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History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास

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Bhishma Kukreti:
                                   Proto- Australoid Race in Context History of Haridwar -1

                                          कोल , मुंड , शवर जाति और हरिद्वार का इतिहास -1
                                   
                              Racial Elements in Haridwar Population of Prehistoric Period -4
                                              हरिद्वार की नृशस शाखाएं -एक ऐतिहासिक विवेचन -4
 
                                       हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -13   

                                                      History of Haridwar Part  --13 
                             
                           
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
 हट्टन के मुताबिक़ कोल , मुंड , शवर जाति या Proto- Australoid Race मध्य एशिया याने पेलिस्टाइन से पश्चिम भारत में आई और भारत में छा गयी।  भारत में उत्तर प्रस्तर उपकरण संस्कृति विकास -प्रसारण का श्रेय कोल , मुंड , शवर जाति या Proto- Australoid Race दिया जाता है।
 आज भी भारत में कोल मुंड -शवर जाति की तलछट मिलती है। मुंड -कोल भाषा का प्रसार व आज भी कई भाषाओं पर इस भाषा  प्रभाव इस बात का द्योतक है कि कोल -मुंड -शवर जाति का प्रसार अफगानिस्तान से हिन्दचीन , इंडोनेसिया तथा प्रशांत सागर द्वीपों  में हुआ था।

                                        कोल , मुंड , शवर जाति की शारीरिक विशेषतायें
 प्राचीन साहित्य में कोल , मुंड , शवर जाति का नाम मिलता है।  वर्तमान समय में भी मध्य भारत व कुछ क्षेत्रों में दक्षिण भारत जाति मिलती है। द्रविड़ जाति के प्रसार से पहले इस जाति का आगमन व प्रसार हुआ।   कोल , मुंड , शवर जाति की विशेषताओं में घुंघराले बाल , पर्याप्त दाढ़ी -मूछें , कम चौड़ा सिर  , चपटी नाक , जबड़ों में अधिक झुकाव , गहरा कथई रंग , अपेक्षाकृत नाटा कद हैं। कोल , मुंड , शवर जाति के बाल नीग्रिटो की तरह ऊनी नही थे।

                                               कोल , मुंड , शवर जाति का उत्तराखंड में आगमन


                    प्राचीन काल में  कोल , मुंड , शवर जाति का प्रसार सारे भारत में हुआ।  किन्तु द्रविड़ आदि नृशस शाखाओं के दबाब से ये जातियां हिमालय के भीतरी भागों व मध्य भारत  सीमित होती गयीं। यह अनुमान लगाना कठिन है कि कोल , मुंड , शवर जाति ने कब हरिद्वार , सहारनपुर और उत्तराखंड की पहाड़ियों में प्रवेश किया होगा। किरात जाति के प्रादुर्भाव के कारण  व पश्चिम से खस जाति के आगमन के बाद कोल जाति निर्जन , दुर्गम घाटियों की ओर बस्ने लगीं। 
 
 गढ़वाल , भाभर में कोल भाषा के शब्द गांवों के नामों जैसे अमगडी , गडोला आदि , नदियों के नामों जैसे बड़गाड़ , सलटगाड़ आदि , बर्तनों के नामों (फुल्टा) व ने शब्दों जैसे बुगठ्या , लुठ्या , बिराळि , ढालफोल आदि से निर्णय लिया जाता है कि गढ़वाल में कोल जाति बसी थे और आने वाली नस्लों को अपनी भाषा संम्पदा भी दे गयी।
हरिद्वार , बिजनौर और सहारनपुर में ऐतिहासिक दृष्टि से हर पचास साल या सौ साल में उथल -पुथल होते रहे , अतएव इन क्षेत्रों में गाँवों के प्राचीन नाम, स्थानीय भाषा में कोल भाषा के शब्द अक्षुण  नही रख पाये। किन्तु कोल जाति का विकास हरिद्वार , सहारनपुर और बिजनौर क्षेत्रों में वैसा ही हुआ जैसे गढ़वाल -कुमाऊं में हुआ।

                                              कृषि विकास
 कोल , मुंड , शवर जाति द्वारा उत्तर प्रस्तर संस्कृति का विकास हुआ।  इसी जाति ने उत्तर भारत में प्रारम्भिक कृषि की नींव भी डाली।  कुदाल की सहायता से छोटी छोटी क्यारियों में सब्जी आदि उगाना भी कोल , मुंड , शवर जाति  ने शुरू किया।  भारत में कदली , नारिकेल , नीम्बू , जामुन , सेमल को इसी जाति ने अपनाया। कोल , मुंड , शवर जाति ने ही गन्ना उत्पादन सीखा और सीरा , राव , गुड बनाने की विधि ईजाद की। 

