Author Topic: Historical information of Uttarakhand,उत्तराखंड की ऐतिहासिक जानकारी  (Read 34660 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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                     द्रोणनगरी में भी पड़े थे स्वामी विवेकानंद के पावन पग
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 नगाधिराज हिमालय स्वामी विवेकानंद को भी आकर्षित करता रहा था। द्रोणनगरी, यानी देहरादून को भी उनके दर्शन का दो बार सौभाग्य मिला। स्वामी गंभीरानंद द्वारा लिखित स्वामी विवेकानंद की जीवनी 'युग नायक विवेकानंद' के मुताबिक 1890 में नैनीताल, अल्मोड़ा, कर्ण प्रयाग, रुद्रप्रयाग होते हुए वे डांडी में श्रीनगर आए जहां उन्होंने ईसाई बन चुके एक टीचर को फिर से सनातन धर्म में लौटाया।

स्वामी विवेकानंद इसके बाद भागीरथी दर्शन को टिहरी गए और भागीरथी व भिलंगना के संगम गणेश प्रयाग में कुटिया बनाकर रहे। वहां से टिहरी राजा के दीवान रघुनाथ भंट्टाचार्य ने उन्हें दो घोड़ों में दून पहुंचवाया। मसूरी से आते हुए 13 अक्टूबर1890 को उन्हें अपनी गुरुभाई स्वामी तुरीयानंद मिले। देहरादून में उन्हें व बीमार स्वामी अखंडानंद को आश्रय स्थल खोजने में बहुत परेशानी हुई। एक बनिए के आधे अधूरे बने घर में आसरा मिला।

मगर यहां इतनी सीलन थी कि ब्रोंकाइटिस से पीड़ित स्वामी अखंडानंद का स्वास्थ्य और बिगड़ जाता। स्वामी विवेकानंद को जनरल एसेंबलीज कालेज के अपने सहपाठी ईसाई हृदय बाबू मिल गए। हृदय बाबू दून में एक स्कूल में शिक्षक थे। बाद में एक कश्मीरी वकील आनंद नारायण की मदद से नंद गांटा नाम से मशहूर एक व्यवसायी के यहां किराए का कमरा मिला।

 यहां वह तीन हफ्ते रहे। दून आकर स्वामी विवेकानंद दूनघाटी के शांत, वातावरण से बहुत से अभिभूत हुए थे। राजपुर स्थित बावड़ी मंदिर के नीचे गुफा में उनके गुरु भाई स्वामी तुरीयानंद तपस्यारत थे। स्वामी विवेकानंद ने वहां अपने गुरु भाई से भेंट की। इस कमरे को मिलाकर दो कमरे आज भी मौजूद हैं। इसकी देखरेख रामकृष्ण मिशन के स्तर पर की जाती है। रामकृष्ण मिशन आश्रम देहरादून के अध्यक्ष स्वामी निर्विकल्पानंद बताते हैं कि यह कमरा और स्थल लोगों की श्रद्धा का केंद्र है।

देहरादून से स्वामी विवेकानंद ऋषिकेश गए फिर देहरादून से वह सहारनपुर के वकील बंकुबिहारी चटोपाध्याय के घर भी रहे जहां से वह मेरठ चले गए।

 शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में सनातन धर्म व भारतीय संस्कृति की अमिट छाप छोड़ने के बाद 1897 में स्वामी विवेकानंद दार्जिलिंग से फिर देहरादून पहुंचे थे। उन्होंने 14 नवंबर को इंदुमती मित्र को पत्र लिखकर बताया था कि वह देहरादून में एक सप्ताह रहेंगे मगर उन्होंने यहां 10 दिन तक प्रवास किया और फिर राजपूताना चले गए। देहरादून में उनके शिष्य कैप्टन सेवियर व उनकी पत्नी अनाथालय खोलना चाहते थे।

 इससे वे बेहद खुश हुए। बड़ा सपना संजोए स्वामी विवेकानंद देहरादून अल्मोड़ा में रामकृष्ण मिशन के केंद्र बनाना चाहते थे। मगर उनके शुरुआती प्रयास सफल नहीं हुए। स्वामी निर्विकल्पानंद के मुताबिक स्वामी विवेकानंद की स्पष्ट धारणा थी कि साधकों को घोर तप और अध्ययन करना चाहिए। उनकी चाहत थी कि आश्रम में मौजूद संन्यासी गरीबों, बीमारों और जरूरतमंदों के लिए दीवानों की तरह काम करें।

उत्तराखंड में ज्ञान का प्राप्ति

स्वामी विवेकानंद की जीवनी 'युगनायक विवेकानंद' के मुताबिक नैनीताल से अल्मोड़ा की राह पर एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। उनके सहयात्री गुरुभाई स्वामी अखंडानंद ने अपनी डायरी में नोट किया है कि स्वामी विवेकानंद ने उनसे कहा था कि सृष्टि के आदि में शब्द ब्रह्म था। अणु ब्रह्मांड व विश्व ब्रहमांड की एक ही नियम से रचना हुई।

