Author Topic: Exclusive Garhwali Language Stories -विशिष्ठ गढ़वाली कथाये!  (Read 34548 times)

Bhishma Kukreti

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  फट्यांणु
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Garhwali Fiction by Famous Satirist Sunil Thaplyal Ghanjir
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  वेकी आंखि उकाल ,उंदार , पौन पंछी , हैल पुंगड़ि , थ्वरड़ि बछुरी , भ्याल भौंकारू मा हि खुलिन । गंडेल सटगिग्या नौ छौ वेकु । उमर ई रै ह्वेली तेरा चौदा बरस । भस्स वूं पोड़ु , खिन्ना , सुरैं , पैंया ,किनगोड़ि हिंसर कांडों तैं हि सरी दुन्या मनदु छौ वो  ।

   कि एक दिन सुबादार साब गौं मा ऐनि । उंकू ब्वलंणु बच्यांणु , खांणु पैनणु व गिच्ची कु एक्सप्रैशन गौं मा सबसे अलग किस्मो व ध्यानार्कषण कु केंद्र छौ । गंडेल बिचरू त् अधा मनिख अधा जनावर हि छौ उबरि ।
   जै दिन सुबादार साबै वापिसी छै वे दिन उंल  गंडेल सटिगग्या का भरसक बरोबर थौला वेका कांधि मा धरी अर एक मील दूर मोटर सड़की तक वे थै बि ल्ही गेनी ... बल मी थै फट्यांणौ आ रै ... कौन से तिन यख दलीप कुमारो पार्ट ख्यलंणै । दलीप कुमारो नौ पैली दौ सूंणि छौ गंडेल न् । झंणि क्या च् धौं वो दलेप कुमार ... वेन अपंणा काचा मन का लाटा माखा उडैन।

    जेमू बसै फ्रंट सीट कब्जांण से पैली सुबादार बोडा वेका हत मा वोजनदार एक रूप्यो गिलट धैर ग्या ... बल गंडेला क्याला खै ले हो ।
  गिलट की गरमैश वे पाड़ि बांदर थै साफ मैसूस हूंणि छै ... खुटा असमान पौंछि गेन वेका । कीसा बि नि छयो वेकी कड़कड़ी मैलदार झुल्लीयूं मा । गंवा बड़ा नौनौ का डौरल वो सारी बाटा घौर कब पौंछि गे, वे तै पतै नि चलो । आजतलक त् फूला का पांच अर दस पैंसा हलका सिक्का हि लगदा छया वेका हत  कबि कबार ... वो बि देवी मंदिरू  मा भैर छिटग्यां ।
  आज गिलट कु वजन वेका स्वींणौं  कु वोजन बढांणु छौ । वेका शांत अबोध मन मा एक तूफान रिंगण बै ग्या । अब दिन रात गंडेल एक ही बात स्वचदु छौ कि इनमेसी का गिलट रूप्या कौं डाल्यूं मा लगदा होला ।

अर फिर एक दिन गंडेल सटिगग्या वीं हि जेमू बस मा कुचे क् पाड़ बटि सटिग ग्या जिद्दमारि क् जैमा सुबादार साब अलोप ह्वे छया द्वी बरस पैली ।

  आज एक दशक बाद वे थै वीं डालि को एड्रेस त् मीलि ग्या ज्यां फर गिलट लगदिन पर ... वेकी गंवै धार नी छ् वे मा । गौं हर्च्यूं छ् वेकू ... अब वो छक्वे वीं घड़ी तै गाली दींणु रांद जैं घड़ी मा सुबादार साब गौं मा आया छया अर वेका कुंगला हतुमा वजनदार एक रूप्या धैर गे छया ।

!!!

सुनील थपल्याल घंजीर
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Presented by - B.C.Kukreti


Bhishma Kukreti

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लावरि साँड
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Garhwali Fiction , Garhwali Story by Mahesha Nand
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यो च वु साँड जैन झगड़ि भै कि खांणि-सींणि हराम करीं छै। येकि ब्वेन् द्वी बोड़ु हौर जांणि (पैदा किए) छा पंण वु जांदा रैन। वून दूधा बान अपड़ि ज्यान ख्वा। झगड़ी सैंण रैजा गौड़ौ दूध बजारम् बिच्द। वींकS नौना दूधै ठ्यक्कि (छोटी बाल्टी) द्येखि टरकंणि कर्दा। पंणि वूं दूधै एक पोळि त फुंड फूका, पींसु तका नि मीलि चखंणु। ज्व मौ नौनौं थैं टरकै सकद, वूं खुंण गौड़ा बोड़्वी गौळि टरकांण कतगा सौंगि ह्वलि तुम गुंण्ये सकद्यां।
रैजन् दुध्यरा बोड़ूं थैं हूंदै सार दूध नि पिजंण द्या। रीता पेट क्वी ज्यूंदु नि रांद पंणि जैकS जोगुम् खांण ह्वलु त वु कुलड़्यूंन गिंडै कि बि नि मोर। यु निरभाग जब जल्मी त् ये थैं रैजन दूध नि पिजंण द्या। तौबि निरभाग तीन दिन तकै बच्यूं रा। झगड़िन् ये कु चौकुम् भिबराट द्येखि त् बींगि ग्या-- "यु जाटि बोड़ च। भिबराट कै हौळ भचोड़लु। त् साब रैजन दिन भांची (एक दिन छोड़कर) वे दूध पिजंण द्या।
रैजा ये थैं गौड़ि पनांणू जन्नि छोड़ त् गौड़ि गगराट कै पांसों बटि दूधै छराक मन बैठि जौ। गौड़ि जब पनांद (दूध देने के लिए सहज हो जाना) त् वS घास नि खांद, जुगार नि लगद।
...............
.......... अर तब छ्वीं ह्वेनि कि..... गौड़ा, भैंसा, बखरा, गैळ बळ्द, ढंगड़ा, ....
यि गोर कु छन ? वु गोर कु छन जौं कS बान खम्वसा-खमोस हूंणि च...
रैजा बोड़ु थैं दिन भांची दूध पिलांण गीजि ग्या। बोड़ु रैजै सार बींगि ग्या। सार गौडु बि बींगि ग्या। गौड़न् बि मंणमंण घालि द्या -- " यून म्यारा द्वी नौनौ ढळकै येनि। तुम थैं बि चुसंणा नि चुसा त् म्यारु नौ बि गौ- माता नी। सुद्दि म्यारा नौ कु पांसु चुसुंणा छंया ! अर मै बेखाद-बादौ (बिना कसूर के) गाळि खलांणा छंवा !" अगनै दिख्यां रै! गौ- मातै कनि कुगSता हुंईं च। ल्या, थुपंण्या ब्वल्यां, म्यारु नौनु मै थैं सकळि बिंगालु।"
यु बोड़ु बिंड्डि दूध प्ये द्यौ। गौड़ि अर बोड़ै ज्य सांट-गांट ह्वे हो। बोड़ु थैं रैजा जन्नि गौड़ा पनांणू छोड़, तन्नि गौड़ि दूधै छर्क मन बैठि जौ। गौड़्यू पनांण रैजा बींगि जांद त् वS सट्ट बोड़ु थैं रुंगुड़ (खींच लेना) दींद। अर सरबट गौड़ा पांसा गबदांण बैठि जांद। गौड़ु चंट च। वु रैजा हतू सागस (स्पर्श) अडगळ दींद। ब्याळि रैजन जन्नि गौडि पना त् वीन दूध नि द्या। रैजा फर लतड़्यौ (लगातार लात मारना) मचै द्या। .......
यु बोड़ खाकंडि.....
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 यु खाकंडि बोड़ु एक्कि सड़ाकम् द्वी दिना बरोबर दूध प्ये ग्या। रैजन् उठा सुट्गि अर चटैं-चटैं चार चटाग वेकS कुंगळा करघंडम् मारि द्येनि। वेन अफू दूध फिरै द्या। हैंकि बेळि वेकS मुक फर सुक्युं घास धोळी रैजन् जन ब्वलेंद वे खुंण घात घालि हो---"प्वट्गि सैढ़लि त्यरि। निरभाग खांदि छै त् खैलि निथर मोरि जै धौं म्यरि भां से।"
भयूं, जैकS जोगम् खांण ल्यख्यूं ह्वलु त् वे थैं क्वी नि मार सकद। नि मोरि यु। यु सदनि चटगयेंणु रा त् दिना-दिन मरख्वड़्या हूंणु रा। कट्टा-मुंगर्या दगड़ा यु सयंणु क्य ह्वा कि एक कुघड़ि कु कुदिन ए ग्या। झगड़िन् एकि कांधम् ज्यू धैरि द्या। ज्यू धैरि चतSया कि यु त् गैळ च। गैळ, गैळ बोली स्यु झंणि कबSरि सांड ह्वा, कैन नि चिता।
बंचिलु (अवगुणी) जन्कि-- अपखौ, अस्यड़ु (असहिष्ण), कुस्ड़ि (कुत्सित) जळथ्यरु, निकज्जु मनिख कत्तै नि सयेंद। यु त् निकज्जु गोर च। यु नि सया। रैजन् ये थैं तीन तलाक द्ये हो जन्कि। "जा ये थैं कक्खि खेद्या (छोड़कर आना), खांणै बोदर।"
भ्वळकुंणौ झगड़ि भै ये थैं बजार खेद्या। यु नप्पोड़ि ड्यार आ। येन गैलु कन गाड़ि ? यु सगळि रात क्वट्य काक्या मुंगर्यड़ा रंदमंद कनु रा। सुबेरौ कन गळ्यौ-घत्यौ मचि तबा! ब्वल्दन बल कि गोर्वी गाळ बल गुसैं खौ। त् तां कु तौ (गरमी) ये साँडा कपाळ फर्री फुटंण छौ। साँड वे दिन कच्यल्ये ग्या। पंण कै बि निरबुद्दा बिंगंणम् नि आ कि ये जीबनै अपडि कंगस्या (कामना) छन, यू बि मौज मारि खांण-सींण चांद......झगड़ि वे थैं डांडा एक डाळा फर ऐंठी आ, वे थैं बागन् नि खा......
.....जड़ उग्टि ग्या यूं नेतौं कि..... यूंकि मवसि धार लग्यां....जौन यून् हम गोर भैंसौं थैं अपड़ा खत्यां धरमू स्ये जोड़्यालि। क्वी बि गोर धरम् इन बिंगद कि तू बि खS, मी बि खौलु ..... पंण जड़ उगट्यां रै ! तुमSरि जु तुम हमSरा पैथर राजनिति कना छंया। ..... जु मे थैं माता ब्वन्नान् वु कतगा छन जु म्यरि टाळ-टकोळ (देखभाल) कन्ना छन। सि छां यीं कुगSतम् ...... जु मे थैं खांणअपड़ु धरम समझंणान् वु धरम नी ....
गौड़ि अर साँडै भिटा-घटि जब नजीबाबादम् ह्वा त् मासुर साँडा बि कळ्यूर ह्वे ग्या-- "हे रै वै! तु चा जै बि धरम् कु छै हम नि जंणदां,पंण तु मनिख नि छै। तु अफु थैं भौत खुप्ड़िबाज चितांणु छै, अबै त्वे चुलै बिन्डि कळकळि च म्यारा सरेलम् त्वे खुंणै।" गौड़्या आंखौं बटि ठम्म-ठम्म आंसु चूंणा छा।
गोरु कु नौ भनै कि राजनिति येयी देसम् ह्वे सकद। ........ वूंकु गोरु स्ये क्वी लेंणु-देंणु नी तौबि भापनौ कु बिजनिस हूंण्वी लग्यूं च।
Copyright @ Mahesha Nand
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Bhishma Kukreti

