Author Topic: Exclusive Garhwali Language Stories -विशिष्ठ गढ़वाली कथाये!  (Read 32567 times)

Bhishma Kukreti

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Apsagunya: A Garhwali Story opposing Blind Faith of Ominous perception 
(Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short Story Collection ‘Udrol’ (Stories written by Sandeep Rawat -4)
 (Review of ‘’ a Garhwali Short story (Story written by Sandeep Rawat)
Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
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  ‘Apsagunya’ a Garhwali short story by Sandeep Rawat is an inspiring story opposing the people as perceiving a person ominous by birth. Moni’s mother died at her birth time and her father perceives her as ominous girl and remarries. Moni had two step brothers but they were unable to raise their old aging father but Moni raised him as good as son.
   The narration is very simple and reader can read the story in one reading. The language is simple. There is twisting in the story but the twist does not surprise much.
Garhwali short Story – Apsagunya 
By Sandeep Rawat
From ‘Udrol’ a Garhwali Short Stories Collection
Pub: Utkarsha Prakashan Meerut
Year – 2017
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
 Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun


Bhishma Kukreti

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Bakya: Garhwali Story exemplifying ‘You can take Horse to water but cannot make him drink’

(Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short Story Collection ‘Udrol’ (Stories written by Sandeep Rawat -5)
 (Review of ‘Bakya ’ a Garhwali Short story (Story written by Sandeep Rawat)

Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
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 Bakya,  a modern  Garhwali story by Sandeep Rawat is a simple story illustrating that you can copy a work but cannot master it if you don’t have talent to do so. The son of a future teller (Bakya) wants to become future teller but he totally failed in doing so.
   The story has least energy. The story is very simple with simple plot and language.
  However, the story raises a question of transforming Hindi or Sanskrit words in Garhwali might be dangerous if not done properly. Sandeep Rawat used a word ‘Chhetar’  for Hindi or Sanskrit word Kshetra (area or region) but the word ‘Chhetar means in Garhwali a notorious one. In my opinion , it is not necessary that we literature creators transform every word of other languages.
Garhwali short Story – Bakya   
By Sandeep Rawat
From ‘Udrol’ a Garhwali Short Stories Collection
Pub: Utkarsha Prakashan Meerut
Year – 2017
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
 Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun



Bhishma Kukreti

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Ultant: Many Plots, Many Subjects and too many villains

Chronological History and Review of Modern Garhwali Short Stories/Fiction Series)
(Review of Short Story Collection ‘Udrol’ (Stories written by Sandeep Rawat -6)
 (Review of ‘Ultant’ a Garhwali Short story (Story written by Sandeep Rawat)

Review by: Bhishma Kukreti (Literature Historian)
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  ‘Ultant’ a Garhwali short story by Sandeep Rawat has three plots and many issues. There is story about sharp enmities between two villages, marriage problems between those nearby villages and there is alcohol consumption and indecency from groom side. Sandeep Rawat tried to accommodate all those issues to create a plot  in one story .  When you mix too many spices the chances of spoilage of broth are more and same happened in ‘Ultant’.
  The incidents are real but due to too many plots it is difficult to find the chief aim of story narrator.
The  language of the story  is simple and Rawat uses common phrases for narration.
Garhwali short Story – Ultant   
By Sandeep Rawat
From ‘Udrol’ a Garhwali Short Stories Collection
Pub: Utkarsha Prakashan Meerut
Year – 2017
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2019
 Modern Garhwal Fiction /short stories from Uttarkashi Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Tehri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Pauri Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Rudraprayag Garhwal, South Asia; Modern Garhwal Fiction /short stories from Dehradun


jagmohan singh jayara

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पतरोळ

उत्तराखण्डा ऊंचा डांडौं मा हरा भरा बण सब जगा छन। 1985 सी पैलि बेटी ब्वार्यौं तैं घास लाखड़ु का खातिर युं बणु मा जाण पड़दु थौ।  हर चौक मा भैंसा बल्द बध्यां रन्दा था। गौं की सार्यौं मा घास लाखड़ु की कमी होण का कारण ऊंचा डांडौं फर गौं का लोग निर्भर रन्दा था। बेटी ब्वारि जब बण जान्दि त पतरोळ की भारी डौर रन्दि थै।  पतरोळ जूड़ी दाथड़ि लूछि देन्दा था अर बण औण कु मना करदा था।  घसेर्रयौं का सामणि भारी आफत पैदा ह्वे जान्दि थै।  एक तरफ सैसर्यौं की डौर अर दूसरी तरफ पतरोळ की। 

1906 मा राजशाही का दौरान वन अधिकारी सदानन्द गैरोळा न चन्द्रवदनी, टिहरी क्षेत्र की मुनार बन्दी करवै थै। उबरि खासपट्टी का लोगुन बण फर अपणा हक्क का खातिर ढ़ंढ़क आन्दोलन करिक अपणु विरोध जताई थौ।  मुनारबन्दी सी पैलि लोग बण बिटि बेरोक टोक घास लाखड़ा ल्हौन्दा था।  जब बण मा बणांग लग्दि थै त सब्बि गौं का लोग आग बुझौण जान्दा था। मुनारबन्दी का बाद गौं का लोग्वा मन मा या बात आई, अब्त बण सरकारी छन। आग बुझौण की जिम्मेदारी सरकार की हिछ।  बणु की जग्वाळ का खातिर सरकार न पतरोळ नियुक्त कर्यन अर गौं का लोगु तैं बण बिटि घास लाखड़ु ल्हौण की मनाही ह्वेगि।