                                                 पशु पालन
 कोल , मुंड , शवर जातिने कुछ पशु पक्षियों को पालतू बनाया। इन मनुष्यों ने हठी व घोड़ों को पालतू बनाया।  मधुमखियों और मछलियों को अपनाना भी कोल , मुंड , शवर जाति ने प्रारम्भ किया। कोल , मुंड , शवर जाति ने कई पशुओं को जो नाम दिए थे वे नाम भी अभी तक  हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर के अतिरिक्त अन्य स्थानो में भी चल रहे हैं जैसे कोलभाषा में चमगादड़ को बादड़ कहते हैं और साधारण हिंदी -गढ़वाली में गादड़ खा जाता हैं।  इसी तरह बहुत से पौधों व लताओं का खाद्य रूप में अथवा आर्थिक रूप में उपयोग भी कोल , मुंड , शवर जातिने प्रारम्भ किया।
                                                   उपकरण
 कोल , मुंड , शवर जाति ने झोपडी बनाकर गांवों में बसना शुरू किया और मिटटी , पत्थर , लकड़ी , घास फूस से कई उपकरणों का अन्वेषण भी किया।  धनुष बाण , कुदाल फावड़े आदि का पुरानतम रूप के उपकरणों कोल , मुंड , शवर जाति की देन है।  बाण, लकुट , लगुड , लिंग , लौड़ा शब्द भी शायद कोल , मुंड , शवर जातिकी शब्दावली से आये हैं।
                     
                                       कामयाबी

  कोल , मुंड , शवर जाति ने बीसी /कोडी गिनती की शुरुवात भी की । दिन रात की तिथियों को समझना व अन्य तथ्यों का विवेचन भी इसी जाति ने शुरू किया। पूर्णमासी , अमवस्या , तथा नक्षत्र पुंज हेतु शब्द राका , कुहु , और मातृका जैसे शब्दों की शुरुवात की जो कालांतर में इन शब्दों को संस्कृत भाषा में भी प्रयोग हुआ। 
                                   सामाजिक प्रथाएं
 कोल , मुंड , शवर जाति ऊर्जावान व आनंद हेतु अन्वेषण प्रेमी थे।  विवाह से पहले प्रेम की शुरुवात करने में विश्वास करते थे।  विवाहितों के लिए अलग घर बनाने की प्रथा थी।  प्रथम काल मेंकोल , मुंड , शवर जाति  मृतकों को पशु पक्षियों से नुचवाती थी और फिर अस्थियों को समाधि में दबाती थी ।   मृतक की अस्थियों के साथ कतिपय आवश्यक वस्तुएं रखने का रिवाज था।
   Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 25 /11/2014

History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 14       
 

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

                                                               संदर्भ

१- डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास भाग - 2

Proto- Australoid Race in Context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Laksar, Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; Proto- Australoid Race in Context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Proto- Australoid Race in Context History of Bijnor; Proto- Australoid Race in Context History of Nazibabad , Proto- Australoid Race in Context History of Saharanpur

                                   स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत

Bhishma Kukreti:
                         Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto -Australoid
 
                            वैदिक मंत्र, आयुर्वेद का आधार : कोल -मुंड के मांत्रिक -तांत्रिक विश्वास
                                   Proto- Australoid Race in Context History of Haridwar -2

                                          कोल , मुंड , शवर जाति और हरिद्वार का इतिहास -2
                                   
                              Racial Elements in Haridwar Population of Prehistoric Period -5
                                              हरिद्वार की नृशस शाखाएं -एक ऐतिहासिक विवेचन -5
 
                                       हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -14   

                                                      History of Haridwar Part  --14 
                             
                           
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
 
                                 हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास के परिपेक्ष में आदिमयुगीन  विश्वास


