Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 30762 times)

Bhishma Kukreti

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पौरवकाल में  स्रुघ्न व मोरध्वज शहरों की दशा

Srughna , Moradhwaja Cities in Paurava Period 

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास- 18

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age  of History of Haridwar, Bijnor , Saharanpur  18

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  295                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  295                 


                  इतिहास विद्यार्थी :::  भीष्म कुकरेती 
-
  पौरव वंशी शासनों में गाँवों के संस्कृत नाम उल्लेख हैं किन्तु शहरों के नाम नहीं मिलते। 
    बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर पौरव काल इतिहास संदर्भ में निम्न मुख्य शहरों की विवेचना आवश्यक है -
                        स्रुघ्न
हर्ष काल में ही स्रुघ्न का बैभव समाप्त हो गया था।  पाणिनी काल शुंग काल में जो ख्याति स्रुघ्न की थी वह पुनः प्राप्त न हो सकी।  हर्ष काल में राजधानी स्थानेश्वर से कन्नौज स्थानांतर होने से स्रुघ्न का महत्व कम हो गया।  डा छवडा को शुंगकालीन मृण मूर्ति मिली थी जो शुंग काल की बताई जाती है (1 )  डा डबराल का मत सही प्रतीत होता है कि अमोधभूति पश्चात शक -पह्लव लुटेरों के छापों से स्रुघ्न व बेहट आदि का बैभव कमजोर पड़ गया होगा। कुषाण शासन में राजकीय मार्ग व व्यापारिक मार्ग होने से जो श्री बढ़ी थी वह  हूण  हर ले गए (1 ) ।

     मोरध्वज
   स्रुघ्न से गोविषाण जाने वाले मार्ग पर मोरध्वज का बड़ा महत्व था।  छति सातवीं सदी में किसी राजा ने सुदृढ़ दुर्ग निर्माण किया था।  सन 1844 में मखराम ने यहां खुदाई की थी और कई
 आर्किओलॉजी सर्वे ऑफ़ इण्डिया की वेब साइट के देहदन सर्कल में मोरध्वज महल के बारे में सूचना मिलती है कि गढ़वाल विश्वविद्यालय के डा के पी नौटियाल की अध्यक्षता में खुदाई हुयी व कई नए तथ्य मिले व सिद्ध हुआ कि खंडहर क्रिश्चियन सदी से दो सदी पहले से  पांचवी , सातवीं सदी के हैं।
 चूँकि मोरध्वज गढ़वाल के भाभर तराई हिस्से में था अतः मोरध्वज पर Paurava  अधिकार ही था (3  )
         
         

सन्दर्भ :
 
1- Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page 421 
 2 - मखराम ,(1891 ) जॉर्नल ौफ़ एसियाटिक सोसाइटी बंगाल  1891 जिल्द ६ पृष्ठ २, ३ ४ ६
3  Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page  422
 
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  Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of Haridwar;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of  Kankhal , Haridwar;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of Jwalapur , Haridwar;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of  Rurki Haridwar;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of Haridwar;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of Laksar , Haridwar;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of  Saharanpur;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of  Behat , Saharanpur;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of  Saharanpur;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of Nakur,  Saharanpur  Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of  Devband , Saharanpur;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of  Bijnor ;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of  Bijnor ;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of  Nazibabad , Bijnor  Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of  Bijnor;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of Nagina  Bijnor ;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History  of  Dhampur , Bijnor ;   Srughna , Mordhwaja Cities in Paurava Period , History of  Chandpur Bijnor ; 
कनखल , हरिद्वार इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ; ज्वालापुर हरिद्वार इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;रुड़की , हरिद्वार इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;लक्सर हरिद्वार इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;मंगलौर , हरिद्वार इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ; बहादुर जुट , हरिद्वार इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;
सहरानपुर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;देवबंद , सहरानपुर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;बेहट , रामपुर , सहरानपुर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;बाड़शाह गढ़ , सहरानपुर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ; नकुर , सहरानपुर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;
बिजनौर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ; धामपुर , बिजनौर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;   नजीबाबाद ,  बिजनौर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;   नगीना ,  बिजनौर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;   चांदपुर ,  बिजनौर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ;  सेउहारा  बिजनौर इतिहास में पौरव कालीन स्रुघ्न व मोरध्वज ; 
 

