Author Topic: Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें  (Read 181288 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
धगोली-थगोली
 
 धगोली धगोली थगोली थगोली
 मेर बोये तो कखक होली
 बिराण मुल्क बिराण बाटा
 बोये क्या होलो पर परबता
 धगोली धगोली थगोली ........
 
 आणी छे याद एक एक बाता
 वो पहाडा की राता वो कूड़ा वो बाटा
 घिर घिर  आणी वहाली बरसता
 अन्ख्युं मा छेगै बोये अंशुं की धार
 धगोली धगोली थगोली ........
 
 बोई याद आणु वो बालपन को दीण
 कभी स्कूला कभी सरीयुं कभी डालीयुं दीण
 कभी डगडीयुं कभी मैत्र कभी भै भैणु गीण
 हींशोला काफल कींगोडा छे हम टिप   
 धगोली धगोली थगोली ........
 
 कब हम बड़ा होयां कब ग्याई  बचपन छीन
 धयाडी कमाण वास्ता गढ़ भी छुट ग्याई
 मण मारी की बैठीं छुं सात समुद्र पार
 बोई कब आलो ओ दीण कब हम वाला साथ
 धगोली धगोली थगोली ........
 
 धगोली धगोली थगोली थगोली
 की बस अब रैगे इण साणी मा याद
 बोई बाबा दादा दादी ये मेर गढ़ देश
 ते थै च मयारू सत सत प्रणाम
 धगोली धगोली थगोली ........
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
 मेरा ब्लोग्स
 http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ विस्मीत स्थीती
 
 कोमलता हो या प्रखर 
 सेतु होआ जो निर्मित
 निर्मल रहे वह निरंतीत
 समानीत ओर रहे संतुलित
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 विहंग की उड़न से उछालीत       
 मत्स्य अब जल मै प्रवाहीत       
 तनिक विलम्ब पर लक्ष्य केद्रीत
 संसार स्वंयंम  संचार रचेयता 
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 रवि की किरणों से पखारीत
 चाँद की है चांदनी प्रमाणीत
 दिन की परिभाष अगणीत
 रात की मधुरता रहे अमिट
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 अलग पर संगघठीत
 विचारों की भाष से एकनिष्ट
 एकलव्य सा लक्ष्य छेदित
 अर्जुन से बिलकुल विपरीत
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 कोमलता हो या प्रखर 
 सेतु होआ जो निर्मित
 निर्मल रहे वह निरंतीत
 समानीत ओर रहे संतुलित
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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 मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
गुडा धेली गढ़
 
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 मीठी ना लगदी चा चीनी की
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 
 पहली भैली भैली पहली की
 म्यार देबता इष्ट देवों की
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 
 दूजी  भैली भैली दूजी की
 बोये भगवती माँ चरणु की
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 
 तीजी भैली भैली तीजी की
 बाबा केदार बद्री धमा की 
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 
 चोथी भैली भैली चोथी की
 संत देवों की स्थली देवभूमी की
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 
 पांचवी भैली भैली पांचवी की
 सफल सुफल रयां गढ़ नरेशा की   
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 मीठी ना लगदी चा चीनी की
 गुडा की धेली धेली गुडा की
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ बरखा

 
 ऐगै  भरमणत
 ऐगै झणमणत
 ऐगै  बरखा बरखा बरखा
 छणमणत   
 ऐगै  भरमणत
 ऐगै झणमणत भरमणत  ऐगै झणमणत.........२
 
 पहाड़ों मा छेगै
 ऐगै धडधडहट
 सरर र र बरखा की धार
 पुआडै सारी रात
 ऐगै झणमणत भरमणत  ऐगै झणमणत.........२
 
 कवि मण त्यांसु रहैगै प्यासु
 बरखा धार एक रेखा
 उजाड़ जीकोडी बाण हरीयालु
 गों  बाटा पुंगड़ डाणड़
 ऐगै झणमणत भरमणत  ऐगै झणमणत.........२
 
