Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 30043 times)

Bhishma Kukreti

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                           Wars between Aryas and Anaryas (Das) (History of Vedic Period )


                          हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में आर्यों व अनार्य नरेशों के मध्य युद्ध

                                                          History of Haridwar Part  --54   

                                                         हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -54   
                                                                                                             
                                                   इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   

                                     आर्य नरेश वध्रयश्व
          पर्वतीय शत्रुओं से भिड़ने के लिए वध्रयश्व  वंशजों ने प्रमुख रूप से भाग लिया था।  अग्नि वध्रयश्व को हमेशा सहायता करती थी।  वध्रयश्व ने अनार्य क्षेत्र के खेतों , वनो , घरों पर आग लगाकर स्वहा करने पर प्रसिद्धि पायी थी।

                                     शक्तिशाली आर्यनरेश दिवोदास
  आर्यराजाओं में दिवोदास सबसे अधिक शक्तिशाली राजा था।  दिवोदास के पुरोहित भारद्वाज जा अन्य कई आर्य नरेशों पर प्रभाव था।  अतः आर्य दिवोदास के साथ संगठित हो पाते थे।  यदि आर्य संघ न बनता तो शंबर से आर्य नही जीत सकते थे।  दिवोदास का साथ कुत्स , श्रुत्र्य , तुरवीत , दभीति , ध्वसंती तथा पुरुषांत जैसे आर्य नरेशों ने दिया था।  अजुर्न पुत्र कुत्स ने अनार्य पर्वतराजा शुष्ण की हत्या की थी। पुरुकुत्स दिवोदास का दाहिना हाथ था।
                               दास  शुष्ण का पराक्रम

शुष्ण शंबर के सहायकों में सबसे पराक्रमी , युद्ध कुशल , कूटनीतिज्ञ था जिसे ऋग्वेद में मायावी कहा गया है।  शुष्ण आर्य कुत्स का प्रतिद्व्न्दी था। शुष्ण के स्थाई व अस्थाई दुर्ग थे।
                                शुष्ण का कुत्स से युद्ध
   शुष्ण व कुत्स के मध्य कई बार युद्ध हुए जो द्योतक है कि शुष्ण व कुत्स के राज्य आस पास सटे थे। एक बार शुष्ण के पंजे में कुत्स फंस गया तो इंद्र ने उसे बचाया था। कुत्स को रणभूमि से भागना पड़ा था। अंत में कुत्स शुष्ण को पकड़ने में आर्य में सफल हो गये । ऋषियों ने इस कार्य हेतु इंद्र की प्रशंशा की।
 शुष्ण को कारागार में डाला गया और इंद्र ने उसके अंडे फोड़ डाले  क्रूरता पूर्वक उसे मार डाला।  शुष्ण के अश्वो -गायों को लूट लिया गया।  इसके बाद शुष्ण के परिवार , रिश्तेदारों और बच्चों पर भयकर अत्त्याचार किये गए।




Bhishma Kukreti

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                                                 Important Das or Anarya Kings in Rigved

                                                        ऋग्वेदीय  पर्वतीय संघ के अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति


                                                                        History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --56     

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -56     
                                                                                                             
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   


                                                      दास नरेश भेदके सहायक
                                             महायुद्ध के बाद भी पर्वतीय संघ समाप्त नही हुआ था।  दिवोदास द्वारा पर्वतीय नरेशों जैसे शंबर , वर्चिन की हत्या के बाद भी पर्वतीय संघ आर्यों से बदला लेने को आतुर रहा था।
पर्वतीय संघ की कमान भेद ने संभाला।  भेद के कई वीर सहायक थे।  उनमे से निम्न मुख्य थे -
अज - शायद यह हिमाचल की एक जाति थी और इसकी पहचान खश  जाति से की जा सकती है।
यक्षु -ऋग्वेद में यक्ष शब्द का प्रयोग पूजा , बलिदान , महोत्स्व के लिए हुआ है।  शायद यह जाति खश जाति की एक शाखा थी।
शिग्रु - वेदकालीन संस्कृत शब्द शिग्रु सहजन वृक्ष के लिए प्रयोग हुआ है।  शिग्रु जनो का जातीय चिन्ह प्रतीक है।  अनुमान है कि वेद कालीन काल में शिग्रु जाति पंजाब , सहारनपुर , हरिद्वार , गढ़वाल हरिद्वार के भाभर -तराई , बिजनौर के  तराई -भाभर तक फैली थी। पृलुस्की के अनुसार यह जाति कोलवंशी थी।
भेद एक अनार्य नरेश था जो वीर , निस्वार्थी था और अपनी पर्वतीय सर्वसत्ता को बचाने का कार्य किया।  इस जाति  फैलाव हिमाचल व उत्तराखंड में था।
                             उत्तर महायुद्ध के आर्य नरेश
सुदास -आर्य नरेश देवदास  पुत्र सुदास था जिसने आर्य राज्य की रक्षा की थी।
                चार दिशाओं से सुदास राज्य पर आक्रमण
      सुदास पर सभी सीमाओं से आक्रमण हुए थे।
तेरह    आर्य राजाओं -तुर्वस , यदु , अनु , द्रह्यु , पुरू , शिम्यु , कवष , मत्स्य , पकथ , भलानस , अलिन , विषाणी , शिव  ने पश्चिम दिशा  से रॉबी नदी को पार कर सुदास के क्षेत्र पर आक्रमण किया।
शत्रु को फंसा देख पर्वतीय नरेश भेद ने पूर्व दिशा से सुदास पर आक्रमण कर दिया।
एक एक कर सुदास ने आक्रमणों को रोका और जीत प्राप्त की।
भेद के चंगुल से सुदास को इंद्र ने बचाया। भेद की पराजय हुई, भेद की हत्या की गयी  और सुदास ने भेद राज्य को लूटा। लूट का हिस्सा ऋषियों को भी दिया गया। और अज , यक्षु ,, शिग्रु जन ने सुदास की आधीनता स्वीकार की।  हिमाचल  हिस्से पर आर्यों का अधिकार हो गया। अन्य आर्य जन सुदास से पिछड़ गए।

*संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 57   
History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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Bhishma Kukreti

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                                                          Characteristics of Anarya or Asura in Rigveda

                                                                    ऋग्वेद कालीन असुर
                                                                        History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --57   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -57   
                                                                               
                               
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती   


   असुर /दास /अनार्य लोगों को कृष्ण वर्ण का कहा गया है। ये असुर /दास /अनार्य हिमालय के ढालों में बसते थे।
१- असुर पर्वत वासी थे जो घुमन्तु किस्म के थे।
२- असुर दुर्गों में रहते थे।
३- दास /असुर या अनार्य सम्पत्तिशाली व मायावी (छापमारी युद्ध कलावंत ) थे।
४-पर्वतीय व पर्वतीय ढालों में रहने वाले अनार्य शिश्न पूजक थे
५- इन्हे दास , असुर , राक्षश , दानव , नाग नाम दिए गएँ हैं
६- ऋग्वेद में इन्हे हराने के लिए आर्यों को देवताओं की आवश्यकता पड़ती थी।
ऋग्वेद में इन जातियों को हीं समझते थे।
७- उत्तराखंड  हिमाचल व निकटवर्ती जगहों के वासी कृषक व पशुचारक थे।
८- पशु स्थाई व अस्थाई खरकों में रखे जाते थे जो हिमालय में अब भी एक संस्कृति है।
९- गाओं के अतिरिक्त शिवालिक पहाड़ियों के ढालों -भाभर /तराई में छोटे नगर भी थे
१०- दास स्वतंत्रता प्रेमी थे।
११- आयुधजीवी थे


** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 58 

Rig- Vedic Asura or Das & History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & Haridwar; Rig- Vedic Asura or Das & History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Bijnor; Rig- Vedic Asura or Das & History of Nazibabad Bijnor ; Rig- Vedic Asura or Das & History of Saharanpur

कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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Bhishma Kukreti

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                                       Devasur War in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur
                                                    हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में देवासुर संग्राम
                                                                        History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --58   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -58   
                                                                                                             
 
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती 

     आर्यों से पर्वतीय असुरों ने कई युद्ध किये और वैदिक काल के सैकड़ों साल तक उनकी वीरता की गाथाएं समाज में गाती जाती रहीं थीं। अतः इनका वर्णन परवर्ती वैदिक साहित्य में आना आश्चर्य नही दिलाता।
                                                               देवासुर संग्राम
 प्रजापति दक्ष का राज्य उत्तराखंड से लेकर मध्य प्रदेश तक फैला था।  दक्ष  राजधानी कनखल (हरिद्वार ) थी।  दक्ष की तेरह  कन्याओं विवाह कश्यप से हुआ था।  इन कन्याओं में से - अदिति , दिति , दनु और खसा से देवता , दैत्य , दानव , यक्ष , रक्ष संतति  हुए।
दानवों में सौ भाई हुए जिनमे हिरण्यक शिपु , हिरण्याक्ष  वृषपर्वा अति वीर हुए है। असुरों  में तेरह महाबली -व्यंश , शल्य आदि हुए। असुर -दानवों की संख्या लाखों -करोड़ों में थी।
देवता दानवो -असुरों -दैत्यों के सौतेले भाई थे। वीरता और समृद्धि में दैत्य बढ़चढ़कर थे कि  के लिए इंद्र को आना पड़ता था और विष्णु को अवतार  पड़ते थे।
देवासुर संग्राम हिमालय में हुआ था। जिसमे देवताओं को कई  कष्ट सहने पड़े थे।
 पराक्रमी व अस्त्र सश्त्रों से सुस्सज्जित थे।
असुरों में निम्न वीरों का पराक्रम प्रसिद्ध हुयें हैं -
नमुचि
शंबर
कुजम्भ
वित्र
वृषपर्वा
असुर पर्वतीय माया के विशषज्ञ थे।  पर धातु से बने थे।
असुरों  चरित्र वास्तव में सभ्य चरित्र वाला था।
महाभारत में गंगाद्वार (हरिद्वार , कनखल , भृगुश्रृंगी -भृगुखाल (हरिद्वार से सटा उदयपुर पट्टी , पौड़ी गढ़वाल ) वर्णन विस्तार से हुआ है।  भेद की पराजय के बाद  हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर व उत्तराखंड में ऋषियों का पदार्पण हुआ और उन्होंने यहां कई आश्रम बनाये थे।
** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 59 


History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur
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Bhishma Kukreti

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                               Uttarakhand including Haridwar, Bijnor, Saharanpur  in Mahabharata and Purana -1

                                          महाभारत व पुराणों में हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर सहित उत्तराखंड का वर्णन -1

                                                                        History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --59   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -59   
                                                                               
                             
 
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती 

  जब तक सिंधु घाटी के अवशेषों का पता नही चला था तब तक यही माना जाता था कि 1500 विक्रम संवत  पूर्व ही आर्यों से भारत में ऐतिहासिक युग प्रारम्भ हुआ।  किन्तु सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष सिद्ध करते हैं कि भारत में 3500 विक्रम संवत पहले आधुनिक सभ्यता आ चुकी थी।
महाभारत , रामायण व ततपश्चात रचे गए पुराणो में पुराणो का वर्णन है।  पुराण का तातपर्य इतिहास व सुनी गयी ऐतिहासिक कथाएँ होता था। वास्तव में जिस प्रकार का प्रयत्त्न वेदों की रचनाओं को सुरक्षित रखने के लिए हुए उतने प्रयत्त्न पुराणो के श्लोकों को सुरक्षित रखने हेतु न हो सका।  महाभारत में एक वर्णन है जिसमे कहा गया है कि वृहस्पति नीति शास्त्र के एक लाख श्लोक समाप्त हो गए हैं याने कि श्रुति संरक्षण विधि में ये श्लोक समाप्त हो गए।
 पौराणिक साहित्य में ऐतिहासिक तथ्य अवश्य हैं।
                                                   महाभारत

