Author Topic: Some Ideal Village of Uttarakhand - उत्तराखंड राज्य के आदर्श गाव!  (Read 22078 times)

Bhishma Kukreti

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कुठार (बिछला ढांगू ) में ठाकुर महेशा सिंह व विजय सिंह की तिबारी में काष्ठ अंकन कला

ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर काष्ठ अंकन कला -17
  Traditional House wood Carving Art of Gangasalan  (Dhanu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Llangur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -17
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  29
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  29 
( चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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    कुठार बिछला ढांगू का एक विशेष गाँव है।  गंगा घाटी में होने से कुठार गाँव व निकटवर्ती गांव हथनूड़ , दाबड़ , अमोळा , खंड , तैड़ी  आदि गाँव समान उर्बरक है।  व समृद्ध गाँवों में माना जाता था , कृषक बड़े परिश्रमी थे व कह सकते थे कि धन धान्य से परिपूर्ण थे व गाँव में घी दूध के गदन बहते थे।  अब अन्य गढ़वाली गावों जस ही पलायन की मार भुगत रहा है। 
     कभी गाँव में तिबारियां होना गाँव की समृद्धि की निशानी होती थीं।  कुठार (बिछला ढांगू ) में भी तिबारियाँ  थीं व अभी तक दो तिबारियों की सूचना मिल पायी हैं। ठाकुर महेश सिंह व विजय सिंह की तिबारी आलिशान  तिबारी कही जायेगी।  में काष्ठ अंकन उच्च कोटि का है। 
बिछला ढांगू कुठार के ठाकुर महेशा सिंह व विजय सिंह की तिबारी भी दक्षिण गढ़वाल की अन्य तिबारियों जैसे ही दुभित्या मकान के पहली मंजिल पर खुला बरामदा (बैठक )  है।  चार स्तम्भों से तीन  मोरी /द्वार, म्वार बनी हैं। 
   कुठार की इस कला के मामले में आलिशान तिबारी पर छज्जा पत्थरों  के दासों (टोड़ी ) पर टिका है और पाषाण दास कलयुक्त है कुछ कुछ घोड़े की मोणी (सिर ) की छवि भी प्रदान करते हैं।  छज्जे के ऊपर उप छज्जा है जिस पर स्तम्भों के आधार  चौकोर पाषाण हैं जिन पर स्तम्भ के काष्ठ टिके हैं।  किनारे के दो काष्ठ स्तम्भ (column ) दिवार से कलात्मक काष्ठ कड़ी के जरिये जुड़े हैं। 
       दीवार -स्तम्भ जोड़ती खड़ी कड़ी में ज्यामितीय व वानस्पतिक कलाएं अंकन हुआ है।  वानस्पतिक व ज्यामितीय कला संगम अनूठा है।   दिवार -स्तम्भ जोड़ती खड़ी कड़ी में ऊर्घ्वाकार कमल दल , नक्कासीदार डीलू (wood plate in between  two shafts of same column ) एवम  फर्न नुमा पत्ती /leaves  अंकन साफ़ झलकता है। 
स्तम्भ का आधार या कुम्भी अधोगामी पदम् दल (Downward lotus petals कला से निर्मित हुआ है  ) अधोगामी कमल दल के उद्गम पर ही डीलू (wood plate ) जहां से ऊपर की ओर ऊर्घ्वाकार (upward ) कमल दल भी शुरू होता है।  ऊर्घ्वाकार कमल दल के समाप्ति पर स्तम्भ की कलयुक्त कड़ी  /shaft शुरू होती है जो दो अन्य पुष्पनुमा डीलों पर समाप्त होती है (वास्तव में चिपकी ही है अलग नहीं  है ) , दो डीलों के बाद ऊर्घ्वाकार पद्म दल प्रारम्भ होता है जिसके समाप्ति से   स्तम्भ से चाप (arch )की शुरुवात होती  है। 
 कुठार (बिछला ढांगू ) के महेशा सिंह व विजय सिंह की तिबारी की एक विशेषता सामने आयी है कि आधार के कमल दल से ही तीन चीरे  (vertical edges ) शुरू होते हैं जो अंत में ऊपर arch मंडप /तोरण की तीन तह (layers of intrados  अंतश्चाप या अन्तः वक्र ) निर्माण करती हैं।  सभी स्तम्भों में एक जैसी कला व शैली मिलती है।
तोरण शानदार व तिपत्ती नुमा/ trefoil arch नुमा है जिस पर मध्य विन्दु में ogee arch द्विज्या का तीखापन है। मोरी / तोरण (arch ) पांच तहों से बना है व  सभी स्तम्भ से जुड़े हैं वाह्य तह /बहिश्चाप extrados / कुछ मोटा है व ऊपर horizontal क्षैतिज पट्टी से मिलता है।  इस  क्षैतिज पट्टी  के दोनों किनारे स्तम्भ दिवार जोड़ू कड़ी के किनारे से मिलती है।  प्रत्येक स्तम्भ जहां से चाप शुरू होता है से एक थांत नुमा प्लेन पट्टा ऊपर जाता है।  इस पट्टा व चाप के मध्य पुष्प आकृति कला अंकित हुयी है , पुष्प  चक्राकार भी है व एक स्थान में पुष्प चिड़िया जैसी छवि भी प्रदान करता है यह है कलाकार की कृति विशेषता।  एक स्थान पर पुष्प केंद्र भैंस के मुंह की छवि प्रदान भी करता है हो सकता है यह नजर न लगने हेतु कोई शगुन प्रतीक के रूप में प्रयोग किया होगा।
     स्तम्भों के  शीर्ष के ऊपर क्षितिज पट्टी के ऊपर एक चौड़ी पट्टा है जिसपर जालीनुमा (किन्तु बंद ) आकृति अंकित है।  जाली में दो जगह पुष्प आकृतियां भी अंकित हैं।  जाली पट्टिका के नीचे किसी देव प्रतिमा भी अंकित दीखती है।  जालीदार पट्टी छत आधार की पट्टी से जुड़ जाती है।  छत पट्टिका दासों (टोड़ियों )  पर टिके हैं।  एवं दास (टोड़ी ) के अग्र भाग में कलयुक्त कष्ट आकृति लटकी मिलती है।
  इस तरह कहा जा सकता है कि कुठार के महेशा सिंह - विजय सिंह की तिबारी में ज्यामितीय , प्राकृतिक (natural motifs पुष्प , पत्तियां )  , मानवीय (भैंस मुंह , पक्षी गला व चोंच ,   Figurative  motifs )  व दार्शनिक / आध्यात्मिक (देव प्रतिमा /deity image ) मिलते हैं। 
  एक बात सत्य है कि इस तिबारी के काष्ठ कला निर्माता ढांगू के तो न रहे होंगे क्योंकि ढांगू में यह कला कलाकारों ने कभी नहीं अपनायी यहां तक कि सौड़ -जसपुर जैसे कलकारयुक्त गाँवों ने भी इसकला को  निर्माण हेतु नहीं अपनाया। 
   कहा जा सकता है कि कुठार के ठाकुर महेशा सिंह व विजय सिंह की तिबारी ढांगू की कला छवि वृद्धि करने में सक्षम है।