 बरखा की सैर
 घार घार गाम गाम
 बद्री केदारनाथ धाम
 ऊँचा ये कैलाश थान
 ऐगै झणमणत भरमणत  ऐगै झणमणत.........२
 
 ऐगै  भरमणत
 ऐगै झणमणत
 ऐगै  बरखा बरखा बरखा
 छणमणत   
 ऐगै  भरमणत
 ऐगै झणमणत भरमणत  ऐगै झणमणत.........२
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ


विस्मीत स्थीती
 
 कोमलता हो या प्रखर 
 सेतु होआ जो निर्मित
 निर्मल रहे वह निरंतीत
 समानीत ओर रहे संतुलित
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 विहंग की उड़न से उछालीत       
 मत्स्य अब जल मै प्रवाहीत       
 तनिक विलम्ब पर लक्ष्य केद्रीत
 संसार स्वंयंम  संचार रचेयता 
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 रवि की किरणों से पखारीत
 चाँद की है चांदनी प्रमाणीत
 दिन की परिभाष अगणीत
 रात की मधुरता रहे अमिट
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 अलग पर संगघठीत
 विचारों की भाष से एकनिष्ट
 एकलव्य सा लक्ष्य छेदित
 अर्जुन से बिलकुल विपरीत
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 कोमलता हो या प्रखर 
 सेतु होआ जो निर्मित
 निर्मल रहे वह निरंतीत
 समानीत ओर रहे संतुलित
 कोमलता हो या प्रखर  ........
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ

शब्दों का मह्जाल से घिरा हों
 
 शब्दों का मह्जाल से घिरा हों
 लेखनी से मै इस तरह जोड़ा हों
 आज तक नदी बन फिर रहा था
 आज जाके सागर से मिला हों   
 
 पतझड़ हो या सावन निर्झर हो या मधुबन
 बण बण फिर था रहा मेर मण प्रतीश्रण
 विकल ओर विफल ना सूझे कोई विकल्प
 कल्पतरु सा था मरुस्थल जहँ था जल विहल
 
 अनत अवरीत अचल था अटल वो छल बल 
 पल पल पग परिवर्तन के प्रवर्तित से पेरित
 अपने ही ग्रहण से गहारीत गमन से गाछीत
 वेदों से वंचिंत विरल विपरीत वर्णन से वरहित
 
 संकोचित समर्पण समधान से अपमानीत
 अवमानीत से ताडीत मन पटल पर पाडीत
 स्वछेद सरलीत सरल सम्पन सुखद समर्पण
 पलव से पालीत पुष्प से गुंदीत गुल से गुछित
 
 वेदना से वर्णीत विरोह मै विमोचन
 विशालकय विपरीत विरम से आछदित
 आकश मै अवरोहीत  भूमी मै संग्रहीत
 कल कल बहती नदी सागर मै हो विमोडीत
 
 शब्दों का मह्जाल से घिरा हों
 लेखनी से मै इस तरह जोड़ा हों
 आज तक नदी बन फिर रहा था
 आज जाके सागर से मिला हों   
 
 मेरी कविता समर्पण हेतु अवतरीत होयी है
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
ये गढ़वाल
 
 दादा दादी
 बैठ छन घार
 तिबारी दार
 सनघुला ताला
 माथा कूड़ा देखा
 देखा तुम ताल
 पूरा गढ़ देश का एक ही हाल
 पलायन काण लग्युं इन यान
 पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम
 
 बतवा मी थै दीख्वा इन गाम
 जख नी पुन्ह्न्छु ये शैतान ण
 गव्हाई दिला ये बाटा ये कूड़ा
 हकीकत बयां करला ये बोहज्याँ चुलह
 कबैर जल्दी छे इन मा भी आगा
 कंण फुटयूँ मेर इन भाग्य
 देवभूमी छुडी मी भी भागा 
 पलायन काण लग्युं इन यान
 पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम
 