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सनातनी परंपरा की गवाह है धर्मनगरी

हरिद्वार को यूं ही धर्मनगरी नहीं कहा गया है, यहां के कण-कण में भक्ति के स्वर फूटते हैं। आदिकाल से लेकर अब तक यहां समय-समय पर अनेक धार्मिक अनुष्ठान होते रहे हैं, जिन्होंने हरिद्वार को धर्मनगरी का दर्जा प्रदान किया। इन्हीं विराट धार्मिक अनुष्ठानों में महाकुंभ आयोजन की परंपरा आज भी चली आ रही है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हरिद्वार के साथ कई कथाएं जुड़ी हैं। धार्मिक साहित्य में हरिद्वार का नाम कपिल आश्रम के रूप में सबसे पहले आता है।

 महाभारत काल में उलूपी को अर्जुन से इरावत नाम के पुत्र की प्राप्ति हुई। इस प्रकार से कहा जाए तो हरिद्वार इरावत की ननिहाल भी रहा है। यह भी मान्यता है कि हरिद्वार के साथ भीम का गहरा संबंध रहा है। भीम के घोडे़ की ठोकर से जो कुंड बना, उसे आज भी भीमगोड़ा के नाम से जाना जाता है। हरिद्वार के बाबत इस तरह के ऐतिहासिक तथ्य भी मिलते हैं कि मैत्रेय ऋषि को विदुर ने महाभारत की कथा हरिद्वार में ही सुनाई थी और यहीं पर सप्तर्षियों ने इस कथा को देवर्षि नारद को सुनाया।

हरिद्वार में ब्रह्मकुंड के समीप ब्रह्मा की तपस्या करके महाराज श्वेत ने उनसे वरदान प्राप्त किया कि ब्रह्मा अन्य देवी देवताओं के साथ सदा इस स्थल पर विराजमान रहेंगे। उनके नाम से यह कुंड ब्रह्मकुंड कहलाया। यह भी कहा जाता है कि कुशावर्त घाट पर स्वयं भगवान दत्तात्रेय ने भी तपस्या की थी। हरिद्वार के ऐतिहासिक धार्मिक तथ्यों का सिलसिला यहीं नहीं थमता है।

पुराण चर्चित लोमस ऋषि के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने युधिष्ठर को हरिद्वार की विशेषता बताते हुए कहा था कि भगवान शिव ने यहीं पर गंगा को अपनी जटाओं में लिया था। इसी के कारण गंगा के वेग में कुछ कमी आई। ऐसी भी मान्यता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडव हिमालय जाते समय पहले हरिद्वार आये। हरिद्वार में ही कनखल नामक स्थान पर प्रथम जैन तीर्थाकर आदिनाथ ने आकर तपस्या की थी।

जनश्रुति के अनुसार 38 ईसा पूर्व विक्रम संवत के प्रवर्तक उज्जयिनी के महाराजा विक्रमादित्य के ज्येष्ठ भ्राता भतर्ृहरि ने हरिद्वार में गंगा के किनारे तपस्या की। राजा विक्रम ने अपने भाई भतर्ृहरि की तपस्थली पर ब्रह्मकुंड एवं हरि की पैड़ी घाट का निर्माण कराया था। इसके अलावा अबुल फजल की पुस्तक आइन-ए-अकबरी के मुताबिक यह भी माना जाता है कि अकबर के शासनकाल में हरिद्वार में तांबे के सिक्के ढालने के लिए टकसाल भी थी।

कहने का मतलब हरिद्वार पौराणिक ही नहीं, ऐतिहासिक महत्व का शहर भी है, जहां समय-समय पर कई सभ्यताएं फूलती-फलती रही हैं। अब जबकि, महाकुंभ सिर पर है, ऐसे में धार्मिक लिहाज से भी इन ऐतिहासिक प्रसंगों की प्रासंगिकता बढ़ गई है।

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मौर्यकाल में कुरु जनपद का अंग रहा हरिद्वार

पुराणों में उल्लिखित मायापुर [हरिद्वार] में इक्कीसवीं सदी का प्रथम कुंभपर्व आरंभ हो चुका है, जाहिर है हर कोई इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से भी परिचित होना चाहेगा।

सातवीं शताब्दी के आसपास उत्तर भारत विभिन्न जनपदों में बंटा था। बौद्ध व जैन साहित्य समेत पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है। रैपसन कुरु महाजनपद को गंगा-यमुना के मध्यवर्ती क्षेत्र शिवालिक पहाडि़यों तक फैला मानते हैं। वह लिखते हैं कि कुरु जनपद के उत्तर में हिमालय पर्वत, पूर्व में उत्तर पांचाल एवं दक्षिण पांचाल स्थित है। इससे स्पष्ट है कि महाजनपद काल में हरिद्वार कुरु जनपद का अंग था।

