Author Topic: Historical information of Uttarakhand,उत्तराखंड की ऐतिहासिक जानकारी  (Read 34469 times)

Bhishma Kukreti

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                                 उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास

                                    आलेख :  भीष्म कुकरेती


                                      प्रस्तर  युग में   उत्तराखंड में कृषि व भोजन (Food and Agriculture in Stone Age)


                                                      आदि प्रस्तर युग में भोज्य पदार्थ भोजन विधि

                        प्रस्तर युग के उपकरणों से पता चलता है कि हिम युग अंत के पश्चात उत्तराखंड में मानव विचरण शुरू हो गया था । गंगाद्वार (हरिद्वार ) के समीप आदि प्रस्तर युग के फ्लेक , स्क्रैपर्स , चौप्र्स आदि के निसान मिले हैं । यह सिद्ध होता है कि सोन -मानव टोली हिमालय की कम ऊँची पहाड़ियों (जम्मू से नेपाल तक ) विचरण करती थीं ।
              इस युग में मांस , कंद -मूल -फल भोज्य पदार्थ थे
   अनुमान है कि सोन मानव युग में मनुष्य ने शिला -चौपर्स या गंडासा जैसा उपकरण बनाना सीख लिया था  । वर्तमान गंडासे जैसा शिला उपकरण से मांस , कंद -मूल -फल काटा जा सकता था । मांस या कंद-मूल की  छोटी छोटी बोटियाँ काटने के लिए शिला गंडासे पर दांत नुमा शिला दराती भी थीं ।
  आखेट हेतु इस युग का मानव एक जगह नही रुकता था । उत्तराखंड में सोन मानव कौन से पशुओं और वनस्पतियाँ को खाता था  यह पूर्णत: नही पता है ।
डा के . पी . नौटियाल , सकलानी व विनोद नौटियाल का लेख

                                                   मध्य प्रस्तर  युग में भोज्य पदार्थ भोजन विधि
१५००० साल पहले के इस युग में कास्ट , अस्थि व पत्थर उपकरण प्रयोग में थे और इन उपकरणों में निखार आ गया था । अब ये उपकरण अधिक हल्के, कलापूर्ण  व सुडौल बनने लगे थे जो कि उस समय के भोजन खाने की विधि पर प्रकाश डालते हैं ।
  चकमक पत्थर की समझ से मानव को आग के लाभ मिलने लगे थे । यही समय था जब मांस को भुनकर खाने की शुरुवात हुयी ।

                                              उत्तराखंड में प्रस्तर छुरिका -संस्कृति और मानव भोजन
      इतिहास कार डा शिव प्रसाद डबराल लिखते हैं कि हरिद्वार के पास डा यज्ञ दत्त शर्मा को प्रस्तर उपकरनो के साथ ऐसी शिलाएं भी मिली   जो  उत्तराखंड में प्रस्तर छुरिका -संस्कृति होने के संकेत देते हैं ।  इस संस्कृति युग में भी आखेट व पशु भक्षण आदि मानव भोजन था   । गुफाओं व पर्ण कुटीरों में रहने का अर्थ है कि मनुष्य भोजन भंडारीकरण भी करता होगा । 
          इस समय का मानव आखेट संस्कृति से आगे नही बढ़ पाया  था   ।
                    प्रस्तर छुरिका -संस्कृति में यहाँ के मनुष्य का भोजन वनैले गाय , बैल , भैस , घोड़े , भेद -बकरियां , हिरन चूहे , मछली व घड़ियाल का मांस था ।
  कंद मूल फल जो पाच जाता हो  होगा ।

                                                  उत्तराखंड में उत्तर प्रस्तर संस्कृति और मानव भोजन


                     उत्तर प्रस्तर संस्कृति याने १५०००-से ५५०० वर्ष पूर्व के संस्कृति में मानव सभ्यता में कई परिवर्तन आये ।

