Author Topic: Various Dynasities In Uttarakhand - उत्तराखंड के विभिन्न भागो मे राजाओ का शासन  (Read 30617 times)

Risky Pathak

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Kings of Shah Vansh
Mahipati Shah
Prithavipati Shah
Medinipati Shah(1676AD)
FatehShah
Pradeep Shah(1744AD)
Pradhyumn Shah
Sudarshan Shah
Bhawani Shah
Pratap Shah(1871-1886)
Keerti Shah(1892-1913)
Narendra Shah(1916-1946)
Manvendra Shah


Risky Pathak

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गढ़वाल के जिन ५२ गढ की बात करते है, वो ७वी  शताबदी तक बन चुके थे| और इन्ही पर पवार राजवंश के लोगो ने १९४९ तक राज्य किया|     

Veer Vijay Singh Butola

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Nice Info Mahar ji & pathak ji.............thanks to share this info with us.............

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढ़वाल के गुरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने 18वीं सदी में गंगोत्री मंदिर का निर्माण इसी जगह किया जहां राजा भागीरथ ने तप किया था। मंदिर में प्रबंध के लिये सेनापति थापा ने मुखबा गंगोत्री गांवों से पंडों को भी नियुक्त किया। इसके पहले टकनौर के राजपूत ही गंगोत्री के पुजारी थे। माना जाता है कि जयपुर के राजा माधो सिंह द्वितीय ने 20वीं सदी में मंदिर की मरम्मत करवायी।

ई.टी. एटकिंस ने दी हिमालयन गजेटियर (वोल्युम III भाग I, वर्ष 1882) में लिखा है कि अंग्रेजों के टकनौर शासनकाल में गंगोत्री प्रशासनिक इकाई पट्टी तथा परगने का एक भाग था। वह उसी मंदिर के ढांचे का वर्णन करता है जो आज है। एटकिंस आगे बताते हैं कि मंदिर परिवेश के अंदर कार्यकारी ब्राह्मण (पुजारी) के लिये एक छोटा घर था तथा बाहर तीर्थयात्रियों के लिये लकड़ी का छायादार ढांचा था।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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टिहरी

ऐतिहासिक रूप से टिहरी रियासत का एक भाग चंबा या तटकासीन चामुआ एक जगह थी जहां वर्ष 1803 में गढ़वाली सेना ने गोरखा सेना को परास्त किया था। शहर का मैदानों से सान्निध्य होने के कारण यहां ऐसी संस्कृति फैली जो गढ़वाली एवं उत्तर भारतीय संस्कृति का मिश्रण है। हाल ही में लोगों का यहां बसना प्रारंभ हुआ है तथा वर्ष 1960 के दशक तक यह घने जंगलों के बीच एक गांव ही था। अब यह एक व्यस्त शहर है तथा यात्रियों को सहज यात्रा की पहुंच प्रदान कराता है तथा यहां से कई स्थलों की यात्रा, खास तौर से गंगोत्री एवं यमुनोत्री, की कराता है। चंबा अपनी वातावरणीय सुन्दरता के लिए भी प्रसिद्ध है एवं विशाल बंदर पूंछ पर्वतों का दृश्य मनोहारिक है स्थानीय आकर्षणों में एक मंदिर एवं एक स्मारक हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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धारचूला अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण एक प्राचीन व्यापारिक शहर था, जिसके एक तरफ नेपाल तथा दूसरी तरफ तिब्बत-चीन की सीमाएं हैं। पर्वतीय-पथ पार करने में दक्ष, मुख्य रूप से भोटिया-व्यापारी तिब्बत से भारत आकर धारचूला बाजार में ऊन, भेड़/बकरी, मशाले एवं तंबाकू खरीदकर तिब्बत में बिक्री करने ले जाते। ऊन व्यापार से संबंधित कई छोटे-मोटे उद्योगों के केंद्र भी इस समृद्ध नगर में थे। "जौलजीबि" जैसे व्यापार-मेले का आयोजन वाणिज्य को प्रोत्साहित करता था। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण व्यापारिक गतिविधियों पर अकस्मात् विराम लग गया और उस कारण ही दोनों देशों के बीच व्यापार रूक गया। इस प्रकार वाणिज्यिक शहर के रूप में धारचूला का महत्व कम हो गया।

सुदूर स्थित होने के कारण क्षेत्र के ऐतिहासिक घटनाओं में धारचूला की सक्रिय भागीदारी अवरुद्ध थी। फिर भी, इसका इतिहास कुमाऊं से जुड़ा है। भारत की आजादी से पहले शेष कुमाऊं के सामान्य भागों की तरह धारचूला पर भी कई रजवाड़ों का शासन रहा था। वर्तमान छठी शताब्दी से पहले यहां कुननिदा उसके बाद खासों, नंदों का और फिर मौर्यों का शासन था। माना जाता है कि राजा बिंदुसार के समय खासों ने विद्रोह किया। यह विद्रोह उनके उत्तराधिकारी सम्राट अशोक ने कुचल डाला। उस खास समय में कुमाऊं पर कई सरदारों एवं रजवाड़ों का प्रभुत्व रहा। माना जाता है कि उस समय धारचूला किले पर एक स्थानीय राजा मंदीप का शासन था।