ईसा पूर्व से आरंभ होता है हरिद्वार का इतिहास, तब संपूर्ण उत्तर भारत में नंदवंश का शासन था। 321 ईसा पूर्व नंदवंश के पराभव के बाद मौर्य वंश का आधिपत्य स्थापित हुआ। संपूर्ण उत्तर भारत में हिमालय एवं नर्मदा के बीच मौर्य साम्राज्य फैला हुआ था।

उस दौर में हरिद्वार क्षेत्र मौर्य साम्राज्य का ही अंग रहा। हालांकि कोई स्पष्ट साक्ष्य हरिद्वार क्षेत्र से उपलब्ध नहीं हुआ है, लेकिन समीपस्थ जनपद देहरादून में यमुना के दाएं किनारे पर स्थित कालसी क्षेत्र में मौर्य सम्राट द्वारा उत्कीर्ण कराया गया शिलालेख एवं हरियाणा के यमुनानगर जनपद में खिजरावाद के समीप ग्राम टोपरा से प्राप्त स्तंभ लेखों से पता चलता है कि इस क्षेत्र पर मौर्य साम्राज्य का विस्तार था।

भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष डा.प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात उत्तर भारत में 184 ईसा पूर्व पुष्यमित्र ने शुंग साम्राज्य की स्थापना की। शुंग राजाओं के 112 वर्षो के राज्यकाल के पश्चात 72 ईसा पूर्व कण्व ब्राह्मणों ने पुष्यमित्र शुंग का अनुकरण करते हुए राजसत्ता पर अपना प्रभुत्व जमा लिया।

भारतीय इतिहास में शुंग-कण्व काल सनातन धर्म के पुनरुत्थान के लिए महत्वपूर्ण युग था, लेकिन ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि हरिद्वार क्षेत्र पर शुंग राजाओं का प्रभाव रहा होगा। अलबत्ता साहित्यिक कृतियों, जनश्रुतियों व धार्मिक साहित्य में कनखल व गंगाद्वार का उल्लेख जरूर मिलता है।

महाकवि कालिदास ने भी अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'मेघदूत' के पूर्वा‌र्द्ध में कनखल नगर का उल्लेख किया है। ऐतिहासिक शोध बताते हैं कि महाकवि कालिदास शुंगराजा अग्निमित्र के समकालीन थे। ऐसे भी प्रमाण हैं कि 38 ईसा पूर्व विक्रम संवत् के प्रवर्तक उज्जयिनी नरेश महाराज विक्रमादित्य के बड़े भाई भतर्ृहरि ने गंगाद्वार में गंगा किनारे तपस्या की थी।

राजा विक्रम ने अपने भाई भतर्ृहरि की तपस्थली पर 'ब्रह्मकुंड' एवं 'हरकी पैड़ी' घाट का निर्माण करवाया था। हरकी पैड़ी एवं ब्रह्मकुंड निर्माण के बारे में यह पहला संदर्भ है।

डा. मिश्रपुरी के अनुसार अंतिम कुषाण शासक वासुदेव के पश्चात लगभग एक सदी तक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में क्षेत्र की स्थिति स्पष्ट नहीं है। सहारनपुर गजेटियर में एचआर नेविल ने लिखा है कि वर्तमान परगना मंगलौर के तत्कालीन राजा मंगलसेन ने गुप्त शासकों का अधीनता स्वीकार कर ली थी। वर्ष 1992 के पूर्वा‌र्द्ध में ग्राम अजमेरीपुर उत्खनन से प्राप्त सामग्री में गुप्तकालीन संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं।

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यही गंगा युवान-च्वांग की है महाभद्रा

गुप्तकाल में मायापुर ने आकार लेना आरंभ कर दिया था, जिसकी पुष्टि पुरातत्ववेत्ता कनिंघम के लेख से भी होती है। प्राचीन मायापुर स्थित 'नारायण बलि' मंदिर के संबंध में वह लिखते हैं कि यह मंदिर 9.5 इंच की वर्गाकार और 2.3 इंच मोटी ईटों से निर्मित है।

 यह माप गुप्तकालीन ईटों के अनुरूप है। भारतीय इतिहास में गुप्तकाल की अवधि 650 ईस्वी तक मानी गई है, लेकिन पश्चिमी भाग हूण आक्रमण के कारण या तो हूणों के अधीन रहा अथवा उनसे प्रभावित हुआ।

शताब्दी के अंतिम चरण में स्कंदगुप्त की मृत्यु के पश्चात 'थानेश्वर' में प्रभाकरवर्धन ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली और गंगा-यमुना के मध्य क्षेत्र एवं गंगा पार क्षेत्र में राज्य विस्तार के लिए उन्मुख हुआ।

प्रभाकरवर्धन के पश्चात राज्यवर्धन ने भी तेजी से अपने राज्य का विस्तार किया, लेकिन इस बीच उसकी अकाल मृत्यु हो गई और 606 ईस्वी में राज्य की बागडोर हर्षवर्धन के हाथ आ गई।