Cसूचना व फोटो आभार - अभिलाष रियाल व कमल जखमोला व कुछ फोटो भाग वीरेंद्र असवाल
Copyright @ Bhishma Kukreti , 2020
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Bhishma Kukreti

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खमण (मल्ला ढांगू )  के खुशीराम लखेड़ा की जंगलादार निमदारी में काष्ठ कला

ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर काष्ठ अंकन कला -18
  Traditional House wood Carving/Tibari ,  Art of Gangasalan  (Dhanu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Llangur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -31
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  31

( चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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   खमण गाँव वास्तव में हिंवल नदी पार का गाँव है किन्तु डबरालस्यूं नहीं अपितु पट्टी मल्ला ढांगू अंतर्गत  आता है।   ढांगू पट्टी से करुंद पट्टी के रूप में अलग होने या करुंद से डबरालस्यूं  परिवर्तन के बाद भी खमण को डबरालस्यूं में नहीं रखा गया। इसका कारण है कि 1820  या उसके लगभग डबरालों ने खमण  को जसपुर के कुकरेतियों  (ग्वील संस्थापक बृषभ 'जी'  की मां जो डबराल थी  ) को दहेज में दे दिया था ) अतः जब ढांगू से करुंद पट्टी अलग हुयी या डबरालस्यूं बनी तब डाबरलों ने खमण को डबरालस्यूं में न लेने का फैसला किया होगा  (लोक कथा पर आधारित ) । 
  खमण में कुकरेती  जी नहींअपितु व लखेड़ा , पंत व जुगराण जाति के परिहार वास करते हैं।  मोक्षप्राप्त महंत इंदिरेश चरण दास का  श्रीधर कुकरेती के नाम से खमण में ही जन्म हुआ व लालन पोषण हुआ। 
 खमण में तिबारियां ही नहीं अपितु जंगलेदार निमदारी होने की सूचना मिली है धीरे धीरे सभी सूचना मिल जाने पर उन भवन कलाओं पर लिखा जायेगा।
    खमण में खुशिराम लखेड़ा की तिमंजली निमदारी एक समय खमण की छवि वर्धकों में से एक थी (landmark in Khaman ) .
खमण के खुशीराम  लखेड़ा की निमदारी तिभित्या (तीन भीत याने  तीन दीवाल या एक आगे व एक पीछे के कमरे ) कमरों वाली जंगलादार निमदारी है। पहले मंजिल (मंज्यूळ ) व दूसरे मंजिल  (तिपुर )  में ही काष्ठ स्तम्भ हैं जबकि तल मंजिल में कोई स्तम्भ नहीं है। 
ऊपरी दोनों मंजिलों  (मंज्यूळ व तिपुर )  में प्रत्येक मंजिल में दस काष्ठ स्तम्भ है व उनसे 9 खोली (रिक्त स्थान ) बनते हैं।  अग्र  भीत (दिवार ) व स्तम्भ के मध्य  छज्जे हैं।  पहली मंजिल का छज्जा पाषाण का है व पाषाण दासों (टोड़ी ) पर टिका है जबकि तिपुर  का छज्जा काष्ठ का है व लकड़ी के दासों (टोड़ी ) पर टिका है। दोनों मंजिलों के प्रत्येक काष्ठ स्तम्भ के तीन भाग है आधार भाग जो चौड़ा है व उसमे कला उत्कीर्ण हुयी है कुछ कुछ कमल दल जैसा ही।   फिर इस स्तम्भ आधार के बाद कड़ी  है (shaft of column ) शुरू होता है जो कलायुक्त कमल दल में समाप्त होता है व फिर से स्तम्भ का ऊपरी ब्लेड, wood plate  या डीला शुरु  होता है , डीले के बाद कमल दल आकृति उभरती दिखाई देती है। 
बाकी सभी लकड़ी में सभी जगह ज्यामितीय कला देखने को मिलती है।  कहीं भी मानवीय (figurative पशु , पक्षी , मनुष्य , तितली आदि ) कला ादेखने को नहीं मिलती है याने केवल वानस्पतिक (प्रकृति ) व ज्यामितीय कला ही खमण के खुशीराम लखेड़ा की निमदारी  में मिलते हैं
दोनों मंजिलों के दो स्तम्भ मध्य आधार पर एक डेढ़ फ़ीट ऊँचा काष्ठ जंगला  है। 
   छत का  आधार  काष्ठ  पट्टियां  हैं।   
 कहा जा सकता है कि खमण के खुशीराम लखेड़ा की तिमंजिला निमदारी तीन मंजिला होने के कारण क्षेत्र में  प्रसिद्ध हुयी है हाँ काष्ठ कला की दृष्टि से केवल स्तम्भों पर कला ही उभर कर आयी है।  संभवतया यह निमदारी सन 1947 -1955 मध्य निर्मित हुयी होगी।  स्थानीय ओड व बढियों ने ही निर्माण किया  किया होगा। 

