Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 30776 times)

Bhishma Kukreti

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी राजवंश राज स्थापना                

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १२
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -12

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 324                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३२४                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -
 
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राहुल ने गढ़वाल पृष्ठ १०५ में तर्क दिया कि वसंतन  राज्यारोहण से पहले  दो शतियों  तक गढ़वाल , उत्तराखंड पर तिब्बत राज था।  तिब्बती शासक बौद्धों के प्रति एनएमआर थे व ब्राह्मणों के प्रति द्वेष रखते थे।  जब तिबत्ती भोटियों में शासन हेतु  स्वदेशी सामंतों में आपसी द्व्न्द शुरू हुआ तो  देशीय /उत्तराखंडिडी  सामंतों की शक्ति बढ़ने लगी। शकवंशीय वसंतन ने समय देखकर ब्राह्मण धर्म की शरण ले ली।  और केदारखंड का सामंत राजा बन बैठा। 
डाक्टर डबराल (१ )  ने राहुल  का खंडन करते  लिखा कि यशोवर्मन (७२५ -७५२ ईश्वी )  ने तिब्बती आतंकवादियों से उत्तराखंड को स्वतंत्र कर दिया था  अतः  यह सिद्धांत सही नहीं ठहरता कि  वसंतन  ने तिब्बती आतंकवादी शासक से उत्तराखंड का शासन ग्रहण किया।  चीनी यात्री अनुसार सातवीं सदी तक उत्तराखंड से बौद्ध धर्म लुप्त हो चूका था। 
संदर्भ :
दर्भ :
  १ शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४४७
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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर


Bhishma Kukreti

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी वंश की राज्यावधि   शरुवात         
     

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १३
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -13

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 325                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३२५                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -

 ललित शूर कत्यूरी राजवंश का आठवाँ नरेश था व ललित शूर का राज्य आरम्भ ८३२ ईश्वी था।   इस तरह ललित शूर से ७ पीढ़ी पूर्व  याने १०० साल  पहले कत्यूरी राज वंश की शुरुवात हुयी होगी (डबराल )
इस तरह गणत  करने से वसंतन  ने लगभग ७३२ ईश्वी से राजयारंभ  किया होगा।  वसंतन  संभवतया यशोवर्मन का पर्वत क्षेत्र का सामंत रहा होगा व यशोवर्मन के कमजोर होने पर वसंतन  ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया होगा। 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४४८
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में      कत्यूरी राजवंश राजधानियां             

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १४
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -14

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 326                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 326                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
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 कत्यूरी   बागेश्वर शिलालेख में वसंतन की राजधानी का कोई उल्लेख नहीं है। यदि वसंतन  या वासुदेव एक ही व्यक्ति थे तो जोशीमठ शिलालेख आधार पर जिसमें वासुदेव को गिरिराज चक्र -चंद्रचूड़ामणी  ' कहा गया है जिससे अनुमान लगता है कि वासुदेव या वसंतन की राजधानी जोशीमठ रही होगी (डबराल)।  जिसे कत्यूरी अभिलेखों में कार्तिकेयपुर कहा गया है।  तथा जहां निंबर परिवार की व सलोणादित्य परिवार की राजधानी थी।  कार्तिकेयपुर तिब्बत जाने वाले मार्ग नीति -माणा  की प्रहरी थी।  जोशीमठ से कुमाऊं क्षेत्र में सेना भेजने में भी सुगमता थी।  स्वतंत्र होने के पश्चात भी तिबती आतंकवादियों से रक्षा आवश्यक थी। कार्तिकेयपुर एक सही छावनी स्थल था।  डबराल लिखते हैं कि  रक्षा हेतु अन्य स्थानों में भी छावनियां रहीं होंगी।
 डी  सी सरकार ने कत्यूरी अभिलेखों की राजधानी कार्तिकेयपुर को अल्मोड़ा के वैद्यनाथ (आज का बैजनाथ ) को माना है (१ )। जबकि एटकिनसन (३ व राहुल (४ ) ने असहमति जताते बताया कि  राजधानी जोशीमठ ही थी।  वैद्यनाथ -कार्तिकेयपुर का सर्वपर्थम उल्लेख  तेरहवीं सदी  के त्रिभुवन पाल देव के शिलालेख में मिलता है (५ ).  त्रिभुवनपालदेव  के पूर्वज ललितशूर व पद्मदेव के अभिलेखों में कार्तिकेयपुर के निकट अंतरग, टंकणपुर, विषय , टंकण पुर , बद्रिकाश्रम , तपोवन , योशिका ,गरुड़ाश्रम , पलसारी , विष्णु गंगा आदि का उल्लेख होने से कत्यूरियों की आदि राजधानी जोशीमठ सही बैठती है।  पीछे जब बैद्यनाथ जाना पड़ा तो राजधानी का नाम वैद्यनाथ -कार्तिकेयपुर नाम दे दिया ( ६)।  राहुल की मान्यता है कि कत्यूरियों के पुरखे अपनी मुद्राओं में कार्तिकेय अर्थात स्कंध अंकित करते थे।  समुद्रगुपर के समय कीर्तिपुर की ख्याति थी बाद में महत्व घट गया किन्तु बाद में कत्यूरियों ने पुनः गरिमा प्रदान की व राजधानी स्थापित की ( २ )।
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संदर्भ :
१- एपिग्रफिका इंडिका vol ३१ भाग ६ , पृष्ठ २७९
  २ - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४४८
३- एटकिनसन - हिमालयन डिस्ट्रिक्ट्स खंड २ पृष्ठ ४६७
४- राहुल , कुमाऊं पृष्ठ ५६
५- राहुल कुमाऊं पृष्ठ ६१
६- राहुल कुमाऊं पृ ६५ 
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में    कत्यूरी नरेश वसंतन का चरित्र               