 अल्प अवधि में ही उत्तर में हिमालय, पूरब में बंगाल एवं दक्षिण में नर्मदा तक उसका साम्राज्य फैल गया। इस दौरान 629 ईस्वी में चीनी यात्री युवान-च्वांग [ह्वेनसांग] भारत भ्रमण पर आया। अपने यात्रा वृत्तांत में उसने मायापुर नगर गंगाद्वार का उल्लेख किया है।

वृत्तांत के अनुसार वह मंडावर के उत्तर-पश्चिम में भद्रा [गंगा] के पूर्वी किनारे पर स्थित मो-यु-लो अथवा म-य-रा नगर पहुंचता है। पुरातत्ववेत्ता कनिंघम लिखते हैं कि युवान-च्वांग का मो-यु-लो हरिद्वार एवं कनखल के मध्य ध्वस्त क्षेत्र मायापुर ही है।

ह्वेनसांग के अनुसार मायापुर घनी आबादी का नगर है, जिसकी परिधि 20 ली. [चीनी नाप की यूनिट] अर्थात् 3.3 मील है। कनिंघम ने ललताराव से लेकर राजा वेन का किला क्षेत्र [वर्तमान भल्ला कालेज] तक के क्षेत्र की माप लेकर चीनी यात्री के कथन की पुष्टि की है।

गंगाद्वार के बारे में ह्वेनसांग लिखता है कि मायापुर नगर से थोड़ी दूरी पर नदी में एक बड़ा मंदिर स्थित है, जिसे गंगा का द्वार अर्थात् गंगाद्वार कहा जाता है। वह गंगाद्वार के पास एक कुंड का भी उल्लेख करता है, जिसमें पवित्र नदी महाभद्रा [गंगा] का जल एक नहर द्वारा लाया जाता है। कनिंघम की यह धारणा है कि ह्वेनसांग द्वारा उल्लिखित कुंड ही वर्तमान ब्रह्मकुंड है।

ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत में कहा गया है कि हिंदू लोग अपने परिजन की मृत्यु के पश्चात शव जलाकर उसके अवशेष [अस्थियां] एवं भस्म को गंगाजल में प्रवाहित करते हैं। इससे मृतक व्यक्ति को उसके कर्मो से मुक्ति मिल जाती है। उसे मरणोपरांत स्वर्ग की प्राप्ति हो और पुनर्जन्म हो तो अच्छे, उच्च धर्मपालक गृह में हो।

उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि महाभारतकालीन परंपराओं का संपादन सातवीं शताब्दी में भी किया जा रहा था। ह्वेनसांग आवासीय क्षेत्र का उल्लेख केवल मायापुर के रूप में ही करता है, जबकि गंगा को उसने महाभद्रा कहा है।

कनिंघम लिखते हैं कि महाभद्रा गंगा के अनेक पर्यायवाची शब्दों में से एक है। हो सकता है कि कनखल क्षेत्र में गंगा को तब भद्रा या महाभद्रा कहा जाता रहा हो।

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                                           उत्तराखंड के इतिहास का एक पन्ना
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उत्तराखंड में राजवंशों की शासन श्रृंखला के बारे में अनेक  पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर जो लिखा जाता रहा है एवं उसकी पांडुलीपियों  और शिलालेखों से यहां के बारे में जो जानकारियां मिलती हैं वह उत्तराखंड  के प्राचीन इतिहास और सभ्यता को समृद्धशाली बनाती हैं। उत्तराखंड की नई  पीढ़ी इस समय अपने उच्चतम विकास की प्रत्याशा में यहां से पलायन कर रही है  या फिर उसमें अपने पूर्वजों को पढ़ने और समझने में कम ही दिलचस्पी है।

 इतिहास वेत्ताओं का कहना है कि उत्तराखंड का इतिहास राजवंशो से इतना  समृद्धिशाली है कि उनकी पृष्ठभूमि इस तथ्य की पुष्टि करती है कि उत्तराखंड  राज्य की आवश्यकता तो आज़ादी के समय से ही थी यदि इस पर दूरगामी राजनीतिक  और आर्थिक दृष्टि से कार्य किया जाता तो देश का यह महत्वपूर्ण हिम क्षेत्र  अब तक पर्यटन उद्योग का एक प्रमुख मॉडल और प्रत्येक दृष्टि से बहुत  समृद्धशाली हो गया होता। 

  ईसा से 2500 वर्ष पहले पश्चिमोत्तर भू-भाग  में कत्यूरी वंश के शासकों का आधिपत्य था। प्रारंभ में इनकी राजधानी  जोशीमठ थी जो कि आज चमोली जनपद में है, बाद में कार्तिकेयपुर हो गई।  कत्यूरी राजाओं का राज्य सिक्किम से लेकर काबुल तक था। उनके राज्य में  दिल्ली व रोहेलखंड भी थे। पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने भी अपनी किताब में इस  तथ्य का उल्लेख किया है।