                                     उत्तर प्रस्तर संस्कृति में पशु पालन का श्रीगणेश


                   उत्तर प्रस्तर संस्कृति में पशु पक्षियों का पालन शुरू हुआ । कुत्ते को पालतू बनाने का कार्य इसी युग में हुआ इसी युग में पशु पालन विकास उत्तराखंड में हुआ । डा मजूमदार व पुसलकर का मानना है कि उत्तराखंड  भूभाग उन थोड़े से भूभागों में से एक है जन्होने जंगली जानवरों को पालतू बनाया ।
  शिवालिक की पहाड़ियों व मैदानी हिस्सों में तोते , चकोर आदि पक्षियों को पालने के प्रक्रिया भी शुरू हुयी ।
           
                                                             कृषि प्राम्भ
                                     उत्तराखंड में इसी युग में कृषि शुरू हुई ।
गेंहू , जाऊ, चना, फाफड़ , ओगल , कोदू , उड़द व मूंग की जंगली जाती पाए जाने से इतिहास कार सिद्ध करते हैं कि यहाँ इस युग में कृषि करते थे और आग में भूनते थे । जंगली प्याज , बथुआ, हल्दी , कचालू , चंचीडा, नाशपाती , अंजीर , अंगूर , केला, दाडिम , चोलू,आडू  आदि के जंगली प्रजातियाँ भी संकेत देती है की यहाँ इन वनस्पतियों का प्रयोग भली भांति भोज्य पदार्थ क एरुप में होता था (मजूमदार ) ।
  उस समय में भी औरतें कृषि कार्य में लिप होती थीं । औरतें बाढ़ की गीली मिटटी में बीज बिखेरकर  कृषि करती थीं । औरतें गुफा में आग बचाने का भी कम संभालतीं थीं । औरतें पत्तों व मिटटी के पात्र बनाती थीं . नारी ही हड्डी , पत्थर या लकड़ी की कुदाल से कंद मूल खोद कर लती थी । पुरुषों का कम उस समय आखेट,  अन्य वस्तियों से अपनी वस्ती के रक्षा करना व अन्य वस्तियों पर आक्रमण में संलग्न रहता था ।
 
शेष  -- उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास भाग … २ में
                   
 Copyright @ Bhishma  Kukreti  22/8 /2013

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दीपक पनेरू

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समस्त सामग्री कॉपी करके पेस्ट कि गयी है मूल लेखक अगर इस लेख को पढ़े तो कृपया अन्यथा न लें आपके अथक प्रयासो से लिखा गया लेख हमारे पाठको तक पहुचने का हम एक माध्यम बने है और जो कोशिश अपने की है वही हम भी कर रहे है. आपका धन्यवाद


