Author Topic: Articles by Pankaj Bhatt on various Social movements- by Pankaj Bhatt पंकज भट्ट  (Read 1277 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

We are posting here articles written by Pankaj Bhatt (bhattpankaj7@yahoo.in) on various Social Movements related to Uttarakhand.

जन सरोकारों से जुड़े एक नए आन्दोलन का आगाज़.......

 -पंकज भट्ट

उत्तराखंड के पहाड़ और प्राकृतिक आपदाओं का लम्बा  इतिहास है। पहाड़ों में लगभग हर साल प्राकृतिक आपदा आती है। बादल  फटने, भू-स्खलन जैसी घटनाएं अब आम हो गयी हैं। इन घटनाओं में भारी  मात्रा में संपत्ति नष्ट होती है। कई लोग असमय काल के गाल में समा  जाते हैं। सरकार फौरी तौर पर राहत और बचाव के कार्य करती है। आपदा प्रभावितों को नाममात्र की कुछ मुआवजा राशि वितरित की जाती है और सरकार अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है। पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। इसके विपरीत सरकार और उसके कर्ताधर्ताओं की मानों लाटरी खुल गयी हो। वो आपदा के नाम पर अधिक से अधिक पैकेज हड़पने के लिए जुट जाते हैं। जिस आपदा के नाम पर सरकारी तंत्र बड़े-भारी बज़ट को ठिकाने लगा देता है, उस आपदा में पीड़ित लोग शरणार्थियों सा जीवन जीने को विवश होते हैं।

यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि इतनी आपदाओं के बावजूद  उत्तराखंड में पीड़ितों के विस्थापन व पुनर्वास की कोई ठोस नीति नहीं है  और नहीं कभी किसी भी स्तर पर इसकी जरुरत महसूस की गयी। सरकार  हो या गैर सरकारी संगठन, बौद्धिक जुगाली करने वाले लोगों आदि तक ने  भी इस दिशा में सोचने की कोशिश नहीं की। इसका परिणाम यह रहा कि आपदा पीड़ितों को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होना पड़ता है। जिला  प्रशासन विस्थापन व पुनर्वास के नाम पर संवेदनशील गाँवों की भू-गर्भीय जांच करा कर सरकार को भेज देता है। सरकार उस गाँव को विस्थापित होने वाले गाँवों की सूची में डाल कर ठंडे बस्ते में फेंक देती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आज प्रदेश में इस श्रेणी में लगभग तीन सौ से भी अधिक गाँव हो गए हैं।

By Pankaj Bhatt


M S Mehta


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सरकार ने विस्थापन व पुनर्वास के मुद्दे को कभी गंभीरता से नहीं लिया। राजनैतिक दलों को तो आरोप-प्रत्यारोपों से फुर्सत मिले  तो वे इस बारे में सोचें। पीड़ितों की तरफ से भी कभी अपने विस्थापन व पुनर्वास की मांग ठोस तरीके से नहीं उठी। शायद यही कारण रहा की किसी ने भी इसकी जरुरत नहीं समझी। पीड़ितों का हाल ये है की वो सरकार द्वारा दी गयी मुआवजा राशि को पर्याप्त मान कर संतुष्ट हो जाते हैं। पीड़ितों को लगता है की उन्हें जितनी भी मुआवजा राशी मिली है, वह सरकार की कृपा ही है। पीड़ितों को कभी किसी ने यह नहीं बताया की सरकार जो मुआवजा राशि उन्हें दे रही है, वो सरकार की कृपा नहीं बल्कि  उनका अधिकार है। यह सरकार का कर्तव्य है कि वो अपने नागरिकों की सुरक्षा करे, उनके कल्याण के बारे में सोचे। मगर अब पीड़ितों को यह  अहसास होने लगा है और पीड़ित अपनी लडाई लड़ने को भी तैयार हो रहे हैं।पीड़ित अपने विस्थापन व पुनर्वास की मांग भी उठाने लगे हैं।यह मांग उठी है केदारघाटी के अगस्त्यमुनि कस्बे से । केदार घाटी में हुए जल प्रलय में अगस्त्यमुनि नगर पंचायत के विजयनगर, सिल्ली, गंगानगर, पुराना देवल आदि स्थानों में भारी नुक्सान पहुंचा था।  बड़ी-भारी संख्या में लोग बेघर हो गए, लोगों की सम्पत्ति नष्ट हो गयी, होटल, लॉज आदि बह गए। संपन्नता की श्रेणी में आने वाले लोग एक ही रात में सड़क-छाप हो गए। लोगों को समझ नहीं आ रहा था की यह क्या हो गया? कई लोग बदहवाशी की स्थिति में थे।



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कल्पना की जा सकती है की लोगों के जीवन भर की जमा-पूँजी एक झटके में पानी में समा जाए तो उनकी क्या हालत होगी? मगर इस स्थिति के बावजूद कुछ पीड़ित युवाओं ने हालात से निबटने की सोची और लोगों का मनोबल बढाने की कोशिशें की। उन्होंने पीड़ितों को इकट्ठा करना शुरू किया। निराशा छोड़ कर संगठित होने की मुहीम छेड़ी। यह सूत्र वाक्य दिया की जो हो गया, सो हो गया- अब आगे की सोचो। कुछ ही दिनों में इस मुहिम ने रंग लाना शुरू कर दिया। पीड़ितों ने एकजुट होना शुरू किया