 ताम्रपत्रों और शिलालेखों के अध्ययन से कत्यूरी  राजा सूर्यवंशी ठहरते हैं इसीलिए कुछ शोधकर्त्ताओं के विचार से अयोध्या के  सूर्यवंशी राजाओं का विस्तार कदाचित यहां तक हो। यह निर्विवाद है कि  कत्यूरी शासक प्रभावशाली थे। उन्होंने खस राजाओं पर विजय पाकर अपने  साम्राज्य का विस्तार किया।  आज दो राजस्व मण्डलों (कुमायूं, गढ़वाल) के  13 जिलों सिमट कर रह गया है किंतु यह कत्यूरी तथा चन्द राजवंशों, गोरखाराज  और अंग्रेजों के शासनाधीन रहा। ईपू 2500 वर्ष से 770 तक कत्यूरी वंश, सन्  770-1790 तक चन्द वंश, सन् 1790 से 1815 तक गोरखा शासकों और सन् 1815 से  भारत को आजादी मिलने तक अंग्रेज शासकों के अधीन रहा।

 कुमायूं और गढ़वाल  मण्डल, शासन-प्रशासन, राजस्व वसूलने की सुविधा की दृष्टि से अंग्रेज  शासकों ने बनाये थे।    कत्यूरी शासकों की अवनति का कारण शक व हूण थे।  वे यहां के शासक तो रहे लेकिन अधिक समय नहीं। कत्यूरी राजवंश के  छिन्न-भिन्न भू-भाग को समेट कर बाद में चन्द्रवंश के चंदेले राजपूत लगभग  1000 वर्ष यहां के शासक रहे। बीच में खस राजा भी 200 वर्ष तक राज्य करते  रहे। इस प्रकार उत्तराखंड का यह भू-भाग दो राजवंशों के बाद अनिश्चिय का  शिकार बना रहा।   

कत्यूरी शासकों के मूल पुरुष शालिवाहन थे जो  कुमायूं में पहले आए। उन्होंने ही जोशीमठ में राजधानी बनाई। कहा जाता है  कि वह अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं में थे। अस्कोट (पिथौरागढ़ जनपद का एक  कस्बा) रियासत के रजबार स्वयं को इसी वंश का बताते हैं। हां, यह शालिवाहन  इतिहास प्रसिद्ध शालिवाहन सम्राट नहीं थे। ऐसा अवश्य हो सकता है कि  अयोध्या का कोई सूर्यवंशी शासक यहां आया हो और जोशीमठ में रहकर अपने  प्रभाव से शासन किया हो।

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जोशीमठ में राजधानी रखते हुए कत्यूरी राजा शीतकाल में ढिकुली (रामनगर के पास) में अपनी शीतकालीन राजधानी बनाते थे। चीनी यात्री हवेनसांग के वृत्तांतों से मिली जानकारी के अनुसार गोविषाण तथा ब्रह्मपुर (लखनपुर) में बौद्धों की आबादी थी। कहीं-कहीं सनातनी लोग भी रहते थे। इस प्रकार मंदिर व मठ साथ-साथ थे। यह बात 7वीं शताब्दी की है।

 लेकिन आठवीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य की धार्मिक दिग्विजय से यहां बौद्ध धर्म का ह्रास हो गया। शंकराचार्य का प्रभाव कत्यूरी राजाओं पर भी पड़े बिना नहीं रहा। कदाचित बौद्धधर्म से विरत होने के कारण उन्होंने जोशीमठ छोड़कर कार्तिकेयपुर में राजधानी बनायी। जोशीमठ में वासुदेव का प्राचीन मंदिर है जिसे कत्यूरी राजा वासुदेव का बनाया कहा जाता है इस मंदिर में 'श्री वासुदेव गिरिराज चक्रचूड़ामणि' खुदा है।


कत्यूरी राजाओं ने गढ़वाल से चलकर बैजनाथ (बागेश्वर के निकट) गोमती नदी के किनारे कार्तिकेयपुर बसाया जो पहले करवीरपुर के नाम जाना जाता था। उन्होंने अपने ईष्टदेव कार्तिकेय का मंदिर भी वहां बनवाया। इस घाटी को कत्यूर नाम दिया। कत्यूरी राजाओं के संबंध काश्मीर से आगे काम्बुल तक थे काश्मीर के तुरुख वंश के एक राजा देवपुत्र वासुदेव के पुत्र कनक देव काबुल में अपने मंत्री के हाथों मारे गये। ऐटकिंसन का तो यहां तक मानना है कि काश्मीर के कठूरी वंश के राजाओं ने ही घाटी का नाम कत्यूर रखा। कई पीढ़ियों तक कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन रहा।

