Author Topic: Honour Of State Movement Heroes - उत्तराखण्ड आन्दोलन के आन्दोलनकारियों का सम्मान  (Read 10781 times)

पंकज सिंह महर

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साथियो,
    आप सभी अवगत है कि उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति के लिये हम लोगों के काफी लम्बा संघर्ष किया है, कई दमन चक्रों, लाठियों, गोलियों और असहनीय अपमान सहने के बाद हमें अपना उत्तराखण्ड राज्य मिल गया। उसके बाद सरकारों ने आन्दोलनकारियों को सम्मानित करने की योजनायें बनाई। क्या वह साकार हो पाई, क्या वास्तविक पात्रों को इसका लाभ दिया गया, किस तरह की सुविधायें और सम्मान इन्हें मिलना चाहिये, इस पर हम इस टोपिक के अन्तर्गत चर्चा करेंगे।

पंकज सिंह महर

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इन आठ सालों में उत्तराखण्ड ने तीन सरकारें और चार मुख्यमंत्री देखे। सभी यह कहते सुने गये कि उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों का सम्मान किया जायेगा। थोड़ी-बहुत मदद हुई भी, चिन्हीकरण की प्रक्रिया भी शुरु हुई, लेकिन क्या आन्दोलनकारी को आर्थिक मदद ही पर्याप्त नहीं है।
     जो बुजुर्ग आन्दोलनकारी थे, उनके आश्रितों को सरकारी नौकरी दी जानी चाहिये। इसके लिये सरकार समूह ग तथा घ में कुछ पद भी आरक्षित करे, जो आन्दोलनकारी अथवा उनके आश्रितों के लिये हो। क्योंकि उत्तराखण्ड आन्दोलन पृथक राज्य के लिये नहीं बेरोजगारी से क्षुब्ध होकर भी लड़ा गया था। आन्दोलन कारियों चिन्हीकरण कर सम्मान देना चाहिये, उनकी मदद से ज्यादा उनका सम्मान होना चाहिये। जो भी चिन्हित आन्दोलनकारी हैं, उन्हें कम से कम उत्तराखण्ड परिवहन निगम की बसों में फ्री पास, सरकारी कार्यालयों में प्रवेश हेतु आजीवन प्रवेश पत्र भी जारी किये जाने चाहिये।
      सरकार चिन्हीकरण के लिये मात्र सरकारी दस्तावेजों को ही आधार मान रही है, जब कि अधिकांश ऎसे भी आन्दोलनकारी हैं, जो न तो कभी पुलिस रिकार्ड में रहे न ही मीडिया में। ऎसे लोगों को भी सम्मान मिलना चाहिये।
       उत्तराखण्ड आन्दोलन किसी दल विशेष का आन्दोलन न होकर एक जनांदोलन था, जिसमें सभी राजनैतिक दलों के लोग, सरकारी कर्मचारी, महिला-पुरुष, बुजुर्ग-बच्चे, सभी आम जन शामिल थे। इसमें सरकार कैसे चिन्हीकरण कर पायेगी? मुझे याद है, KMOU और GMOU की सभी बसों में "उत्तराखण्ड परिवहन" लिख दिया गया था, सरकार ऎसा लिखने वालों का जबरदस्ती चालान काटते थे, क्या इनका चिन्हीकरण कर सम्मान दिया जायेगा?

सरकार ने इसके लिये उत्तराखण्ड आन्दोलनकारी सम्मान परिषद का गठन जरुर किया है, लेकिन उसका output क्या रहा, यह किसी से छिपा नहीं है।

जिस आंदोलन में पूरा प्रदेश और यहां तक कि नेपाली मजदूरों को भी मैने जुलूस निकालकर "आज दो-अभी दो, उत्तराखण्ड राज्य दो" के नारे लगाते हुये देखा है। खटीमा गोलीकांड में एक रिक्शाचालक भी शहीद हो गया था, ऎसी स्थिति में इस मुद्दे को राजनीति का हथियार न बनाया जाय और सम्पूर्ण उत्तराखण्ड का समग्र और समेकित विकास कर इस जनांदोलन का सम्मान किया जाना चाहिये। ईमानदारी के साथ आम उत्तराखण्डी की समस्या और पीड़ा को धरातल पर समझ कर धरातलीय नीतियां बनाकर विकास किया जाय, यही हर आन्दोलनकारी का सर्वोच्च सम्मान होगा।


जय उत्तराखण्ड।

पंकज सिंह महर

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राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरी देने की मांगJul 01, 11:54 pm

