Author Topic: Bal Krishana Dhyani's Poem on Uttarakhand-कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी  (Read 30693 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
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अद बाटा मि

अद बाटा मि कन की अड़े गयुं
झट गौं घार गढ़वाल छोड़ी सुरुक अटकी गयुं

अब नि लगदु जियू मेरु यख
कया करना व्हाला ऊ म्यारा बिगेर वख

कन धोँ मची छन ये जीकोडी की गेड मा
झट सियुं की चट उठी ग्युं जनि कै डैरा मा

औंद औंद बुल्दा रों ऊ फुँद फुँद जाँदा रै
अद रति देकी टूटी ये स्पुनिया आच मि धैय लग्ना छिन

ये बोई ये बाबा जी मेरा आप आच याद आना छिन
मि थे थे किले ये भास ऐ ऐकी किले इनि झुराणा छिन

स्वास भोरी गे नब्ज जामी गे
आँखों का धारा छूटी की आच मि रुलेगे

खोयुं छों बस ऊँकी खुद मा
म्यार गों गोठ्यार म्यारा मुल्की की बाटा मा

अब बी
अद बाटा मि … ध्यानी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hours ago
ते दगडी प्रीत जुडी गे

ते दगडी प्रीत जुडी गे
ये सरला
मैत छुडि की
तू झट सौरस दौड़ी ये

बोल्यूं मान मेरु
ये मेरी बिमला
चल दोईयां जोंला
वे छला खाणा कु तिमला

कन चम चमकी
ये मेर बिन्दुली
चरखी मा ना बैठा
ना मार इन गिर गिरकी

जाता जाता तू
ये सुनीता
सुणा जा मेर
बौल्या बंण ने की कथा

मेरा पहाड़ की
ये पहाड़ बांदा
देखा दे तेर
झुमकी नरखी नखरा

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
May 24
काफल पाको,मिल नी चाखो’

दीदा काफल पाको पाड़ा
भुल्हा क्ख्क चाखो मिल नी छों ये पाड़ा

चकुला बनी उडी जौं
फिरदा रोलूं अपरू ये पाड़ा

काफल खै खै की भुल्हा बत्लू
काफल डला मा काफल पाकी की नि

दीदा काफल पाको पाड़ा
भुल्हा क्ख्क चाखो मिल नी छों ये पाड़ा

इन लमडी विं डला भ्तेक
ते दगडी अब छों भैर देश बहारा

काफल चखी काफल पाकी
दोईयं भैं दगडी वे गै अपरी

ऊ भी बिना चखी उड़ दा रैगे
हम भी अपरा पाड़ों से दूर चलेगे

दीदा काफल पाको पाड़ा
भुल्हा क्ख्क चाखो मिल नी छों ये पाड़ा

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
21 hours ago
इन हुन्दी जिकोड़ी मेरी

इन हुन्दी जिकोड़ी मेरी
जनि मेर पाड़ा ये मेरा हिमाला
जनि बगनि बोई यख गंगा की धारा
ये मेरु कुमौ -गढ़वाल

इन हुन्दी जिकोड़ी मेरी ...............जिकोड़ी मेरी

बुरांस जनि लाल रंग रंगी मेरु देब्तों कु माथा
जनि मेरु कुल देबता नरंकार
फ्योंली का पिंगला रंग जनि पसरी यख
हमरु रीती रिवाज हमरु गौं घारा

इन हुन्दी जिकोड़ी मेरी ...............जिकोड़ी मेरी

ना हुंदु बड़ो कबि ना अंदि ये अकल दाडा
ना छूट द गढ़देश मेरु ना मेरु पुंगड़ू ना ये डंडा कांठा
चकुलु जनि नि बैठ दूँ रान्यूं ये डाला वे छाला
बाल मन जनि जीयु हुँदु मेरु हे मेरा माया देशा

इन हुन्दी जिकोड़ी मेरी ...............जिकोड़ी मेरी

बिछो कु दुःख क्या हूंद सुण रे मेरु उकाला
दणमण नि रुन्दा ये आंसूं कू रेन्दु मेरु पासा
हेर दी ना वा फेर दी दाणी हाती मलस दी ये माथा
इनि नि भाग मेरु बल कया लिक ये मा बिधाता

इन हुन्दी जिकोड़ी मेरी
जनि मेर पाड़ा ये मेरा हिमाला
जनि बगनि बोई यख गंगा की धारा
ये मेरु कुमौ -गढ़वाल

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
July 3
यख उमरी गुजरी गैनी

काफल टिप दि टिप दि ,बेडू खांदा खांदा
छोलों का पाणी पि दा पि दा
यख उमरी गुजरी गैनी