 दूर-दूर के राजाओं के राजदूत कत्यूरी राजाओं के दरबार में आते थे।कत्यूरी राजा कला-संस्कृति के प्रेमी थे और प्रजा-वत्सल भी। उन्होंने जन-कल्याण के लिए नौले (बाबड़ी), नगर, मंदिर बनाये। जहां वे निर्माण का कोई कार्य करते वहां पत्थर का स्तम्भ अवश्य गाड़ते थे। 'बिरखम्म' के रूप ऐसे स्तंभ आज भी उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों में दबे पाये जाते हैं। कई जगहों पर शिलालेख भी मिलते हैं जो कत्यूरी राजाओं के प्रभुत्व के साक्षी हैं।

कुछ कत्यूरी राजाओं के स्थापित शिलालेखों से उनके नामों का पता चलता है, यथा: बसन्तनदेव, खरपरदेव, कल्याणराजदेव, त्रिभुवनराजदेव, निम्बर्तदेव, ईशतारण देव, ललितेश्वरदेव, भूदेवदेव जो गिरिराज चक्रचूड़ामणि या चक्रवर्ती सम्राट कहे जाते थे। कई शिलालेख संस्कृत भाषा में भी उत्कीर्ण हैं।बंगाल के शिलालेखों और उत्तराखंड के शिलालेखों की इबारत में साम्य यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं दोनों का सम्पर्क था। यह बंगाल के पाल व सेन राजवंशों का उत्तराखंड के कत्यूरी वंश के राजाओं से हो सकता है। यह भी संभव है कि शिलालेखों को लिखने वालों ने एक दूसरे की इबारत की नकल की हो। ऐटकिंसन नकल की संभावना अधिक जताते हैं।

हालांकि अपने को कत्यूरी राजाओं का वंशज बताने वाले अस्कोट के रजबार ऐतिहासिक कसौटी पर बंगाल के पालवंशीय राजाओं के निकट नहीं ठहरते तो भी यह सत्य है कि कत्यूरी राजा प्रतापी थे, बलशाली थे और उनके साम्राज्य का विस्‍तार बंगाल तक हो और वे पाल राजाओं को परास्त करने में सफल हुए हों। कत्यूरी शासकों के बाद सन् 700 से 1790 तक चन्द राजवंश का उत्तराखंड में आधिपत्य रहा।कुमायूं में गोरखों के राज को अंग्रेजों को सौंपने में अपना योगदान देने वाले चर्चित पं हर्षदेव जोशी के बारे में जो दस्तावेज मिलते हैं उनके अनुसार हर्षदेव जोशी ने अंग्रेज फ्रेजर को बताया 'चन्दों के पहले राजा मोहरचन्द थे जो 16-17 की आयु में यहां आये थे।

उनके बाद तीन पीढ़ी तक कोई उत्तराधिकारी न होने से मोहरचन्द के चाचा की संतानों में से ज्ञानचन्द को राजा बनाया गया।' इसके अनुसार मोहरचन्द कुमायूं में सन् 1261 में आये और ज्ञानचंद सन् 1374 में गद्दी में बैठे।ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि राजा मोहरचन्द ने झूंसी से आकर नेपाल के किसी जार (जाट) राजा के यहां नौकरी की किंतु बाद में कुमायूं के कबीरपुर राज्य के राजा को परास्त कर जयदेव तथा अन्य हितैषियों के साथ मिलकर चम्पावती व कूर्मांचल राज्य की स्थापना की।

यही भू-भाग बाद में कुमायूं हो गया। काल गणना के अनुसार यह सन् 1438 पड़ता है। इसको हैमिल्टन ने अपने लिखे इतिहास में स्थान दिया और ऐटकिंसन ने उद्धृत किया। ऐसा भी कहा या सुना जाता है कि सोमचन्द एमणटी राजा के भानजे थे और अपने मामा से मिलने आये थे।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Alphabetical List of Monuments -            Uttranchal

(Source - http://asi.nic.in/asi_monu_alphalist_uttranchal.asp)
           
Dehradun Circle, Uttaranchal
                 
Sl. No.
                 
Name of Monument / Sites
                 
Location
                 
District
                 
1.
                  Badrinath group of temples                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
2.
                  Bandeo Temple                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
3.
                  Gujardeo Temple                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
4.
                  Kacheri group of temples                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
5.
                  Kutumbari Temple                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
6.
                  Maniyan group of temples                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
7.
                  Mritunjaya group of temples                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
8.
                  Ratan Deo Shrines                 
Dwarahat
                 
Almora
                 
9.
                  Surya Temple                 
Katarmal
                 
Almora
                 
10.
                  Dandeshwar Temple                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
11.
                  Chandi-ka-Temple                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
12.
                  Jageshwar Temple                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
13.
                  Kuber Temple                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
14.
                  Mritunjaya Temple                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
15.
                  Nanda Devi or Nau Durga                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
16.
                  Nava-grah shrine                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
17.
                  Pyramidal shrine                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
18.
                  Shrine dedicated to Surya                 
Jageshwar
                 