Bhishma Kukreti

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पर्वताकार पौरव  ताम्र शासनों में ग्राम नाम

 Village Names in Copper Inscriptions of Parvatakar Paurava Rulers

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास (647-725 AD  )- 18

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age  of History of Haridwar, Bijnor , Saharanpur  (647-725 AD ) - 18

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  295                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  295                 


                  इतिहास विद्यार्थी :::  भीष्म कुकरेती 
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   पर्वताकार पौरव काल में जनभाषा देश भाषा संस्कृत नहीं अपितु  स्थानीय थी जिसे अपभ्रंस आदि नाम दिया जाता है।  पूर्व ताम्र शासनों में उत्तराखंड के पहाड़ी गाँवों के नाम पर बड़ी रोचक जानकारी मिलती है।  पूर्व ताम्र शासन में इन नामों को संस्कृत रूप देकर अंकित किया गया है (1, )-
पौरव  ताम्र शासन में नाम -----संभावित गाँव या खेत , स्थल नाम ,  पौरव  ताम्र शासन में नाम -----संभावित गाँव या खेत , स्थल नाम,
उदुंबरवास ----------------------------------- गोविलवास ,   -------         कपिलगर्ता -------------------कपिल्या गाड ,   
कोल्लपुरी  -----------------------------------कोली गांव     ---------         खण्डाकपल्लिका  -------------खंड गांव 
खट्टलिका  -----------------------------------खाटली     ----------------      खोहिलका   -------------------खोळी
गोहबाटक  ---------------------------------गोरबाट       ------------          चम्पक   ------------------------चम्बा     
चन्दुलाक पल्लिका   ---------------------चंडा पाली       -----------           छिद्रगर्ता  ----------------------  उड्यारी   
जयभट्टपल्लिका      -------------------जैगांव भट्ट गाँव     ----------           जंबुशालिका  --------------     जामुणसारी
डिंडिका ----------------------------------- डिंडा ---------------------            दुभाया  -------------------------डोभ  /डोभा
तोली  --------------------------------------तोळी  -------------------               तापल्ली  ----------------------थापळी
द्रोणी  ------------------------------------दून दूण   -----------------              देवखल  ------------------------दिखैत
दीपपुर   --------------------------------दिउळा      ----------------------------- दूण्णा  ------------------------- दूणी 
नागिलक्षेत्र   ----------------------------नागर जातोक , नगळि , नगळी , -------निंबसारी  ------------------------------ नीमसारी
  पल्ली   --------------------------------पाली   ,          ----------------------------पटलिका  -------------------पटवाळ गां
पुष्पदन्तिका  ---------------------------फुल्यार गां , ----------------------------   बुरासिका  -------------------------बुरांसी
बृद्धतर पल्लिका  ----------------------------बड़ी पाली  , ---------------------------बंजाली   -----------------------बंजा गां बंजण गां
भट्टिपल्लिका  -----------------------------भट गां , ---------------------------------भुतपल्लिका -----------------------भूत गां
मालवकक्षेत्र  -----------------------------मालूखेत  -------------------------------- रजकस्थल ------------------------धोबीघाट
 लवणोदक  ------------------------------लूणियासोत   ----------------------------श्रृंगारखोहलिका  -------------------स्याळै खोळी 
सेम्मकक्षेत्र  -------------------------------सेम , सीम  ---------------------------------सेम्महिका -------------------------सिमलगा
सन्दर्भ :
 
1- Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page 420
 

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 Village Names Paurva Time, History of Haridwar;  Village Names Paurva Time, History of  Kankhal , Haridwar;  Village Names Paurva Time, History of Jwalapur , Haridwar;  Village Names Paurva Time, History  of  Rurki Haridwar;  Village Names Paurva Time, History  of Haridwar;  Village Names Paurva Time, History  of Laksar , Haridwar;  Village Names Paurva Time, History  of  Saharanpur;  Village Names Paurva Time, History of  Behat , Saharanpur;  Village Names Paurva Time, History  of  Saharanpur;  Village Names Paurva Time, History  of Nakur,  Saharanpur Village Names Paurva Time, History of  Devband , Saharanpur;  Village Names Paurva Time, History of  Bijnor ;  Village Names Paurva Time, History  of  Bijnor ;  Village Names Paurva Time, History  of  Nazibabad , Bijnor Village Names Paurva Time, History of  Bijnor;  Village Names Paurva Time, History  of Nagina  Bijnor ;  Village Names Paurva Time, History  of  Dhampur , Bijnor ;  Village Names Paurva Time, History of  Chandpur Bijnor ; 
कनखल , हरिद्वार इतिहास ; ज्वालापुर हरिद्वार इतिहास ;रुड़की , हरिद्वार इतिहास ;लक्सर हरिद्वार इतिहास ;मंगलौर , हरिद्वार इतिहास ; बहादुर जुट , हरिद्वार इतिहास ;
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हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की पर्वतीय पौरव  काल की स्थानीय भाषा :खस भाषा के अंश
Local Languages of Haridar, Saharanpur Bijnor in Parvatakar Paurava Kingdom

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास (647-725 AD  )- 19

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age  of History of Haridwar, Bijnor , Saharanpur  (647-725 AD ) - 19

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  296                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  296                 


                  इतिहास विद्यार्थी :::  भीष्म कुकरेती 
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   पिछले अध्याय में डबराल द्वारा पौरव वंशी शासनो की पढ़कर कुछ गांवों के नाम दिए जिन्हे पौरव काल में शासनों में संस्कृत में परिवर्तित किया गया था (1 ) ।  यह ऐसा ही है    जैसे अंग्रेजी शासन में अंग्रेजी में शासन आदेश अंग्रेजी में ही आते थे व कई स्थलों के नाम परिवर्तित हुए जैसे गढ़वाल के गाँव ग्वील को Goil कर दिया गया , बरसुड़ी को Barsuri या महाराष्ट्र के धुळे को Dhule नाम डबराल ने जिन संस्कृत रुपया ग्रामों का गढ़वाली नाम ववरण दिये  वे वास्तव में खस भाषा के सूत्र thread लगते हैं यथा बाट , गाड , खोळी , सारी खारी आदि आदि ।  आज भी ये नाम कुमाऊं -गढ़वाल में विद्यमान हैं।  चूँकि विद्वानों के पास रिकॉर्ड में प्राकृत या अपभृंश नाम ही है तो इतिहासकार भी  सरलीकृत वृति या सरलीकरण  हेतु  भाषा संदर्भ में प्राकृत , अपभ्रंश या देश भाषा नाम दे देते हैं जैसे डबराल ने भी लिखा (1 )।  दूण , खारी सारी शब्द भी संकेत करते हैं कि तब गढ़वाल कुमाऊं व लग्गे बग्गे मैदानी भागों में  खस या खस  निर्मित भाषा बोली जाती थी।
    यह मानने में अधिक दिक्क्त नहीं होनी चाहिए कि पौरव वंशियों के महाधिराज विरुद से सिद्ध होता है कि पूर्व वंशी राज मैदानों (हरिद्वार, सहारनपुर व बिजनौर तक या कुछ भाग तो था ) . अतः यह भी माना जा सकता है कि हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर में खस भाषा बोली जाती थी जिसे डबराल ने देशज भाषा उल्लेख किया  जिसे विद्वान व इतिहासकार सरलीकरण मानसिकता के तहत प्राकृत ,  अपभ्रंश नाम दे दे दते हैं। 
डबराल ने आगे लिखा कि यही देशज भाषा बाद में उत्तराखंड की वर्तमान बोलियां बनीं।

         हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर की प्राचीन बोलियां ?

