैं। कार्तिक मास में किसानों की फसल खेतों और आंगन में बिखरी पडी रहती है, जिसकी वजह से वे अपने काम में व्यस्त रहते हैं और एक माह बाद जब सब कामों से फुर्सत होकर घर में बैठते हैं, तब वहां दीवाली मनाई जाती है।

कुछ लोगों का कहना है कि लंका के राजा रावण पर विजय हासिल करके भगवान राम कार्तिक माह की अमावस्या को अयोध्या लौटे थे। इस खुशी में वहां दीवाली मनाई गई थी लेकिन यह समाचार इन दूरस्थ क्षेत्रों में देर से पहुंचा, इसलिए अमावस्या को ही केन्द्रबिंदु मानकर ठीक एक माह बाद दीपोत्सव मनाया जाता है।

एक अन्य प्रचलित कहानी के अनुसार एक समय टिहरी नरेश से किसी व्यक्ति ने वीर माधो सिंह भंडारी की झूठी शिकायत की, जिस पर उन्हें दरबार में तत्काल हाजिर होने का आदेश दिया गया। उस दिन कार्तिक मास की दीपावली थी। रियासत के लोगों ने अपने प्रिय नेता को त्योहार के अवसर पर राजदरबार में बुलाए जाने के कारण दीपावली नहीं मनाई और इसके एक माह बाद भंडारी के लौटने पर अगहन माह में अमावस्या को दीवाली मनाई गई।

ऐसा कहा जाता है कि किसी समय जौनसार बावर क्षेत्र में सामू शाह नाम के राक्षस का राज था, जो बहुत  निरंकुश था। उसके अत्याचार से क्षेत्रीय जनता का जीना दूभर हो गया था, तब पूरे क्षेत्र की जनता ने उसके आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए अपने ईष्टदेव महासू से प्रार्थना की। उनकी करुण पुकार सुनकर महासू देवता ने सामू शाह का अंत किया। उसी खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है।

शिवपुराण और लिंग पुराण की एक कथा के अनुसार एक समय प्रजापति ब्रह्मा और सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर आपस में संघर्ष होने लगा और वे एक-दूसरे के वध के लिए तैयार हो गए। इससे सभी देवी-देवता व्याकुल हो उठे और उन्होंने देवाधिदेव शिवजी से प्रार्थना की। शिवजी उनकी प्रार्थना सुनकर विवाद स्थल पर ज्योतिर्लिंग महाग्नि स्तम्भ के रूप में दोनों के बीच खडे हो गए। उस समय आकाशवाणी हुई कि दोनों में से जो इस ज्योतिर्लिंग के आदि और अंत का पता लगा लेगा, वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्माजी ऊपर को उडे और विष्णुजी नीचे की ओर। कई वर्षों तक वे दोनों खोज करते रहे लेकिन अंत में जहां से निकले थे, वहीं पहुंच गए। तब दोनों देवताओं ने माना कि कोई उनसे भी श्रेष्ठ है और वे उस ज्योतिर्मय स्तंभ को श्रेष्ठ मानने लगे।

इन क्षेत्रों में महाभारत में वर्णित पांडवों का विशेष प्रभाव है। कुछ लोगों का कहना है कि कार्तिक मास की अमावस्या के समय भीम कहीं युद्ध में बाहर गए थे। इस कारण वहां दीवाली नहीं मनाई गई। जब वह युद्ध जीतकर आए तब खुशी में ठीक एक माह बाद दीवाली मनाई गई और यही परम्परा बन गई।

कारण कुछ भी हो लेकिन यह दीवाली जिसे इन क्षेत्रों में नई दीवाली भी कहा जाता है, जौनसार बावर के चार-पांच गांवों में मनाई जाती है। वह भी महासू देवता के मूल हनोल और अटाल के आसपास। इन इलाकों में एक परम्परा और भी है। महासू देवता हमेशा भ्रमण पर रहते हैं और अपने निश्चित ग्रामीण ठिकानों पर 10-12 साल बाद ही पहुंच पाते हैं। वह जिस गांव में विश्राम करते हैं, वहां उस साल नई दीवाली मनाई जाती है जबकि बाकी क्षेत्र में (बूढी दीवाली) का आयोजन होता है।

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

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JahanTak main Samajhata huin ye pure Uttarakhand Main budi diwali ke naam se hoti hogi kyuki mujhe achchhi tarah yaad hai meri dadi ye bolti thi ki " jao re di jagao aaj bud diwai chhu" lekin isaka prabhav utana nahi hota tha jala diya to thik nahi jalaya tab bhi thik , tab budi dadi hoti thi to duri diwali v hoti thi aaj budi dadi v nahi hai or budi diwali v nahi hoti hai.

हेम पन्त

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ये देखिए!!! डिश एन्टीना और भी कई कामों के उपयोग में लाया जा सकता है... 