सोमेश्वर (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संघर्ष समिति के सदस्यों ने गोष्ठी का आयोजन किया। इस अवसर पर राज्य प्राप्ति आंदोलनकारियों की स्थिति व सरकारों का रवैया विषय पर व्यापक विचार विमर्श किया गया।

गोष्ठी में सोमेश्वर क्षेत्र के 16 आंदोलनकारियों को चिह्नित करने, उन्हे सरकारी नौकरी दिए जाने व स्वरोजगार के लिए कम से कम 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने की मांग की गई। इन मांगों का एक ज्ञापन प्रदेश के संसदीय कार्य एवं पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत व आंदोलन कार्य परिषद अध्यक्ष सुशीला बलूनी को प्रेषित किया गया।

गोष्ठी में उपस्थित राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि क्षेत्र के 16 आंदोलनकारियों ने राज्य प्राप्ति आंदोलन के दौरान जबरदस्त पुलिसिया उत्पीड़न सहा व कई बार जेलों में बंद रहे, लेकिन राज्य गठन के बाद राज्य प्राप्ति आंदोलनकारियों को हासिये में धकेल दिया गया है। राजनैतिक स्वार्थपूर्ति में लिप्त सरकारों ने उनकी मांगों व उनके त्याग की उपेक्षा कर आज तक उनकी कोई सुध नहीं ली

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_4593990/

पंकज सिंह महर

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राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरी देने की मांगJul 01, 11:54 pm

सोमेश्वर (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संघर्ष समिति के सदस्यों ने गोष्ठी का आयोजन किया। इस अवसर पर राज्य प्राप्ति आंदोलनकारियों की स्थिति व सरकारों का रवैया विषय पर व्यापक विचार विमर्श किया गया।

गोष्ठी में सोमेश्वर क्षेत्र के 16 आंदोलनकारियों को चिह्नित करने, उन्हे सरकारी नौकरी दिए जाने व स्वरोजगार के लिए कम से कम 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने की मांग की गई। इन मांगों का एक ज्ञापन प्रदेश के संसदीय कार्य एवं पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत व आंदोलन कार्य परिषद अध्यक्ष सुशीला बलूनी को प्रेषित किया गया।

गोष्ठी में उपस्थित राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि क्षेत्र के 16 आंदोलनकारियों ने राज्य प्राप्ति आंदोलन के दौरान जबरदस्त पुलिसिया उत्पीड़न सहा व कई बार जेलों में बंद रहे, लेकिन राज्य गठन के बाद राज्य प्राप्ति आंदोलनकारियों को हासिये में धकेल दिया गया है। राजनैतिक स्वार्थपूर्ति में लिप्त सरकारों ने उनकी मांगों व उनके त्याग की उपेक्षा कर आज तक उनकी कोई सुध नहीं ली

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आंदोलनकारी की पीड़ा रेल पटरी के नीचे दफन

ऋषिकेश, जागरण कार्यालय : एक ऐसा दंपती जो उत्तराखंड आंदोलन में झंडा लेकर चलता रहा, इस परिवार का हश्र ऐसा होगा, किसी ने सोचा न था। सारी कमाई तीन बेटियों की शादी में लग गई। बेटा बेरोजगार, पत्नी की कैंसर से मौत के बाद टूट चुके प्रेम सिंह रावत ने ट्रेन के आगे कूद जान दे दी। ट्रेन के आगे कूदकर एक व्यक्ति ने आत्महत्या की भले ही यह समाचार अखबारों की सुर्खियां न बना हो, लेकिन 20 अगस्त को वीरभद्र रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या करने वाले 60 वर्षीय राज्य आंदोलनकारी प्रेम सिंह रावत नवोदित राज्य उत्तराखंड की व्यवस्था को तमाचा मार कर चले गए। 35 वर्ष तक आईडीपीएल में सेवा के उपरांत वह राज्य आंदोलन में शामिल हो गए। उनकी पत्नी इमला रावत भी सुनहरे उत्तराखंड के सपने देखते-देखते कुछ वर्ष पूर्व कैंसर की बीमारी के कारण दुनिया से रुखसत हो गईं। अपने जीवन की सेवा के पश्चात रिटायरमेंट के दौरान मिली धनराशि श्री रावत ने अपने तीन पुत्रियों के विवाह पर खर्च कर डाली। अब उनके पास बचा था तो आईडीपीएल का एक अदद भवन, जो कभी भी छिन जाए और उस घर में बैठा बेरोजगार जवान बेटा। आंदोलन में सक्रिय रहे श्री रावत के साथियों का कहना है कि 13 सितंबर 1994 को जब आंदोलनकारी धरनास्थल पर बैठे थे तो अचानक आई पुलिस ने डंडे बरसाना शुरू कर दिए। इसमें श्री रावत गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस उन्हें पकड़ कर देहरादून ले गई, जहां पांच दिन तक वह जिला कारागार में बंद रहे।

