Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 30750 times)

Bhishma Kukreti

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       यशोवर्मन के राज्य में हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर क्षेत्र

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास - २६ 

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death - 26

Ancient History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  303                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३०३               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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                    यशोवर्मन व सामयिक हरिद्वार , बिजनौर व सहरानपुर
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हर्ष की मृत्यु बाद उन दिनों पूर्व नरेशों का राज चल रहा था।  भारत के पश्चिम में यवनों का राज्य प्रारम्भ हो गया था।  इसी समय कश्मीर में ललितादित्य व पंचाल नरेश यशोवर्मन ने अरबों या मुस्लिम आक्रांताओं या आतंकवादियों को रोकने हेतु प्रयत्न  किये। 
 हर्ष की मृत्यु से ७५ वर्ष तक का पांचाल इतिहास में कोई प्रामाणिक सामग्री नहीं मिलती है।  तभी सन  ७२५ ी के लगभग कन्नौज में एक भड़ /बियर योद्धा ने कान्यकुब्ज राजगद्दी पर अधिकार कर लिया (२ )
यशोवर्मन के बारे में  यशोवर्मन के राजकवि वाकपति  के प्राकृत काव्य संग्रह  गाऊड वहो ('गौड़ वध '  में मिलता है (३) ।
इस विवरण याने गाउड  वहो म   यशोवर्मन तै चंद्रवंशी बुले गे अर  यशोवर्मन दिग्विजय प्रकरण मिल्दो  सर्व प्रथम बंग नरेश ने अधीनता स्वीकार की फिर मलय देस व समुद्र तटीय क्षेत्र जीते  , पारसीकों के बाद सह्याद्रि , राजस्थान , थानेश्वर में राज्य कायम किया व  उपायेन (कर या दक्षिणा ) निश्चित किये। थानेश्वर से    कुरुक्षेत्र  होते हुए अयोध्या जीता।  फिर मंदर पर्वत  जहां कुवेर वास करते हैं व देवदारु वाले क्षेत्र को जीता।  (यद्यपि कई विरोधाभास हैं ) . वाकपति  के वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण हैं। 
 तिब्बत पर आक्रमण
    डा शिव प्रसाद डबराल ने बताया कि  यशोवर्मन ने   व तिब्बतियों के आतंकवादी  हमले  रोकने  हेतु चीन नरेश से (731 ई  ) से सहायता मांगी थी।  चीन नरेश ने कोई सहायता नहीं दी तो ललितादित्य व यशोवर्मन ने अरबी आतंकियों के सरदारों को भगाया।  मुस्लिम आतंकवादियों को समाप्त करने का भारत में यह पहला  सादोस्य पूर्ण  कार्य माना  जायेगा।  यशोवर्मन को तिब्बती  आतंकवादी आक्रांताओं को रोकने में भी सफलता मिली थी।  बाद में ललितादित्य से उसका युद्ध हुआ।  इसी समय यशोवर्मन राजू अस्त हो गया। 
   यशोवर्मन के मुद्रा से उसका काल ७२५  से ७५२ तक  बैठता है। 
         इस तरह साबित होता है कि  यशोवर्मन का राज्य हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर पर भी था।
 डा डबराल ने लिखा है कि  उत्तराखंड के शासक कत्यूरी वंश संस्थापक बसन्तन  ने    संभवतया यशोवर्मन की अधीनता स्वीकार की होगी।  यशोवर्मन का  ललितादित्य से पराजय या मृत्यु बा कत्यूरी नरेश बसन्तन ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी हो।
       यशोवर्मन का व्यक्तित्व
यशोवर्मन वीर था व भविष्यदर्शी भी था।   यशोवर्मन  को मध्य देश  बचाने हेतु तिब्बत (आज चीन )  के आतंकवादी  हमले रोकने के लिए उत्तराखंड रक्षा व मुस्लिम आतंकवादियों के आतंकवादी हमलों से  से रक्षा हेतु कश्मीर रक्षा को  महत्व पूर्ण  समझा। 
यशोवर्मन विद्वान् प्रशंसक था व उसके दरबार में  कवि व विद्वान आश्रय लेते थे,  जैसे वाकपति  व नाटककार भवभूति।  रजतरंगनी  अनुस्वार यशोवर्मन स्वयं भी कवि था। 
   

