Author Topic: Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें  (Read 173115 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Write a comment...देव भूमि बद्री-केदार नाथ मेरी प्रीत बिंगा ......२
 मेरी .....मेरी जीकोड़ी.......२ मेरी माया बिंगा दे
 मेरी प्रीत बिंगा ......२
 
 मेरु मनखीहो  हो  होआ  आ आ
 मेरु मनखी माया भरमिगे
 तेर सवणी मुखडी देखी की .....२
 मी थै बोल्या बाणी गै
 मेरी प्रीत बिंगा ......२
 
 जै टैम भाटैक देख मिल
 ये माय्ल्दी आंखी  हो  हो  होआ  आ आ ...२
 ये माय्ल्दी आंखी दगडी
 मेरी निंदी सैणी खाणी हारची गै
 मेरी प्रीत बिंगा ......२
 
 गढ़ देश  मयारू गढ़ देशा भैजी
 रोंलूं का ढुंगा गदनयूँ का गारा  हो  हो  होआ  आ आ ...२
 बांदा यख भली भली ये दीदा ....२
 वा बांद थै मेरी ब्योली बाण दै
 मेरी प्रीत बिंगा ......२
 
 मेरी प्रीत बिंगा ......२
 मेरी .....मेरी जीकोड़ी.......२ मेरी माया बिंगा दे
 मेरी प्रीत बिंगा ......२
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
 देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
आज की बारात

ऐजवा.......२ दिदो
बारात पुहंचगै गाम मा
ऐजवा........२ पुआणु
दाल भात खैणी कुण भोज मा
ऐजवा.......२

पत्ता भी हर्ची गैनी
कंकरालो घीयु लुकी गैनी
तम्बा लुट्या बीके गैनी
पुआणु पैली भोज खैयाली आज गाम मा
ऐजवा.......२

ढोलह दामु बिसरी गैनी
मसोबाज हर्ची गैनी
अपरी संस्क्रती बिसरी गैनी
पोप डिस्को ताल मा
ऐजवा.......२

वैधी सजी चा बस केला पात्त्ता मा
हवंन अग्नी जलण जब पंडो दक्षीण हाथ मा
बाण देणारा कखक लुके अब ये गढ़ धाम मा
दण बोढया जवान तुण्ड दारू की बरसात मा
ऐजवा.......२

बारात की बिदाई भी णी व्हाई
गाम वाला पुन्ह्चगै अपर अपर घरमा
कंण रीत आयींच अपर गढ़वाल मा
अपरू अपरू कण कै की मत भेद व्हाई आज गाम मा
ऐजवा.......२

ऐजवा.......२ दिदो
बारात पुहंचगै गाम मा
ऐजवा........२ पुआणु
दाल भात खैणी कुण भोज मा
ऐजवा.......२

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
ये है कल्पना की उछाल

देख कल्पना देख की उछाल
उछाल गया दिल
उछाल गया मंजर
उछाल गया सागर
हो गयी उथल पुथल
देख कल्पना की देख उछाल.....

करने को अपने आप को साकार
उदित होआ नित नया संसार
रवि ने जलायी उजाले की माशाल
अपने अपने विचारों के साथ-साथ
देख कल्पना की देख उछाल.....

अब कवि और कलम की आयी बात
एक नयी कल्पना होगी अब साकार
मेज पर पन्नों की सुनो लो पुकार
गम और खुशी बीच बस ये संसार
दुःख के संग ही खिली हंसी बारंबार
अपने प्यार का जग करे क्यों इजहार
आँखों आँखों अब होने लगा इक़रार
दिल की धक धक की देख उछाल
देख कल्पना की देख उछाल.....

आपने से ही उछालकर कर गयी
कल्पना अब देखो बीच बाजार
बैठा था मै घर मे सोच घूम रही थी उस बन मे
अपने ही लोगों से मे मिल रहा था
जिसे गैर मे अब तक समज रहा था
अकेले अकेले सब जीये जा रहे थे
अपने ही पल और गम मे घुले जा रहे थे
समय के साथ जैसे बहे जा रहे थे
मेरे मन और अकेलेपन की तरह
एक एक कर मुझ से रिश्ता जोड़े जा रहे थे
देख कल्पना की देख उछाल.....

कल्पना वंह से उछालकर पुहंची एक बाग़ मै
उसमे खिल रहे थे गुल आशीकी भी थी भुल दुर उड़ रही थी धुल
दिल से क्या वे दिल मिल रहे थे या वासना मे जैसे वे घिर रहे थे
एक नये प्रेम की भाषा थी जिसमे जवानी वासना की अभीलाषा थी
देख ऐसी रासलीला मीराँ ने भी अब दर वो भुलाह
ना भायी जगह को प्रेम की ये नयी बोली
दुखी मन लेकर बाग़ से विदा होई कल्पना की डोली
देख कल्पना की देख उछाल.....

