Author Topic: Some Ideal Village of Uttarakhand - उत्तराखंड राज्य के आदर्श गाव!  (Read 20509 times)

Bhishma Kukreti

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 ठंठोली संदर्भ में ढांगू गढ़वाल  की तिबारियों पर अंकन कला -1
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  हिमालय की भवन काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -1   
चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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  गोरखा काल याने 1815 तक गढ़वाल में पक्के मकान ढूंढने से भी नहीं मिलते थे।  कच्चे व घास फूस के मकानों में ही जनता रहती थी।  हम में से बहुतों को गलत फहमी होती है कि गढ़वाल में तिबारी संस्कृति (नक्कासीदार भवन काष्ठ  कला युक्त मकान ) बहुत पुरानी है।  गढ़वाली राजा युग में मकान निर्माण वास्तव में पाप समझा जाता था क्योंकि नए मकान पर भारी कूड़ कर देना पड़ता था।  जब गढ़वाल में सम्पनता आनी शुरू हुयी तो ही 1860 के पश्चात ही आधुनिक , पक्के एक मजिला मकान निर्माण शुरू  हुआ।  तिबारी निर्माण का प्रचलन लगता है 1890 या उसके बाद शुरू हुआ होगा जब अन्न उत्पादन से कुछ परिवार सौकार (शाहूकार ) बनने लगे व पधानचारी में अधिक बचत होने लगी।  ढांगू में भी 1890 लगभग तिबारियों , डंड्यळ / डंड्यळियों  का निर्माण शुरू हुआ।  अभी तक इस लेखक को कोई ठोस , तर्कयुक्त प्रमाण नहीं मिला कि दक्षिण गढ़वाल (ढांगू , डबरालस्यूं , उदयपुर ) में कोई मकान 1860 से पहले बना हो या तिबारी 1890 से पहले निर्मित हुयी होगी। 
  तिबारी का अर्थ है दुभित्या उबर के ऊपर बरामदे में काष्ठ की नक्कासी  हो।  यदि काष्ठ नक्कासी ना  हो तो ऐसे एक मंजिले खुले बरामदे या बंद बरामदे को डंड्यळ कहते हैं यदि बरामदा न हो और ऊपर कमरा हो तो उस कमरे को मंज्यूळ  ही कहते हैं। 
    सर्वेक्षण से इस  शोधकर्ता ने पाया कि ढांगू के तकरीबन हर गाँव में दो से अधिक तिबारियां अवश्य थीं  जो कुछ बर्बाद हो गयीं है या समाप्ति के बिलकुल निकट हैं।  यह भी पाया गया है कि जिनके मालिक गाँव में नहीं थे व तिबारी नष्ट हो गयी तो तिबारी की नक्कासीदार लकड़ी को लोग ऐसे ही उठाकर ले गए हैं या तिबारी के मालिक ने किसी को अन्य प्रयोग हेतु दे दी गयीं।  कुछ तिबारियों की लकड़ी जला भी दी गयी थीं। 
    सर्वेक्षण से पाया कि लगभग सभी तिबारी सूचनादाता कहते हैं कि तिबारी पर काष्ठ कला अंकन हेतु कलाकार श्रीनगर से आये थे।  श्रीनगर के कारीगर वास्तव में एक जनरिक ब्रांडिंग का उदाहरण है।  किसी को कुछ नहीं पता कि वे अनाम कलाकार कहाँ से आये थे व कहाँ ठहरा करते थे।  केवल ग्वील की सूचना मिलती है कि काष्ठ  कलाकार रामनगर से आये थे व  सौड़ की तिबारी अंकन कलाकर श्रीनगर के थे व छतिंड में रहते थे (अस्थायी निवास ) .
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       ठंठोली के  मलुकराम बडोला की तिबारी में काष्ठ अंकन कला

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ठंठोली मल्ला ढांगू का महत्वपूर्ण गाँव है।  कंडवाल जाति किमसार या कांड से कर्मकांड व वैदकी हेतु बसाये गए थे।  बडोला जाति ढुंगा , उदयपुर से बसे।  शिल्पकार प्राचीन निवासी है।  ठंठोली की सीमाओं में  पूर्व  में रणेथ  , बाड्यों , छतिंडा व दक्षिण पश्चिम में ठंठोली गदन (जो बाद में कठूड़ गदन बनता है ) , दक्षिण पश्चिम में कठूड़ की सारी , उत्तर में पाली गाँव हैं।   
 चंडी प्रसाद बडोला की सूचना अनुसार लकड़ी की नक्कासीदार आलिशान तिबारियां भी ठंठोली में थी व  मलुकराम बडोला (नंदराम बडोला , नारायण दत्त बडोला के पिता  ) , , राजाराम बडोला , बासबा नंद कंडवाल,  जय दत्त कंडवाल, पुरुषोत्तम कंडवाल , रामकिसन कंडवाल आदि सात  तिबारियां थीं। 
    इस लेखक को ठंठोली के मलुकराम बडोला के पड़पोते (great grandson ) हरगोपाल बडोला ने अपनी तिबारी की फोटो भेजीं हैं. यदि स्व मलुक राम  बडोला,  उनके पुत्र स्व नंदराम बडोला   उनके पुत्र स्व प्रेम लाल बडोला व पड़पोते हरगोपाल बडोला (जन्म 1952 ) के मध्य  समय की गणना करें तो हर साखी में 25 साल के अंतर् से मलुकराम बडोला का जन्म  लगभग सन 1875  बैठता है।  याने तिबारी मलुकराम बडोला के यौवन काल के बाद ही निर्मित हुयी होगी।  याने यह तिबारी 1900 के लगभग ही निर्मित  हुयी होगी।  तिबारी की शैली बताती है कि नक्कासी शैली प्राचीन व  नहीं है  याने किसी भी प्रकार से तिबारी 1900  से पहले नहीं निर्मित हुयी होगी। 
  काष्ठ तिबारी साधारण दुभित्या उबर (तल मंजिल ) के ऊपर बरामदा  नक्कासी तिबारी है युक्त है।   तिबारी का काष्ठ  कला चौकोर है , चार खम्बों या स्तम्भों  वाली तिबारी में कोई धनुषाकार मेहराब (arch ) नहीं है सभी चौकोर हैं । चारों स्तम्भ छज्जे के ऊपर स्थापित हैं।  चारों खड़े स्तम्भों में  सुंदर चित्रकारी हुयी है अथवा अंकन किया गया है।   यह पता नहीं चल सका है कि स्तम्भ  एक ही लकड़ी के स्लीपर /लट्ठ से उकेर कर किया गया हो या कई कलाकृतियों को जोड़कर निर्मित किये गए हों  जैसे ग्वील के क्वाठा भीतर के स्तम्भ हैं। 
 
   स्तम्भ में आधार के कुछ ऊपर पहले अधोमुखी कुछ  कुछ कमलाकार अंकन व उसके ऊपर  एक अंडाकार आकृति के ऊपर  उर्घ्वमुखी  कमला की पंखुड़ियां     अंकन हुआ है।  बीच में भी कला कृती में  उभार है जो गोल है व स्तम्भ के चारों और है।  फिर स्तम्भ की गोलाई कम होती है और कुछ कुछ चौकोर  आकृति में स्तम्भ ऊपर के  काष्ठ आकृति जो ऊपरी छज्जे (छत के नीचे ) छज्जे के मिलता है।  यह रेखायुक्त हैं और काष्ठ की कई पत्तियों से बने लगते हैं।  कई परतों में ऊपर का भाग है जो छत से मिलते हैं।  चारों स्तम्भों को मिलाने वाली ऊपर भू समांतर  वाली परत सीधी प्लेट हैं किन्तु दो बीच की प्लेटों में बेल बूटे  अंकित हैं  . ऊपर की परतों में से दो स्तम्भों से बने  दोनों किनारे की खिड़की (?) के ऊपर मध्य में दो गुच्छे हैं व बीच की खिड़की के ऊपर चक्राकार फूल की पंखुड़ियां अंकित है।   स्तम्भों में भी वर्टिकली  बेल बूटे अंकित हैं जो ऊपर की परतों से मिलती हैं व समानता प्रदान करती हैं याने शौक (shock ) से छुटकारा देते हैं। 
    उबर/तल मंजिल  के ऊपर पत्थर के छज्जे  है व छज्जा पत्थर के दासों (टोड़ी ) पर टिके  हैं।   पत्थरों के निर्मित हैं व दास उलटा s की आकृति आभास देता है।  ढांगू में अधिकतर दास (टोड़ी ) इसी आकृति के होते थे।   इस तिबारी में छत के नीचे का छज्जे  का वह  भाग जो स्तम्भों से संबंधित में दास लकड़ी के हैं चौकोर।  उन दासों (टोड़ीयों ) के सबसे आगे नीचे  तीन लम्बे शंकुनुमा आकृतियां लटकी दिखती हैंजबकि वे चिपकी हैं । 
हर स्तम्भ के मध्य एक उभरी लकीर है जिस पर बड़े कमल पंखुड़ियों के ऊपर छोटे ऊर्घ्वाकार कमल पखुड़ियां अंकित हैं और फिर एक उभरी काष्ठ लकीर है इस  उभरी काष्ठ लकीर पर बेल बूटे जैसे कुछ  अंकन है
  नक्कासी में अधिकतर आकृतियां बेल बूटे के ही आभास देते हैं या हैं। 
तिबारी मेंक हीं  भी पशु या पक्षी अंकित नहीं हैं
अपने जमाने में यह तिबारी मेहमानों की खातिरदारी हेतु गाँव वाले प्रयोग  करते थे।  अब तो रंगदार तिबारी लग रही है किन्तु पहले नहीं थी।  कब रंग लगाया में भी शोध आवश्यक है। 
      ठंठोली की इस तिबारी का अभी भौतिक रूप से देखकर शोध आवश्यक है व बारीकियां व अति वैशिष्ठ्य तभी पता चल सकेगा।       
साधारणतया किसी को आज पता नहीं कि इन तिबारियों के बढ़ई /काष्ठ कलाकार कौन थे , कहाँ के थे।  ठंठोली की इस तिबारी के उत्तराधिकारियों के पास भी इस बाबत कोई सूचना नहीं बस एक ही सूचना है वे शायद श्रीनगर गढ़वाल के थे।  वैसे यह भी निश्चित नहीं है कि वे श्रीनगर के थे या जनरिक ब्रैंडिंग हिसाब से  श्रीनगर नाम पड़ा है। 
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फोटो व सूचना आभार - ठंठोली के पंडित  हरगोपाल बडोला

सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती

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Bhishma Kukreti

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 दाबड़ ( बिछला ढांगू ) संदर्भ में हिमालयी कला व कलाकार

ढांगू गढ़वाल की  लोक कलाएं व लोक कलाकार श्रृंखला - 9
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 प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती


