Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 30042 times)

Bhishma Kukreti

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                  Non Aryan Kingdoms- Kings of Rigveda in context History of Haridwar ,Bijnor and Saharanpur
           

                                हरिद्वार , बिजनौर और सहारनपुर इतिहास संदर्भ मेंअनार्य नरेश अथवा दास राजा

                                                              History of Haridwar Part  --47 

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -47   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती 


                           किरात दुर्दांत जाति
          ऋग्वेद अध्ययन से कई अनार्य जातियों व् नरेशों का पता चलता है।  इन्हे ऋग्वेद या वैदिक साहित्य में दास नाम दिया गया है।
            ऋग्वेदिक किरात पड़ोसी पहाड़ियों में निवास करती थी और ऋग्वेद में बार बार एक ऐसी महान दास जाति का प्रयोग हुआ है जिसे हराने के लिए आर्यों को इन्द्रादि की आवश्यकता पड़ी थी।  यह महान जाति शक्तिशाली व दुर्जेय थी।
                            ऋग्वेदिक दास नरेश
शंबर - ऋग्वेदिक अनार्य नरेशों में शंबर सबसे अधिक शक्तिशाली नरेश था आर्य नरेश (परुष्णी -विपासा -शुतुद्रि क्षेत्र ) दिवोदास को चालीस वर्षों तक घोर युद्ध करना पड़ा था।  याने शंबर कांगड़ा का नरेश था।
ऋग्वेद में निम्न अनार्य नरेशों या दास राजाओं का विवरण मिलता है -
चुमुरी
धुनि
शुष्ण
बलबूत
पिपरु
कुयव
वृत्र
व्यन्स
रुधिका
नमुचि
कुलितर
भेद
अज
यक्ष
शिग्रु

इलीविष
वर्चिन
इनमे से संभवतया कुलितर व नमुचि शंबर के पूर्वज थे।
भेद ने शंबर की हत्या की थी और दिवोदास के पुत्र सुदास से दो भीषण युद्ध किये थे।


**संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 48

History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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Bhishma Kukreti

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                          Das Bhumi in Rigveidic Period in contaxt Haridwar, Bijnor and Saharanpur History

                                        ऋग्वेदीय समय में दास भूमि विस्तार

                                                        History of Haridwar Part  --48 

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -48   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती 
 
   ऋग्वेद अनुसार वैदिक राजाओं ने कई युद्ध किये और चालीस वर्षों तक अनार्य /दास नरेशों से युद्ध करते रहे।  इसका अर्थ है कि दास भूमि पंजाब के नजदीक , कांगड़ा तक ही सीमित नही रही होगी।  दास भूमि का विस्तार अवश्य ही उत्तराखंड , हिमाचल , सहारनपुर , हरिद्वार , बिजनौर तक फैला था।
  दिवोदास ने दास नरेश शंबर के सौ शिला दुर्गों तथा पुरकुत्स ने सात दुर्ग ध्वस्त किये।  देवदास ने साठ हजार सैनिकों की हत्या की।  वशिष्ठ ने तीन हजार दासों को आहत किया।  तो वामदेव ने पचास हजार कृष्ण रंगी दासों  मारा।
       दास हत्त्या युद्ध में एक लाख वीरों के मरने का उल्लेख मिलता है।  ऋग्वेद में अपार दासों को मरने का उल्लेख है।
इन आंकड़ों से विदित होता है कि दास भूमि सप्तसिंधु से काफी दूर   तक पंहुची थी और शायद सहारनपुर , उत्तराखंड , बिजनौर तक दास भूमि का विस्तार था।

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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 49


History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur
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                                    Prosperity of Anarya or Das in Rigvedic Period in context Haridwar, Bijnor and Saharanpur History

                              हरिद्वार , बिजनौर और सहारनपुर इतिहास संदर्भ में ऋग्वेदकालीन अनार्यों या दास भूमि की समृद्धि

                                                                       History of Haridwar Part  --49 

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -49   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती 

