Author Topic: Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें  (Read 239451 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 मी आजा   
 
मी आजा
फुलणी खिली णी खिली
ना खिली ये बागा ......२
ड़णड़ बाटा सी उजड़ी गैण
मयारू गढ़वाल सारु आजा ......२
घर घरा की बाता भुल्हो घर घरा की बाता ....२
पुरु गढ़ देश रीटा होंयूँ
झण क्या वहाई बाता ......२
कुकर बिरल रुअडी गैनी
कै कूल्हण वो लुकी आड़ा.....२
घर घरा की बाता भुल्हो घर घरा की बाता ....२
दाण आंखी रूणी च आज
कंण चल युं ये चक्रचाल.....२
बुलाण कुण ब्वारी घर च
जीकोड़ी सात समोदर पारा ......२
घर घरा की बाता भुल्हो घर घरा की बाता ....२
माया प्रीत मा ताण तण
बोल्या बाणु गढ़ देश आजा ....२
पाड़ी पाड़ी णी बोल्यां मी थै
मी छुं आज दूँण सम्रारट ...२
घर घरा की बाता भुल्हो घर घरा की बाता ....२
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मै उत्ताराखंड......
 
 अधर पटल पर खड़ा मै
 कर रहा विहंग विहल
 एक एक कौंद जाती दामनी सी
 मेरे अंतर पटल
 
 खोजों मै उन्हे हर पल
 जो गये मुझे छुडकर
 बीच धार नाता तुडकर
 अन्तकरण की पुकार
 पुकारती है बार बार
 
 अधर पटल पर खड़ा मै....
 कर रहा विहंग विहल
 एक एक कौंद जाती दामनी सी
 मेरे अंतर पटल
 
 तब मै बंधा होआ था
 अपने आप मै कशा था
 कैसे रुकता तुम्हे मै
 पग को कैसे अड़ता मै
 अधर पटल पर खड़ा मै....
 कर रहा विहंग विहल
 एक एक कौंद जाती दामनी सी
 मेरे अंतर पटल
 
 आज मैने संसा लिया
 खुली हवा ओडलिया
 अपने अंचल फैलाकर
 केई को अपनी और मूड लिया है
 
 अधर पटल पर खड़ा मै....
 कर रहा विहंग विहल
 एक एक कौंद जाती दामनी सी
 मेरे अंतर पटल
 
 
 अब तुम्हारी बारी है
 
 मै उत्तराखंड आप को बुला रहा हूँ कब आओगे ?

http://balkrishna-dhyani.blogspot.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 घुगुती तू केले होणी उदास   
घुगुती तू केले होणी उदास
 घुगुती तू केले होणी उदास म्यारा स्वामी च्या सात सामुद्र पर ..........ओंकी याद मा तू ना रोई सुध बुध आपणी ना खोयी घुगुती तू केले होणी उदास म्यारा स्वामी च्या सात सामुद्र पर ..........बरखा की रिघ लगी च्या आजकला कला बादल किले चिरडयानवाला आजम्यार असूं की तरह ये भी रोणा वाला आजा घुगुती तू केले होणी उदास म्यारा स्वामी च्या सात सामुद्र पर ..........प्रीत की तिष ना जण वालापरदेश जो जण वाला अपरी जी का छुडी कण के रहण वालाघुगुती तू केले होणी उदास म्यारा स्वामी च्या सात सामुद्र पर ....
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमी बद्री केदार नाथ 
 
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
गुमसुम
 
 गुमसुम कीले बैठी होली वा
 यकुली कीले लगी वहाली वा
 नाराज कीले वहली मेर लटुँली घटुली
 लगी वींकी मी थै बडुली
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 रूसे कै बाण रुसली मेरी
 ते दगडी जुडी जीकोडी मेरी
 बाटा हेर मेर मेरी बेटुली मेरी
 लाऊँलू पात्त भरी की जिलेबी तिथै
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 कर ले बबा बोई दगडी बात
 त्यारू और बोई क्या वहली बात
 देख तिथै मी हुग्युं उदास
 क्या करण मी सात समुद्रर पार 
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 खेल ले छुछी भै भैनो साथ
 आनो वहलो अब छुट्टी मी   
 फिर जमलो तेरु मेरु साथ
 तब तक मेर थागुली बात ले मेर बात
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 गुमसुम कीले बैठी होली वा
 यकुली कीले लगी वहाली वा
 नाराज कीले वहली मेर लटुँली घटुली
 लगी वींकी मी थै बडुली
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
पादुका
 