(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 ढांगू में दो गाँवों के नाम 'दाबड़ ' हैं एक मल्ला ढांगू में मळ -दाबड़  व दूसरा बिछला ढांगू के खंड -अमोळा -दाबड़।  इस अध्याय में  बिछला ढांगू दाबड़ की लोक कलाओं की चर्चा की जा रही है।
   सामन्य गढ़वाली गाँव जैसे ही डाबड में  भी निम्न कलाएं मौजूद थीं या हैं -
अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभिव्यक्तियां  जैसे पंडितों द्वारा पूजन समय  गणेश ,  निर्माण आदि , जन्मपत्रियों में पंडितों द्वारा कई कलाएं , बधाण पूजन समय खिन्न लकड़ी से कुछ धार्मिक प्रतीक निर्माण आदि।
ब - शरीर अंकन व अलंकरण (हल्दी हाथ , होली व सुनारों द्वारा अलंकार निर्माण 
स - धार्मिक व सामजिक स्तर पर लोक नृत्य व गीत गायन आदि
द - स्वयं हेतु या जीवकोपार्जन हेतु कई लोक कलाएं
   तिबारियां - दाबड़ में आज भी चार तिबारी (ऊपरी मजिल बरामदे का काष्ठ कला अंकन  )  मौजूद हालत में हैं  . जब इन तिबारियों की निम्न जानकारी मिली है -
 १ - भोला सिंह राणा की तिबारी - भोला सिंह के पहली पीढ़ी में नंदन सिंह व जगत सिंह राण हुए फिर जगमोहन सिंह राणा हुए अब हीरा सिंह राणा चौथी पीढ़ी के हैं।  हीरा सिंह राणा का जन्म लगभग 1980 में हुआ था. एक पीढ़ी में 20 वर्ष का अंतर  से तातपर्य निकलता है कि भोला सिंह का जन्म लगभग 1900 या 1880 (एक पीढ़ी में 25 साल का अंतर हो तो )  याने किसी भी प्रकार से भोला सिंह की तिबारी  1910 से पहले निर्मित नहीं हो सकती।
२- बालम सिंह राणा की तिबारी - बालम सिंह के पोते कलम सिंह राणा की उम्र आज 80 के लगभग है तो बालम सिंह का जन्म लगभग 1900 ठहरता है।  याने 1925 के करीब तिबारी निर्मित हुयी होगी और तिबारी की मरोम्मत 1952 में भी हुयी
३- तारा सिंह राणा की तिबारी - तारा सिंह राणा का पुत्र भरत सिंह राणा हुए , भरत सिंह का पुत्र आलम सिंह राणा व आलम सिंह का पुत्र कलम सिंह की उम्र आज 40 वर्ष की है।  याने यह तिबारी भी 1940 के बाद ही निर्मित हुयी।   अनाम तिबारी काष्ट  अंकन कलाकार - इन तिबारियों के वर्तमान उत्तराधिकारियों से पूछने पर उत्तर मिला कि उस समय भवन चिणाइ तो गंगापार वाले करते थे किन्तु तिबारी निर्माण के बारे में एक उत्तर होता है मथि मुलक (उत्तरी गढ़वाल ) . केवल भोला सिंह राणा की तिबारी कलाकार का नाम मिला और उसका नाम था मथुरा।  कोई कहता है भवन निर्माता व् काष्ठ कलाकार गंगापार  (टिहरी ) डुमरी -बछणस्यूं के थे।  जबकि बछणस्यूं तो गंगा वार आज रुद्रप्रयाग किन्तु पहले पौड़ी गढ़वाल में था । 
ओड /भवन निर्माण
  छोटे मकानों चिनाई (निर्माण ) हेतु ओड व मिस्त्री  गाँव या मंजोखी (पड़ोसी गाँव ) के होते थे जिनमे भूतकाल व वर्तमान ओड ओं  के नाम हैं - जवाहर सिंह , रूप सिंह , टेक  सिंह ,  घनश्याम।
 मंजोखी के ओडों  में रैजा , भाना सतूर आदि प्रसिद्ध हुए हैं। यही पत्थर खान से पत्थर निकलते थे व बढ़ई गिरी का काम भी करते थे
यद्यपि मंदर निर्माण (बड़ी व दर्री  जैसी गेंहू के पराळ  से बनी चटाई ) प्रत्येक व्यक्ति पारंगत था किन्तु लूंगा सिंह , होशियार सिंह , फते  सिंह , , कल्याण सिंह , दलीप सिंह विशिष्ट कलाकार माने जाते  थे।
बांस के भंडार हेतु बर्तन (कंटेनर ) जैसे दबल आदि कलाकार थे चतुर
लोहार - गडमोला के चैतराम आर्य
टमटा गिरी  (धातु वर्तन व उपकरण  )- टंकयाण  (धातु बर्तन मरोम्मत ) हेतु गडमोला पर निर्भर अन्यथा कभी जसपुर पर ही निर्भर थे
सुनार हेतु भी अन्य गाँव जैसे मल्ला ढांगू के जसपुर व पाली गाँव पर निर्भर
कोल्हू (कुलड़ ) - तेल पेरने हेतु कोल्हू दाबड़ के बंशीलाल  कुलड़ मालिक हुए हैं।
   कृषि कार्य हेतु कील , ज्यूड़ (रेशे का ) , हल , जुआ , निसुड़ , पाटा , दंदळ ,  रेशे बुनने , प्रत्येक परिवार स्वयं करता था।  स्वतन्त्रता के बाद भी प्रत्येक मवासे के अपने म्वार जळट (मधुमखहि घर ) थे।  लगभग प्रत्येक पुरुष हिरण , काखड़ , सुवर , शाही (सौलू  ), आदि के आखेट खेलने , मुर्गा पकड़ने मेंकुशल    थे।  गंगा किनारे गाँव होने के कारण मच्छी भी मारना Fishing  जानते थे।
 पंडित - दाबड़ एक राजपूतों व शिल्पकारों का गाँव है अतः पंडिताई हेतु खंड पर निर्भर।  खंड के स्व परमान्द बड़थ्वाल प्रसिद्ध थे और वर्तमान में श्याम लाल बड़थ्वाल। 
, Dhol Vadak /drum player - Swanr Das and family and now Pitambar Das
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सूचना आभार - सत्यप्रसाद बड़थ्वाल (खंड ) व ममता राणा (दाबड़ )

Bhishma Kukreti

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ढांगू की लोक कला व कलाकार  series

ढांगू की लोक कला व कलाकार  - 1

मूळी माई : याने ढांगू की ब्वान वळि  माई
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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  माई शब्द हमारे क्षेत्र में मंदिर या मठ में स्त्री महंत को कहते हैं या जिस स्त्री ने संन्यास ले लिया हो।  ऐसी ही माई थीं  कौंदा (बिछला  ढांगू ) की मूळी माई।  बाल विधवा होने के बाद मूळी ने सन्यास ले लिया था याने तुलसी माला ग्रहण कर लिया था किन्तु कोई मंदिर ग्रहण नहीं किया था।  मूळी माई तिमली डबराल स्यूं के प्रसिद्ध व्यास श्री वाणी विलास डबराल की बहिन थीं या  मुंडीत  की थीं  व कुकरेती ससुराल।  मूळी नाम शायद विधवा होने या मूळया होने के कारण पड़ा  होगा। 
 पूरे ढांगू (मल्ला , बिछले , तल्ला ) में वे मूळी से अधिक ब्वान वळी माई से अधिक प्रसिद्ध थीं।  ढांगू के हरेक गाँव में उनकी जजमानी थी।  वे बबूल (गढ़वाली नाम ) का ब्वान (झाड़ू ) बनाने में सिद्धहस्त थीं व हरेक गांव में कुछ ब्वान लेजाकर बेचतीं भी थी।  ब्वान से लोग उन्हें चवन्नी या दो आना या बदले में अनाज  दाल  आदि देते थे।  अन्य माईयों  की तरह वे भीख नहीं मांगती थीं।  जनानियां उन्हें प्रेम से भोजन पानी देतीं थीं व अपने यहाँ विश्राम करने में धन्य समझतीं थी।  उनके बनाये ब्वान में कला झलकती थीं याने उनकी अपनी शैली /वैशिष्ठ्य होता था । 

कल पढ़िए एक मंगळेर  के बारे में ढांगू की कला व कलाकार   -2 में

 
खंड बिछला ढांगू की लोककलाएं कला व कलाकार

 ढांगू गढ़वाल की लोककलाएं व भूले बिसरे कलाकार - 2
(श्री व जी नहीं लगाए हैं समाहित समझिये )
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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  खंड गंगा तट पर दाबड़ , कांडी , अमोला से घिरा गाँव है।  आज मुख्यतया बड़थ्वालों का गाँव कहा जाता है।
   खंड की मुख्य कलाएं इस प्रकार हैं -
संस्कृति - संस्कारो से संबंधित कला अभिव्यक्ति में - विवाह में जन्मने , नामकरण , मुंडन  आदि के वक्त पंडितों द्वारा गणेश निर्माण , चौकी सजावट सामन्य संस्कारी कलाएं कन्हड में जीवित है , शादी में हल्दी हाथ ,
भी सामन्य सांस्कृतिक कला आम गढ़वाली गांव की भांति खंड गांव की संस्कृति  का अंग है। स्त्रियां  लोक गीत गातीं  थीं व कई गीत स्थानीय घटनाओं पर आधारित रच कर  बौण  व पुंगड़ियों  में गति ही थीं।  लोक खेल भी गढ़वाल जैसे ही थे। 
   पहले चैत  में नाट्य व गीत कला खंड के सांस्कृतिक कला अंग थे।  जंतर -मंतर कला  भी गढ़वाल को प्रतिनिधित्व करते थे।  बादी बादण  नाच गीत के लिए प्रसिद्ध थे ही।
   औजी - ढोल बादक दाबड़ बिछले ढांगू के थे पीतांबर दास परिवार से थे व दूसरी तीसरी साखी में सिंकतु , सैना , चमन लाल , पंकज हुए
   मंदर , चटाई निर्माण - सन 60 -65  तक गाँव में ही बनते थे।
 ब्वान - खंड में ही निर्मित होते थे , कौंदा की मूळी माई भी आती थीं
दबल -ठुपरी = भ्यूंळ  की खंड में ही निर्मित होते थे।  किंतु बांस की ठुपरी , दबल हेतु हथनूड़ व बागी (बिछले ढांगू ) पर निर्मभर थे।
मिटटी के दिए ,हिसर  , मृदा बर्तन - पहले (शायद स्वतन्त्रता से पहले व कुछ समय बाद भी ) - हथनूड़ के कलाकारों पर निर्भर थे।
दर्जीगिरी - पहले औजी ही थे बाद में सिमाळु  खंड  के उमानंद बड़थ्वाल प्रसिद्ध दर्जी हुए ।  देहरादून के प्रसिद्ध टेलर रोशन बड़थ्वाल इसी परिवार के हैं।
  टाट -पल्ल -नकपलुणी - बिछला ढांगू में घने जंगल होने के कारण गोठ प्रथा न थी।  बिछला ढांगू वाले हर्मियों , वर्षा ऋतू में अपने जानवर मल्ला ढांगू भेज देते थे अतः  टाट -पल्ल -नकपलुणी  कला ना के बराबर थी।  घर या गौशाला के आगे हेतु   छपर हेतु पल्ल बागी वाले या हथनूड़  वाले कलाकार थे
उरख्यळ।  छज्जे के दास - ठंठोली (मल्ला ढांगू पर निर्भर  )
मकान के पत्थर गांव के पास या कलसी कुठार (मल्ला ढांगू ) पर निर्भर
भवन निर्माता /ओड - बागी के
सुनार - जसपुर व पाली (मल्ला ढांगू )
लोहरगिरि व टमटागिरी - बड़े कार्य हेतु जसपुर पर निर्भर छोटे कार्य टंकयाण , अदि हेतु गाँव के लोहार गबुल थे।
तिबारियां थी।  पूरी जानकारी हासिल न हो सकी
पहले लगभग हर परिवार से कर्मकांडी पंडित व जंतर मंतर के  पंडित थे। 
पंडित मुकंद राम बड़थ्वाल , दैवेज्ञ (1887 -1979 खंड के ही थे जिन्होंने कई ज्योतिष पुस्तकें रचीं
( खंड के उद्यान कृषि पुरोधा सत्य प्रसाद बड़थ्वाल की दी सूचना पर आधारित )

 
 
