Author Topic: Various Dynasities In Uttarakhand - उत्तराखंड के विभिन्न भागो मे राजाओ का शासन  (Read 30405 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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HISTORY OF ALMORA DISTRICT.

आज के इतिहासकारों की मान्यता है कि सन् १५६३ ई. में चंदवंश के राजा बालो कल्याणचंद ने आलमनगर के नाम से इस नगर को बसाया था। चंदवंश की पहले राजधानी चम्पावत थी। कल्याणचंद ने इस स्थान के महत्व को भली-भाँति समझा। तभी उन्होंने चम्पावत से बदलकर इस आलमनगर (अल्मोड़ा) को अपनी राजधानी बनाया।

सन् १५६३ से लेकर १७९० ई. तक अल्मोड़ा का धार्मिक भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व कई दिशाओं में अग्रणीय रहा। इसी बीच कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं राजनैतिक घटनाएँ भी घटीं। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टियों से भी अल्मोड़ा सम्स्त कुमाऊँ अंचल का प्रतिनिधित्व करता रहा।

सन् १७९० ई. से गोरखाओं का आक्रमण कुमाऊँ अंचल में होने लगा था। गोरखाओं ने कुमाऊँ तथा गढ़वाल पर आक्रमण ही नहीं किया बल्कि अपना राज्य भी स्थापित किया। सन् १८१६ ई. में अंग्रेजो की मदद से गोरखा पराजित हुए और इस क्षेत्र में अंग्रेजों का राज्य स्थापित हो गया।

स्वतंत्रता की लड़ाई में भी अल्मोड़ा के विशेष योगदान रहा है। शिक्षा, कला एवं संस्कृति के उत्थान में अल्मोड़ा का विशेष हाथ रहा है।

कुमाऊँनी संस्कृति की असली छाप अल्मोड़ा में ही मिलती है - अत: कुमाऊँ के सभी नगरों में अल्मोड़ा ही सभी दृष्टियों से बड़ा है।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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इतिहास
गढ़वाल राजाओं के शासन काल में डोईवाला एक गांव था। लेकिन रेल लाइन के आगमान के बाद डोईवाला एक बाजार के रूप में रूपांतरित हो गया। गोरखा और गढ़वाल राजाओं के समय डोईवाला देहरादून क्षेत्र में स्थित एक छोटा सा गांव था। जब डोईवाला पर अंग्रजों का अधिकार हुआ, तब इस क्षेत्र के आसपास की भूमि पर कृषि कार्य प्रारंभ हुआ और इनका विकास ग्रांट के रूप हुआ। यही कारण है कि डोईवाला क्षेत्र में स्थित लच्छीवाला, रानीपोखरी, भोगपुर और घमंडपुर गांवों के आसपास कई ग्रांट हैं। इनमें मार्खम ग्रांट, माजरी ग्रांट और जॉली ग्रांट प्रमुख हैं। 1 मार्च 1900 को हरिद्वार- देहरादून रेल मार्ग पर रेल गाड़ियां चलनी प्रारंभ हुईं। इसी दिन डोईवाला स्टेशन अस्तित्व में आया। धीरे-धीरे ग्रांट के आसपास के क्षेत्र विकसित होने लगे और डोईवाला एक छोटा सा बाजार बन गया। 1901 में डोईवाला में पहला विद्यालय खुला। इसी साल यहां के पहले अस्पताल की भी स्थापना हुई। 1933 में यहां जानकी चीनी मिल ( रेलवे स्टेशन के नजदीक ) स्थापित हुआ। इसकी स्थापना जब्बाल इस्टेट के शासकों और स्थानीय हवेलिया परिवार ने मिलकर किया था। स्व. दुर्गा मल और कर्नल प्रीतम सिंह संधू जैसे वीर स्वतंत्रता सेनानियों की जन्म भूमि भी डोईवाला ही है। गौरतलब है कि ये दोनों नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा गठित आजाद हिंद फौज की ओर से देश के उत्तर-पूर्वी सीमा पर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे। बीते दशक में डोईवाला की बड़ी उपलब्धि रही है- जॉली ग्रांट हवाई अड्डे के पास “हिमालयन इंस्टीट्यूट अस्पताल” की स्थापना। इसकी स्थापना 1994 में स्वामीराम ने करवाया था। 750 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में प्राथमिक उपचार से लेकर गंभीर बीमारियों तक की आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं। इस अस्पताल से गढ़वाल क्षेत्र के लोग तो लाभान्वित हुए ही है, साथ ही यह उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती भागों के लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं के निदान में भी काफी सहायक सिद्ध हुआ है।


Parashar Gaur

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Re: हमारे जनप्रतिनिधि/ OUR REPRESENTATIVE
« Reply #52 on: December 10, 2008, 05:37:16 PM »
गडवाल के राजबंसावाली 

