Author Topic: Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें  (Read 230242 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
गेल्या मेरा.

 सुख दुःख

 सैलयामेरा
 बिता दिणु का
 छेल्या  मेरा
 गेल्या मेरा......२

 रूठी गीयुं मी

 छुडी गयुंमी
 मेरु गढ़ धाम
 तू णा रूठी मेसै
 मेरु घनश्याम
 गेल्या मेरा......२

 गुरु बल्दों

 हाकद हाकद 
 निकुल घाम
 बांसुरी की ताण सुणी
 तब मिल आराम
 गेल्या मेरा......२

 आज कल मा

 तेरु मेरु छुटु साथ
 याद आंणदी वा
 आधी आपुरी बात
 गद्न्युँ रुल्याँ का साथ 
 गेल्या मेरा......२

 ग्याई यणी रात ण

 णा गायाई याणी प्रभात
 जब मेरु गेल्या तु णा आयी या
 ये मेरा उतराखंड गेल्या
 कर दे मी थै माफ़
 गेल्या मेरा......२

 बालकृष्ण डी ध्यानी

 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
यादों की चादर
 
 यादों की चादर ओढ़ा लो मै आजा
 आँख की कोर से उसे छेड़ लों आज
 तनहाई से मेरी दिलरुबाई है आज
 मातम ने दूर बजाई शहनाई है आज
 
 दिल की दीवार ने लिखा तेर नाम
 उसने कीया तुझे सरेआम बदनाम
 बीच राह तुडकर कर दे उसे इनाम   
 वफा भी बेवफाई का अब लेगी इल्जाम
 यादों की चादर ओढ़ा लो मै आजा
 
 वीरने मै एक लाशा जल रही है
 गीली लकडीयां भी आज सुलगरही है
 गम गीन मौसम भी अब साथ साथ है
 लपटों मै उड़ रही वो बीती यादों की राख है
 यादों की चादर ओढ़ा लो मै आजा
 
 पञ्च तत्त्व मै मिलकर ना करारआया
 प्राण पखेरू को तब भी ना आराम आया
 कागा बनकर घर की खिड़की मै आज भी
 हमदम ये दिल करे तेरा ही पुकार
 यादों की चादर ओढ़ा लो मै आजा
 
 यादों की चादर ओढ़ा लो मै आजा
 आँख की कोर से उसे छेड़ लों आज
 तनहाई से मेरी दिलरुबाई है आज
 मातम ने दूर बजाई शहनाई है आज
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
दर मंदर
 
 दर मंदर आ आ छुटण लाग्यां
 माटा का कुअडा अब तुटण  लाग्यां
 कोई अब कै कुआण ना रहाई
 भाई बंद अब सारा कै कुहलाण लुकी गैण
 दर मंदर आ आ छुटण लाग्यां .......२
 
 मया ण अब खेल खेल्याई
 मयारू गढ़ देश भी अछुतु णी रहाई
 स्वार्थ अहंकार घर कै गयाई
 अतिथी को गलसा दूध लुकी गयाई
 छानी लैंदु गुआड़ अब छुटण लाग्यां .......२
 
 लेंटर कुअडा अब गढ़ मा तणन पड्यां
 गौं गौं अब रीटा होणा लाग्यां
 संघलूं ओर कपाली पर ताला पड्यां
 जीकोडी उकली उन्दरुआ का बाटा लाग्यां
 बेटा बावरी नाती नातणी अब छुटण लाग्यां .......२
 
 दर मंदर आ आ छुटण लाग्यां
 माटा का कुअडा अब तुटण  लाग्यां
 कोई अब कै कुआण ना रहाई
 भाई बंद अब सारा कै कुहलाण लुकी गैण
 दर मंदर आ आ छुटण लाग्यां .......२
 
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
रजुँल

 रजुँल जो रुसवा होवा

 ईबादतगाह तबाह होवा

 रोशनी नुरे मोहब्बत की

 लिफाये कब्र के गार होवा

 वफ़ाये वादीयाँ तरनुम सी

 बेवफाई बेवक़त शुमार होवा

 वादाये वादा खिलाफी दर से

 बीच बाजार  वो नीलाम होवा

 तनहाई दिलये फुर्सत की

 विरानो मै अब आबाद होवा 

 खामोशी ही खामोशी थी यंहा
   
 अब मेरा वंहा आगाज होवा 

 टुटा ये दर्पण के फरश पर

 नाकाम इश्क का ये अंजाम होवा

 रजुँल जो रुसवा होवा

 ईबादतगाह तबाह होवा

 बालकृष्ण डी ध्यानी

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
गढ़ महन
 
 गढ़ मा गढ़ महन
 उतराखंड देवभूमी को मान
 जय गढ़ नरेश जय गढ़ भगवान
 जय बद्री जय केदारनाथ
 गढ़ मा गढ़ महन
 
