Author Topic: Some Ideal Village of Uttarakhand - उत्तराखंड राज्य के आदर्श गाव!  (Read 21563 times)

Bhishma Kukreti

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ग्वील  (ढांगू ) में सदा नंद कुकरेती (मुखत्यार जी ) की तिबारी में काष्ठ कला

ग्वील (ढांगू )  में तिबारी , निमदारी , जंगलेदार मकान या डंड्यळ  में काष्ठ कला - 1
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 24
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -
  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  48
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  48 
(लेख अन्य पुरुष में  होने से  जी आदि  उपयोग नहीं किये गए हैं ) 
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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  ग्वील से  अब तक तीन तिबारियों , एक जंगलादार मकान व क्वाठा भितर तिबारी  की सूचना प्राप्त हुयी है। 
   ग्वील मल्ला  ढांगू  में ही नहीं उदयपुर , डबरालस्यूं व अन्य पट्टियों  में प्रसिद्ध गाँव है।  पणचर जमीन होने से उर्बरक गाँव तो है ही साथ ही एक समय सन 1960  से पहले ग्वील इस क्षेत्र में सबसे अधिक पढ़ा लिखा गाँव था (अब भी ) ।      ग्वील  पधानु   हेतु भी प्रसिद्ध गाँव है।  ग्वील पधान के एक  मुख्तियार भी थे जिनका नाम सदा नंद कुकरेती था किन्तु मुखत्यार नाम से अधिक प्रसिद्ध थे  . कहते हैं  पधान से अधिक रौब दाब मुखत्यार का था।  मुख्तयार  याने चीफ एक्जीक्यूटिव ओफिसर (CEO ) .  मुखत्यार  अपनी पधानचरी गाँवों में घोड़े पर जाते थे।  रेबदार सलवार , कोट  उनकी पहचान थी। 
    सदा नंद कुकरेती ने तिबारी भी निर्मित की थी और वह तिबारी भव्य किस्म में ही गिनी जायेगी .  हाँ   सदा नंद कुकरेती उर्फ़ ' मुखत्यार  जी 'की  तिबारी से अधिक भव्य तिबारी क्वाठा भितर (किला ) ही था।  मकान तिभित्या  याने  वाला याने एक कमरा बाहर व एक अंदर है
     सदा नंद कुकरेती की तिबारी मकान के पहले मंजिल में है व छज्जे के ऊपर देहरी पर टिकी है।  तिबारी में चार काष्ठ सिंगाड़ /स्तम्भ /column है व किनारे के स्तम्भ दीवार से एक काष्ठ कड़ी से जुड़े हैं , दीवार व स्रम्भ जोड़ू कड़ी में भी नक्कासी है। जोड़ू कड़ी  के आधार में कुम्भी /पथ्वाड़  है व फिर कड़ी में ऊपर की ओर वानस्पतिक व जाली दार या ज्यामितीय अलंकरण है। कड़ी ऊपर छत के नीचे की पट्टी याने मुरिन्ड  से मिल जाती है।
   प्रत्येक काष्ठ स्तम्भ  के आधार  पर कुम्भी है व एक अधोगामी पदम् पुष्प दल से बना है।  अधोगामी पद्म  पुष्प दल आधार के ऊपर डीला या धगुल याने round wood plate है।  डीले या धगुल से उर्घ्वगामी पद्म पुष्प शुरू होता है और कमल दल से जड़ से फिर सिंगाड़ का नक्कासी दार शाफ़्ट शुरू होता है जो छोटे कमल दल पर समाप्त होता है। कमल दल के बाद डीला या धगुल आकृति (wood plate ) है फिर उर्घ्वगामी कमल दल है। कमल दल की पंखुड़ियों के ऊपर डीला /धगुल  है  जहां से चाप /मेहराब /arch का अर्ध मंडल शुरू होता है व दूसरे स्तम्भ के अर्ध चाप के साथ मिलकर  मेहराब /arch  बनाता है।  मेहराब की चाप तिपत्ती नुमा है केवल केंद्र में यह चाप नुकीली है।  किनारे के मेहराब के बाह्य प्लेट /पट्टी पर किनारे पर फूल उत्कीर्णित  हैं याने तिबारी में कुल चार  फूल उत्कीर्णित हैं।  मध्य मेहराब चाप के बाहर किनारों पर एक एक फूल है किन्तु अंदर मानवाकृति है जो शायद नजर हटाने वाला कोई आध्यांत्मिक प्रतीक चिन्ह होगा।  मेहराब के ऊपर चौखाना वाला मुण्डीर है याने शीर्ष है और कोई कला दर्शन इस पट्टिका पर नहीं होते हैं सपाट मुण्डीर याने  सपाट  शीर्ष।
   ग्वील में सदा नंद कुकरेती की इस तिबारी का निर्माण काल 1925 से ऊपर या लगभग ही होना चाहिए जब मुखत्यार जवान रहे होंगे।  काष्ठ कलाकार स्थानीय थे या नहीं इस पर कोई सूचना  नहीं मिल पायी है।यह  तय है कि  सदा नंद कुकरेती 'मुखत्यार जी ' की तिबारी  क्वाठा भितर  के कहीं बाद में निर्मित हुआ होगा। 
ग्वील में सदा नंद कुकरेती 'मुखत्यार जी ' की तिबारी की विशेषता है कि इस तिबारी में प्राकृतिक , मानवीय (आधात्मिक रूप लिए ) व ज्यामितीय तीनों अलंकरण मिलते हैं। 

सूचना व फोटो आभार : राकेश कुकरेती , ग्वील
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  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला , Tibari  Wood Carving Art  Gweel, Dhangu Garhwal

Bhishma Kukreti

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बुरांसी (लंगूर )  के अर्जुनदेव डोबरियाल के भवन की लौह लोक कला

लंगूर,   गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  men  अंकन कला -2 
House Wood  Carving  Art of  Langur Patti  -2 
Traditional House Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
पश्चिम लैंसडाउन तहसील /गंगा सलाण (ढांगू , उदयपुर, डबराल स्यूं , अजमेर , लंगूर , शीला ) गढ़वाल  हिमालय में  तिबारी , निम दारी भवन  कला  व लोक कलाएं
-गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   )  अंकन लोक कला ( विशेष -तिबारी अंकन )  - 49
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -  49
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संकलन - भीष्म कुकरेती

