Author Topic: It Happens Only In Uttarakhand - यह केवल उत्तराखंड में होता है ?  (Read 33066 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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कतरन से पहले होती है भेड़ों क ी पूजा
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यूं तो रवांई क्षेत्र में वर्ष भर मेलों व त्योहारों की धूम धाम रहती है, लेकिन सरबडियाड़ क्षेत्र के आठ गांवों में मार्च व सितंबर माह में भेड़ों के ऊन कतरन के समय 'ऊन लवाण मेला' लगता है। मेले में क्षेत्र में पशुधन की समृद्धि के लिये पशुपालक अपने वन और ईष्ट देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं। साथ ही भेड़ों से ऊन उतराने से पहले उनकी पूजा होती है।

चार दिन तक चलने वाला मेला सोमवार को संपन्न हो गया। मेले में ऊन कतरन के समय स्थानीय गीत गाने की आज भी परम्परा कायम है। इस वर्ष भी सितम्बर से रवांई के सरबडियाड़ क्षेत्र के सर, लेवटाडी, कसलंाव, डिगाडी, किमडार, पोंटी, छानिका व गोल गांवों में परम्परा के अनुसार मेले में पूजा अर्चना के बाद तीन हजार भेड़ों की ऊन काटने का कार्य शुरू हुआ। गांव के शीशपाल सिंह, मेघनाथ सिंह, उमराव सिंह, जयवीर सिंह व यशवीर सिंह बताते हैं कि इसी महीने काठों व बुग्यालों से भेड़ बकरियों को गांव में लाया जाता है।

 ऊन के अच्छे उत्पादन को परंपरा अनुसार पक वान तैयार किये जाते हैं। ढोल नगाड़े व रणसिंघे बजाकर वन व गांव के ईष्ट देवताओं की पूजा की जाती है, जिसके बाद ऊन काटी जाती है। इस वर्ष भी पशुपालन विभाग की टीम ने भेड़ पालकों को ऊन काटने में मदद की।

 साथ ही भेड़ों को टीकाकरण, भेड़ों का बीमा व निशुल्क दवाएं वितरित भी की। पशु चिकित्सक डॉ. एसके तिवारी व पशुधन प्रसार अधिकारी चंद्रमोहन ने बताया कि इसी महीने कंडियाल गांव में खादी ग्रामोद्योग की ओर से ऊन खरीद मेला भी लगाया जायेगा।


Source Dainik jagran

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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  खास होता है चतुर्थी, नवमी और अमास्या का श्राद्ध       Sep 21, 01:46 am    बताएं           हरिद्वार, जागरण प्रतिनिधि: सनातनी संस्कृति में सालभर में एक बार पड़ने वाले पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का तर्पण व पिंडदान किया जाता है। यह पितरों के प्रति श्राद्ध व कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर होता है। यूं तो पितृपक्ष के सोलहों दिन पितरों के प्रति तर्पण आदि होते हैं, लेकिन इनमें कुछ दिन खास होते हैं।
आश्रि्वन मास के कृष्ण पक्ष में पितृपक्ष होता है। इसमें भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि भी शामिल होती है। पितृपक्ष के सभी सोलह दिनों में श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों अनुसार जिस तिथि को पूर्वज की मृत्यु होती है, उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है। पितृपक्ष की सबसे खास तिथि नवमी होती है। मान्यता है कि नवमी को श्राद्ध करने से मातृ ऋण कम होता है। हालांकि शास्त्र यह भी बताते हैं कि जीवन में सभी ऋणों से मुक्ति मिल जाए, लेकिन मातृ ऋण से मुक्ति नहीं मिल पाती है। इसी प्रकार पितृपक्ष में चतुर्दशी की तिथि भी खास होती है। शास्त्रीय मान्यता है कि अकाल मौत के शिकार व्यक्तियों के निमित चतुर्दशी का श्राद्ध किया जाना चाहिए। अमावस्या को ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित श्राद्ध किए जाने का विधान है। अमावस्या की तिथि के साथ ही पितृपक्ष संपन्न हो जाते हैं और पितर धरती से पितृलोक वापसी करते हैं।
ज्योतिषाचार्य डॉ. विपिन कुमार पाराशर और पंडित पवन कृष्ण शास्त्री बताते हैं कि यदि किसी पितर की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं हो तो अमावस्या को श्राद्ध करना चाहिए। पितृपक्ष में पितरों के निमित श्राद्ध करने से पितर तृप्त होकर आशीष प्रदान करते हैं।



(Source - Dainik Jagran)

   