  ऋग्वेद अनुसार उस काल में अनार्य या दास जन समृद्ध थे। आर्यों ने पंजाब की पहाड़ियों के अनार्य नरेशों से उलझना स्वीकार किया किन्तु यमुना पूर्व मैदानी हिस्सों पर आक्रमण नही किया और ऋग्वेद इस विषय में मौन है।  इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि यमुना पूर्व के अनार्य शक्तिशाली थे।
 आर्यों को अपने बढ़ते पशुधन हेतु चारागाहों की आवश्यकता थी।  और पहाड़ों की घास अधिक रसीली थी  /गर्मियों में भी हरी घास की प्रचुरता थी।  अतः आर्यों ने पहाड़ी किरातों याने शंबर के क्षेत्र पर अधिकार किया।
 शंबर के अधिकार क्षेत्र में धन सम्पनता ,, पुष्ट जानवर , अश्व , भेड़ बकरी , आदि की प्रचुरता थी और आर्य इन्हे छीनने के लिए आतुर रहते थे।
पर्वतीय प्रदेशों में खनिज -ताम्र , बहुमूल्य पत्थर , स्फटिक , जड़ी बूटियाँ प्रचुर मात्रा में थीं।
आर्य पर्वतीय प्रदेशों से बहुमूल्य सम्पति छें कर ऋषियों में भी उत्साह से वितरित करते थे। (ऋग्वेद - ६ /४७ /२२ )


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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 50

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                             Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans
                                       आर्यों द्वारा अनार्य  /दास भूमि  अधिकार

                                                                  History of Haridwar Part  --50   

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -50   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   

 किरतादि जन हिमालय की तलहटी स्थित शिवालिक , भाभर तराई भागों में रहते थे।  आर्यों से आने से पहले ही इन लोगों का अधिकार तराई -भाभर -शिवालिक वनों पर था।  पंजाब का  तराई भूभाग गंगा पूर्व के भाभर -तराई से अधिक स्वास्थ्यकर रहा होगा। आर्य लोग तराई -भाभर के चराई क्षेत्र व पहाड़ी क्षेत्रों में पशु चराने  धमकते आ थे।
                                         आर्यों द्वारा दास, बच्चों का स्त्री अपहरण

 आर्य अनार्य लोगों का अपहरण करते रहते थे।  कोल मुंड , द्रविड़ स्त्रियों के मुकाबले किरात व खस स्त्रियां अधिक गोरी  पीली व आकर्षक थीं .
  आर्य दास प्राप्ति हेतु प्रार्थना करते थे।  छीने दास जन को भृत्य या सेवक/सेविका  बनाया जाता था।  सेविकाओं को प्राप्त करना पशु धन प्राप्ति के समान था।  आर्य गोरी दास नारियों को रखैल भी बनाते थे और उनसे उत्पन पुत्रों को ऋषि बनने  में कोई दिक्क्त भी नही होती थी।
कई अवसरवादी किरात दास अपने शत्रु बांधवों के बच्चे व स्त्री आर्यों को सौंप देते थे और ऐसे समय में अपनी दास स्त्रियां अश्त्र -शस्त्र भी चलाने लगे थे।
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 51

Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Bijnor; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Nazibabad Bijnor ; Aryans Capturing Pasture /Grazing  Land of Das/Anaryans  in context History of Saharanpur

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                              Aryan Kings Killing Anaryan /Das Kings and People
                                              अनार्य /दास हन्ता आर्य राजा

                                                       History of Haridwar Part  --50   

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -50   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   

         ऋग्वेद से ज्ञान मिलता है कि जो भी आर्य नरेश दास /अनार्य जनों पर जितना अधिक अत्त्याचार करते थे उनको  आर्य समाज में उतना ही अधिक सम्मान मिलता था।  मनु , नहुष , मान्धाता , कुत्स , पुरूकुत्स , रिजीस्वा , सेपुत्र आदि आर्य राजाओं को अनार्य /दास जनों पर क्रूर अत्याचार से ही सम्मान व प्रसिद्धि मिली।  आर्य लोग अत्याचारी आर्य नरेश को त्रष -दस्यु (दासों को त्रास दाता ) नाम की उपाधि देते थे ।
         गुफा वासी   दास जाति वीर जातियाँ थीं।
         ऋग्वेद में दास विनाश का श्रेय इंद्र , अग्नि आदि देवों को दिया गया है।  याने कि दास वीर साधारण नही थे।
                         महायुद्ध
           अनार्य या दास वीर जातियां थीं और सैकड़ों साल आर्यों  अनार्यों के मध्य युद्ध चलते रहे।  अनार्य युद्ध में पारंगत थे और रणनीति का उपयोग बखूबी करते थे। दासों के पास असंख्य दुर्ग भी थे।  जब भी आर्यों का अधिक दबाब बढ़ता था अनार्य अपने दुर्ग छोड़ पहाड़ों में फ़ैल जाते थे। समय आने पर अनार्य आर्यों से बदला लेने अचानक आक्रमण कर डालते थे।  ऋग्वेद व अन्य वैदिक साहित्य में दासों को मायावी याने गुरिल्ला जैसे सैन्य संचालन वाला बताया गया है।  इन पर्वतीय जनों की सेना में स्त्रियां भी हथियार लेकर युद्ध लड़ती थीं और आर्य इन  स्त्रियों का उपहास उड़ाते थे।  अनार्यों के पास जादुई तागत का उल्लेख वैदिक साहित्य में किया गया है।  दासों व आर्यों के मध्य चलने वाले युद्ध का स्मरण सैकड़ों साल तक जीवित रहा और महाभारत में इन युद्धों का वर्णन हुआ है।