    लंगूर गढ़ी या भैरव गढ़ी एक ऐतिहासिक स्थल है जहां गोरखा सेना को बारह साल तक गढ़वाली प्रजा से युद्ध से जूझना पड़ा।  इसी गढ़ी के निकटवर्ती गाँव है बुराँसी।  बुराँसी , प्राचीन ढाकर मार्ग (डाडा मंडी - बांघाट ) में द्वारीखाल , रजकिल , बरसुडी के निकट का गांव है।  रजकिल की भाँती इस गाँव में डोबरियाल बहु संख्या में हैं।  व बुरांसी रजकिल पंचायत का ही भाग है।  बुरांसी  का सीधा सीधा अर्थ है जहां बुरांश अधिक हों याने ऊंचाई वाला गाँव। 
  पलायन एक चिंतन के टीम सदस्य दिनेश कंडवाल, मुकेश बहुगुणा व मनोज इस्तवाल ने अर्जुन देव डोबरियाल के निमदारी  की सूचना भेजी , बुराँसी के अर्जुन देव डोबरियाल की निमदारी में काष्ठ जंगला  नहीं अपितु पहले मंजिल पर लौह जंगला  है और बारीक स्तम्भ /छड़ी भी लौह के हैं ,  मुकेश बहुगुणा ने सूचना दी कि  अर्जुन देव डोबरियाल  की निमदारी  का निर्माण 1936  में हुआ था व कुल  रु 200   में लौह जंगला  तैयार हुआ था।  जंगले  की विशेषता है कि  बिन जोड़ के यह जंगला  है (मुकेश बहुगुणा की सूचना )
   अर्जुन देव डोबरियाल की  निम दारी  की एक अन्य  विशेषता है कि 12 घरों का बड़ा मकान है और आज भी पक्का है याने बास्तु कला में ड्यूरेबिलिटी का नमूना है।
  अर्जुन देव डोबरियाल की इस निमदारी की बड़ी विशेषता है कि  लौह जंगले  का निर्माण स्थानीय कलाकारों /मिस्त्रियों ने किया।  अतः   अर्जुन देव डोबरियाल की निमदारी   गंगा सलाण  की लोक कला का अभिनव नमूना है।  निमदारी मेके जंगल में लौह के छः छड़ियाँ व छः जालीदार भाग हैं /
   पुरातन शैली का यह एक नमूना है।  लैंसडाउन तहसील के इस ऐतिहासिक जंगले के बारे में अन्य जरूरी सूचनाओं का डॉक्युमेंटेसन आवश्यक है
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सूचना व फोटो आभार :  दिनेश कंडवाल , मुकेश बहुगुणा , मनोज इष्टवाल                                       
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Bhishma Kukreti

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दिवागी ( उदयपुर ) में सोहन सिंह बिष्ट की निमदारी  में  भवन काष्ठ कला -अलंकरण
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साइकलवाड़ी /दिवांगी  में भवन काष्ठ कला /अलंकरण -2

उदयपुर  संदर्भ में गढ़वाल  , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर भवन काष्ठ अंकन कला - 9
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
 दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल ,स्यूं  अजमेर , , लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार भवन   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( अलंकरण motifs )  -  50
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya - 
 
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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    दिवागी /साइकलवाड़ी वास्तव  में  किमसार (उदयपुर पट्टी , दक्दषिण  पश्चिम गढ़वाल  ) के ही भाग हैं।  साइकलवाड़ी /दिवागी से जण द्वीएक तिबारी व निम दारी की सूचनाएं मिली हैं व फोटो आनी बाकी है।  अभी दिवागी (साइकलवाड़ी ) के  सोहन बिष्ट की निम दारी  की सूचना फोटो सहित हरीश कंडवाल ने भेजी है। 
दिवागी के सोहन सिंह बिष्ट की  निमदारी  कला दृष्टि से नहीं अपितु बृहद भवन आकर की दृष्टि से भव्य है और अपने क्षेत्र में उच्च श्रेणी  में रखी  जाती रही है।  भवन में पहली मंजिल में काष्ठ जंगला कसा  गया है जिसमे 12 कमरे से अधिक।   भवन तिभित्या   अंदर व एक कमरा  बाहर  शैली में है। 
ऊपरी मंजिल के सभी कर्मों को बांधे  काष्ठ जंगला है।     काष्ठ जंगल  तीन ओर से बंधा हुआ व  पूरी जंगले  में 19 से अधिक काष्ठ स्तम्भ है व फिर आधार पर दो फिट के ऊपर रेलिंग है।  जंगले का आधार थांत पट्टी नुमा याने  bat blade  नुमा है व फिर सीधे  ऊपर छत से शीर्ष /मुण्डीर है।  स्तम्भ की पट्टी सपाट है याने कोई   मानवीय व प्राकृतिक अलंकरण दृष्टिगोचर नहीं होते है।  केवल ज्यामितीय कला के दर्शन होते हैं। 
   ऐसी जंगले दार निम दारी  निर्माण का समय 1970  से पहले ही रहा है।  उदयपुर  ढांगू , शीला में 1970  के बाद मैदानी भवनों की शैली आने लगी थी।
  सोहन सिंह बिष्ट की निम दारी   प्राकृतिक व मानवीय अलंकरण हेतु  नहीं याद की जाएगी बृहद आकर हेतु याद की जाएगी व एक समय क्या आज भी सोहन सिंह बिष्ट की निमदारी  दिवागी व साइकलवाड़ी को बृहद बड़ी निम दारी हेतु पहचान (Recognition ) दिलाने में सक्षम है। 

सूचना व फोटो आभार : हरीश   कंडवाल साइकलवाड़ी
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संसोधित गटकोट  (मल्ला ढांगू ) की लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकार

संसोधन में कमल जखमोला की महत्वपूर्ण भूमिका है
ढांगू संदर्भ में गढ़वाल की लोक  कलाएं व भूले बिसरे कलाकार श्रृंखला  - 5
(चूँकि आलेख अन्य पुरुष में है तो श्रीमती , श्री व जी अपरिहार्य नहीं है )
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संकलन - भीष्म कुकरेती
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गटकोट मल्ला  ढांगू का एक महत्वपूर्ण ही नहीं प्राचीन गाँव है. गटकोट के बारे में कमल जखमोला गटकोट  को खस समय का वसा गाँव बताते हैं।
गटकोट के दक्षिण  में मंडळु गदन , पश्चिम में हिंवल नदी तो पूर्व में घणसाळी , जल्ली , व उत्तर में मित्रग्राम, पंयाखेत  गाँव हैं. गटकोट की जमीन मंडुळ पार गुदड़ में भी है।   
अन्य गढ़वाल क्षेत्र की भाँति (बाबुलकर द्वारा विभाजित  ) गटकोट   में भी निम्न कलाएं व शिल्प बीसवीं सदी अंत तक विद्यमान थे. अब अंतर् आता दिख रहा है। 
   अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ
   ब -   शरीर अंकन व अलंकरण कलाएं व शिल्प   
 स -फुटकर। कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि
   द  - जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें
                 अ - संस्कृति संस्कारों से संबंधित कलाभ्यक्तियाँ व शरीर अंकन


