Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 30774 times)

Bhishma Kukreti

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में  कत्यूरी नरेश निंबर की प्रशस्ति       
           

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २२
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -22
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 324                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३२४                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
 अभिलेखों में निंबर राज्य की किसी अन्य घटना का उल्लेख नहीं मिलता है।  निंबर के पौत्र ललितशूर के ताम्रशासनों  (पृष्ठ ३ -४ ) में निंबर को सतयुग सामान नरेश ,  दया , दाक्षिण्य , सत्व , शील , शौच , औदार्य , गाम्भीर्य , मर्यादा , आर्यवृत्ति , गुण संपन बतलाया गया है।  ताम्रशासन में निंबर को आश्चर्य जनक कार्य करने वाला बतलाया गया है।  भगवती माँ नंदा की असीम कृपा से निंबर को अपार लक्ष्मी प्राप्त हुयी थी।  निम्बर की अग्रिम महिषी का नाम नाशू देवी था। 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४५२
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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर

Bhishma Kukreti

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में    आदि गुरु  शंकराचार्य    का  गढ़वाल आगमन        

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २३
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -23
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  325                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   325               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
  ऐसा माना जाता है कि  आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म केरल में हुआ (788 ई ) और उन्होंने केदारनाथ में समाधी  ( ८ २०  ई )  ली थी।   आदि शंकराचार्य निंबरदेव या इष्टगण देव कत्यूरी के राज्य काल में गढ़वाल आये थे व उन्होंने बद्रीनाथ में अपने ग्रंथों की रचना की थी।  ऐसा कहा जाता है कि  आदि गुरु शंकराचार्य को व्यास ने दर्शन दिए थे।  (१ )
केरल से आदि गुरु अवश्य ही हरिद्वार व सहारनपुर क्षेत्र से बद्रिकाश्रम आये होंगे।  यदि  शंकराचार्य द्वारिका से बद्रिकाश्रम आये तो भी सहारनपुर व हरिद्वार के रास्ते ही बद्रिकाश्रम गए होंगे।  यदि शंकराचार्य जगनाथ पूरी से बद्रीनाथ आये तो चम्पावत , बागेश्वर व अल्मोड़ा के रास्ते बद्रिकाश्रम पंहुचे होंगे।  बद्रीनाथ में शंकराचार्य ने वर्तमान मूर्ति की स्थापना की थी और  तिब्बत समर्थित बौद्ध आतंक का नाश भी करवाया था। 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४५३ 
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में    कत्यूरी नरेश इष्टगणदेव               

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २४
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -24
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  326                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -३२६                   


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
ललित शूर के ताम्रशासन  (पृष्ठ ५ , ६ ) से पता लगता है कि निंबर के पुत्र इष्टगणदेव ने कान्यकुब्ज नरेश को संकट में फंसा देख संभवतया देवपाल के इशारे पर परम्भट्टारक महाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण कर ली।  ताम्रशासन अनुसार इष्टगणदेव ने अपनी िज्वाल तलवार से हाथी का मष्तश विदीर्ण कर कीर्ति पायी थी। 
  इस ताम्रशासन से अनुमान लगता है कि इष्टगणदेव पर किसी मैदानी राजा ने आक्रमण किया होगा क्योंकि पहाड़ों में राजा हाथी पर युद्ध नहीं कर सकते थे।  संभवतया इष्टगणदेव ने मैदानी राजा को घाटी में युद्ध में परास्त किया होगा (१ )
एटकिनसन अनुसार यह प्रतियोगी प्रतिहार नरेश नागभट्ट  का कोई सामंत रहा होगा (२ )।  इष्टगणदेव की राज महिषी का नाम वेग्देवी और  ओकले अनुसार भूदेव शिलालेख में रानी का नाम धरादेवी था। 
 
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संदर्भ :
१ -  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४५३
२- ऐटकिनसन,  हिमालयन डिस्ट्रिक्ट्स जिल्द २ पृष्ठ ४६७
३- ओकले , होली हिमालय पृष्ठ ९८
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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग :  नरेश ललित शूर                