सूचना व फोटो आभार - सुशील  कुकरेती (गुदड़ ) 
Copyright @ Bhishma Kukreti , 2020
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तैड़ी (बिछला ढांगू ) में सुरेश चंद्र व रमेश चंद्र रियाल की तिबारी में भवन काष्ठ कला

House Wood carving Art of Tibari of Suresh Chandra and  Ramesh Chandra Riyal of Tairi (Bichhala  Dhangu)
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर काष्ठ अंकन कला -19
  Traditional House wood Carving Art of South  West Lansdowne Tahsil   (Dhanu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Llangur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya  -19
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -32 
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya - 32

   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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 जैसा कि तैड़ी की लोक कला अध्याय में कहा गया है कि गंगा तट व व्यासचट्टी निकटस्थ  तैड़ी ढांगू में  उर्बरक गाँवों में से एक महत्वपूर्ण गांव   है । 
तैड़ी गांव  से अभी तक दो  तिबारियों की सूचना मिल पायी है। 
   कला दृष्टि से तैड़ी में सुरेश चंद्र -रमेश चंद्र रियाल की तिबारी की काष्ठ कला प्रशंसनीय है ।  मकान तिभित्या (तीन दीवाल का, याने एक कमरा आगे व एक कमरा पीछे ) है और तिबारी पहली मंजिल पर है व दो कमरों के बरामदे को दीवार  से नहीं ढकागया  है अपितु तिबारी निर्माण हुआ है (काष्ठ कार्य ) .
जैसे कि आम तिबारियों में होता है बल तिबारी में चार काष्ठ स्तम्भ हैं व ये चार काष्ठ स्तम्भ तीन  मोरी , खोळी /द्वार बनाते हैं।  तैड़ी में सुरेश चंद्र , रमेश चंद्र की तिबारी की विशेषता है कि स्तम्भ गोल नहीं अपितु  चौकोर (आयताकार )  हैं और यही आयताकार स्तम्भ कला तैड़ी में ही  अन्य तिबारी चक्रधर रियाल की तिबारी में भी पायी गयी है।
किनारे के दो स्तम्भ डी दीवार से कलयुक्त कड़ी से जुड़े हैं। दीवाल -स्तम्भ जोड़ु  कड़ी में बेल बूटे (वानस्पतिक बेल नुमा ) कला उभर कर आयी है।
  प्रत्येक स्तम्भ पाषाण के उप छज्जे पर टिके हैं आधार भी पाषाण के हैं।  स्तम्भों के काष्ठ आधार कुंभी (घट या तुमुड़ नुमा ) नुमा नहीं हैं ।  चौकोर स्तम्भ में चरों ओर वानस्पतिक कला /अलंकार (natural motifs ) निर्मित हुयी है।  स्तम्भ जब ऊपर शीर्ष पट्टी से मिलते हैं तो एक डेढ़ फ़ीट नीचे से स्तम्भ से मेहराब/arch /अर्धमंडल /तोरण  की पट्टी शुरू होती है. दोस तम्भो के मध्य  तोरण trefoil शैली में है। तोरण के बगल की पट्टियों  के किनारे चक्राकार फूल हैं याने कुल छः /6 चक्राकार फूल हैं। पुष्प  केंद्र में गणेश प्रतीक उतना उभरा नहीं है जितना अन्य तिबारियों में पाया गया है।  फूल के चारों ओर नयनाभिरामी वानस्पतिक चित्रकारी  (floral motif ) .   मेहराब। तोरण के शीर्ष पट्टिका/ यानी जो स्तम्भ शीर्ष की भी पट्टिका है  में भी वानस्पतिक चित्रकारी है। 
 छत काष्ठ पट्टिका  पर तिकी है व काष्ठ पट्टिका काष्ठ दासों (टोड़ी ) पर टिकी है।  दासों के मध्य पट्टिकाओं जो स्तम्भ शीर्ष या तोरण शीर्ष पट्टिकाओं से मिलते हैं में भी floral motifs /वानस्पतिक कला उकेरी गयी है।  तोरणों के trefoil से एक दो जगह काष्ठ आकृति लटक रही दीखती है जो आभाष तो चिड़िया की देती हैं।
चिड़िया आभाष को छोड़ दें तो कह सकते हैं बल तैड़ी में सुरेश चंद्र -रमेश चंद्र  रियाल की तिबारी में ज्यामितीय व प्राकृतिक चित्रकारी ( floral  and geometrical motifs ) व आध्यात्मिक प्रतीक की चित्रकारी हुयी है और   प्रशंसनीय है।
तिबारी संभवतया 1947 से पहले (1937 के करीब ) की लग रही है। 
भूतकाल में तैड़ी जैसे गंगा तटीय गाँव में मकान निर्माण मिस्त्री व जटिल कार्य के बढ़ई अधिकतर टिहरी गढ़वाल (गंगपुर्या ) से ही बुलाये जाते थे तो  संभवतया सुरेश चंद्र -रमेश चंद्र की तिबारी के कलाकार भी टिहरी गढ़वाल से ही भट्याये गए हों। 