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विकाश
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Modern Garhwali Short Story by Jasvir
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ये साल गर्मीयूं कि छुट्टीम गौं जयूंछायी,  मेरी मां ल बथै कि हमरा सैणाक पुगुंड फर सडक कटेणी च बल।   मि हैरान ह्वे ग्यों, यो पुगुंडु त हमरु सबसे बडु पुगडु छौ, येकै नाज से त हम पलेन्दा छा।

ब्यखुनि दौं  मि धुमुणकु चलि ग्यों सारी जने,  द्य्याखा त सैर्या पुंगुडु कटै ग्या, द्वी JCB अर पाचं मजदूर लग्यां छा खैंण्डण फर। मि निराश ह्वे कि पुंगडक एक किनरा फर बैठि ग्यों,   तबरि म्यारू ध्यान पुगंडक ढीसक पोड फर गा, म्यारा आखोंन्द आंसु  ब्वगण लगगी, आखों अगने धुन्धकार ह्वे ग्या, मीथै अपणु बचपन दिखेण बैठ ग्या।

चैत का मैनेौं कि सट्टी (धान) बुतैम येयी पोडाक मुडि बैठिक कल्योरोटी खान्द छाया, मेरी मा मीखुणी बोदि छै, लखडु अर ग्वपला टीपीकि ल्यायु आग जगोंला अर च्या (चाय) बणौला।

म्यारू दादा (बडु भै) मीसे काफी बडु छाै यांलै वो हैल लगांदु छौ, अर मी खुणि ब्वदा छा तु डाला फोड, सबसे बेकार काम छौ मीथै भारी गुस्सा औन्दु छो पर म्यारा पिताजी कि डैरकु  मि चुप रैजान्दु छौ ।   मी थै सिनक्वलि भूख लग जान्दी छै, मि बार-बार मेरी मां थैं सनकाणु रैन्द छौ, मेरि मां हैंसिकि बोदि छै,  मूडि गदन  छोयाम जा अर पाणि लियो फिर रोटि खौंला।

मि खुश ह्वेकि हथ फरकु कूटू एक तरफ चुटैकि पाणी कु कैन हाथ म पकडि कि दौडुदु छौ छोंया कि तरफ, तवरि पिछनै भटी म्यारा पितजिकी खतरनाक अवाज सुणेन्दी छै, कन भूख ह्वे रे त्वे खुण,    अभित अद्दा पुगुंडु भि नि बुते, के कु कबलाट हुयूं त्वेफर ?  फिर मि रुवण्यां सि मुख बणा खै अपणी मां जनै देखुदु छौ अर तब मेरी मां बोदि छै, नन्नु लौडु च भूख लग गे होली वेथैं, आल्यावदि खै ल्यूंला बगत ह्वेतग्या। फिर हम सब्या येई पोडक मुडि बैठिक कल्योरोटी खाणकि तैयरी करदा छाया।  पिताजि तैल -मैल पुंगडक हल्यों थैं धै लगांन्दा छाया, आवा भारे रोटी खै जावा।

असूजक मैना मेरी मां ब्वलदि छै बुबा आज इसगोलकि   छुट्टी कारो आज सैणाक  पुगंडक सट्टी मन्डणी, सर्या सार मुके ग्या हमरु ही हमरु रै ग्या, लोखुल गोर छोडयलीं सारि । मि मेरी मां दगड एक शर्त धरुदु छों कि मिल तभ आण  जो तिल  कखडिकु रैलु अर भात बणाण अर एक कखडी कच्ची खाणा कु लिजाण नथर मिल नि आणु I  मेरी मां  तैय्यार ह्वे जान्द छै। सुबेर मेरी मां भात और रैला थे भान्डाउन्द धैरि क अपणी पुरणी धोती का कत्तर चीरि कि एक फन्ची बणा कि मेरि भुल्ली का मुण्डम धरदि छै और हथ फर पाणी कु कैन लेकि  भुल्ली अगने भटै अर मां अर मी पिछनै भटे मोलकु ब्वर्या मुन्डम धैरीक रस्तालग जान्दा छाया।

पुंगडम पौंछिकि जब मि सट्यूंकु कुन्डकु देखुदु छौ, जो कि मी से भी उच्चु रैन्दु छौ त म्यारू सबि साहस खत्म ह्ने जान्दु छौ । सट्टी   मंडै, पराल फ्वलै, फिर बोरि भ्वारा अर धार सरै, थकि -थुकि खै फिर ये ही पोड मुडि बैठिक रैलु भात खयेन्दु छौ, मेरी मा आन्दी-जान्दी बेटी-ब्वारीयूं थै धै लगै- लगै कि बुलान्दि छै, आजावा हे कखडी खा जावा, .. अर तब  मिल-जुलिखै  हारा मठ्ठा दगडि हैरि कखडी कि फडकी खयेन्दि छै।

फागुणक  मैना स्कूल १० बजी लगदी छै, हमरा गौंक  लौडौंकि एक टीम छै, सुवेर-सुवेर पैलि हम एक धात मोल घोल्यान्दा छाया सैणाक पुंगडों, दगुडु बणेकि जान्दा अर आन्दा छा, रस्ता म एक गौं प्वडुदु छों, वख भटै अमरूद च्बरणा, खूब गालि खयेन्दी छै पर मजा भी खूब आन्दु छो।