Almora
                 
19.
                  Monuments                 
Sitoli
                 
Almora
                 
20.
                  Grave of a European Soldier                 
Uprari
                 
Almora
                 
21.
                  Group of ancient temples, consisting of main shrine of Siva                  and 17 subsidiary shrines                 
Baijnath
                 
Bageshwar
                 
22.
                  Three temples of the Indo-Aryan shikara type known as Lakshmi                  Narayan, Rakshas Deval and Satya Narayan                 
Talli Hat
                 
Bageshwar
                 
23.
                  Remains of sixteen temples                 
Adibadri,
                 
Chamoli
                 
24.
                  Fort with walls and ruins of dwelling house inside it and                  with flights of steps                 
Chandpur
                 
Chamoli
                 
25.
                  Trident of iron with a shaft with one ancient and three                  modern inscriptions                 
Gopeshwar
                 
Chamoli
                 
26.
                  Two Temples                 
Pandukeshwar
                 
Chamoli
                 
27.
                  Rudranath temple                 
Gopeshwar
                 
Chamoli
                 
28.
                  Rock Inscription in Survey Plot No. 89                 
Village Mandal
                 
Chamoli
                 
29.
                  Group of Baleshwar Temples                 
Champawat
                 
Champawat
                 
30.
                  Kotwali Chabutra                 
Champawat
                 
Champawat
                 
31.
                  Naula or covered spring attached to the Baleshwar Temples                 
Champawat
                 
Champawat
                 
32.
                  Temple sacred to Mahasu                 
Hanol or Onol
                 
Dehradun
                 
33.
                  Ancient site                 
Jagatram
                 
Dehradun
                 
34.
                  The inscribed rock edicts of Asoka                 
Kalsi
                 
Dehradun
                 
35.
                  Kalinga Monuments                 
Karanpur
                 
Dehradun
                 
36.
                  Temple and images in its vicinity                 
Lakha Mandal
                 
Dehradun
                 
37.
                  Old Cemetery                 
Rourkee
                 
Haridwar
                 
38.
                  Old Cemetery                 
Shaikhpuri & Ganeshpur
                 
Haridwar
                 
39.
                  Remains of ancient buildings locallly identified with                  Vairatapattana                 
Dhikuli
                 
Nainital
                 
40.
                  Old temple sacred to Sita                 
Sitabani
                 
Nainital
                 
41.
                  Patal Bhubaneswar Caves                 
Patal Bhubaneswar
                 
Pithoragarh
                 
42.
                  Remains of a few old temples and an inscribed masonry well                 
Gangoli Hat
                 
Pithoragarh
                 
43.
                  Excavated Site at Dronasagar (only preliminary notification                  issued)                 
Mauza Ujjain Kashipur
                 
Udhamsingh Nagar
                 
44.
                  Excavated site and Remains                 
Purola
                 
Uttarkashi

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   उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में एक माह बाद भी क्यों मनती है दीपावली ?
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जहां शुक्रवार को पूरे देश में दीपावली की जगमगाहट होगी। वहीं टिहरी जिले के कई इलाकों में इस मौके पर खास उत्साह नहीं होगा। इसका कारण जिले के कुछ क्षेत्रों में दीपावली का त्योहर ग्यारह दिन बाद और कुछ इलाकों में एक माह बाद मनाने की परंपरा है।

किवदंती के अनुसार पंवार वंशीय राजाओं के लिए शासनकाल के समय गोरखों ने गढ़वाल पर आक्रमण किया। तिब्बत से भी इस बीच आक्रमण होते रहे। किंवदंती है कि महाराजा के सेनापति माधो सिंह भंडारी एक बार तिब्बत के युद्ध में तिब्वतियों को खदेड़ते हुए दूर निकल गए। वह दीपावली के समय अपने घर नहीं लौट पाए थे।

 तब अनहोनी की आशंका में पूरी रियासत में दीपावली नहीं मनाई गई थी। बाद में रियासत का यह सेनापति युद्ध में विजेता बनकर लौटा। यह खबर रियासत में दीवाली के ग्यारह दिन बाद पहुंची। जिसके बाद टिहरी के समीपवर्ती इलाकों में इगास का त्योहार मनाया गया। जबकि दूरस्थ इलाकों में सेनापति के विजयी होकर लौटने की खबर करीब एक माह बाद पहुंची, जिसके कारण वहां दीवाली एक महीने बाद मनाते हैं।

 समाजसेवी महीपाल नेगी बताते हैं महज दो सौ सालों से ऐसा हो रहा है। कई इलाकों में उसी परंपरा का निर्वहन करते हुए लोग एक माह बाद दिवाली मनाते हैं।