सूचना व फोटो आभार - अभिलाष रियाल व कमल जखमोला
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Bhishma Kukreti

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तैड़ी (बिछला ढांगू )  में चक्रधर रियाल की तिबारी में भवन काष्ठ कला अंकन
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House wood Carving Art in Tibari of Chakradhar Riyal of Tairi (Bichhala Dhangu)
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर काष्ठ अंकन कला -20
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhanu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Llangur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -20
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  33
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  33

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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 तैड़ी (बिछला ढांगू ) में  पहले सुरेश चंद्र -रमेश चंद्र रियालों की  तिबारी की सूचना के बाद दूसरी तिबारी चक्रधर रियाल की तिबारी की सूचना मिली है।  तैड़ी के चक्रधर रियाल की तिबारी भी तिभित्या मकान (तीन दिव्वळ युक्त एक कमरा आगे व एक कमरा पीछे ) पर है व पहली मंजिल पर दो कमरों के मध्य दीवाल न होने तिबारी (बरामदा ) बनी है। 
तिबारी के चार स्तम्भ अन्य गाँवों की तिबारियों जैसे गोल न होकर चौकोर हैं जैसे तैड़ी  के ही चौकोर स्तम्भ सुरेश चंद्र रमेश चंद्र की तिबारी में हैं।  चारों स्तम्भ तीन मोरी , द्वार बनाते हैं।  किनारे के स्तम्भ  वा दीवार एक एक काष्ठ कड़ी के मार्फत जुड़े हैं । जोडु कड़ी में सुंदर लतायुक्त  (प्रकृति या वानस्पतिक कला अलंकरण /nature motifs )  अंकन हुआ है।
 काष्ठ स्तम्भ पाषाण के उप छज्जे के ऊपर चौकोर पत्थर के आधार पर ठीके हैं , अन्य गाँवों की तिबारियों भाँती तैड़ी के चक्रधर रियाल की तिबारी के स्तम्भ आधार में  घटी /घड़ा /तुमड़ी /नुमा आधार नहीं है अपितु केवल सामने  की और  अधोगामी कमल दल है (lotus petal ) . कमल दल के ऊपर पुष्प शरुवात  पर कोई  डीला (जैसे भर धोते वक्त सर पर रखा जाता जाता  है ) . कमल पुष्प दल के प्रारम्भ से
सीधे ऊपर स्तम्भ शीर्ष तक लता युक्त कलाकारी दिखाई देती है। स्तम्भ शीर्ष या मुण्डीर पर भी वानस्पतिक कलाकृति अंकित है।  मुण्डीर या चरों स्तम्भों के शीर्ष पट्टिका के ऊपर दो या तीन  पट्टिकायें हैं जो छत के काष्ठ आधार को जोड़ने वाली पट्टिका पर भी  पुष्पनुमा कला उत्कीर्ण है , ये पुष्प कलाकृति कुछ कुछ देवताओं का आभाष (perception only ) देते हैं  याने आध्यात्मिक कलाकृति भी है।  मुण्डीर (स्तम्भ शीर्ष ) में खिन खिन नजर हटाने के प्रतीक भी चिपकाएं हैं (आध्यात्मिक या दार्शनिक अलंकरण )
   तिबारी में कहीं भी  मानवीय (figurative motifs ) अलंकरण दिखाई नहीं देते  हैं।
कहा जा सकता है कि तैड़ी  )बिछला ढांगू ) के चक्रधर रियाल की तिबारी में ज्यामितीय , वानस्पतिक अलंकरण कला मिलती है और मानवीय (figurative motifs ) अलंकरण नहीं मिलती। 
तिबारी का निर्माण काल 1937 के बाद ही होना चाहिए व गंगपुर्या कलाकारों ने ही मकान व तिबारी निर्माण किया होगा जैसे कि व्यासचट्टी के निकटवर्ती गाँव वाले  सूचना देते हैं कि उनके मकान बनाने गंगपुर्या  या उत्तरी गढ़वाल से आते थे। 
सूचना व फोटो - अभिलाष रियाल व कमल जखमोला
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दाबड़ (बिछला ढांगू ) में कलम  सिंह राणा की तिबारी में भवन काष्ठ कला

House Wood Carving Art in Tibari of Badri Singh Rana from Dabur (Bichhla Dhangu, Pauri Garhwal )
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों पर काष्ठ अंकन कला -21
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  34
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  34