 चूँकि मध्य युग व ततपश्चात मुस्लिम आक्रांताओं व मुगल राज आ जाने से इस क्षेत्र में कोई सजातीय समाज न रहा जैसे गढ़वाल या कुमाऊं में तो कोई सजातीय भाषा भी न बच सकी।    इस कारण सहारनपुर , बिजनौर , हरिद्वार की प्राचीन बोलियों पर भी किसी विद्वान् का ध्यान भी नहीं गया। 
      खस भाषा या शौरसेनी भाषा ?
  इतना तो तय है कि पहाड़ों में खस भाषा बोली जाती थी  और चूँकि सहारनपुर , हरिद्वार व बिजनौर तब तक उत्तराखंड के अभिन्न अंग थे तो  यह माना जा सकता है कि सहरानपुर , बिजनौर व हरिद्वार में भी खस भाषा या बोली (स्थानीय बदलाव अवश्यम्भावी है ) बोली जाती रही होगी।
   विद्वान मानते हैं कि शौरसेनी हिंदी (हिंदी जो पश्चमी उत्तर प्रदेश , हरियाणा , हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर  में बोली जाती है ) की जननी है और इस  शौरसेनी का जन्म लगभग 2वीं  -3 वीं सदी का माना जाता है (2 )
पौरव  काल 645 -725 का है याने इतने काल में तब तो कोई भाषा इतना प्रभाव नहीं डाल  सकती थी कि सम्पूर्ण समाज शौरसेनी प्रभावित हिंदी बोलने लग जाय न ही कोई आर्थिक औचित्य था ।  इन विवेचना से कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण बिजनौर , हरिद्वार , सहरानपुर न सही कुछ भागों में में खस भाषा या खस प्रभावित बोली अवश्य बोली जाती रही होगी।  हो सकता है शौरसेनी प्रभावित हिंदी या स्थानीय भाषा व खस मिश्रित भाषा भी बोली जाती रही होगी। 
 
   

सन्दर्भ :

 

1- Dabral, Shiv Prasad, (1960), Uttarakhand ka Itihas Bhag- 3, Veer Gatha Press, Garhwal, India page 420

 2 - वुलनेर , अल्फ्रेड (2016 ) इंट्रोडक्शन टु प्राकृत रीप्रिंट मोतीलाल बनारसी दास दिल्ली

 

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स्रुघ्न (साहरनपुर ) का नष्ट होता बैभव
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 पूर्व वंश काल में बिजनौर , सहारनपुर , हरिद्वार के नगर - १

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास (647-725 AD  )- १९

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age  of History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  (647-725 AD ) - 19   

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  296                     
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  29६     

    इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती     
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हर्ष के राज्य काल में ही स्रुघ्न नगर के  बैभव पर ग्रहण लगना  शुरू हो गया था। कान्यकुब्ज (उत्तरप्रदेश )  में उत्तर भारतीय क्षेत्र की राजधानी बनने से स्थाणेश्वर  व स्रुघ्न दोनों के बैभव निम्न तल में जाने लगे थे।  डा डबराल ने डाक्टर छाबड़ा के खोज आधार पर टिप्पणी देते लिखा कि अंदाज लगता है कि अमोधभूति  काल में शक -पल्ल्व लुटेरों के अश्चर्यी आक्रमणों ने बसृह्न ने अपनी समृद्धि खो दी होगी।  कुषाण  काल में प्रसिद्ध है वे नगर स्रुघ्न की समृद्धि हूणों के आक्रमण से छिन  गयी। 

 संदर्भ
शिव प्रसाद डबराल  चारण ,  १९६९ , उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ , पृष्ठ ४२१
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सहारनपुर इतिहास में स्रुघ्न का महत्व ,  स्रुघ्न का सहारण पुर इतिहास में स्थान