                  अंध विश्वास का नाम मै सही नही ठहराता।  विश्वास जो विज्ञानिक तरीकों से सही नही ठहराए जायँ का अर्थ नही है कि ये विश्वास गलत हैं।  विपदा में मन को स्थिर करने , सकारात्मक सोच लाने याने मनोवैज्ञानिक समाधान इन मंत्रों व तंत्रों का ध्येय है।  वेदों के मंत्रों को सही ठहराना और झाड़ ताड़ को गलत ठहराना नाइंसाफी है।  यह ठीक है कि चिकत्सक की चिकत्सा होनी ही चाहिए किन्तु मानसिक चिकत्सा भी आवश्यक है।
           निर्जन -वनप्रदेशों में विचरित करने वाली कोलजाति अनदेखी प्रकृति विपदा , भूत -प्रेत , भटकती पितर आत्माओं से त्रस्त रहती थी। अनदेखे , अनसुलझे विपदाओं के निवारण हेतु कोलजाति ने कई रोचक कर्मकांडी उपाय अपनाये।
मजूमदार व पुसलकर जैसे इतिहासकार मानते हैं कि अपरिचित से डरना और उसके लिए उपचार करना जैसे घात लगाना , दाग लगाना या घात उतारना /दाग उतारना आदि मांत्रिक /तांत्रिक उपाय कोलजाति की  है।
ग्रामीण हरिद्वार , गढ़वाली -गैर गढ़वाली भाभर , बिजनौर व सहारनपुर में अभी भी नकझाड़ , निछावर जैसी मांत्रिक तांत्रिक विधाओं के जन्मदाता कोलजाति ही थी।
      ऊँची -कम ऊँची शिलाओं , शिखर , नदी , गधेरे , ताल -तल्लयों , व पेड़ों जैसे पीपल , बड़ , नीम , आम , महुआ , बबूल , बेल , गूलर , सेमल , बांस , साल व शिवालिक -हिमालयी पेड़ -पौधों से संबंधित तांत्रिक क्रियाओं, अनिष्ट निवारण , जादू टोना आदि का काल्पनिक संसार कोलजाति  देन है।
वैदिक मंत्रों में जो मनोवैज्ञानिक ढंग से अपने को तैयार करने वाले मंत्र हैं उनकी आधारशिला वास्तव में कोलजाति , मुँड़जाति , शवर जाति ने ही रखा था। आज भी बिजनौर , हरिद्वार में , सहारनपुर में तंत्र -मंत्र जीवित हैं तो यह कहा जा सकता है कि उन विधियों के प्रारम्भिक रूप को कोलजाति युग में हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर में भी प्रयोग होता था।
कोलजाति के परीक्षणों ने कई पेड़ -पौधों और पृथ्वी की मिट्टी से दवाइयाँ बनाई या इन पेड़ -पौधों -मृदिका से उपचार करना सीखा और जो कालांतर में आयुर्वेद  अपनाया व इन उपचारों को विकसित किया।

                           हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास के परिपेक्ष में कोलजाति के धार्मिक विश्वास



कोल , मुंड , शवर जाति द्वारा प्रचलित कई धार्मिक , मनोवैज्ञानिक विश्वास आज भी चले आ रहे हैं और हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर इन धार्मिक विश्वासों से अछूता नही है। हरिद्वार में आज भी पुरानतम शैली में भूत भगाने वाले तांत्रिक कर्मकांड क्रियाओं का संचालन गंगा तट पर देखे जा सकते हैं।
कोल , मुंड , शवर जाति ने धार्मिक पूजन में डमरू थाली से देवता नचवाना , पितरों की आत्मा नचवाना शुरू किया।
नाना प्रकार के नाग , विष्णु के दसावतार (मत्स्य , कछप , बराह , नृसिंघ , गरुड़ ) आदि का आधार कोल , मुंड , शवर जातिकी देन है। गरुड़ , मूषक , बृषभ , स्वान , शेर हाथी आदि की पूजा  आधार भी कोल , मुंड , शवर जाति धार्मिक विश्वास रहे हैं।
पुनर्जन्म की कल्पना  भी कोल , मुंड , शवर जाति ने की।
धार्मिक संस्कारों से आपदा -विपदा उपचार भी कोल , मुंड , शवर जातिकी देन हैं।

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 26  /11/2014

History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 15         
 

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)


Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Laksar, Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Bijnor; Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Nazibabad , Psychology Oriented Faith (Mantra , Tantra ) of Proto –Australoid in context History of Saharanpur

                                   स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत

खीमसिंह रावत:
Bahut achchhi Jankaari ke liye dhanybad

Bhishma Kukreti:
                        Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races
         
                                  हरिद्वार का इतिहास परिपेक्ष में बलि प्रथा

                           Proto- Australoid Race in Context History of Haridwar -3

                                          कोल , मुंड , शवर जाति और हरिद्वार का इतिहास -3
                                   
                              Racial Elements in Haridwar Population of Prehistoric Period -6
                                              हरिद्वार की नृशस शाखाएं -एक ऐतिहासिक विवेचन -6
 