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उत्तराखंड की गुफाएं संजोए हैं आदिम इतिहास
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उत्तराखंड के बारे में आम धारणा है कि यहां लोग दूसरे प्रदेशों से आकर बसे हैं। बहुत से उत्तराखंडी लोग भी यही मानते हैं कि उनके पूर्वज कहीं और से आकर उत्तराखंड में बस गए, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य इस बात को झुठलाते ही नहींबल्कि सिद्ध करते हैं कि उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक मानव का अस्तित्व था। वह यहां बसता ही नहींथा बल्कि उसने यहां की कंदराओं में अपनी गुहाचित्र कला के नमूने भी रख छोड़े हैं।

पुरातत्व विभाग के अभिलेखों के मुताबिक सन 1968 में अल्मोड़ा जिले में सुयाल नदी के दाएं तट पर लखु उड्यार में गुहा चित्रों की खोज मध्य हिमालय में गुहावासी आदि मानव की गतिविधियों की पहली पुख्ता खोज थी। कुमाऊं विवि के प्रोफेसर डॉ. महेश्वर प्रसाद जोशी को यहां काले, कत्थई लाल और सफेद रंगों से बने सामूहिक नृत्यों के चित्रों के साथ ज्यामितीय आकृतियों के चित्र मिले थे। इस खोज को प्रकाश में लाने में डॉ. धर्मपाल अग्रवाल और डॉ. यशोधर मठपाल ने भी मदद की थी। डॉ. जोशी की इस महत्वपूर्ण खोज के बाद अल्मोड़ा जिले में ही फड़कानौली, फलसीमा, ल्वेथाप, पेटशाल और कसारदेवी में भी गुहाचित्र मिले हैं।

 बाद में गढ़वाल मंडल में भी गुहावासी मानवों के दो शैलाश्रयों को खोज हुई। अलकनंदा घाटी में स्थित पहले शैलाश्रय को स्थानीय लोग ग्वरख्या उड्यार के नाम से जानते हैं, तो पिंडरघाटी के किमनी गांव के पास भी एक अन्य शैलाश्रय मिला है। इतना ही नहीं1877 में रिवेट कार्नक ने अल्मोड़ा के द्वाराहाट में शैल चित्रांकन का वर्णन किया है। देहरादून के कालसी के पास भी प्राचीन पत्थर के उपकरण मिले हैं जिन्हें आरंभिक पाषाण युग के उपकरण माना जाता है।

कुमाऊं मंडल में अल्मोड़ा जिले की पश्चिमी राम गंगा घाटी और नैनीताल जिले के खुटानी नाले में भी पूर्व पुरापाषाण कालीन पत्थर के औजार मिले हैं। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के देहरादून सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. देवकी नंदन डिमरी का कहना है कि ये पुरातात्विक साक्ष्य उत्तराखंड के प्राचीन ही नहीं प्रागैतिहासिक इतिहास की ओर संकेत करते हैं। यह सिद्ध करते हैं कि हिमालय प्रागैतिहासिक मानव का वासस्थल भी रहा है। उनका कहना है कि इन पुख्ता पुरातात्विक साक्ष्यों के जरिए उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल से अब तक का क्रमिक इतिहास गढ़ा जाना चाहिए।

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घुंघचाई में मिले मुगलकाल के सिक्के
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   पूरनपुर। सड़क निर्माण के लिये की गई खुदाई के दौरान मिले सिक्के 1101 ई. मुगलकाल के हैं। यह ई. सिक्कों पर उर्दू में स्पष्ट नजर आ रही है। पुलिस ने इसकी पुष्टि की है और अब वह मजदूरों से मिले सिक्के बरामद करने का प्रयास कर रही है।
पूरनपुर तहसील के ग्राम घुंघचाई में बुधवार को मनरेगा अंतर्गत बनाई जा रही सड़क की मिट्टी खुदाई के दौरान एक घड़े से सोने एवं चांदी के सिक्के मिले। इस पर मजदूरों में छीना-झपटी भी मची और उनके कपड़े भी फटे। कई मजदूर उन सिक्कों को उठाकर घर ले गये।
चर्चा के बाद जब मामला पुलिस चौकी पर पहुंचा तो चौकी इंचार्ज सतेन्द्र सिंह ने मजदूरों को तलब किया। परतें खुलने पर पता चला जो सिक्के मिले उस पर उर्दू में लिखा है। जानकारों ने बताया उस पर रौनक 1101 अली मूल्य बेरौनक मैरा लिखा है। इससे स्पष्ट है कि 1101 ई. में महमूद गजनवी के मुगल शासन में वे सिक्के बने। लोगों ने बताया कुछ सिक्के सोने के भी मिले हैं। चौकी इंचार्ज ने भी मुगलशासन के सिक्के मिलने व एक चांदी का सिक्का खुद देखने की पुष्टि की है


। उन्होंने बताया मजदूर विश्राम को मिला एक सिक्का उसके भाई दाताराम ने दिखाया है। सिक्के कितने मजदूरों को मिले इसकी जानकारी की जा रही है तथा उनकी रिकवरी का प्रयास हो रहा है।
   
Dainik jagran news

 

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