महाभारत की घोषणा कहती है कि ऐसी कोई कहानी नही है जो महाभारत म नही है . महाभारत में कुरुक्षेत्र एक महत्वपूर्ण घटना है। यह महायुद्ध शायद 1000 -1400 BC पूर्व हुआ होगा।
महाप्रलय की तिथि 33102  BC आंका जाता है।
आकलन से पौराणिक कालों को निम्न उपवर्गों में बांटा गया है।
प्रलय पूर्व युग - 3120 BC से पहले
प्रलय -मनु युग - 3102 -3000 BC
ययाति युग - 3000 -2750 BC
मान्धाता युग -2750 -2550 BC
परशराम युग -2550 -2350 BC
रामचन्द्र युग - 2350 -1950 BC
श्रीकृष्ण युग -1950 -1400 BC
महाभारत युद्ध - 1400 BC
परीक्षित से नन्द वंश युग -1400 -350 BC

** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर


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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 60

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                                                      Pralaya  Purv Yug  or Pre- Catastrophic Era

                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में प्रलय पूर्व युग

                                                                               History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --60   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -60   
                                                                               
                             
 
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती 


पौराणिक आख्यानों अनुसार सृष्टि प्रारम्भ में अन्धेरा था। फिर एक अंड विशाल पैदा हुआ। अंडे से अविनाशी वीज पैदा हुआ और प्रथम मानव पैदा हुए -प्रजापालक देवगुरु ब्रह्मा।
ब्रह्मा ने गङ्गास्रोत्र के निकट हिरण्यश्रंग पर्वत पर विन्दुसरोवर में यज्ञ किया।  ब्रह्मा ने आनंद व वर्णाश्रम की स्थापना की।
                                           स्वयंभू मनु
मनु भी दैवदत्त अंडे से प्रकट हुए। मनु सरस्वती नदी किनारे विन्दुसरोवर, उत्तराखंड  पर सदा स्थिर रहते हैं (भीष्मपर्व )।

वर्णाश्रम नियम सिथिल पद गए थे और स्वयंभू मनु ने उन्हें पुनर्स्थापित किये  (शान्तिपर्व , महभारत ).
स्वायम्भू मनु की राजधानी सरस्वती तट पर थी
                   स्वरोचिष मनु
 स्वायम्भू मनु की पुत्री आकृति पुत्र का नाम स्वरोचिष मनु था। इसके बाद तीसरे , चौथे , पांचवे मनु हुए।  स्वायम्भू मनु द्वितीय पुत्र उत्तानपाद के तीन पुत्र हुए जिनमे ध्रुव ने विष्णु की तपस्या की।
                                   वेन नरेश
ध्रुव पुत्र प्रचीनगर्भ का नाम चाक्षुष मनु हुआ जिसका जिक्र वेद , महाभारत व पुराणो में हुआ है।
वेन को भयानक शरीर , काला  अत्याचारी बतलाया गया है।
                            हरिद्वार बिजनौर , सहारनपुर पर  वेन अधिकार
वेन का राज्य दक्षिण हिमालय से लेकर उत्तरप्रदेश , बिहार तक था। मायापुर (हरिद्वार ) , बिजनौर , मुरादाबाद , बदायूं , बरेली।  चंपारण रोहतासगढ़ के कई प्राचीन गढ़ों का संंबध राजा वेन से जोड़ा जाता ह.
राजा वेन की राजधानी मायापुर (हरिद्वार ) थी
ऐसा प्रतीत होता है कि वेन कोलबंसी था।  उत्तराखंड , बिजनौर पर कोलवंशी (डोम ) वंशी राजाओं का अधिकार रहा था और बिजनौर व मादीपुर पर सातवीं सदी में शूद्र नरेश का शाशन रहा है।

वेन संभवतया अंतिम अनार्य नरेश था जिसको हराकर या मारकर इस क्षेत्र  आर्यों का अधिकार हुआ होगा।