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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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दाबड़ गंगा तटीय  गाँव व ढांगू में उर्बरक , कृषि में समृद्ध गांव माना जाता रहा है और कर्मठ कृषकों का गाँव था।  आज दाबड़ पलायन की मार क झेल रहा है।  अब तक दो शानदार तिबारियों की सूचना मिली है।   
कलम  सिंह राणा कीकाष्ठ  तिबारी कलायुक्त ,  मेहराब युक्त है किन्तु इस काष्ठ तिबारी में ब्रैकेट नहीं हैं. दाबड़ में कलम   सिंह राणा  की तिबारी भी तिभित्या (तीन दीवार , एक कमरा आगे व एक कमरा पीछे ) मकान की पहली मंजिल पर दो कमरों केब्रांडे पर है।  दाबड़ में कलम  सिंह राणा की तिबारी में भी ढांगू की अन्य तिबारियों की भाँती चार स्तम्भ हैं जो तीन मोरी/ द्वार/ खोळी  बनाते हैं।   काष्ठ स्तम्भ पाषाण की देहरी /देळी  में चौकोर पाषाण आधार पर ठीके हैं , किनारे के स्तम्भ दीवार से एक वानस्पतिक कड़ी से जुड़े हैं व जोड़ू कड़ी में लता युक्त कला उत्कीर्ण हुयी है। स्तम्भ का आधार अधोगामी कमल पुष्प दल से बना कुम्भी /तुमड़ी /पथोड़ी नुमा आकृति है।  कमल दल ऊपर  डीले (round wood plate, सर में भार धोने हेतु कपड़ा या अन्य  से बना डीलू आकृति  ) से निकलते हैं।  डीले के ऊपर ऊर्घ्वगामी कमल पुष्प दल  निकलता है जो फिर शाफ़्ट में बदल जाता है व शाफ़्ट  गोलाई कम  होती जाती है।  फिर दो डीलों की आकृति के बाद वुड प्लेट या थांत का चौड़ा भाग शुरू होता जहाँ से मेहराब की चाप शुरू होती है।  स्तम्भ के शाफ़्ट /कड़ी के दो डीलों  के ऊपर के थांत (flat wood plate ) में भी बेल बूटे व पत्तियों की आकृतियां उत्कीर्ण हुयी है। 
 मेहराब तिपत्ति trefoil नुमा है व बीच की चाओ ogee arch जैसी है।  चाप के बाह्य extra-dos plate में भी वानस्पतिक कला   अंकित हुयी है व  मेहराब चाप के बाहर की प्लेट में किनारे  पर एक एक चक्राकार  (mandana design )  फूल गुदे हैं , याने ऐसे कुल छ /6 पुष्प गुदे हैं।  मेहराब व स्तम्भ के शीर्ष पट्टी जो छत से मिलती है उस आयताकार कड़ी या पट्टी (मुण्डीर ) में भी प्राक्रितिक कला उत्कीर्ण हुआ है।  इस कड़ी में तीन नजर न लगे के प्रतीक आकृति लगी हैं याने कुल तीन आकृति।
   क विश्लेषण से साफ़ पता चलता है कि काष्ठ तिबारी में प्राकृतिक (natural motif ) व ज्यामितीय (geometrical motif ) कला अलंकरण हुआ है और मानवीय (figurative ) कला अलंकरण नहीं हुआ है
  दाबड़ की इस तिबारी 1947 से पहले की लगती है व 1930 के पश्चात की।  तिबारी व मकान कलाकारों की कोई सूचना नहीं मिल पायी है।  यह सत्य है बल  अधिकतर गंगा तटीय बिछला ढांगू की तिबारी निर्माण कलाकार टिहरी  गढ़वाल से आते थे। 
दाबड़ में कलम  सिंह राणा की तिबारी आज भी भव्य  तिबारी लगती है व कलापूर्ण मेहराब युक्त तिबारी है।   
सूचना व फोटो आभार : ममता राणा (दाबड़ ) व  सत्य प्रसाद बड़थ्वाल (खंड )
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दाबड़ (बिछला ढांगू )में बद्री सिंह राणा की तिबारी में काष्ठ कला

ढांगू , डबरालस्यूं , उदयपुर, अजमेर , लंगूर , शीला गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों  पर काष्ठ अंकन कला -22
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   22
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  35
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  35

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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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कभी जनता तटीय गाँव दाबड़ कृषि में समृद्ध गाँव खुशाली थी तो मकान निर्माण में भी समृद्धि दिखती थी।  ऐसी ही एक तिबारी है दाबड़ के बद्री  सिंह राणा की। तिबारी अब जीर्ण शीर्ण अवस्था में जाने वाली है किन्तु काष्ठ कला बताती है कि तिबारी ढांगू की तिबारियों में उच्च कला युक्त तिबारी कही जाएगी।
    बद्री सिंह राणा की उच्च कोटि की काष्ठ कला युक्त तिबारी तिभित्या मकान (तीन भीत /दीवाल याने एक कमरा बाहर व एक अंदर ) की पहली मंजिल पर दो कमरों के बरामदा  के बाहर बनी है।  तिबारी पत्थर  की देहरी (उप छज्जा ) पर टिकी है।  तिबारी में चार काष्ठ स्तम्भ/ खाम  हैं जो देहरी के ऊपर चार चौकोर  पत्थर के डळे पर स्थित हैं।  किनारे के स्तम्भ दीवार से नक्कासीदार कड़ी से जुड़े हैं।  जोड़ू कड़ी पर ज्यामितीय व वनस्पतिक मिश्रित शानदार नक्कासी है यद्यपि वनस्पति का केवल आभास होता है। 
    स्तम्भ एक आधार याने कुम्भी /तुमड़ी /पथ्वाड़  अधोगामी पदम् पुष्प दल (Downward  Lotus Petals ) से बना है।  स्रम्भ के कुम्भी याने अधोगामी कमल पुष्प के ऊपरी भाग में गोल डीला (wood Plates ring ) है।  डीले के ऊपर से उर्घ्वगामी  कमल पुष्प दल (upward lotus flower ) शुरू होता है और दलान्त के ऊपर से स्तम्भ के मोटाई/गोलाई  कम  होती जाती है।  इस कड़ी (shaft of Column ) पर भी वानस्पतिक नक्कासी हुयी है।  कड़ी  के ऊपरी भाग में उलटा कमल दल है और जिसके ऊपर फिर से डीला है।  डीला (गोलाई में काष्ठ कृति )   से उर्घ्वगामी कमल दल दीखता है व यहीं से  तिबारी चाप  (arch ) या trefoil /तिपत्ती मेहराब भी शुरू होती है। कड़ी एक बड़े चौड़े थांत (bat ) शक्ल में बदल जाता है  एवं ऊपर मुण्डीर /शीर्ष  से मिलता है।  थांत पर एक नकसी युक्त ब्रैकेट जुड़ा है। ब्रैकेट में वानस्पतिक व मानवीय छवि लिए कलाकारी है एक तरफ पक्षी आभाष भी मिलता है (perceptional art ). ब्रैकेट के ऊपरी भाग में लकड़ी का cross नुमा आकृति भी बिठाई गयी है।  मुण्डीर छत के छज्जे से जुडी है। चारों  स्तम्भों  में कला एक जैसी है। 
   चाप  तिपत्ती नुमा है।  चाप के बाहर की पट्टी  में किनारे पर चक्राकार पुष्प सुशोभित हैं।  मेहराब की चापें ऊपर मुण्डीर पट्टी से मिलती हैं।  शीर्ष /मुण्डीर पर नकासी हुयी है  मध्य में नजर न लगे का प्रतीकात्मक चिन्ह जुड़े हैं।
   कला की दृष्टि से दाबड़  में  बद्री सिंह राणा की तिबारी उच्च स्तर की कही जायेगी  .  तिबारी में  पशु अंकित नहीं   हैं।   वानस्पतिक व ज्यामितीय कला का उत्कृष्ट नमूना है बद्री सिंह राणा की तिबारी में काष्ठ  कला। 
सूचना व फोटो आभार : ममता राणा व सत्यप्रसाद बड़थ्वाल
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  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dabur, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udyapur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला 