 मि इन्नि बचपन का सपना देखुणु रौं तबरि गाड का पलिछाल मडगट भटि म्यारू सि दद्दा आंद दिख्या, ... मि हैरान ह्वे ग्यों दद्दा थैं म्वर्यांत कै साल ह्वेगीं पर इबरी यख ..कनखै ?      दद्दा नजदीक ऐैग्या, दद्दा कु मुख गुस्साल लाल हुययूं छौ, अर अन्दिचोट दद्दा JCB वला मजदूर फर पिलची ग्या।     कनु रै हराम का बच्चा . . .किलै उजाड रे तुमुल यो पैरु ? ....तुम थैं पता मिल अर मेरी सैणिल मूडि गाड भटै सर्यां छी ये पैरा खुणि ये ढुन्गा, सर्या भीड्ड उजाडयाल? . . मजदूर ब्वनु, हे ब्वाडा सडक बनणीच यख, ... उनभित बन्जर ही छो स्यू प्वडीयूं, किलै छौ गुस्सा हूणा ?  यां का पैसा मिलणी तुम थैं।

अरे बुबा कतग पैसा जि देला तुम ? कतग खैरि खंयीच मेरी यीं पुगंडी बार, अपडि शैणिकु बुलाक, गुलाबन्द अर कन्दुडुकि मुर्खी बिकै कि मिल या पुगुंडि मोल ल्या, तीन दिन का बासा फर पैदल भूखू- निर्भुखु  पौडि गौंमि येकि रजेस्ट्री कराणा खुणि, मेरी खैरिक क्या कीमत दे सकदौ तुम ? ....पर निर्भे छव्वारा केखुण खैन्डणा छो तुम यीं सडक थै ?

अरै ब्वाडा विकास आणुच बुना ..गढवालम यीं सडकाक रस्ता, मजदूर बोनु ।

पर बुबा कतग बडु च वो विकास जै खुण इतग बड़ी सडक चैन्द ?

 अरे ब्वाडा बहुत बडुच यत कुछ भि नीच वे खुण त सैर्या गढ्वाल खैन्डेणू च ।,

सचें ब्वनु छै तू?

हां ब्वाड़ा।

तबरी दद्दा  कि नजर मीं फर पोडिग्या, ... कनु रै निर्भग्याओ किलै छोडियीं तुमल पुगंडि बन्जी ? ...... मि डैर ग्यों, क्या बोलु, फिरभी हिम्मत कैरिक मिल ब्वाल ... कैल कन खेति - पाति ब्वे - बाप अब दाना ह्वेगीं।

दद्दा कु गुस्सा अब सातों असमान फर चैडिगे, .... कनु तुम थैं जैर अयूंच करदा ?

डरदा- डरदा मिल ब्वाल ....दद्दा हम द्विया भाई शहर रन्दौ नौकरी फर।,

पर ब्वारि त ह्वेली तुम्हरी धारम ?, दद्दाल  पूछ

मि-   न - न वो भि हम दगड ही रन्दन ।

 पर किलै ? दद्दा हैरान ह्वेकि

मि-  नौनौ थैं पडाना खुणि ..

दद्दा  गुस्साम -  पर यख किलै नि पढाया ? .... तुमल भित यखि पाढा।

मि- दद्दा यखकि पडै मा और वख कि पडै मा भौत फर्क च ।

दद्दा हैरानी से -  क्या फर्क च रै ?

मि-  दद्दा यख पैडिकत हम जन ही बणला, पर वख पाडला त भौत बड़ा आदिम बणला।

दद्दा - बड़ा आदिम ? कतग बड़ा रै?

मि-   भौत बड़ा दद्दा,  इतग बडा कि फिर वो मूडि ब्वे-बाप, नाता-रिस्ता, बोलि-भाषा, तीज-त्योहार कैथै नि देखि सकदा, बस विकास थै की देखिदीं।

दद्दा -  बिकास ? ......को .... जो यीं सडका रस्ता आणुचं ....वी ? 

मि- हां दद्दा ।     
 
दद्दा क मुख फर निराश छा ग्या, ठिक च बाबू.... बोलिकि,  फर फरकि, एक नजर उजड्रयां पैराक तरफ ढ्याख  फिर पुगंड जनै ढ्याख.... अर  फिर स्यां-स्यां मडगट जनै जाण लग गीं। मि रुण बैठग्यों, जोर से धै लगैं, ....दद्दा .... मी थै भि लीजा अफु दगडि, पर दद्दाल  फरकि खै भि  नि ढ्याखु, अचानक मेरी तन्द्रा टु्टी, मिल द्याख कि मित पुगंडक किनरा फर बैठ्यूं छौं अर मजदूर काम कना छा। दद्दा थैं म्वरयां त तीस साल ह्वे गीं पर शोर अभि भी पुगंडियूं फरै च । दद्दा थै सायद बिकास समझ नि आयी, पर मेरित गेड बन्दी च, कि विकास आलु त यूं सडक्यूं कै रस्ता आण ।


                                 जसवीर
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With Kind Regards


Dhangu, Gangasalan Ka Kukreti

Bhishma Kukreti

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 ये बाबा चिठ्ठी भेजणाईं रै वाँ ! 

गढवाली रेखाचित्र कथारूप में - हरी लखेड़ा , नई दिल्ली


गोपाल, माँ बाप क चार बेट्यूंक पैथर एक ही बेटा छै। छै मतलब, कत्ती साल ह्वे गेन क्वी ख़बर सार नी च। भगवान से प्रार्थना च जख भी ह्वा राज़ी ख़ुशी ह्वा। ग्यारहवीं और बारहवीं क्लास मा दगडी पढवां। द्वी गढ़वाली । द्वी मिडिल क्लास परिवार। गोपाल अपर गढ़वाल बिटिन, मी लोवर गढ़वाल। बोली एक। स्कूलम त देशी फुदक छे पर घरम सब गढ़वाली ही बोल्द छे। वनी भी सरा किदवई नगर, सरोजिनी नगर नेताजी नगर, सेवा नगर गढवाल्यून भर्यूं छे। तब उत्तरांचल या उत्तराखंड नी बोल्द छे। बारहवीं क बाद मी त एथर चल ग्यूं पढणकुण और वू सरकारी नौकरी लग ग्ये, एल डी सी। दिल्ली माँ ही रंद छे सो मुलाक़ात हूणाई रैंदी छे। वेक पिताजी भी सरकारी नौकरी करद छे, क्वाटर मिल्यूं छे। रिटायर हूंण पर वु क्वाटर गोपालक नाम ह्वे ग्ये। सब बढ़िया चलणाई छे। व्या भी ह्वे और एक बिटिया भी आइ ग्ये। सरकारी पक्की नौकरी, सरकारी घर, सुंदर सुखी परिवार, बहुत सारे दोस्त। और क्या चायेणाई छे।

पर गोपाल ताई त विदेश जांणै कि धुन सवार छे। हर समय वही बात- यख क्वी भविश्य नी च। सब चोर छन साला। पिताक तरैं जिंदगी एक कमरा क घरम कटी जाली। ईं तनख़्वाह माँ क्या मी खौलु क्या बच्चों ताइ खलोल्। अमरीका कनाडा बिटीक ज़ू भी आंदू क्या ठाट छन वूंक। हज़ार द्वी हज़ार रुप्या त यनि फूँक दीदन। और हम साला एक एक कौड़ी गिणनाई रौंदां। सारी सामान लाला की दुकान बिटीक आंद उधार। भलु ह्वेन वेक जु द्वी टाइम ठीक से परिवार चलणाई च। महीनाक आख़िर जब तनखा मिलद त अध्धा त वखी चल जांद और बाकी मा सारी मैना भुगतान पडद।

कन्नी कैक जुगाड़ लगाइ और एक दिन मौन्टैरियल, कनाडा कुण रवाना भी ह्वे ग्ये। वैक क्वी चचेरा भाई रौंद छै वख। जांद वगद पार्टी सार्टी भी कर। हम सबून खूब मस्ती भी कर। जांणैक टाइम पर सब्यूंक आँख माँ आंशु भी छे। वेक पिता त जांद जांद भी कुछ न कुछ शिक्षा दींणाई रैन पर माँ बस रूणाइ रै और एक ही बात - ये बाबा चिठ्ठी भेजणाईं रै वाँ ! और गोपाल क भी एक ही जबाब- माँ चिंता न कर। द्वीयूं ताई सेवा लगाइक टैक्सी मा बैठी ग्ये। एयर पोर्ट तक सबी ग्यवां। पहुंचणैकी एक चिठ्ठी आई और फिर छै महिनामां दूसरी। वे टाइमपर फ़ोन त छै ना। आज कि तरह न त मोबाइल छे न ह्वाट्सअप न मेसेंजर। पैसा और रसूक वालों क घर पर ही फ़ोन छे। बौडी  चिठ्ठीक इंतज़ार करणै रैंद छे। गोपाल क जाण क बाद क्वाटर भी छुट गे।कुछ दिन किराय पर रैन फिर लड़की क घर म। गोपाल ख़र्चा पाणी कुण भेजणाई रै। कुछ पिता क पेन्सन से काम चल जाँ छे।