पंकज सिंह महर

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राज्य तो मिला लेकिन सम्मान नहीं

शूरवीर भंडारी, मसूरी दो सितंबर 1994, नगर के चारों ओर पसरा सन्नाटा, बच्चों की किलकारियां, बूढ़ों की कराहना, महिलाओं की चीख-पुकार, पुलिस व एसटीएफ के वाहनों के हूटर व शायरन को शोर तथा मालरोड़ पर पीएसी व पुलिस का कड़ा पहरा। कुछ ऐसा ही नजारे के साथ उन दिनों पहाड़ों की रानी संगीनों के साये में थी। 15 सितंबर को मसूरी कूच और टूट गयी मसूरी में पसरी खामोशी, लेकिन नहीं निकला लोगों के दिलोदिमाग में बैठा भय। जिन लोगों ने अपने सामने देखी हो छ: मौतें, पुलिस का नंगा नाच और अधिकारियों का अडियल रवैया। उनमें से शायद ही कोई भूला होगा वो खौफनाक मंजर। दो सितंबर 1994 के उस खौफनाक मंजर की याद आते ही दिल दहल उठता है। उस दिन की टीस आज भी आंदोलनकारियों के मन में है। यह सब कुछ झेलने के बाद बना पृथक उत्तराखंड राज्य। लेकिन आज आंदोलनकारियों के बदौलत सत्तासुख भोग रहे नेताओं को आंदोलनकारियों की याद नहीं है। मसूरी के आंदोलनकारी सम्मान व नौकरी की मांग को लेकर पिछले दो साल से लगातार क्रमिक अनशन पर बैठे हैं। सूबे के कई मुखिया बदल गए, अधिकारी इधर से उधर हो गए, लेकिन आंदोलनकारियों को सम्मान व नौकरी तथा आश्रितों को नौकरी दिलाने वाली दीमक लगी फाइल का कोई सुध लेना वाला नही। यही कहना है आंदोलनकारी मंच के अध्यक्ष देवी प्रसाद गोदियाल का। काबिलेगौर है कि पृथक राज्य का आंदोलन किसी नौकरी व लालच के लिए नही चलाया गया था। यह सम्मान की लड़ाई थी जिसमें मसूरी गोलीकांड व मसूरी की भूमिका मील का पत्थर साबित हुई। एक सितंबर को खटीमा गोलीकांड के खिलाफ आंदोलनकारी शांतपूर्ण जुलूस निकालना चाह रहे थे। आंदोलनकारी मसूरी झूलाघर पर एकत्रित हुए। झूलाघर में पहले से ही पांच आंदोलनकारी क्रमिक अनशन पर बैठे थे, जिन्हें पुलिस रात को उठाकर ले गयी और सुबह-सबेरे 47 आंदोलनकारियों को वाहन में बिठाकर बरेली जेल के लिए रवाना कर दिया। नगर की युवाशक्ति पौड़ी मंडल मुख्यालय पर प्रदर्शन के लिए गयी थी। शहर में बुढ़े आंदोलनकारी व महिलायें ही ज्यादा तादाद में थीं। आंदोलनकारियों को नही पता था कि मुलायम की फौज उनकी टोह में है। सुबह से ही पुलिस ने झूलाघर के आसपास भारी संख्या में अश्रु गैस व अन्य सामग्री रख दी। हाल में दाखिल होते ही पीएसी ने बर्वरतापूर्वक महिला आंदोलनकारियों पर गोलियां चला दीं। मौके पर ही आंदोलनकारी हंसा धनाई व बेलमती चौहान के सिर के चिथड़े उड़ गए और दोनों वहीं ढ़ेर हो गयी। युवा बलवीर सिंह नेगी को एक पुलिस कर्मी ने संगीन घोप कर घायल कर दिया। धनपत, राय सिंह बंगाारी व सुमेरचंद कुमाई पुलिस की गोली से घायल हो अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ गए। नगर में यह सूचना आग की तरह फैल गयी। एक पुलिस उपाधीक्षक उमाकांत त्रिपाठी की भी पुलिस की गोली से मौत हो गई। चंद मिनट में ही सात जिंदगियां तबाह हो गयी। पूरे नगर में हाहाकार मच गया। गोलीकांड की खबर से आला अधिकारी व नेता मसूरी पहुंचने लगे। लेकिन तब तक सब कुछ तबाह हो चुका था। उसके बाद पुलिस व पीएसी ने आंदोलनकारियों के घरों में दबिश व बेवजह यातनायें देनी शुरू कर दी। वयोवृद्ध स्व. कलम सिंह रावत को थाने में बुरी तरह पीटा गया और नगर के चौदह लोगों पर सीबीआई ने पुलिस उपाधीक्षक की हत्या का मुकदमा दर्ज किया। शहर में पंद्रह दिन का कफ्र्यू लगा दिया गया। आंदोलनकारियों व शहीदों की शहादत काम आयी। राज्य तो मिला, लेकिन राज्य के आंदोलनकारी आज भी सम्मान व नौकरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं।   