जखमोला जाति के कई परिवार पंडिताई करते थे तो पूजन समय चौकल में चित्रकारी व दीवाल में पूजन चित्रकारी सामन्य बात है।  विवाह समय हल्दी हाथ  चढ़ाना , वर वधु का मेक अप /शरीर सौंदर्यीकरण , होली वक्त रंग चढ़ाना भी सामन्य कला प्रदर्शन होता ही है।  तेरहवी व बार्षिकी श्राद्ध में वैतरणी पार करने हेतु मिट्टी , चावल से कला प्रदर्शन  गढ़वाल के अन्य गाँव सामान है।  कर्मकांड , धार्मिक उतस्वों की कला भी प्रदर्शित होती है। जनेऊ, राखी  निर्माण गाँव के पंडित करते थे। 
              ब - अलंकरण कलाएं व शिल्प   
 सुनार गाँव में न था और शायद अलंकार निर्माण , रिपेयर हेतु गटकोट गाँव जसपुर या पाली पर निर्भर था।  वनस्पति आभूषण भी गढ़वाली गाँव जैसे प्रचलित थे। 
    स फुटकर कला
 कला /शिल्प जैसे भोजन बनाना , अध्यापकी , खेल कलाएं , आखेट, गूढ़ भाषा वाचन  (अनका ये , कनका क, मनका म ललका ला =कमला ,  जैसे  ) या अय्यारी भाषा   आदि    भी सामन्य थी।  गटकोट से कई प्रसिद्ध अध्या पक हुए व वर्तमान में भी हैं व अचला नंद जखमोला सरीखे गढ़वाली  विद्वान् भी गटकोट से ही हुए जिन्होंने गढ़वाली - हिंदी, अंग्रेजी व अंग्रेजी -गढ़वाली शब्दकोश रचा  व अभी सतत कार्यरत हैं । वर्तमान में  गटकोट के कमल जखमोला  गढ़वाली गद्य व कविता में प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं
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       द -जीवकोपार्जन की पेशेवर की  व्यवसायिक  कलाएं या शिल्प व  जीवनोपयोगी शिल्प व कलायें
       ओड /भवन निर्माता - परवीन सिंह , जीत सिंह (म्वारी गाँव )
बक्की /भविष्यवक्ता - गणत हेतु चैनु,  डखु
जागरी - हरकदेव , खीमानंद जखमोला, भगली राम
ढोल बादन - गरीब दास , सतरु  दास , राम दास , मानदास , श्यामदास बच्चू ,
दर्जी - उपरोक्त ढल बादक परिवार
लोहार - मलंगी , तलंगी , थामा , गूड़ी प्रेम ,
मच्छे मार विशेषज्ञ - मुल्तान , चतरु , , मथुरा प्रसाद वर्तमान में रज्जी
बादी - बिजनी के हीरा बादी
कर्मकांडी  ब्राह्मण - आशाराम जखमोला, महाबंद , लीलानंद , ज्योतिराम , आदित्यराम जखमोला वर्तमान में गुना नंद,  प्यारेलाल जखमोला। 
चर्मकार - मंडुळ  में चमड़े कमाया जाता था।  कांगड़ा से चर्मकार आये थे (रोशन लाल के पूर्वज ) आज भी मोची छप्पर के नाम से स्थान प्रसिद्ध है
 गाँव में तीनेक तिबारियां थीं।  एकतिबारी  पधान  की थी जिसमे लकड़ी पर नक्कासी थीं। शम्भु प्रसाद जखमोला की सूचना अनुसार तिबारी की लकड़ी पर नक्कासी में फूल पत्ती , पशु पक्षी, मोर की पूंछ  थे।
माँगळ  गीत व ने लोक गीत व चैत में गए जाने वाले गेट।  नृत्य , स्वांग - लगभग सभी महिलाएं , प्रत्येक  बारह वर्ष बाद बादी लांग खेलने आते थे व गीत , नृत्य  स्वांग  करते थे ,
थड्या।  चौंफला नृत्य गीत विशेषज्ञ - जल्ली की दादी , संकरी देवी , भगा देवी व अन्य सभी महिलाएं
रामलीला कलाकार - दाता  राम जखमोला, मनोहर , लीला नंद , अभयराम , टंखीराम , अनिल जखमोला आदि
रामलीला के विदूषक - कल्याण सिंह , बीणी राम

  गटकोसंसोधित गटकोट  (मल्ला ढांगू ) की लोक कलाएं व भूले बिसरे कलाकारट में उपयोग होते कृषि यंत्र जो गढ़वाल के अन्य गाँव जैसे ही थे जैसे - हल-ज्यू  , जोळ (पाटा ) , काष्ठ दंदळ , लौह दंदळ,   कूटी , भद्वाड़  खणवा कूटी , फाळु /फावड़ा , सब्बल , दाथी , थांत , , कील , पल्ल -टाट ,  कुल्हाड़ी , बसूला , फरसा , मुंगर अधिकतर कुल्हाड़ी , बसूला , फरसा , सब्बल छोड़ कर गाँव में हर परिवार बना सकता था।  अब स्थिति बदल गयी है। 
स्वतंत्रता से पहले सफ़ेद कपड़ों पर रंग  हल्दी या ढाक ।  किनग्वड़ से चढ़ाया जाता था तो हरा रंग जौ के पौधों से रंग चढ़ाया जाता था। 

(आभार - शम्भू  प्रसाद जखमोला, कमल जखमोला  की सूचना पर आधारित )