द्वी साल बाद आई और घरवाली और बेटी ताई भी ले ग्ये। मानन पडल कि मजामां छै। सेहत भी बढ़िया। हम पर भी दिल खोलिक ख़र्च कर। मज़ा ऐ ग्ये छे। हमन पुछ - अरे गोपाल तु क्या करदी कनाडा मा। गोपालन बताई कि टैक्सी चलांदु। खूब इनकम च। ज़्यादातर रात मा चलांदु। टिप ज्यादा मिलिद। सवारी जतना ज्यादा पियूँ रंद वतना ज्यादा टिप दींद। जतुक मी यख साल मा कमादु छै वख महिना मा कमै लींदु। मतलब कि आराम भले ही कम च पर कमाई खूब च। तब तक पता नी छै कि डालर मा कमाई च त ख़र्च भी डालर मा ही होलू। ख़ैर, पर सब देखीक त ठीक ही लगणाई छे।

जांद बगद पिता भी रुणाई छै और माँ त एक दम चुप। बस यनी ब्वाल- ये बाबा चिठ्ठी भेजणाईं रै वाँ ! और गोपाल- आप लोग चिंता ना करीन। मी आणाईं रौल न। गुड्डि दादी! दादी ! चिल्लाणाई रै पर दादी मुंड पर बस हाथ फेरना रै। बेटा ब्वारी न बूड बुढ़िया ताई सेवा लगाई और चल दीन। एयर पोर्ट तक छोडनोक बस मी ग्यूं। टैक्सी मा ततीक जगह छे। तब तक टिकट लेकर भीतर तक जै सक्यांदू छे। सामान वग़ैरा मा मदद ह्वे जांदी छे। अब त भीतर क्या अग़ल बग़ल मा भी नी झाँकण दींद।

फिर तीन साल तक गोपाल नी आइ। चिठ्ठी भी कम। ख़र्चा पाणी भी बंद। माँ बीमार ह्वे त गोपाल कुण चिठ्ठी भ्याज। एक दिन अचानक माँ चल बसी ग्ये। गोपाल तेरहवीं कुण आई अकेला। हफ़्ता भरकुण। ज्यादा बात नी ह्वे। पता चल कि बेटी स्कूलम च। एक बेटा भी ह्वे ग्ये। काम काज भी ठीक च । ख़र्चा बढ़ ग्ये त टैक्सी १८ घंटा तक चलाण पडद। ए टाइम पर एयरपोर्ट तक जाण नी ह्वे। मेरी भी नौकरी क बोझ छै और समय क भी अभाव। वैन भी क्वी देर नी द्याई।

अब गोपाल क पिता भी बुढे गे छे। बीमार ही रंद छै। जब ज्यादा हूंद छै तब भी बोल्द छै  कि गोपाल ताई नी बताण। ख़ामखां परेशान होलु। एक दिन बहुत तबियत ख़राब ह्वे त लड़कीन हास्पिटल मा भर्ती कर और गोपाल कुण तार कैरि दे। गोपाल हफ़्ता भर बादमां आई तब तक पिता ठीक ह्वेकन घर ऐ ग्ये छे। हफ़्ता भर रै कन वापस चल गे।
छै महिना बाद फिर तबियत ख़राब ह्वे, बचणैकि उम्मीद कम। गोपाल कुण तार कर। हफ़्ता भर बाद आई। बहुत दुखी ह्वेकन ब्वाल वैन- मी भगवान से प्रार्थना करदु कि एटाइम पर पिता जी क स्वर्ग वास ह्वे जाव त प्रसाद चढौलु। एक दिन त जाण ही च। अब बार बार आण नी हूंद। जहाज़ क किराया भी बहुत ह्वे गे। काम क भी नुक़सान।

द्वी दिन बाद सचमुच पिताजी चल बसींन। तेरहवीं करीक गोपाल चल ग्ये। गोपाल जरूरत पड़न पर आई जरूर च। बेटा हूंण क फ़र्ज़ निभाय। ऐ टाइम पर क्वी बोलन वालु नी छै- ये बाबा चिठ्ठी भेजणाईं रै वाँ ! कैन बोलन छे, कैकुण बोलन छे। फिर कभी मुलाक़ात भी नी ह्वे।

सर्वाधिकार @ हरि लखेडा,
दिसंबर, २०१७.

NB- मेरी कच्ची पक्की गढ़वाली मे है। जिन बंधुओं को गढ़वाली न आती हो, किसी दूसरे से पढ़वा/अनुवाद करवा सकते हैं। कोई जी एस टी नही है।


Bhishma Kukreti

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आणाईं जाणाई रै !

(गढवाली कथा )

कथाकार - हरि लखेड़ा , बणचुरी , उदयपुर , गढवाल
-
जब पता चल कि चैता बौ भी दिल्ली ऐ ग्या त मिलण कुण चल ग्यूं। चैता बौ क ड्वाला मी भी लै छे। दादा खेति बाड़ी करद छे। द्वींयूं कुण कालु अक्षर भैंस बराबर। गाँव मा सबसे बढिया पुंगडी ऊँकी परिवारम छे। वे टाइम पर बरखा भी समय पर हूंदी छे। लोग काम से जी भी नी चुरांद छे। खूब मेहनत करद छे। साल मा द्वी फ़सल परिवारकुण बहुत छे। बाखर, ढेबर का व्यापार मा नक़द रक़म मील जांदी छे। कभीकभी गाय बैल बेचीक भी आमदनी ह्वे जांदी छे। मेहनत जरूर छे पर मेहनत कख नी च। बग़ैर मेहनत क त थालीक खाणुक भी गिच तक नी जांदु।
पर दादा की एक ही लगन छे कि वूंकि तरैं लड़का - लड़की अँगूठा छाप नी रैन। एक लड़का और द्वी लड़की वास्त एक ही सपना कि सब पढ़ लिख जावन। गाँव मा स्कूल छैंछ्या। लडक्यूंन बारवीं तक पढ़ और शादी करवै द्यै। लड़का, जु सबसे छोटु छे, बारहवींक बाद, देहरादून पढणकुण भेज द्या। लड़का पढणमा होशियार छ्या। थोड़ा यना वना बीठीक क़र्ज़ लीण पड़ पर पढ़ाई पूरी कर। एक दिन दिल्ली मा अच्छी नौकरी भी मीलि ग्ये।
दादा न जब ब्वारी खोजणै की स्वाच त लडकान साफ बोल दै कि वै ताई बिना पुछ्यां कखि बात न करीन। क्या कन छे, हाथ मा हाथ धरीक बैठ गीन। एक द्वी बेर द्वी झण दिल्ली गे भी छे पर दिल नी लगु , वापस ऐ गीन। लड़का न बहुत ब्वाल कि गाँव की जमीन कैं ताई त्याड पन देकन दिल्ली ऐ जाव पर एक त क्वी लीण वालु ही नी छ्ये दुसर मकान पण तालु लगाण गाली सी लगदि छे। बेटा जब तक हाथ खुट चलणाई छन, गाँव ही ठीक च। लड़का न भी ज़ोर नी द्ये। हाँ अगली बेर जब घर आई त एक मोबाइल पकड़ै ग्ये। शुरू शुरू मा त दिन मा चार पाँच बगत बात करनाई रैन। एक दिन लड़का न बोल बार बार फ़ोन करनैकि जरूरत नी, डिस्टर्ब हूंद मी। क्वी ख़ास बात ह्वा तभी बात कर। मी फ़ोन कैरि ल्यूल। अब पाँच दस दिनम लड़का ही फ़ोन करदु।
एक दिन फ़ोन आई कि वैन अफकुण लड़की ढूँढ आलि। शादी कि तारीख़ भी पक्की ह्वे ग्ये। हफ़्ता भर बाद ही दिन छे। जल्दी जल्दी कपड़ा समेटीन और दिल्ली पौंचि गेन। ज्यादा कुछ कैरी नी सकद छे पर चैता बौ न अपणी बुलाक और गलूबंद आण वाल ब्वारी कुण दे द्या। लडकान यतूक ब्वाल क्या जरूरत च और वनि भी अब कु पैरुद ई सब। मन मारीक रै गीन बिचार।
लड़की शादी क दिन ही द्याख। पंजाबी परिवारैकि लाड़ली बेटी। खूब सजीं छे। एकदम जन अप्सरा हूंदन। एक किनार पर सोफ़ा मा बैठी रैन। बीच मा पंडित जीन बुलाई, कुछ मंत्र वंत्र पढीन और ह्वे ग्या व्यौ। शादी क कार्ड मेकुण भी ऐ छे पर शादी हूंण क बाद। सब बात बाद मा पता चलिन। शादी क बाद दूल्हा दुल्हन हनीमून पर बैंकाक चलि गीन और दादा और बौ वापस गाँव। ईं बात ताई दस साल ह्वे गीन।
बीच मा ख़बर मील कि दादा नी रै और बौ एकदम अकेला ह्वे ग्ये। आज जब पता चल कि बौ दिल्ली च त मिलणौक चलि ग्यूं। बौ न ब्वाल कि तीन महिना बिटीक दिल्ली च। इतवार क दिन छे, सोचि छे कि सब घर पर ही ह्वाल। जांण से पैली फ़ोन भी करी छे। भतिजा और ब्वारी पंद्रह बीस मिनट क बाद यन बोलीक चली गीन कि जरूरी काम से जाण जरूरी च और शाम तक आल। एक तीन महीना की बच्ची , बौ और मी और मेरी धर्म पत्नी। बौ न और पत्नी न मिलीक खांणुक बणाई, गप्प लगाइन, खांणुक खाई और वापस ऐ गवाँ।
आंद बगद बौ न ब्वाल आणाईं जाणाई रैन। हमन ब्वाल तुम भी ऐन। बौ ब्वाल कन कैक आण यीं बच्ची ताई छोडीक। यीं बच्ची क बान छौं एक, नेथर गाँव से बढिया कखी नी।

