Author Topic: Nick Names Of Places - उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों एव विशेष व्यकित्यो के उप नाम  (Read 13734 times)

विनोद सिंह गढ़िया

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बागनाथ की नगरी        :         बागेश्वर

 पौराणिक आख्यानों के अनुसार बागेश्वर शिव की लीला स्थली है । इसकी स्थापना भगवान शिव के गण चंडीस ने महादेव की इच्छानुसार ‘दूसरी काशी’ के रुप में की और बाद में शंकर-पार्वती ने अपना निवास बनाया । शिव की उपस्थिति में आकाश में स्वयंभू लिंग भी उत्पन्न हुआ जिसकी ॠषियों ने बागीश्वर रुप में अराधना की । बागनाथ अर्थात भगवान शिव की नगरी बागेश्वर का जिग्र स्कन्द पुराण के मानस खंड के अनुसार बागेश्वर की उत्पत्ति आठवीं सदी के आस-पास की मानी जाती है। और यहां के बागनाथ मंदिर की स्थापना को तेरहवीं शताब्दी का बताया जाता है। 1955 तक बागेश्वर ग्राम सभा में आता था। 1955 में इसे टाउन ऐरिया माना गया। सन् 1962 में इसे नोटिफाइड ऐरिया व 1968 में नगरपालिका के रूप में पहचान मिली। 1997 में इसे जनपद बना दिया गया।

  स्वतंत्रता संग्राम में भी बागेश्वर का महत्वपूर्ण स्थान है। कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत बागेश्वर से ही हुई थी। बागेश्वर अपने विभिन्न ग्लेशियरों के लिये भी विश्व में अलग स्थान रखता है। इन ग्लेशियरों के नाम है - सुंदरढु्रगा, कफनी और पिण्डारी ग्लेशियर   
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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दिनेशचंद्र पाण्डेय, चम्पावत:
एतिहासिक, धार्मिक व पौराणिक स्थलों के साथ नैसर्गिक सौंदर्यता को अपने में समेटे चम्पावत को टेम्पल सिटी के नाम से भी जाना जाता है। जनपद में देवी मां के शक्तिस्थल के रूप में मंदिरों की बहुतायत है। जहां विश्व विख्यात बग्वाल मेले के लिए प्रसिद्घ मां बाराही धाम है, वहीं उत्तर भारत का प्रसिद्घ पूर्णागिरि धाम और ब्यानधुरा मंदिर जो हर एक की मनोकामना पूर्ण करते हैं।
   चम्पावत की ऊंची चोटी में क्रांतेश्वर, हिंग्लादेवी और मानेश्वर मंदिर स्थापित हैं। गंडक नदी के समीप डिप्टेश्वर, ताड़केश्वर, महाभारतकालीन घटोत्कच्छ तथा कुमाऊं के अराध्य देव गोरलदेव का मंदिर स्थापित है। नगर के बीचों बीच बालेश्वर, नागनाथ मंदिर श्रद्घालुओं की मनोकामना पूर्ण करने के साथ ही प्राचीन व अनूठी शिल्पकला के लिए प्रसिद्घ है। इसके अलावा मांदली गांव में ज्वालादेवीमंदिर, शिवमंदिर, खर्ककार्की में विष्णुमंदिर, कलेक्ट्रेट परिसर में गजारबाबा का मंदिर और चैकुनी गांव में सूर्यमंदिर अपने कलाशिल्प के साथ ही भक्तों की आस्था का केंद्र बने हैं।
     तल्लादेश क्षेत्र के मंच कस्बे में स्थापित गुरुगोरखनाथ मंदिर अपनी त्रियुगी धूनी के अलावा निसंतान दंपत्तियों की मनोकामना पूर्ण करने के लिए प्रसिद्घ हैं। जिम कार्बेट द्वारा इस क्षेत्र में नरभक्षी बाघ के आतंक से निजात दिलाने के कारण भी यह पर्यावरण प्रेमियों के साथ विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। रीठासाहिब में स्थापित गुरुद्वारा सिख धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात है। इसके अलावा जनपद के ओर छोर में तकरीबन दो हजार से ज्यादा छोटे बडे़ मंदिर हैं। जिनमें पंचेश्वर शिवमंदिर, सुई का आदित्यमंदिर, खेतीखान और पऊ मोस्टा का सूर्यमंदिर, भिंगराड़ा ऐड़ीमंदिर, फटकशिला मंदिर गहतोड़ा, पूर्णागिरि मंदिर बापरू और मानेश्वर, झूमाधुरी मंदिर, देवीधार मंदिर, पम्दा का भगवती मंदिर विशेष रूप से लोगों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। जनपद के हर एक गांव में कम से कम आधा दर्जन ईष्ट देवी-देवताओं के मंदिर स्थापित हैं।
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          श्वरों की है नगरी
 टेम्पल सिटी में एक दर्जन ऐसे मंदिर हैं जिनके नाम के साथ श्वर शब्द जुड़ा है। इनमें बालेश्वर, मानेश्वर, क्रांतेश्वर, डिप्टेश्वर, ताड़केश्वर, मल्लाडे़श्वर, पंचेश्वर, ऋषेश्वर, सप्तेश्वर, हरेश्वर मंदिर जनपद में स्थापित हैं और यहां की विशेष पहचान बने हुए हैं।