 झैड़ (तल्ला ढांगू ) की  लोक कला , शिल्प व भूले बिसरे लोक कलाकार
 
    ढांगू संदर्भ में गढ़वाल की  कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  - 3
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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झैड़  तल्ला ढांगू का एक महत्वपूर्ण गाँव है जो मैठाणियों  का गाँव से अधिक जाना जाता है।  झैड़ की पूर्व व पश्चिम उत्तर  सीमाएं क्रमश: चंद्रभागा व गंगा नदियों से घिरी हैं व मंजोखी  , चैनपुर, नांद , कोयला , खैड़ा सीमा पर लगे गांव हैं।   
अन्य गढ़वाल क्षेत्र की भाँति (बाबुलकर द्वारा विभाजित  ) झैड़  में भी निम्न कलाएं व शिल्प बीसवीं सदी अंत तक विद्यमान थे. अब अंतर् आता दिख रहा है। 
   अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ
   ब -   शरीर अंकन व अलंकरण कलाएं व शिल्प   
 स -फुटकर। कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि
   द  - जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें   
       अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ   
        झैड़ , ढांगू में  संस्कृति व सब्सकारों संबंधी  कलाएं कुछ आज भी हैं कुछ समाप्ति हो गयी हैं - बच्चों के जन्म ,नामकरण , वर्षफल , छट्टी , जनेऊ , चुड़कारम संस्कार , विवाह संस्कार में कर्मकांडी अंकन  । जन्मपत्री , चौकी , चौक्ला , दिवार , पूजन , धूळि अर्घ्य , व विवाह कर्मकांड में विशेष कलाएं वा नाट्य मंचन।  मृत्यु संस्कार   में कई तरह की कलाओं का प्रदर्शन होता है। झैड़ , ढांगू में संस्कृति के अंतर्गत देवी देवताओं की मूर्तियां या प्रतीक निमर्ण या थर्पण ; मंदिर , क्षेत्रपाल देव; व्रत त्यौहार , उत्स्व , मेलों , लोक नृत्य व संगीत, लोक नाट्य , लोकअभिन्य , बच्चों के खेलने के उपकरण निर्माण या खेल, भित्ति चित्र , गोबर, कमेड़ा  या मिटटी से लिपाई मिटटी /गोबर मूर्ति निर्माण व थर्पण , मुखौटे विशेषतः रामलीला या लोक नाट्य उत्स्व (बादी , बदण कृत ) ; पत्तों के उपकरण (जैसे  पत्तल , पुड़की निर्माण ) जंतर मंतर व तांत्रिक क्रियाएं आदि कलाएं , शिल्प मुख्य थे । 
 जहां तक झैड़ का  पंडिताई , ज्योतिष , कर्मकांड से संबंध है झैड़ में हर परिवार से पंडित , ज्योतिषी व वैद्य हुए हैं  जगतराम मैठाणी , अनसूया प्रसाद मैठाणी , सच्चिदानंद मैठाणी प्रसिद्ध वैद्य थे व लीला नंद मैठाणी।  शाश्तार्थ भी होते थे ब्रिटिश काल में भी। 
पंडिताई में जगतराम मैठाणी  ,गोकुल देव  मैठाणी , नरोत्तम प्रसाद , श्रीनन्द मैठाणी , शंभु प्रसाद  व  कई कर्मकांडी पंडितों ने व्यास वृति (भागवत पाठ - भक्तदर्शन मैठाणी , मधुसुधन मैठाणी ) में अच्छा नाम कमाया था। 
     ब -   शरीर अंकन व अलंकरण कलाएं व शिल्प     
    विवाह अवसरों में हल्दी हाथ समय , वर वधु को उबटन , हल्दी लगाना ; वर वधु को सजाना , मेंहदी (लाइकेन को पीसकर ) लगाना, पैरों में अल्टा लगाना;   हाथ , कान , नाक , हाथ व पैरों व कमर में विभिन्न धातु या  वनस्पति अलंकार   पहनने व निर्माण की वृति झैड़ , ढांगू में भी थी   व है।  शरीर गोदने  की प्रथा कम थी।    वैष्णवी तिलक लगाना या शैव्य त्रिपुण्ड लगाना  , माथे पर , सिंगाड़ व ढोल पर पिठाई लगाना भी आम कला प्रदर्शन है।  आभूषण हेतु शरीर अंग वेधन सामन्य कला तो नहीं है किन्तु  आम संस्कृति भाग है।  मुख पर मेक अप बीसवीं सदी में झैड़ , ढांगू में दुर्लभ ही था।  आँखों पर सुरमा लगाना भी सामन्य था। 
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    स -फुटकर। कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट  आदि
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 झैड़ ढांगू में मैठाणी  जाति को पंडिताई  प्राचीन समय में (प्रथम वर्ग के ब्राह्मण ) , सर्यूळ ( फौड़  या सामूहिक भोजन बनाना ), जंतर -मंतर , झाड़खंडी कार्य  हेतु बसाया गया था।  झैड़ के मैठाणी बिछला ढांगू व तल्ला ढांगू  में सर्यूळ कार्य भी करते थे।
     ब्रिटिश काल में तो स्कूलों का निर्माण शुरू हो गया था।  किन्तु पहले मैठाणी पंडित अपने बच्चों को घर पर ही संस्कृत सिखाते थे व  ज्योतिष ज्ञान , कर्मकांड ज्ञान भी सिखाते थे।  इसी तरह झाड़खंडी विद्या भी सिखाते थे।  सूचना मिली है कि कर्मकांड व ज्योतिष की टीका बहुत पहले गढ़वाली में ही होती थी।
    जब ब्रिटिश सरकार ने स्कूल शुरू किये तो कर्मकांडी ब्राह्मणों को ही अध्यापकी वृति दी गयी थी तो अवश्य ही झैड़ के पंडितों को अध्यापकी वृति मिली होगी ही।  यही कारण है कि झैड़ में आज भी अध्यपक वृति की ओर हर परिवार का रुझान है शायद ब्रिटिश काल से अब तक कम से कम 50 अध्यापक तो झैड़  से हुए ही होंगे।  एक बार लोक कहावत थी कि झैड़ में पत्थर उठाओ तो  अध्यापक व वैद्य मिल जायेंगे।   
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     द  - जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें     
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   बीसवीं सदी में निम्न शिल्प व कलाकार झैड़ , ढांगू में प्रसिद्ध हुए (जो जानकारी हासिल हुयी ) -
यह ध्यान रहे कि ढांगू में जाती प्रथा ु तरह जकड़न वाली ना थी जैसे भारत के मैदानों में अतः कई शिल्प जो मैदानों में ब्राह्मण व राजपूत नहीं अपनाते थे गढ़वाल में ब्राह्मण व राजपूत भी कई तरह के शिल्प प्रवीण थे। 
  दन्न , पंखी निर्माण, कंबल निर्माण  - रामशरण मैठाणी
 पर्या , परोठी , बरोळी निर्माण - बलदेव प्रसाद मैठाणी
ब्वान( गढ़वाली नाम बबूल घास  का झाड़ू )  - अधिकतर हरेक परिवार स्वयं निर्माण करता था व कौंदा की  मूळी माई व झैड़ इ ही शिल्पकारजैसे झाबा , भादु  आदि निर्माण करते थे।
हळ -ज्यू - बहुत से मैठाणी व शिलकपकार शिल्पी
बढ़ई गिरी (मकान व अन्य विशेष काष्ठ वस्तुतएं - मूसा , भादु
भ्यूंळ की टोकरी , दबल तो हरेक परिवार स्वयं निर्मित करता था व इसी तरह कई शिल्प जैसे न्यार , चारपाई  आदि वस्तुएं भी हर परिवार स्वयं इंतजाम करता था।   
बांस के दबल , सूप , टोकरी , कंडी - दुसरे गाँव काटळ (बिछली  ढांगू ) के थामेश्वर और झैड़  के आत्माराम मैठाणी। मंजोखि के शिल्पकार भी कई कार्य करते थे।
मकान निर्माण - झैड़ के भादु , हन्दा , झाबा  आदि मंजोखी (बिछला ढांगू ) के कई शिल्प विशेषज्ञ  झैड़ आकर मकान निर्माण करते थे।
 छत पत्थर खनन व पत्थर कटान -  मकान छत हेतु पटाळ (पत्थर )  खान झैड़ में ही थी व झैड़ के जतनी विशेषज्ञ थे। 
उरख्यळ /ओखली , छज्जे के दास - ठंठोली गांव  (मल्ला ढांगू ) पर निर्भर
छज्जा -पैडळस्यूं पर निर्भर
  सोने चांदी के अलंकार हेतु झैड़ वाले जसपुर , पाली (मल्ला ढांगू ) पर अधिक निर्भर थे
 झैड़ में लोहार भी थे किन्तु बड़ा काम बाहर ही होता था।  पीतल , कांसे वर्त्तन या घांडी हेतु जसपुर पर निर्भर। 
तांत्रिक , मांत्रिक , झाड़खंडी - गोकुलदेव मैठाणी , रामसरण मैठाणी , महानंद मैठाणी प्रसिद्ध थे।
घड्यळ /जागरी में गोकुलदेव मैठाणी , उरबी दत्त मैठाणी , ललिता प्रसाद मैठाणी, नाथूराम मैठाणी  का नाम आज भी  लिया जाता है.
नाथूराम मैठाणी व गोकुलदेव मैठाणी पुछेर /भविष्यवक्ता थे ,
नाथूराम मैठाणी नरसिंग जागर  विशेषज्ञ थे।   
हर परिवार गेंहू की टहनियों से टोकरी बनाते थे। 
 
 गंगा किनारे होने व घने जंगल निकट के कारण  तैराकी , मच्छी मारना ,    मुर्गा फांसना, आखेट मनोरंजन  कलाये सम्मलित थीं। 
झैड़ में काष्ठ नकासियुक्त तिबारियां व पत्थर की तिबारियां भी थी जैसे भोला दत्त (गोकुलदेव , गोविंदराम मैठाणी ) की तिबारी।  यह मकान मिट्टी के साथ उरद के मस्यटू (पीठ ) से भी  चिना  गया था। 
भोला दत्त मैठाणी , चित्रमणि मैठाणी मकान की भी काष्ठ कलाओं  सज्जित तिबारियां थीं जिसमे शहतीर (जो छत को बंधे रखता था में कई देवताओं जैसे  गणेश व नजर न लगने वाला तांत्रिक आकृति , पशु पक्षी (हाथी  , शेर , मोर , मिरग ) , फूल पत्ती (खड़े  सिंगाड़ में कमल फूल  व रेखा चित्र)    दोहरी रेखाएं , कलस आकृति  , गोल आकर आदि     (सभी देवेंद्र मैठाणी सूचना अनुसार ) , थीं
बादी -बादण - बिजनी तल्ला ढांगू के हीरा बादी प्रसिद्ध थे।  हीरा बादी लांग खेलते थे  व नाटक स्वांग , गायन नाच का कार्य बखूबी करते थे। 
ढोल बादक - दाबड़  (बिछला ढांगू ) के पीतांबर दास आदि आज इनके उत्तराधिकारी यह कार्य संभाले हुए हैं।
गोठ संस्कृति न होने से टाट -पल्ल कला नहीं थी। 
 तेल पिरोने हेतु पहले झैड़ में ही कुल्हड़ थे किन्तु बाद में नांद , कुला खैड़ा पर निर्भर थे।
जब तक सिंगटाळी  पुल नहीं निर्मित हुआ था तो गंगा पार करने हेतु नाव चलती थीं किन्तु नाव या ठोपरी  निर्माण व मल्लाह सिंगटाळी (टिहरी गढ़वाल ) के शिल्पी होते थे
प्राचीन काल में दीवारों की लिपाई हेतु लाल मिट्टी , गोबर व कमेड़ा प्रयोग होता था , प्रत्येक महिला पारंगत होती थी
भीड़ -पगार (खेतों की दीवारें ) हर व्यक्ति अपने आप चिनता  था व बड़े कार्य हेतु व्यवसायिक शिल्पी (जाति भेद नहीं ) काम आते थे।
प्राचीन काल याने ब्रिटिश काल तक खेत  जंगल को काटकर याने 'कटळ -खणन'  विधि द्वारा तैयार किये जाते थे। 
मेरे अनुभव में कविता अंताक्षरी के अच्छे ज्ञाता - मोहन लाल मैठाणी ,  व राजेंद्र मैठाणी थे  तो देवन्द्र मैठाणी  भी अच्छे कविता अंताक्षरी ज्ञाता थें
स्त्रियां  गीत मौसम में नाच गान करती थीं व स्वांग भी करते थे तथा वन व खेतों में गीत भी गातीं थीं।  पहेलियाँ भी पूछीं जाती थीं। 
        (संदर्भ देवेंद्र मैठाणी (भू पू पोस्ट मास्टर ) की टेलीफोनिक सूचना )
Copyright @ Bhiashma  Kukreti ,Dec .  2019
 
 
   ठंठोली (मल्ला ढांगू ) की  लोक कला , शिल्प व भूले बिसरे लोक कलाकार
 
    ढांगू संदर्भ में गढ़वाल की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  - 4
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं  है )
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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ठंठोली मल्ला ढांगू का महत्वपूर्ण गाँव है।  कंडवाल जाति किमसार या कांड से कर्मकांड व वैदकी हेतु बसाये गए थे।  बडोला जाति ढुंगा , उदयपुर से बसे।  शिल्पकार प्राचीन निवासी है।  ठंठोली की सीमाओं में  पूरव में रनेथ , बाड्यों , छतिंडा व दक्षिण पश्चिम में ठंठोली गदन (जो बाद में कठूड़ गदन बनता है ) , दक्षिण पश्चिम में कठूड़ की सारी , उत्तर में पाली गाँव हैं। 
  ठंठोली की लोक कलाओं के बारे में  निम्न सूचना मिली है -
 
 लोक गायन  व नृत्य - आम लोग , स्त्रियां जाती हैं , गीत भी रचे जाते थे।  सामूहिक व सामुदायक नाच गान सामन्य गढ़वाल की भाँती।  घड़ेलों में जागर नृत्य भी होता है।  बादी बादण  नाच गान  व स्वांग करते थे।  बिजनी के  हीरा बादी पारम्परिक वादी  थे।  कुछ लोग स्वयं स्फूर्ति से भी स्वांग करते थे। बादी हर बारह वर्ष में लांग खेलते थे।
 