पतरोळ की व्यथा या होन्दि थै, जु घसेन्यौं फर दया करदु त नौकरी खतरा मा। साब सुण्लु त नौकरी चलि जालि अर नौकरी जालि त, बाल बच्चौं न तब क्या खाण? एक पतरोळ मूं लगभग बीस वर्ग किलोमीटर कु क्षेत्र होन्दु।  यथ्गा बड़ा क्षेत्रफल का बण की रख्वाळि कन्नु भि औखु काम होन्दु। पतरोळ नि दिखेन्दु त घसेरी तबर्यौं बांजै डाळि काटिक काम तमाम करि देन्दि थै। हौळ लगौण कु नसुड़ा का खातिर लोग बांजौ डाळु रड़कै देन्दा था।  जब पतरोळ वे क्षेत्र मा औन्दु त देख्दु, बांजै डाळि काटि कूटिक काम तमाम करयुं छ।   

पाडैं बेटी ब्वार्यौं कु बण जाणु जरुरी होन्दु थौ।  सुबेर राति उठिक सब्बि बेटी ब्वारि कै मैल ऊकाळ हिटिक बण पौंछ्दि थै।  बाल बच्चौं सी ज्यादा गोरु भैंसौं की फिकर होन्दि थै।  बण बिटि घास ल्हौणु, गोर भैंसा पिजौणु, चूल्लू जगैक खाणौ बणौणु, बाल बच्चौं तैं खलौणु पिलौणु, थकि हारिक से जाणु, या थै पाड़ै बेटी ब्वार्यौं की जिंदगी।     
पतरोळ जाण्दु थौ, पाड़ की बेटी ब्वार्यौं कु बण हि सारु छ।  एक गौं की घसेरी न सुबेर बण जान्दि बग्त अंधेरा मा कोदा की रोठ्ठी समझिक रोठ्ठी बणौण कु तौ चादरि फर लिब्टैक धरि।  बण मा घास काटण का बाद दिन मा सब्यौंन अपणि रोठ्ठी खोल्यन त वीं घसेरिन देखि,  वींकु रोठ्ठी की जगा तौ ल्हयुं छ। 

पाड़ की बेटी ब्वार्यौं तैं काम की भारी राड़ धाड़ रन्दि थै। कुपोषण का कारण उम्र सी बड़ी लग्दि थै बेटी ब्वारी।  पति परदेस रन्दा था, बाल बच्चौं की रेख देख, धन, चैन, खेती बाड़ी का काम मा जिंदगी कटेन्दि थै। तबरि तौंकी जिंदगी पाड़ जनि औखि थै।  1985 का बाद बग्त बदलि, बेटी ब्वार्यौं की जिंदगी मा कुछ बदलौ आई।  पर्वासी अपणा परिवार तैं दगड़ा ल्हिग्यन अर पाड़ खाली होण लगि।  पाड़ मा रैग्यन सिर्फ बुढ़्या ब्वे बाब।  पाड़ मा पलायन पसरी अर गौं मा वा रौनक अब नि रैगि।

पाड़ मा आज सब सुविधा छन।  बण आज क्वी घसेरी नि जान्दि ।  बण यथ्गा घणा ह्वेग्यन, अब वख बाग रीक्क की भारी डौर छ।  पतरोळ बेफिक्र छन किलैकि अब बण मा मनख्यौं कु जाणु बिल्कुल बन्द ह्वेगि।  गौं गौं मा आज घास लाखड़ु भौत छ।  धन चैन कै भि चौक मा अब नामात्र का छन।   पुंगड़ा बंजेणा छन अर वख बान्दर सुंगर मौज मनौणा छन।  दूरदर्शन फर एक दिन पाड़ फर डौक्युमेन्टरी प्रसारित होणी थै।  मैंन धर्मपत्नी कु ब्वलि, देख हमारु पाड़ क्थ्गा रौंत्याळु छ।  धर्मपत्नी न ब्वलि, “पाड़ पिक्चर मा हि सुन्दर लग्दु, पाड़ की जिन्दगी हमारा खातिर कतै भलि नि थै।”

पतरोळ पाड़ की घसेरियौं का खातिर एक खलनायक थौ।  बण घसेरियौं का मैत था।  चिपको आन्दोलन की महिला कार्यकर्ताओं न भी बण तैं अपणु मैत बताई।  जब जब सरकान न बण काटण का ठेका दिनिन्यन त महिलाओं न बढ़ि चढ़िक बण बचौण का खातिर आन्दोलन करिक अपणा बण बचैन। घसेरी अर पतरोळ का बीच द्वन्द फर गीताकारु न गीत बणैन अर गीत मा पाड़ की घसेरियौं की व्यथा भि बताई।  बग्त बदलि अर घसेरियौं की औखि जिंदगी भि।  पाड़ पलायन सी आज घैल छ।   पाड़ पिरेमि आज पलायन की बात करदन।  असंभव लगणु छ, जब तक पाड़ मा रोजगार, शिक्षा अर स्वास्थ्य की भलि व्यवस्था नि ह्वलि, पाड़ दिन दिन पलायन सी त्रस्त ह्वन्दु जालु।