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २५
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -25
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  327                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३२७                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
  कत्यूरी नरेश इष्टगण देव के पुत्र ललित शूर के दो ताम्रपत्र उपलब्ध हुए हैं  (२ ) ।  दोनों ललित शूर के ताम्रशासनों में ललित शूर व ललित शूर के पुरुखों की प्रशंसा हुयी है (२ )।  पहले ताम्रशासन में दूसरे  ताम्रशासन से दो श्लोक अधिक अंकित हैं (३ )।  ललित शूर की उपाधि दोनों ताम्रशासनों में परमभटारक महाराजधिराज परमेश्वर अंकन हुआ है (१ )।
 ललित शूर के ताम्र शासन में  ललित शूर ने अपने को परम महेश्वर परमब्रह्मण्य  घोषित किया है।  ललित शूर के ताम्र शासनों में ललित शूर को शौर्य -वीरातव में ललित शूर की समानता कीर्तिबीज , पृथु व गोपाल से की गयी है (२ )। 
ललित शूर के ताम्रशासनों में पाल वंशजों के अभिलेखों का प्रभाव मिलता है (१ )। 
ललित शूर के ताम्रशाशनों में ललित शूर के वंशज , राजयधिकारी व भूदानों का उल्लेख तो हुआ है किन्तु अन्य ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश नहीं हुआ है (३ ) ।
 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४५३
२- ललित शूर के ताम्रपत्र पृष्ठ  ५ व ६ 
३ शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग  १  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ३७९ 
 
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Bhishma Kukreti

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग   : ललित शूर देव द्वारा मन्दिरों को भूदान 
           

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २६
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -26
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  328                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३२८                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
वसंतन राजयकाल में वैष्णव धर्म का प्रवेश उत्तराखंड में हो चूका था।  जनश्रुति अनुसार शंकराचार्य ने बड़रकाश्रम में नारायण मूर्ति थरपी।  (डबराल ) . ललितशूर की एक रानी ने कार्तिकेयपुर क्षेत्र के गोरुन्नासा गाँव में भगवान नारायण मंदिर की शापना की थी (१ व २ )।  ललित शूर के राज्य में  श्रीपुरुष भट्ट ने गरुड़ आश्रम में  नारायण मंदिर की स्थापना की थी।  ललित शूर ने इन मंदिरों को भूमिदान दी थी (२ ) ।
 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४५४
२-ललित शूर का ताम्र शासन  पृष्ठ २० 
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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  :   ललित शूर का परिवार           

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २७
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -27
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -    329                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३२९                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
 ललितशूर के ताम्रशासनों (२ )  से ज्ञात होता है कि   ललित शूर की दो रानियां थीं।  ललित शूर की एक रानी का नाम लयादेवी था जिससे कुमार भूदेव का जन्म हुआ था। कत्यूरी नरेश   ललित शूर की दूसरी पत्नी का नाम सामा देवी था जिसने गोरुन्नामा  गांव में नारायण मंदिर स्थापित किया था (२ )। सामादेवी को अभिलेख में प्रधान रानी कहा गया है।  सामादेवी की संतति के बारे में कोई उल्लेख अभिलेखों में नहीं मिलता है। 
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संदर्भ :
 १ - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४५४
२- ललित शूर के ताम्र शासन  (शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग१  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ३७५ )       

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २७
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -27
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -    329                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३२९                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
 ललितशूर के ताम्रशासनों (२ )  से ज्ञात होता है कि   ललित शूर की दो रानियां थीं।  ललित शूर की एक रानी का नाम लयादेवी था जिससे कुमार भूदेव का जन्म हुआ था। कत्यूरी नरेश   ललित शूर की दूसरी पत्नी का नाम सामा देवी था जिसने गोरुन्नामा  गांव में नारायण मंदिर स्थापित किया था (२ )। सामादेवी को अभिलेख में प्रधान रानी कहा गया है।  सामादेवी की संतति के बारे में कोई उल्लेख अभिलेखों में नहीं मिलता है। 
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संदर्भ :
 १ - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४५४
२- ललित शूर के ताम्र शासन  (शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग१  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ३७५ )
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हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर

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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  :    ललित शूर देव की राज्यावधि     
     

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २८
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -28
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -     330               
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३३०                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
ललित शूर देव ने  अपने शासन काल के २१ वे व २२ वे वर्ष में दो ताम्रशासन  प्रसारित किये थे।  इंडियन ऐन्टीक्वेरी (१८९६ ) जिल्द २५ पृष्ठ १७८ (स्वाति पब्लिकेशंस इंटरनेट )  के सम्पादक  रिचर्ड कारणक अनुसार प्रथम ताम्र पत्र  २२ दिसंबर ८५३ (संबत ९१० वि ० , उत्तरायण संक्रांति ) का है
तो दूसरा ताम्रशासन २५ सितंबर ८५४  ईशवी  का ही। 
वर्षों के गणत  सही बैठ रहे हैं। 
ताम्रशासनों की गणत अनुसार ललित शूर देव की राज्यावधि ८३२ से व मृत्यु ८५४  तक मानी जाती है।  इसी तरह गणत  से निंबर  व इष्ट गण देव की की राज्यावधि ८०० से ८३२ तक बैठती है (१ )। 
-
संदर्भ :
  १ - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४५५
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  :   नरेश  भूदेव कत्यूरी      
   