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  पौरव  काल पश्चात  मयूरध्वज नगर  का ध्वस्त होना 


हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास (647-725 AD  )-  २०

Paurava dynasty in Dark/ Early Middle Age  of History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  (647-725 AD ) - २०   

Ancient History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History Part  -  297                     
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  २९७   

    इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती     
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   भग्न मोरध्वज  या मयूरध्वज किला    उत्तर प्रदेश क्व बिजनौर जिले में  कोटद्वार से नजीबाबाद जाते समय १५ किलोमीटर दूर  मथुरामोर में स्थित है।   मयूरध्वज का संबंध महाभारत काल से ही रहा है। कहा  जाता है कि   राजा मयूरध्वज या  मयूरध्वज  कृष्ण   के परम भक्त  थे। 
पौरव काल से पहले मोरध्वज गोविषाण - जाने वाले राज मार्ग का विशेष व्यापारिक नगर था। 
  पुरात्ववेतियों जैसे मरखाम  (२ ) व के पी नौटियाल (४ )  के खुदाई से मयूरध्वज /मोरध्वज किले  पर कई प्रकाश पड़ता है।   मरखाम की खोज में  पता चला कि  छठी  - सातवीं सुदृढ़ किला  निर्मित हुआ  में १३ १/२   X  ८ १/२  "  X २ १/२ " ईंटे लगीं थी।  आधार में इससे भी बड़ी आकर की ईंटें लगीं थीं।  दुर्ग के बाहर ६० फ़ीट चौड़ी व ६ फ़ीट गहरी खायी खुदी थी।   पूर्व में एक स्तूप था।   मखराम को वहां पकी हुयी १०००  मृदा मूर्तियां मिलीं थीं।  जिन पर  एक ही सांचे से किसी अचल ध्यान मग्न योगी की आकृति अंकित थी तो नौटियाल की खोज में  बुद्ध मूर्ति व कृष केशी राक्षस वध की मूर्तियां मिलीं।  मखराम अनुसार योगी की शक्ल बुद्ध से मिलती जुलती थी।  दो वृताकार मृणमूर्तियों पर चैत्य के अंदर बैठे  बुद्ध चित्र अंकन हुआ है।  चैत्य के निम्न तल में 'ये धम्मा' आदि खुदा है।   दो दर्जन  छोटी छोटी मृणमूर्तियां मिलीं थीं।  इन सब में ध्यान मग्न बुद्ध अंकित हुए थे।  दोनों ओर  दो भिक्षु भी खड़े अंकित थे। 
 बारहूत व साँची स्तूपों जैसे काष्ठवेष्टिनियां मिलीं थीं।  वैसी   मोरध्वज की खुदाई में नहीं मिलीं।  यहां के स्तूपों में जो अलंकरण /सजावट हुए हैं  उन्हीं चित्रित  शिलाओं का प्रयोग नजीबाबाद के पत्थर गढ़ किले में भी हुए हैं (५ ) अर्थात निजाबु दौला  (जिसने किला बनवाया )   ने मोरध्वज के  स्तूप  के पत्थरों को  तहस नहस किया गया व किला बनवाया गया। 

नौटियाल की खोजानुसार यह नगर 2  BC  - ५ / ६ सदी तक  फल फूल रहा था।
  जनश्रुति अनुसार मोरध्वज का निर्माण महाभारत कालीन  किसी  राजा ने किया था।  दुर्ग व स्तूप पर लगी इंटों  के अध्ययन से लगता है  कि  दोनों  के  निर्माण काल  में कोई विशेष अंतर् न था।  स्तूप में मिलीं मृण  मूर्तियों  की लिपि  अध्ययन से लगता है कि स्तूप का निर्माण काल आठवीं सदी का होगा।  पर्वताकार नरेशों का अधिकार भाभर क्षेत्र में भी था अतः  मोरध्वज किला भी  पर्वताकार राज्य के अधिकार में रहा होगा। 