कुमाँऊ शब्द की उत्पत्ति कुर्मांचल से हुई है जिसका मतलब है कुर्मावतार (भगवान विष्णु का कछुआ रूपी अवतार) की धरती। कुमाँऊ मध्य हिमालय में स्थित है, इसके उत्तर में हिमालय, पूर्व में काली नदी, पश्चिम में गढ‌वाल और दक्षिण में मैदानी भाग। इस क्षेत्र में मुख्यतया ‘कत्यूरी’ और ‘चंद’ राजवंश के वंशजों द्धारा राज्य किया गया। उन्होंने इस क्षेत्र में कई मंदिरों का भी निर्माण किया जो आजकल सैलानियों (टूरिस्ट) के आकर्षण का केन्द्र भी हैं। कुमाँऊ का पूर्व मध्ययुगीन इतिहास ‘कत्यूरी’ राजवंश का इतिहास ही है, जिन्होंने 7 वीं से 11 वीं शताब्दी तक राज्य किया। इनका राज्य कुमाँऊ, गढ‌वाल और पश्चिम नेपाल तक फैला हुआ था। अल्मोड‌ा शहर के नजदीक स्थित खुबसूरत जगह बैजनाथ इनकी राजधानी और कला का मुख्य केन्द्र था। इनके द्धारा भारी पत्थरों से निर्माण करवाये गये मंदिर वास्तुशिल्पीय कारीगरी की बेजोड‌ मिसाल थे। इन मंदिरों में से प्रमुख है ‘कटारमल का सूर्य मंदिर’ (अल्मोडा शहर के ठीक सामने, पूर्व के ओर की पहाड‌ी पर स्थित)। 900 साल पूराना ये मंदिर अस्त होते ‘कत्यूरी’ साम्राज्य के वक्त बनवाया गया था।कुमाँऊ में ‘कत्यूरी’ साम्राज्य के बाद पिथौरागढ‌ के ‘चंद’ राजवंश का प्रभाव रहा। जागेश्वर का प्रसिद्ध शिव मंदिर इन्ही के द्धारा बनवाया गया था,  इसकी परिधि में छोटे बड‌े कुल मिलाकर 164 मंदिर हैं।ऐसा माना गया है कि ‘कोल’ शायद कुमाँऊ के मूल निवासी थे, द्रविडों से हारे जाने पर उनका कोई एक समुदाय बहुत पहले कुमाँऊ आकर बस गया। आज भी कुमाँऊ के शिल्पकार उन्हीं ‘कोल’ समुदाय के वंशज माने जाते हैं। बाद में ‘खस’ समुदाय के काफी लोग मध्य एशिया से आकर यहाँ के बहुत हिस्सों में बस गये। कुमाँऊ की ज्यादातर जनसंख्या इन्हीं ‘खस’ समुदाय की वंशज मानी जाती है। ऐसी कहावत है कि बाद में ‘कोल’ समुदाय के लोगों ने ‘खस’ समुदाय के सामने आत्मसमर्फण कर इनकी संस्कृति और रिवाज अपनाना शुरू कर दिया होगा। ‘खस’ समुदाय के बाद कुमाँऊ में ‘वैदिक आर्य’ समुदाय का आगमन हुआ। स्थानीय राजवंशों के इतिहास की शुरूआत के साथ ही यहाँ के ज्यादातर निवासी भारत के तमाम अलग अलग हिस्सों से आये ‘सवर्ण या ऊंची जात’ से प्रभावित होने लगे। आज के कुमाँऊ में ब्राह्मण, राजपूत, शिल्पकार, शाह (कभी अलग वर्ण माना जाता था) सभी जाति या वर्ण के लोग इसका हिस्सा हैं। संक्षेप में, कुमाँऊ को जानने के लिये हमेशा निम्न जातियों या समुदाय का उल्लेख किया जायेगा – शोक्य या शोक, बंराजिस, थारू, बोक्स, शिल्पकार, सवर्ण, गोरखा, मुस्लिम, यूरोपियन (औपनिवेशिक युग के समय), बंगाली, पंजाबी (विभाजन के बाद आये) और तिब्बती (सन् 1960 के बाद)।
6वीं शताब्दी (ए.डी) से पहले-क्यूनीनदास या कूनीनदास
6वीं शताब्दी (ए.डी) के दौरान-खस, नंद और मौर्य। ऐसी मान्यता है बिंदुसार के शासन के वक्त खस समुदाय द्धारा की गई बगावत अशोक द्धारा दबा दी गई। उस वक्त पुरूष प्रधान शासन माना जाता है। 633-643 ए.डी के दौरान यूवान च्वांग (ह्वेन-टीसेंग)  के कुमाँऊ के कुछ हिस्सों का भ्रमण किया और उसने स्त्री राज्य का भी उल्लेख किया। ऐसा माना जाता है कि यह गोविशाण (आज का काशीपूर) क्षेत्र रहा होगा। कुमाँऊ के कुछ हिस्सों में उस वक्त ‘पौरवों’ ने भी शासन किया होगा।
6वी से 12वी शताब्दी (ए.डी)-इस दौरान कत्यूरी वंश ने सारे कुमाँऊ में शासन किया। 1191 और 1223 के दौरान दोती (पश्चिम नेपाल) के मल्ल राजवंश के अशोका मल्ल और क्रचल्ला देव ने कुमाँऊ में आक्रमण किया। कत्यूरी वंश छोटी छोटी रियासतों में सीमित होकर रह गया।
12वी शताब्दी (ए.डी) से-चंद वंश के शासन की शुरूआत। चंद राजवंश ने पाली, अस्कोट, बारामंडल, सुई, दोती, कत्यूर द्धवाराहाट, गंगोलीहाट, लाखनपुर रियासतों में अधिकार कर अपने राज्य में मिला ली।
1261 – 1275-थोहर चंद
1344 – 1374 या 1360 – 1378-अभय चंद। कुछ ताम्रपत्र मिले जो चंद वंश के अलग अलग शासकों से संबन्धित थे लेकिन शासकों के नाम का पता नही चल पाया।
1374 – 1419 (ए.डी)-गरूड़ ज्ञानचंद
1437 – 1450 (ए.डी)-भारती चंद
1565 – 1597 (ए.डी)-रूद्र चंद
1597 – 1621 (ए.डी)-लक्ष्मी चंद। चंद शासकों के दौरान नये शहरों की स्थापना और इनका विकास भी हुआ जैसे रूद्रपुर, बाजपुर, काशीपुर।
1779 – 1786 (ए.डी)-कुमाँऊ के परमार राजकुमार, प्रद्धयुमन शाह ने प्रद्धयुमन चंद के नाम से राज्य किया और अंततः गोरखाओं के साथ खुरबुरा (देहरादून)  के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।
1788 – 1790 (ए.डी)-महेन्द्र सिंह चंद, ऐसा माना जाता है कि यह चंद वंश का अंतिम शासक था। जिसने राजबुंगा (चंपावत) से शासन किया लेकिन बाद में अल्मोड‌ा से किया।
1790 – 1815 (ए.डी)-कुमाँउ में गोरखाओं का राज्य रहा। गोरखाओं के निर्दयता और जुल्म से भरपूर शासन में चंद वंश के शासकों का पूरा ही नाश हो गया।
1814 – 1815 (ए.डी)-नेपाल युद्ध। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने गोरखाओं को पराजित कर कुमाऊँ में राज्य करना शुरू किया।
यदपि ब्रिटिश राज्य गोरखाओं (जिसको गोरख्योल कहा जाता था) से कम निर्दयता पूर्ण और बेहतर था लेकिन फिर भी ये विदेशी राज्य था। लेकिन फिर भी ब्रिटिश राज्य के दौरान ही कुमाँऊ में प्रगति की शुरूआत भी हुई। इसके बाद, कुमाँऊ में भी लोग विदेशी राज्य के खिलाफ उठ खड‌े हुए।