१   कनाक्पाल  { गुजरात से आए थे }
२   श्यामपाल
३   पादुपाल
४   अभीभगत पाल 
५   सिगात्पाल
६   रतनपाल
७   सालपाल
८   बिधीपाल्ल
९   मदनपाल
१०  भगतिपाल
११  जैचंदर पाल
१२  केर्तीपाल
१३  मदनसिंह
१४  अभिबग्ती पाल /अजजीत पाल
१५  सुरतीपाल
१६  जीतपाल
१७  अनन्तपाल { मालवा कोट से आए )
१८  अनाद्पाल
१९  बिभोग पाल
२०  सुभियातु पाल
२१  बित्रम पाल ( अम्बुवा कोट से आए )
२२  बिचित्र पाल
२३  हंसपाल
२४  सोनपाल { भिलंग}
२५  कान्दिपाल { चांदपुर}
२६  कामदेब पाल
२७  सुतकन देब
२८  लखनपाल
२९  अनन्तपाल
३०  पूरणदेब
३१  अभयदेब
३२  जयराम देब
३३  असलदेब
३४  जगतपाल
३५  जीतपाल
३६  अन्मंत्र पाल
३७  अजयपाल
३८  अजयपाल
३९  कल्याणसाही
४० हंसदेब
४१  विजयपाल
४२  बादरसहा /बलभद्रसाह 
४३  मानसही
४४  महिपतसाही 
४५  पर्थेवीसही 
४६  उपेंदर सही
४७  फते शाही
४८  ललित कुवर सही
४९  जैक्रत सही
५०  प्रधुमन सही
५१  सुदर्शन सही
५२  भवानी सही
५३  प्रताप सही
५४  कीर्ती सही
५५  नरेंदर सही 
56   Manvender shahee  { last king  राज )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कर्णप्रयाग का इतिहास
विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
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अलकनंदा एवं पिंडर नदी के संगम पर बसा कर्णप्रयाग धार्मिक पंच प्रयागों में तीसरा है जो मूलरूप से एक महत्त्वपूर्ण तार्थ हुआ करता था। बद्रीनाथ मंदिर जाते हुए साधुओं, मुनियों, ऋषियों एवं पैदल तीर्थयात्रियों को इस शहर से गुजरना पड़ता था। यह एक उन्नतिशील बाजार भी था और देश के अन्य भागों से आकर लोग यहां बस गये क्योंकि यहां व्यापार के अवसर उपलब्ध थे। इन गतिविधियों पर वर्ष 1803 की बिरेही बाढ़ के कारण रोक लग गयी क्योंकि शहर प्रवाह में बह गया। उस समय प्राचीन उमा देवी मंदिर का भी नुकसान हुआ। फिर सामान्यता बहाल हुई, शहर का पुनर्निर्माण हुआ तथा यात्रा एवं व्यापारिक गतिविधियां पुन: आरंभ हो गयी।

वर्ष 1803 में गोरखों ने गढ़वाल पर आक्रमण किया। कर्णप्रयाग भी सामान्यत: शेष गढ़वाल की तरह ही कत्यूरी वंश द्वारा शासित रहा जिसकी राजधानी जोशीमठ के पास थी। बाद में कत्यूरी वंश के लोग स्वयं कुमाऊं चले गये जहां वे चंद वंश द्वारा पराजित हो गये।

कत्यूरियों के हटने से कई शक्तियों का उदय हुआ जिनमें सर्वाधिक शक्तिशाली पंवार हुए। इस वंश की नींव कनक पाल ने चांदपुर गढ़ी, कर्णप्रयाग से 14 किलोमीटर दूर, में डाली जिसके 37वें वंशज अजय पाल ने अपनी राजधानी श्रीनगर में बसायी। कनक पाल द्वारा स्थापित वंश पाल वंश कहलाया जो नाम 16वीं सदी के दौरान शाह में परिवर्तित हो गया तथा वर्ष 1803 तक गढ़वाल पर शासन करता रहा।

गोरखों का संपर्क वर्ष 1814 में अंग्रेजों के साथ हुआ क्योंकि उनकी सीमाएं एक-दूसरे से मिलती थी। सीमा की कठिनाईयों के कारण अंग्रेजों ने अप्रैल 1815 में गढ़वाल पर आक्रमण किया तथा गोरखों को गढ़वाल से खदेड़कर इसे ब्रिटिश जिले की तरह मिला लिया तथा इसे दो भागों– पूर्वी गढ़वाल एवं पश्चिमी गढ़वाल– में बांट दिया। पूर्वी गढ़वाल को अंग्रेजों ने अपने ही पास रखकर इसे ब्रिटिश गढ़वाल नामित किया। वर्ष 1947 में भारत की आजादी तक कर्णप्रयाग भी ब्रिटिश गढ़वाल का ही एक भाग था।