अब मी भी क्या बोलु। आप सब समझदार छन।
Copyright @ हरि लखेडा,नई दिल्ली
जनवरी, २०१८.


Bhishma Kukreti

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आदत पैड़ी जालि

Garhwali Story by Hari Lakhera

काकी तै बीस से ऐथर गिनती नि आन्दि। टैम काट त कनकै। बीस तक गणद फिर शुरू । दिवाल पर लगीं घड़ी बि के कामै  कि जब घड़ी देखण ही नि आन्द । कबि जरूरत ही नि पड़ि। बेटा-ब्वारी सुबेर निकलदन त देर रात मा ही दिख्यान्दन।
एक दिन सामणैकि पार्क मा मन बहलाणुक चलि गे। जब लौटीक  ऐ त क्वी घर साफ कैरि गे। सब तरफ सामान फैल्यून् छे। काकी ताल लगाण भूलि गे छे। गांव कि आदत। सारी दिन परेशान । कर बि त क्या । द्वी  मैना पैलि ऐ छे। कै तै नि जाणदि । वन बि सब दरवाज बंद करीक रंदन ।
देर रात बेटा ब्वारी ऐन। ब्वाल त कुछ  नी पर चेहरा त बताई दीन्द। बस नुकसान गिणाणाई रैन।
फिर कबि काकी घर से भैर नि निकलि। चटकनि लगाइक पड़ी रै भितर । भैर बीटिक बेटा चाबि घुमै कन चल जान्द।
आदत पैड़ि जालि।
Copyright@ Hari Lakhera , Delhi , 2018
Garhwali Stories from Banchuri region Garhwal, Uttarakhand by Hari Lakhera; Garhwali Stories from Udaipur region Garhwal, Uttarakhand by Hari Lakhera; Garhwali Stories from Lansdowne Tehsil Garhwal, Uttarakhand by Hari Lakhera; Garhwali Stories from Garhwal, Uttarakhand, South Asia  by Hari Lakhera;
हरि लखेड़ा की  गढवाल , उत्तराखंड क्षेत्र से गढवाली कथाएँ ; हरि लखेड़ा की  बणचुरी  गढवाल , उत्तराखंड क्षेत्र से गढवाली कथाएँ ; हरि लखेड़ा की  उदयपुर पट्टी , गढवाल , उत्तराखंड क्षेत्र से गढवाली कथाएँ ; हरि लखेड़ा की  लैंसडाउन तहसील , गढवाल , उत्तराखंड क्षेत्र से गढवाली कथाएँ ; हरि लखेड़ा की  गढवाल , उत्तराखंड दक्षिण एसिया क्षेत्र से गढवाली कथाएँ ;








Bhishma Kukreti

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बिन्डी फुंद्यानाथ न बण

By Hari Lakhera


सारि गाँव मा रुकमा काकी ही रै गे जु मिताई चुप कराई सकद। बाकी सब चल बसींन। मतलब जु मिताई चुप कराई सकद छै। काकी कि बात ही अलग च। उमर ह्वे गे पर एकदम चुस्त। अपर टैम की पाँचवी पास। एक त पाँचवी पास,  ऊपर से काकी। रिस्तों की इज़्ज़त जरूरी च। डाटणौ क पूर अधिकार च काकी क और चुप रौणोक म्यार।
काकी जब शुरू हूंद त रुकणौक नाम नी लींद। मी भी कम नि छौं , सब रिकार्ड करदै। स्मार्ट फ़ोन क यतुक फायदा त छैंच। फ़ैसला आपक हाथ मा।
मी-
काकी नमस्कार। खूब छे।
काकी-
मी त खूब छौं पर तु ठीक नी छे मेजाण। द्वी चार सालम एक द्वी दिनौकुण घर आंदि और फुंद्यानाथ बणी जाँदि। ई बि गलत, वी बि गलत। यन करो, तन करो। अरे तिताई क्या पड़ीं च। आदी, खादी और जादी। जब कुछ पता ही नी च त किलाई खामोखां पटवारी बणदी। मी सब सुणणाई छे, त्यार भाषण।
मी-
काकी क्या गलत ब्वाल? यन त ब्वाल कि सब पुंगड नी कै सकद त सग्वाड त करी ल्याव। घर कि नज़दीक बाँझ पुंगड ख़राब दिख्याणाई छन।
काकी-
तिताई चायेणाई च बैठक और वूं ताई तेरी सिगरेट। सग्वाड त करी ल्याव! तिताई क्या पता? ताज़ी ताज़ी भुज्जी कै ताई ख़राब लगद? हैं? बांदर ह्वे गेन। कुछ नी राखद। जड़ से उखाडीक ख़ै जांदन। ब्याली भरसा क सग्वाड सफ़ाचट करि गेन। वैन बचाणैकी कोशिश कर त वैकि कपड़ा लत्ता फाडीक चंप्पत ह्वे गेन। जै कन देख, खटला मा पड्यूं च। यन लगणाई जन कैन लाठ्यूंन मारी ह्वालू।
काकी क्या बुनै छे, बांदर छन कि रिख? -मीन अपर ग्यान बखार।
काकी-
रिख से भी ख़तरनाक। आठ दस दगड मा आंदन। यतूक त गाँव मा आदिम नि रै! नरेशै की ब्वारी कुटद्वार जाईं च। अफ़ीक खाणुक बणाणैई च। रोटी बणैक धैरि गे और सग्वाड चारण बैठ बि नि छै कि बांदर ऐन और रोटीक टोकरि लेकन भागी गेन। मिज़ाण दरवाज़ खुल्यूं रै गे। क्या कन छे, भुकि से गे। तुम लोग ताई कुछ पता नी। गाँव की जिंदगी पैली भी मुश्किल छे अब त क्या बोन। कुछ दिन यख रैंकन द्याखो तब पता चललो।