वाद्य बादन  - बांसुरी बादन  आम था , अलगोजा भी बजाया करते थे।  बादी हारमोनियम भी बजाते थे।  जागरी थाली व डमरू बादन  करते थे।  हंत्या घड्यळ के जागरी ठंठोली नाम  चतुर था। 
ढोल वादक - ढौंर के कुशला व सुतला।  मुशकबाज बागों के कलाकार।
सिद्धि  दर्शन - बीसवीं सदी मध्य तक चोर पकड़ने , खोई वस्तु या जानवर खोजने हेतु मंत्र बल पर पुरुषोत्तम कंडवाल घड़ा रिटाते थे व घड़े के ऊपर  मकर राशि के रामचरण कंडवाल बैठते थे
रणेथ (ठंठोली का भाग ) डळया गुरु कई तंत्र मंत्र के विशेषज्ञ थे। 
समस्या पूर्ति या पहेलियाँ ज्ञान - तकरीबन हर नागरिक  पहेली , कहावतों , का ज्ञान रखता था।
कोशों का ज्ञान - आयुर्वेदिक वैद्य होने के लिए वैदकी सीखना सामन्य चलन था।  संस्कृत का ज्ञान पहले घर में दिया जाता था। 
सर्यूळ - बडोला व कंडवाल, कुकरेती  सर्यूळ  (सामहिक भोजन बनाना ) का कार्य करते थे।
पेय पदार्थ (कच्ची शराब ) - भवा नंद कंडवाल प्रसिद्ध थे।
बढ़ईगिरी - शिल्पकार , बाड्यों के व ठंठोली के थे
बांस के वर्त्तन - बाड्यों के चिरुड़  व गोबिंदराम
पत्थर खान - ठंठोली में मलण गाँव में छज्जे के दास , उरख्यळ (ओखली ) , सिल्ल बट्ट हेतु पत्थर की खाने थीं व पत्थर निकालने व कटान के कलाकारों में रीठू , बेळमू , पन्ना लाल व उनके पुरखे  प्रसिद्ध थे
लोहार गिरी - स्थानीय शिल्पकार में रीठू , बेळमू , पन्ना लाल
 सुनार - जसपुर व पाली (मल्ला ढांगू ) पर निर्भर
टमटागिरी (ताम्बा , पीतल , कैसे के बर्तन निर्माण आदि ) - पूर्णतया जसपुर पर निर्भर
घराट - बाड्यों के शिल्पकारों पर निर्भर
 कूड़ चिणायी (मकान निर्मणाकरता ओड  ) -  सौड़ व जसपुर के ओडों पर निर्भर   
भ्यूंळ  की टोकरी , दबल आदि स्थानीय लोग स्वयं निर्मित करते थे
माला आदि फूलों से बनाते थे व बच्चों की सुरक्षा माला जिसमे कौड़ियां , बघनखे , चांदी/ताम्बे  के सिक्के , अजवायन थैली भरके बनाई जातीं थीं व कंडवाल पंडित विशेज्ञ होते थे।
मुख पर रंग व उबटन की प्रथा विवाह अवसर पर थी।  दूल्हा दुल्हन को विष्णु व लक्ष्मी रूप दिया जा था। 
  गहने  पहनने हेतु शरीरांग छेदन  होता था व अधिकतर लोहारों की सहायता ली जाती थी। बचपन में लड़कियां तोर या वनस्पति के गहने बनाकर पहनते थे ,
 ज्योतिष व कर्मकांड में पुरुषोत्तम कंडवाल , भैरव दत्त कंडवाल , दामोदर कंडवाल , दिनेश कंडवाल , राधाकृष्ण कंडवाल , किसन दत्त कंडवाल आदि वैद्य व भेषज प्रसिद्ध थे। भैरव दत्त  कंडवाल व्यास वृति हेतु प्रसिद्ध थे। कर्मकांडी ब्राह्मण  तकली कातकर जनेऊ निर्माण करते थे।  जन्म पत्रियों  पर विभिन्न चित्रकारी भी करते थे , पूजन समय कई कला प्रदर्शन होते थे -जैसे चौकल में  में गणेश थरपण। 
   वैद्यों में जय दत्त कंडवाल ,हरि दत्त ,  पुरोषत्तम कंडवाल  व किसन दत्त कंडवाल नामी वैद्य थे।
   लकड़ी की नक्कासीदार आलिशान तिबारियां भी ठंठोली में थी व  मलूकराम बडोला (नंदराम नारायण दत्त बडोला के दादा ) , , राजाराम बडोला , बास्बा  नंद कंडवाल,  जय दत्त कंडवाल, पुरुषोत्तम कंडवाल , रामकिसन कंडवाल आदि सात  तिबारियां थीं।  इनमे देवताओं को छोड़ पशु , पक्षियों व अन्य नक्कासी  थी। 
मकानों की लिपाई लाल या काली मिट्टी के साथ गोबर से होती थीं। व कमेड़ा भी प्रयोग होता था
लोक खेलों में - गारि /गिट्टे पाछ गारी, - गारि क्वाठा म डळण   घिरपातयी  , इच्चि दुच्ची ,     लुक्का छिपी -,घुंड फोड़ -, काणो बणिक पकड़न ,पकड़ा पकड़ , इकटंगड्या -छौंपा दौड़ , डुडड़ कूद याने रस्सी कूद खेल , रस्सा कस्सी,    कुद्दी मरण /फाळ मरण,   झुळा खिलण , बा कटण  (तैराकी ) ,  डाळम चढ़ण,  पत्थर घुरैक चुलाण , घुंघरा घुराण , - बाग़ बकरी खेल , गुच्छी खिलण कांचक या पथरक गोटी खिलण, इलाड़ु का घट्ट रिंगाण,  रड़न , खाडु लड़ान .  तीर चलाण - मल्ल युद्ध व मुक्केबाजी , तास खिलण , चौपड़ खेल , खुट गिंदी  ,  हिंगोड़, हथ गिंदी , गिल्ली डंडा खेल, सिमनटाई /पिट्ठूपोड़ - , कबड्डी - खो खो - ,माछ मरण - अयेड़ी खिलण, ब्यौ  मा -हल्दी लगाण , कंगण तुड़न ;  रिंगण -,ग्यूं या अन्य फसल का बलड़ों  म छजजा से  ,  तमाखु बूंद दैं नचण , गिगड़ुं  लड़ै  मुख्य खेल थे कई खेल आज भी विद्यमान हैं। 
 
 
                                                           
(सूचना आभार ठंठोली के चंडी प्रसाद बडोला )

 
संसोधित गटकोट  (मल्ला ढांगू ) की लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार

 संसोधन में कमल जखमोला की महत्वपूर्ण भूमिका है
ढांगू संदर्भ में गढ़वाल की लोक  कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  - 5
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी अपरिहार्य नहीं है )
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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गटकोट मल्ला  ढांगू का एक महत्वपूर्ण ही नहीं प्राचीन गाँव है. गटकोट के बारे में कमल जखमोला गटकोट  को खस समय का वसा गाँव बताते हैं।
गटकोट के दक्षिण  में मंडळु गदन , पश्चिम में हिंवल नदी तो पूर्व में घणसाळी , जल्ली , व उत्तर में मित्रग्राम, पंयाखेत  गाँव हैं. गटकोट की जमीन मंडुळ पार गुदड़ में भी है।   
अन्य गढ़वाल क्षेत्र की भाँति (बाबुलकर द्वारा विभाजित  ) गटकोट   में भी निम्न कलाएं व शिल्प बीसवीं सदी अंत तक विद्यमान थे. अब अंतर् आता दिख रहा है। 
   अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ
   ब -   शरीर अंकन व अलंकरण कलाएं व शिल्प   
 स -फुटकर। कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि
   द  - जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें
                 अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ व शरीर अंकन


जखमोला जाति के कई परिवार पंडिताई करते थे तो पूजन समय चौकल में चित्रकारी व दीवाल में पूजन चित्रकारी सामन्य बात है।  विवाह समय हल्दी हाथ  चढ़ाना , वर वधु का मेक अप /शरीर सौंदर्यीकरण , होली वक्त रंग चढ़ाना भी सामन्य कला प्रदर्शन होता ही है।  तेरहवी व बार्षिकी श्राद्ध में वैतरणी पार करने हेतु मिट्टी , चावल से कला प्रदर्शन  गढ़वाल के अन्य गाँव सामान है।  कर्मकांड , धार्मिक उतस्वों की कला भी प्रदर्शित होती है। जनेऊ, राखी  निर्माण गाँव के पंडित करते थे। 
              ब - अलंकरण कलाएं व शिल्प   
 सुनार गाँव में न था और शायद अलंकार निर्माण , रिपेयर हेतु गटकोट गाँव जसपुर या पाली पर निर्भर था।  वनस्पति आभूषण भी गढ़वाली गाँव जैसे प्रचलित थे। 
    स फुटकर कला
 कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि    भी सामन्य थी।  गटकोट से कई प्रसिद्ध अध्या पक हुए व वर्तमान में भी हैं व अचला नंद जखमोला सरीखे गढ़वाली  विद्वान् भी गटकोट से ही हुए जिन्होंने गढ़वाली - हिंदी, अंग्रेजी व अंग्रेजी -गढ़वाली शब्दकोश रचा  व अभी सतत कार्यरत हैं । वर्तमान में  गटकोट के कमल जखमोला  गढ़वाली गद्य व कविता में प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं
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       द -जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें
       ओड /भवन निर्माता - परवीन सिंह , जीत सिंह (म्वारी गाँव )
बक्की /भविष्यवक्ता - गणत हेतु चैनु,  डखु
जागरी - हरकदेव , खीमानंद जखमोला, भगली राम
ढोल बादन - गरीब दास , सतरु  दास , राम दास , मानदास , श्यामदास बच्चू ,
दर्जी - उपरोक्त ढल बादक परिवार
लोहार - मलंगी , तलंगी , थामा , गूड़ी प्रेम ,
मच्छे मार विशेषज्ञ - मुल्तान , चतरु , , मथुरा प्रसाद वर्तमान में रज्जी
बादी - बिजनी के हीरा बादी
कर्मकांडी  ब्राह्मण - आशाराम जखमोला, महाबंद , लीलानंद , ज्योतिराम , आदित्यराम जखमोला वर्तमान में गुना नंद,  प्यारेलाल जखमोला। 
चर्मकार - मंडुळ  में चमड़े कमाया जाता था।  कांगड़ा से चर्मकार आये थे (रोशन लाल के पूर्वज ) आज भी मोची छप्पर के नाम से स्थान प्रसिद्ध है
 गाँव में तीनेक तिबारियां थीं।  एकतिबारी  पधान  की थी जिसमे लकड़ी पर नक्कासी थीं। शम्भु प्रसाद जखमोला की सूचना अनुसार तिबारी की लकड़ी पर नक्कासी में फूल पत्ती , पशु पक्षी, मोर की पूंछ  थे।
माँगळ  गीत व ने लोक गीत व चैत में गए जाने वाले गेट।  नृत्य , स्वांग - लगभग सभी महिलाएं , प्रत्येक  बारह वर्ष बाद बादी लांग खेलने आते थे व गीत , नृत्य  स्वांग  करते थे ,
थड्या।  चौंफला नृत्य गीत विशेषज्ञ - जल्ली की दादी , संकरी देवी , भगा देवी व अन्य सभी महिलाएं
रामलीला कलाकार - डाटा राम जखमोला, मनोहर , लीला नंद , अभयराम , टंखीराम , अनिल जखमोला आदि
रामलीला के विदूषक - कल्याण सिंह , बीणी राम
  गटकोट में उपयोग होते कृषि यंत्र जो गढ़वाल के अन्य गाँव जैसे ही थे जैसे - हल-ज्यू  , जोळ (पाटा ) , काष्ठ दंदळ , लौह दंदळ,   कूटी , भद्वाड़  खणवा कूटी , फाळु /फावड़ा , सब्बल , दाथी , थांत , , कील , पल्ल -टाट ,  कुल्हाड़ी , बसूला , फरसा , मुंगर अधिकतर कुल्हाड़ी , बसूला , फरसा , सब्बल छोड़ कर गाँव में हर परिवार बना सकता था।  अब स्थिति बदल गयी है। 
स्वतंत्रता से पहले सफ़ेद कपड़ों पर रंग  हल्दी या ढाक ।  किनग्वड़ से चढ़ाया जाता था तो हरा रंग जौ के पौधों से रंग चढ़ाया जाता था। 

(आभार - शम्भू  प्रसाद जखमोला, कमल जखमोला  की सूचना पर आधारित )

Copyright@ Bhishma Kukreti , Dec. 2019
 
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 तैड़ी ( बिछला ढांगू ) की  लोक कला , शिल्प व भूले बिसरे लोक कलाकार
 