अगले भाग में वेन पृथु व अन्य मनुओं के बारे में पढ़िए ………

** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर


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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 61

History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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                       History of Flood Disaster in Haridwar and Kankhal and Surrounding Regions

                                                                 हरिद्वार क्षेत्र में बाढ़ का भयंकर प्रकोप

                                                                   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --61   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -61   
                                                                               
                             
 
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती 

                                                                      पृथ्वी का प्रथम सम्राट -- पृथु
 वेन की दाहनी जंघा से उत्पन्न पृथ्वी का प्रथम सम्राट हुआ।  वेन मायापुर याने हरिद्वार क्षेत्र का राजा था। यदि वेन के आख्यानों में सच्चाई है तो पृथु का राज्य उत्तराखंड , हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर व उत्तरप्रदेश के अन्य भाग तक फिला था।

                                                                  गढ़वाल , बिजनौर , सहारनपुर  भाबर की जमीन का समतलीकरण

  पृथु ने भाभर के उबड़ खाबड़ जमीन को कृषि योग्य बनाया।  पशुपालन को बढ़ावा दिया और नगर व गाँवों को बसाया।

                                                                 मायापुर /हरिद्वार का प्रतापी राजा दक्ष

           पृथु की पांचवी पीढ़ी में दक्ष प्रजापति हुआ।  महाभारत व पुराणो में उनकी गाथा का विस्तृत वर्णन मिलता है। दक्ष पिता प्रचेता ने अग्नि द्वारा वृक्षों को जलाकर कृषियोग्य धरती बनाई।  दक्ष से समस्त प्रजायें उत्पन हुईं इसीलिए उन्हें पितामह नाम दिया गया है।
                                         दक्ष की राजधानी कनखल थी।  दक्ष के न्योते से वहां सरस्वती व सरेणु नदी प्रकट हुयी।  क्या इसका मंतव्य यह तो नही कि हरिद्वार से नहरें भी खोदी गयीं थीं ?
        दक्ष से एक सहस्त्र पुत्र पैदा हुए और नारद ज्ञान से वे विरक्त हो गए।  इसके बाद दक्ष ने पचास कन्याएं पैदा कीं।  दक्ष के एक कन्या सती का विवाह शिवजी से हुआ दक्ष ने शिवजी का अपमान किया और तब गणों ने यज्ञ विध्वंस किया।  अंत में दक्ष ने शिवजी की आधीनता स्वीकार की।

                                                              हस्तिनापुर में   बाढ़

       आख्यानों से अंदाज लगता है कि दक्ष राज्य काल में भयंकर बाढ़ आई थी और नजदीकी क्षेत्र के गाँव नगर नष्ट हो गए थे।  जब गंगा जी का जल कम हुआ हो गया तो फिर से गाँव और नगर बसाये गए होंगे। हस्तिनापुर की खुदाई से ज्ञात होता है कि 800 BC पहले उस क्षेत्र में गंगा जी में भयंकर बाढ़ आई थी।  इसका अर्थ है कि हरिद्वार , कनखल , बिजनौर व सहारनपुर के गंगा तटीय क्षेत्रों पर बाढ़ का कुप्रभाव अवश्य पड़ा होगा।
                       
** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 62

History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;History of Bijnor; History of Nazibabad Bijnor ; History of Saharanpur
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                                       History of Post Catastrophe with reference to History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                                            हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में प्रलय और वैवस्वत  मनु

                                                                   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --62   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -62   
                                                                               
                             
 
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
 
 मायापुर नरेश (हरिद्वार नरेश ) दक्ष की पुत्री अदिति से कश्यप का पुत्र विवस्वान पुत्र हुआ।  विवस्वान का पुत्र वैवस्वत मनु हुआ।
वैवस्वत मनु ने प्रलय में मनुष्यों की रक्षा की। वैवस्वत ने बद्रिकाश्रम में एक पैर पर खड़े होकर दोनों हाथ उप्र कर तपस्या की थी। (वनपर्व )।