                                       हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -15   

                                                      History of Haridwar Part  --15 
                             
                           
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


कोल , मुंड , शवर जाति अपनी सम्पदा अक्षुण रखने , सम्पदा वृद्धि , वांछित फल प्राप्ति हेतु पशु पर्क्षियों की बलि दिया करते थे। किसी शील  को चिन्हित कर देवी -देवता के लिंग  बनाकर पूजा करते थे। कोल , मुंड , शवर जाति शिला लिंग को बलि वाले पशु के रुधिर से स्नान कराते थे।  देव लिंग अथवा मूर्ति को बलि पशु के खून से अथवा सिंदूर से लाल करने की प्रथा आज भी चली आ रही है।
हरिद्वार  दक्षिण काली मंदिर में जनविरोध  के बाद भी पशु बलि दी जाती है। कालरात्रि की रात चंडी वन में पशु बलि के कई तरह तांत्रिक क्रियाये पूरी की जाती हैं।
 कई धार्मिक कर्मकांडों में गुलाल , सिंदूर , हल्दी का प्रयोग कोल , मुंड , शवर जाति द्वारा शुरू हुए कर्मकांडों के अवशेष हैं।
दैनिक जीवन व पूजा में चावलों का प्रयोग इसी जाती का आविष्कार है।
कोल , मुंड , शवर जाति द्वारा शुरू किये गए कर्मकांड की तरह आज भी मेंढे , बकरे , भैंसे , मुर्गे व अन्य पशुओं की बलि हरिद्वार ,बिजनौर व सहारनपुर में दी जाती है।


Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 27  /11/2014

History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 16         
 

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)


Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Laksar, Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Bijnor; Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context History of Nazibabad , History of Animal Sacrifice by  Proto -Australoid Races in context Saharanpur

                                   स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत




Bhishma Kukreti:

                             Imagination  of   Puran Stories by Proto- Australoid Race in context  History of Haridwar, Bijnor and Saharanpur 

                                हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में पौराणिक कथाओं का जन्म
                               Proto- Australoid Race in Context History of Haridwar -4

                                          कोल , मुंड , शवर जाति और हरिद्वार का इतिहास -4
                                   
                                Racial Elements in Haridwar Population of Prehistoric Period 7
                                  हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर की नृशस शाखाएं -एक ऐतिहासिक विवेचन -7
 
                                       हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -16   

                                                      History of Haridwar Part  --16 
                             
                           
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
            पुराणो में संग्रहित एवं भारत , उत्तराखंड , हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर में आज भी प्रचलित अनेक पुराकथाओं की कल्पनाओं का श्रेय कोल , मुंड , शवर जाति को जाता है। अंड से मनु , ब्रह्माण्ड , सृष्टि का जन्म जैसे सिद्धांत , विष्णु के नवावतार; मत्स्य -गंध , मत्स्य -गंधा स्त्री ; जल , पातळ , नागलोक , नागों को देवलोक समक्ष ले जाने वाली कई कथाओं की कल्पना का श्रेय कोल , मुंड , शवर जाति को ही जाता है (मजूमदार , पुसलकर ).
       कोल , मुंड , शवर जाति ने पेड़ -पौधों , नक्षत्रों , जंतुओं से अपनी जाति  का जन्म व इनका जाति विशेष पर अनुग्रह की भी कल्पना की और ये  कल्पनायें अभी भी लोककथाओं में भारत , उत्तराखंड , हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर में जीवित हैं। 
 महाभारत में कौरवों का जन्म मांस पिंड से होना , रामायण , महाभारत की अन्य कथाएँ , धूमकारी जातक कथाओं की सर्वप्रथम कल्पना कोल , मुंड , शवर जाति ने की थी। रामायण में ककड़ी से सूर्यवंश की कल्पना , भी कोल , मुंड , शवर जाति की ही देन है।
 रामायण की कथा की कल्पना भी कोल , मुंड , शवर जाति ने शुरू की थी।  इसी तरह कृष्ण ,  व्यास , विदुर , अनार्य कोल या द्रविड़ माताओं से जन्म लेने जैसी कथाओं का श्रेय भी कोल , मुंड , शवर जाति को जाता है। 

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 28  /11/2014

History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग 17         
 

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)

  Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Laksar, Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Bijnor; Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context History of Nazibabad , History of Imagination of Puran Stories by Proto- Australoid Race in context Saharanpur

                                   स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत


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