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झैड़  (तल्ला  ढांगू ) में दया नंद मैठाणी , सच्चिदा नंद मैठाणी  व शम्भु प्रसाद मैठाणी  की तिबारी प्रवेश (खोळी ) द्वार पर काष्ठ कला
 Door wood Carving Art of House of Daya Nand Maithani, Sacchida nand Mithani and Shambhu Prasad  Maithani of  Jhair Talla Dhangu
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों  पर काष्ठ अंकन कला -23
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   23
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  36
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  36
( चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी शब्द नहीं जोड़े गए है )   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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जैसा कि पिछले अध्यायों में बताया गया है कि झैड़ में  चार पांच तिबारियां थीं और अब एक भी नहीं बचीं हैं क्योंकि  गढ़वाल में जगह की कमी नहीं किन्तु  मकान के लिए चट्टान के ऊपर जमीन होना व प्रकाशयुक्त होना अवहसिक है अतः शुरू से ही मकान हेतु स्थल की भारी कमी रही है।  जिनके तिबारी वाले मकान थे उनके लिए तिबारी बचाना कठिन है अतः तिबारियों की जगह आधुनिक शैली के मकान बन रहे हैं। 
 झैड़  में  दया नंद मैठाणी , सच्चिदा नंद मैठाणी  व शम्भु प्रसाद मैठाणी     की शानदार  तिबारी का भी यही हाल है  उनके   उत्तराधिकारियों ने पहली मंजिल में तिबारी की जगह  आधुनिक भवन बना दिया है।  तल मंजिल में तिबारी प्रवेश द्वार या खोळी  बची है जिसपर काष्ठ कला का खूबसूरत नमूना  विद्यमान है। 
    खोळी याने तल मंजिल से पहले मंजिल जाने का भीतर ही भीतर आने का प्रवेश द्वार।  दया नंद मैठाणी , सच्चिदा नंद मैठाणी  व शम्भु प्रसाद मैठाणी   की  तिबारी की खोळी में दो स्तम्भ (सिंगाड़ ) हैं जो के एक कड़ी से दीवार से जुड़े हैं।  दिवार जोड़ु काष्ठ कड़ी पर ज्यामितीय व वानस्पतिक मिश्रित (geometrical and natural motif  ) अलंकृत कला के दर्शन होते हैं।  वानस्पतिक अलंकरण में लता व पत्ती आभास होता है।
   सिंगाड़ /स्तम्भ /खम्बा  पाषाण चौकी पर टिके हैं।   

 हैं।  पाषाण चौकी से स्तम्भ का  आधार जो ऊपरी स्तम्भ के मुकाबले चौड़ा व उभार लिए है में भी कलाकृति उत्कीर्ण है।  फिर दोनों स्तम्भ /सिंगाड़ ऊपर  आयाताकार मुरिन्ड ( शीर्ष पट्टिका  ) से मिल जाते हैं।  सिंगाड़ शाफ्ट पर ज्यामितीय व floral अलंकरण उत्कीर्ण हुआ है। सिंगाड़  शीर्ष  से कुछ नीचे से प्रत्येक सिंगाड़ से तोरण/ चाप /arch   शुरू होता है.  तोरण तिपत्ति नुमा है केवल मध्य में arch या चाप ogee type arch है।
 तोरण के बाह्य पट्टिका पर पुष्प अलंकरण कला के दर्शन होते हैं।  तोरण के उप्पर मुण्डीर है व फिर ऊपर आयताकार शीर्ष पट्टिका है।  मुण्डीर के मध्य में बहुभुजी गणेश उत्कीर्ण हुआ है (मानवीय अलंकरण या figurative motifs ) .  मुण्डीर पट्टिका व शीर्षस्थ पट्टिका दोनों में लता , पुष्प व ज्यामितीय अलंकरण हुआ है। कला की दृष्टि से पूरा  प्रवेश  द्वार उतकृष्ट उदाहरण  है। 
  प्रवेश द्वार की काष्ट कला से  अनुमान लगाना सरल है कि श्याम लाल मैथानी की तिबारी में भी कला उत्कृष्ट रही होगी। दरवाजे पर कोई कलाकृति नहीं उकेरी गयी है। 
  तिबारी लगभग 1940  से पहले की ही रही होगी व तिबारी (दो कमरों से बना बरामदा के काष्ठ द्वार ) कलाकार टिहरी गढ़वाल या उत्तरकाशी के ही रहे होंगे। 