 संदर्भ -
 १- शिव प्रसाद डबराल, चारण  १९६९ ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ , वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ४२१
2- मरखाम , १८९१  जॉर्नल ऑफ एसियाटिक सोसाइटी ौफ़ बंगाल , vol 60 , पृष्ठ २
३- ऐतिहासिक स्थानावली ,  राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी  , जयपुर , पृष्ठ ७६४
४- Mordhwaj , District Bijnor, Archeological Survey of India site , asideharaduncircle ,  in . excavation , html  (के नौटियाल द्वारा  खनन १९७८ -१९८१ में )
५- फ्यूरर मोनीमेंट्स ऐन्टिक्विटीज  vol २ पृष्ठ ३२
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मोरध्वज किला व तब बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर में आजीविका साधन

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास २१

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death - 21

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -   298                 
                           
  हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -२९८                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 मोरध्वज  किला वा आस पास के उत्खलन से उस समय क्र भाभर (बिजनौर  , हरिद्वार व सहरानपुर ) के इतिहास पर कई तरह का प्रकाश पड़ता है।   बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर में   उस समय विशेषतः हर्ष व पर्वताकार समय आजीविका का मुख्य साधन कृषि  व वन उत्पाद संबंधी कार्य था।  कृषि तब भी वर्षा पर निर्भर थी।  भाभर , नजीबाबाद , मोरध्वज व आसपास के उखलन में तालबों के मिले अवशेषों से अनुमान लगता है कि  तब वर्षा कम होती थी और वर्षा जल संग्रहण (पीने , घरलू उपयोग , पशुओं के पीने व सिंचाई हेतु ) हेतु तालाब खोदे जाते थे।  तलबाब तट पर यक्ष मूर्तियों से पता चलता है कि  वर्षा हेतु मनौती मानी जाती थी व बलि चढ़ाई जाती थी (१ ) । 
एशिया लगता है व्यापर भी आजीविका माध्यम था।  सोने की मुद्रा प्रचलित थीं।  लोगों  की आवश्यकताएं कम थीं। 
संदर्भ
१- शिव प्रसाद  डबराल  ‘चारण’ , १९६९ , उत्तराखंड का इतहास भाग -४ पृष्ठ ४२२ , वीर गाथा पर्सेस दुगड्डा , उत्तराखंड , भारत
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मोरध्वज किला व तब बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर में आजीविका साधन , हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का प्राचीन इतिहास  आगे खंडों में   .. ,


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पर्वताकार पौरव काल में बिजनौर, हरिद्वार , सहरानपुर में वेशभूषा

Dressings  in Bijnour, Haridwar , Sahranpur in   Paurava/Parvatkar Ruling period
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -२२

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -22

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -    299                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  २९९               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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मोरध्वज  किला स्थल के उत्खलन से प्राप्त मृणमूर्तियों से ज्ञात होता है कि  उस समय नर नारी छोटी धोती पहना करते थे।  धोती कमर पर कास कर बंधी होती थी (२ )  I उसके ऊपर नर नारी  पटुका बांधते थे।   नारियों के पटुके से  कोई आभूषण लटका रहता था धोती ऊपर शरीर नग्न होता था।  )१ )
तब बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर के नर  नारी बालों में  जूड़ा  बनाते।  नारियों गले में हर होते थे।  योगी व भद्र पुरुष आसन बांधकर बैठते थे व शिष्य या सेवक चंवर डोलते थे।  अंजन का बड़ा प्रचलन था।  मोरध्वज की खुदाई में अंजन की सलाईयां मिलीं है।
   मोरध्वज यद्यपि बिजनौर में आज है किंतु  यह स्थल हरिद्वार व सहारनपुर से कोई दूर नहीं है कि  संस्कृति में भारी बदलाव आये।   
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 संदर्भ -
शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ४२२ ४२३
मखराम - जॉर्नल , एसियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल vol  ६० , पृष्ठ २ व ४
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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का प्राचीन इतिहास  आगे खंडों में   ..