Bhishma Kukreti

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गटकोट  के जोत  सिंह - जितार  सिंह रावत की जंगलेदार निमदारी में काष्ठ  कला
गटकोट  (मल्ला ढांगू ) में भवन काष्ठ उत्कीर्ण कला  -अलंकरण  - 4
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 25
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर  , लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  51
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -51   
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 गटकोट से तिबारियों व जंगलेदार निमदारियों की सूचना उत्साहवर्धक रही है।  अभी इस लेख में एक आम जंगलेदार निम दारी  की विवेचना की जायेगी जिसकी सूचना साहित्यकार व अध्यापक विवेका नंद जखमोला ने भेजी है।  (गटकोट की लोक कलाओं व तिबारियों आदि की सूचना में पहले ही गटकोट वर्णन आ चूका है )
गटकोट (ढांगू ) में  जोत सिंह रावत -जितार सिंह रावत की यह जंगलेदार  निमदारी ने अवश्य ही गटकोट  को एक गर्वयुक्त पहचान दी थी।  आज भी जोत सिंह - जितार सिंह रावत की 12  कमरों की जंगलेदार निमदारी यद् दिलाती है कि 1900 - 1970  तक ढांगू   में तिबारी , डंड्यळी , जंगलेदार निम दारी गाँव को एक गर्वयुक्त पहचान दिलाते थे।   इस लेखक का अनुमान है पहले तो पूरे गढ़वाल (उत्तरकाशी छोड़ कर ) में मिटटी पत्थर से सुसज्जित पहली मंजिल निर्माण 1890 के पश्चात ही शुरू हुआ होगा व संभवतया प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही तिबारियों का प्रचलन बढ़ा होगा। 
    गटकोट (मल्ला ढांगू )  में जोत सिंह जितार सिंह रावत की निम दारी में  पहली मंजिल पर काष्ठ  जंगला बंधा है जिसमे दस  काष्ठ हैं  जो लकड़ी के छज्जों पर टिके हैं व सीधी ऊपर छत की पट्टिका याने शीर्ष /मुण्डीर  पट्टिका से मिलते  हैं ।   प्रत्येक स्तम्भ के आधार पर दो फिट तक  पट्टियां लगाकर स्तम्भ आधार को  वृहद होने या मोठे आधार  होने की छवि प्रदान की गयी  है , दो फिट ऊंचाई तक रेलिंग व लकड़ी के जंगल हैं।  स्तम्भ व रेलिंग व जंगल स्पॉट ज्यामितीय ढंग से काटे गए हैं।  लकड़ी के छज्जे  व छत के दास भी सपाट आयताकार रूप में लगे हैं।  खिड़कियों पर ज्यामितीय अलकंरण  या कटान  . कहीं  भी  प्राकृतिक व मानवीय अलंकरण के चिन्ह नहीं मिलते हैं।
ढांगू या पश्चिम -दक्षिण गढ़वाल में जंगले दार मकान का प्रचलन सन 1940 के बाद ही अधिक बढ़ा तो कहा जा सकता है यह  जंगलेदार निम दारी  स्वतंत्रता के पश्चात ही निमृत हुयी होगी व स्थानीय ओड व बढ़ई रहे होंगे। 
  अंत में कहा जा सकता है कि जोत सिंह -जितार सिंह की जंगलेदार निमदारी में ज्यामितीय कला उभर कर आयी है।  मकान में बड़ी होने या वृहद रूप होने से भव्यता आयी है।   

सूचना व फोटो आभार: विवेका  नंद जखमोला
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Bhishma Kukreti

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ग्वील में वाचस्पति कुकरेती ('शिवजी ')  की भव्य तिबारी

      (जो अब ध्वस्त हो चुकी है)

ग्वील (ढांगू )  में तिबारी , निमदारी , जंगला काष्ठ कला /अलंकरण व लोक कलाएं -2
  House Wood carving (Tibari, Kwatha Bhitar , Nimdari, dandyal)  art of Gweel  -2

ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 26
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  52
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    52
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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   ग्वील आर्थिक दृष्टि से तब भी समृद्ध स्थल /उर्बरक भूमि वाला स्थल था जब यहां गाँव नहीं बसा  था।   ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद  सम्भवतया चार भाई जसपुर से ग्वील बसे (चक्रधर कुकरेती की कुकरेती वंशावली से अनुमान ) . जसपुर ग्वील में भूमि बंटवारे से भी लगता है कि  कम से कम चार भाई जसपुर छोड़ ग्वील बसे होंगे, एक ही भाई जसपुर रहा  व कुछ ग्वील वालों की जमीन जसपुर में फिर भी जमीन बची रही होगी जो उन्होंने बहुगुणाओं    को दान में दी , जखमोलाओं व खमण से आये  कुकरेतीयों  को बेचीं या दी। 
 ग्वील पानी के हिसाब से भाग्यशाली गाँव है छहों दिशाओं में  जल ही जल है तो समृद्धि होनी ही है।  टंकाण  स्कूल 1870 या आसपास खुलने से ग्वील , जसपुर व बड़ेथ व मल्ला ढांगू में शिक्षा प्रसार अन्य क्षेत्रों से पहले शुरू हुयी . ग्वील बड़ेथ के शिक्षित व्यक्ति सरकारी विभागों  व सेना में प्रवेश लिया याने  ग्वील में \भूमिगत समृद्धि के अतिरिक्त सरकारी नौकरी से भी समृद्धि आयी व  समृद्धि प्रतीक में ग्वील में कई भवन , तिबारी , निमदारी निर्मित हुए , ग्वील का क्वाठा भितर तो पूरे इलाके में प्रसिद्ध रहा है , आज भी।  चित्रमणि कुकरेती का तिपुर /तीन मंजिल , सफेद कूड़ तो भवनों में प्रसिद्ध रहे है हैं।  कुछ तिबारियों की सूचना व फोटो भी मिली है।  कुछ तिबारी /जंगले  कालग्रसित हो गए हैं उनकी जानकारी अब लोक कथाओं में ही रह गयी हैं।  राकेश कुमार या भूतपूर्व प्रधानध्यापक बिनोद कुकरेती जैसे सुधि जनों के कारण कुछ फोटो व सूचनाएं मिली हैं जो ग्वील  के भवनों की कला का डॉक्युमेंटेशन में कारगर सिद्ध होंगे। 
 इस लेख में यह लेख उस तिबारी की विवेचना करेगा जो खत्म ही हो चुकी है। भजन राम बन्धु ने यह तिबारी निर्मित कराई थी .  राकेश कुकरेती (पौत्र सदा नंद कुकरेती , मुख्त्यार जी ') va viml kukreti का कार्य - फोटो व सूचना जुटाना वास्तव में स्तुतीय है कि तिबारी तो न बच सकेगी पर डॉक्युमेंटेसन तो हो ही जाएगा।   तिबारी  वाचस्पति कुकरेती की है।  संभवतया तिबारी 1925 के बाद निर्मित  हुयी होगी। मकान तो सौड़  के शेर सिंह , बणवा सिंह परिवार ने ही निर्मित किया होगा किन्तु तिबारी उत्कीर्ण कलाकार बाहर के ही रहे होंगे।
    मकान तिभित्या /तीन भीत /दीवाल याने एक कमरा अंदर व एक बाहर शैली में है।  पहली मंजिल पर दो कमरों के मध्य दीवार नहीं है अपितु बरामदा बनता है और इसी बरमदा के बाहर  तीन खोळी /द्वार /मोरी वाली तिबारी है।  चार स्तम्भों की तिबारी के स्तम्भ पाषाण छज्जे के ऊपर टिके  हैं।  प्रत्येक स्तम्भ/ सिंगाड़ / column   पाषाण देहरी के ऊपर पत्थर चौकोर डौळ  के ऊपर टिके हैं।  स्तम्भ /सिंगाड़ का आधार याने कुम्भी या पथ्वड़  आकृति उलटे कमल दल पंखुड़ियों से बना है।  उल्टे कमल दल के आधार पर डीला /धगुल याने round  wood plate है जहां से उर्घ्वगामी कमल दल शुरू होता है।  कमल दल  के बाद स्तम्भ /सिंगाड़  का शाफ़्ट /कम मोटा स्तम्भ कड़ी  है जिसकी मोटाई ऊपर की ओर  कम होती जाती जय और जब सबसे कम  मोटाई आती है तो वहां पर दो डीले /धगुले  round wood plate उत्कीर्णित है और उन wood plates  के मध्य कमल पंखुड़ी आकृति उत्कीर्ण हुयी है।  ऊपरी डीले /धगुले  से उर्घ्वगामी कमल दल  शुरू होता है व बगल में मेहराब /तोरण /चाप arch का अर्ध मंडल शुरू होता है जो दूसरे  स्तम्भ के अर्ध मंडल से मिलकर चाप बनाता है।  चाप पट्टिका तिपत्ति  (trefoil) नुमा है मध्य में ही  तीखी है।  तोरण  बाह्य पट्टिका के किनारों पर फूल गुदे हैं फूलका केंद्र गणेश का प्रतीक है ,  जैसे पूजा में गोबर का गणेश बनाया जाता है।  तोरण  बाह्य पट्टिका पर वानस्पतिक कलाकृति गोदी गयी है।     तोरण शुरू होती है तो स्तम्भ   फैलता है  ( थांत पट्टिका /Blade जैसे ) . वास्तव में इस भाग पर ब्रैकेट /दीवारगीर लगे थे।   ग्वील , सौड़ में ऐसे दीवार गीरों /  ब्रकेट्स में प्राकृतिक कला उत्कीर्ण के अतिरिक्त मानवीय (पशु व पक्षी चित्रण ) हुआ है तो  वाचस्पति कुकरेती की तिबारी में भी सौड़ के शेर सिंह नेगी जिअसे ही कुछ पक्षी या पशु चित्रित हुए रहे होंगे (अनुमान )
  स्तम्भ ऊपर चौखट शीर्ष /मुण्डीर की दो भू समांतर पट्टिकाओं से मिलते है , जो छत की पट्टिका से जुड़ते हैं।  शीर्ष या मुंडीर पट्टिका पर पत्तियां या  प्राकृतिक  कला चित्रित /उत्कीर्ण हुयी है।
 वाचस्पति कुकरेती की तिबारी आखरी साँस ले रही है व मुझे आश्चर्य हो रहा है कि अभी तक लोग लकड़ी चोरी कर   नहीं ले गए हैं अन्यथा जब इस प्रकार के मकान  बिन देख रेख ध्वस्त होते है तो पत्थर , लकड़ी आदि लोग ऐसे ही उठा लेते हैं।
   वाचस्पति कुकरेती की तिबारी भी भव्य तिबारी रही होगी व  प्राकृतिक , मानवीय व ज्यामितीय कला अलंकरण  हुआ है।  आवश्यकता है ऐसी तिबारियों का संरक्ष्ण हो व सर्वेक्षण तो हो ही।     
सूचना व फोटो आभार : राकेश कुकरेती , ग्वील
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  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला

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हथनुड़ (बिछला ढांगू ) की बिष्ट परिवार की तिबारी में काष्ठ कला , अलंकरण