ब्रिटिश काल में कर्णप्रयाग को रेल स्टेशन बनाने का एक प्रस्ताव था, पर शीघ्र ही भारत को आजादी मिल गयी और प्रस्ताव भुला दिया गया। वर्ष 1960 के दशक के बाद ही कर्णप्रयाग विकसित होने लगा जब उत्तराखंड के इस भाग में पक्की सड़कें बनी। यद्यपि उस समय भी यह एक तहसील था। उसके पहले गुड़ एवं नमक जैसी आवश्यक वस्तुओं के लिये भी कर्णप्राग के लोगों को कोट्द्वार तक पैदल जाना होता था।

वर्ष 1960 में जब चमोली जिला बना तब कर्णप्रयाग उत्तरप्रदेश में इसका एक भाग रहा और बाद में उत्तराखंड का यह भाग बना जब वर्ष 2000 में इसकी स्थापना हुई।


http://hi.wikipedia.org/wiki

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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पंवारवंश
गढ़वाल का प्रारंभिक इतिहास कत्यूरी राजाओं का है, जिन्होंने जोशीमठ से शासन किया और वहां से 11वीं सदी में अल्मोड़ा चले गये। गढ़वाल से उनके हटने से कई छोटे राजाओं का उदय हुआ, जिनमें पंवार वंश सबसे अधिक शक्तिशाली था जिसने चांदपुर गढ़ी (किला) से शासन किया। कनकपाल को इस वंश का संस्थापक माना जाता है। इस विषय पर इतिहासकारों के बीच विवाद है कि वह कब और कहां से गढ़वाल आया।

कुछ लोगों के अनुसार वह वर्ष 688 में मालवा के धारा नगरी से यहां आये। कुछ अन्य मतानुसार वह गुज्जर देश से वर्ष 888 में आया जबकि कुछ अन्य बताते है कि उसने वर्ष 1159 में चांदपुर गढ़ी की स्थापना की। उनके 37वें वंशज अजयपाल के शासन के बीच के समय का कोई अधिकृत रिकार्ड नहीं है जो चांदपुर गढ़ी से राजधानी हटाकर 14वीं सदी में देवलगढ़ ले गया।

अजय पाल ने गढ़वाल के गढ़पतियों को परास्त कर, गढ़वाल के अधिकांश भाग पर पंवार वंश का शासन जमाया।


Vidya D. Joshi

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राजा बाज बहादूर चन्द के  ऐतिहासिक ताम्र पत्र  ( सन १६५८)

श्री साके १५८० कर्तिक सुदी २ चन्द्रे श्री बाज बहादूर  ज्यू ले
बैकुंठ जोईसी मणीकंठ गदाधर जोईसी बयाल लखमण देउबा
 नरी कंड्याल गजती जैसींग बोरो डोटी का सयाणा लाई
मुन्स्यारी ज्वार की भुमी कुताई बार सीरती की जामा कराई ब्यौरा

Devbhoomi,Uttarakhand

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टिहरी गढ़वाल का इतिहाश


टिहरी और गढ़वाल दो अलग नामों को मिलाकर इस जिले का नाम रखा गया है। जहाँ टिहरी बना है शब्‍द ‘त्रिहरी’ से, जिसका मतलब है एक ऐसा स्‍थान जो तीन तरह के पाप (जो जन्‍मते है मनसा, वचना, कर्मा से) धो देता है वहीं दूसरा शब्‍द बना है ‘गढ़’ से, जिसका मतलब होता है किला। सन्‌ 888 से पूर्व सारा गढ़वाल क्षेत्र छोटे छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था, जिनमें अलग-अलग राजा राज्‍य करते थे जिन्‍हें ‘राणा’, ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से जाना जाता था।


ऐसा कहा जाता है कि मालवा के राजकुमार कनकपाल एक बार बद्रीनाथ जी (जो आजकल चमोली जिले में है) के दर्शन को गये जहाँ वो पराक्रमी राजा भानु प्रताप से मिले। राजा भानु प्रताप उनसे काफी प्रभावित हुए और अपनी इकलौती बेटी का विवाह कनकपाल से करवा दिया साथ ही अपना राज्‍य भी उन्‍हें दे दिया। धीरे-धीरे कनकपाल और उनकी आने वाली पीढ़ियाँ एक-एक कर सारे गढ़ जीत कर अपना राज्‍य बड़ाती गयीं। इस तरह से सन्‌ 1803 तक सारा (918 सालों में) गढ़वाल क्षेत्र इनके कब्‍जे में आ गया।