पतरोळ अर घसेरी कु युग अब अतीत मा समैगि।  घसेरियौं की वा पिड़ा अब हमारा पाड़ मा निछ।  हमारी नयी पीढ़ी अब पतरोळ का बारा मा कुछ नि जाण्दि।  कखि लेख कथाओं मा हि घसेरी अर पतरोळ बारा मा पढ़लि।  घसेरियौं की वे बग्त की पीढ़ी आज प्रवास मा सुखी जिंदगी बितौणि छ।  जब जब वे बग्त की बात ऊंका मन मा आलि, तब की जिंदगी अर पिड़ा उभरिक मन मा जरुर आलि। 

जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
दर्द भरी दिल्ली प्रवास बिटि,
दूरभाष: 9654972366
दिनांक 10/12/2019         


jagmohan singh jayara

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जुन्याळि रात

देवभूमि उत्तराखण्ड मा भूतू की कथा मन मा उमंग पैदा करदि छ। देवभूमि मा भूत गौं, भूत देव्ता, भूतू की बरात की बात हम सुण्दा छौं। दाना सयाणौं सी हम पूछ्दा छौं, क्या आपन भूत भि देखि?  कै लोग विस्तार सी भूत द्यखण की बात बतौन्दा छन।  क्वी ब्वल्दन रात का सफर मा भूतन मैंमु बीड़ी मांगी।  क्वी बतौन्दन मनख्यौंन भूत दगड़ि लड़ै भि करि।  कै लोग ब्वल्दन, भूत नि ह्वन्दा, सिरप भ्रम होन्दु।  लैंसडौंन, मसूरी मा अंगरेजु का भूत देखण की बात हम सुण्दा छौं।  उत्तराखण्ड का अलावा देस बिदेस भर मा भूतू की चर्चा ह्वन्दि छ। अकाळ मौत का कारण मनखि भूत बण्दा छन।  जब तक ऊंकु जीवनकाल पूरु नि ह्वन्दु, भूत बणिक भटकदा छन।

पैलि मनोरंजन का साधन नि था।  ह्युंद का मैना झट्ट खै पकैक लोग ढ़िक्याण का भितर लेटि जान्दा था। छोरा-छारा दादा-दादी सी कथा सुणौण कु ब्वल्दा था।  दादा-दादी अपणा मौखिक संकलन सी कथा सुणौन्दा था।  कथा रज्जा राणी, रामैण, महाभारत, तोता-मैणा, भूत अर लोक कथा आधारित ह्वन्दि थै।  आज लोक कथाओं कु प्रचलन सनै सनै खत्म होणु छ। टेलीविजन अर मोबैल आज मनोरंजन कु साधन ह्वेगि।   

असूज का मैंना की बात छ, एक हफ्ता बिटि लगातार बरखा लगिं थै। ठंडन कंपनारु छुटण लग्युं थौ। हम दादी जी का दगड़ा ढ़िक्याण पेट लेट्यां था।  सब्बि नाति नतणौन दादी जी सी ब्वलि, हे दादी, आज तू हम्तैं भूतू की कथा सुणौ।  दादी जी कु हात मा मुंगरेठु धर्युं थौ।  किलैकि जब भि कै नाति नतणा फर खाज उठदि त दादी मुंगरेठान खाज कन्यौन्दि थै।  हमारी फरमैस सुणिक दादीजिन ब्वलि, “सुणा, आज मैं तुम्तैं भूतू का बारा मा आप बीती बात सुणौन्दु”। “असूज कु मैनु थौ, फूलफट्ट की जोन लगिं थै। वे दिन जुन्याळि रात थै।  सुबेर तुमारा दादा जी अर मैंन झंगरेटा काटण कु बर्ताखुंटा पुंगड़ा जाण थौ।  हम्तैं झट्ट निन्द ऐगि”।  हम्न पूछि, दादीजी फेर क्या ह्वे? तब दादीजिन बताई, “वीं रात तुमारा दादा जी की निन्द झट्ट टूटिगी, तुमारा दादाजिन मैकु ब्वलि खड़ु उठ रात खुलण वाळि छ। जुन्याळि रात होण का कारण तुमारा दादा जी तैं भ्रम ह्वे, जन रात खुलण वाळि छ।  मैंन तुमारा दादा जी सी पूछि, अजौं रात भौत छ, किलैकि रतब्येणु नि दिखेणु। तुमारा दादाजिन म्येरी बात फर गौर नि करि अर ब्वलि चल झट्ट। जब हम बर्ताखुंट पौंछ्यौं त सामणि बारगुर का डांडा फुन्ड रॉंका घुमण लग्यां था अर भूत किलक्वारि मान्न लग्यां था।“