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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 51

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                                                   Anary/Das  King Namuchi

                                                  दास नरेश नमुचि

                                                            History of Haridwar Part  --51   

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -51   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   


    ऋग्वेद में वर्णित दास नरेशों में महावीर नरेश नमुचि का नाम प्रसिद्ध है जिसे लड़ाकू व उपीडक बताया गया है।
नमुचि आर्य नरेश मनु का समकालीन था। मनु की सेना ने नमुचि से पंजाब की पहाड़ियों के नीचे युद्ध किया था।  मनु का सेनापति सयपुत्र नमी रहा होगा। नमुचि ने सयपुत्र नमी पर तब आक्रमण किया जब वह सोया था।  इंद्र ने नमी की रक्षा की।  मनु ने नमुचि की सर फोड़ कर क्रूर हत्त्या की।  सैकड़ों दासों की भी हत्त्या की गयी।  मनु व सेना को धन धान्य प्राप्त हुआ।
मनु को मानव जाति  पिता कहा गया है।
नमुचि दनु के चौबीस पुत्रों में से एक था। था शंबर , अजक  सहोदर था। ऋग्वेद में इंद्र ने नमुचि वध किया था और महाभारत में इंद्र द्वारा छल से नमुचि का वध किया गया बतलाया गया है।  यह घटना सरस्वती और अरुणा के बीच हुआ जहां इंद्र ने मित्रद्रोह का  पाप धोने स्नान किया था।  अतः कहा जा सकता है कि नमुचि प्रदेश सिरमौर हिमाचल की पहाड़ियों के नीचे था।

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                   Anarya or Das Kings  Vishishipra , Vrita in context Haridwar, Bijnor, Saharanpur History

                                हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में वीर अनार्य।/दास राजा


                                                            History of Haridwar Part  --52   

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -52   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   


                                             अनार्य /दास नरेश विशिशिप्र

       ऋग्वेद में दास नरेश विशिशिप्र नरेश का उल्लेख हुआ है।  विशिशिप्र का युद्ध मनु से हुआ था और वीर गति प्राप्त की थी। यह युद्ध चिरकाल तक चला था।  सोमदेव ने दस्युजनो से घिरे मनु की रक्षा की थी। अंत में अग्नि की सहायता से मनु ने दस्यु जनो पर विजय प्राप्ति की थी।  मनु ने फसलों , खेतों ,वनो पर आग लगाते दस्यु विजय प्राप्त की थी।
                                                        वृत्र - दास नरेश

              वृत्र नामक दास नरेश का वर्णन शंबर समान वर्णन ऋग्वेद में हुया है। इंद्र की सहायता से मनु ने वृत्र के 99 दुर्गों का नाश किया था। वृत्र हत्या के बाद मनु को बहुत धन -धान्य मिला।  अनेक गायें , घोड़े , अन्न लुटेरे मनु को मिला। वृत्र की हत्या आर्य नरेश मनु ने शरद ऋतू में की थी।
     वृत्र हत्या बाद इंद्र ने प्रसन्न होकर सोमपान किया था। वृत्र का क्षेत्र हरयाणा के उत्तर में सिरमौर की पहाड़ियों को माना जा सकता है (डा डबराल )

                                       अज्ञात वीर दास नरेश

                    दिवोदास से पहले कई दास नरेशों ने आर्यो आक्रान्ताओं  से लोहा लिया था।  ऋग्वेद में  इन दास नरेशों का नाम नही उल्लेख है किन्तु वीरता का वर्णन अवश्य है। आर्य नरेश पुरुरवा , कुत्स , त्रेतन , बभ्रु , नहुष आदि ने दास नरेशों की हत्या की थी। आर्य संगठित नही थे।  अनार्य या दास लोग गरम मैदानी इलाकों में आने को तैयार नही थे। अतः युद्ध चिरकाल तक चलता रहा।
                                          कुलितर
      पर्वतीय दास या अनार्य नरेशों में कुलितर का उल्लेख तो है किन्तु अधिक वर्णन नही है।  कुलितर काल में आर्य व अनार्यों के मध्य शान्ति रही।  प्रसिद्ध पर्वत, अनार्य  नरेश शंबर कुलितर का पुत्र था।
*संदर्भ - ---
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 53
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                          Anarya or Das King Shambar Pratap (context Haridwar, Bijnor, Saharanpur History)
                                     हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में दास नरेश शम्बर प्रताप