उन्‍ही सालों में गोरखाओं के नाकाम हमले (लंगूर गढ़ी को कब्‍जे में करने की कोशिश) भी होते रहे, लेकिन सन्‌ 1803 में आखिर देहरादून की एक लड़ाई में गोरखाओं की विजय हुई जिसमें राजा प्रद्वमुन शाह मारे गये। लेकिन उनके शाहजादे (सुदर्शन शाह) जो उस वक्‍त छोटे थे वफादारों के हाथों बचा लिये गये। धीरे-धीरे गोरखाओं का प्रभुत्‍व बढ़ता गया और इन्‍होनें करीब 12 साल राज्‍य किया। इनका राज्‍य कांगड़ा तक फैला हुआ था, फिर गोरखाओं को महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा से निकाल बाहर किया। और इधर सुदर्शन शाह ने इस्‍ट इंडिया कम्‍पनी की मदद से गोरखाओं से अपना राज्‍य पुनः छीन लिया।


ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने फिर कुमाऊँ, देहरादून और पूर्व (ईस्‍ट) गढ़वाल को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला दिया और पश्‍चिम गढ़वाल राजा सुदर्शन शाह को दे दिया जिसे तब टेहरी रियासत के नाम से जाना गया।

राजा सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी टिहरी या टेहरी शहर को बनाया, बाद में उनके उत्तराधिकारी प्रताप शाह, कीर्ति शाह और नरेन्‍द्र शाह ने इस राज्‍य की राजधानी क्रमशः प्रताप नगर, कीर्ति नगर और नरेन्‍द्र नगर स्‍थापित की। इन तीनों ने 1815 से सन्‌ 1949 तक राज्‍य किया। तब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहाँ के लोगों ने भी काफी बढ चढ कर हिस्‍सा लिया। आजादी के बाद, लोगों के मन में भी राजाओं के शासन से मुक्‍त होने की इच्‍छा बलवती होने लगी। महाराजा के लिये भी अब राज करना मुश्‍किल होने लगा था। और फिर अंत में 60 वें राजा मानवेन्‍द्र शाह ने भारत के साथ एक हो जाना कबूल कर लिया। इस तरह सन्‌ 1949 में टिहरी राज्‍य को उत्तर प्रदेश में मिलाकर इसी नाम का एक जिला बना दिया गया। बाद में 24 फरवी 1960 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी एक तहसील को अलग कर उत्तरकाशी नाम का एक ओर जिला बना दिया।

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कत्यूरी व चन्द राजवंशों का उत्तराखंड