दादी जी की बात सुणिक हमारा मन मा डौर सी पैदा होणि थै।  हम्न दादी जी सी पूछि, अग्वाड़ि क्या ह्वे दादी? दादीजिन बताई, “मैकु भारी डौर सी लगणि थै।  मैंन तुमारा दादा जी तैं बताई, मैकु भारी डौर लगणि छ।  तुमारा दादाजिन चिरड़ेक ब्वलि, त्वेकु सदानि डौर हि ह्वयिं छ।  फटाफट्ट झंगरेटा काट, सुबेर ये पुंगड़ा मा हम्न हौळ लगौण।  तुमारा दादा जी की बात सुणिक मैं झंगरेटा काटण लगिग्यौं।  कुछ देर बाद तुमारा दादा जी सुस्ताण लग्यंन।  ऊंन एक चिलम तमाखू भरि अर तमाखू प्येण लग्यन।  जब तुमारा दादाजिन तमाखू पिनि त थोड़ी देर मा माल्या पुंगड़ा बिटि भत्त भत्त ढुंगा पण्न लग्यन।  तुमारा दादाजिन जोर सी आवाज लगै, कुछ रे ढुंगा चलौणु।  थ्वड़ि देर मा ढ़िस्वाळ का पुंगड़ा फुंड एक स्याळ रोण लगि।  मैकु समझण मा देर नि लगि, यु भूत छ जू छम्म धन्न लग्युं छ।  तुमारा दादजिन मैकु ब्वलि, तू डरी ना।” अब हम सब्बि नाति नतणा न्युं च्युं ह्वेग्यौं।  हम्न दादीजी सी पूछि, वेका बाद क्या ह्वे दादी? 

दादीजिन अग्वाड़ि की बात बताई। “भौत देर बाद एक भैंसू सामणि एक पुंगड़ा फुंड अटगण लग्युं थौ।  मैंन स्वचि, यु कैकु भैंसू छ यीं रात मा यख फुंड दनकण लग्युं।  तुमारा दादा जी तैं त डौर कतै नि लग्दि थै।  कै बार ऊंन भूत भगाई।  किलैकि ऊं फर भैरु द्यव्ता औन्दु थौ। तुमारा दादाजिन मैकु ब्वलि, तू कतै न डर।  कुछ समय बिति ह्वलु, एक चिलांगु भत्त भत्त एक डाळा बिटि हैक्का डाळा मा उडाण लगि। मैकु अब भारी डौर लगण लगि थै।  कुछ देर बात हम्न देखि, अब हमारा सामणि एक लम्बू सफेद मनखि सी खड़ु ह्वेगि। ऊ आगास तक लम्बू दिखेणु थौ”।

हम हुंगरा देण लग्यां था अर दादी जी आपबीती कथा सुणौण लगिं थै। हम सब्यौंन पूछि, दादीजी क्या ह्वे अग्वाड़ि? “दादीजिन बताई, वे लम्बा भूत देखि म्येरा आंख फट्ट बंद ह्वेन अर मैं भ्वीं मा बैठिग्यौं।  तुमारा दादा जी फर भैरु द्यव्ता आई अर तुमारा दादा जी भूत जथैं भाग्यन।  मैं पुंगड़ा मा यकुलि रैग्यौं।  तुमारा दादाजिन ऊ भूत नौसा बागी का नीस चुप्पच्याणि तक धद्याई।  भौत देर बाद ऊं पुंगड़ा मा ऐन।  मैंन तुमारा दादा जी कु ब्वलि, तुमारी आज कनि मति मरि।  तुम्न सेण भि नि दिन्यौं।   तुम आधी रात मा उठिग्यन आज।  देखा अब छ धार मा रतब्येणु औणु”।

“सैडा पुंगड़ा का झंगरेटा काटदु काटदु सुबेर ह्वेगि, तब तुमारा दादा जी अर मैं घौर अयौं।   हम्न रातै बात सब्यौं तैं बताई।  सब्यौंन हम झिड़क्यौं, क्या थै तुम फर यनि बितिं, जू रात मा झंगरेटा काटण गयें।”  दादी जी की आपबीती सुणिक हम सब्बि नाति नतणा फंसोरिक सेग्यौं। आज दादी जी स्वर्गवासी छन।  दादी जी हम्तैं भलि भलि कथा सुणौन्दि थै। 

हमारा उत्तराखण्ड मा काम काज कु सदानि भार रन्दु थौ।  जै गौं मा पाणी कु अखर्यो ह्वन्दु थौ, वखा मनखि रात भर पाणी भन्न मा व्यस्त रन्दा था।  क्वी रात मा सेरौं पाणी बट्यौण जान्दा था। झंगोरा कोदा की पिसै कन्न कु सारी रात घट्ट मू रन्दा था।  क्वी रुद्रप्रयाग, गुलाबराई भैंसा, बल्द मंडी मा ल्हिजान्दा था।   रात भैर रण का कारण मनख्यौं कु भूत सी सामना भि होन्दु थौ । भूत घट्ट की भेरण रोकि देन्दा था। कै मनखि फर जब भूत लग्दु थौ त झाड़कंडी बुलौन्दा था।  रख्वाळि अर मंत्र सी भि भूत भगौन्दा था।  भूतू कु प्रकोप आज भि ह्वन्दु छ।   

-जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: बागी-नौसा, चंद्रवदनी, टिहरी गढ़वाळ,
उत्तराखण्ड।
प्रवास: दर्द भरी दिल्ली।
दूरभाष/ 9654972366 
दिनांक 14/11/2019   

jagmohan singh jayara

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उत्तराखण्ड के लोकगायक बाद्दी

