Author Topic: Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें  (Read 168162 times)

devbhumi

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मेरी कविताओं

मेरी कविताओं
चलो एक वादा कर लो
जब तन्हा हूँ अकेला हूँ
तुम आकर मुझ से मिल लो

मुझ से बहुत दूर जा रही
अपनी उन निगाहूँ से जरा कह दो
मैने आंखें बंद करली है
तुम आकर मुझ से मिल लो

तुम से बहुत सी बातें करनी है
अकेले में बैठे मुलाकातें करनी है
अनकही कितनी बातें बतानी है
तुम आकर मुझ से मिल लो

मेरे अहसासों आओ जागो जरा
मेरे यथार्थ से आकर मुझसे खेलो जरा
अभिव्यक्ति तब संपूर्ण होगी जब
तुम आकर मुझ से मिल लो

भोली भाली सी है वो खूब सूरत है
दुनिया उसे देख कर खूब हैरत है
रंगत उसकी और खूब रंगीन होगी जब
तुम आकर मुझ से मिल लो

मेरी कविताओं .....

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बस पता पूछ ने की देर थी
वैसे तो सब पता था मुझे
अपने को छिपा रखा कुछ ऐसे
शब्दों ने जिस तरह मुझे लिखा

ध्यानी बस महसूस होता है

devbhumi

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पन्नों को पलट ते वक्ता जब भी तेरा ख्याल आया
सिरहाने को बगल में दबा तेरे ख्यालों में खो गया

ध्यानी ना समझ

devbhumi

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वो ही हिस्सा मेरा

अपना दर्दे छुपाऊँ कैसे
बोलो तुम मैं मुस्कुराओं कैसे

हर अपना अपने में गुम है
इन मे अपनों को ढूंढू कैसे

मुश्किलों से मैं हरदम भागा
दुनिया का मैं अकेला अभागा

जलते दिप बुझ गये हैं सारे
कल तक जहां बसेरा था मेरा

शेष नहीं वहां बचा है कोई
राख का ढेर वो ही हिस्सा मेरा

अपना दर्दे छुपाऊँ कैसे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बस महसूस हुआ

पहले मैंने बस हंसना सीखा
मुझे रोना ना आया

बाद मैंने बस रोना सीखा
मुझे हंसना ना आया

तब मैंने दोनों ना सीखा
मुझे जीना ना आया

अब मैंने दोनों सीख लिया
मै जीना सीख लिया

संभल कर कैसे रख दूँ
इसलिए लिख दिया तुम्हे

बहुत खोकर पाया तुम्हे
अब खोना नहीं है तुम्हे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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इच्छाएं एक पूरी होते होते ही अनेकों क्यों जाग्रत हो जाती हैं
ना जाने क्यों ?
कोई बता सके की वो पूर्ण रूप से तृप्त कब होती हैं
बस इंसान है की उन्हें पाने को स्वंय सारी उम्र तड़पता रहता है
फिर भी वो रिक्त ही रह जाती है
... ध्यानी

devbhumi

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हम खो गए है

हम खो गए है
किसे ढूंढते ढूंढते
हर दरवाजे पर
पता पूछते पूछते

क्यों रो दिए ?
क्या खो दिये ?
इस भीड़ में
गुम से हो गए

बढ़ती उम्मीदों
दबा सा दिया
दिए की लौ सा
तड़पा सा दिया

खामोश अब
हम हो गए
बैठ अकेले अकेले
ऐ सब सोच गए

हम खो गए है

बालकृष्ण डी ध्यानी
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तेरी मेरी बात हुई है

तेरी मेरी बात हुई है
आंखों से बरसात हुई है
(बड़े दिनों  बाद) ... २
तेरी मेरी मुलाकत  हुई है

खुश हुई है ,उछल पड़ी है
दौड लगा कर वो मुझ से मिली है
रूठी हुई थी  बिछड़ी हुई थी
वो ख़ुशी खुश होकर मुझ से मिली है

तेरी मेरी ऐसी शुरुवात हुई है
एहसासों की फिर बरसात हुई है
(बड़े दिनों बाद) ... २
तेरी मेरी मुलाकत  हुई है

छाता मैं खोलों या भीग मैं  जाऊं
कैसे जतलाऊँ  कैसे उनको बताऊँ
देख तुम्हे आंखें  खुली रह गई है
चुप के नजरें नजरों से बयाँ कर गई है

तेरी मेरी बात हुई है  .... ३

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कभी लगता है ऐसे

कभी लगता है ऐसे
कोई ढूंढे मुझे भी
पढ़कर कभी कोई
(कोई खोजे मुझे भी )... २
(कभी लगता है ऐसे ) ... २

बिखरा पड़ा हूँ
 उलझा पड़ा हूँ
राहों में अकेला
पन्नों जैसा  उड़ता पड़ा हूँ
(कभी आये कोई तो )... २
(कभी लगता है ऐसे  ) ... २

मेरा ही घर है
मुझ से जुदा है
मेरा ही वजूद है .
खुद रूठा पड़ा है 
(कभी कोई मनाये कभी  तो )... २
(कभी लगता है ऐसे  ) ... २

थोड़ी फुर्सत तो दे दो
थोड़ा कुछ और वक्त  दे दो
गिनता पड़ा हूँ
इन्तजार बैठा पड़ा हूँ
(कभी कोई आस दिलाये  कभी  तो )... २
(कभी लगता है ऐसे  ) ... २

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरे गाँव में बर्फ गिरी है

मेरे गाँव में बर्फ गिरी है
सफेद चादर धरती पर बिछी है

उच्च हिमालयी क्षेत्र  है मेरा
बुरा असर है वो हर ओर बिछी है

धूप-छांव का खेल  है जीवन
बूंदाबांदी और वो पल बदल रही है

करवट लेता हूँ वो अकड़ रही है
दायरे को और मेरे अब सिमटा रही है

दूर से वो बहुत खूबसूरत लग रही है
मिलते ही वो मुझ से बिछड़ रही है

लकदक  हुए वो मेरे देखे सारे सपने
मेरे कारोबार की तरह वो भी ठिठोर रहे हैं

जलती चिमनी का बस अब सहार है 
उजाड़ा है बस मेरा एक ही बचा वो आशियान है 

मेरे गाँव में बर्फ गिरी है
फिर  भी माँ मेरी दिन रात कामों में लगी है

बालकृष्ण डी ध्यानी
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