    ढांगू संदर्भ में गढ़वाल की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  -  6
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )
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संकलन - भीष्म कुकरेती     
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  ढांगू में तैड़ी  को ' सट्टी वळ   गाँव ' के नाम से भी पहचाना जाता है।  न्यार तट पर तैड़ी बसा गांव का विशिष्ठ महत्व है।  किनसुर , कांडी , धुनारों बागी , गूम , कौंडा की सीमाओं से तैड़ी गाँव घिरा है और चौरस धरती वाला गाँव है।
      अन्य गढ़वाल क्षेत्र की भाँति (बाबुलकर द्वारा विभाजित  ) तैड़ी   में भी निम्न कलाएं व शिल्प बीसवीं सदी अंत तक विद्यमान थे. अब अंतर् आता दिख रहा है। 
   अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ
   ब -   शरीर अंकन व अलंकरण कलाएं व शिल्प   
 स -फुटकर। कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि
   द  - जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें   
कृषि कला शिल्प - सभी कास्तकार थे तो प्रत्येक व्यक्ति कृषि कला में पारंगत था ही।
  स्योळ /न्यार /म्वाळ निर्माण में पुरुष आगे होते थे।  खटला बनाना , न्यार की चौकी बनाई जाती थी।
भोजन कला - महिलाओं के अतिरिक्त पुरुष भी भोजन पकाने में माहरात हासिल हुए थे विशेषतः  जो फौड़/( सामूहिक भोजन ) में भोजन बनाते थे। 
लोक गीत , नृत्य - गीत महीनों में महिलाएं लोक गीत गातीं थीं व नृत्य करने के अलावा स्वांग भी भरतीं थीं कई युवा भी पारंगत थे।  व्यवसायिक गीत -नृत्य -स्वांग हेतु बादी आते थे (हीरा बादी ).   घड्यळ , मंडाण में धार्मिक नृत्य , संगीत सामन्य था।
 पंडिताई - नारायण दत्त रियाल , रामदयाल , रामनाथ रियाल , श्रीनन्द वर्तमान में चक्रधर रियाल अतः कर्मकांड में अपायी जाने वाली सभी कलाएं तैड़ी  में फलती फूलती रही हैं वर्तमान में भी।
सभी तैड़ी  वालों के पंडित बणेलस्यूं  सिलसू के दिस्वाल ब्राह्मण होते थे केवल  तैड़ी में बसे देवप्रयागि ध्यानियों के पंडित देवप्रयाग से पूजा हेतु आते थे.
मंदिर - ढंकलेश्वर  जिसमे लौह सांप , लौह त्रिशूल , ताम्बे के प्रतीक आज भी नए मंदिर में विद्यमान हैं। मंडित आम एक उबरा मकान जैसा था जिसकी छत सिलेटी पत्तरों की थी।
वैद्य - पिछले पचास सालों से शिव प्रसाद रियाल।
झाड़खंडी - रामनाथ रियाल - छाया , आदि पूजन में उपयोग  होती सभी कलाओं का प्रयोग। आवश्यकता पड़ती थी तो गडमोला , नैरुळ  के झड़खंडियों को भी बुलाया जाता था।
जागरी  कैन्डूळ के घुत्ती
मसुकबाजी - हथनुड़ के 
ढोल बादक - किनसुर के गुरखा दास , शिवलाल
लोहार - घूरा
टमटा गिरी - विचत्ति या बणेल स्यूं पर निर्भर
ओड - बाहर के जैसे किनसुर के दिगंबर ।  पहले 1960  से पहले के अधिकाँश मकान टिहरी गढ़वाल (गंगपुर्या ) से आये मकान शिल्पियों ने निर्मित किये हैं।
तिबारी - नारायण दत्त , राम दयाल रियाल की
मिट्टी के बर्तन - हथनूड़
               ढांगू में मच्छी मारने की कला विशेषज्ञ तैड़ी गाँव वाले
   नयार तट व अपना बड़ा गदन होने के कारण तैड़ी गाँव वाले  मच्छी  मारने में भी कुशल थे व जंगल से घिरे होने के कारण मृग , काखड़ , सौलू मारने , मुर्गा शिकार हेतु भी उस्ताद थे।
   अतः  तैड़ी गाँव  में निम्न कलाएं बिकसित हुईं थीं
विभिन्न प्रकार के जिवळ (स्योळु का जाल जिसमे घ्वीड़  मिरग , सुअर सौलू आदि  फंसाये  जाते थे। 
मच्छी मारने के जाल , फट्यळ , छ्युंछर ,बाद में  नायलोन का जाल , बांस की अन्य मच्छी फाँसो उपकरण
 मच्छी , घ्वी , काखड़ पकाने के  विशेषज्ञ स्वयं विकसित हो जाते थे
मच्छी पकड़ने के कई तरीके जैसे हाथ से पकड़ना , पत्थर में घण लगाकर चोट से मच्छियों को बहरा कर , रत में टॉर्च मारकर मछलियों को अँधा कर हाथ से पकड़ना , लंग्वाळ विधि ( पानी के कैनाल / स्रोत्र बंद कर या मोड़कर ) , जाळ , फट्याळ  आदि।  कारतूस फेंकर, 1970 के बाद डीडीटी आदि भी प्रयोग हुए हैं
 


( सूचना आभार -मदन बड़थ्वाल )

       
      मित्रग्राम (मल्ला ढांगू ) की लोक कलाएं व लोक कलाकार
 
  ढांगू संदर्भ में गढ़वाल की  लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  -  7 
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )
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मल्ला ढांगू में  उत्तरमुखी मित्रग्राम जखमोलाओं का गाँव है जहां पिछली शताब्दी में दो  ही शिल्पकार  परिवार थे।  मित्रग्राम बहुत पहले गटकोट का ही भाग था या गटकोट से ही जखमोला परिवार मित्रग्राम  में बसा।  इतिहासकार डबराल लिखते हैं कि 1815 बाद विद्वान् , अंग्रेज विरोधी पंडित बासबानंद बहुगुणा गढ़वाल पलायन करते वक्त जसपुर , ग्वील से होते हुए मित्रग्राम ठहरे थे। मित्रग्राम के पूर्व में बन्नी , खैंडुड़ी ,   पश्चिम गटकोट , उत्तर में बाड्यों  गाँव हैं।  हिंवल नदी भी मित्रग्राम  की सीमा में बहती है।
 गाँव में प्राचीन बट वृक्ष ने कई नए वृक्षों को जन्म दे दिया था।  इन वृक्षों के नीचे  सभी परिवारों के पत्थर के ओखलियाँ स्थापित थीं।
  अन्य गढ़वाल क्षेत्र की भाँति (बाबुलकर द्वारा विभाजित  )मित्रग्राम   में भी निम्न कलाएं व शिल्प बीसवीं सदी अंत तक विद्यमान थे. अब अंतर् आता दिख रहा है। 
   अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ
   ब -   शरीर अंकन व अलंकरण कलाएं व शिल्प   
 स -फुटकर। कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि
   द  - जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें   
 
मित्रग्राम में आवास भवन व गौशा

Bhishma Kukreti

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ढांगू , हिमालय की  पाषाण उत्कीर्णन कला व कलाकार

ढांगू गढ़वाल संदर्भ में हिमालय की   लोक कलाएं व लोक कलाकार श्रृंखला - 10
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 प्रस्तुति -  भीष्म कुकरेती
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 ढांगू पट्टी , पच्छिमी , दक्षिण पौड़ी गढ़वाल (हिमालय ) में कुछ समय पहले तक कई तरह की पाषाण संबंधी कलाएं  जीवित थीं व कुछ आज भी विद्यमान हैं। 
  ढांगू पट्टी , पच्छिमी , दक्षिण पौड़ी गढ़वाल (हिमालय ) पाषाण शिल्प व कलाओं के बारे में निम्न ब्यौरा प्राप्त हुआ है
         ढांगू (हिमालय ) के घरेलू पाषाण पात्र या उपरकरण
पाषाण पयळ/गहरी थाली  - भूतकाल में स्वतन्त्रता से  कुछ समय पहले तक रसोई संबंधी पात्र जैसे पाषाण थाली (पयळ ) भी  ढांगू (हिमालय ) में  निर्मित होते थे। पळयो आदि रखने हेतु पयळ सही पात्र होता था। इसके अतिरिक्त मवेशियों को पींड (भोजन ) आदि खिलने हेतु भी पयळ सही पात्र था।  पयळ  के कलाकार वे ही होते थे जो सिल्ल बट्ट , दास (टोड़ी ) या छज्जा निर्माण करते थे. या छत पत्थर के कलाकार भी पयळ उत्कीर्ण कर सकते थे।
  पाषाण ओखली (उरख्यळ )  निर्माण -  अधिकतर प्रत्येक गांव में प्रत्येक परिवार की पाषाण ओखली या काठ की ओखली होती थी।  पाषाण ओखली हेतु पत्थर  छत के पत्थर व छज्जे के दास की खानों से ही मिलता था और वही कलाकार होते थे जो पत्थर निमाकलने व उत्कीर्ण के कलकार होते थे।
सिल्ल बट्ट - पाषाण काल से चले आ रहे इस उपकरण का महत्व आज भी है यद्यपि मिक्सर गरिन्द्र से सिल्ल बट्ट प्रयोग पर प्रभाव अवश्य पड़ा है किन्तु महत्व है ही।  सिल्ल बट्ट हेतु पत्थर खान (पख्यड़ खांडि ) लगभग वही खाने होतीं थी जो ओखली , दास (टोड़ी ) , छज्जे के पत्रों हेतु होती थीं और सिल्ल बट्ट निर्माण के व्ही कलाकार होते जो अन्य पाषाण उपकरण उत्कीर्ण करते थे। यही कलाकार बाद में खरल व मूसल के चिकने होने पर छीलते भी थे। 
    खरल या इम्मा दस्ता (Mortar ) प्रयोग - ढांगू में ठंठोली , गडमोला , नैरूळ -कैन्डूळ ,  वाड़ , गैंड ,झैड़ , मित्रग्राम -कठूड़ आदि गाँवों में वैद्य होते थे जिन्हे आयुर्वेदीय औषधि पीसने या मिश्रित करने हेतु पाषाण खरल की आवश्यकता पड़ती थी।  पाषाण खरल निर्माता भी वही होते थे जो सिल्ल बट्ट , ओखली का उत्कीर्णन करते थे या छज्जा  निर्माण कलाकार। 
  पाषाण चक्कियों का  प्रयोग -  कुछ समय पहले ढांगू  के प्रत्येक घर में एक जंदुर /चक्की का होना आवश्यकता थी।  अनाज पीसने हेतु एक आवश्यकता थी व अधिकतर  रसोई घर में चक्की बिठाई जाती थी। इसी तरह जहां गधेरे हों वहां पनचक्की भी आवश्यकता थीं।  पन चक्कियां अधिकतर पधान, सामाजिक उत्तरदायित्व  के तहत एक चक्की निर्मित करवाते थे व चक्की चलाने हेतु किसी चक्कीवान परिवार को दे देते थे जो चक्की की देखरेख , मरम्मत भी करता था व पिसाने वालों से आटा लेकर आजीवका चलता था।  बहुत से व्यक्ति स्वयं भी गदन तट  पर चक्की निर्माण करते थे व चक्की को आजीविका साधन बनाते थे।  अब दोनों प्रकार की छक्के अप्रासंगिक होती जा रही हैं।  अधिकतर चक्की के पाटे  , ओखली व और छज्जा  खान से उत्कीर्ण होते थे अतः चक्की /पनचक्की के पाट निर्माता भी वही होते थे जो छज्जा , ओखली व  सिल्ल बट्ट निर्माता होते थे।  चक्की बैठने का कार्य वही करते थे जो भवन निर्माण करते थे (मिस्त्री या ओड ) . हाँ चक्कियों को बाद में छिलाई हेतु स्थानीय कारीगर या कलाकार होते थे। 
  ढांगू (हिमालय )  में पत्थर की तकली - बहुत बार  काठ की तकली के स्थान पर  पत्थर की तकली भी प्रयोग होती थी।  पाषाण तकली हेतु कड़क पत्थर का प्रयोग होता था और अधिकतर भवन निर्माता कालकर पाषाण तकली बना देते थे। 
 ढांगू (हिमालय )  में  उड़्यार  /गुफा में लेखन - यद्यपि कम ही उड़्यार /गुफा के पत्थरों में लेख मिले हैं हाँ कई उड्यारों  में शिक्षा प्रसार के बाद उड्यारों के पत्थर पर बच्चे या शिक्षित अपना नाम या कुछ भी उत्कीर्ण कर देते थे या करते हैं।  उड्यार पाषाण पर उत्कीर्ण हेतु पत्थर या , कूटी आदि से लिखाई की जाती है। 
 ढांगू (हिमालय )  में पाषाण देव प्रतिमाएं - पाषाण देव प्रतिमा जो भी होंगे वे प्राचीन या कम से कम सौ डेढ़ सौ साल पहले की प्रतिमाएं या प्रतीक होंगे।  किन्तु ढांगू (हिमालय ) में इसका उल्लेख कम ही किया जाता कि फलां देव स्थल में पाषाण प्रतिमा लगाई गयी आदि।  गोल ढुंग रखकर देव मूर्ति (प्रतीक )  समझी जाती थी।  कहीं कही किसी गाँव में भैरव जैसे क्षेत्रपाल की पाषाण प्रतिमा दीवाल पर लगी हैं।  इस दिशा में खोज की अति आवश्यकता है।
    धार /मगर - कूल से पानी को नियम से गिराने हेतु   ढांगू में भी  पत्थर के धार या मगर का प्रयोग होता है।  जहां तक अभी तक इस लेखक को जो भी सूचना मिली है उसके अनुसार  ढांगू (हिमालय )  में पाषाण धार या पाषाण मगर  गढ़वाल से बाहर से ही मंगाए गए हैं।  जो धार लगवाता था (दान में ) वह धार के नीचे पत्थर पर शिलालेख भी उत्कीर्ण करवाता था उदाहरणार्थ जसपुर में मथि धार के धार को  स्व लोकमणि  बहुगुणा ने लगवाया था और शिला पर  कुछ या उनका नाम उत्कीर्ण था (संस्कृत में ) . यह खोज का विषय है कि शिलालेख भी बाहर ही खुदवाया गया था या किसी  स्थानीय कलाकार ने लेख खुदाई की थी।
 वास्तु शिल्प हेतु पाषाण प्रयोग - गढ़वाल की भाँति ही ढांगू में भी मकान निर्माण हेतु  कई प्रकार  के पत्थरों की आवश्यकता पड़ती थी
 छत के पत्थर हेतु सिलेटी पत्थर - ऐसे पत्थरों हेतु खाने होतीं थी और उन खानों से पत्थर निकालने वाले व उन्हें अकार में काटने का कार्य विशेष कलाकार करते थे।
छज्जे - छज्जे की खाने ढांगू में कम ही थीं याने उपयोगी पथ्हर न थे तो छज्जे  व चक्की पाषाण हेतु पैडलस्यूं पर निर्भरता थी।
छज्जे के दास या टोड़ी हेतु तथर - अधिकतर छत के पटाळ की खानों से ही दास मिल जाया करता था अन्यथा पैडळस्यूं पर निर्भर।
 मकान चिनाई हेतु पत्थर - मकान चिनाई में कई तरह के पत्थरों की आवश्यकता पड़ती है।  पत्थरों हेतु   मकान वाला अपने  खेतों में विद्यमान पत्थर खान या  किसी अन्य से मांगकर पत्थर खान से उपयोगी पत्थर निकलते थे।  पत्थर निकलने वाले भी कुछ ना कुछ हिसाब से ट्रेंड ही होते थे।
 पहाड़ी खेतों की दीवाल या अन्य दीवालों आदि हेतु भी पत्थरों का उपयोग करते थे। 
कभी कभी पाषाण कलाकार बच्चों हेतु पत्थर से खिलोने भी बनाते थे।  किन्तु कम प्रचलन था। 
 