पौराणिक अध्ययन से निर्णय लिया जाता है कि वैवस्वत मनु महाभारत से 95 पीढ़ी याने 1400 पूर्व पैदा हुए होंगे और इस तरह वैवस्वत मनु का राज्यकाल 3102 BC मना  जाता है। इसी समय उत्तर भारत में उत्तर प्रस्तर उपकरण संस्कृति थी।  और ताम्र संस्कृति की शुरुवात थी।
                                        इक्ष्वाकु वंश
   मनु के दस पुत्रों में से एक इक्ष्वाकु से इक्ष्वाकु वंश का प्रारम्भ हुआ।  भगवान राम इसी वंश में पैदा हुए थे , जैन तीर्थंकरों में से कई तीर्थंकर व गौतम बुद्ध इसी वंश के मने जाते हैं। इक्ष्वाकु वंश का राज्य पूर्वी मध्य देस व अवध माना जाता है।
                                        ऐलवंश या चन्द्र वंश

            इला मनु की पुत्री थी और दोषों के कारण उसे नर के जगह नारी गति प्राप्ति हुई।  वशिष्ठ की कृपा से उसे पुरुषत्व प्राप्त हुआ और उसका नाम सद्युमन पड़ा।  चन्द्र वंश की स्थापना इस तरह हुई।
कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि चन्द्र वंश का राज्य प्रयाग के पास था कुछ हिमालय को चन्द्र वंश का मूल हिमालय मानते हैं। चन्द्र वंश का बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर से अवश्य ही संंबध रहा है।
                                                 पुरुरवा
पुरुरवा का वर्णन ऋग्वेद में है और उसने पहाड़ी राज्यों का बिखंडन किया था किन्तु उसके राज्य में प्रजा संतुष्ट नही थी।

** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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Post Catastrophe with reference to History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 63
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                         Yayati Era / Yug  in context History of Haridwar, Bijnor and Saharanpur

                                  हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में ययाति युग , ययाति काल

                                                 History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --63   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -63   
                                                                               
                             
 
                                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
   नहुष - नहुष पुरुरवा का पौत्र पौत्र था जिसने इंद्र का राज्य प्राप्त किया किन्तु भृगु श्राप से स्वर्ग से गिरा दिया गया।  भृगु का आश्रम हरिद्वार के निकट उदयपुर पट्टी , गढ़वाल में था।  अतः कहा जा सकता है कि नहुष का संबंध हरिद्वार, उत्तराखंड , बिजनौर और सहारनपुर से अवश्य था।  नहुष ने उत्तराखंड में यमुना किनारे यज्ञ किया था (वनपर्व , १२९/३ महाभारत )
ययाति - ययाति एक दिग्विजयी सम्राट था और कहा जाता है कि वह जम्बूद्वीप का सम्राट  था । इससे भी साबित किया जाता है कि ययाति का प्रभाव हरिद्वार , उत्तराखंड , बिजनौर और सहारनपुर पर था।
ययाति ने शर्मिष्ठा व देवाइनी से विवाह किया और उनसे पांच पुत्र हुए - यदु , तुर्वसु , अनु , द्रह्यु तथा पुरू।  ययाति ने अपना राज्य निम्न भागों में सभी पुत्रों को बाँट दिया था।
प्रतिष्ठान में - पुरू के वंशज पौरव
गुजरात काठियावाड़ - यदु वंशज -यादव
रेवा क्षेत्र - तरवसु के वंशज
चंबल से यमुना तक - द्रह्यु वंशज
उत्तरपांचल , उत्तराखंड - अनु वंशज /याने हरिद्वार , बिजनौर और सहारनपुर समेत उत्तराखंड में अनु वशज
कान्यकुब्ज
काशी
अनु के समय चंद्रवंशियों के उपरोक्त सात राज्य हो चुके थे।
इक्ष्वाकु वंशियों का राज्य अयोध्या क्षेत्र में था।
ययाति काल में कई ऋषि हुए उनमे भृगु ने उत्तराखंड में भृगु श्रृंगी  तपस्या की थी।  शायद  भृगुखाल , उदयपुर ,पौड़ी गढ़वाल था। (वनपर्व ९०/२३ )