 जगी जवां खोली का गणेशा  ये
 जगी जावा मोरा का नरैण ये
 अल छल पल  छल ये गढ़ धाम
 चमकण रै तेरु ये ऊँचा हिमाल
 गढ़ मा गढ़ महन
 
 माँ भगवती को माँड़ण
 नन्दा माँ को यख जात
 चों तरफा छायु तेरु एक छत्र छल 
 बगती जा माँ गंगा ये गढ़ द्वार
 गढ़ मा गढ़ महन
 
 कैलाशा बैठा मेरा शम्भुनाथ
 बद्री डाला का छाला बद्री विशाला
 तेरु ये गाथा गूंजेये गढ़ गढ़ धाम
 साधु संतों की नगरी ये पावन गढ़वाल
 गढ़ मा गढ़ महन
 
 गढ़ मा गढ़ महन
 उतराखंड देवभूमी को मान
 जय गढ़ नरेश जय गढ़ भगवान
 जय बद्री जय केदारनाथ
 गढ़ मा गढ़ महन
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
मण स्थीती
   
 धणडू पड़युंच डाणडीयुं मा
 कोयेडी छायी अन्खोंयुं मा
 बारमासा बार दिण गैण
 फिर स्वामी बोउडी णी येण 
 
 धणडू पड़युंच डाणडीयुं मा.........
 
 बरखा लगी च मनख्यूं मा
 दणमण रुण छन जीकोड़ी मा
 माया प्रीती की सौत व्हैगे   
 सुओण मैण मा रात व्हैगे   
 
 धणडू पड़युंच डाणडीयुं मा.........
 
 बसंत मा फुल्यार आयी
 कण मोल्यार आयी
 चखल जण भुर उड़याँ
 आकाश सारु रीट होयां
 
 धणडू पड़युंच डाणडीयुं मा.........
 
 घामा ही घाम च गढ़ धाम
 दुई घड़ी छेलुमा णा आराम
 पंतेदर मा मची अब तिस
 उजाड़ पुंगड़ पाटों मा पीस 
 
 धणडू पड़युंच डाणडीयुं मा.........
 
 धणडू पड़युंच डाणडीयुं मा
 कोयेडी छायी अन्खोंयुं मा
 बारमासा बार दिण गैण
 फिर स्वामी बोउडी णी येण 
 
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
रैबार
 
 घुघूती उड़ उडेकी
 कखक भाटे ऐ तू परदेश
 आपरा गढ़ देश छुडीकी
 कीले छे तु उदास क्या वहाली बात
 क्या लायुंच रैबार मेरा घरबारै की 
 रैबार दै जा घुघुती पहाड़ की.........
 
 कंण छीण देश अपरू कण छीण ड़णडा काठी
 उकाला बाटा अब भी हीठण छीन क्या
 घस्यारी गीतोंण वहाली गूंजती ड़णडी 
 गवलो गूअर हक़ण बजाण  वहली घंडी
 रैबार दै जा घुघुती पहाड़ की.........
 
 काफल कीन्गोड़ पक्याँ व्हाला
 बोरंस प्योंली खिल्यां व्हाला
 गद्न्युं का छाला हीशोंला टीप्यां वाहला
 वख मयारू खुटु का छाप छपयाँ वाहला
 रैबार दै जा घुघुती पहाड़ की.........
 
 गामा का बात बता ये घुघूती पहाड़ की
 घ्यापोलू बाराड क्या हाल  छीण
 मित्र -दागडया का क्या रैबार छीण
 बाब बोई को लाई आशीर्वाद छीण
 रैबार दै जा घुघुती पहाड़ की.........
 
 देख्णु दै तेरे अन्ख्युं मा ये घुघूती पहाड़ की
 मेर सोंजडया की मुखडी देखीगै
 ओ लगान्दी मै दगडी माया ये घुघूती
 ये निर्दयी अन्ख्युमा मेर आसुं केले भुरी गै
 रैबार दै जा घुघुती पहाड़ की.........
 