उत्तराखण्ड राज्य में निवास करने वाले बाद्दी समाज के लोग आदिकाल से गायन एवं नृत्य करते हैं।  लोकगायक बाद्दी जटा धारण करते हैं और अपने को शिव का वंशज मानते हैं। उत्तराखण्ड राज्य में इनके कई गांव हैं।  टिहरी जनपद में इनका गांव डांगचौंरा प्रसिद्ध है।  गायन और नृत्य में निपुण होने के अलावा ये लोकगीत रचने में पारंगत होते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी इनके रचे गीत मौखिक रुप से संकलित गाए जाते हैं।  इनके गीत घटनाओं पर आधारित भी होते हैं। सतपुलि, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड में संवत 2008 में आई विनाशकारी बाढ़ पर रचित इनका कालजई गीत आज भी गया जाता है। इनके रचे गीतों में अतीत का सुंदर संकलन होता है।  देवी देवताओं पर आधारित गीत भी ये लोग गाते हैं।   अतीत में आज जैसे मनोरंजन के साधन नहीं होते थे।  ये लोग गांव गांव भ्रमण करते हुए हर इलाके की खबर का प्रसार करते हुए, गीत और नृत्य के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करते हैं।

अतीत में गांव गांव भ्रमण करते हुए ये लोग लांक और वर्त का प्रदर्शन करते थे।  जहां वर्त खेली जाती थी, वहां का नामकरण वर्ताखुंट हो जाता था।  वर्त खेलने के लिए बाबुल घास की एक मोटी एवं लम्बी रस्सी तैयार की जाती थी।  उसे खूंटे से ढ़लान में बांध दिया जाता था।  लोकगायक बाद्दी उस रस्से पर लकड़ी की काठी पर बैठकर फिसलता हुआ जाता था।  यह प्रदर्शन जोखिम भरा भी होता था।  सकुशल प्रदर्शन के बाद स्थानीय लोग लोकगायक बाद्दी को अनाज, कपड़े एवं धन प्रदान करके मान सम्मान करते थे। वर्तमान में यह परंपरा विलुप्ति की कगार पर है। 

लांक खेलने के लिए बांस का एक डंडा खड़ा किया जाता था।  उसकी धुरी पर लकड़ी की काठी लगाई जाती है।  लोकगायक बाद्दी उस पर पेट के बल लेटकर घूमता है। ये भी एक जोखिम भरा कार्य होता था।  प्रदर्शन के बाद लोग लोकगयक बाद्दी को सम्मान स्वरुप अनाज, कपड़े एवं धन देते थे। आज यह परम्परा भी विलुप्त होती जा रही है।

बाद्दी लोकगायक सर्दियों के मौसम में गांव गांव जाकर गायन और नृत्य करके अपनी आजीविका चलाते हैं।  लोकगायक बाद्दी सिर पर पगड़ी और दाढ़ी रखते हैं और ढ़ोलकी बजाते हैं।  लोकगायक बाद्दी की पत्नी को बादिण कहते हैं।  बादिण घाघरा और घुंघरु पहनकर नृत्य करती है और बाद्दी के साथ गीत गायन में जुगलबंदी भी। शादी विवाह के सुअवसर पर इन्हें बुलाया जाता है।  ये बरात के साथ जाते हुए गायन और नृत्य की प्रस्तुति करते हैं।       

             आज इस समाज के लोग अपना पारम्परिक गायन एवं नृत्य का कार्य आगे ले जाने में असमर्थ हो गए हैं।  जब से आडियों/विडियों का प्रचलन हुआ,    तब से इनके इस पारम्परिक व्यवसाय में पहले वाली बात नहीं रह गई।  इस समाज के कुछ लोग नौकरी पेशा वाले हो गए हैं।  इस कारण से अपनी विधा को आगे ले जाने में ये असमर्थ है।  आज गिनती के लोकगायक बाद्दी अपनी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।  उत्तराखण्ड सरकार के लोक संस्कृति विभाग को आर्थिक मदद करके लोकगायन  एवं नृत्य विधा के धनि लोकगायक बाद्दी समाज को आगे अपनी परम्परा निभाने को प्रोत्साहित करना चाहिए।  इनके पास अतीत से लेकर आज तक के लोकगीतों का पारम्परिक मौखिक संकलन मौजूद है।  उत्तराखण्डी साहित्यकारों ने इन पर लेख लिखकर संग्रह के माध्यम से इनके लोक गीतों का संकलन किया है। उत्तराखण्ड की लोक भाषाएं इनके गीतों में संकलित है।

        समाज भाषा, संस्कृति और विरासत का वाहक होता है। आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी संस्कृति और विरासत का त्याग करते जा रहे हैं।  संपूर्ण भारत की लोक संस्कृति अनोखी है।  हम विकास करें लेकिन, भाषा, संस्कृति और विरासत का त्याग न करें। उत्तराखण्ड राज्य में निवास करने वाले लोकगायक बाद्दी समाज के लोगों की वर्तमान और अतीत की झलक प्रस्तुत करने का मैंने प्रयास किया है।  कवि और लेखक होने के नाते फर्ज निभाने का भी। 


जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
ग्राम: नौसा बागी, पट्टी: चंद्रवदनी,
पोस्ट औफिस: कुन्डड़ी,
टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।
दूरभाष: 9654972366
प्रवास: दर्द भरी दिल्ली।
दिनांक 23/5/2019
ई-मेल: jjayara@yahoo.com

jagmohan singh jayara

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उत्तराखण्डा बाग

 

कुमगढ़ पत्रिका का संपादक जी कु मैकु फोन आई।  मैंन जोशी ज्यू सी कुशल मंगल पूछि। जोशी ज्यून बताई, अब स्वास्थ्य ढ़ीलु हि रंदु।  मैंन ब्वलि, आप सुबेर सुबेर घुमण जया करा।  जोशी ज्यून बताई, गौला पार हल्दवानि मा सुबेर सुबेर बाग की भारी डौर रन्दि। मैंन ब्वलि, जोशी ज्यू मैं “उत्तराखण्डा बाग” शीर्षक सी एक लेख भेज्लु कुमगढ़ पत्रिका का सितम्बर-2018 का अंक मा प्रकाशनार्थ।   

     म्येरी कवि नजर मा 9 नवम्बर, 2000 कु उत्तराखण्ड राज्य बण्न फर उत्तराखण्डा बाग भौत ऊदास था।  बाग स्वचणा था अब उत्तराखण्ड कु यनु बिकास ह्वलु, जु हमारा उड्यार तक पौंछ्लु, तब हम कख रौला?

            उत्तराखण्ड जब बण्न लग्युं थौ,
                     भारी ह्वयिं थै डौर,
            बाग अपणा मन मा स्वचणा,
            छ्वडण पड़लु अब घौर।

     बिकास की बयार कतै नि बगि अर पलायन की धार जरुर लगि।  आज गौं का गौं बिना मनख्यौं का बंजेण लग्यां छन।  हम प्रवासी भौत फिकर करदौं पलायन की।  सभा, गोष्ठ्यौं मा पलायन फर भौत चर्चा ह्वदिं।  उत्तराखण्ड सरकारन पलायन आयोग भी बणैयालि।  बाग अब उत्तराखण्ड मा मनस्वाग बाग बणिक मनख्यौं तैं खाणा छन।  बाग की भारी डौर ह्वेगि, अब यकुलि कखि औणु जाणु भि खतरा सी खाली निछ।  उत्तराखण्डा बाग धैं बिल्क किलै कन्ना छन? म्येरी कवि नजर मा बाग इलै हम फर बिल्कणा छन।


     उत्तराखण्डा बाग बण्यां छन,
            आज द्येखा खौंबाग,
            मनख्यौं मारी मारी खाणा,
            ब्वन्न लग्यां छन जाग।

     सच मा स्वचा आज लठ्याळौं,
            क्या छ ऊंकू दोष,
            कर्म हमारा द्येखि द्येखि,
            औण लग्युं ऊं रोस।

     हम संस्कृति कु त्याग कन्ना,
            ब्वलणा निछौं अपणि भाषा,
            नौं का उत्तराखण्डी रैग्यौं,
            बाग तैं ह्वणि भैात निरासा।

 

          सरकार ब्वन्नि छ बाग बचावा अर हम ब्वन्ना छौं, हे नेतौ! उत्तराखण्ड तैं पलायन अर बाग सी बचावा। उत्तराखण्डा गौं मा जू मनखि गणति का रयां छन ऊ बाग सी भौत डरयां छन।  हम प्रवासी ह्वेक पलायन की मार सी मरयां छौं। एक दिन यनु आलु, उत्तराखण्डा बाग अर भैर का अयां मनखि वख रला अर उत्तराखण्डी गैब।  बाग तैं क्वी मतलब निछ, उत्तराखण्ड मा उत्तराखण्डी रौन या न रौन। बाग मनख्यौं फर बिल्कदा हिछन, तब्बित जिम कार्बेट कुमाऊं अर रुद्रप्रयाग का मनस्वाग बाग मान्न कु ऐ थौ। आज ऊंका नौं फर जिम कार्बेट पार्क बणैयुं छ, बागु की जनसंख्या बढ़ौण का खातिर।

 
     बाग त बाग होंदु पर मनखि भी बाग की तरौं होन्दन।  हम उत्तराखण्डी उत्तराखण्डा बिकास की आस करदौं पर हमारा बणैयां नेता बाग बणिक देरादूण मा मौज मनौणा छन।  उत्तराखण्ड ऊताणदंड होणु छ, बाग भी उत्तराखण्डा हाल द्येखिक रोणु छ।  योजना बाग बचौण की भी बणि छन।  बागा नौं फर भी धोळ फोळ होलु होणु।  हमारा उत्तराखण्डा कै मनखि कु नौं बाग सिंह थौ।  गौं की ब्वारि नौं बर्जदि थै, तब ऊ बाग तैं लुकण्यां ब्वल्दि थै।  आज या परंपरा भी बग्त का दगड़ा खत्म ह्वोणि छ। उत्तराखण्डा बाग तू जुगराजि रै अर हमारु उत्तराखण्ड भी।