                                                          History of Haridwar Part  --53   

                                                         हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -53   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   

दास नरेश कुलितर का पुत्र शंबर प्रताप प्रतापी राजा था।  ऋग्वेद में शंबर के ऐश्वर्य, पराक्रम , सैनिक संगठन शक्ति , आतंक का वर्णन कई बार आता है। ऋग्वेद में शम्बर नरेश का जिक्र 21 बार किया गया है।
           शंबर वृहतपर्वत याने हिमालय पर्वत नरेश था। ऋग्वेद विवरण विवेचना से विद्वानो ने अनुमान लगाया कि शंबर कांगड़ा , हिमाचलप्रदेश का अधिपति था।
         शंबर के पास सौ अभेद्य पत्थर के दुर्ग थे। शंबर के पास अनेकों खरक (गोठ ) थे जिनमे उसके अश्व , पशु सम्पति रहती थी। स्थायी दुर्गों के अतिरिक्त शंबर के पास जलवायु अनुसार ग्रीष्म व शीतकालीन दुर्ग भी थे।
       आर्य नरेश वध्रयश्व ने अपनी सीमा पश्चिम की ओर सरस्वती की ओर बढ़ा ली थी। सरस्वती की अनुकम्पा से वध्रयश्व दिवोदास नामक पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुआ।
दिवोदास को आजीवन पर्वत नरेश शंबर से 40 वर्षों तक निरंतर युद्ध करना पड़ा था।

                                   शंबर द्वारा पर्वतीय संघ का संगठन
      आर्य नरेश बार बार पर्वतों पर अधिकार जमाने का प्रयत्त्न करते थे और पशु सम्पति आदि लूटा करते थे।  आर्यों के आक्रमण रोकने हेतु शंबर ने पर्वत नरेशों व अधिपतियों का संघ बनाया।  सभी पर्वत राजाओं ने आर्यों को रोकने हेतु संगठित कार्य किया था।
निम्न नरेशों का नाम शंबर मित्र नरेश अथवा शंबर के सेनापतियों का नाम ऋग्वेद में इस प्रकार आये हैं -
परमसहायक -
चुमुरी
धुनि
पिप्रु
शुष्ण
कुयव
वृत्र
सहायक -
अशुष
व्यंस
रुध्रिका
कुछ को शंबर का सेनापति माना जा सकता है परन्तु वर्चिन अवश्य ही शंबर समकालीन अनार्य नृप था जिसके पास अनेक दुर्ग लाख के करीब सेना व पशु सम्पति थी।
             
                                    आर्य संघ
 आर्यों के लिए पश्चिम की ओर बढ़ना /प्रसार मुश्किल था।  पूर्व की ओर हरयाणा , सहारनपुर , हरिद्वार बिजनौर की ओर जाना भी कठिन था।  अतः उन्हें हिमाचल की पहाड़ियों व नजदीकी पहाड़ियों पर अधिकार करना अत्यावश्यक था।  पर्वत नरेश संगठित हो चुके थे तो प्रतिक्रियास्वरूप आर्य नरेशों को भी संगठित होना पड़ा था।
*संदर्भ - ---
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 54

History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur
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                              Wars between Aryas and Anaryas (Das) (History of Vedic Period )


                          हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में आर्यों व अनार्य नरेशों के मध्य युद्ध

                                                          History of Haridwar Part  --54   

                                                         हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -54   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   

                                     आर्य नरेश वध्रयश्व
          पर्वतीय शत्रुओं से भिड़ने के लिए वध्रयश्व  वंशजों ने प्रमुख रूप से भाग लिया था।  अग्नि वध्रयश्व को हमेशा सहायता करती थी।  वध्रयश्व ने अनार्य क्षेत्र के खेतों , वनो , घरों पर आग लगाकर स्वहा करने पर प्रसिद्धि पायी थी।