 घुघूती उड़ उडेकी
 चल उड़ जा आपरा गढ़देश
 आपरा देश छुडी कीणी रैंदु ये परदेश
 मेरु ऐ रैबार दे दै मेरा देश
 तु अगणे अगणे जा मी पीछणे आन्दु
 मेरा रैबार मेरा गढ़वाल थै सुणा
 ये  घुघुती मेर पहाड़ की
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
गैरसैण तिल कब राजधानी बाणण ?
 
 गैर गैर ग़ैरु व्हैगे
 दूँण अब  सैरु व्हैगे
 
 छेलु का गढ़ गैरु व्हैगे
 पुंगडीयुं मा अब डैरू व्हैगे
 
 रीटा डंडा केले रीटा भांडा केले
 उकाला का बाट मा अब कंडा केले 
 
 गढ़देश को मन केले रुश गै
 उन्दरून का जीकोडी दूँण बसगै
 
 सैण मा सब केले हर्चीगै
 देहरा मा केले राज  बसगै   
 
 क्रांती की मशाल बली फिर  बुझीगै 
 क्रांतीकरीयुं का स्वपण बल  कखक छुटगै 
 
 गैर गैर ग़ैरु व्हैगे
 दूँण अब  सैरु व्हैगे
 
 सीयीं सरकार थै जगण हमल
 क्रांती मशाल फिर बालण हमल 
 
 एक दुई सब गढ़ जगीगै 
 गैरसैण फिर अब  मुद्दा बाणीगै 
 
 हाथ की उंगल अब मुठी  बाणगै  ग
 गढ़देश गैरसैण राजधानी बनगै
 
 गैर गैर गैर  सैण  अब  गढ़  को  छेलु व्हैगे
 दूँण बल अब गैरु व्हैगे 
 क्या ईणी वहलो भूलह ?
 
 गैर गैर ग़ैरु व्हैगे
 दूँण अब  सैरु व्हैगे
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ

करहता पह्ड़ा
 
 नशा ऐसा छाया पहाड़ नजर ना आया
 कितने दिनों बाद इन्हे हम पर प्यार आया
 
 जाने क्या बात होयी जाने कंहा प्रभात होयी
 दूँण नरेणा की गढ़देश कैसे बारात आयी 
 
 करहता पह्ड़ा खैरी विपदा से घायल
 मरहम पट्टी के साथ साथ दुरु,गड्डी भी साथ आयी
 
 बेटी ब्वारी की चिंता मै देखो कैसे बाड़ आयी
 मतदातों को रिझाने के लिये ही ये बहार आयी
 
 टूटी सड़कें बयाँ करती पहाड़ का दर्द
 रुती आंखें रुलाती यंह हर बे-वकत
 
 फरक किसे पड़ता है यंहा अब
 दो पल झुमने की वो सौगात आयी
 
 ग्य्यार वर्ष का गम भूल कैसे जायें हम
 उनके छलावे मै इस बार भी क्या ठगा जाये हम ?
 
 क्रांतीकरीयुं सहादत तुम्हे पुकारती है
 उत्तरखंड तुझसे गढ़ की राजधानी मांगती है
 
 गढ़ की ये माटी तुम्हे याद दिलाती है
 खुन की रंगोली क्या तुम्हे याद नहीं आती है
 
 कब तक सोया रहेगा तो कब जागेगा
 अपनों से कब तक ये दिल धोखा खायेगा
 
 नशा ऐसा छाया पहाड़ नजर ना आया
 कितने दिनों बाद इन्हे हम पर प्यार आया
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
शादी की सालगिरह
 
 आज रिश्ता बंधा मेरा
 सर सैरा सजा मेरा
 अपनों छुड आयी वो
 मुझे बुहत भायी वो
 
 दोस्तों मेरी लुगाई वो
 सात फेरे बाद आयी वो
 जीवन से कदम मिलने
 सात वचनों को लायी वो
 
 दुःख सुख की साथी वो
 मै दिया तो वो बत्ती वो
 खुशीयुं की बाहर लायी वो
 जीवन ने ली अंगडाई  वो 
 
 सुखी मेरा परिवार
 जैसी हम दो हमारे दो
 २००० मै  थी शादी
 मकरसक्रांत बेल वो
 
 इतने वर्षों के बाद जैसे
 कल ही शादी होई वो
 मेरी अर्धांगीनी मेरी पत्नी
 तुम्हे भी बहुँत बधाई वो
 
 आज रिश्ता बंधा मेरा
 सर सैरा सजा मेरा
 अपनों छुड आयी वो
 मुझे बुहत भायी वो
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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