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १५
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -15

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  327                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -    327               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -

अभिलेखों से पता चलता हैं  कि  कत्यूरी राज संस्थापक वसन्तन एक धार्मिक विटी वाला नरेश था (डबराल )।   जोशी मठ नृसिंह   मंदिर में वसंतन का नाम खुदा है।  शायद यह मंदिर भी वसंतन  ने ही निर्माण करवाया होगा। कत्यूरी नरेश वसंतन  ने वैष्णवों को शरणेश्वर ग्राम अग्रहार मर दिया था।  कत्यूरी शासक वसंतन  की रानी सज्यनदेवी को पीटीआई परायण बताया गया है (१ )। नरसिंघ मंदिर अभिलेख में उसकी उपाधि ' गिरिराज चक्रचूड़ा मणि' अंकित है जिससे उसके शक्तिशाली राजा होने में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।  बागेश्वर अभिलेख में उसकी उपाधि 'परमभट्टारकमहाराजधिराज ' अंकित है। 
कत्यूरी वंश ने उत्तराखंड पर २५० -३०० वर्ष तक शांति व समृद्धियुक्त शासन किया।   
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ४८९   
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में  कत्यूरी नरेश   वसंतनपुत्र अज्ञातनामा नरेश                 

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १६
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -16

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 328                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३२८                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -

 वसन्तं के पश्चात उसका पुत्र राजगद्दी पर बैठा।  शिलालेख में इस अज्ञात नामी नरेश का नाम अपाठ्य  हो गया है (१ )।  वसंतनपुत्र की उपाधि 'परमभट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर था।  डबराल  अनुसार (१ ) इस नरेश को शिलालेख में परम् सम्मानित , श्रद्धाभाजन , अति बैभवसंपन बताया गया है।
 अज्ञात नामी राजा शिवभक्ति में विश्वास करता था।  शिव पूजनार्थ राजा ने कई वृतियां घोसित कीं  थीं .  अम्ब्ली गाँव में ब्याखरेश्वर मंदिर में पूजा अर्चन हेतु व्यवस्था की थी।  वसंतन  ने शरणेश्वर गाँव वैष्णवों को दान दिया था जिसे उसके इस पुत्र ने ब्याघ्रेश्वर मंदिर को अर्पित कर दिया था  (१ )। 
इस नरेश ने सार्वजनिक मार्ग (जयकुल भुक्तिका मार्ग ) ,  पथ शालाओं  जैसे समाज हित कार्यों का निर्माण किया था।  शिलालेख अनुसार उसकी कीर्ति चंद्र दिवाकर रहने की कामना की गयी है।  अशोक के पश्चात इसी अज्ञात नामी नरेश ने सामजिक मार्गों का निर्माण करवाया था।   
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संदर्भ :
१-  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग १  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ३७८ 
  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४४९ 
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी नरेश खर्परदेव              

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १७
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -17
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 329                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -३२९                   


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -
 
अज्ञातनामि कत्यूरी नरेश के पुत्र खर्परदेव की उपाधि भी 'परमभट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर ' थी।  खर्परदेव के शासन विषय में शिलालेख में कुछ नहीं मिलता।  खर्परदेव की रानी का नाम भी शिलालेख में अपठनीय हो गया है।  (डबराल )
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४४९
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में     कत्यूरी नरेश त्रिभुवनराजदेव               