पंकज सिंह महर

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देहरादून : राज्य के लिए लंबे समय से आंदोलन होते रहे हैं। इनमें शिरकत करने वाले हजारों लोग जेल गए और अभी तक मुकदमे झेल रहे हैं। अब तक राज्य आंदोलनकारियों की श्रेणी में 1994 के बाद के आंदोलनों में शामिल वालों को ही रखा गया है। उक्रांद की मांग पर सीएम ने कहा कि पहले के आंदोलनों का भी परीक्षण कराया जाएगा। उत्तराखंड क्रांति दल के एक प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी से भेंट की। इनका कहना था कि 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल गठित होने के बाद से ही राज्य आंदोलनों की शुरुआत हुई। कांग्रेस शासन ने 1994 से आंदोलनकारियों को चिन्हित किया है। अब उक्रांद की मांग है कि 1994 से पहले के आंदोलनों को भी उसी श्रेणी में रखा जाए बकौल उक्रांद, मुख्यमंत्री इस बात पर सहमत हो गए हैं कि यह मामला आंदोलनकारी कल्याण परिषद के सामने रखा जाएगा। उक्रांद नेता काशी सिंह ऐरी कहते हैं कि अब तक आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण को हुए शासनादेशों में से किसी में भी 1994 या किसी अन्य वर्ष को समय सीमा नहीं बताया गया है। यदि 1994 के बाद उत्तराखंड के प्रताडि़त होने वालों को आंदोलनकारी की श्रेणी में रखकर कुछ लाभ दिए जा रहे हैं तो उससे पहले भी इसी कामन काज के लिए लड़ने वालों को इस श्रेणी में क्यों नहीं रखा जा सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह कुछ लोगों के साथ अन्याय नहीं है। उक्रांद नेता शक्तिशैल कपरवाण बताते हैं कि दल के गठन के बाद राज्य की मांग को लेकर कई आंदोलन हुए। यदि 1979 से 1992 तक के आंदोलनों की बात करें तो कम से कम बारह हजार से अधिक लोग जेल भेजे गए । कई मुकदमे तो सरकार ने वापस ले लिए पर अभी भी दो दर्जन से अधिक विचाराधीन हैं। इन लोगों को भी आंदोलनकारियों की श्रेणी में रखने की उक्रांद की मांग पर सीएम का रुख सकारात्मक लग रहा है।
 

पंकज सिंह महर

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Dehradun (PTI): In a special gesture, the Uttarakhand Government on Thursday announced financial assistance to 46 agitators, against whom the CBI had registered cases during the Statehood movement of 1990s.

Parliamentary Affairs Minister Prakash Pant told the Assembly that the government would release Rs one lakh each to 22 of the 46 agitators who were sent to jail during the movement.

The agency had registered six cases -- three in Mussoorie, two in Tehri and one in Dehradun -- and booked a total of 46 people in 1994.

Under another category, the CBI had filed chargesheet against seven protesters but they were not sent to jail after a court stayed their incarceration. They would be eligible for a grant of Rs 75,000 each.

Pant said another group of 17 agitators, against whom FIR was filed but released after investigation, the government would give Rs 50,000 each to honour their contribution in the movement that led to the creation of a separate State in 2000.

The previous NDA Government had ordered withdrawal of cases against all the Statehood activists.


http://www.hindu.com/thehindu/holnus/004200902261781.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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There has been grievances from State Agitators ever since the State came in existance that they were not given the due recognition.

Govt must honor those who sacrified a lot and specially who scarified their lives, their kids must be given due facilities, compenstation etc.