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - २९
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -29
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  331                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३३१                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
  नरेश भूदेव  का अभिलेख अब अप्राप्य है किन्तु ऐटकिंसन  (हिमालयन डिस्ट्रिक्ट्स जिल्द २ पृष्ठ ४६७ ) ने शिलालेख का अनुवाद किया है।  भूदेव ने अपने राज्य शासन के चौथे वर्ष में शिलालेख अंकित किया था।
शिलालेख अनुवाद से ज्ञात होता है कि -
   भूदेव कत्यूरी की शरीर आकृति - सुवर्ण वर्ण।  नेत्र नील सरोज सामान व चपल थे। 
   भूदेव कत्यूरी के गुण - सत्य प्रिय , सुंदर , विद्वान् व सदा धर्मानुष्ठान में तत्पर । ब्राह्मण भक्त व बौद्ध शत्रु।  वर्णाश्रम पर कट्टर निष्ठा।
 भूदेव की उपाधि - पराम् भट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर
भूदेव बौद्ध शत्रु था का  कोई प्रमाण  नहीं मिलता क्योंकि सातवीं सदी  तक उत्तराखंड में बौद्ध धर्म लुप्त प्रायः हो चूका था। 
कत्यूरी नरेश भूदेव की मृत्यु ८७६ इ ० मणि जाती है (१ )। भूदेव के उपरान्त इस दुसरे कत्यूरी शाखा का अंत हो गया।   
 
 
-
संदर्भ :
 १-  शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४५५ 
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  : सलोणादित्य  के वंशजों का इतिहास             

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  -
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
सलोणादित्य  के वंशजों में देशट , पद्मट और सुभिक्षराज के ताम्र शासन अभिलेख प्राप्त हुए हैं (१ ) ।    इन तीनों ताम्रशाशनों में नरेशों की कोई स्वतंत्र उपाधि नहीं मिलती है।  पद्मट  के ताम्र शासन में उसे भुजाओं द्वारा राज्य प्राप्ति करने वाला व रिपुओं के चक्र नष्ट करने वाला बताया गया है।  इस ताम्रशासन की इबादत से अनुमान लगता है कि इस शाखा के संस्थापक ने भूदेव को या भूदेव के उत्तराधिकारी से राज्य छीना था।
     जबकि कन्नौज के दुर्बल होने पर  सलोणादित्य  के पुत्र इच्छट  देव को पराम् भट्टारक माहराज धीरज की उपाधि धारण करने का अवसर मिल गया था (१ )। 
-
संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  : सलोणादित्य वंशज की प्रशस्तियां              

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - ३१
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -31

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 333 
                           
हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   ३३३               



                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -

निंबर देव के वंशजों ने अपने पूर्वजों की प्रशस्ति में जिस प्रकार की उपमाएं व शब्दावली प्रयोग की है उससे कईं अधिक बढ़ चढ़कर सलोणादित्य के वंशजों ने अपने पितरों  या सलोणादित्य की प्रशंसा में प्रयोग किया है )१ ) । सलोणादित्य हेतु भगवान चंद्रशेखर के चरण कमलों की रज से पुनीत निर्मित। समस्त कली कलंक से दूर व तपोवदात देह वाला बतलाया गया है।   सलोणादित्य को दान , दम , सत्य , शौर्य , धैर्य , क्षमा के गन वाला व सतयुग के सगर उपमा से द्र्श्य गया है।  इसके अतिरिक्त अन्य उपमाओं का प्रयोग है जैसे - दिलीप , मन्धाता , धुंधसार , ँहगीरथ आदि।  सलोणादित्य को त्रैलोक्य को आनंद देने वाली भगवती नंदा देवी के चरण कमल कमला वरदान से प्राप्त बताया गया है।  सलोणादित्य निखिल भुवनों के प्रकाशक आदित्य सामान बतलाया गया है (२ )।  सलोणादित्य की रानी का नाम महादेवी सिधवलीदेवी था (१ )। सलोणादित्य के राज में किसी विशेष घटना की सूचना अभिलेखों में नहीं मिलती है।
-
संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४५६
२- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग १  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड ३४८
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