Devbhoomi,Uttarakhand

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यहां मुसलमान भी मनाते हैं दिवाली हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं मंदाकिनी घाटी के गांव
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Source Amarujala



रुद्रप्रयाग। अगस्त्यमुनि के समीपवर्ती डांगी, सिनघटा, कोटी और बेड़बगड़ के मुस्लिम परिवार भी दीपावली त्योहार का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इन दिनों ग्रामीण दिवाली की रात में आधौं और भैलों की तैयारी                 कर रहे हैं।


इन गांवों में हिंदू-मुस्लिम परिवार वर्षों से साथ रहते हैं। तीज-त्योहार मिलजुल कर मनाते हैं। यहां कभी सांप्रदायिक विद्वेष नहीं रहा।   आजादी से पहले यहां कु छ मुस्लिम परिवार बसे थे। अब यहां उनके पूरे गांव हैं। ये परिवार न केवल मुस्लिम सभ्यताओं को संजोए हैं, बल्कि हिंदू परंपराओं को भी निभा रहे हैं।


 जिस उत्साह से स्थानीय निवासी ईद और रमजान मनाते हैं, उसी उमंग से होली, दीपावली, श्रावण और बसंत का आगमन भी मनाते हैं। इन गांवाें में सभी परिवार आपस में मुंह बोले-रिश्तों की कड़ियों से बंधे हैं। यहां सभी जाति धर्म को भूलकर एकसाथ खुशी-खुशी दीपावली आदि त्‍योहार मनाते हैं।




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भक्ति की शक्ति से सिर पर उगी हरियाली







   श्रीनगर गढ़वाल: कहते हैं भक्ति में ही शक्ति होती है यही चरितार्थ कठयुड़ (जौनपुर) स्थित भद्राज देव के पश्वा अनिल रमोला ने कर दिखाया वह भगवान की भक्ति में इतने लीन हो गए कि उन्होंने  सिर में जौ की हरियाली उगाई।


वह भक्तजनों की टोली को लेकर बदरीनाथ धाम पहुंचे और भगवान बदरी विशाल को यह हरियाली अर्पित कर गए। भद्राज देव के पुजारी बाबूराम नौटियाल ने बताया कि बदरीनाथ धाम में स्वयं श्री रावल ने बीते सोमवार को प्रात: छह बजे प्रथम अभिषेक में भक्त अनिल रमोला के सिर से हरियाली काटकर भगवान के चरणों में अर्पित की।


इससे पूर्व 101 भक्तों की टोली के साथ पश्वा भक्त अनिल रमोला को कठयुड से शोभा यात्रा के साथ बदरीनाथ धाम ले जाया गया। मौजी, क्यारी, ललोटना, हनोती, गानू, बनचौरा सहित अन्य गांवों के श्रद्धालुजन आनंद सिंह रावत, चंद्रमणि की व्यवस्था में शोभा यात्रा में शामिल हुए।



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अलकनंदा तट पर हुआ समुद्रमंथन

   



 देवी मां चंडिका के बन्याथ यात्रा के दौरान शुक्रवार को सिवाई गांव के समीप अलकनंदा नदी तट पर पौराणिक परंपराओं का निर्वहन करते हुए समुद्रमंथन का कार्यक्रम वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुआ। इस मौके पर समीपवर्ती गांवों से सैकड़ों की संख्या में देवी भक्तों ने पूजा-अर्चना कर मनौतियां मांगी, समुद्रमंथन के दौरान देवी के जयघोष व भजन कीर्तन से माहौल भक्तिमय बना रहा।

शुक्रवार को अपराह्न बाद देवी का निशान सिवाई गांव से अलकनंदा नदी तट पर समुद्रमंथन की परंपरा का निर्वहन करने पहुंचा तो ढ़ोल-नगाडे़ व शंख ध्वनि के बीच सभी भक्त पीछे-पीछे हो लिये।

अलकनंदा नदी तट पर देवी के पुजारियों ने विशेष घडे़ में दूध-दही, शहद व पंचामृत तैयार कर मंथन की प्रक्रिया शुरू की जिसमें एक ओर असुर व दूसरी ओर देवगणों ने समुद्रमंथन शुरू किया। इस दौरान निकले 14 रत्‍‌नों कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, उच्चश्रवा घोड़ा, कौस्तुक मणि, पारिजात वृक्ष, रंभा अप्सरा, लक्ष्मी, वरूण, अमृत कलश, विष, शंख, वीणा व धनुष का देवगणों व दैत्यों में प्रतीक स्वरूप बंटवारा हुआ, बाद में प्रसाद भक्तों में भी वितरित किया गया।