घनश्याम जोशी

भारत के उत्तराखंड में राजवंशों की शासन श्रृंखला के बारे में अनेक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर जो लिखा जाता रहा है एवं उसकी पांडुलीपियों और शिलालेखों से यहां के बारे में जो जानकारियां मिलती हैं वह उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास और सभ्यता को समृद्धशाली बनाती हैं। उत्तराखंड की नई पीढ़ी इस समय अपने उच्चतम विकास की प्रत्याशा में यहां से पलायन कर रही है या फिर उसमें अपने पूर्वजों को पढ़ने और समझने में कम ही दिलचस्पी है। इतिहास वेत्ताओं का कहना है कि उत्तराखंड का इतिहास राजवंशो से इतना समृद्धिशाली है कि उनकी पृष्ठभूमि इस तथ्य की पुष्टि करती है कि उत्तराखंड राज्य की आवश्यकता तो आज़ादी के समय से ही थी यदि इस पर दूरगामी राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से कार्य किया जाता तो देश का यह महत्वपूर्ण हिम क्षेत्र अब तक पर्यटन उद्योग का एक प्रमुख मॉडल और प्रत्येक दृष्टि से बहुत समृद्धशाली हो गया होता।
ईसा से 2500 वर्ष पहले पश्चिमोत्तर भू-भाग में कत्यूरी वंश के शासकों का आधिपत्य था। प्रारंभ में इनकी राजधानी जोशीमठ थी जो कि आज चमोली जनपद में है, बाद में कार्तिकेयपुर हो गई। कत्यूरी राजाओं का राज्य सिक्किम से लेकर काबुल तक था। उनके राज्य में दिल्ली व रोहेलखंड भी थे। पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने भी अपनी किताब में इस तथ्य का उल्लेख किया है। ताम्रपत्रों और शिलालेखों के अध्ययन से कत्यूरी राजा सूर्यवंशी ठहरते हैं इसीलिए कुछ शोधकर्त्ताओं के विचार से अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं का विस्तार कदाचित यहां तक हो। यह निर्विवाद है कि कत्यूरी शासक प्रभावशाली थे। उन्होंने खस राजाओं पर विजय पाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
आज दो राजस्व मण्डलों (कुमायूं, गढ़वाल) के 13 जिलों सिमट कर रह गया है किंतु यह कत्यूरी तथा चन्द राजवंशों, गोरखाराज और अंग्रेजों के शासनाधीन रहा। ईपू 2500 वर्ष से 770 तक कत्यूरी वंश, सन् 770-1790 तक चन्द वंश, सन् 1790 से 1815 तक गोरखा शासकों और सन् 1815 से भारत को आजादी मिलने तक अंग्रेज शासकों के अधीन रहा। कुमायूं और गढ़वाल मण्डल, शासन-प्रशासन, राजस्व वसूलने की सुविधा की दृष्टि से अंग्रेज शासकों ने बनाये थे।
कत्यूरी शासकों की अवनति का कारण शक व हूण थे। वे यहां के शासक तो रहे लेकिन अधिक समय नहीं। कत्यूरी राजवंश के छिन्न-भिन्न भू-भाग को समेट कर बाद में चन्द्रवंश के चंदेले राजपूत लगभग 1000 वर्ष यहां के शासक रहे। बीच में खस राजा भी 200 वर्ष तक राज्य करते रहे। इस प्रकार उत्तराखंड का यह भू-भाग दो राजवंशों के बाद अनिश्चिय का शिकार बना रहा।
कत्यूरी शासकों के मूल पुरुष शालिवाहन थे जो कुमायूं में पहले आए। उन्होंने ही जोशीमठ में राजधानी बनाई। कहा जाता है कि वह अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं में थे। अस्कोट (पिथौरागढ़ जनपद का एक कस्बा) रियासत के रजबार स्वयं को इसी वंश का बताते हैं। हां, यह शालिवाहन इतिहास प्रसिद्ध शालिवाहन सम्राट नहीं थे। ऐसा अवश्य हो सकता है कि अयोध्या का कोई सूर्यवंशी शासक यहां आया हो और जोशीमठ में रहकर अपने प्रभाव से शासन किया हो।
ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि जोशीमठ में राजधानी रखते हुए कत्यूरी राजा शीतकाल में ढिकुली (रामनगर के पास) में अपनी शीतकालीन राजधानी बनाते थे। चीनी यात्री हवेनसांग के वृत्तांतों से मिली जानकारी के अनुसार गोविषाण तथा ब्रह्मपुर (लखनपुर) में बौद्धों की आबादी थी। कहीं-कहीं सनातनी लोग भी रहते थे। इस प्रकार मंदिर व मठ साथ-साथ थे। यह बात 7वीं शताब्दी की है। लेकिन आठवीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य की धार्मिक दिग्विजय से यहां बौद्ध धर्म का ह्रास हो गया। शंकराचार्य का प्रभाव कत्यूरी राजाओं पर भी पड़े बिना नहीं रहा। कदाचित बौद्धधर्म से विरत होने के कारण उन्होंने जोशीमठ छोड़कर कार्तिकेयपुर में राजधानी बनायी। जोशीमठ में वासुदेव का प्राचीन मंदिर है जिसे कत्यूरी राजा वासुदेव का बनाया कहा जाता है इस मंदिर में 'श्री वासुदेव गिरिराज चक्रचूड़ामणि' खुदा है।