                                     शक्तिशाली आर्यनरेश दिवोदास
  आर्यराजाओं में दिवोदास सबसे अधिक शक्तिशाली राजा था।  दिवोदास के पुरोहित भारद्वाज जा अन्य कई आर्य नरेशों पर प्रभाव था।  अतः आर्य दिवोदास के साथ संगठित हो पाते थे।  यदि आर्य संघ न बनता तो शंबर से आर्य नही जीत सकते थे।  दिवोदास का साथ कुत्स , श्रुत्र्य , तुरवीत , दभीति , ध्वसंती तथा पुरुषांत जैसे आर्य नरेशों ने दिया था।  अजुर्न पुत्र कुत्स ने अनार्य पर्वतराजा शुष्ण की हत्या की थी। पुरुकुत्स दिवोदास का दाहिना हाथ था।
                               दास  शुष्ण का पराक्रम

शुष्ण शंबर के सहायकों में सबसे पराक्रमी , युद्ध कुशल , कूटनीतिज्ञ था जिसे ऋग्वेद में मायावी कहा गया है।  शुष्ण आर्य कुत्स का प्रतिद्व्न्दी था। शुष्ण के स्थाई व अस्थाई दुर्ग थे।
                                शुष्ण का कुत्स से युद्ध
   शुष्ण व कुत्स के मध्य कई बार युद्ध हुए जो द्योतक है कि शुष्ण व कुत्स के राज्य आस पास सटे थे। एक बार शुष्ण के पंजे में कुत्स फंस गया तो इंद्र ने उसे बचाया था। कुत्स को रणभूमि से भागना पड़ा था। अंत में कुत्स शुष्ण को पकड़ने में आर्य में सफल हो गये । ऋषियों ने इस कार्य हेतु इंद्र की प्रशंशा की।
 शुष्ण को कारागार में डाला गया और इंद्र ने उसके अंडे फोड़ डाले  क्रूरता पूर्वक उसे मार डाला।  शुष्ण के अश्वो -गायों को लूट लिया गया।  इसके बाद शुष्ण के परिवार , रिश्तेदारों और बच्चों पर भयकर अत्त्याचार किये गए।
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 55

Vedic Period & History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Vedic Period &History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Vedic Period &History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Vedic Period &History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;Vedic Period & History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;Vedic Period & History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Vedic Period &History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Vedic Period &History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Vedic Period &History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;Vedic Period &History of Bijnor; Vedic Period &History of Nazibabad Bijnor ; Vedic Period &History of Saharanpur
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              Great Battles  between Aryas and Anaryas (Das) in context Haridwar History , Bijnor History, Saharanpur History


                         हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में आर्य व अनार्यों /दासों के मध्य महायुद्ध
                                                                                            History of Haridwar Part  --55   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -55   
                                                                                                             
                                                              इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   
अनार्य कुयव  - कुयव शुष्ण का प्रमुख सहायक था।  कुयव ने  कुत्स आर्जुनेय को पर्वतीय प्रदेशों में न घुसने हेतु संघर्ष किया। कुयव के दल में सहस्त्रों सैनिक थे व उसकी दोनों पत्नियां युद्ध पारंगत थीं। इंद्र की सहायता से कुत्स ने कुयव की हत्या की।
मायावी असुर पिप्रु - पिप्रु के पास आधा लाख  सैनिक व पार पशु , वन , कृषि सम्पति थी। पिप्रु के पास अपार पशुधन था जिन्हे वह खरक में रखता था और आर्य रिजिश्वा जब उन्हें छीनने आया तो आर्यों व दासों में घोर संघर्ष हुआ। इंद्र की सहायता से पिप्रु हारा और आर्य उसके पशु ले गए।
                इनके अतिरिक्त वंगृद, करंज , पर्णाय भी दास  वीर थे जिन्हे इंद्र की सहायता से ऋजिश्वा आदि ने मारा। 
 भृगय , चुमुरी , धुनि , कचिन आदि दास नायकों को भी संघर्ष में वीरगति प्राप्त हुयी।
                                                    शंबर की हत्त्या

आर्यों व शंबर के मध्य चालीस वर्षों तक युद्ध चलता रहा।  एक एक करके जब शंबर के उपरोक्त सहायक वीरगति को प्राप्त हो गए तो दिवोदास ने शंबर के एक महत्वपूर्ण दुर्ग पर हमला किया।  शंबर अपने पशु धन की रक्षा करते वार्चिन के साथ मारा गया।  उसका सब धन दिवोदास द्वारा लूट लिया गया। लूट की सामग्री में से ऋषियों को भी भेंट दी गयी।

                                            महायुद्ध का परिणाम

शंबर व उसके सहायकों के समाप्ति से आर्य सुरक्षित ही नही हुए वल्कि उन्हें धन धान्य , पशुओं के अतिरिक्त पर्वतीय प्रदेश भी मिल गया और चरागाह भी मिल गए।

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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 56


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