(Dainik Jagran)

नवीन जोशी

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Bhishma Kukreti

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डांडा नागराजा मंदिर- सीममुखिम कु दूसरू रूप
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सरोज शर्मा गढ़वाली पाॅप लिटरेचर-209
पौड़ी से 37 किलोमीटर दूर च नागराजा मंदिर, उत्तराखंड का गढ़वाल मंडल म जै देवशक्ति कि सर्वाधिक मान्यता च, वु च भगवान कृष्ण क अवतार का रूप मा बहुमान्य नागराजा कि, पौराणिक मान्यताओं क अनुसार भगवान कृष्ण थैं ई क्षेत्र अत्यंत पावन और सुंदर लग त ऊं न नाग कु रूप धैरिक भूमि मा लेट लेटिक ऐकि परिक्रमा कैर, किन्तु ऐ का नाम से स्थापित पूजास्थल पौडी से लेकि जौनसार भाबर तक भौत पयै जंदिन, नागराजा थैं समर्पित इन्नी बहुमान्य देवस्थल पौडी जनपद मुख्यालय से लगभग 40-41 किलोमीटर दूरी पर एक पहाड़ी क माथ स्थित च जु कि डांडा नागराजा क नाम से जंणै जांद,
पौडी शहर से लगभग 45 किलोमीटर दूर अदवानी- बगानीखाल मार्ग मा स्थित च डांडा नागराजा मंदिर,
पौराणिक दृष्टि से यै मंदिर कु अलग ही महत्व च, उत्तराखंड क गढ़वाल मंडल मा जै देवशक्ति कि सर्वाधिक मान्यता च वु कृष्ण अवतार रूप क नागराजा मंदिर, ऐक मुख्य धाम उत्तर काशी मा सीममुखिम च इन मान्यता च ई दुइया मंदिर एक ही छन, काफल, बांज, बुरांस का घैंणा वृक्षो से घिरयूं ई मंदिर पर्यटको खुण आकर्षण कु केंद्र च,
ई मंदिर इतगा उंचै मा स्थित च यख से चन्द्रबदनी (टिहरी) ,भैरव गढ़ी (कीर्तीखाल ),महाबगढ ( यमकेश्वर) ,कण्डोलिया (पौडी) कि पहाडियो कि सुन्दरता भि दिखै जांद,
मंदिर क पुजारी श्री चंडि प्रसाद देशवाल न यै मंदिर की मूलस्थापना लगभग 150 वर्ष पैल कैर छै, इन बतंदीन, परंपरा अनुसार नजदीकि गौं सिल्लू का पुजरी यख पूजा अर्चना करदिन, वर्तमान मा श्री चंडी प्रसाद देशवाल और मनमोहन देशवाल बारी बारी से बखूबी पूजा अर्चना कु कार्य निभांणा छन, ग्राम रीई का शेखरान्नद चमोली का प्राचीन मंदिर क वर्ष 1994 मा जीर्णोद्धार कैरिक यैकि सुन्दरता और भि निखार दयाई ,पर्यटन विभाग द्वारा मंदिर कु सौंदर्यीकरण जारी च,
प्रत्येक 13-या 14 वर्ष मा अप्रैल मा मंदिर मा मेला आयोजित किए जांद, जैमा विषेशकर महिलाये अपणि पारंपरिक वेश-भूषा मा मुंडम कलश सजै कि शोभायात्रा का रूप मा भगवान श्रीकृष्ण थैं श्रद्धा सुमन अर्पित करदिन, यै अवसर पर पुरूष श्रधालुओ की भि बराबर भूमिका रैंद, यै दिन मनौती पूरण हूण से मंदिर मा घंटा अर्पित करदिन, यख पर्यटको खुण ठैराण कु धर्मशाला, होटल और पर्यटक अतिथि गृह छन, उन त यै मंदिर मा कभी भि ऐ सकदौ लेकिन मार्च से जून तक कण्डोलिया टेका अदवानी का जंगल बुरांस का फूलों से लदयां रैंदिन पर्यटक ठण्डी ठण्डी हवा और बांज बुरांस क छायादार बृक्षो क आनंद लेकि मंदिर तक पौंछ सकदिन।


 

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