मी-
काकी! बांदर, रिख, सुंगर, बाघ त पैली भी छै। कत्ती बेर बाघ बाखर खींचीक ली गे छे। कत्ती बेर कुत्ताओं न भगाई। पर तब लोग डरद नी छै। दूर दूर तक पुंगड आबाद छै। साल मा चार मैना पुंगड्यूं मा कटि जाँदि छे। रात गोट और दिन जानवरूक चराण। साल भर कुण अनाज यूँ पुंगड्यूं बिटीक आंद छे। अब क्या ह्वे । खेती बाँझ रैली त जानवरूक मज़ा च।
काकी-
बात त ठीक च। पर तु बता तब त्यार परिवार मा खाण वाल कति छै और अब कति छन। क्या सब्यूंक गुज़ार ह्वे सकद। नि ह्वे सकद न? जब परिवार मा खाण वाल बढ़ी जांदन त कुछ ताई कुछ और काम करण पडद। अब गाँव मा क्या काम च। कुछ बि ना। भैर जाण पडद। वख जैकन ज़ू बि काम मील करण पडद।
मी-
सी त ठीक काकी पर पैली साल मा चार छै महिना कुण जांद छे। खेती क टाइम पर घर ऐ जांद छे।चार छै महिना की कमाई से मदद ह्वे जाँदि छे। बाल बच्चा पल जाँदि छे।
काकी-
तु नि छे समझणाई। परिवार त बढि गेन, खेत त नी बढ़ी सकद। पेट त जानवर भी भरि लींदन। फिर यन बि च कि भैर जैकन वकैकी चका चौंध देखीक चकराई गेन और फिर वखैकी ह्वे गीन। जब घर आंदन त ठाटबाट से। देखा देखी सब तनी करण लगि जांदन। तु आपताई देख ले। पढ़ी लेखीक तीन क्या कर गाँव कुण। अरे साहब ह्वेल त आपकुण। शुक्र मना भाई छैं च घरम। तुम लोगुक बस बात ही बात च, करीक दिखाव त मी भी मानुलु।
मी-
काकी मेरी बात छोड़। ऊँकी बात कर जु भैर जैकन छोटी मोटी नौकरी कैकन गुज़ार करणाई छन । उ त गाँव मा अपर खेत करी सकदन। और ना त कम से कम बीच बीच मा ऐकन अपर पूर्वजों क घर त सँभाली सकदन।
काकी-
जब कैन रौण ही नी त घर संभालिक क्या फैदा? तु क्या छे समझणाई ? घर संभालाण मज़ाक़ नी। पट्वाल खिसिकी गेन, कूड चूणाई छन। कै ताई नी आंदु ठीक करण। न त पट्वाल रै न पट्वाल लगाण वाल। लिंटर डालण कुण भी बिहारी या नजंबाद बिटीक मुसलमान आंदन। तीन चार घर मा लिंटर तीन भी देखी ह्वाल, सब पर ताल लग्यां छन। जब क्वी आल त पैली त झाड़ झपौड करौलु, गंध दूर करणौकु खांतुडु - चद्दर ताई धाम दखाल तब जैकन रात सीणैकी सौचुलू। कैम च यतुक टैम?
एक बात और। सब नकारा ह्वे गीन। काम क्वी नी कन चांदु। क्या बोल्दन - मनरेगा, बेपेल, पेंसन। जब मिले यूँ त धन्नी काम करे क्यूं? जोंक बाप दादा ज़मींदार छे अब भिखारी ह्वे गेन। सरकार जैकी भी ह्वा पर भिखारी त हम छवां।

मी-
काकी! पर गाँव मा बारवीं तक सरकारी स्कूल च, हस्पताल च, प्रधान च, सरपंच च । फिर भी गाँव ख़ाली किलाई हूणाई च।
काकी-
अब जादा नि बुलवा। स्कूल च पर मास्टर नीन। हस्पताल च पर डाक्टर नी, प्रधान और सरपंच बिक्यां छन। चुनावक टैम पर जु जादा दाम लगालु वैक ह्वे जांदन। किलाई। तु क्या छे समझणाई? त्यार बाबा अपर बच्चौं ताई पढ़ाई सकद त और नी पढ़ाई सकद। अपर त जन कटी, तन कटी। बच्चौं भविष्य त सुधारो। बस यनी सोचीक क्वी वापस नी आणाईं।
मीन त अपर मँगला कुण यनी ब्वाल। यख कुछ नी धर्यूं। बच्चा पढ़ि लिख जाल त कुछ बणी जाल। यख ना स्कूल , ना रोज़गार।
उपर से ते जनी लोग ऐ जांदन। पानी कि बोतल और सब्ज़ी बि दगड मा लांदन। बढिया जुत्त, कपड़ा। विदेशी शराब। लंबी लंबी सिगरेट। द्वी चार दिन रै, गाँव की आव हवा की तारीफ़ करी, बेफिजूल सलाह दे और फिर नदारद। लौटीक आल कि ना, वै क बी पता नी।
तु बुर नी मानी। मेरी आदत त यनी च। जु मन मा आई बोलि दींदु। मेरी बात मान, काकी छौं तेरी। छुट्टी काट और जा। फुंद्यानाथ ना बण। त्यार जाकण बाद, सब मज़ाक़ करदन। मिताई अच्छा नी लगदु। त्यार विचार ठीक छन। गाँव बाँझ ह्वे गे। कूड टुट्यां पड्यां छन। कै ताई अच्छु लगदु। पर करण क्या च। जैकी जन चलणाई च, ठीक च। सब कुशल चायाणाई छन।
ये ले। यतना देर बिटीक बक बक करणै छौं चाय तक नी पूछ।
काकीन चाय बणाई। चुप्पी साधीक मीन चाय प्यै। अब तक खोपड़ी घुर्याणाई  च। काकी कि बात मा कतना सच्चाई च, विचार क विषय च।
आप मा कुछ जौं ताई पता च कि मी अमरीका मा रौंदु सोचणाई ह्वेली कि मिताई क्या पडीं। पर मीन त जौं पुंगड्यूं मा पगार लगाइन वु जब जंगल बण गीन त दुख हूंद। वन देखे जाव त हमेशा कुछ नी रै। जब बड़ बड़ क़िला नि रै त हमार गाँव क खपरैल की क्या?


हरि लखेडा,
जून २०१८
Copyright@ Hari Lakhera , Delhi , 2018
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गढ़वाली और बंगाली

Comparative Study of Garhwali and Bengali Languages

Hai Lakhera
यन बोल्दन कि हम लखेडाओं के पूर्वज बंगाल बिटीक गढ़वाल माँ ऐकन बसींन। या बात ख़ास करीक पौडी ज़िला क बारा माँ ज्यादा बोल्ये जांद। मी लगभग २० साल कलकत्ता माँ रौं और मिताई यन लग कि ईं बात माँ काफ़ी सच्चाई च। बहुत से रीति रिवाज मिल्द जुल्द छन। बोलि भाषा माँ बहुत समानता है। कुछ उदाहरण :-
गढ़वाली - काका  (चाचा)     बंगाली - काका
       "       काकी ( चाची)      "     - काकी
    "          त्यार क्या नाम       "     -  तुमार नाम की
     "          क्या खाणाई छे     "      - कि खाच्छो
     "          कख जाणाई छे     "    -   कोथाई जच्छो
     "          कब ऐलि               "   - कोबे फिरबे
     "          क्या हाल छन       "     - केमोन आछो
और भी कई समानता होली। मतलब या च कि हम कखी भी चली जवाँ हमार रिति रिवाज, बोली भाषा, रहन सहन, हमार दगड रंद। आज भी जु लोग भारत से अफ़्रीका, फ़िज़ी, मौरिसस, बाली, सिंगापुर आदि जगह जैकन सदियों पैली बसींन, कै न कै रूप माँ अपण जड़ों से जुड्यां छन।