दुःख से विदा होकर कल्पना बागा से बाहर आयी
एक बुजुअर्ग के आँखों से जा टकराई
जीवन की सच्चाई ने थी आंखें छलकाई
एक युग ने कहनी दो शब्दों मे सुनायी
जो कुछ होता है वो तो होना ही है
फिर किस लिया यंह तेरा रोना है
उनकी बातों से हो हैरान कल्पना लिया एक विराम
कुछ पालो के बाद वो आगे बड़ी अब हो गयी थी वो भी बड़ी
देख कल्पना की देख उछाल.....

राह मे चलते चलते कल्पना मे मोड़ आया
दुर छुड पर वो देखो देखो एक छोर आया
एक नये पोधे की तरंह वो बचपन अंकुराया
उस नन्हे सपनो के साथ साथ एक जोश आया
अब मेरी बारी है मुझे भी निभानी अब दुनिया दरी है
कल्पना की गठरी अब मुझे उठानी है
मेरे दिल ये बात मानी और ठानी है
कल्पना आज भी है कल भी थी और कल भी रहेगी
ये मेरी कल्पना की थी उछाला देख कल्पना की देख उछाल.....

काश मेरी कल्पना मिल जाये दिख जाये आपको
साथ साथ अपने कल्पना का भी देना मुझे साथ
जोड़ा दे इस मे अब तेरा साथ जैसे विहंग उड़े आकाश
जिसे नये शब्दों के साथ जोड़ राह एक नये विश्व नीर्माण
ये है कल्पना की उछाल ये है कल्पना की उछाल
ये मेरी कल्पना की थी उछाला देख कल्पना की देख उछाल.....

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
तिबरी- डंडाली

तिबरी मा पीड़ा पडी
डंडाली मा पडी उजाडा
ऊँचा निसा गढ़-देश मयारू
रीटा रीटा मनखी की पुकार
ये मेरी बोई तिबरी- डंडाली पहाड़ की ......

डंडा मा
बुरांस खीद खीद खीदक्याणी
प्योंली मुल मुल मुलरायणी
बीती बिसरी बात दगडी किले
मणमा ये सखी वा हरश्याणी
ये मेरी बोई तिबरी- डंडाली पहाड़ की ......

तिबरी मा
कूड़ा मा हेर का अन्ख्न्या लाग्या
जीकोड़ी दगडी माया का भागा
पुंगडी गों का साडै सता लगा
रीटा गौं बंजा पुंगड़ का बाटा
ये मेरी बोई तिबरी- डंडाली पहाड़ की ......

तिबरी मा पीड़ा पडी
डंडाली मा पडी उजाडा
ऊँचा निसा गढ़-देश मयारू
रीटा रीटा मनखी की पुकार
ये मेरी बोई तिबरी- डंडाली पहाड़ की ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
ये मेरा सिप्पोडा बाला

ये मेरा सिप्पोडा बाला
चल दगडी अपडा पुंगडा जोंला
हाल खांदा मा धरी हे बाला
अपडा पुंगडा जोती ऊंला
ये मेरा सिप्पोडा बाला........

दुई चोटी बंधा के मेर बाला
धान का बीज पुंगडा बोंती ऊंला
बोये की बोल्युं मान रे बेटा
अपरी बोई थै भेंटी ऊंला
ये मेरा सिप्पोडा बाला........

माना ना हार मेर राजा बेटा
माया पुन्गाडा दगडी लगी ऊंला
जग माया का पीछणे पीछणे
अपरा पहाड़ थै ना कभी छुडी जोंला
ये मेरा सिप्पोडा बाला........

पहाडा मा खैरी विपदा भारी
दोई जोड़ा मा कटेगै उम्र सारी
हैरी हैरी का जीवाण म्यार पहाडा
कटेगै ईणमा जीन्दगी को उन्दारू उकाला
ये मेरा सिप्पोडा बाला........

तुछे रे मयारू जीकोडी को दिलासा
तुज पर टिकी हम सबकी आशा
गढ़ देश की तु बदल दै परीभास
दैणु हो जाये तै पर बद्री-केदार
ये मेरा सिप्पोडा बाला........

ये मेरा सिप्पोडै बाला
चल दगडी अपडा पुंगडा जोंला
हाल खांदा मा धरी हे बाला
अपडा पुंगडा जोती ऊंला
ये मेरा सिप्पोडा बाला........

