Author Topic: Kalu Singh Mahara, First Freedom Fither of Uttarakhand-कालू सिंह महरा  (Read 10757 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

Thousands of people from Uttarakhand participated during Freedom Struggle. Kalu Singh Mahra got s known as the first freedom fighter from Kumaun, then in the United Province.



ABOUT KALU SINGH MAHARA

Kalu Mahara was the leader of the Vishung Patti of Kumaun, Karnakarayat in present. This region is situated near Lohaghat, in district Champawat of Uttarakhand.


He received a cryptic letter from Audh, inviting the Kumauni people and other hill people to join the Rebellion against the British. The government of Awadh proposed that after regaining the power from the British, the hill area will be returned to Kumauni people and the Tarai (plain area) will be taken by Oudh. Kalu Mahara organised the local people against British empire. Skirmishes all across the area of Kali Kumaun, Sui, Gumdesh and the adjoining areas , now in the Champawat district, frustrated the British. His militiamen composed mainly of riflemen Bandukchi ambushed and harassed the British forces on several occasions.

We will share more information about Kalu Singh Mahra.



M S Mehta


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कालू महरा

कालू महरा को उत्तरांचल के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी होने का गौरव प्राप्त है। कालू महरा ने सन् १८५७ में अंग्रेजों के खिलाफ सैन्य संगठन बनाकर विद्रोह किया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ व्यापक आंदोलन चलाया था। उत्तरांचल में विक्टर मोहन जोशी, गोविन्द बल्लभ पंत, हरगोविन्द पंत, कुमाऊॅ केसरी बद्रीदत्त पाण्डेय, अमर शहीद श्री देवसुमन, इद्र सिंह नायक, वीर चन्द्र सिंह गढवाली, बैरिस्टर मुकुन्दीलाल, गढ केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, शान्तिला त्रिवेदी, हर्षदेव ओली, ज्योतिराम काण्डपाल, भागीरथ पाण्डे, सरला बहन, मास्टर रामस्वरुप, राम सिंह धौनी, विचारानन्द सरस्वती, महावीर त्यागी, वीर खडक बहादुर, नरदेव शास्त्री, मोहन लाल शाह, शंकर दत्त डोभाल, वीरेन्द्र सकलानी, खुशीराम, दादा दौलत राम आदि स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के नेता थे। सन् १८५७ के विद्रोह के बाद यहां अंग्रेजों के प्रति विद्रोह फैलता रहा लेकिन धार्मिक एवं सामाजिक रुढवादिता के कारण लोग एकजुट नहीं हो पा रहे थे। इसके लिए स्वाम दयानंद सरस्वती ने राष्ट्रीय चेतना उत्तरांचल से शुरु की थी। गोविन्द बल्लभ पंत और हरगोविन्द पंत ने सन् १९०३ में हैप्पी क्लब के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना फैलाने का कार्य किया। सन् १९०५ में बंगाल विभाजन के विरोध में अल्मोडा के नवयुवकों ने जगह-जगह आंदोलन किये और अंग्रेजों की दमन नीति का विरोध किया था। सन् १९१६ में कुमाऊॅ परिषद की स्थापना की गई। इस अवधि में कुमाऊॅ मण्डल के नैनीताल, अल्मोडा तथा गढवाल जिलों में सरकार की वन नीति और कुली बेगार के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। महात्मा गॉधी सन् १९१६ में अफ्रीका से लौटने के बाद देहरादून आये और अनेकों जगहों पर जनसभायें की। सन् १९२१ में बागेश्वर में सरयू तट पर कुली बेगार प्रथा का खात्मा हो गया। कुली बेगार रजिस्टरों को नदी में फेंक दिया गया। उत्तरांचल में स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पडा। सन् १९०५ में कुमाऊॅ में टम्टा सुधार सभा का गठन किया गया। जिसे बाद में शिल्पकार सभा कहा गया। लाला लाजपत राय का सन् १९१३ में नैनीताल आगमन हुआ और शिल्पकार सभा ने आर्य नाम धारण किया। तब से शिल्पकार लोगों ने जनेऊ धारण करना शुरु किया। इससे पिछडे वर्ग के हौंसले बुलंद हुए और उसके बाद टिहरी रियासत के आंदोलन में भी पिछडों ने बढ-चढकर हिस्सा लिया। २३ अप्रैल १९३० को पेशावर म चन्द्र सिंह गढवाली और अन्य पहाडी फौजियों ने हिन्दुस्तानी मुस्लिम भाइयों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया। ३० मई १९३० को टिहरी रियासत में स्वाई क्षेत्र में वन अधिकारों की लडाई जनता ने लडी तथा इस लडाई में करीब २०० लोग शहीद हो  गए। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा गठित आजाद हिन्द फौज में उत्तरांचल से काफी लोग भर्ती हुए। सन् १९३२ तथा १९३४ के बीच वस्त्रों का बहिष्कार और ऋषिकेश में शराब विरोधी आंदोलन हुए। सन् १९३८ में श्रीनगर-गढवाल में राजनीतिक सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें पण्डित जवाहर लाल नेहरु और विजय लक्ष्मी पण्डित आदि ने भाग लेकर आंदोलन को तेज किया। जागृत गढवाल संघ ने १९३८ में सरकार द्वारा बढाए गए लगान का विरोध किया। सन् १९४०-४१ में कुमाऊॅ कमिश्नरी में सत्याग्रह आंदोलन हुआ, जबकि देहरादून में २३ फरवरी, १९४१ को टिहरी राज्य मण्डल के तत्वावधान में श्रीदेव सुमन ने टिहरी रियासत