कत्यूरी राजाओं ने गढ़वाल से चलकर बैजनाथ (बागेश्वर के निकट) गोमती नदी के किनारे कार्तिकेयपुर बसाया जो पहले करवीरपुर के नाम जाना जाता था। उन्होंने अपने ईष्टदेव कार्तिकेय का मंदिर भी वहां बनवाया। इस घाटी को कत्यूर नाम दिया। कत्यूरी राजाओं के संबंध काश्मीर से आगे काम्बुल तक थे काश्मीर के तुरुख वंश के एक राजा देवपुत्र वासुदेव के पुत्र कनक देव काबुल में अपने मंत्री के हाथों मारे गये। ऐटकिंसन का तो यहां तक मानना है कि काश्मीर के कठूरी वंश के राजाओं ने ही घाटी का नाम कत्यूर रखा। कई पीढ़ियों तक कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन रहा। दूर-दूर के राजाओं के राजदूत कत्यूरी राजाओं के दरबार में आते थे।
कत्यूरी राजा कला-संस्कृति के प्रेमी थे और प्रजा-वत्सल भी। उन्होंने जन-कल्याण के लिए नौले (बाबड़ी), नगर, मंदिर बनाये। जहां वे निर्माण का कोई कार्य करते वहां पत्थर का स्तम्भ अवश्य गाड़ते थे। 'बिरखम्म' के रूप ऐसे स्तंभ आज भी उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों में दबे पाये जाते हैं। कई जगहों पर शिलालेख भी मिलते हैं जो कत्यूरी राजाओं के प्रभुत्व के साक्षी हैं। कुछ कत्यूरी राजाओं के स्थापित शिलालेखों से उनके नामों का पता चलता है, यथा: बसन्तनदेव, खरपरदेव, कल्याणराजदेव, त्रिभुवनराजदेव, निम्बर्तदेव, ईशतारण देव, ललितेश्वरदेव, भूदेवदेव जो गिरिराज चक्रचूड़ामणि या चक्रवर्ती सम्राट कहे जाते थे। कई शिलालेख संस्कृत भाषा में भी उत्कीर्ण हैं।
बंगाल के शिलालेखों और उत्तराखंड के शिलालेखों की इबारत में साम्य यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं दोनों का सम्पर्क था। यह बंगाल के पाल व सेन राजवंशों का उत्तराखंड के कत्यूरी वंश के राजाओं से हो सकता है। यह भी संभव है कि शिलालेखों को लिखने वालों ने एक दूसरे की इबारत की नकल की हो। ऐटकिंसन नकल की संभावना अधिक जताते हैं। हालांकि अपने को कत्यूरी राजाओं का वंशज बताने वाले अस्कोट के रजबार ऐतिहासिक कसौटी पर बंगाल के पालवंशीय राजाओं के निकट नहीं ठहरते तो भी यह सत्य है कि कत्यूरी राजा प्रतापी थे, बलशाली थे और उनके साम्राज्य का विस्‍तार बंगाल तक हो और वे पाल राजाओं को परास्त करने में सफल हुए हों। कत्यूरी शासकों के बाद सन् 700 से 1790 तक चन्द राजवंश का उत्तराखंड में आधिपत्य रहा।
कुमायूं में गोरखों के राज को अंग्रेजों को सौंपने में अपना योगदान देने वाले चर्चित पं हर्षदेव जोशी के बारे में जो दस्तावेज मिलते हैं उनके अनुसार हर्षदेव जोशी ने अंग्रेज फ्रेजर को बताया 'चन्दों के पहले राजा मोहरचन्द थे जो 16-17 की आयु में यहां आये थे। उनके बाद तीन पीढ़ी तक कोई उत्तराधिकारी न होने से मोहरचन्द के चाचा की संतानों में से ज्ञानचन्द को राजा बनाया गया।' इसके अनुसार मोहरचन्द कुमायूं में सन् 1261 में आये और ज्ञानचंद सन् 1374 में गद्दी में बैठे।
ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि राजा मोहरचन्द ने झूंसी से आकर नेपाल के किसी जार (जाट) राजा के यहां नौकरी की किंतु बाद में कुमायूं के कबीरपुर राज्य के राजा को परास्त कर जयदेव तथा अन्य हितैषियों के साथ मिलकर चम्पावती व कूर्मांचल राज्य की स्थापना की। यही भू-भाग बाद में कुमायूं हो गया। काल गणना के अनुसार यह सन् 1438 पड़ता है। इसको हैमिल्टन ने अपने लिखे इतिहास में स्थान दिया और ऐटकिंसन ने उद्धृत किया। ऐसा भी कहा या सुना जाता है कि सोमचन्द एमणटी राजा के भानजे थे और अपने मामा से मिलने आये थे।