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
वो याद पहाड़ की

फुँर फुँर रुमाली बथों मा फुँर
घेरा घेरा मा बसी म्यार मुल्की की फुँर
लास्का ढह्स्कों गढवाली गीतों की फुँर
तू भी ऐजा दीदा मरले एक फुँर
फुँर फुँर रुमाली बथों मा फुँर

नाथ की नथुली मुड्मा साफा
हाथ मा कमरी कमरी मा बंधा
पैरों मा पैजाण गला गुलुबन्द
कान का झुमका वह तेरा ठुमका फुँर
फुँर फुँर रुमाली बथों मा फुँर

मुड्मा मा टोपली दीदा
कुर्ता पैजामा दगडी कमरी हिला
दंत्ता की पट्टी ऐसे खिला फुँर
हमारी लोक संस्क्रती की दर्शन करा फुँर
फुँर फुँर रुमाली बथों मा फुँर

ढोलह थापों मा पैजाण बजै फुँर
माशू बाजों संग रिगांण लगे फुँर
दामू की थपकी मा ये ढह्स्क तेर
याद आणी मी थै वो पहाडा मेरा
फुँर फुँर रुमाली बथों मा फुँर

फुँर फुँर रुमाली बथों मा फुँर
घेरा घेरा मा बसी म्यार मुल्की की फुँर
लास्का ढह्स्कों गढवाली गीतों की फुँर
तू भी ऐजा दीदा मरले एक फुँर
फुँर फुँर रुमाली बथों मा फुँर

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From - Bal Krishana D Dhyani

देव भूमि बद्री-केदार नाथ


एक
 हम एक हैं
 फिर घर क्यों अनेक हैं ?
 एक को चार दीवारी
 दुजे को दुनिया सारी
 एक को छत ने घिरी
 दुजे ने मारी आकाश फैरी 
 
 माँ और माई
 क्या फर्क है भाई
 एक ने गैस मै रोटी पकाई
 दुजे ने चूल्हे मै रोटी सैकाई
 हम एक हैं
 फिर घर क्यों अनेक हैं ?
 
 एक आगन का  घेरा
 दुजे का फुटपाथ का बसेरा
 तेरा भी वो सवेरा
 मेरा भी वो सवेरा
 हम एक हैं
 फिर घर क्यों अनेक हैं ?
 
 दिल एक मंदिर
 फिर भी वो संग दिल है
 रहता है अलग अलग
 पर धडकने पर भी बिल है
 हम एक हैं
 फिर घर क्यों अनेक हैं ?
 
 कैसा है चलन
 छलनी जैसा है गुलबदन
 एक खुसबु मै महकता है
 दुजा बदबु मै चहकता है
 हम एक हैं
 फिर घर क्यों अनेक हैं ?
 
 एक
 हम एक हैं
 फिर घर क्यों अनेक हैं ?
 एक को चार दीवारी
 दुजे को दुनिया सारी
 एक को छत ने घिरी
 दुजे ने मारी आकाश फैरी 
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ


गढ़ व्यथा
 
 खैरी खैरी विपदा विपदा
 मेर दगडी दगडी सदणी 
 मी अगणे अगणे हीट दो
 ये पीछाणे पीछाणे आंदी
 खैरी खैरी विपदा विपदा ......
 
 म्यार मण का अंशुं
 दडमण दडमण भीगा
 गला मा फंसुं तासुं
 जीकोडी  मेरा तिशा
 खैरी खैरी विपदा विपदा ......
 
 डैभरा जण हर्ची मी 
 बोकटया जण कटी मी
 भगवती का चरणु पडी
 कणगुँडा पाणी खोल्याई
 खैरी खैरी विपदा विपदा ......
 
 पुन्गाड जण बांज पड़युं
 हीम जण मी जमयुं 
 रोल्युं गदनयुं जण रीट होयुं
 डंडा जण उजाड पड़युं   
 खैरी खैरी विपदा विपदा ......
 
 खैरी खैरी विपदा विपदा
 मेर दगडी दगडी सदणी 
 मी अगणे अगणे हीट दो
 ये पीछाणे पीछाणे आंदी
 खैरी खैरी विपदा विपदा ......
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ

बिता दिण
 
 बिता दिणु मा इण क्या बात वहाई
 मेर दगडी किले रात आई
 भोल्ह ब्योखंणी की बात णी च
 म्यार साथ यकुली रात गयाई
 बिता दिनों मा इण क्या बात वहाई....
 
 डंणडा डंणडा उडी मण
 उजाड़ कणड़ जोड़ी मण
 उकाला बाटा छोडी मण
 उन्दारू बाटा रुअडी मण
 बिता दिनों मा इण क्या बात वहाई....
 
 तिबारी डंडाली मा हेर पड़युं
 गों का बाटा मा फेर पड़युं
 जीकोडी मा लागुली सा गेडा 
 जुन्यली रात मा बेल पड़युं
 बिता दिनों मा इण क्या बात वहाई....
 
 बिता दिणु मा इण क्या बात वहाई
 मेर दगडी किले रात आई
 भोल्ह ब्योखंणी की बात णी च
 म्यार साथ यकुली रात गयाई
 बिता दिनों मा इण क्या बात वहाई....
 
 बालकृष्ण डी ध्यानी
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