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पर्वताकार के पौरव  राजवंश में मोरध्वज क्षेत्र (बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर ) में धर्मावलम्बी

Religion in Mordhwaj fort Region in Paurava dynasty of Parvatakar
 
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -२३

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -२३

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  300                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३००               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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मोरध्वज क्षेत्र में लोक धर्म हिन्दू (सनातन )  था।  दक्षिण बिजनौर में कुछ क्षत्रों में बौद्ध , अ चैल  योगी उपासक थे।  नाग , सूर्य ,वामन स्वामी , यक्ष , ग्राम देवी देवताओं की पूजा प्रचलित थी एवं इनकी मूर्ति पूजा होती थी।  मंदिरों को भूमिदान देना पुण्य कार्य समझा जाता था।  जनता , भद्र पुरुष व शासक भूमि दान में आगे होते थे इसलिए मंदिर संख्या में वृद्धि हुयी।  (द्युतवर्मन का शाशन २   ) .   
      मोरध्वज  (बिजनौर ) परिपेक्ष में  पौरव में देव मंदिरों की व्यवस्था -
    देव मंदिरों की व्यवस्था हेतु  राज्य में  एक  विभाग था।  जिसके मुख्य अधिकारी को देवद्रोण्यधिकृत कहते थे।  देवद्रोणी शब्द से समझा जा सकता है कि  तब भी देव जात्राएँ निकला करती थीं . इसमें दो राय नहीं कि तब हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर में क्षेत्रीय या राज्य प्रसिद्ध डिवॉन की यात्रायें निकलतीं थी (2 ) ।  मंदिरों हेतु दी गयी भूमि पर राज्य कर नहीं लगता किन्तु कर बराबर अनाज आधी अधिकृत मंदिरों को मिलता था। 
 कृषि  उपज आय से मंदिरों में यात्रियों को भोजन व वास की सुविधा मिलती थी। किसान उपज का निश्चित भाग मंदिर को देते थे।
  इन धमराधिकारियों की सहायता हेतु परिषद होतो थी जिसमे जनपद के प्रतिष्ठित साधू सन्यासी , ब्रह्मचारी , सदस्य होते थे।  परिषद संभवतया धार्मिक स्थलों व   मंदिर भूमि की व्यवस्था करती रही होगी (१ )। मोरध्वज के पास धार्मिक स्थल तो था ही।  संभवतया एक अधिकारी (स्तर अधिकारी ) मोरध्वज क्षेत्र के लिए रहा हो। 
 मंदिरों में देव मूर्ति सम्मुख बलि चढ़ाकर पूजा होती थी।  बलि में पशु , अनाज भोग आदि होता था।  देव मूर्ति को दही , घी , सुगंधित पदार्थ लेप होता था (द्युतिवर्मन के आदेश )  व पुष्प अर्पित होते थे।  चूँकि पौरव राजध्यक्षों के आदेश में वाद्य यंत्रों का उल्लेख नहीं मिलता डोकर डबराल ने निर्णय दिया कि  देव दासी प्रचलन नहीं रहा होगा। 
मंदिर की सफाई , मरोम्मत आदि का वयवय भी मंदिर को दी गयी भूमि कृषि लगान से होता था।  भूमि किसान कर राज्य को नहीं अपितु मंदिर पुजारी  को देते थे।  इसकी सूचना उपरीक , परमातार , प्रतिहार , कुमारामात्य , विषयपति बलाधीक्ष आदि अधिकारीयों को दे दी जाती थी। 
- संदर्भ
 १-  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४२३
२- नचिकेत चंचानी ,२०१९ , माउंटेन टेम्पल्स ऐंड टेम्पल माउंटेन्स : आर्किटेक्चर रिलिजन ऐंड नेचर इन द सेंट्रल हिमालय , यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन प्रेस, पृष्ठ 56
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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का प्राचीन इतिहास  आगे खंडों में   .. पर्वताकार के पूर्व राजवंश में मोरध्वज क्षेत्र (बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर ) में धर्मावलम्बी , Religion in Mordhwaj fort Region in Paurava dynasty of Parvatakar