 
       जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
       दर्द भरी दिल्ली प्रवास बिटि
       दूरभाष:9654972366
       दिनांक 25/9/2018         

jagmohan singh jayara

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दर्द भरी दिल्ली

भौत पैलि बिटि उत्तराखण्डी लोग पाड़ बिटि पलायन करिक दिल्ली मा रोजगार का खातिर औन्दा रैन।  पैलि परिवार गौं मा हि रंदा था अर दिल्ली बिटि गौं जाणु अर औणु लग्युं रंदु थौ।  पैलि संचार का साधन बिल्कुल नि था।  चिठ्ठी पत्तरी का माध्यम सी खूस खबर मिल्दि थै।  1990 का लगभग बिटि प्रवासी उत्तराखण्डी सपरिवार दिल्ली मा हि रण लग्यन। दिल्ली मा नौकरी कन्न वाळौं तैं गौं का लोग नौकर्याळ ब्वल्दा था।  नौकर्याळ जब गौं औन्दा त गौं का लोग ऊंकू खूब मान सम्मान करदा था अर नौकर्याळ भी।  नौकर्याळ जब छुट्टि खत्म ह्वोण फर दिल्ली औन्दा त गौं का लोग दूर तक अड़ेथण औन्दा था।

बग्त बदलि, नौकर्याळ दिल्ली मा बसण वाळि कच्ची कलोन्यौं मा पलौट ल्हीक जीवन बसर कन्न लग्यन।  यमुना पार भौत लोगुन पलौट लिन्यन अर बिना बिजली पाणी का तंगी मा दिन बितौण लग्यन।  जब बरखा ह्वन्दि त पाणी भरे जान्दु थौ।  यमुना पार रण वाळा बतौण मा शर्मान्दा था कि मैं यमुना पार रंदौ। तबरि दिल्ली मा गाड़ी मोटर भौत कम थै।  सैकिल सी भौत सी लोग औणु जाणु करदा था। भीड़ भाड़ तबरि कम हि थै। पाड़ की भौत खुद लगदि थै।  ये कारण सी मैं फर कवित्व जागि अर मैं गढ़वाळि कवि “जिज्ञासू” बणिग्यौं। 

12 मार्च, 1982 कु मैंन भी रोजगार का खातिर दिल्ली पलायन करि।  दिल्ली ऐक रोजगार की तलाश थै।  रोजगार मिलि अर रौण कु ठिकाणु पांडव नगर मा।  कुछ टैम बितण का बाद म्येरा गौं का नजिक का श्री अनंत राम नौटियाळ जिन विनोद नगर मा पलौट लिनि अर वख एक कच्चु कमरा बणाई। मैं वे कमरा फर यकुलि रण लग्यौं।   पलौटिंग की जगा फर पैलि बड़ु भारी तलौ थौ। जब जब भारी बरखा ह्वदिं त कमर कमर का पाणी मा लोग अपणा घर मा औन्दा था। बिजली की क्वी व्यवस्था नि थै अर हैंड पंप कु पाणी हि पेण कु एक साधन थौ।

आज दिल्ली मा गाड़ी मोटरु कु जाम भौत लग्दु।  ड्यूटी टैम फर पौंछणु संभव नि होन्दु।  बायोमैट्रिक हाजरी अब सरकारी औफिसु मा लग्दि छ।  कलोनी सी भैर अवा त जगा जगा टैक्टर अर पाणी का टैंकर जाम लगै देन्दन।  बस की जग्वाळ मा हि काफी टैम बिति जान्दु।  भीड़ भरी बस मिलि भि गि त जेब कतरा अब मोबैल कतरा बणिक पिछ्नै पड़्या रन्दन।  हर दिन बस मा मोबैल की चोरी आम बात छ।  दिल्ली मा अयां भैर का लोग बस मा अंट शंट ब्वल्दन अर लड़ै झगड़ा आम बात छ।

दिल्ली मा अब मोटर गाड़्यौं कु भौत धम्मद्याट छ।  कंदूड़ फूटि जान्दन हो हल्ला सी। तेज चन्न वाळि मोटर सैकल अर गाड़्यौं देखि भारी डौर लग्दि।  अपणा घौर ब्याखुनि बग्त जब तक नि पौंछ़्या भगवान हि मालिक छ।  दिल्ली मा उत्तराखण्ड दर्शन ह्वन्दन अर यनु लग्दु जन उत्तराखण्ड यखि छ।  बदरपुर, संगमविहार, यमुना पार जख भि जवा उत्तराखण्डी लोक जीवन की झलक यख दिखेन्दि छ। म्येरी एक गढ़वाळि कबिता छ “धन बे दिल्ली” जैंका अंश ये प्रकार सी छन।


उत्तराखण्ड की रौनक हर्चिगि, दिल्ली मा सदानि बग्वाळि,
घर घर जख्या कु तड़का लग्दु, बणौन्दा पकोड़ी स्वाळि।


पाड़ बिटि पलायन कन्न का बाद हमारु रिस्ता अजौं देवभूमि सी कायम छ।  जू पाड़ नि जान्दु ऊ मनखि हंत्या, द्येव्ता अर हंकार पूजण गौं जरुर जान्दु।  वंत अब यी काम दिल्ली मा भि ह्वे जान्दन।  म्येरी रचना कु एक अंश ये प्रकार सी छ।


             घड्याळा लगणा भूत पूजेणा, पित्र भि यखि थर्पेणा,
                               दिल्ली भारी स्वाणि लगणि, द्येव्ता भि यखि नचेणा।