ऐसी भी किम्बदन्ती प्रचलित है कि कुमायूं के पुराने वाशिन्दे बोरा या बोहरा जाति के लोगों के अधिकार कत्यूरी राजाओं द्वारा छीन लिए जाने से वे असंतुष्ट थे, इसलिए वे चुपचाप चन्द वंश के राजकुमार सोमचन्द से झूंसी में मिले और विस्तारपूर्वक सभी प्रकार का ऊंच-नीच समझाकर उन्हें कुमायूं लिवा लाए और कत्यूरी राजा के एक अधिकारी गंभीरदेव की कन्या से उसका विवाह करवा दिया। सोमचन्द देखने में रूपवान, बुद्धिमान, वाचाल, शरीर से बलवान व्यवहार में कुशल व चतुर थे। उन्होंने चम्पावतपुरी को शीघ्र ही नया राज्य बनाकर स्वयं राजा बन बैठे। प्राप्त दस्तावेजों से ज्ञात होता है कि सोमचन्द के गद्दी पर बैठने का समय सन् 700 ठहरता है। यहीं से चन्द वंश का शासन शुरू होता है। कत्यूरी राजवंश के पतन के बाद थोड़े वे इधर-उधर बचे कत्यूरी वंश के छोटे-छोटे राजाओं को परास्त करने में चन्द वंश के उत्तराधिकारियों को कोई कठिनाई नहीं हुई। कत्यूरियों के अलावा खस जाति के लोग भी बिखरे हुए ऊंचे टीलों पर रहते और लूटपाट से अपना जीवन बिता रहे थे। आशय यह कि चन्द वंश ने जब राज्य स्थापित किया तो उस समय अराजकता व्याप्त थीं।
इस समय कन्नौज के राजा को प्रतिष्ठित ही नहीं सार्वभौम माना जाता था। समाज के गुणी जनों की राय से सोमचन्द ने अपनी ओर से एक प्रतिनिधिमंडल कन्नौज भेजा। चम्पावत में सोमचन्द ने एक किला बनवाया और उसे 'राजा बुंगा' नाम दिया। कार्की, बोरा तड़ागी, चौधरी फौजदार या किलेदार थे। राजा सोमचन्द ने उस समय नियमबद्ध राज्य प्रणाली अथवा पंचायती प्रणाली की नींव डाली। कुमायूं के दो जबर्दस्त दलों महर व फर्त्याल को नियंत्रण में रखा। यह राजा सोमचन्द की चतुराई तथा योग्य शासक होने का प्रमाण है। सामान्य मांडलीक राजा से शुरू करके सोमचन्द जब सन् 731 में परलोक सिधारे तो उनके राज्य में कालीकुमाऊं परगना के अलावा ध्यानीरौ, चौभेंसी, सालम व रंगोड़ पट्टियां उनके अधीन थी। वे 21 वर्ष गद्दी में रहे।
राजा सोमचन्द के बाद आत्मचन्द गद्दी पर बैठे। 21 वर्ष राजा रहते हुए उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। कई छोटे-छोटे सरदार उनके दरबार में सलामी बजाने आते थे। धर्म-कर्म में रूचि रखने वाले और प्रजावत्सल थे। सन् 740 में वह स्वर्गवासी हो गये।
आत्मचन्द के बाद पूर्णचन्द राजा हुए। वह शिकार के शौकीन थे। राजकाज में मन कम लगता था। अठारह वर्ष राज्य करने के पश्चात अपने पुत्र इन्द्रचन्द को गद्दी सौंपकर सन् 815 में पूर्णागिरी की सेवा में लग गये और एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु भी हो गयी। इन्द्रचन्द ने बीस वर्ष राज्य किया। उनके शासन काल की विशेष घटना रेशम का कारखाना खुलवाने की है। रेशम के कीड़ों के लिए शहतूत (कीमू) के पेड़ लगवाए। बुनकरों (पटुवों) को रोजगार मिला।
चन्द वंशावली के राजाओं में सबसे अधिक समय (41 वर्ष) राजा ज्ञानचन्द् ने राज्य किया। उनके संबंध दिल्ली के तुगलक बादशाह से भी थे। जब रोहेलखंड के नवाबों ने माल (तराई) का भू-भाग चन्द राजा से छीना तो ज्ञानचन्द ने इसकी शिकायत तत्कालीन बादशाह मुहम्मद तुगलक से की। एक सर्प का शिकार कर उसे ले जा रहे गरुड़ को मारकर ज्ञानचंद ने तुगलक बादशाह को प्रसन्न कर दिया। बदले में बादशाह ने उनका छीना भू-भाग तो लौटाया ही साथ में उन्हें 'गरुड़ ज्ञानचंद' की उपाधि भी दे दी।
चन्द वंशावली के सभी राजाओं का उल्लेख कर पाना संभव नहीं है। राजा कल्याणचन्द के बाद तो चन्द्रवंश के राज्य का अवसान सा हो गया। पहाड़ ही नहीं तराई भावर (माल) से भी चन्द वंश के राजाओं का प्रभाव क्षीण हो गया। इस प्रकार उत्तराखंड दो राजवंश (कत्यूरी-चन्द) अपने-अपने राज्यों को गोरखालि राज को सौंपने के लिए बाध्य हुए। कदाचित समय को यही मंजूर था।