Pawan Pathak

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ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी ‘राजबुंगा का किला’
चंद व कत्यूरी राजवंशों के अलावा अंग्रेजों ने भी कार्यस्थल बनाया

चंपावत। चंद, पाल व कत्यूरी राजवंश के शासकों की राजधानी रहे चंपावत नगर के मध्य में स्थित ‘राजबुंगा का किला’ आज भी अतीत की कई गौरवगाथाओं का प्रत्यक्ष मौन साक्षी बनकर खड़ है। इस किले में जहां चंद व कत्यूरी शासनकाल के दौर में कई राजाज्ञाएं जारी की गईं वहीं अंग्रेज हुक्मरानों ने भी इस किले को अपनी प्रमुख प्रशासनिक कार्यस्थली के रूप में प्रयुक्त किया था। किले के निर्माण में प्रयुक्त किए गए भारी भरकम पत्थरों की दीवारें आज कई शताब्दियों के बाद भी यथावत बनी हुई हैं।
इतिहासकार देवेंद्र ओली के मुताबिक राजबुंगा किले का निर्माण पंद्रहवीं शताब्दी में चंद राजवंश के राजा कीर्तिचंद पुत्र रतन चंद के शासनकाल में हुआ था। उस समय में किले की बनावट इस तरह से की गई थी कि कोई भी दुश्मन उस पर आसानी से आक्रमण न कर सके। ऊंचाई में स्थित किले में तहखाने के अलावा दो प्रवेश द्वारों के साथ ही दुश्मनों पर अभेद निशाना साधने वाले परकोटे भी बनाए गए हैं। ‘राजबुंगा किले’ के परिसर में वर्तमान में तहसील व उपकोषागार कार्यालय संचालित किए जा रहे हैं। किले के समीप ही चंद शासकों द्वारा निर्मित ‘नागनाथ मंदिर’ ऐतिहासिक महत्व के साथ ही तमाम धार्मिक मान्यताएं भी समेटे हुए है। मंदिर की मान्यता को लेकर स्थानीय लोगों में खासी आस्था है।

Source-http://earchive.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20090203a_007115016&ileft=357&itop=681&zoomRatio=155&AN=20090203a_007115016

 

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