जीकोडी तिस बूझैंदी मिटेंदी
दोई खुटी दगडी हिट दा हिट दा
यख उमरी गुजरी गैनी

हात ना कूच बी रैई
रैगी ऊ सदनी की दोई भैना,खैरी-पीड़ा दगड़ी
यख उमरी गुजरी गैनी

इन ऐई सर चली गैनी
यूँ उकलू मिसळी गैनी , ईं गदनी बोगी गैई
यख उमरी गुजरी गैनी

अपरी मा लगी फसी रैई
झट सै गैई सिन्कोली जागी गैई
यख उमरी गुजरी गैनी

काफल टिप दि टिप दि ,बेडू खांदा खांदा
छोलों का पाणी पि दा पि दा
यख उमरी गुजरी गैनी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
June 28
ते थे फिर लेलु अंग्वाल

यख बी पड़ी बन्द
वख पड़ी गे बन्द बेटा राम
कया करलू अब

उकालू बाटा हर्ची
उन्दरु बाटो ना चली तेर मर्जी बेटा राम
कया करलू अब

आलू प्याज दाम अब रुळांण लग्गे
पाड़ा खुद अब ते आंण लग्गे बेटा राम
कया करलू अब

किले छोड़ी जाणा
अपरा गढ़ देश आपरी पछाणा बेटा राम
ऐजा दौड़ी ते थे फिर लेलु अंग्वाल

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
June 27
ते थे फिर लेलु अंग्वाल

यख बी पड़ी बन्द
वख पड़ी गे बन्द बेटा राम
कया करलू अब

उकालू बाटा हर्ची
उन्दरु बाटो ना चली तेर मर्जी बेटा राम
कया करलू अब

आलू प्याज दाम अब रुळांण लग्गे
पाड़ा खुद अब ते आंण लग्गे बेटा राम
कया करलू अब

किले छोड़ी जाणा
अपरा गढ़ देश आपरी पछाणा बेटा राम
ऐजा दौड़ी ते थे फिर लेलु अंग्वाल

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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
और बस

आडंबर है मचा हुआ
अपने से वो लगा हुआ
असत्य कथनी जग जाहिर है
अकरण ही तू उस में उलझा हुआ
और बस

कितना और तू उलझेगा
कितना तू सुलझना चाहेगा
कितना तेरे पास रह जायेगा
कितना तेरे साथ आयेगा
और बस

खुद ही अब सोच ले
खुद ही अपने पग आगे बड़ा
खुद ही में जब तू खो जायेगा
खुद ही तू उसे जान जायेगा
और बस

एक बिंदु है वो
एक अखंड सत्य है वो
एक से तू जब एकाकार हो जायेगा
एक में तू उसे बस पायेगा
और बस

आडंबर है मचा हुआ
अपने से वो लगा हुआ
असत्य कथनी जग जाहिर है
अकरण ही तू उस में उलझा हुआ
और बस !!और बस !!और बस !!

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 6 · Edited
कुछ भी नही है

दो दिन दिन हैं दो दिन रातें
कुछ भी नही है
हाथों में हमारे तुम्हरे
आज से अब से ये दिल मेरा
कहने लगा है
और सुनने लगा है

बिन तेरे कुछ वो बातें
बीती वो अपनी सारी मुलकातें
जब से तुम याद आने लगे
एक पल जब तुम मुझ से दूर जाने लगे हो

सुनो ना यूँ दूर जाने वालों
क्या ये सितम है

दो दिन दिन हैं दो दिन रातें
कुछ भी नही है
हाथों में हमारे तुम्हरे

देखों मै सपने तेरे
सपने में तुम हो के मेरे
दिन रातों से आकर कहने लगे हो
हरपल मुझे तुम अब छेड़ने लगे हो

सुनो ना प्रियतम प्यारे
चलें हम तुम्हरे नक्शे कदम के सहारे

दो दिन दिन हैं दो दिन रातें
कुछ भी नही है
हाथों में हमारे तुम्हरे
आज से अब से ये दिल मेरा
कहने लगा है
और सुनने लगा है

दो दिन दिन हैं दो दिन रातें
कुछ भी नही है

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
July 4
कुछ नही चाहिये मुझको

कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही हाँ कुछ नही
जो मिल गयी
जो मिल गयी माँ के हाथों की बनी दो रोटियाँ
मुझे जन्नत मिल गयी अब क्या चाहिये मुझको
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

बचपन की वो लोरियाँ दूध भात की कटोरियाँ
सारे दिन थक कर भी माँ सुनाती थी कहानीयां
और क्या चाहिये था मुझको और क्या
दो मीठे बोल दो माँ की वो प्यारे हाथों की थपकियाँ
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

बचपन छूटा लड़कपन छूटा
जवानी अपने ही रंग घर गृहस्थी संग बिता
अब भी याद आती हो तुम मेरा साथ दे जाती हो तुम
माँ उस कोने में जब उदास बन झूठा झूठा मै जब रूठा
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही हाँ कुछ नही
जो मिल गयी
जो मिल गयी माँ के हाथों की बनी दो रोटियाँ
मुझे जन्नत मिल गयी अब क्या चाहिये मुझको
कुछ नही चाहिये मुझको कुछ नही
जो मिल गयी

एक उत्तराखंडी

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