(Source- http://atulayabharat.com)

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     1857 का नायक कालू माहरा 
 

 लोहाघाट (चंपावत)। देश  की आजादी की पहली लड़ाई में काली कुमाऊं की अहम भूमिका रही है। यहां से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ उठा विरोध का स्वर भले ही अंजाम तक न पहुंचा हो, लेकिन ब्रिटिश  हुकूमत की चूलें हिलाने देने वाले इस विद्रोह ने पूरी क्रांति नया रंग दे दिया और  इसी क्रांति के चलते काली कुमाऊं के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी जान  देश के लिए न्यौछावर कर दी।
   
काली कुमाऊं में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत  का झंडा कालू सिंह महरा ने बुलंद किया। उन्होंने पहले स्वतंत्रता संग्राम में काली  कुमाऊं के लोगों की मंशा को भी विद्रोह के जरिए जाहिर करावा दिया। हालांकि इसकी कुर्बानी उन्हे स्वयं तो चुकानी ही पड़ी साथ ही उनके दो विश्वस्त मित्र आनंद सिंह  फत्र्याल व विशन सिंह करायत को अंग्रेजों ने लोहाघाट के चांदमारी में गोली से उड़वा  दिया।
    आजादी की पहली लड़ाई में काली कुमाऊं में हुआ गदर आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यहां कालू सिंह महरा के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ हुई  बगावत ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला कर रख दी थी। सिर्फ कालू महरा ही नहीं बल्कि  आनंद सिंह फत्र्याल और बिशन सिंह करायत ने भी अपने प्राणों की आहुति दी। कालू सिंह  महरा का जन्म लोहाघाट के नजदीकी गांव थुआमहरा में 1831 में हुआ। कालू सिंह महरा ने  अपने युवा अवस्था में ही अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया। इसके पीछे  मुख्य कारण रूहेला के नबाव खानबहादुर खान, टिहरी नरेश और अवध नरेश द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के लिए पूर्ण सहयोग सशर्त देने का वायदा था। इसके बाद कालू माहरा ने  चौड़ापित्ता के बोरा, रैघों के बैडवाल, रौलमेल के लडवाल, चकोट के क्वाल, धौनी,  मौनी, करायत, देव, बोरा, फत्र्याल आदि लोगों के साथ बगावत शुरू कर दी और इसकी  जिम्मेदारी सेनापति के रूप में कालू माहरा को दे दी गई। पहला आक्रमण लोहाघाट के  चांदमारी में स्थिति अंग्रेजों की बैरेंकों पर किया गया। आक्रमण से हताहत अंग्रेज  वहां से भाग खड़े हुए और आजादी के दिवानों ने बैरोंकों को आग के हवाले कर दिया।
     पहली सफलता के बाद नैनीताल और अल्मोड़ा से आगे बढ़ रही अंग्रेज सैनिकों को रोकने  के लिए पूरे काली कुमाऊं में जंग-ए-आजादी का अभियान शुरू हुआ। इसके लिए पूर्व  निर्धारित शर्तो के अनुरूप पूरे अभियान को तीनों नवाबों द्वारा सहयोग दिया जा रहा  था। आजादी की सेना बस्तिया की ओर बढ़ी, लेकिन अमोड़ी के नजदीक क्वैराला नदी के तट पर  बसे किरमौली गांव में गुप्त छुपाए गए धन, अस्त्र-शस्त्र को स्थानीय लोगों की  मुखबिरी पर अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया और काली कुमाऊं से शुरू हुआ आजादी  का यह अभियान बस्तिया में टूट गया। परिणाम यह हुआ कि कालू माहरा को जेल में डाल  दिया गया, जबकि उनके नजदीकी सहयोगी आनंद सिंह फत्र्याल एवं बिशन सिंह करायत को  लोहाघाट के चांदमारी में अंग्रेजों ने गोली से उड़ा दिया।