 रीटा कूड़ा उजड़ा पडू ये  ड़णड़ 
 बंजा पड़ा पुंगडा सरयागढ़ धाम
 कमधणी नीच बस ध्याड़ी की बात
 कण के विपदा को उकल चढ़लू ये गढ़ धाम
 खैरी खैरी च यखा और सीयीं छ सरकार
 विचार गोष्टी कै की बस बाणगया बात
 शीलन्यास करै की  कम चलो होलो परबत
 इन मा दीण दिण चली गैनी  कब आलू ओ प्रभात
 पलायन  मुक्त होलू मेरु गढ़ धाम
 पलायन काण लग्युं इन यान
 पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम
 
 भैर भटैक आयां व्यापारी कामदी यख रुपया हजार
 यखा का नोजवान बुल्दी हमकोंण दुई चार
 उंदर बाट बाट जाकी जब णी बाणी माया बात
 वाख जाके तब आयी मेरी भांडी  याद
 चुना की रोटी ल्ह्शोंनै  की चटनी को स्वाद
 जेकोड़ी मा तब लगी दण मण बरसात 
 रहे रहे कीले वहाली याणी बात मेर गढ़ धाम
 छुडी जाण तुंम सात समुदर पार
 पलायन यो समस्या को नीच समधान
 विचार कर ये बात जब तुम जब छुडीला गढ़ताज 
 पलायन काण लग्युं इन यान
 पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम   
 
 दादा दादी
 बैठ छन घार
 तिबारी दार
 सनघुला ताला
 माथा कूड़ा देखा
 देखा तुम ताल
 पूरा गढ़ देश का एक ही हाल
 पलायन काण लग्युं इन यान
 पलायन पलायन बस ये गढ़ धाम
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ आज का व्यक्ती
 
 आज का व्यक्ती
 बाड़ा ही व्यथीत
 आपने विचारो से गृहीत
 सभी सेवाओं से है निर्वीत
 आज का .........
 
 समय नहीं है
 पर समय पर वीलम्बीत
 आगे बढ़ ने की चाह
 हर समय पीडीत
 आज का .........
 
 दो शब्द प्यार के
 दो मील चलकर याद आयें
 अपने पराये भीड़
 हर वकत अकेला पाये
 आज का .........
 
 साँस लेने की फुर्सत नहीं है
 सीगरेट खुब सुलगाये
 बीवी और बच्चों से ज्याद
 टी .वी अब इसे भाये
 आज का .........
 
 रेस लगी दुनीया मै
 सब के सब लगे हैं दुआड मै
 माया जब ठग जायेगी
 तो खड़ा होगा एक छोर मै
 आज का .........
 
 विस्मित विमोड़ की मुर्ती
 छुप रही है अब तेरी किर्ती
 वो मोड़ दुर नहीं इस अड़ मै
 जब बीक जयेगा बीच बाजार मै 
 आज का .........
 
 आज का व्यक्ती
 बाड़ा ही व्यथीत
 आपने विचारो से गृहीत
 सभी सेवाओं से है निर्वीत
 आज का .........
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
धगोली-थगोली
 
 धगोली धगोली थगोली थगोली
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 धगोली धगोली थगोली थगोली
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 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
लड़कपन प्रेम
 
 ये काया है
 बड़ी महामाया
 इसने लोभ जगाया
 इसने जग दिखया
 
 इस नगरी की
 डगर मनहोर
 रहता ना खुद पर जोर
 उस बिन दिल है बोर
 
 आशुं का उठाता शोर 
 नयनो बसा माखन चोर
 वर्षा गिरी अति घनघोर
 मुख कहै ओनस मोर
 
 दिन रात ना फर्क कोई
 आये गये  मोड़ कई
 माँ बाप सब छोड़ कंही
 बसाये दुनिया ओर कंही
 
 प्रेम और ये काया
 वासना की छाया
 इस गिरफ्त से ना मै
 ना तो भी बच पाया
 
 मानस जग हरा
 कलयुगी दुःख गहराया
 विलास और सुख मै
 अपनों का गम बिसरया
 
 वेदना है अब हर जगह
 तड़प और उस का पन
 प्रेम नहीं ये है लड़कपन
 मन फिरता अब बण बण
 
 ये काया है
 बड़ी महामाया
 इसने लोभ जगाया
 इसने जग दिखया
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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