House Wood Carving (Tibari )  art , Motifs  of  Hathnur/Hatnur   (Bichhla Dhangu )  Garhwal
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 27
  Traditional House wood Carving Art /Motifs of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   -27
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  53
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   53
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 संकलन - भीष्म कुकरेती 
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      हथनुड़  बिछला ढांगू (निकट सिलोगी , द्वारीखाल ब्लॉक , लैंसडाउन  तहसील, पौड़ी गढ़वाल ) का एक उर्बरक , कर्मठ लोगों का गाँव है जिसके निकटवर्ती गाँव हैं , अमोला , दाबड़ , कुठार , तैड़ी , किनसुर आदि गाँव हैं व  है। 
    उर्बरक व कर्मठ कृषकों के गाँव होने से समृद्ध गाँवों की श्रेणी में आता है हथनुड़ ।  किम्बदन्ती है कि  गोरखा काल से पहले हथनुड़ जसपुर के तहत वाला गाँव था।  भौगोलिक व तार्किक दृष्टि  लोक कथा को सच नहीं मानती है ।  किन्तु बहुगुणा गुरुओं  की पारम्परिक जजमानी हथनु ड़  में होने से साफ़ जाहिर है कि कभी भूतकाल में हथनु ड़  अवश्य ही जसपुर का हिस्सा रहा होगा।  राजनैतिक  व सामजिक सरंचना क्या रही होगी का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। 
     हथनुड़ से अभी  तिबारी की सूचना मिली है।   बिष्ट  परिवार की यह तिबारी अवश्य ही तब की  है जब तल घर में मंजिल में गौशाला का रिवाज अधिक प्रचलित था।  यद्यपि बिछला ढांगू में तल मंजिल में पशु व पहली मंजिल पर मानव का वास आज भी पस्चालन में है किंतु मल्ला ढांगू में अधिकतर गाँवों में गौशाला व घर अलग अलग ही हैं।  हथ नुड़  के बिष्ट परिवार की यह तिबारी अधिकांश रूप से दाबड़ में  विवरणित  तिबारियों जैसे ही है। 
 मकान तिभित्या याने  तीन दीवार अर्थात   एक कमरा अंदर व दूसरा  कमरा बाहर।  पहली मंजिल के दो कमरों  के  न हो बरामदा निर्मित है व इनके बहार काष्ठ  तिबारी  निर्मित या बिठाई गयी है।  तिबारी चार स्तम्भ वाली तिबारी है व ये चार स्तम्भ /सिंगाड़ /खम्भे /columns तीन विशिष्ठ /मोरी द्वार /खोळी  बनाते हैं।  किनारे के दो स्तम्भ दीवार से एक एक कड़ी (पट्टिका ) क ेमाध्यम से जुड़े हैं।  जोड़ू  कड़ी में वानस्पतिक या प्राकृतिक  अलकंरण  (कला )  उत्कीर्ण हुआ है।  जोड़ू  कड़ी के शीर्ष में संभवतया  काष्ठ   दीवारगीर (wood bracket ) लगे थे।  व इन दीवारगीरों  में प्राकृतिक , पर्तीकात्मक व् अमानवीय अलंकरण था।
   प्रत्येक स्तम्भ पाषाण छज्जे के ऊपर बिछाए  पाषाण देहरी (देळी ) में बिछे चौकोर पाषाण डौळ (Stone Base ) पर टिके हैं।  स्तम्भ के कुम्भी /पथ्व ड़  अधोगामी कमल दल /पंखुड़ियां से बने हैं व जहां से  अधोगामी तीखी है। 
कमल दल शुरू होता है वहां स्तम्भ पर गोलाकार डीला /धगुल है (Round Wooden Plate ) .  डीले या धगुल  से उर्घ्वगामी कमल दल /पंखुड़ियां शुरू होती हैं।  कमल दल के बाद फिर ढीला है व  स्तम्भ मोटाई में कम होता जाता है (Shaft ) जहां से  स्तम्भ कड़ी (Shaft )  सबसे कम मोटा होता है वहां  पर डीले /धगुले  हैं फिर उर्घ्वगामी कमल दल शुरू होते हैं यहीं से शाफ्ट की मोटाई बढ़ती ही व् ऊपर  कमल दल   है।  जब कमल दल समाप्त होता है वहीं से स्तम्भ से अर्ध मंडल /अर्ध चाप /half arch पट्टिका शुरू होती है  व दूसरे स्तम्भ की अर्ध मंडल क पट्टिका से मिलकर सम्पूर्ण तोरण / अर्ध मंडल बनाने में सक्षम है।  तोरण अर्ध मंडल या arch तिपत्ती  नुमा है हाँ मध्य की arch
  चाप पट्टिका के बाहर किनारे पर फूल हैं व अनुमान लगाया जा सकता है कि  इस  कोई ब्रैकेट था व उसमे आम प्राकृतिक , ज्यामितीय व मानवीय  अलंकरण हो सकता है।
 स्तम्भ तोरण शीर्ष ऊपर भू समांतर पट्टिका है जो छत के आधार काष्ठ पट्टिका से मिलती हैं।  शीर्ष पट्टिका में प्राकृतिक अलंकरण की पूरी गुंजायश है। 
 कहा जा सकता है हथनुड़  की यह तिबारी  भव्य किस्म की रही होगी व पाने गाँव को व क्षेत्र को अवश्य  विशिष्ठ पहचान  रही होगी जैसे आज भी है।   
सूचना व फोटो आभार : रश्मि कंवल , e -uttranchal .com
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  Traditional House Wood Carving  (Tibari ) Art of, Dhangu, Garhwal, Uttarakhand ,  Himalaya; Traditional House Wood Carving (Tibari) Art of  Udaipur , Garhwal , Uttarakhand ,  Himalaya; House Wood Carving (Tibari ) Art of  Ajmer , Garhwal  Himalaya; House Wood Carving Art of  Dabralsyun , Garhwal , Uttarakhand  , Himalaya; House Wood Carving Art of  Langur , Garhwal, Himalaya; House wood carving from Shila Garhwal  गढ़वाल (हिमालय ) की भवन काष्ठ कला , हिमालय की  भवन काष्ठ कला , उत्तर भारत की भवन काष्ठ कला


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मित्रग्राम (ढांगू ) में  परुशराम जखमोला की भव्य तिबारी