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १८
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -18

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  330                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३३०                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -
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कत्यूरी नरेश   त्रिभुवनराजदेव ने अपने पुरखों के अनुसार पराम्भट्टारक महाराजधिराज उपाधि धारण नहीं की  क्योंकि तब उसके पड़ोसी सबल व आतंकी थे जैसे धर्मपाल।  डा डबराल अनुसार धर्मपाल के राज्य कर्मियों ने केदारनाथ की भी यात्रा की थी। 
कत्यूरी नरेश त्रिभुवनराजदेव ने जयकुलभुक्तिका में दो दूण वाला खेत ब्याघ्रेश्वर मंदिर को दान दिया था जिससे मंदिर में अर्चना , पुष्प , केशर का प्रबंध हो सके (२ )। 
कत्यूरी नरेश त्रिभुवनराजदेव के भाई ने त्रिभुवनराजदेव के राज आरूढ़ के ११ वर्ष में बंन्दिरों को भूमि प्रदान की जिससे पता चलता है कि त्रिभुवनराजदेव ने  कम  से कम ११ वर्ष राज किया था।  त्रिभुवनराजदेव का एक किरात पुत्र मित्र था जिसने ब्याघ्रेश्वर व गोबिंदपिंड देव हेतु भूमि दाम की थी (२ )। किरात पुत्र के बारे में अन्य कोई सूचना नहीं मिलती है। 
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संदर्भ :
 १-  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४५० 
२-शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग १  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड पृष्ठ ३७९
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में     कत्यूरी राजवंश का अज्ञात राजकुमार               

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - १९
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -19
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 331                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   ३३१               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -
 
 बागेश्वर शिलालेख से पता चलता है कि  अधिधज के दुसरे पुत्र ने अपने भाई त्रिभवंराजदेव से अधिक भूमि दान दी थी और इस राजकुमार का नाम शिलालेख में नहीं है (१ )। उसने यह भूमि  भटकु (भरके ) ब्याघ्रेश्वर वचंडालमुंडा डिवॉन को दान की थी।  अज्ञात कत्यूरी राजकुमार ने एक प्यायू भी निर्माण करवाया था (१ ) । 
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संदर्भ :
 १-  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४५१
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी नरेश  निंबर    व वंशावली              

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २०
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -20
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 332                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३३२                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती - -
 ललितशूर के ताम्रशासन में प्रस्तुत राजा का नाम श्रीनिंबरस् अंकन हुआ है।  भूदेव के बागेश्वर शिलालेख में प्रस्तुत नरेश को निम्बर्त लिखा गया है।  भूदेव के शिलालेखों में कत्यूरी राज वंशावली में अंतर् न होने से दोनों नाम एक ही नाम मने गए हैं।  अतः प्रस्तुत नरेश को निंबर हीमाना जाता है (१ )
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४५१ 
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में  कत्यूरी नरेश     निंबर    की राज्य प्राप्ति             

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २१
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -21
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -333                     
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३३३                 


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 ललितशूर ताम्रशासन अनुसार 'निंबर ने भगवान धुज्जर्टि  की कृपा से शत्रु तिमिर को हटाकर अपनी भुजा बल से राज्य प्राप्त  किया।  ऐसा लगता है कि त्रिभुवनराज की मृत्यु पश्चात उसके वंशजों को निंबर ने लड़कर उन्हें राजगद्दी से उतारकर स्वयं राजगद्दी पर बैठा था। 
 धर्मपाल ने ८०० ई  ० के लगभग  बाद  इंद्रायुध को कान्यकुब्ज की राजगद्दी से हटाकर चक्रायुध को बिठाया था। खालीमपुर ताम्र शासन अनुसार  . चक्रायुध अभिषेक समय  दरबार में गांधार , मरु आदि नरेश शामिल हुए थे किन्तु कार्तिकेय नरेश का नाम नहीं आया है।  इसके दो कारण है या तो कार्तिकेयपुर कान्यकुब्ज के तहत था या कार्तिकेयपुर का महत्व नहीं था। 
 इस दरबार के समय धर्मपाल के राज्य अधिकारी केदारनाथ यात्रा पर आये थे।  ऐसा लगता है कि निंबर का पाल वंश से अच्छे तालयकाट थे।  और लगता है धर्मपाल की सह पर निंबर ने  त्रिभवंराज देव या उसके वंशजों को राजगद्दी से उतारकर स्वयं गद्दी हासिल की (डबराल)।
 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ४५२   
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