- संदर्भ
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४२५ -४२६
२- चोपड़ा प्राण नाथ , (२००३ )  कॉम्पेरहेंसिव हिस्ट्री ऑफ़ ऐनसियंट इंडिया , स्टर्लिंग , पृष्ठ १९४
३- मजूमदार ,रमेश चंद्र ,(१९५२), एनसीयंट इण्डिया , मोतीलाल बनारसीदास , प २५९
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बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का इतिहास व पांचाल में उथल पुथल  व वज्रायुध

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास २७

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -27

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -   ३०४                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -३०४                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 पांचाल याने कान्यकुब्ज में पराक्रमी नरेश यशोवर्मन के पश्चात कमजोर शासकों का राज रहा अर्थात पांचाल पतन होता गया।  इसी पतनकाल ग्यारहवीं लगशांति विक्रम संवत से लेकर ढाई सौ वर्ष तक उत्तराखंड में कत्यूरी राजाओं का राज्य रहा और कहा जाता है कि कत्यूरियों का अधिकार सतुलज नदी से लेकर गंडकी नदी से लेकर रुहेलखंड तक फैला था (१ , २  ) .   
 किस प्रकार कत्यूरी नरेश अपनी प्रभुसंपन्ता बनाये रखने हेतु पांचाल में उथल पुथल को भी समझना आवश्यक है। 
   यशोवर्मन अपने मित्र  ललितादित्य से हारकर यशोवर्मन की  कांती   नष्ट हो  चुकी थी  (३ )  व फिर भी कुछ समय तक उसके वंशजों का राज निकटवर्ती क्षेत्रों में न्यूनाधिक रूप से रहा।  डबराल का मानना है कि  संभवतया इसी समय कत्यूरी वंश संस्थापक वसंत देव ने क्तिरि राज की स्थापना की थी। (१  )
             वज्रायुध  कनौज राजा  (७७० -८१० )
 यशोवर्मन की मृत्यु पश्चात  कान्यकुब्ज सिंघासन पर एक नए राज वंश का अधिकार हो गया ये दुर्बल नरेश थे ा इना राज ७७० से ८१६ तक मन जाता है (३ )
अनुमान किया जाता है कि  वज्रयुद्ध सन ७७० में राज्यासीन हुआ व ८१० सन तक उसका राज्य रहा। 
रजत रंगनी अनुसार कश्मीर नरेश ने कान्यकुब्ज कोप्रजित किया और सिंहासन व छत्र उठकर ले गए।  संभवतया यह घटना वज्रायुध के अंतिम काल या इंद्रायुध  के समय घटित हुयी होगी।  (त्रिपाठी पृष्ठ २१३ )
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संदर्भ -
  १ -शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४२९ , ४३० 
२- एटकिंनसन  एडवर्ड टी - हिमालय  गजेटर्स   वॉल्यूम  २ ,  पृष्ठ -४६७ , कॉस्मो पब्लिशर्स दिल्ली
३-  रमा शंकर त्रिपाठी , १८८९ ,हिस्ट्री ऑफ़ कन्नौज _ टु द मोसेलम कोनक्वेस्ट  , मोतीलाल बनारसीदास पृष्ठ २११-२१२
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 कन्नौज राजा इन्द्रायुद्ध

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास - २८

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death - 28

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -     305               
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३०५                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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जैन ग्रंथ हरिबंश अनुसार इंद्रायुध  उत्तर दीक्षा का नरेश था   व उसका  शाशन कल ७८३ - ७८४ ई.  माना  जाता है (१ ) बज्रयुध  की मृत्त्यु के बाद कनौज निकट तीन शाशक कन्नौज को हथियाने की मंशा बनाये थे  ये तीन शाशक थे