 चलो आजा हम
 पादुका से रूबरू हों जायें
 रहते हैं जो कदमो मै
 आज उन्हे सर पै बिठाये
 
 दो की जोड़ी रहती साथ
 उन से हम कुछ सीख जाये आज
 कम कम से मंजील तक
 अब हम अपनों का साथ दे जायें
 
 चलो आजा हम
 पादुका से रूबरू हों जायें ........
 
 रहते हैं दहलीज पर
 पार नहीं करते कभी हद
 मर्याद का पाठ पड़ते
 वो जोड़ी पादुका की हर वक़त 
 
 चलो आजा हम
 पादुका से रूबरू हों जायें ........
 
 कथा मुझे वो याद आये
 भाई-प्रेम प्रेम ने आंखें छालकाये
 श्री राम के सिहासन विराज
 १४ बरस प्रभु चरण फिर पाये
 
 चलो आजा हम
 पादुका से रूबरू हों जायें ........
 
 हीन भावना से सब देखते
 अपने मन को मलिन खुद करते
 जब पग से मै विहीन हो जाओंगा
 तब जाकर तुम्हे याद आऊँगा   
 
 चलो आजा हम
 पादुका से रूबरू हों जायें ........
 
 चलो आजा हम
 पादुका से रूबरू हों जायें
 रहते हैं जो कदमो मै
 आज उन्हे सर पै बिठाये
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
तेरे पीछे पीछे
 
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा
 जीन्दगी तुझसे दूर कैसे रह पाऊँगा
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा
 
 उदास ही सही तु साथ है
 सुख ना सही गम तु पास है
 इस मे भी मै गुनगुनाऊँगा
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा
 
 आँखों से ना देख पाऊँगा
 हाथों से ना तुझे  छु पाऊँगा
 आँसुं को हरदम बहाओंगा
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा
 
 ऊषा की किरण चमकली
 रात की गल्यारी वो अंधेरी
 तेरी मुरत को भी उसमे पाऊँगा
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा
 
 अंत वकत जब अयेगा
 शरीर छुड आत्मा के साथ उड़ जाऊँगा
 एक नया रूप लेकर फिर भी आऊँगा
 तुझे छुडकर जीन्दगी कंहा जाऊँगा 
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा 
 
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा
 जीन्दगी तुझसे दूर कैसे रहा पाऊँगा
 तेरे पीछे पीछे चला आऊँगा
 
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
सास बोई बेटी ब्वारी
 
 कण बिगरैली कण बिगरैली
 मुखडी स्वाणी माता कण बिगरैली
 सास बोई बेटी ब्वारी मेर पहाड़ की
 कण बैठ्याँछन भ्ग्यांन मेर पहाड़ की
 
 लगी दूर दूर तक रांग मेर पहाडा मा
 भगवती तेरु पैलू मान मेर पहाड़ मा
 तेरु चरणु मा नतमस्तक ये संसार मेर पहाड़ मा
 ये मुखी भी अब लगाणी जयकार मेर पहाड़ मा
 
 सास बोई बेटी ब्वारी मेर पहाड़ की
 कण बैठ्याँछन भ्ग्यांन मेर पहाड़ की
 
 खैरी विपदा को गढ़ मेरु गढ़ धाम मा
 भगवती कर दे तेरु उपकार  मेरु गढ़ धाम मा
 तेरु दया आगाध छात्र छ्या मेरु गढ़ धाम मा
 कैलाश छुडी की नंदा माँ ऐ मैत मेरु गढ़ धाम मा
 