मित्रग्राम   (ढांगू ) की लोक कलाएं - 5
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला -28
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   28
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  54
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -    54
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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मित्रग्राम जो कि  गटकोट , बन्नी , खैंडुड़ी गाँवों का निकटवर्ती गाँव है और मल्ला ढांगू में एक महत्वपूर्ण गाँव है।  यद्यपि मैं इत्तेफाक नहीं रखता किन्तु डा डबराल लिखते हैं कि गोरखा काल समाप्ति के बाद पंडित बासवा नंद बहुगुणा ने पलायन करते वक्त मित्रग्राम  में वास किया था।   इसका कारण है कि  तब तक मित्रग्राम बसा ही नहीं था और यदि जगह थी भी तो मतण या मतंग (यहाँ पर साधू के ध्यान   से अर्थ है ) थी तो  बासबानंद की डायरी में कहाँ से मित्रग्राम  नाम आया।  फिर सौड़  का जिक्र भी डा विनय डबराल ने किया  (डा शिव प्रसाद डबराल ने उद्घृत किया ) तो सौड़ जगह थी किन्तु गाँव तब नहीं था।  लगता है डायरी का संदर्भ  निराधार ही डा विनय ने दिया है।
    आज  मित्रग्राम में स्थित परुशराम जखमोला (वर्तमान में जयराम -स्वयंबर जखमोला ) की तिबारी का वर्णन किया जाएगा , तिबारी स्व परुशराम जखमोला के पिता या दादा ने निर्मित की थी और शायद 1925  के लगभग या पश्चात ही तिबारी का निर्माण हुआ था। अब यह तिबारी ध्वस्त हो चुकी है तिबारी के स्थान पर अत्त्याधुनिक  मैदानी शैली का मकान निर्मित हो गया है बस अब तो फोटो ही बाकि है वह भी
    तिबारी अपने समय की भव्य तिबारियों में शामिल थीं व मित्रग्राम  की  विशेष शान या पहचान में यह तिबारी भी शामिल थी।   ढांगू , लंगूर , उदयपुर , शीला , लंगूर की तिबारियों जैसे ही  परुशराम जखमोला की तिबारी पहले मंजिल पर है व मकान तिभित्या (एक कमरा बाहर व एक कमरा नादर व पहली मंजिल में दो कमरों का बरामदा व उस पर तिबारी फिट किया जाना )   है। 
   तिबारी में आम भव्य तिबारियों जैसे ही नक्काशीदार चार काष्ठ    स्तम्भ / सिंगाड़ /columns  हैं।  दीवार और  किनारे के  सिंगाड़  जोड़ने वाली कड़ी पर वानस्पतिक अलंकरण  हुआ है। आम भव्य तिबारियों जैसे ही स्तम्भ तीन मोरी /द्वार या खोळी  बनाते हैं
   स्तम्भ पाषाण छज्जे के ऊपर देहरी /देळी  में स्थापित किया चौकोर डौळ के ऊपर टिके  हैं।  पाषाण डौळ  के ऊपर से स्तम्भ का कुम्भी /पथ्वड़ /तुमड़ी नुमा आधार शुरू होता है जो वास्तव में उल्टे कमल दल /पंखुड़ियां से बना है।  स्तम्भ में अधोगामी कमल दल के अआधार पर एक डीला /धगुल (round wood  plate ) है जहां से उर्घ्वगामी कमल दल शुरू होता है और कमल दल अंत से स्तम्भ की मोटाई कम होती जाती है फिर डीले /धगुल  हैं व फिर उर्घ्वगामी कमल दल व वहां से प्रत्येक स्तम्भ से तोरण  का अर्ध चाप शुरू होता है जो दूसरे  स्तम्भ के अर्ध भाग से मिलकर चाप /तोरण /मेहराब बनाता है।  तोरण तिप्पत्ति नुमा है।  टॉर्न के किनारे वाली काष्ठ पट्टिका पर फूल व वानस्पतिक अलंकरण हुआ है।  यदि ब्रैकेट रहे हैं तो अवश्य ही मानवीय (पशु या पक्षी अंकन ) हुआ होगा। तोरण  शीर्ष  की पट्टिकाएं छत की पट्टिका से मिलते हैं।  तोरण शीर्ष (मुरिन्ड /मुण्डीर ) में भी प्राकृतिक चित्रण /अंकन हुआ है व कहा जाता है कि तिबारी के यौवन में नयनाभिरामी अंकन बरबस ध्यान खींचती थी.
 आज तिबारी ध्वस्त है किन्तु जब भी मित्रग्राम  की पहचान /identity की  चर्चा  होगी तो परुशराम जखमोला की तिबारी कीचर्चा   अवश्य होगी।     

सूचना व फोटो आभार : गौरी अनूप (पुत्र सुरेंद्र जखमोला ) मित्रग्राम
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ग्वील (ढांगू गढ़वाल )  में पूर्णा नंद कुकरेती की तिबारी में काष्ठ  कला /अलंकरण

ग्वील गाँव में भवन काष्ठ कला /अलंकरण  (तिबारी , जंगलादार मकान , निंदारी ) भाग - 3
Wood Carving Art and ornamentation in Tibari of Purna Nand Kukreti in Gweel (Garhwal)
ढांगू गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 29
  Traditional House wood Carving Art of West Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  55
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   55 
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 ग्वील को जसपुर, पूर्यत  की तरफ या बिजंरा  या बड़ेथ की ओर  से देखने में जो  कूड़  या मकान बरबस ध्यान खींचते थे (आज भी ) वे मकान थे सफेद कूड़ व जम्मुन का कूड़ . सफेद कूड़ ग्वील में ऊपरी जगह में जम्मुन का कूड़  अलग है।  आज  सफेद कूड़  में तिबारी का विवेचन किया जाएगा।
  सफेद कूड़ (मकान ) पूर्णा नंद कुकरेती के दादा ने निर्मित कराया था किन्तु अब मिल्कियत बदल गयी है। 
मकान तिभित्या (तीन दिवार ) याने एक कमरा अंदर व एक बाहर व पहली मंजिल पर दो बाहर के कमरों में दिवार न हो बरामदा निर्मित होता था व बरामदे को तिबारी से ढका या अकंकृत किया जाता था।  सफेद कूड़ याने पूर्णा नंद कुकरेती के मकान में भी ढांगू /उदयपुर की भाँती ही तिबारी है (बाद में इसे सीमेंट के जंगले  से ढक दिया गया था )
टीबार में चार स्तम्भ हैं व स्तम्भ तीन मोरी /द्वार /खोळी  बनाते है व किनारे पर स्तम्भ दीवार से नक्कासीदार कड़ी के माध्यम से जुड़े हैं।
  पूर्णा नंद कुकरेती  की तिबारी में स्तम्भ शीर्ष में मेहराब या तोरण  नहीं अपितु चौखट नुमा ही है।  कायस्थ स्तम्भ का आधार अन्य तिबारियों के स्तम्भ आधार से अलग दीखता है व स्तम्भ पर अलंकरण में भी भिन्नता है , गोलाई कम अलंकृत है। स्तम्भों पर शंकु नुमा आकृतियां उत्कीर्ण हुयी है।  ब्रैकेट भी है जिनमे आकृति विशेष हैं जो ग्वील की अन्य तिबारियों से अलग हैं
स्तम्भ शीर्ष /मुण्डीर /मुरिन्ड में नक्कासी वानस्पतिक ही है किन्तु कम उभर कर आयी है उतना नहीं जितना स्तम्भ  में शंकुनुमा आकृतियां या ातमभ ब्रैकेट /दीवारगीर में अलंकरण। 
 सफेद कूड़ या पूर्णा  नंद कुकरेती की इस तिबारी  में कला अलकनकरण की सूचना आणि अभी बाकी ही है।  फिर भी कहा जा सकता है सफेद कूड़ या पूर्णा नंद कुकरेती की तिबारी की अपनी विशेषता है और कई रूप में ढांगू की तिबारियों से भिन्न आभास देती  है .
सूचना व फोटो आभार : मूल राकेश कुकरेती व सहायक सूचना चक्रधर कुकरेती
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फतेहपुर गढ़वाल में बारजा  /बालकनी में काष्ठ कला , अलंकरण