Devbhoomi,Uttarakhand

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Grate hem daju ye to hona hi tha, kyon ab ye dis use nahin hota hai nai nai tecnology Aa gayi hai ab ye dis kapde shukhane ke hi kaam ayega,

सुधीर चतुर्वेदी

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                    छतरी ओढ़, छोड़ डोली, मैं तो पिया की हो ली  


चंबा [टिहरी]। कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है और इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया टिहरी जिले के एक गाव के बाशिदों ने। विवाह में दुल्हन की डोली उठाने को कहार नहीं मिले तो झट विकल्प तलाश लिया और वह भी इतना आसान कि आप जानकर मुस्कराए बिना नहीं रह सकते। ग्रामीणों ने डोली का विकल्प बनाया छतरी, यानी छाते को और अब यह परंपरा इस गाव की अनूठी पहचान सी बन गई है।

पहाड़ में वर-वधु को डोला व पालकी में बिठाकर ले जाने की सदियों पुरानी परंपरा रही है। प्राचीन समय में दूल्हा पालकी में बैठकर दुल्हन के घर जाता था और वहा से दुल्हन को डोली में बिठाकर घर लेकर आता था। आज भी दूरस्थ अंचलों में यह परंपरा कायम है, लेकिन एक गाव ने समय की आवश्यकता के अनुरूप इसका स्वरूप बदल दिया।

यह गाव है टिहरी जिले का धारकोट गाव, जहा दुल्हन डोली में नहीं, बल्कि छतरी ओढ़कर विदा होती है। दरअसल, गावों में पलायन की समस्या बढ़ने व इसके चलते डोली-पालकी उठाने वालों की कमी के कारण गाववालों को यह कदम उठाना पड़ा। हालाकि, पिछले तीन दशक से क्षेत्र की शादियों में सभी दूल्हा-दुल्हन छतरी लेकर विदा होते हैं, लिहाजा अब यही यहा की अनूठी परंपरा बन चुका है।

हालाकि, गाव के लोगों ने जब इसकी शुरुआत की, उस समय सबकी अलग-अलग राय थी। खासकर जिन लड़कियों ने डोली में बैठकर ससुराल जाने के सपने संजोए थे, उनको यह स्वीकार्य नहीं था। यहा यह जानना जरूरी है कि इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई। गाव के पूर्व प्रधान कमल सिंह पवार ने बताया कि 1965 में जब उनकी शादी हुई थी, तब यातायात की सुविधा नहीं थी। एक गाव से दूसरे गाव बारात मीलों पैदल जाती थी। डोला और पालकी का रिवाज था, जिसको ढोने वाले लोगों की संख्या काफी कम थी। ऐसे में बारातें अधिक होतीं, जबकि डोली ले जाने वाले कहार कम। फिर डोली ले जाने के बदले उन्हें अनाज के सिवा मिलता भी कुछ नहीं था, इसलिए उन्होंने यह काम छोड़ दिया। इसके अलावा गाव से पलायन बढ़ने से भी दिक्कतें आने लगीं।

ग्राम प्रधान पुष्पा चौहान का कहना है कि, वह अपनी शादी में छतरी ओढ़कर आई, हालाकि उस समय दु:ख हुआ था, लेकिन अब तो यह परंपरा बन गई है और इस लिहाज से खुशी भी होती है कि इसकी वजह से गाव को खास पहचान भी मिल रही है।

Source : Dainik Jagran (18/12/09)

Devbhoomi,Uttarakhand

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                  मेंहमानों का पैर धोना,ये भी सिर्फ उत्तराखंड में ही होता है
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उत्तराखंड के जौनसार क्षेत्र में पिछले लगभग 30 वर्ष तक उनके बीच एक विशेष प्रथा थी। जनजातीय समुदाय के लोग अपने मेंहमानों का सम्मान उनके पैर धोकर और पैरों की मालिश कर किया करते थे।

देहरादून की यमुना घाटी के नागथाट गांव के एक वरिष्ठ नागरिक को आज भी इसका स्मरण हैः ''हां यह परंपरा थी। मेहमान आते तो न केवल उनके बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों के पैर भी गर्म पानी में धोए जाते।''

अब चूंकि परिवार के सदस्य अपने पैरों की तेल मालिश करते इसलिए मेहमानों के पैरों की भी मालिश की जाती इस वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार पैर धोने और मालिश करने का मकसद सभी का सत्कार और सभी को राहत देना था। इसके पीछे तर्क यह होता है परिवार के सदस्य खातिर करके थक जाते होंगे और मेहमान पैदल यात्रा से।

पिछले तीन दशकों में रीति दम तोड़ने लगी है। इस गांव की कुछ महिलाएं मानती हैं कि बाहर के लोग इस रीति के कारण जौनसौरी की आलोचना किया करते।

इन दिनों मेहमानों को हाथ-पैर धोने के लिए सिर्फ गर्म पानी दिया जाता है। अब पैरों की मालिश नहीं की जाती। परिवार के सदस्यों के पैर की मालिश भी नहीं की जाती, कहती हैं नागथाट की एक महिला किसान।

 

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