 सास बोई बेटी ब्वारी मेर पहाड़ की
 कण बैठ्याँछन भ्ग्यांन मेर पहाड़ की
 
 तू सदणी रै मेरु दगडी दगडी मेरु गढ़ धाम मा
 कभी बणीकी बोई कभी बावरी  कभी बेटी  मेरु गढ़ धाम मा
 मील णी पीछण पायी बोई तेरु ये चमत्कार मेरु गढ़ धाम मा
 कर दे ये मुर्ख को उधार मेरु गढ़ धाम मा
 
 सास बोई बेटी ब्वारी मेर पहाड़ की
 कण बैठ्याँछन भ्ग्यांन मेर पहाड़ की
 
 कण बिगरैली कण बिगरैली
 मुखडी स्वाणी माता कण बिगरैली
 सास बोई बेटी ब्वारी मेर पहाड़ की
 कण बैठ्याँछन भ्ग्यांन मेर पहाड़ की
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
बिबेक ना खोंयाँ भैजी मेरा
 
 बदली बदली णी बदली हम
 विस्की रम णी नीकलु अब हमरु दम
 कथा च या पूराणी गाथा गढ़ा की
 वोट दगडी नोट च साथ कच्बोली पडी काम
 
 गम गम घुमाण लाग्यां
 सत्ता का अब सब ठेखदार
 कमल हाथ दगडी दगडी
 हाथी सायकल पर सवार
 
 बदली बदली णी बदली हम
 विस्की रम णी नीकलु अब हमरु दम
 
 करण कुण गढ़ को व्यापार
 स्वार्थ गंध की इन मा च  भरमार
 जनता केले बाणणी लाचार
 फिर लेणी कीले पाँच बरसा को आजर
 
 कथा च या पूराणी गाथा गढ़ा की
 वोट दगडी नोट च साथ कच्बोली पडी काम
 
 जर समझी लीवन दाद भुल्हों
 दांण बारडा साणयां बढ़यूँ 
 दोई दीण की नीच बारात
 ये मेर दीदी भूली यूँ खैरी की च बात
 
 बदली बदली णी बदली हम
 विस्की रम णी नीकलु अब हमरु दम
 
 तुम्हारो हाथ मा च गढ़ को हाथ
 विचार कर जर फिर बोला आपडी बात
 टक लगा की देश सुणनोच आज
 क्या गढ़वाल करलू नयी शुरवात 
 
 कथा च या पूराणी गाथा गढ़ा की
 वोट दगडी नोट च साथ कच्बोली पडी काम
 
 बदली बदली णी बदली हम
 विस्की रम णी नीकलु अब हमरु दम
 कथा च या पूराणी गाथा गढ़ा की
 वोट दगडी नोट च साथ कच्बोली पडी काम
 
 उत्तराखंड विधान सभा चुनवा ३० जनवरी २०१२
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
गुमसुम
 
 गुमसुम कीले बैठी होली वा
 यकुली कीले लगी वहाली वा
 नाराज कीले वहली मेर लटुँली घटुली
 लगी वींकी मी थै बडुली
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 रूसे कै बाण रुसली मेरी
 ते दगडी जुडी जीकोडी मेरी
 बाटा हेर मेर मेरी बेटुली मेरी
 लाऊँलू पात्त भरी की जिलेबी तिथै
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 कर ले बबा बोई दगडी बात
 त्यारू और बोई क्या वहली बात
 देख तिथै मी हुग्युं उदास
 क्या करण मी सात समुद्रर पार 
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 खेल ले छुछी भै भैनो साथ
 आनो वहलो अब छुट्टी मी   
 फिर जमलो तेरु मेरु साथ
 तब तक मेर थागुली बात ले मेर बात
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
 गुमसुम कीले बैठी होली वा
 यकुली कीले लगी वहाली वा
 नाराज कीले वहली मेर लटुँली घटुली
 लगी वींकी मी थै बडुली
 ये मेर छकुली ये मेर ध्गुली  ....२
 
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