Copyright@ Hari Lakhera , Delhi , 2018




Bhishma Kukreti

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फिर कब ऐलि

by Hari Lakhera


जब क्वी बहुत ही क़रीबी, जन कि बेटा, बेटी, भाई, बैण या बहुत ही प्रिय दोस्त जाण लगद त  'फिर कब ऐलि' अचानक मुख से निकलि जांद। स्तिथि और भी नाज़ुक ह्वे जांद जब पता च कि फिर आणैकि उम्मीद शायद बहुत साल बाद या कभी नी च। यन समय पर इच्छा त हूंद कि बोलु कि 'न जा' पर मुख बिटीक निकल्द 'अपण ख़्याल राखी' । समझ मा नी आंद कि क्या बोलु। वक्त की कमी और हाथ हिलाण क बीच की दूरी इतना नज़दीक भी ह्वे सकद वी बताइ सकद जु यीं परीछा से गुज़र ह्वालू।
चाच्ची क भी हालत यनी च।
बात ज़रा पुराणि च। लगभग पचास साल ह्वे गीन।  व्या क बाद द्वी साल तक चाच्ची गाँव मा ही रै। चिच्चा कि नै नै नौकरी छे त दगड नि लिजाइ सौकु। गाँव मा सब चाच्ची क तारीफ़ करद नी थकद छे। रुसाडो हो या सग्वाडो, चाच्ची हर काम मा एथर। क्वी बोलि नी सकद छे कि चाच्ची मुरादाबाद मा पैदा ह्वे, वकी बडी ह्वे, दसवीं पास कर । द्वी साल बाद चाच्ची चिच्चा क दगड दिल्ली ऐ ग्ये। चिच्चा कि नौकरी सरकारी त छे पर तनखा से मुश्किल से ही गुज़ार हूंद छे। पर चाच्ची त चाच्ची। एकदम बचत से, जरूरी ख़र्च पर कमी ना और फ़ालतू ख़र्च की छूट ना। चिच्चा की बीड़ी भी बंद। कभी कभी चिच्चा घूँट भी लगाई लींद छे पर वी भी बंद।
काफ़ी मन्नत और मंदिरूंक चक्कर लगाणक बाद शादीक पंद्रह साल बाद पुत्र प्राप्ति ह्वे। फिर क्या छे चाच्ची क त सारी दुनिया ही चंदर यानी चंद्रमोहन । जनि जनि चंदर बड़ हूंद ग्ये वनि वनि वैकि छलाँग भी लंबी हूंद ग्ये। चाच्ची न लाड़ प्यार त करीच पर साथ मा वैकि पढ़ाई लिखाई क खूब ध्यान रख। आईआईटी बीटीन इंजीनियरिंग कर और एथर पढ़ाई कुण अमरीका भेज द्ये। गाँव बिटिन पैली लड़का अमरीका ग्ये त सारी गाँव ताइ गर्व ह्वे। चाच्ची चिच्चा भी खुस। सारी जमा पूँजी वैकि पढ़ाई पण ख़र्च करण पर ज़रा भी नी हिचक। हिचकण भी किलाई छे। एक ही बच्चा, वो भी पढ़ाई मा अब्बल।
चंदर अमरीका पढ़ाई मा व्यस्त ह्वे ग्यै। एक त पढ़ाई क ख़र्च, फिर महंग टिकट । पैली साल त ऐ च पर दुसर साल बिटीक छुट्ट्यूं मा काम करण लग्या। चार साल मा पढ़ाई पूरी कर और बढिया नौकरी पर भी लगी ग्यै। फिर बीच बीच मा आणाईं रै पर वू भी काम क बहाना से धीरे धीरे कम हूँ ग्यै। आजैकि तरां मोबाइल, स्काइप त छै न। फ़ोन भी नी छे। फिर वख रात त यख दिन। कभी पडोस्यूंक यख फ़ोन पर बात ह्वे जाँदि छे। यख चिच्चा चाच्ची परेशान । कमी त कुछ नी छे। रिटायरमेंट से पैली  एक मकान भी बणाई आल छे। पेंशन से गुज़ार बसर ठीक ठाक ह्वे जांद छे। बस एक ही इच्छा कि चंदर घर ऐ जाव। कति बेर ब्वाल भी च पर क्वी असर नी पड़।
पाँच साल बाद चंदर आई। अटेची भरीक बहुत सामान भी लाई। चिच्चा चाच्ची ताई हरिद्वार घुमाई कन भी लाई। दिल्ली भी कत्ति जगा गेन। पाँच सितारा होटल मा पैली बेरि डिनर भी कर। चाच्चीन कुछ टट्वाल भी च कि शादी क बार मा क्या विचार छ। पैंतीस सालूक ह्वे ग्यै। हम न भी कब तक रण। अपणि सामिणी देखि लींदु त चैन से बाकी जिंदगी कटि जाली। अकेला रैंदी। कब तक यनी रैली। हमारी चिंता न कर। कत्ति लड़की नजर मा छन। तु हाँ त बोल। चंदर ज़्यादातर चुप ही रै। चाच्ची ताई शक भी ह्वे, कखि कै गोरीक दगड त नी फँस ग्यै। चिच्चा न भी ब्वाल पर चंदर को बस एक ही जबाब, मीन व्या नी करण।
फिर जाण क दि नज़दीक ऐ ग्यै। चाच्ची न पूछ फिर कब ऐलि। चंदर न बोल क्या बतौं। चाच्ची सत्तरम और चिच्चा पिच्चातरम । ब्वालन भी त क्या।
और जाणक दिन ऐई ग्यै। चाच्ची पापड़, अचार, मिठाई लाइ कि चंदर लिजालु। चंदर न अटैचि तैयार कर। चिच्चा न ब्वाल एयरपोर्ट तक हम भी जौला। टैक्सी बुलाई। एयरपोर्ट पहुंचीक चंदर न सामान ट्राली मा धर। द्वीयूंक पैर छ्वीन। देखद देखद चंदर एयरपोर्ट क अंदर चलि ग्यै। चिच्चा त कुछ बुदबुदाई भी च पर चाच्ची त यनि भी नी बोलि सैकी कि अपण ख़्याल राखी। समय ही नी मीलु।
चिच्चा त नी च अब पर चंदर ऐ छे बल। चाच्ची ताई कै ब्रिद्ध आश्रम मा भर्ती कैरि ग्ये। कमी त अब भी कुछ नी च । हाँ पुछणैं रंद बल कि चंदर कब आलु। यन भी सुण मा आई कि जब चंदर आई भी च त वै ताई पुछणैई रै चंदर कब आलु।
Copyright @ Hari Lakhera





Bhishma Kukreti

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फुट्यूं  कपाल -भाग- १

by Hari Lakhera

चैतु नि रै ।  अबि उमर ही क्या छे?  बस ३५। जब कपाल फुट्यूं रंद त यनि हूंद।
फुट्यूं  कपाल नि हूंद त पैदा हूंद ही ब्वे ताई खांदु? पाँच सालक भितर बुबा ताई भी ख़ै गे। सारी ज़िम्मेदारी मे बुढ़िया पन। बुढ़्या रंद त तब भी ठीक, पर बर्दाश्त नि कै सक। चलि गे। मिलिटरी   मा सिपै छे, पिनसन म्यार नाम ह्वे गे। पुंगड त्याड पर दियां छे, गुज़र हूणाई छे। एक उम्मीद छे कि चैतु छैं च।
अकेला मी और नाबालिग़ चैतु। अब मि क्या कौरु? मौरि जौं? मरण यतुक आसान हूंद त बात ही क्या छे। मौरि भी त नी सकदु। दादी! दादी! हर वखत दादी, दादी! न त ब्वे ब्वाल न बाबा। वैकुण भी क्या बोलु, नरभागी। वैकुण त मी छौं ब्वे भी, बुबा भी, दद्दा भी।
अब हमन क्वी कमी त नी करी। जब पता चल कि ब्वारी उम्मीद से छ त सारी गाँव ताई पता पड़ी गे। गाँव मा बात नि छुपदि। सब ठीक ठाक ही चलणाई छे। ब्वारी तु माँ बनणाई छे, अपर ख़याल
राखि। ज्यादा बोझ भार नी उठाई, मी छौं न ! भगवानैकी दया से क्वी कमी नी।सब उम्मीद मा कि कब घरम नै मेहमान आलु। कब वे कि किलकारी सुणाई देलि। फिर उ दिन भी आई। ब्वारी न ब्वाल दर्द हूणाई च। तब गाँव मा बस गौरा ही सब बातूकी जानकार छे। वींक हाथ मा जादू छे। गौरा ताई भीतर  त नी घुसाई सकद , हरिजन परिवार से छे। हरिजन बोल्णू से जात त नी बदलदी न ! सन्नीम बिस्तर लगाण पड़।
आधि रात क क़रीब चैतु पैदा ह्वे। वेकी किलकारी सूण त ब्वारी ख़ुश। सब ख़ुश। यन लग सब ठीक च। सुबेर सारि ख़बर गाँव मा कि म्यार पोता ह्वे गे। मी दादी बणी ग्यूं। पर ई क्या? द्वी दिन ह्वे गीन और ब्वारी खडी ही नी ह्वे पाणाई। गौरा न बताई कि ख़ून नी रुकणाई पर घबराणै कि बात नी च। दुसर गाँव विटिक वैद ताई बुलाई। वैन कुछ जड़ी बूटि पीसीक देन। जब पाँच दिन तक ख़ून नी थम त पिनस करीक दस कोश दूर हस्पताल लीगों । वख पहुंचण से पैली ही ब्वारीन दम तोड़ी दे।
सौणा न दुसर व्या करण से मना करि दे। कतना समझाई पर एक नी मानी। क्या करण छे, चुप रै गिवां। खेती बाड़ी तायी सौणा ही संभालदु छे। दिन मा गोर चरावु, बाखरूक व्यापार करु और कबीँ क़बी चैतु ताई भी पुचकारी द्यावु, बस। और क्वी मतलब नी। भितर  ही  भितर घुट्यूण रै। खाण पीणैकि शुध ना। हर वखत खप्प, खप्प। वैद न दवाई दै पर खाँसी नी गे। फिर खटला पकडि लै। हस्पताल भी दिखाई पर कुछ पता नी चलु। डाक्टर न दवाई देन और ब्वाल कि बड़ हस्पताल मा दिखाव। बड़ हस्पताल त तीस कोश दूर च। पिनस मा लिजाण पडल। द्वी दिन लगल बल। हमन त द्याख न सूण। पर गाँव वालून ब्वाल कि सब ह्वे जालु। गाँव क ज्वान ज्वान छ्वारा पिनस तैयार करण लगींन। सौणा न रात मा हि दम तोड़ी द्ये।
चैतु तब तक पाँच सालौकु भी नी ह्वे छे। अब फुट्यूं कपाल नी त और क्या च। कपाल हमार फुट्यां छे कि वैक पता नी पर जाण वाल त चली जांदन। मुश्किल त जु बच्यां छन वूं कुण हूंद। चैतूकी ज़िम्मेदारी हमारी। यन लग जन सौणा ताई फिर से बड़ करणाई छवां। चैतू मा सौणा दिख्याणाई रै। बुढ़्या भी छोडि गे। अब बस मी और चैतू।
जनि तनि कैकन समय कट, चैतु बड़ ह्वे, गांवैकि स्कूल बिटीक मिडिल पास कर । बहुत समझाई कि ऐथर पढ़ि ले पर नी मानु। बिंडि पढीक क्या करण? मीन त गाँव मा ही रण। खेति करुलु। मीन तिताई छोडीक कखी नी जाण। बात भी ठीक ही छे। फिर म्यार भी स्वार्थ। बुढ़िया  ह्वे ग्यूं, देखभाल कु करुल्।
आज सोचद त वे ताई मीन मार। मी ज़रा और ज़ोर दींदु त वु ऐथर पढणकुण भैर जांद, अच्छी नौकरी करदु, आराम की  जिंदगी बितांदु और बिना इलाजकु नी मरदु। मिताई त अपरि लगीं रै। म्यार क्या होलु।
यन जिंदगी कु क्या मतलब? बेटा खाई, ब्वारी खाई, पति खाई और अब एक ही पोता।