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  सूचना व फोटो आभार : पवन कुमार मैठाणी , झैड़ 
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चुब्यानी ( मल्ला उदयपुर ) में  जितार सिंह बिष्ट व रघुबीर बिष्ट की    जंगलादार   निमदारी  में   काष्ठ कला


चुब्यानी  संदर्भ में उदयपुर  गढ़वाल , हिमालय  की निमदारियों व तिबारियों पर भवन काष्ठ अंकन कला - 3
  Traditional House wood Carving Art of Udayapur  , Garhwal, Himalaya   3 
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी , निमदारी ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )/ लोक कला  - 30
Traditional House Wood Carving Art (Tibari, Nimdari ) of Udaypur, Dhangu, Langur, Dabralsyun , Ajmer  Uttarakhand , Himalaya -30   
 
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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चुब्यानी मल्ला उदयपुर पट्टी का एक समृद्ध नामी गाँव माना  जाता रहा है।   चुब्यानी गाँव  मुख्यतया चमोला बिष्टों का गाँव है जहाँ कुछ चौहान परिवार भी वास  करते थे।  कभी 40 परिवार वास करते थे।   अब पलायन से सब कुछ खाली । 
 चुब्यानी   के जितार सिंह बिष्ट व रघुवीर सिंह बिष्ट भाईयों ने सन 1955 में 12 कमरों का जंगलेदार मकान निर्मित किया था।  स्थानीय मिस्त्रियों की कला अभी भी दर्शनीय है।  सन 1992 केभ्यूंचळ याने  भूकंप में मकान ढह गया था तब  द्यूराण -जिठाण  राजेश्वरी देवी बिष्ट व स्व . सतेश्वरी बिष्ट ने पुनः निर्माण करवाया।  प्रसन्नता की बात है  कि जितार सिंह व रघुबीर सिंह बिष्ट के प्रवासी पोते मकान की जीर्णोद्धार  व देखभाल कर मकान को संभाले हुए हैं। 
   चुब्यानी  में जितार -रघुबीर की   निमदारी या जंगलेदार  मकान  में 6 कमरे नीचे तल मंजिल पर व 6 कमरे पहली मंजिल पर हैं।  ऊपरी मंजिल या पहली मंजिल में जंगला है।छत आज टिन की है।    जंगले  में कुल  9 स्तम्भ है व 8 खोली या मोरी हैं।   एक खोली में ऊपर आने का  द्वार है जो सीढ़ियों से भूतल से जुड़ा है।
             चुब्यानी  के जितार -रघुबीर बिष्ट के जंगल के स्तम्भ थांत या क्रिकेट बैटनुमा स्तम्भ हैं (ब्लेड नीचे हत्था ऊपर ) किन्तु हत्था याने ऊपरी भाग ब्लेड से लम्बे  है।  स्तम्भ ब्लेड के ऊपर कड़ी है और फिर ब्लेड जो छत की काष्ठ छज्जे से मिलते हैं।  सत्मव्ह के नीचे की ब्लेड के दोनों ओर  से wood plate  जुड़े हैं।  स्तम्भ जहां पर नीचे की ब्लेड समाप्त होती है उसी ऊंचाई पर जंगल हैं याने कुल  8 जंगल। 
 कला दृष्टि से इस भवन पर केवल  ज्यामितीय कला ही दृष्टिगोचर होती है।  हाँ इसमें कोई शक नहीं बल बनावट व शैली से मकान भव्य रहा है।
कहा जा सकता है कि   चुब्यानी  में जितार बिष्ट -रघुबीर बिष्ट बंधुओं की निमदारी भले ही काष्ठ कला में अग्रणी न हो किन्तु निर्माण बनावट व शैली व ज्यामितीय कला की दृष्टि से प्रशंसनीय है।  सन  1947 के बाद ऐसे ही जंगलेदार मकानों का रिवाज पश्चिम दक्षिण गढ़वाल (उदयपुर , ढांगू , अजमेर ,डबरालस्यूं , लंगूर , शीला ) में आया था।  इसी श्रृंखला में मित्रग्राम के  दो , गुदुड़ के एक जंगलेदार मकान की चर्चा पहले ही की जा चुकी है और 1947 -1955 के समय हिसाब से  चुब्यानी  में जितार बिष्ट -रघुबीर बिष्ट बंधुओं की निमदारी भव्य  कही गयी होगी।   


सूचना व फोटो आभार - विक्रम सिंह बिष्ट , चुब्यानी

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 कुमार्था (उदयपुर ) में इंद्र सिंह भंडारी की तिबारी /निमदारी  में काष्ठ कला -1
 
उदयपुर पट्टी संदर्भ में लैंसडाउन , दक्षिण गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों  पर काष्ठ अंकन कला -4
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  37
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  37