 १- बंग , मगध नरेश धर्मपाल
२- अवन्ति  का प्रतिहार नरेश बत्स राज
३- राष्ट्रकुल मान्यखट  नरेश ध्रुव
 इन तीनो के मध्य    कन्नौज हथियाने   कड़ा संघर्ष चला था।  अनुमान है कि धर्मपाल जब पश्चिम की ओर   बढ़ रहा था तो प्रतिहार नरेश बछराज ने   धर्मपाल को पराजित कर उसका राजछत्र छीन लिया।   जब राष्ट्र कुल नरेश ध्रुव् कांय कुब्ज  जीतने  हेतु आगे बढ़ा तो इंद्रायुध  ने धर्मपाल की सहायता मांगी और मानखुट  नरेश  ध्रुव ने   धर्मपाल को पराजित किया तो इंद्रायुध को ध्रुव की दासता स्वीककारनी पड़ी।  ध्रुव ने अपने राजचिन्हों में गंगा जमुना भी अंकन शुरू कर दिया था किन्तु शीघ्र  ही ध्रुव को दक्षिण ओर लौटना पड़ा। 
- '
संदर्भ
`१-  राम शंकर त्रिपाठी , १९८९ ,  हिस्ट्री ऑफ़ कन्नौज  टू  द  मोसोलेम कनक्वेस्ट ,  मोतीलाल बनारसी दास ,  पृष्ठ २१३
  २- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ    ४३१
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चक्रायुध  ko कन्नौज  की राजगद्दी मिलना

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास - 29

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death - 29

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -   306                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  306               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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ध्रुव ने धर्मपाल पर आक्रमण किया तो धर्मपाल शक्तिशाली ही हो गया।  मजूमदार  (२ ) अनुसार  धर्मपाल ने कन्नौज पर इंद्रायुध  को राज्यच्युत कर इंद्रायुध के परिवार के चक्रायुध को कान्यकुब्ज की राजगद्दी पर बिठाया (संभवतया ८०० ईशवी ) ।
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४३१
२-  मजूमदार  आर सी  . १९५५ , एज  ऑफ इम्पीरियल कन्नौज , पृष्ठ ४६

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  मगध -सम्राट : धर्मपाल
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हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -३०

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -30

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 307                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -    ३०७             


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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कान्यकुब्ज पर अधिकार पश्चात ंघड़ सम्राट धर्मपाल ने कन्नौज में  धूम धाम से दरबार लगाया था।  धर्मपाल खालीमपुर शासन अनुसार (२ )  इस दरबार में भोज , मत्स्य ,मद्र , कुरु , एवं , अवन्ति , गांधार कांगड़ा के राजाओं ने उपस्थित होकर प्रणाम किया था।  अन्य राजाओं के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे।   इतिहासकारों हेतु आश्चर्य है कि निकटवर्ती राज्यों के शासक जैसे उत्तराखंड के कार्तिकेयपुर, स्रुघ्न , और ब्रह्मपुर के राजा उपस्थित नहीं हुए। (१ )   हो सकता है कि तब तक उत्तराखंड के ये तीनों क्षेत्र धर्मपाल के तहत आ गए हों।   धर्मपाल के पुत्र देवपाल के शासन  अनुसार उसका राजू विस्तार गंगा जी के सत्र तक था।  देवपाल के प्रतिनिधियों ने केदारखंड की यात्रा भी की थी(३)। 
निविड़ परिवार के अभिलेखों में पाल वंशज का उल्लेख है।  ऐसा लगता है जब चक्रायुध धर्मपाल का सूबेदार बना तभी धर्मपाल के इशारे पर निविड़ ने वसन्तं के परिवार के अंतिम नरेश त्रिभुवनराज से कार्तिकेयपुर का शासन छीना था (१ ) ।   उपरोक्त तथ्यों से निश्चित होता है कि  धर्मपाल का हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर और   परोक्ष  या अपरोक्ष  रूप से शासन रहा था। 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४३२ -३३
२- धर्मपाल का खालीमपुर ताम्रपत्र शासन पृष्ठ २१-२२
३- देवपाल का मुंगेर शासन प, १०-१२ 
४- देवपाल का मुंगेर शासन प, २३ , २४
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मगध सम्राट देवपाल