शीला पट्टी , गढ़वाल , हिमालय  की तिबारियों/ निमदारियों / जंगलों  पर काष्ठ अंकन कला - 6
House Wood carving art of Shila Patti Garhwal (Kotdwra Tahseel) -6
  Traditional House wood Carving Art of West Kotdwra and Lansdowne Tahsil  (Dhangu, Udaypur, Ajmer, Dabralsyun,Langur , Shila ), Garhwal, Uttarakhand , Himalaya   
  दक्षिण पश्चिम  गढ़वाल (ढांगू , उदयपुर ,  डबराल स्यूं  अजमेर ,  लंगूर , शीला पट्टियां )   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण   
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  गढ़वाल, उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार   ) काष्ठ अंकन लोक कला ( तिबारी अंकन )  -  56
Traditional House Wood Carving Art (Tibari) of Garhwal , Uttarakhand , Himalaya -   56 
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 संकलन - भीष्म कुकरेती
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 फतेहपुर वास्तव में ब्रिटिश काल में  लैंसडाउन सेना विभाग बन जाने से से दुगड्डा ब्लॉक का मुख्य  भाग ही नहीं बना बल्कि  गढ़वाल के लिए भी महत्वपूर्ण गांव बना  । एक महत्वपूर्ण स्थल बना जहां सेना के घुड़शाल थे    फतेहपुर दुगड्डा ब्लॉक याने कोटद्वार तहसील का  समृद्ध गाँव है।  फतेहपुर (दुगड्डा ब्लॉक ) से एक चित्तार्शक फोटो Exotic Uttarakhand  group से मिली जिसे फोटोग्राफर प्रशांत पंसेरी ने पोस्ट की।  मैंने जब पंसेरी से  भवन मालिक के बारे में सम्पर्क किया  तो उनका कोरा कोरा  जबाब था 'पता नहीं ' पर फतेहपुर की बात उन्होंने स्वीकार  की भवन फतेहपुर दुगड्डा में ही है।  ऐसे मकान फतेहपुर , ऐता  अदि  होना कोई आश्चर्य नहीं ।   इस अनाम मालिक के  भवन व आम ग्रामीण गढ़वाल के भवन में अंतर् साफ़ झलकता है कि  भवन की खिड़किया ऊंची व चौड़ी हैं जब कि पहाड़ी गढ़वाल में गाँव भवन में खड़किया बिरली ही होती थी।  जड्डू /शीत   के कारण खिड़की का रिवाज था ही नहीं यदि था भी तो बहुत छोटी खिड़कियां निकाली जाती थी और वास्तव में खड़कियों का रिवाज न था जो कि सुकई गाँव (बंगार  स्यूं , पौड़ी गढ़वाल ) में ब्रिटिश काल से पहले के भवन से भी साबित हो जाता है। 
 फतेहपुर वास्तव में भाभर के निकट का गाँव है तो हवादार सर्दी उस तरह की नहीं पड़ती जैसे कि पहाड़ी गढ़वाल में।  दूसरा भवन में तल मंजिल व खिड़की व पहली मंजिल पर बड़ी खिड़की  व बारजा  देखकर साफ़ अनुमान लगता है कि मकान व काष्ठ कला पर बिजनौर का साफ़ प्रभाव है।   पहली मंजिल पर बारजा  /बालकोनियां  या खड़की में छजजा बिजनौर से ही प्रभावित हुयी होंगी। 
तलमंजील की खिड़की आम बड़ी खिड़की है और कोई छज्जा बालकोनी नहीं है।  पहली मंजिल पर खिड़की पर छज्जा है मकान की दायी ओर।   यह भी पहाड़ी मकानों से कुछ अलग ही है कि इस ओर  दो खिड़की है।
 खिड़की में काष्ठ   छज्जा आगे की और है  व लकड़ी के ही काष्ठ दासों पर टिका  है। खड़की छज्जे काष्ठ पट्टिकाओं , व दासों में कोई कला /अलंकरण उत्कीर्ण नहीं हुआ है  व ज्योमितीय  कटान है।
  फतेहपुर के इस भवन की खिड़की के काष्ठ छज्जे के चारों तरफ   अभी चार स्तम्भ हैं  किन्तु अवश्य ही पांच काष्ठ  स्तम्भ /columns रहे होंगे दो दीवार के लगते व तीन आगे सामने जैसे अभी भी सामने के स्तम्भ विद्यमान हैं।
  प्रत्येक स्तम्भ  में कटाई व उत्कीर्ण एक जैसे ही हुआ है।   प्रत्येक स्तम्भ आधार जो काष्ठ छज्जे पर टिका है थांत कार्य पट्टिका नुमा या जैसे क्रिकेट बैट ब्लेड जैसा है व इस थांत कार्य पट्टिका नुमा आकृति पर ज्यामितीय  अलङ्करण  उत्कीर्ण  हुआ है।  ऊपर की ओर जब थांत कार्य पट्टिका आकर समाप्त होता है तो गोल - डीले /धगुले आकृति उत्कीर्ण है जो शोभा देते हैं।  धगुले या डीले से स्तम्भ कुम्भी आकार लेता है व फिर गोलाई लिए  मोटाई धीरे धीरे कम होती जाती है फिर जहां  गोलाई लिए  मोटाई कमतम है  वहां डीला या ढगला है फिर कोई फूल दल नुमा आकृति उभर कर आती है व यहीं सर फिर स्तम्भ थांत कार्य पट्टिका का (क्रिकेट बैट  ब्लेड ) अकार ग्रहण कर लेता है व बाद में छज्जे के छत से मिल कर  शीर्ष बनता है। 
स्तम्भ शीर्ष के ऊपर  बरखा /घाम रोकु काष्ठ पट्टिका  है जिस पर नीचे की ओर त्रिभुजाकार कटाई है जो ज्यामितीय अलकंरण है व भवन की शोभा बढ़ाती है।  काष्ठ छज्जे की ऊपरी छत पर पहाड़ी स्लेटी पटाळ  हैं। 
   खिड़की व काष्ठ  छजजा व अलंकरण उमदा  ही नहीं अपितु भवन  की शोभा बृद्धिकारक हैं।   
  मकान तो परम्परगत पहाड़ी शैली का है किंतु बड़ी खिड़की व उस पर काष्ठ कलाकारी पर अवश्य ही बिजनौर का प्रभाव है और हो सकता है बढ़ई बिजनौर से ही बुलाये गए हों।
एक पाठक ने सूचना दी कि यह तिबारी  फतेहपुर में नत्थी सिंह  की है
  सूचना व फोटो आभार : प्रशांत पंसारी (फोटोग्राफर ) (एक्जोटिक उत्तराखंड ) 
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