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पौरव राजवंश समय हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर में बौद्ध धर्म

Bauddhism in Haridwar, bijnour , Sahranpur  in Paurava Era (mordhwaja Fort )
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -२४

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -24

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -     301               
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३०१             


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 यह सर्विदित था कि  जब  हुयेन  सांग भारत आया तो बिजनौर व गोविषाण (उधम सिंह नगर ) में बौद्ध धर्म जड़ जमा चूका था।  मोरध्वज किला व निकटवर्ती archeological  अवशेषों  से पता चलता है कि  बिजनौर व भाभर (हरिद्वार मिलकर ) में बौद्ध धर्म लोप नहीं हुआ था। 
मखराम के खोजों अनुसार (२ ) चैत्यों में मिली मिटटी की छोटी  बौद्ध मूर्तियों से स्पष्ट है कि  पौरव काल या हर्ष काल के बाद बिजनौर में बौद्ध धर्मावलम्बी थे।  बुद्ध की पकी मिटटी की मूर्तियों  में 'ये धर्मा हेतुप्रभवा ' अंकन हुआ है। 
मोरध्वज की कुछ मूर्तियों में बुद्ध  अति सुंदर चैत्य  के अंदर बैठे हैं।  बुद्ध के सिर में प्रभामंडल है।  बुद्ध को पुष्पहारों से सजाया गया है।  ऊपर गंदर्भ   वाद्य यंत्र  बजा रहे हैं।  चैत्य के दोनों और  एक एक व्यक्ति हैं और शायद एक नारी है ।  व्यक्ति चंवर दोल रहे हैं (१ )
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संदर्भ -
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   -४२४
२- मखराम  १८९१ ,उपरोक्त पृष्ठ ३, ४ , ५

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पौरव राजवंश समय हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर में  अचैल योगी  (जैन  धर्मी    ) उपासना    (संदर्भ मोरध्वज किला )
Bauddhism in Haridwar, bijnour , Sahranpur  in Paurava Era (mordhwaja Fort )
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -२५

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -25 

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -     302                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३०२               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
मोरध्वज  किले की खुदाई से मखराम  (  १८९१ ,जॉर्नल ऑफ असोसिएटेड ऑफ़ बंगाल जिल्द ६० , पृष्ठ ३ )  ने स्पष्ट किया कि तब  इस क्षेत्र से अनेक मिटटी की मूर्तियों में ध्यानस्थ अचैल  का अंकन भी है।  योगी के सर पर जता है।  गांठ के ऊपर मोरपंख हैं व सिर  पर प्रभा मंडल भी है।  दोनों ओर छोटे आकर के नग्न व्यक्ति खड़े हैं।  मखराम ने बौद्ध मूर्ति माना है।  किन्तु डा शिव प्रसाद डबराल ने खंडन किया कि बुद्ध की सचैल दिखने की प्रथा थी जबली अचैल मूर्तियों का प्रचलन जैन धर्मियों में था।  इससे लगता है कि   कहीं कहीं जैन धर्म विश्वासी भी थे।
     मोरध्वज   उत्खलन आधारित जब विश्वास
मोरध्वज किले के उत्खलन से लगता है बिजनौर , हरिद्वार व सहारन पुर की जनता श्रद्धालु थी व सनातनी मंदिरों व स्तूपों के निर्माण , वहां अर्चना करना व दर्शन करना पुण्य का काम समझा जाता था।  राजवंशों में देवकुल निर्माण की प्रथा थी।  यद्यपि पूर्व वंशों के देवकुल से कोई मूर्ति नहीं मिलीं। 

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संदर्भ -
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   -४२४


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