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास ३१

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -31

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -   308                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -३०८                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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धर्मपाल की मृत्यु पश्चात मगध राजगद्दी पर उसका पुत्र देवपाल राजगद्दी पर बैठा।  उसकी  मां  का  नाम राणादेवी व पत्नी का नाम महत्ता देवी था . देवपाल की राज्य समय ८१० से ८५० ईश्वी माना जाता है (१ ) ।
देवपाल ने पाल वंश की राज्य का क्षेत्रीय प्रसार भी किया था।  देवपाल के मुंगेर  ताम्रशासन से विदित होता है कि उसका राज्य समस्त उत्तर भारत , हिमालय से विंध्याचल, अर्ब सागर  से बंगाल तक था।  प्रतिहार नरेश नागभट ने कन्नौज पर आक्रमण किया व  देवपाल से पराजित हुआ (२ )।
देवपाल भी बौद्धमत मानता था।  अनुमान है की इसी युग में गुरु गोरखनाथ ने धौला उड्यारी नामक गुफा में तपस्या की थी (१ ) । 
देवपाल का उत्तराखंड क्षेत्र नरेशों से मित्रता थी (२ )। 
धर्मपाल व देवपाल वीर नरेश थे। 
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संदर्भ :
१- त्रिपाठी , एज ऑफ़ इम्पीरियल कन्नौज , परइ ५०-५२
  २- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४३५-४३६ 
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में प्रतिहार नरेश  मिहिर भोज (८३३   -८८५ ईशवी )
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Pratihar  King  Mihir Bhoj ( 833   -885 AD )
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -३२
Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -32

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  309                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३०९               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 रामभद्र पुत्र भोज को सन ८३३ लगभग प्रतिहार सिंघासन प्राप्त हुआ था।  प्रतिहार नरेश भोज को ८३६ ईस्वी में कान्यकुब्ज पर शासन स्थापितीकरण की सफलता मिली।  ८४३ के लगभग भोज को पूर्व राजस्थान की ओर  शासन में ध्यान देना पड़ा।  देवपाल से पराजित होने के बाद भोज को दक्षिण की ओर  ध्यान देना पड़ा।  (Age of  Emperial Kannauj  page 29 ) .
८४५ - ८६० तक भोज ने राष्ट्रकूट पर आक्रमण किया किन्तु नरेश ध्रुव से हार का सामना करना पड़ा।  कलचुरी नरेश  ने भी भोज को हराया।   इस कारण भोज राज्य प्रसार न कर स्का . भोज ने ८६१ लगभग जोधपुर कस्टर पर विजय हासिल की थी। 
सन ८५० िश्वि में देवपाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी कमजोर साबित हुए तो प्रतिहार भोज को उत्तर में राज्य विस्तार का अवसर प्रशस्त हो गया।
शिलालेख से विदित होता है कि भोज ने दिग्विजय की योजना बनाई और मगध , राष्ट्रकूट , पर अधिकार कर लिया (Tripathi , Age of  Emperial Kannauj  page31 ) I
भोजन ने उत्तराखंड  कत्यूरी नरेश सलोणाादित्य  से सिंघसन छीना (८७६ -८७८ )। 
प्रतिहार भोज का राज गुरत व काठियावाड़ के कुछ भाग पर भी रहा।  उत्तर पश्चिम में पंजाब पर भी अधिकार था।  गोरखपुर पर भी भोज का शासन था।  बुंदेलखंड पर भी भोज का अधिकार था।  उत्तराखंड पर भी कुछ न कुछ हिसाब से भोज का अधिकार था। 
भोज बलवान व महत्वाकांक्षी था व भगवती भक्त राजा था।  भोज की मृत्यु लगभग ८८५ सन के लगभग हुयी ( १ ) .
अर्थात प्रतिहार नरेश का शसन सहारनपुर , हरिद्वार व बिजनौर पर कुछ न कुछ रूप से था।   
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संदर्भ :
  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ४३६- ४३८   
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    बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर संदर्भ में  प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल प्रथम

हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -33

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death -33


Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 310                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३१०                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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महेंद्र पाल प्रथम मिहिर भोज का पुत्र था व प्रतिहार वंश का सातवां शाशक था। महेन्द्रपाल का उल्लेख काठियावाड़ ,पंजाब , मध्य प्रदेश व बिहार के शिलालेखों में मलिता है।
महेंद्र पल का कुछ भूभाग कश्मीर नरेश शंकरवर्मन ने छीन लिया था।  किन्तु पूर्व में गुर्जर प्रतिहार नरेश  महेन्द्रपाल  ने राज्य वृद्धि की।  प्रतिहार गुर्जर महेन्द्रपाल का राज्य हिमालय से विंध्य व बंगाल की खाड़ी तकव पश्चिम में काठियावाड़  था।  (२ )
उत्तराखंड भी कुछ ना कुछ रूप से महेंद्र पाल शासन अंतर्गत था (१ ). . महेन्द्रपाल की राज्य सभा में कवि नाटककार राजशेखर भी था जो महेन्द्रपाल के पश्चात भी राज कवि रहा है।  राजशेखर कृत प्राकृत नाटक 'कर्पूर मंजरी ' व संस्कृत नाटक 'बाल रामायण' महेन्द्रपाल काल में ही अभिनीत हुए।  हरिश्चन्द्र ने प्राकृत नाटक /सट्टक  का हिंदी अनुवाद किया था। प्रतिहार गुर्जर नरेश  महेन्द्रपाल का शासनकाल ८८५ से ९०८ ईश्वी था। 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४३८
२- रमाशंकर त्रिपाठी , १९८९ , हिस्ट्री ऑफ़ कन्नौज मोतीलाल बनारसी दास पृष्ठ २४८
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प्रतिहार नरेश महिपाल /क्षितपाल ( ९१३ -९४४ )

Pratihar King Mahipaal
हर्षवर्धन पश्चात बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का 'अंध युग' अर्थात तिमर युग  इतिहास -३४

Dark  Age of History after Harsha Vardhan death - 34

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  311                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३११                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 महेन्द्रपाल की मृत्यु पश्चात उसका पुत्र भोज व पौत्र महिपाल सिंघसन पर बैठे।   महिपाल व उसके उत्तराधिकारी दुर्बल शासक ही साबित हुए। 
९१८ लगभग राष्ट्रकूट नरेश नरेश  इंद्र ने  कनौज नगर के तोरणों को नष्ट किया।       राष्ट्र कूट  सेना ने लगभग ९४० ईश्वी में कनौज  राज्य के दक्षिण भाग पर पर आक्रमण किया।  महिपाल को भागना पड़ा (२ )
 कवि राजशेखर भी महिपाल का राजकवि था।
महिपाल कीमृत्यु लगभग ९४४ में हुयी (१ )
 महिपाल के बाद पल वंश का   क्षरण होता गया व ९६० के लगभग कान्यकुव्ज पर विजयपाल के शासन की पुष्टि होती है (२ ) ।  इसके बाद किसी पल का कन्नौज संबंधी शासन  आदेश , शिलालेख नहीं मिलता  है (१ ) ।   महिपाल का एक वंशज देवपाल था जिसके सामंत चढेल बड़े शक्तिशाली थे।  ९२५ लगभग चंदेल नरेश हुए।  जो देवपाल को अपने अधीन मानते थे। 
अनुमान किया जाता है कि  उत्तराखंड नरेश कत्यूरी नरेश सलोणादित्य  ने देवपाल से दक्षिण सीमा पर लोहा लिया था
लगता है देवपाल नाम मात्र का उत्तराखंड यहां पर बिजनौर , सहारनपुर व हरिद्वार का शासक था। 
-
संदर्भ :
१- रमाशंकर त्रिपाठी , १९८९ , हिस्ट्री ौफ़ कन्नौज , मोतीलाल बनारसी दास पृष्ठ २५९
  २- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   -438
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  हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में कत्यूरी राजवंश का दंदर्भ    
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 उत्तराखंड पर कत्यूरी राज - १

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  312                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -    ३१२             


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती
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 पंचाल क्षेत्र में राजनीतिक उलट फेर के अध्ययनों से पता चलता है कि -
यशोवर्मन से  इंद्रायुध  तक  की राजनीती अर्थात ७४० िश्वि से लेकर ८०० ईश्वी  तक उत्तराखंड ( बिजनौर सहारनपुर सहित )  पर कत्यूरियों का शासन था।  इस समय वसन्तं परिवार की राज्यावधि माना जा सकता है (१ )। 
चक्रायुध से लेकर भोज प्रतिहार दिग्विजय अभियान आरम्भ तक अर्थात ८०० -८७५ तक कत्यूरी के निंबर का राज्य माना जा जा सकता है। 
८७६- १००० ईशवी  तक सलोण आदित्य का राज उत्तराखंड पर माना जा सकता है। 

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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४३९
Copyright @ Bhishma  Kukreti
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