अंग्रेजों का कहर  इसके बाद भी खत्म नहीं हुआ और अस्सी साल बाद 1937 तक काली कुमाऊं से एक भी व्यक्ति  की नियुक्त सेना में नहीं की गई। इतना ही नहीं अंग्रेजों ने यहां के तमाम विकास  कार्य रुकवा दिए और कालू माहरा के घर पर धावा बोलकर उसे आग के हवाले कर दिया। यह  पूरा संघर्ष 150 साल पहले काली कुमाऊं के लोहाघाट क्षेत्र से शुरू हुआ और आज इसी  याद को ताजा करने यहां के लोगों ने अपने अमर शहीदों की माटी को दिल्ली के लिए रवाना  किया।

(Source -http://maharcastehistoryonly.blogspot.com)

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Kalu Mahara received the support of many other leaders of the Champawat region including Anand Singh Phartyal, Bishan Singh Kharayat and many others.They led the anti-British Militia then active in the Kali Kumaun region of Kumaun. The rebellion failed as Delhi and Awadh fell to the British
.


Arrest

Kalu mehra, Anand Singh Phartyal and Bishan Singh Kharayat were arrested at Annakhera. Kalu Mahara was executed along with the others.

 
Legacy


He is still revered as the first freedom fighter in Kumaon and is remembered on the day of his birth by the people of Champawat and Kumaon for his ultimate sacrifice. (wikipeida)

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ROLE OF KALU MAHARA IN 1857, FIRST FIGHT FOR FREEDOM

गदर के समय १८५७ में नवाब वाजिद अली शाह ने श्री कालू महरा को एक गुप्त पत्र भेजा। कालू महरा विसुंग का प्रधान था.... और उसका इलाके पर का असर था। नवाब ने कहा कि अगर उसके लोग गदर में शामिल हो जाएं, तो उसे ढेर सारा धन मिलेगा। कालू महरा ने उस समय बड़ी ज़ोरदार नीति चली। उसने गुप्त मंत्रणा कर आधे लोगों को नवाब की ओर भेज दिया.... और शेष बचे आधे लोगों को अंग्रेज़ों की ओर। ताकि हर स्थिति में उसकी हार ना हो। इस समय फांसी गधेरे का उपयोग गदर में भाग लेने वाले लोगों को फांसी चढ़ाने के लिए होता था। (फांसी गधेरा आज भी नैनीताल में हैं.... तल्लीताल बस स्टैंड से गवर्नर हाउस की ओर जाने वाले रास्ते पर फांसी गधेरा पड़ता है। )

धीरे-धीरे कुंमाऊ में भी अंग्रेज़ी नीतियों का विरोध होने लगा। कुली उतार आंदोलन ने पहाड़ में एक नई चेतना भर दी थी। कुली उतार और कुली बेगार से आज़ादी पाने के लिए जनता जी जान से जुटी थी। मैंने वो दौर देखा है... जब लोग कुली उतार से मुक्ति पाने के लिए आंदोलन कर रहे थे। कुमांऊ के दूसरे शहरों की तुलना में नैनीताल में अग्रेंज़ों की ताकत अधिक थी। फिर भी देशभक्त आज़ादी के मतवाले... मौका पाते ही कुछ ना कुछ कर जाते थे।