   कहा  जा सकता है कि ढांगू पाषाण कला के मामले में हिमलाई क्षेत्र की पाषाण कला समझने हेतु  एक सही उदाहरण है।  ढांगू में वे सभी पाषाण कलाएं मिलती हैं जो कलाएं हिमालय के अन्य स्कूटरों में मिलते हैं।   
 
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 ढांगू , हिमालय में बांस आधारित  कलायें  व कलाकार
 
ढांगू गढ़वाल संदर्भ में हिमालय की   लोक कलाएं व भूले बिसरे लोक कलाकार श्रृंखला - 11
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 प्रस्तुति -  भीष्म कुकरेती

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बांस भारत की संस्कृति का अंग सदियों से रहा है।  ढांगू  (पौड़ी गढ़वाल ) हिमालय में भी बांस एक महत्वपूर्ण लकड़ी है जिसके दसियों उपयोग होते थे ा कई कलाओं में बांस का हाथ था.  ढांगू , हिमालय में बांस आधारित कला अपने स्वयं के उपयोग हेतु व  रोजगार या आय साधन में भी बांस आधारित कला का उपयोग सदियों से होता ा रहा है।  अब ढांगू , हिमालय में बांस का उपयोग काम होता जा रहा है क्योंकि कृषि में कमी आने से कई कलाएं भी नष्ट होती जा रही हैं।
   ढांगू (पौड़ी गढ़वाल,  उत्तराखंड )  हिमालय में बांस  आधारित  कलाएं व उपयोग निम्न तरह से था (कम से कम 1970 तक ) -
बाड़ - खेतों की बाड़ या फियंसिंग हेतु बांस के लट्ठे ढांगू में सदियों से इस्तेमाल होते थे।
टाट - जब पशुओं को गोठ में बांधा जाता था तो पशुओं की रक्षा हेतु बांस के टाट बनाये जाते थे जो चलती फिरती बाड़ का काम कार्य करते थे।  टाट बनाने हेतु बांस के लट्ठे को दोफाड़ कर खड़े व पड़े में चार पांच पंक्तियों में बांस डंडे उपयोग होते थे।  बांस के इन फाड़े डंडों को बाँधने का कार्य माळु की रस्सी उपयोग  की जाती थी।  सर्यूळ ब्राह्मणों को छोड़  लगभग प्रत्येक मर्द टाट बनाने की कला जानता था। गोठ संस्कृति ह्रास होने से टाट संस्कृति भी समाप्ति के कगार पर है। सरकारी व्यवधान (बांस की कटाई मनाही थी ) से भी टाट संस्कृति को धक्का लगा है।
पल्ल व नकपलुणी निर्माण - ढांगू  (हिमालय ) के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर सब जगह गोठ संस्कृति (मवेशियों को खेतों में बांधना /रखना न कि  गोशालाओं में )   विद्यमान थी।  गोठ के सुरक्षा व्यक्ति को गुठळ  कहा जाता है।  गुठळ पल्ल के नीचे सोता या विश्राम करता है व मवेशियों को  पल्ल की बाड़ के अंदर बांधे जाते हैं।  पल्ल याने चलता फिरता कैम्प।  पल्ल दो होते हैं मुड़ेट (खेत की दीवाल पर खड़ा किया ) एक कम ऊंचाई का व आठ दस हाथ लम्बा होता है।  मथेट पप्ल  मुड़ेट पल के मुकाबले बड़ा होता है ( लम्बाई व ऊंचाई में भी )  और मथेट पल्ल को मुड़ेट पल के ऊपर रख कर टेम्पोरेरी कैम्प बनाया जाता है किनारे /साइड  में नकपलुणी खड़ी की जाती है जो ऊंचाई में मुड़ेट पल्ल के बराबर होती है किन्तु लम्बाई कम होती है आधी।   पल्ल बनाना भी एक कला है  और तकरीबन प्रत्येक परिवार पल्ल बनाते थे।  पल्ल का ढांचा /कंकाल बांस के आधे फाड़े डंडो को लिटाकर , खड़ा क्र बनाया जाता है जैसे टाट और संध्या स्थल में माळु की रस्सी से बाँधा जाता है।  फिर तछिल व माळु के पत्तों से छाया जाता है। 
दबल /दबली/नरळ  (पेरू /पेरी ) - अनाज भनगरीकरण हेतु ढांगू (हिमालय ) निवासी बांस के भंडार (दबल , दबली , पेरी , पेरू ) उपयोग में  लाते  थे।  बांस के दबल या दबली बड़े बड़े व् छोटे छोटे होते थे।  दबलों का ढांचा पंस की बारीक फट्टियों से बनाये जाते थे व गोबर व लाल मिटटी से लीपे जाते थे।  दबल या दबली के ढक्क्न टोकरीनुमा होते थे व बांस के ही बनाये जाते थे।  अधिकतर देखा गया था कि बांस के दबल निर्माता शिल्पकार परिवार के होते थे यद्यपि कोई पक्का नियम न था। 
टोकरियां - विभिन्न साइज व आयत की टोकरियां /कंडी भी ढांगू, (हिमालय  में निर्मित की जाती थीं वर्तमान में भी।  कई टोकरियों में ढक्कन होते थे कोई बिन ढक्कन के होते थे।  ढांगू , हिमालय में पीठ पर घास या लकड़ी लाने का रिवाज न था अतः पिट्ठू कंडी नहीं निर्मित होतीं थीं। 
कंगल  /कंघियां  - बादी जाति परिवार वाले बांस की कंघियां /कंगल   निर्माण के विशेषज्ञ होते थे। हालांकि अन्य बांस कला कलाकार भी कंघियां  निर्मित कर लेते थे। 
हुक्का - बांस से बंसथ्वळ  (हुक्का ) भी निर्मित होते थे व कोई भी तकननीसियन हुक्का बना सकता था।  हुक्के की नाई /नली भी बनाई जाती थी। 
हिंगोड़ - हॉकी नीमा खेल हिंगोड़ की स्टिक भी बांस से निर्मित होती है और जटिल कला नहीं है।
कलम - बांस व रिंगाळ से कलम बनाई जाती थीं व सभी इस कला के जानकार थे।
जल नल /water canal - कभी कभी जब कम पानी को किसी छोटे गधेरे से ले जाना हो तो दो  धारों के मध्य बांस के नल से पानी ले जाया जाता था किन्तु कम ही।  यह भी  जटिल कला न थी। कभी धार की जगह बांस की नली से धार बनाया जाता था।
बांसुरी व पिम्परी - बांस से बांसुरी व पिम्परी जो शहनाई या मुश्कबाज में प्रयोग होती है भी ढांगू , हिमालय में बनतीं थीं।  दोनों के निम्रं में विशेष कला व तकनीक की आवश्यकता पड़ती थी।
छट्टी /बारीक डंडी - बांस को छील कर बारीक डंडी बनाई जाती थी जो धान ताड़ने /rice thrashing के काम आती थी। 
मुणुक -  बारिश से बचने हेतु  पहाड़ों में छाता बनाया जाता था जो पीठ पर लटकाया जाता था व आधुनिक छाता नुमा भी होते थे, जिन्हे मुणुक कहते हैं ।  दोनों के ढाँचे निर्माण में बांस की छट्टियाँ /पतली डंडी उपयोग में ली जातीं थी।  और ऊपर से माळु के पत्तों से ढांचे को छाया  जाता था व माळु से बनधने का काम होता था।  कुशल कारीगर /कलाकार इन मुणकों को बनाते थे।
  अर्थी - सारे भारत, नेपाल , श्रीलंका  जैसे ही  ढांगू , हिमालय में भी   मृतक को बांस की अर्थी में श्मशान घाट ले जाया जाता है।  अर्थी बनाने हेतु कच्चे   बांस की डंडियां प्रयोग में आते हैं।  प्रत्येक गांव में  दो तीन अर्थी बनाने व मृतक शरीक को अर्थी में बाँधने के विशेषज्ञ होते ही  है।

संसार के अन्य भागों की भांति ढांगू में बांस एक बहुपयोगी वनस्पति है व इसके कई उपयोग हैं जिसके वस्तु निर्माण हेतु ढांगू , हिमालय में विशेषज्ञ कलाकार हुआ करते थे। 


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झैड़  तल्ला   ढांगू , हिमालय की तिबारी काष्ठ  कला

झैड़ संदर्भ में ढांगू गढ़वाल, हिमालय   की तिबारियों पर अंकन कला -2
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  हिमालय की भवन काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  - 2
House Wood Carving Art of Dhangu region, Himalaya -
चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती


Curtsy - Devendra Gokuldev Maithani , Jhair
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 जैसा कि पहले अध्याय में सूचना दी चुकी  है कि गंगा तटीय झैड़ गाँव ढांगू क्षेत्र  में कर्मकांड , वैदकी हेतु एक महत्वपूर्ण   गाँव है।  देवेंद्र गोकुलदेव मैठाणी ने  झैड़  हिमालय संबंधी कई सूचनाएं इस लेखक को दीं।  देवेंद्र गोकुलदेव मैठाणी ने सूचना दी कि झैड़ में 2000 से पहले चार या पांच तिबारियां थीं।  तिबारी वास्तव में भवन के ऊपरी मंजिल का नक्कासी युक्त काष्ठ द्वार युक्त बरामदे को कहते हैं।  बरामदे के अंदर भाग में कम से क दो कमरे होते हैं और नीचे मंजिल में भी चार (अंदर  व बाहर X 2 ) कमरे होते हैं याने तिबारी (बरामदा ) तल (ground flour ) के बाहरी दो कमरों के ऊपर होती है व यदि ऐसी तिबारी पर काष्ठ या पाषाण नक्कासी /उत्कीर्णन न हो तो उसे डंड्यळ कहते हैं और ऐसे कमरों को या मकान को दुभित्या मकान यानेआगे पीछे  दो कमरे भी कहते है । 
 झैड़  में आज एक भी तिबारी साबुत नहीं बची है।  गोकुल देव मैठाणी की भी तिबारी थी जो गोकुलदेव मैठाणी  के पिता ने निर्माण करवाई थी।  चित्रमणि मैठाणी की तिबारी थी जो अब अंग भंग /समाप्त हो गयी है।  अब केवल  तिबारी काष्ठ के दो स्तम्भ ही बच गए हैं आसा है कोई इन्हे बचाने हेतु आगे आएगा क्योंकि आने वाले समय में यह इतिहास हेतु आवश्यक वस्तु होगी। देवेंद्र मैठाणी ने चित्रमणि की तिबारी के दो स्तम्भों के  चित्र इस लेखक को व्हट्सप माध्यम से भेजे। 
   देवेंद्र मैठाणी अनुसार गोकुलदेव (देवेंद्र के पिता ) की तिबारी व चित्रमणि मैठाणी  की तिबारियां क्षेत्र में भव्य तिबारियों में गिनी जाती थीं।  चित्रमणि मैठाणी की तिबारी में चार स्तम्भ थे याने तीन मोरी (द्वार , खिड़की , empty space for entry ) थीं व किनारे के दो काष्ठ स्तम्भ मिट्टी  पत्थर की दीवार से लगीं थीं व सभी चारों काष्ठ स्तम्भों निम्न आधार पत्थर के छज्जे में स्थापित थीं. छज्जों के नीचे पत्थर के दास (टोड़ी ) लगे थे।  एक तिबारी  लगभग 24  फ़ीट X 10  फ़ीट की ही होंगी व तिबारी स्तम्भ लगभग 6 फ़ीट के ऊपर रही होंगी।
     जिन तकरीबन बर्बाद होते काष्ठ स्तम्भों के छाया चित्र देवेंद्र मैठाणी ने भेजे हैं उनकी चमक सर्वथा समाप्त ही है अन्यथा जब बनी होंगी तो चमकदार काली भूरे रंग के नक्कासी युक्त संरचना रही ही होंगी। 
दोनों स्तम्भ एक जैसे हैं और उनकी कलाकृति में एक सेंटी मित्र का भी अंतर् नहीं है।  छज्जे पर टिकने वाला  स्तम्भ आधार  बाहर से सुंदर कलाकृत है।  स्तम्भ आधार  पर उल्टा कमल खुदा है जो अलंकृत है व कमल पत्तियां साफ़ झलकतीं है।  ऐसा लगता है कि स्तम्भ के भाग एक लकड़ी के लट्ठे पर नहीं खड़े किन्तु अलग अलग अलंकृत स्तम्भ आपसे में जोड़े गए हैं।  आधार से कुछ ऊपर स्तम्भ में जोड़ है , इस जोड़ में वृत्त का  डायमीटर /व्यास स्तम्भ के व्यास के छोटा है और जोड़ स्थल में गुटके याने नक्कासी युक्त काष्ठ के गोल नुमा टुकड़ों से चारों तरफ सजे हैं।  जोड़ की नकासी आनंद दायी है। 
   प्रत्येक जोड़ के ऊपर फिर से ऊपर की ओर खिलते कमल की पंखुड़ियां हैं व जैसे ऊपर न्य जोड़ आता है सके नीचे उल्टे लटके कलम पुष्प की  पंखुडिया दिखाई देती है व कभी कभी चीड़ के फल की पंखुड़ी का आभास भी देते हैं।  फिर जोड़ आता है व फिर जब छत के लकड़ी का नेहराब /धनुषाकार आर्च /arch आता है तो भी कमलाकर आकृतियां दिखाई देतीं है।  प्रत्येक जोड़ व कलम पंखुड़ियों के मध्य धारी अंकलकरण /fluting है याने बेल बूटे वाला उत्कीर्णन साफ़ दिखयी देता है.
   देवेंद्र मैठाणी ने सूचना दी कि जब उसकी तिबारी व चित्रमणि मैठाणी की तिबारी सही सलामत थीं तो arch , मेहराब में नयनाभिराम नक्कासी थी।  देवेंद्र मैठाणी की बाचीत से इस लेखक को लगा कि झैड़ की तिबारियों में वानस्पतिक  चित्रकारी हर जगह थी व छत व स्तम्भ को लगने वाली पट्टी पर कुछ रोचक चित्रकारी थी।  हां कहीं भी पशु या पक्षी न थे।  देवेंद्र मैठाणी ने बताया कि  प्रत्येक  तिबारी में ऊपरी भाग (arch ) कोलगते हुए स्तम्भ पर चक्राकार फूल थे व बीच केंद्र में गणेश की चित्रकारी थी।  गणेश का अर्थ है जो पूजा समय गोबर से अंडाकर एक गोल मूर्ति सी बनाई जाती है और इसी आकृति गोल अंडाकार , चक्राकार च पुष्प के मध्य आकृति उत्कीर्ण थी। 
जहां तक स्तम्भ अध्यन  का प्रश्न है  यह स्तम्भ  कलाकारी लगभग ढांगू की काष्ठ तिबारियों में पायी गयी हैं कुछ अंतर् हो सकता है किन्तु बहुत बड़ा अंतर् नहीं दिखाई पड़ता । 
जहां तक तिबारी काष्ठ उत्कीरण  कलाकारों का सवाल है इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल प् रहा है झैड़ में भी कहा जाता है तिबारी निर्माण कलाकार श्रीनगर या गंगापार या मथि मुलक (उत्तरी गढ़वाल ) से आये थे।  भवन निर्माण  निर्माता स्थानीय ओड ही थे और मंजोखी के ही होंगे
प्रश्न  यह भी है कि झैड़  वाले इन स्तम्भों के अवशेष ही सही बचा पाएंगे ?
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आभार छाया चित्र व    सूचना - देवेंद्र गोकुलदेव मैठाणी , झैड़
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मित्रग्राम  ढांगू , हिमालय की तिबारी काष्ठ  कला

ढांगू , गढ़वाल , हिमालय की तिबारी  (भवन काष्ठ  कला )    -3   
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  हिमालय की भवन काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  3 

( चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती


जैसा कि पिछले एक  अध्याय में मित्रग्राम की लोक कलाओं का विवरण देते लिखा गया था कि मित्रग्राम , मल्ला ढांगू , पौड़ी गढ़वाल का एक महत्वपूर्ण गाँव है जिसमे लगभग सभी परिवार (एक परिवार शिल्पकार ) जखमोला है।  ह्री प्रसाद जखमोला ने सूचना दी थी कि कुछ समय पहले मित्रग्राम में चार या पांच तिबारियां (पहले मंजिल पर बरामदा काष्ठ नक्काशीयुक्त ) सही सलामत थीं जबकि अब केवल नारायण दत्त जखमोला की तिबारी ही सही सलामत है।  यह तिबारी नारायण दत्त जखमोला ने लगभग सन 1950 के आस पास किन्ही गाँव वालों से क्रय किया था.
 तिबारी याने दो तल बाह्य कमरों के ऊपर काष्ठ  नक्कासीदार  युक्त बरामदा। 
  नारायण दत्त जखमोला की तिबारी पर चार स्तम्भ है दो स्तम्भ अलग अलग दीवार पर  सटे  हैं।  दो स्तम्भ मध्य में है और इस तरह तीन मोरी /द्वार /खोली बनती है।  प्रत्येक स्तम्भ जब शीर्ष की ओर पंहुचना चाहते है तो  दो स्तम्भों के शीर्ष से कलायुक्त , धनुषाकार  आर्क /मेहराब बनती है। 
  प्रत्येक स्तम्भ देहरी (छज्जे  का  पत्थर ) पर आधारित हैं।  आधार पर उल्टे कमल पंखुड़ियां साफ़ साफ़ झलती है और दर्शक को मुग्ध करने में आज भी सक्षम हैं।  फिर जिस जोड़ से कमल की पंखुड़ियां नीचे को ओर निकलती है उस जोड़ में नकासी युक्त गुटके है जो गोलाई में सारे स्तम्भ को घेरे होते हैं।  जोड़ में भी मुग्ध करने वाली गवाक्षजलम है।  फिर जोड़ से सीधे कमल की पंखुड़ियां ऊपर की ओर खिलती सी हैं।  जब कमल फूल बनता है तो नक्कासी युक्त खभा    ऊपर चलता जाता है जो एक जोड़ में समाप्त होता है और उस जोड़ के कुछ ऊपर अर्ध वृताकार आर्क /मेहराब शुरू होता है जो दुसरे स्तम्भ के आर्क /मेहराब से मिलता है और चक्षु आनंद दायक धनुष सा बनाते है।  बीच के  स्तम्भों  /खम्बाों  / सिंगाड़ों   से दोनों ओर आर्क/मेहराब/अर्धमंडलाकार आकृति   बनते हैं और स्तम्भ /सिंगाड़ के बीच से कलाकृति शुरू होती है  जो छत की पटिया /लकड़ी का स्लैब से मिलता है इस बीच स्तम्भ में उभरी हुयी नक्कासी मिलती है।  मेहराब में  प्रकार की बेल बूटेदार  है।  प्रत्येक अर्धमंडलाकार आकृति /आर्क के   चक्राकार फूल दिखाई।   की अपने  बड़ा  फूल सा आनंद देता है।  फूल के केंद्र में गणेश (अंडकार गोल आकृति जैसे   पूजा में  गोबर  का गणेश बनाते ) होती  है।
  मेहराब या अर्धमंडलाकार आकृति के ऊपर मोटी  लकड़ी की पटिया है जो छत के दास (टोड़ी )  से नीचे है और सिलेटी  पत्थर वाली छत पट्टी व दास  पर तकि है।  छत के पत्थर इस तरह लगे हैं कि तिबारी लकड़ी पर वारिस का पानी पानी सीधे नहीं।  पट्टी पर कलाकृति रही भी होगी तो आज नहीं दिखती। 
     ऊपर जाते /नीचे आते कमल पंकी खुड़ियों आकृति  व जड़ों के बीच खम्बों पर उत्कीर्ण हिसाब से मित्रग्राम के नारायण  दत्त जखमोला की तिबारी के स्तम्भों  की उत्कीर्णन / कलाकृति  लगभग झैड़ के चित्रमणि मैठाणी की तिबारी के स्तम्भ से मिलती जुलती ही है।  मेहराब या अर्धमंडलाकार आकृति  आये उत्कीर्ण कलाकृति प्रशंसनीय है।  कोई पशु या पक्षी की आकृति नहीं दिखी ना ही फोटो में कोई नजर न लगे वाला कोई भयानक आकृति दिखाई देती है। दीवार से लगे किनारे के दोनों स्तम्भ भाग में भी चक्षु आनंद दायक कलाकृति उभर कर आयी हैं.
   हरी प्रसाद जखमोला (नारायण दत्त जखमोला के द्वितीय पुत्र )  के अनुसार तिबारी डेढ़ सौ साल पुरानी होगी किन्तु ढांगू में तिबारियों का प्रचलन सम्भवतया 1900 के आस पास ही शुरू हुआ। 

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सूचना वा फोटो सौजन्य - हरी प्रसाद नारायण दत्त जखमोला    (मित्रग्राम )
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बजारी कठूड़ में टंखीराम कुकरेती  की तिबारी की काष्ठ कला
 
बजारी कठूड़ , ढांगू गढ़वाल ,संदर्भ में   हिमालय  की तिबारियों पर काष्ठ उत्कीर्णन अंकन कला-  2
 