      दिल्ली मा दर्द भौत छन, तौ भि जिंदगी की ठेलम ठेल मा लग्यां छन उत्तराखडी।  पाड़ की काखड़ि, मुंगरी, गोदड़ि, कोदु, झंगोरु भौत भलु लग्दु यख। नौकरी का जंजाळ मा फंसिक हम भौत कुछ ख्वन्दा छौं।  ब्वे बाब का अंतिम दरसन भि नि करि सक्दा। आज सुख सुविधा कु जामनु छ।  सब्बि लोग सुख सुविधा कु आनंद लेणा छन। सब अफुमा मस्त छन अर पैलि की तरौं मेल मुलाकात कु दौर अब निछ।  उत्तराखण्ड की बात अब यख खूब ह्वन्दि, कथ्गै संगठन बण्यां छन पर एक जुट्ट मुट्ट की बात कम छ। सबसि बड़ी विंडबना यछ, हमारु बिकास त ह्वेगि वथैं हमारु उत्तराखण्ड बंजेगि, संस्कृति हर्चिगि, ब्वोलि भाषा भि हर्चिणि छ, अग्लि पीढ़ी हमारी उत्तराखण्डी भाषा नि ब्वल्दि। उत्तराखण्ड लोकभाषा साहित्य मंच अर डी.पी.एम.आई. का सौजन्य सी बच्चौं की छुट्टि का दौरान पूरा राजधानी राष्ट्रीय क्षेत्र मा पिछला द्वी साल बिटि गढ़वाळि कुमाऊंनि क्लास लगणि छन।  छ्वट्टा नौंना नौंनी अपणा गौं कु नौं नि जाण्दा।  मैकु भि बच्चौं तैं गढ़वाळि भाषा सिखौण कु मौका मिलि।  जब उत्तराखण्ड परिचय बच्चौं तैं दिनि त ऊंका मन मा भौत जिज्ञासा कु संचार ह्वे।  कुछ बच्चौंन बताई हम्तैं अपणु गौं भौत प्यारु लग्दु।  वख जंगळ छन, नदी छन अर प्रकृति की सुंदरता भि।

 
कुछ ह्वन्दा खान्दा उत्तराखण्डी अपणा गौं मुल्क तैं बिल्कुल बिसरिग्यन।  जन जन हम संपन्न ह्वणा छौं, दर्द भरी दिल्ली तैं दिल सी अपनौणा छौं। कविमन की आस छ, एक न एक दिन हमारा उत्तराखण्ड कु भलु सी बिकास ह्वलु अर हमारा उत्तराखण्डी भै बंध दर्द भरी दिल्ली त्यागिक उत्तराखण्ड जाला।   

       दिल्ली मा दर्द भौत छन। बरखा ह्वे त परेशानी, प्रदूषण ह्वोन्दु त परेशानी, गर्मी हो त परेशानी, जाम यख भौत लग्दु या भि परेशानी। गुंडा, बदमाश, जेब कतरा यख कै लाख छन।  नेता भि यख सैडा देस बिटि चुनिक औन्दन समस्या दूर कन्न कु आश्वासन दीक,   पर समस्या जन्नि की तन्नि। ऊ चान्दा भि यु हिछन, जंता सदा परेशान रौ।  दर्द भरी दिल्ली मा जिंदगी बितौणु भी जिंदगी मा जीत छ।

 
-जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
  दर्द भरी दिल्ली बिटि।
  दिनांक 22/10/2019

Bhishma Kukreti

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 Review of Ek Yatharth Sacch:  Vidanku lekh kwi Ni Mitai Sakdu

: An inspirational Garhwali long story (novelette)
 (Chronological Critical Review of modern Garhwali fiction)
 (Let us celebrate 108 years of Modern Garhwali Fiction!)
(Reviewed a long fiction Created by Fiction Writer Bacchiram Baurai)
Literature Historian: Bhishma Kukreti
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 Bacchiram Baurai is a well-known Garhwali poet and a well-known teacher of the Beeronkhal region of Pauri Garhwal.
The present ‘Ek Yatharth Sacch: Vidanku lakh kwi Ni Mitai Sakdu a ‘Garhwali long fiction by Bacchiram Baurai is totally an inspirational long story.  There are sayings in each page.
 The story is about spoiled sons and a good son of a Thokdar ‘Krishna ji’. The aim of Baurai is to teach the young generation for going to a good path and leave the wrong path.
 Though the story is inspirational but Baurai used techniques to make it interesting, and not only children take interest the adult will also take an interest.
 Baurai used tens of sayings/proverbs in Hindi, Garhwali, and English to stress the aim that we should take the correct path and not to take wrong path.
The language is suitable for the young generation that is simple and speedy. There are twists in the story too for teaching purposes.
The dialects used by Baurai n the long story are of Beeronkhal (Pauri Garhwal) . The booklet or novelette is one of rare fiction where there are so many proverbs or sayings.
Story Book reviewed- Ek Yatharth Sacch:  Vidanku lekh kwi Ni Mitai Sakdu
Story Writer – Bacchiram Baurai
Year of publication- 2017
Published and printed by Bacchiram Baurai
Beeronkhal , Pauri Garhwal, UK
brbaurai@gmail.com 
 Copyright@ Bhishma Kukreti, 2021

 

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