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 संकलन - भीष्म कुकरेती

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मोहनचट्टी याने शिवपुरी के निकट कुमार्था  गाँव से  दो तिबारी व दो  निमदारी  की सूचना वीरेंद्र सिंह असवाल के जरिये मिली।
कुमार्था   गाँव कभी कृषि समृद्ध गाँव था किन्तु अब पलायन के मार झेल रहा है और पुस्तैनी भवन या तो उजड़ रहे हैं या उनको उजाड़ कर नए  आधुनिक शैली के मकान बन रहे हैं। 
इंद्र सिंह भंडारी की इस तिबारी में दो प्रकार की काष्ठ कृति दिखाई देती है।  एक तो परम्परागत बिन तोरण  (arch / मेहराब /चौखट की तिबारी जैसे साइकलवाड़ी में दिनेश कंडवाल बंधुओं की तिबारी . चार चौकोर स्तम्भों से तीन चौकोर मोरी बनी हैं।    कुमार्था के इंद्र सिंह भंडारीकी इस  इस तिबारी के बाहर जंगला  है जो बहुत कम उदयपुर, ढांगू , लंगूर , अजमेर , डबराल स्यूं में देखा गया है।
तिबारी के स्तम्भ सीधे व चौकोर  हैं इन पर आधार में ही पुष्प नुमा आकृति उत्कीर्ण हुयी है बाकी ज्यामितीय कला ही दिखती है।  चारों  स्तम्भ के शीर्ष /मुण्डीर में एक एक ऊपर  पट्टियां  हैं जिनमे वानस्पतिक कला कृति उत्कीर्ण हैं।    चारों स्तम्भ अब बंद दरवाजों से ढके हैं याने तिबारी बंद कर दी गयी है।
 भंडारी की  तिबारी के बाहर छज्जे में जंगला  बंधा है। जंगले  पर सात से अधिक  स्तम्भ है और प्रत्येक  स्तम्भ पर एक तोरण है।  बाकी कलाकृति के हिसाब से जंगले  में कोई विशेष विशेषता नहीं है। 
इंद्र सिंह भंडारीकी इस तिबारी की विशेषता है कि तिबारी के बाहर काष्ठ जंगला  है और बाहर जंगलों में तोरण कला के दर्शन होते हैं।
 
 
सूचना व फोटो आभार : वीरेंद्र असवाल
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कुमार्था (उदयपुर ) में  भंडारी मुंडीत  की  तिबारी /निमदारी  में काष्ठ कला -2 

Tibari Wood Carving Art of Kumartha Village (Yamkeshwar Block) -2
 उदयपुर पट्टी संदर्भ में लैंसडाउन , दक्षिण गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों  पर काष्ठ अंकन कला -5
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
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  उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  38
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  38

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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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  वीरेंद्र असवाल ने कुमार्था (उदयपुर ) गाँव से कई तिबारी व निमदारियों की सूचना व फोटो प्रेषित किये हैं।  उन्हें शत शत धन्यवाद।  इसी क्रम में  भंडारी मुंडीत का एक ऐसे मकान की सूचना मिली है जिमसे एक भाग में केवल बिन तोरण चौखट तिबारी है तो  दूसरे  भाग में पहली मंजिल पर काष्ठ  जंगला  है। 
   जंगला सह , तिबारी  का विश्लेषण कुमार्था  की तिबारी भाग - 1 में  इंद्र सिंह भंडारी की तिबारी शीर्षक से हो चुका   है। 
       भंडारी मुंडीत  की  इस चौखट याने चार स्तम्भ किन्तु तोरण विहीन तिबारी की समानता साइकलवाड़ी  के दिनेश कंडवाल की तिबारी (लोक कला भाग 16 ) से की जा सकती है।
 कुमार्था  के भंडारी मुंडीत के इस  भाग  की विशेषता है कि पत्थर के छज्जे S  नुमा पाषाण  दासों (टोड़ी ) पर नहीं ठीके हैं अपितु चुका फ्लैट आयातकार पाषाण आकृति पर ठीके हैं।  मकान के बाकी छज्जे 'S'  नुमा पाषाण दासों पर टिके हैं।  तिबारी के चार स्तम्भ तीन चौकोर द्वार /मोरी /खोळी बनाते हैं। 
  स्तम्भों के ऊपर भी चौकोर स्लीपर /पट्टी हैं याने कोई तोरण या मेहराब/arch  नहीं है।  स्तम्भ शीर्ष  पट्टी के ऊपर छत के पट्टी मिलती है।  छत की पट्टी लकड़ी के दासों पर टिकी  है।
  तिबारी का प्रत्येक स्तम्भ  पत्थर के आधार पर टिका है।  आम तिबारियों जैसे इस तिबारी के स्तम्भ आधार गोल न होकर चौकोर हैं व स्तम्भ आधार में अधोगामी कमल दल न होकर साधारण वानस्पतिक कला से उत्कीर्णित हैं।   आधार से लेकर शीर्ष तक स्तम्भ/ सिंगाड़  में ना ही कोई विशेष अंकित कला के दर्शन होते हैं ना ही शीर्ष पट्टिका या मुंडीर पर कोई विशेष कला दृष्टिगोचर होती है। 
 कहा जा सकता है कि भंडारी मुंडीत की  यह तिबारी  कला दृष्टि से आम साधारण तिबारी की कोटि में ही गिनी जाएगी। 
 तिबारी के  आगे मकान के दूसरे छोर पर पहली मंजिल पर 12 स्तम्भों /खम्बों से अधिक का काष्ठ जंगला  है।  जंगला संरचना बताता है कि कभी यह जंगला भव्य रहा होगा।   

     

सूचना व फोटो आभार : वीरेंद्र असवाल
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