पंकज सिंह महर

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इसलिये मैंने अब सपने देखने बंद कर दिये हैं।

मुझे याद है जब आरक्षण आन्दोलन की आग दोबारा धधकी और उत्तराखण्ड को २७ % आरक्षण दिये जाने की मांग को लेकर हमारे छात्र आक्रोशित हो रहे थे, उसी समय उत्तराखण्ड के गांधी स्व० श्री इन्द्रमणि बड़ोनी जी पौड़ी में और श्री काशी सिंह ऎरी जी नैनीताल में  पृथक उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर अनशन पर बैठे…धीरे-धीरे यह आन्दोलन अपने चरम पर पहुंच गया और उत्तराखण्ड के हर गांव-गांव से आवाज आने लगी “आज दो, अभी दो, उत्तराखण्ड राज्य दो”। उत्तराखण्ड की जनता का यह स्वतः स्फूर्त आन्दोलन था…हम लोग इस समय इण्टर में पढ़ रहे थे, स्कूल का बस्ता किनारे रखकर हम लोग भी आन्दोलन में कूद पड़े…..हमारे शिक्षक भी अपनी नौकरी दांव पर लगा कर आन्दोलन में शामिल हो गये। गांव की औरतों ने खेती-बाड़ी बंद कर दी, सरकारी कर्मचारी सड़को पर उतर आये…..पूरा उत्तराखण्ड आन्दोलनमय हो गया।
       महिलायें, बच्चे, कर्मचारी और आम जनता, सबकी आंखों में एक ही सपना कि हमारा नया राज्य बनेगा….फिर हमें दूसरे राज्य में नौकरी की तलाश में नहीं जाना पड़ेगा, हमारी अपनी ही सरकार होगी, हर घर को बिजली, पानी और सड़क मिलेगी, हर हाथ को काम मिलेगा, सुनहरे उत्तराखण्ड के भविष्य का सपना लिये ये लोग प्रशासन की भद्दी-भद्दी गाली, डंडे खाकर भी आन्दोलनरत रहे, प्रवासी उत्तराखंडियों ने भी अपने-अपने स्तर पर आन्दोलन किये, इस सपने को देखकर कि जब हमारा अपना राज्य होगा तो हम क्यों दूसरे शहरों में बेगाने रहेंगे?
       प्रशासनिक दमन चक्र भी चलता रहा, लाठी-डंडे के बाद गोली भी खानी पड़ी, कई घरों के चिराग बुझे, कितनों के सिर से मां-बाप का साया उठा और कितनी ही मांगें उजड़ गई….इस दमन के हम लोग यहां तक शिकार हुये कि शांतिपूर्ण आन्दोलन कर रही महिलाओं के साथ बदतमीजी, अभद्रता और अंत में चौराहे (मुजफ्फर नगर कांड) में हमारी मां बहनों के साथ बलात्कार तक किया गया। दमन की सारी सीमायें पार कर दी गईं, ऎसे दमन का उदाहरण तो हिटलर और मुसोलिनी ने भी नहीं दिया कि विरोध कर रही महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया हो।  
     आन्दोलन बदस्तूर जारी रहा…….लम्बे संघर्ष मे बाद ९ नवम्बर, २००० को जब हमारी आंखें खुली तो हमने अपने सपने को बिखरता हुआ महसूस किया, जब हमें उत्तराखण्ड की बजाय उत्तरांचल और गैरसैंण के बदले देहरादून दिया गया।  फिर हमारे सपने रोज ही कुचले जाने लगे…..शराब, खनन माफिया ही हमारे नीति नियंता बनने लगे, बार-बार हमारी ही आंखों के सामने वह हमारे सपने को तोड़ने, धमकाने और कुचलने लगे…और हम लोग विवश होकर अपने सपनों को रोज टूटते और अब दम तोड़ते देखने के आदी होते रहे…..और अब तो हमने सपने देखने ही बंद कर दिये हैं, क्योंकि सपने सच नहीं होते और अगर कोई हमारे सपने को हमारे सामने ही रोज कुचले और हम कुछ न कर पायें तो रोना आता है, धौंकार (आक्रोश…लेकिन कुछ न कर पाने की विवशता) आता है।

हां….! सपना ही था, एक सपना ही था, उत्तराखण्ड राज्य हमारे लिये और हम यह भूल गये कि सपने को कभी पूरे ही नहीं होते हैं, इसलिये मैंने अब सपने देखने बंद कर दिये हैं।  



* ये पीड़ा आज हर आन्दोलनकारी की है।

 

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