शेष भाग -२
 फुट्यूं  कपाल - भाग- २
(अब तक- चैतु ताई दादीन पाल। बचपन मा ही छुरे गे छे। गाँव क आसपास कखी ठीक इलाजै की व्यवस्था नी हूंण से ब्वे जनम दींद ही मर गे और बुबा पाँच साल क बाद। ऐ कुण कै ताई भी दोष क्या दीण? दादी ताई पिंसन मिलती छे त खाण पीणैकि की खास चिंता नी छे) । अब ऐथर.............
चैतून गाँव की स्कूल बिटीक मिडिल पास कर और ऐथर पढणकुण भैर जाण से साफ मना कैर दे। ब्वाल कि दादि ताई अकेला छोडीक कखी नी जाण। घरम रौलु, खेति बाड़ी करुलु , बाखर पाललु बस। पंद्र सालक बच्चा जल्दी जवान और समझदार ह्वे गे। दादी न भी बिंडि ज़ोर नि दे। बलदूकी जोड़ी ले , कुछ बाखर खरीदिनऔर लग गे काम पर। बरखा भी समय पर हूणाई रै, गाँव वालून भी साथ दे। लग कि सब ठीक ह्वे जाल। चैतू बीस सालोक ह्वे त व्या करि द्ये। ब्वारी बहुत सुंदर, मयाली और मेहनति। भगवान न जोड़ी बणाई ह्वा जन। एक लडिकु और एक लडिकि भी ह्वे गीन। और क्या चायेणाई छे।
पर पता नि किलाई पर लोगुक खेति से मन भरे ग्ये। गुजार नी हूंद बल। जै ताई भी शहरूं मा ठीक ठाक काम मील कै न कै बहाना से बच्चौं ताई भी दगडी ली गे। एक बार गेन त फिर बस चली गेन। धीरे धीरे गाँव ख़ाली हूंण बैठि गे। जु कखी जाण जोग नि छे वी गाँव मा रै गेन।
पुंगड बाँझ पड़न लगींन। बांदर, रिख, सुंगर रईं सईं कसर पूरि करण लगींन। पर चैतू न हिम्मत नी हारि। दूर क पुंगड त नी करि सकु पर आस पास क पुंगड आबाद राख। बाखर भी छैं छे। मेरि पेंसन भी छे।
सडक त बहुत पैली ऐ गे छे। हे राम, मीन त पैली बेर बस द्याख छे। स्कूल भी बारहवीं तक ह्वे गे छे। बस जब बंद ह्वेन त जीप चालु । कुटद्वार तीन घंटा क रस्ता। प्राथमिक चिकिस्तालय भी ऐ गे। वन वख डाक्टर हूंण चायांद पर नी च। पर जन भी च कंपौंडर काम चलाई लींद। अब त कै ताई छींक भी आंद त झट से जैकन गोली ली आंद। जरूरत पड़न पर बड़ हस्पताल जै सक्यांदू । बिजली आयां भी कत्ति साल ह्वे गीन। सबसे बडी बात सब्यूंम फ़ोन ह्वे गीन। सरकार न १०८ एम्बुलेंस सेवा भी लगै दे। कबी कै ताई तत्काल हस्पताल लिजाण पड़ त १०८ नंबर दबाओ और ऐंबुलेंस हाज़िर ह्वे जालि बल। भगवान न कर कै ताई हस्पताल लिजाण पड़ । साल भर ह्वे गे सेवा ताई आईं। अब क्वी बग़ैर इलाजकु नी मरी सकदु।
जब गाँव भर्यूं छे तब ना सडक छे ना बिजली। अब सब कुछ छ पर लोग नीन। एक टैम पर गाँव मा चालीस परिवार छे। खूब रौनक़ रैंदी छे। अब दस बी नी छन। बाकी कूड या त टुट्यां छन या ताल लग्यां छन। पर जनि बी च ठीक च। सरकार कै ताई रोकि त नी सकदि। जैन जाण च वैन त जाण ही च। सब से बडी बात या च कि अब सुविधा ह्वे गीन। दुकानिम जरूरत क सब सामान मील जांद।
कुछ दिन बिटीक देखणायी छौं कि चैतु कमज़ोर लगणाई च। पैली स्वाच कि म्यार आँख कमज़ोर ह्वे गीन। पर जब द्याख कि खासणाई भी रंद त नी रयाई। कोटद्वार हस्पताल म भ्याज। दवाई से कुछ आराम ह्वे पर खप्प खप्प नि रुक। दिन भर बाखरूक पैथर। मीन ब्वाल खतमकर ए झंझट ताई। बेच दी । पिंसन छैं च। पर नी मानु। बच्चों कि पढाइ कुण कखन आल बल।
क़िस्मत कि मार। एक दिन चक्कर आई और भ्यालूंद लमडि गे। गाँव क धन्या वना वीटीक आणाईं रै। कंधा मा लटके क लाई। ख़ून से लथपथ। मुंड मा चोट। १०८ कुण फ़ोन लगाई । पैलि त फ़ोन नी मीलु, जब मील च त बताई कि ऐंबुलेंस नी च। फिर खूब रूण धूप कर तब ब्वाल कि ऐंबुलेंस भेजणाई छन। पाँच घंटा तक भी नी आई। ए बीच जीप क भी कोशिश पर क्वी नी मीलि। फिर फ़ोन कर, बताई कि रस्ता मा ख़राब ह्वे गे, ठीक हूंद ही ऐ जाली। दस घंटा बाद ऐंबुलेंस आई। तब तक त चैतू बेहोश पड्यूं रै। जब तक हस्पताल पहुचीन चैतून दम तोड़ि देन। डाक्टर न ब्वाल, घंटा द्वी पैलि लीआंद त शायद बची जांद।
फुट्यूं कपाल नी हूंद त ऐंबुलेंस न भी तबी ख़राब हूंण छे।
ज़ू भी तुम लोग जख भी छ्यो, यीं ब्वारी और बच्चों क बार मा सोचीन। यूंक दुख नी दिखे जांद। क्वी ढंग क आदिम ह्वा त बतैन। सारी कूडी पुंगडी , जमा पूंजी दे द्यूल।

हरि लखेडा ,
जुलाई २०१८.













Copyright@ हरि लखेडा,
जुलाई २०१८







 

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