और अपने हक के लिए लड़ने का ऐलान किया। अलग-अलग राजनैतिक दलों के लोग शायद ही कभी किसी मंच पर एक साथ और एक जुबान में
बोलते हुए दिखलाई पड़ते हैं। मगर इस लड़ाई के लिए राजनैतिक निष्ठाओं को ताक पर रख दिया गया। भाजपा, कांग्रेस, उक्रांद जैसी किसी की कोई पहचान नहीं है। पहचान आपदा पीड़ित के रूप में ही दिखती है। पीड़ितों ने अपनी इस लडाई को लड़ने के लिए केदारघाटी

विस्थापन व पुनर्वास संघर्ष समिति (केवीपीएस-2) का गठन किया। संगठन ने पीड़ितों के मुआवजा वितरण से लेकर उनके पुनर्वास व विस्थापन तक के मुद्दे को अपने एजेंडें में शामिल किया। पहली बार आपदा पीड़ितों के विस्थापन व पुनर्वास की मांग को लेकर आंदोलनात्मक कार्यक्रम हो रहे हैं। संगठन आपदा पीड़ितों के विस्थापन व पुनर्वास को पीड़ितों का अधिकार मानते हुए सरकार पर कई स्तरों से दबाब बनाने की कोशिशों में जुटी हुयी है।

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केवीपीएस-2 ने पीड़ितों को ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों को भी यह समझाने की कोशिश की कि यह लड़ाई केवल आपदा पीड़ितों की लड़ाई नहीं है। यह पहाड़ के भविष्य की लड़ाई है। आपदा का क्रम हर साल का है। आज यहाँ तो कल वहां। इसलिए लोगों को एकजुट होकर यह लड़ाई लड़ने की जरुरत है। संगठन की अपील का असर भी दिखाई पड़ा। लोग एकजुट होने लगे हैं और सरकार द्वारा विस्थापन व पुनर्वास किये जाने को अपना अधिकार समझने लगे हैं। संगठन ने विस्थापन व पुनर्वास की मांग उठाई तो सरकार ने पीड़ितों को प्री-फेब्रिकेटेड घर बना कर देने की घोषणा की। मगर पीड़ितों ने इसका विरोध किया और सरकार की नियत पर कई सवाल खड़े किये। संगठन ने प्री-फेब्रिकेटेड घरों की बजाय पीड़ितों को आर्थिक पैकेज देने की मांग उठाई। शुरुवात में ना-नुकुर के बाद सरकार रेडिमेड घर के बजाय पांच लाख रूपये के आर्थिक पैकेज के मुद्दे पर राजी हो गयी। पर पीड़ित इससे संतुष्ट नहीं हैं। उनकी मांग है की सरकार आर्थिक पैकेज को और अधिक करे।

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संगठन प्रदेश में विस्थापन व पुनर्वास की एक ठोस नीति बनाने को लेकर लगातार संघर्षरत है। संगठन ने इसके लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी छेड़ा। इस अभियान को व्यापक जन समर्थन भी मिला। प्रदेश में कांग्रेस की ही सरकार होने के बावजूद संगठन द्वारा चलाये जा रहे अभियान में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने भी अपने हस्ताक्षर किये। संगठन के अध्यक्ष अजेन्द्र अजय कहते हैं की शुरुवात में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पीड़ितों का मनोबल बनाने की थी, जिसमे उन्हें बहुत हद तक सफलता मिली है। वे मानते हैं की अभी लड़ाई लम्बी है। उनका कहना है की अब समय आ गया है की सरकार जल्द-से-जल्द विस्थापन व पुनर्वास की ठोस नीति घोषित करे। सरकार उनकी इस मांग को अब नज़रंदाज़ नहीं कर सकती है। संगठन ने केदारघाटी में आयी आपदा के सौ दिन पूरे होने पर रुद्रप्रयाग में पीड़ितों की पंचायत भी बुलाई थी। पंचायत में बड़ी संख्या में दूर-दराज के क्षेत्रों के पीड़ितों ने भी भाग लिया। इससे भी संगठन के पदाधिकारी उत्साहित हैं।

केवीपीएस-२ के आन्दोलन को हतोत्साहित करने वालों की भी कमी नहीं है। कई लोग मानते हैं की सालों गुज़र गए, किन्तु अभी तक कई गाँवों के विस्थापन व पुनर्वास की मांग ठंडे बस्ते में पड़ी हुयी है। ऐसे में संगठन द्वारा की जा रही कार्रवाही कितनी कारगर होगी? मगर  संगठन ऐसे सवालों से बेफिक्र होकर अपने अभियान में जुटा है और उसे धीरे-धीरे विभिन्न सामाजिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविद्दों का समर्थन भी हासिल हो रहा है। बहरहाल, संगठन को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कितनी सफलता मिलती है, यह भविष्य के गर्भ में है। पर संगठन ने एक ऐसे मुद्दे को उठाया है, जो बहुत पहले ही  इस आपदाग्रस्त राज्य की नीति में शामिल होना चाहिए था।

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