Author Topic: Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें  (Read 168161 times)

devbhumi

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तुम्ही  से प्यार है 

तुम्ही  से प्यार है  ... ३
कैसे कह दूँ
ये दिल  तुम्ही पे निसार है
तुम्ही  से प्यार है  ... ३

तुम्ही से  मेरी दुनिया
तुम्ही मेरी दुनिया
तुम्ही से शुरू
तुम्ही पे खत्म  है
तुम्ही  से प्यार है  ... ३

देखो कितना  प्यार है  ... ३
हम जानते नहीं
तुम्ही  से  ही आंखें चार है 
तुम्ही  से प्यार है  ... ३

हम से प्यार
करने लगोगे जब तुम
हमे उसका (इन्तजार है)  .... २ 
क्योंकि हमें
तुम्ही  से प्यार है  ... ३

बालकृष्ण डी ध्यानी
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किसने हमे याद किया

किसने हमे याद किया
कोई हमे क्यों भूल गया
जिस ने चाह जैसे  हमे
वैसे ही उसने कबुल किया

ऐसी कोई बात नहीं
हम में तुम में कहीं पे छुपी
जो ले ले हम से यूँ ही
बिना पूछे ही कोई सही

किसने सम्मान दिया
किसने अवमान किया 
इन बातों में क्यों पड़ना हमे
अकेले ही जब सफर कटना

ना ऐसे तुम अपने से रूठो
ना किसी पर ऐसे तुम बरसो
क्यों छूट जाता है ये सयम
जो संभले रखा तुमने अब तक

किसने कुछ कह दिया
कोई कुछ कह के चला गया
तुम ले बैठे हो उसी बात को
छोड़ो ऐसे  ना उस पर इतराज करो

जियो जिंदगी जी भर के
रोज नए रंग नए उमंग भर के
क्यों करते हो गुरुर इस पल का
ना तेरा था कभी ,ना किसी का हुआ

किसने हमे याद किया

बालकृष्ण डी ध्यानी
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हम तुम से मिले

हम तुम से मिले
जब कोई अपना था
कोई देख लेना हमे
ये डर लगा रहता था

यूँ ही अकेले  हम दोनों 
कई सपने हम संजोते थे
ले हातों में हातों को
कई मीलों तक चलते थे

अब भी हैं वो हम में
गुमसुम सा मासूम सा
खोया खोया सा 
सोया सा हम में  कंही 

चलो छूट ने से पहले
ये वक्त गुजरने से पहले
पकड़लो वही हाता मेरा
फिर उसी रास्ते में निकलें

हम तुम से मिले  .....

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरे बगल में

जब आप मेरे बगल में चलते हो
तब सब चलता रहा है मेरा अपने आप
ये करिश्मा था की आप थे साथ मेरे
लेकर मेरा हात साथ अपने हातों में
जब आप मेरे बगल में चलते हो

अर्धनिद्रित अवस्था  में भी तुम
ना जाने कैसे मुझे देख मुस्कुरा जाती हो
उस घड़ी का सदा इन्तजार रहता है मुझे
जब थका मैं शाम तुम दरवाजा आ खुलती हो
जब आप मेरे लिए दरवाजा खुलती हो

मुझे जोड़  रखा तेरे विश्वास ने तुम संग ऐसा
जब तुम अपने हातों से मेरा हात पकड़ती हो
मुझे यकीन था  कि मैं सबकुछ खो बैठता , पर अब
निश्चित हूँ मैं जब से दिया अपना हात मैंने  तेर हातों में
तुम बेफिक्री में भी अपने से उसे छूटने नहीं देती हो 

मेरे बगल में यूँ ही चलती चलो तुम सदा यूँ ही
निरंतर बढ़ता रहे  हम दोनों का ये प्रवाह यूँ ही
मुस्कराती हुई स्नेह जताती हुयी उम्रभर यूँ ही
हक  अपना जतना ना भूलना तुम मुझ पर यूँ ही
लौटा आऊंगा थका हारा हर शाम मैं घर यूँ ही

बालकृष्ण डी ध्यानी
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अपने गाँव की ओर

चलो चलें फिर अपने गाँव की ओर
नहीं लगता,नहीं लगता,नहीं लगता
मन अब इस  ओर .......  चलो चलें

हसीन वादियों में
खुशगवार नजारों में
पहाड़ पर बर्फ  बिछी होगी
चांदी ही चांदी हर तरफ बिखरी होगी
.......  चलो चलें
फिर अपने गाँव की ओर
नहीं लगता
मन अब इस  ओर .......  चलो चलें

रौनक जँहा लगी होगी
मौसम अपने पुरे मिजाज में होगा
जंहा कोई आतुर खड़ा होगा अब भी मेरे लिये
ओतप्रोत से मुझे गले लगाने के लिए
.......  चलो चलें
फिर अपने गाँव की ओर
नहीं लगता
मन अब इस  ओर .......  चलो चलें