Source : http://www.swatantraawaz.com/uttarakhand_iind.htm

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढ़वाल का इतिहास
टिहरी गढ़वाल
टिहरी और गढ़वाल दो अलग
नामों को मिलाकर इस जिले का नाम
रखा गया है। जहाँ टिहरी बना है शब्द
‘त्रिहरी’ से, जिसका अर्थ है एक
ऐसा स्थान जो तीन प्रकार के पाप
(जो जन्मते है मनसा, वचना, कर्मा से)
धो देता है वहीं दूसरा शब्द बना है ‘गढ़’
से, जिसका मतलब होता है किला।
सन् ८८८ से पूर्व सारा गढ़वाल क्षेत्र
छोटे छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था, जिनमें
अलग-अलग राजा राज्य करते थे जिन्हें
‘राणा’, ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से
जाना जाता था। ऐसा कहा जाता है
कि मालवा के राजकुमार कनकपाल एक
बार बद्रीनाथ जी (जो वर्तमान
चमोली जिले में है) के दर्शन को गये
जहाँ वो पराक्रमी राजा भानु प्रताप से
मिले। राजा भानु प्रताप उनसे
काफी प्रभावित हुए और
अपनी इकलौती बेटी का विवाह कनकपाल
से करवा दिया साथ ही अपना राज्य
भी उन्हें दे दिया। धीरे-धीरे कनकपाल और
उनकी आने वाली पीढ़ियाँ एक-एक कर
सारे गढ़ जीत कर अपना राज्य
बड़ाती गयीं। इस प्रकार सन् १८०३ तक
सारा (९१८ वर्षों में) गढ़वाल क्षेत्र
इनके अधिकार में आ गया। उन्ही वर्षों में
गोरखाओं के असफल हमले (लंगूर
गढ़ी को अधिकार में लेने का प्रयास)
भी होते रहे, लेकिन सन् १८०३ में आखिर
देहरादून की एक लड़ाई में गोरखाओं
की विजय हुई जिसमें राजा प्रद्वमुन शाह
मारे गये। लेकिन उनके शाहजादे (सुदर्शन
शाह) जो उस समय छोटे थे वफादारों के
हाथों बचा लिये गये।
धीरे-धीरे गोरखाओं का प्रभुत्व
बढ़ता गया और इन्होनें लगभग १२
वर्षों तक राज किया। इनका राज्य
कांगड़ा तक फैला हुआ था, फिर गोरखाओं
को महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा से
निकाल बाहर किया। और इधर सुदर्शन
शाह ने इस्ट इंडिया कम्पनी की मदद से
गोरखाओं से अपना राज्य पुनः छीन
लिया।
ईस्ट इण्डिया कंपनी ने फिर कुमाऊँ,
देहरादून और पूर्व गढ़वाल को ब्रिटिश
साम्राज्य में मिला दिया और पश्चिम
गढ़वाल राजा सुदर्शन शाह को दे
दिया जिसे तब टेहरी रियासत के नाम से
जाना गया। राजा सुदर्शन शाह ने
अपनी राजधानी टिहरी या टेहरी नगर
को बनाया, बाद में उनके
उत्तराधिकारी प्रताप शाह,
कीर्ति शाह और नरेन्द्र शाह ने इस राज्य
की राजधानी क्रमशः प्रताप नगर,
कीर्ति नगर और नरेन्द्र नगर स्थापित
की। इन तीनों ने १८१५ से सन् १९४९
तक राज किया। तब भारत छोड़ो आंदोलन
के दौरान यहाँ के लोगों ने भी बहुत बढ़चढ़
कर भाग लिया। स्वतन्त्रता के बाद,
लोगों के मन में भी राजाओं के शासन से मुक्त
होने की इच्छा बलवती होने लगी।
महाराजा के लिये भी अब राज
करना कठिन होने लगा था।
और फिर अंत में ६० वें राजा मानवेन्द्र
शाह ने भारत के साथ एक
हो जाना स्वीकर कर लिया। इस प्रकार
सन् १९४९ में टिहरी राज्य को उत्तर
प्रदेश में मिलाकर इसी नाम का एक
जिला बना दिया गया। बाद में २४
फ़रवरी १९६० में उत्तर प्रदेश सरकार ने
इसकी एक तहसील को अलग कर
उत्तरकाशी नाम का एक ओर
जिला बना दिया।

Pawan Pathak

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कत्यूरों का आंगन फिर महकेगा

जगत सिंह रौतेला, द्वाराहाट प्राचीन कत्यूरी शासकों की राजधानी स्थित स्थापत्य कला के बेमिसाल नमूनों में दोबारा जान फूंकी जाएगी। देवभूमि की विशुद्ध नागर एवं रूचक शैली में बना न्याय का मंदिर यानी कचहरी देवाल तथा मनियान देव मंदिर समूह के जीर्णोद्धार का रास्ता साफ हो गया है। 10वीं सदी के आसपास बने दोनों धरोहर स्थलों का मौलिक स्वरूप बरकरार रहे, इसके लिए कत्यूर वंश की राजधानी स्थित चांचरी व संबंधित उन्हीं पहाड़ियों से पटाल व दीवारों के लिए सेंड स्टोन निकाले जाएंगे, जिन्हें कत्यूरी राजाओं ने सदियों पूर्व निर्माण के लिए उपयुक्त पाया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने बाकायदा 28 लाख का बजट स्वीकृत कर दिया है। 1भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने स्थानीय धरोहर स्थलों के जीर्णोद्धार के ब्लू प्रिंट को अंतिम रूप दे दिया है। कत्यूरी राजाओं के न्याय मंदिर कचहरी देवाल प्रांगण को मूल स्वरूप में लाने के लिए क्षतिग्रस्त व बिखर चुके आंगन पर नए सिरे से पटाल बिछेंगे। विशेष किस्म के सेंड स्टोन से निर्मित मंदिर प्रांगण में 10वीं सदी के दौरान शिल्पियों ने चांचरी व आसपास की पहाड़ियों से विशाल आकार के पत्थर तराशे थे। वहीं से दोबारा सदियों बाद पत्थर निकाल बिछाने की स्वीकृति मिल गई है। इसके अलावा कत्यूर काल की एक और थाती मनियान देव मंदिर समूह का आंगन भी बहुत जल्द अपने मौलिक स्वरूप में दिखेगा। यही नहीं, इन दोनों मंदिरों की बाहरी व आंतरिक दीवारों पर लगे जो पत्थर गिर चुके हैं, अथवा खराब हो गए हैं, उन्हें भी बदला जाएगा। ताकि हिमालयी राज्य की अद्भुत स्थापत्य कला के साथ ही विरासत को संजो कर रखा जा सके।

Source-http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/05-dec-2015-edition-Pithoragarh-page_2-26024-3378-140.html

 

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