छठी एवं 12वीं सदियों के बीच ही एक वंश शक्तिशाली बना और कत्यूरियों ने संपूर्ण कुमाऊं पर शासन किया। फिर भी उनका प्रभाव छोटे क्षेत्र तक ही सीमित रहा, जब वर्ष 1191 से 1223 के बीच, पश्चिमी नेपाल के माल्लाओं ने कुमाऊं पर आक्रमण किया।

12वीं सदी में चंदों का प्रभुत्व बढ़ा और उन्होंने वर्ष 1790 तक कुमाऊं पर शासन किया। उन्होंने कई प्रमुखों को निवेश कर लिया तथा पड़ोसी राज्यों के साथ अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए उनसे युद्ध किया। उस अवधि में इस वंश में केवल एक बार रूकावट आयी, जब गढ़वाल के पंवार राजा, प्रद्युम्न शाह भी कुमाऊं के राजा बने, जिन्हें प्रद्युम्न चंद कहा गया। अंतिम चंद शासक, महीन्द्र सिंह चंद हुआ, जिसने राजबंगा (चंपावत) से शासन किया। वर्ष 1790 में गोरखों ने, जिन्हें गोरखियाणा कहते हैं, कुमाऊं पर कब्जा कर लिया और चंदों का अंत हो गया।

दमनकारी गोरखों के शासन काल का अंत वर्ष 1815 में हुआ, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्हें हराकर, कुमाऊं पर प्रभुत्व कायम कर लिया। अंग्रेजी शासन के अंत में स्थानीय कार्यदल एवं प्रेस ने बेगार प्रथा एवं लोगों के जन-अधिकार के विरूद्ध जनचेतना जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इन आंदोलनों का भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में विलय हो गया - जो आजादी वर्ष 1947 में प्राप्त हुआ। तब कुमाऊं उत्तर प्रदेश का भाग हो गया तथा बाद में वर्ष 2000 में नये राज्य उत्तराखंड का भाग बना।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Panwar Dynasty

 


During the medieval times, Garhwal region, comprising the present day districts of Pauri Garhwal and Tehri Garhwal in Uttaranchal, were ruled by the Panwar Dynasty. This dynasty came into power during the 14th century. It was established by a ruler named Bhanu Pratap. During their reign, the Panwar kings shifted their capitals numerous times, which included Devalgarh and Srinagar. They united the numerous small kingdoms spread over the region and brought stability. The reign of the Panwar dynasty lasted for about three centuries. The dynasty came to a decline around 1803, owing to an earthquake, which destroyed parts of their kingdom. The kingdom was taken over by the Gorkha tribes of the north-eastern region. The last king of the Panwar dynasty, Raja Sudarshan Shah, sought the help of the British. The British army succeeded in capturing the kingdom from the Gorkhas, but it was subsequently merged into the British Empire. This brought about an end to the dynasty.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Chand Dynasty

Chand Dynasty had a dominant presence in the Kumaon region in Uttaranchal. This dynasty was established in AD 700 by a king named Som Chand. Champawat was the first capital of this dynasty. The capital was later shifted to Almora in 1568 by a ruler named Raja Balo Kalyan Chand. Almora Fort served as their military bastion.
During

Veer Vijay Singh Butola

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गढ़वाल मे जो 52 गढ़ है वे इस प्रकार है :


गढ़वाल के जिन ५२ गढ की बात करते है, वो ७वी  शताबदी तक बन चुके थे| और इन्ही पर पवार राजवंश के लोगो ने १९४९ तक राज्य किया|    

पंकज सिंह महर

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अल्मोड़ा: कुमाऊं के अंतिम राजा आनंद सिंह देवज्यू का 123वां जन्मदिवस समारोहपूर्वक मनाया गया। कार्यक्रम का आयोजन जगदम्बा दरबार डयोड़ीपोखर राजा आनंद सिंह के आवास पर किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत राज पुरोहित नागेश चन्द्र पंत ने राजा आनंद सिंह की मूर्ति का अक्षत, रौली, चंदन व पुष्प से पूजन कर किया। राजा आनंद सिंह की मूर्ति पर राज परिवार के सांसद केसी सिंह बाबा ने माल्यार्पण किया। माल्यार्पण करने वालों में नगरपालिका अध्यक्ष शोभा जोशी, विधायक मनोज तिवारी, पत्रकार दीप जोशी, नवीन बिष्ट तथा राज पुरोहित नागेश चन्द्र पंत शामिल थे। इस अवसर पर केसी सिंह बाबा ने अपने पूर्वजों को नमन कर उन पर कृपा दृष्टि रखने की प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि वह अपने पूर्वजों के आदर्शो पर चलकर जनसेवा को अपना धर्म मानते है और आगे भी इसका पालन करेगे।

इस मौके पर राज पुरोहित नागेश चन्द्र पंत ने राजा आनंद सिंह का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा सर्वधर्म समभाव का पालन किया। श्री पंत ने अपने पिता स्व.रमेश चन्द्र पंत का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने राजा आनंद सिंह की मूर्ति का निर्माण कराया। उन्होंने कहा कि राजा आनंद सिंह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, वैद्य, ज्योतिष, साधु महात्माओं, महिलाओं, कन्याओं का श्रद्धाभाव से आदर करते थे। वह मां जगदम्बा के परम भक्त व उपासक थे।





 

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