** संदर्भ - ---
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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 64

Yayati Era in contex tHistory of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar; Yayati Era in context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Yayati Era in context History of Bijnor; Yayati Era in context  History of Nazibabad Bijnor ; Yayati Era in context History of Saharanpur; Yayati Era in context History of Nakur , Saharanpur; Yayati Era in context History of Deoband, Saharanpur; Yayati Era in context  History of Badhsharbaugh , Saharanpur; कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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                                                    Mandhata Era with reference History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur
                                                                  हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में मंधाता युग


                                                                                   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --64   

                                                                    हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -64   


 इक्ष्वाकु वंश में युवनाश्व पुत्र मंधाता एक प्रतापी नरेश हुआ। मंधाता ने कई राजसूय यज्ञ व एक अश्वमेध यज्ञ किया व एक दिन सारी पृथ्वी जीत ली थी।
उसका अधिकार सारे मध्य देश , पूर्वी पंजाब , मध्य भारत था व  कान्यकुब्ज , आनव व हैहव नरेशों को जीता था ।
अतः माना जा सकता है कि मंधाता का अधिकार उत्तराखंड , हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर पर भी था।
मंधाता धार्मिक , दानपरायण व कर्तव्यपरायण नरेश था।
मंधाता के पुत्र कुत्स व पौत्र मुचकुन्द का राज्य दक्षिण में नर्मदा तक फैला था अस्तु  कुत्स व  मुचकुन्द का राज्य अधिकार उत्तराखंड , हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौरपर माना जा सकता है।
कुत्स व  मुचकुन्द काल में चन्द्र वंश की शक्ति क्षीण हुयी थी।
                           उशी नगर
ययाति पुत्र अनु को उत्तरी पांचाल व उत्तराखंड प्रदेश मिला था।
वैदिक साहित्य में उत्तराखंड का नाम उशी नगर , और संभवतया यह प्रदेश यमुना से गंगा व गंगा -यमुना से काली नदी तक था।
कुरु पंचाल के नजदीक उशी नगर था।  मेरठ व रुहेलखण्ड को कुरु -पंचाल माना जाता है।
वैदिक इंडेक्स के संपादकों ने उत्तराखंड को उशी नगर बताया है। कनखल में उशीनगर , विनयपिटक में उशीनगर व महाभारत में उशीनगर व उशीरबीज खा गया है।
उशीनगर नरेश वीर व अस्त्र शस्त्र युक्त थे।
उशीनगर नरेश की मृत्यु पश्चात राज्य उसके पांच पुत्रों में बांटा गया था -
१- शिविराज्य -मुल्तान के आस पास शिवि उशी द्वारा स्थापित
२-यौधेय -मोंटगोमरी व बीकानेर का भाग नृग उशीनर द्वारा स्थापित
३- क्रिमल -कृमि उशीनर द्वारा स्थापित
४-नवरास्ट्र - नव उशीनर द्वारा स्थापित
५-अम्बठ -पूर्वी पंजाब का भाग
६- कुलिंद राज्य - उशीनरेश के बाद सहारनपुर , हरिद्वार , बिजनौर व उत्तराखंड पर किसका राज्य हुआ सूची से स्पष्ट नही होता  है ।
युधिस्टर का पुत्र  यौयेध  था यौयेध व मद्रजनो का पूर्वी भाग कुलिंद राज्य ( सहारनपुर , हरिद्वार , बिजनौर व उत्तराखंड )था । दूसरी ईश्वी में जब मद्रभाग पर कुषाणों का अधिकार हुआ तो कुलिंद नरेश को अपना राज्य बचना कठिन हो गया था और तब यौयेध , कुलिंद और आर्जुनायन नरेशों ने एक संघ बनाया। 



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आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन

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History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 65
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