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  हिमालय की भवन ( तिबारी )  काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  - 6   
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(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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     ढांगू में क्षेत्रफल व जनसंख्या दृष्टि से  बजारी कठूड़ एक बड़ा गाँव है।  यहां की तिबारियों के मामले  में 6 तिबारियों  के बारे में  सूचनाएं व छायाचित्र सतीश कुकरेती ने भेजी हैं।  इनमे से एक तिबारी की फोटो व सूचना टंखी राम कुकरेती की तिबारी के बारे में भी मिली है  .   
 बजारी कठूड़ (मल्ला ढांगू , गढ़वाल, हिमालय ) के टंखीराम की तिबारी कम भव्य तिबारी है। 
तिबारी में चार स्तम्भ हैं व ये चरों स्तम्भ तीन खोली /द्वार बनती हैं।  दो स्तम्भ दिवार से लगीं है।
   प्रत्येक काष्ठ स्तम्भ पत्थर के छज्जे पर स्थापित  हैं व आधार पर उल्टा कमल पुष्पदल दृष्टिगोचर होता है , फिर बीच में चारों ओर गोलाई लिए गुटके हैं।  गोल गुटका नुमा आकृति से स्तम्भ में फिर से ऊर्घ्वाकार (ऊपर उठता ) कमल पुष्पदल दृष्टिगोचर होते है और इस कमल पुष्प आकृति के बाद स्तंभ सीधा ऊपर चलता है व छत के नीची चौकोर पट्टियों से मिल जाते हैं।  छत की पट्टी व कमलाकृति पुष्प के मध्य काष्ठ स्तम्भ में बेल बूटा नुमा आकृतियां अंकित है।  छत के नीचे भी चार काष्ठ पट्टियां हैं जिन पर वनस्पति की आकृतियां अंकित है। छत के नीची चार समानंतर चित्रकारी वाली पट्टियां दिखती हैं। 
    टंखीराम कुकरेती की काष्ठ तिबारी  की मुख्य विशेषता है कि इस तिबारी में कोई मेहराब (arch ) नहीं है जो इस तिबारी को भव्यता दे सके। 
    स्तम्भों व ऊपर पट्टियों में बारीक कला युक्त अंकन हुआ है।  किसी भी भाग में पशु , पक्षी अंकन नहीं दीखता है व कमल को छोड़ कोई   चक्राकार आकर में पुष्पदल  भी अंकित नहीं हुआ है जो अधिकतर ढांगू अन्य तिबारियों में मिलता है।     
 तिबारी को काष्ठ  उत्कीर्णन कला दृष्टि से साधारण तिबारी ही कहा जायेगा। 
    अनुमान है कि ऐसी तिबारियों का निर्माण प्रचलन अधिकतर 1940 के पश्चात ही शुरू हुआ। 
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सूचना व फोटो आभार - सतीश कुकरेती (कठूड़ )
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बजारी कठूड़ में राघवा नंद कुकरेती व देवानंद कुकरेती की तिबारियों की काष्ठ कला
 
बजारी कठूड़ , ढांगू गढ़वाल ,संदर्भ में   हिमालय  की तिबारियों पर काष्ठ अंकन कला 1
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  हिमालय की भवन ( तिबारी )  काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  - 5 
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(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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  ( उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला पर कुछ अधिक कार्य  हुआ है ।  यद्यपि पुस्तकें भी प्रकाशित हुयी हैं और लेख भी।  यह देखा गया कि कला इतिहासकारों ने देहरादून , चमोली गढ़वाल , रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी को  ही गढ़वाल समझा , पौड़ी गढ़वाल विशेषकर दक्षिण गढ़वाल की हर कला अन्वेषक , विश्लेषक , व  इतिहासकार ने हर तरह से अवहेलना ही की है।  ढांगू तो सदा की तरह इस विषय में भी अपेक्षित ही रहा  है। इसीलिए इस लेखक ने दक्षिण गढ़वाल की लोक कलाओं पर ध्यान केंद्रित किया है ) 


जैसा कि कठूड़ संदर्भ में हिमालय कलायें व कलाकार शीर्षक में उल्लेख किया गया है कि कठूड़ जनसंख्या दृष्टि से ढांगू का एक बड़ा गाँव था जहां 12 जातियां वास करती थीं व सम्भवतया क्षेत्रफल हिसाब से भी कठूड़  बड़ा गाँव है।  (यद्यपि कड़ती वाले भी दावा करते हैं कि कड़ती क्षेत्रफल में बड़ा गाँव है ) .
    तिबारियों की दृष्टि में कठूड़ में दो तिबारी पधान (राघवानंद कुकरेती परिवार ) परिवार व दो राजपूत परिवार में थीं।  पधान राघवा नंद कुकरेती के अतिरिक्त इसी परिवार के देवी प्रसाद कुकरेती की भी तिबारी थी।  अब राघवानंद कुकरेती की ही तिबारी बची है जबकि देवी प्रसाद कुकरेती की तिबारी उजाड़ दी गयी है और  नया  भवन निर्मित हो गया है।  तीसरी और भव्य तिबारी (लगभग क्वाठा भितर  जैसे ) तिबारी  जोध सिंह -प्रताप सिंह नेगी भाईयों की थी।  ये दोनों भाई देहरादून जा बसे और तिबारी नत्थी सिंह नेगी को बेच दी गयी थी। इस दौरान बस्बा नंद कुकरेती 'पटवारी व तनखीराम कुकरेती की तिबारियों या हंगलों की भी जानकारी मिली है
      इस लेखक के पास राघवा नंद कुकरेती 'पधान' की तिबारी की सूचना व फोटो मिली है (आभार सतीश कुकरेती ) .
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                             चार स्तम्भ वाली राघवा नंद कुकरेती 'पधान ' व देवा नंद कुकरेती की कठूड़ की तिबारी
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    राघवा नंद कुकरेती 'पधान ' की तिबारी व देवानंद कुकरेती की तिबारियां भी  प्रथम मंजिल पर हैं ।   चारों   स्तम्भ /खम्बे /सिंगाड़   छज्जे के  पत्थर से बने देहरी (देळी ) पर ठीके है।  किनारे के दोनों स्तम्भ  मिटटी पत्थर की बनी दिवार से लगी हैं।   चित्रकारी से समाहित लम्बी ऊपर जाती लकड़ी   स्तम्भ व दीवार को जोड़ती है। यह चित्रकारी से भरपूर दोनों लम्बी लकड़ी अंत में छत कीकाष्ठ  छज्जे से जा मिलते  हैं।  चारों स्तम्भ तीन मोरी /खोळी /द्वार बनाते है और चारों मोरी लगभग 6 फ़ीट से ऊँची होंगी ही।  चारों मोरी आयत व लम्बाई चौड़ाई में समान हैं। 
 प्रत्येक स्तम्भ का आधार उलटा कमल जैसे है और कमल खिलने के स्थान पर जोड़ है जिसके चारों ओर गोलाई लिए काष्ठ गुटके हैं।  फिर इन जोड़ों से प्रत्येक स्तम्भ में ऊपर की और उठते कमल पंखुड़ियां हैं  जो कुछ ऊपर खिलते जैसे लगती हैं और वहां से फिर नई मोटाी अंडाकार आकृति जो धीरे धीरे कम होती है ऊपर की ओर जाती है और कुछ ऊपर एक जोड़ है जो गोलाई में गुटकों से बना है।  यहां से ही स्तम्भ से मेहराब /arch निकलते है।  मुकुट  आकार के तीन मेहराब /arch  पर भी चित्रकारी है।  जिस जोड़ से मेहराब /arch शुरू होता है वहीं से एक काष्ठ आकृति जैसे थांत ऊपर की ओर जाती है जो मकान की छत के छज्जे से मिलते हैं। 
मेहराब के बगल में थांत पर मयूर नुमा पक्षी का गला व चोंच की चित्रकारी है।  इस तरह दोनों तिबारियों में प्रत्येक तिबारी में चार  पक्षिमनुमा  चित्रकारी मिलते हैं
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                       तिबारी के प्रत्येक मेहराब में दो  चक्राकार फूल व  चित्रकारी
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 तिबारी के प्रत्येक मेहराब /arch  के किनारे  दो दो चौड़े पंखुड़ियां काले चक्राकार फूल है जिसके केंद्र में गणेश ( जैसे   पूजा  वक्त  गोबर का गणेश अंडाकार बनाया जाता है ) है।  तीनों मेहराबों में कुल 6 फूल हैं।  प्रत्येक  थांत पर भी नयनाभिराम करते चित्रकारी है।  मेहराब से और पत्थर की छत के छज्जे में मध्य कई मोटे  पटले / पट्टियां हैं जिन पर कई प्रकार की आनंददायक चित्रकारी  है। 
 मेहराब ऊपर चार पट्टियों  में विशेष बेल बूटे
        मेहराब के ठीक ऊपर चार आयताकार पट्टियां हैं जिनमे नीचे की तीन पत्तियों में हर पट्टी पर विशेष व भिन्न बेल बूटे /फूल व पत्तियां कलाकृतियां अंकित हैं।  सबसे उप्पर जो पट्टी छत को छूती है उस पर बिलकुल भिन्न किस्म के फूल हैं , सबसे ऊपर की पट्टी में  किनारे पर की दो चौकी में कमल आकृति दिखती है तो बीच में  ऊपर की ओर उठे पुष्प दल वाला बड़ा फूल दीखता है।  नीचे की तीन पट्टियों में चित्रकारी तरंगों का छवि perception प्रदान करने में सफल हैं।   
  छत के काष्ठ छज्जे से भी शंकु नुमा कलाकृति लटक रही हैं। 
             फोटो में कोई मानवाकृति  अथवा  पशु नहीं दीखते हैं। 
        राघवा नंद कुकरेती 'पधान ' की तिबारी व देवा नंद कुकरेती की तिबारी के स्तम्भों  पर कमल पंखुड़ी आकृति  , झैड़ के चित्रमणि मैठाणी की तिबारी स्तम्भ व मित्र ग्राम  के नारायण दत्त जखमोला की तिबारी स्तम्भ के सामान ही है। मित्रग्राम व कठूड़ की उपरोक्त दो तिबारियों में व झैड़  के तिबारी  स्तम्भों में समानता है। 
  आकलन से लगता है कठूड़  के राघवा नंद कुकरेती 'पधान ' व देवा नंद कुकरेती की तिबारियों का  निर्माण समय 1900 इ.  के पश्चात ही होगा
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 मुख्य सूचना व फोटो आभार - सतीश कुकरेती

 अतिरिक्त  सूचना , भास्कर कुकरेती व  शालनी कुकरेती बहुगुणा
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बजारी कठूड़ में लीला नंद  कुकरेती  की तिबारी की काष्ठ कला
 
बजारी कठूड़ , ढांगू गढ़वाल ,संदर्भ में   हिमालय  की तिबारियों /Tibaris पर काष्ठ उत्कीर्णन अंकन कला-  3 
 
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  हिमालय की भवन ( तिबारी )  काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  - 7   
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(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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   बजारी कठूड़ मंदिरों व तिबारियों व जंगलाओं (भवन प्रकार ) के लिए क्षेत्र में प्रसिद्ध है। कठूड़  तिबारी श्रृंखला में लीला नंद कुकरेती की तिबारी एक समय जानी मानी तिबारी थी।  अब जीर्ण -सीर्ण स्थिति में लगभग अंतिम सांस ले रही है।
  मेहराब /arch न होने यह तिबारी उच्च श्रेणी की तिबारियों में स्थान नहीं पा सकती है। 
लीला नंद कुकरेती की तिबारी में चार काष्ठ स्तम्भ है दो किनारे वाले भवन दीवाल से लगे हैं व चारों सत्मभ तीन मोरी /खोली /द्वार बनाते हैं।  चारों स्तम्भों के प्रत्येक स्तम्भ छज्जे पर आधारित है।  आधार पर उल्टा कमल पुष्पदल दीखता हिअ व फिर गोल गुटके का एक आकृति है जिससे ऊर्घ्वाकर कमल पुष्पदल है जहाँ से स्तम्भ सीधे ऊपर आता है और मुंडीर (सिर ) से जुड़ जाता है सभी स्तम्भ इसी प्रकार मुंडीर से जुड़ते हैं।  मुण्डीर पर चार से   अधिक समांतर र पट्टियां है और आखरी ऊपर की काष्ठ पट्टी छत से मिल जाती है।  मुण्डीर की प्रत्येक नीचे वाली व मध्य पट्टियों  के बिलकुल मध्य में कोई शुभ चिन्ह अंकित है  याने मुण्डीर पर कुल तीन शुभ चिन्ह अंकित है। 
 स्तम्भ या मुण्डीर की पट्टियों पर कोई विशेष कला कृति अंकन के दर्शन नहीं होते हैं किन्तु अपने  निर्माण काल में अवश्य ही कला अंकन दृष्टिगोचर होता रहा होगा। 
छत लकड़ी के दासों (टोड़ी )  की सहायता से ताकतवर पट्टी पर टिकी  है और दास में उल्लेखनीय कला अंकन नहीं मिलता है।
यह तिबारी भी लगभग 1940 या बाद समय की ही लगती है।
तिबारी काष्ठ कलाकारों की अभी तक कोई सूचना नहीं मिल सकीय है।  लगता है लकड़ी कम टिकाऊ /ड्यूरेबल  की है। 
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सूचना व फोटो आभार - सतीश कुकरेती (कठूड़ )
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