और अंतत: सैंतालिस में देश को आज़ादी मिल गयी। मुझे भी लगा... मैं अपने हाथों में आ गया। उस दिन मैं बहुत खुश हुआ था। और धीरे-धीरे कालखंड खिसकते रहे। लेकिन जब पीछे मुड़कर देखता हूं..... तो कभी-कभी मुझे उन अंग्रेज़ों से प्यार होने लगता है...... जिन्हें मैंने कभी अच्छी नज़र से नहीं देखा था। अंग्रेज़ों की अनुशासित नीतियों के प्रति मन में एक आदर की भावना भर जाती है। उन्होने पहाड़ों के लिए जो नीतियां बनाई वो काबिले तारीफ थी। ब्रिटेन से आए अंग्रेजों ने वहां के पहाड़ी शहरों की तर्ज़ पर मुझे बसाने के कायदे कानून बनाए थे। कहां मकान बनने हैं ? कहां सड़कें ? सबके नियम थे। लेकिन आज जब अंग्रेजों के समय से तुलना करता हूं, तो अपने लोगों पर तरस आता है। मेरे अपने मुझ पर अंधाधुंध बोझ बढ़ा रहे हैं। नियम कायदे अभी भी हैं..... पर ले देकर सबकुछ हो रहा है। एक मंज़िल की अनुमति मिलती है, लेकिन सरकारी अफसर को थोड़ा बहुत पैसा खिलाकर दो मंज़िल बनाना मुश्किल नहीं है।



(SOURCE - http://apana-pahar.blogspot.com)

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देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने में उत्तराखंड के शूरवीर भी पीछे नहीं रहे थे। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द सेना में शामिल आठ सौ गढ़वाली सैनिकों ने अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया था।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार नेताजी सुभाषचंद्र की फौज के 23 हजार 266 सैनिकों में लगभग 2500 सैनिक गढ़वाली थे जिनमें से आठ सौ जाँबाज गढ़वाली सैनिक देश की आजादी के लिए लड़ते-लड़ते शहीद हो गए थे। इसी तरह लेफ्टिनेंट ज्ञानसिंह ने 17 मार्च 1945 को अपने 14 जाँबाज साथियों के साथ ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ते हुए देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। इस दौरान भारत छोड़ो आंदोलन में उत्तराखंड के 21 स्वतंत्रता सेनानियों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी।

नेताजी ने कैप्टन बुद्धिसिंह रावत को अपना निजी सहायक और पितृशरण रतूडी को कर्नल और बाद में सुभाष रेजीमेंट की पहली बटालियन का कमांडर नियुक्त किया था। सूबेदार चंद्रसिंह नेगी कर्नल और बाद में सिंगापुर में ऑआफिसर्स ट्रेनिंग स्कूल के कमांडर तथा सूबेदार देवसिंह दानू मेजर बनने के बाद उनकी अंगरक्षक गढ़वाली बटालियन के कमांडर नियुक्त हुए थे।

उत्तराखंड के आजादी के परवानों में देशभक्ति का जज्बा इतना प्रबल था कि चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में पहाड़ी फौजियों ने पेशावर में आजादी के लिए आंदोलन कर रहे लोगों पर गोलियाँ चलाने से इनकार कर दिया था।

सन् 1857 के आजादी के पहले शंखनाद के दौरान भी उत्तराखंड की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। उस दौरान धार्मिक और सामाजिक विसंगतियों के कारण जनता बँटी हुई थी। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने लोगों को एकजुट करने के लिए उत्तराखंड से ही राष्ट्रीय चेतना यात्रा की शुरुआत की थी। कालू महरा को उत्तराखंड का पहला स्वतंत्रता सेनानी होने का गौरव हासिल है। उन्होंने सैन्य संगठन करके अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक आंदोलन चलाया था।

महात्मा गाँधी के नमक आंदोलन में भी उत्तराखंड के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आंदोलन के दौरान महात्मा गाँधी की साबरमती से डांडी तक की यात्रा में उनके साथ जाने वाले 78 सत्याग्रहियों में उत्तराखंड के तीन सत्याग्रही ज्योतिराम कांडपाल,भैरव दत्त जोशी और खड्ग बहादुर भी शामिल थे।

सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उत्तराखंड के 21 स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए तथा हजारों आंदोलनकारी गिरफ्तार किए गए। आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी और दमन के बाद उत्तराखंड में जगह-जगह अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन हुए। खुमाड (सल्ट) में आंदोलनकारियों पर हुई फायरिंग में दो सगे भाई गंगाराम और खीमदेव तथा बहादुर सिंह और चूडामणि शहीद हो गए थे।

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में सल्ट की सक्रिय भागीदारी के कारण इसे 'भारत की दूसरी बारढोली' से गौरवान्वित किया था। (source - webdunia.com)

 

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