प्रकृति जंहा अपने बहार में होगी
नित नये  सृंगार  में होगी
चलो वंहा अपनी तबियत भी बाग-बाग हो जाए
बैठे वंहा दो पल जंहा हम  सुकून  पायें
.......  चलो चलें
फिर अपने गाँव की ओर
नहीं लगता
मन अब इस  ओर .......  चलो चलें
चलो चलें फिर अपने गाँव की ओर
नहीं लगता,नहीं लगता,नहीं लगता
मन अब इस  ओर .......  चलो चलें

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बस यादें दे गई जिंदगी 

जिंदगी ने खेल ऐसा खेला
बस हार ही हार मिली
ना शिकवा  रहा अब किसी से
ना गिला करने कोई मिला

गलत ना समझना  तुम  मुझको
मैंने भी बहुत प्यारा किया तुमको
दांव बिछा कर ऐसा खेल,खेल गई
अब उम्र भर अकेले रह  गई जिंदगी

झूठी हंसी  का हुनर अब वो
हमे भी खूब समझा गई जिंदगी
मरहम की कसम मरहम न मिला
उस दर्द से हमे मार गई जिंदगी

जब अब हार ने के लिये
ना बचा कुछ भी पास मेरे
तड़पा कर फिर मुझे मारने लिए
यादें उसकी पास छोड़ गई जिंदगी 

वो ख़ुद बुलायेगा मुझे
बस मेरा वक़्त तो आने दो
इसी उम्मीद के छलावे देकर
पूरी उम्र मुझे छला गई जिंदगी 

बालकृष्ण डी ध्यानी
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क्या बोलते हैं

क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं
सुन लो ना मेरे यार 
क्या बोलते हैं

कुछ अलग लिखने चला 
हूँ मैं  आज
क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं

रचा जिसने इन्हे  धरा पर
उसे नित मेरा प्रणाम
क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं

ऊँचा हुआ वो हिस्सा
बरसों  का वो किस्सा
क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं

मन बस जाते हैं
रह रहकर याद आते हैं 
क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं

मेरा विश्वास है तू
तू ही मेरी आस  है
क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं

शब्द  झूठ नहीं बोलते कभी
तू ही शरीर  तू  ही मेरा प्राण है
क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं

सच को सच कहने के लिए
खड़े रहते हैं वो , वो ही मेरा पहाड़ है
क्या बोलते हैं पहाड़
क्या बोलते हैं

बालकृष्ण डी ध्यानी
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तू पुकारेगा जरूर 

किस काम की नहीं
अब रह गई है तू
आंखों में इन्तजार
बस दे गई है तू

साँसों की रफ्तार में
खोजा था साथ तेरा
हातों से छोड़ा कर हात
अकेला छोड़ गई है तू

तन्हा इतनी  होगी तू
क्यों ना ये जान पाया
आखरी सफर था शायद
आकर गुजर गई 

कैसे भरोसा करूँ तुझ पर
करीब तू  आएगी  जरूर 
किसी ना किसी बहाने
अपने साथ ले जायेगी जरूर

कैसे अपना वाद मुझ से
तू निभाएगी बता
दरवाज  मेरा खटखटाने से पहले
क्या  तू मुझे बताएगी बता

रुखसत मेरे होने का
वक्त जब मुक़रार होगा
नाम मेरा शायद
तू पुकारेगा जरूर 

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किसी ने तुम्हे  कह दिया

किसी ने तुम्हे  कह दिया
और तुमने उसे मान लिया
कभी मुझसे पूछा नहीं
और मुझे पहचान लिया

मैं धीर गंभीर  समंदर सा
सब कुछ चुप हंसकर पी गया
मेरा हृदय को तुम ने ऐसे छुआ की
वो टूटकर चूर हुआ

सबसे ऊंचा आकाश है
और तुमने उसे मान लिया
कभी तुम ने मुझे ठीक परखा ही नहीं
और मेरी गहराइयों को माप लिया

सागर में सबसे अधिक खारा पानी है
और तुमने उसे मान लिया
कभी मेरे उन आँखों को छलकते  देखा नहीं
और उन आंसुओं को तोल दिया

बरगद की जड़ें गहरी, मजबूत हैं
और तुमने उसे मान लिया
उन अपनी  दोस्ती की जड़ों को सींचा ही नहीं
और उसे  उखाड़ फेंक दिया

किसी ने तुम्हे  कह दिया

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वो ख़ुशी

बिखरे पड़े हैं समेट  लो   
जितना समेटना चाहते हो 
उतना लपेट  लो   

मन की आंखें  खोलो जरा
जैसे देखना उसे  देख लो
पास तुम्हारे हैं ,वो साथ तुम्हारे हैं
बिखरे पड़े हैं समेट  लो

बस महसूस ना  करो
जी लो उन संग
जो नजरें कितने प्यारे हैं
उतना  ही काफी  है
बिखरे पड़े हैं समेट  लो

आँखों में उतार  लो
साँसों में उसे संवार लो
इन हातों लेकर  हात तुम
बस जिंदगी गुजार लो
बिखरे पड़े हैं समेट  लो

दिल में वो उतर जायेगी
वो तेरे साथ चली आएगी
जो अब तक अकेली थी
उसे भी साथी  मिल जाएगा
बिखरे पड़े हैं समेट  लो

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