मान्यता है कि देवी अपने मूल मंदिर जिलासू में प्रवेश से पूर्व अमृत रत्‍‌न प्राप्त कर यात्रा में साथ रहे पश्वाओं, ध्याणियों व भक्तों को आरोग्यता व कष्टों से मुक्ति करती है। समुद्रमंथन के बाद देवी 19 मई को अपने मायका गांव सरमोला पहुंचेगी जहां ध्याणियों से मिलन के बाद 20 मई को खाल में विशेष पूजा संपन्न होगी।

देवी के पुजारी राकेश बेंजवाल व दीर्घायु प्रसाद खाली ने बताया कि सिवाई बनातोली में 21 से 29 तक महायज्ञ कार्यक्रम होगा जिसके तहत यज्ञ पुरूष के 360 विवाह संस्कार पूर्ण करने के बाद बन्याथ यात्रा का समापन सीरा वितरण व भंडारे के साथ होगा।
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Devbhoomi,Uttarakhand

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बारिश के लिए देवता की शरण में पहुंचे ग्रामीण


प्राकृतिक स्रोत सूखने से पानी के लिए भी त्राहि-त्राहि मची है। बारिश की मांग के लिए देवप्रयाग के निकट मुनेठ गांव के लोग नरसिंह देवता को पांच हजार फीट उंची स्थित दशरथ चोटी तक ले गए हैं। मान्यता है कि देवता के वहां जाने से बारिश होती है।

देवता मूर्ति भी तब तक मंदिर के बाहर रहेगी जब तक बारिश नही हो जाएगी। इसी परंपरा को निभाते मुनेठ गांव से लगभग 50 श्रद्धालुओं का जत्था डौंर थाली के साथ दशरथ चोटी तक पहुंचा।

लगभग दस किमी की चढ़ाई  वाली इस पदयात्रा में महिला, बुजुर्ग सहित दस वर्ष के बालक बालिका भी शामिल थे। प्राचीन काल से बह रही नौलीधारा में नरसिंह भगवान का त्रिशूल, चिमटा, छत्र आदि को विधि विधान से स्नान करवाया जाता है।

 यहां श्रृंगार के बाद नरसिंह देवता जब अपना मूलगांव सजवाण कांडा पहुंचे तो यहां ग्रामीणों ने उनकी पूजा-अर्चना की। माना जाता है कि सजवाण कांडा से ही वर्षो  पूर्व नरसिंह देवता मुनेठ गांव में गए थे। नरसिंह दवेता मुनेठ गांव में मंदिर के बाहर ही तब तक विराजमान रहेंगे जब तक क्षेत्र में बारिश नहीं हो जाती।

श्रद्धालु मंदिर के बाहर ही भगवान नरसिंह की पूजा अर्चना कर रहे है। श्रद्धालु मदन सिंह रावत ने बताया कि नरसिंह देव के प्रभाव से यहां कुछ समय बाद ही वर्षा होती रही है। वर्षा होने पर नरसिंह देवता को बागी स्थित बेताल शिला के समीप भागीरथी में स्नान कराया जाएगा और उसके बाद ही वह मंदिर में विराजमान होंगे।


urce dainik jagran
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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बागेश्वर। भराड़ी के मैया भगवती नंदा देवी मंदिर में जागर और पूजा पाठ की परंपरा कई सौ सालों से निरंतर चल रही है। जागर के लिए चौड़ास्थल के चौदह देव डंगरियों को यहां आमंत्रित किया जाता है। क्षेत्रवासियों की स्वैच्छिक पहल से पहली बार सदियों पुरानी बलि परंपरा टूटेगी।

मां बाराही मंदिर के पास ही भगवती नंदा मैया का भी मंदिर स्थित है। जहां हर साल सितंबर के उत्तरार्द्ध में पांच दिवसीय समारोह होता है। क्षेत्रवासियाें के अनुसार एेंठाण आदि गांवों मेें बसासत का इतिहास लगभग सात सौ साल पुराना है। तभी से यहां भगवती नंदा मैया की पूजा होती है। पहले दिन चौड़ा स्थल के काफली कमेड़ा से लगभग 14 देव डंगरिए यहां आते हैं। इनमें नंदा, भगवती, बाण आदि देवी देवता नाचते हैं। मंदिर में जागर लगती है। देवी देवताओं के सम्मुख ग्रामीण बेहतरी और लोक कल्याण की कामना करते हैं। इससे पूर्व डंगरियों का गांव आगमन पर भव्य स्वागत होता है। इस कार्यक्रम के दौरान देवी को बकरों की बलि तथा पंच बलि देने की परंपरा रही है। लेकिन सदियों पुरानी बलि परंपरा को इस बार खत्म करने का निर्णय स्वयं क्षेत्रवासियाें ने लिया है। इस बार सात्विक अनुष्ठानों के कार्यक्रम 17 सितंबर से शुरू होगा। बाद में छोलिया नृत्य, झोड़े, चांचरी तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम हाेंगे।

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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यहां तो घोड़े पर विदा होती है दुल्हन
[/t][/t]  यशवंत बडियारी
देवाल। आपने कारों और डोलियों में दुल्हन को विदा होते देखा होगा, लेकिन दुल्हन को घोड़े पर बैठकर ससुराल जाते नहीं देखा होगा। यदि देखना है तो आपको चमोली जनपद के दूरस्थ इलाके के गांवों का रुख करना पड़ेगा। यहां सदियों से दुल्हन की विदाई घोड़े पर बैठाकर करने की परंपरा है। देवाल विकासखंड के गांव वाण और कुलिंग में ग्रामीण इस परंपरा को खुशहाली का प्रतीक मानते हैं।
डोली में सिर्फ बैठती हैं पार्वती
वाण और कुलिंग गांव में लाटू देवता को ईष्ट के रूप में पूजा जाता है। लाटू देवता की बहन मां पार्वती को भी आराध्य देवी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि देवी यात्रा (राजजात और लोकजात) में ग्रामीण देवी को डोली में बैठाकर कैलास ले जाते हैं। जिसकी अगवानी उनके भाई लाटू देवता करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार डोली में देवी के अलावा यहां किसी को नहीं बिठाया जाता है। इसलिए बेटियों को घोड़ों में विदा किया जाता है।
दूसरे गांवों की दुल्हनें भी उतर जाती हैं डोली से
वाण और कुलिंग लाटू की भूमि है। यहां न तो दुल्हन डोली में बैठकर विदा होती है और न ही प्रवेश करती है। यदि समीपस्थ गांवों की बारातें भी इस गांव की समीप से गुजरती है तो दुल्हन डोली से उतर जाती है। इस परंपरा को यहां खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
-हयात सिंह ग्रामीण/उरवा देवी ग्राम प्रधान।
वाण लाटू देवता का ऐतिहासिक मंदिर एक धाम के रूप में है। जो इस गांव का रक्षक भी है। संसद में इससे पांचवें धाम के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया है जिसे जल्द ही मंजूरी मिल सकती है।
-सतपाल महाराज गढ़वाल सांसद।(source amar ujala)

विनोद सिंह गढ़िया

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कत्यूर घाटी में आज भी जीवंत है पल्ट प्रथा

पहाड़ों में आज भी महिलाएं पल्ट प्रथा से काम कर रही हैं। पल्ट की रस्म को महिलाएं बखूबी निभाती हैं। इसके तहत एक-दूसरे के खेती से संबंधित कामों में हाथ बंटाती हैं। यह प्रथा गांवों की एकता, आपसी, मेलजोल व स्नेह की अद्भुत बानगी है।
यूं तो वर्ष भर गांवों में पल्ट प्रथा का चयन रहता है, लेकिन कृषि कार्य के समय यह प्रथा जोर पकड़ लेती है। गेहूं की कटाई, धान की मढाई, रोपाई, गुड़ाई, निराई और घास आदि कटान के लिए यह प्रथा नजर आती है, लेकिन गांवों के खेतों में मोव सराई (गोबर की खाद) के समय इस प्रथा का काफी महत्व है। पल्ट प्रथा में प्रतिदिन महिलाएं किसी एक परिवार का सहयोग करती हैं। बारी-बारी से गांव की महिलाओं द्वारा प्रत्येक परिवार के यहां कार्य करने का क्रम चलता रहता है। केवल कृषि कार्य के लिए ही नहीं बल्कि शादी बरातों के समय सामान लाने, मकान निर्माण के समय, बाजार से सामान लाने में भी पल्ट प्रथा नजर आती है। कत्यूरी राजाओं की स्मृद्धिशाली राजधानी कत्यूर घाटी में इन दिनों काश्तकारों द्वारा गेहूं बुआई की तैयारी की जा रही है। साल भर से घरों में जमा गोबर की खाद को महिलाएं डलियों में भरकर खेतों में डाल रही हैं। सिर में गोबर की खाद से भरी डलिया पंक्तिबद्ध तरीके से खेतों में पहुंचाई जा रही है। कहना गलत न होगा कि महिलाएं ही पल्ट प्रथा की धुरी हैं।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कब शुरू होगी भगवान् ही मालिक है .

 

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