Author Topic: भरत नाट्य शास्त्र का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Bharata Natya Shast  (Read 4475 times)

Bhishma Kukreti

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'अर्धसूची' ब्रिटेन 'स्खलित' करण तक १० करण
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  १३७ - १३८   बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   ११७
= आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   


जु अलपपद्म मुद्रा वळ हथ  तैं मुंड जिनां लिजाये अर  बैं खुट  'सूची'प्रदर्शन कार तो 'अर्धसूची'  करण जाणो।  १३७ - १३८।
जु एक खुट 'सूची' करण  बतलांद  दूसर  खुटा एड़ी पर लग्यूं  ह्वावो   द्वी हथ क्रमशः कटि  अर  छत्ति पर होवन त  वै तै 'सूचीविद्ध' करण  बुले जांद।  १३८-१३९।
जब जंघा तै 'बलित' करणो उपरान्त चरणों से अपक्रान्त' चारी  प्रदर्शन ह्वावु ,अर द्वी हथ नृत्य नितम अनुसार धरे जावन तो ' अपक्रान्त' करण बुल्दन . १३९-१४०।
जु 'वृश्चिक' करण प्रदर्शित करी , द्वी हथ 'रेचित' अर त्रिक  तै एक गोल घुमै द्यावो त 'मयूरललित' जाणो।  १४० -१४१।
जु   द्वी  खुटों  तै 'अंचित'  दशाम हटाए जाव ,मस्तस्क 'परिवाहित' मुद्रा म अर  द्वी हथ 'रेचित' मुद्रा म धरे जावन तो 'सर्पित' करण  बुले जांद।  १४१-१४२।
जब  चरण  'नूपुर' चारी का पश्चात 'दंडपाद ' चारी  प्रदर्शन कारन , हाथ  शीघ्रता से 'आविद्ध' म प्रदर्शित करदा जावन  त ' दंडपाद' करण बुले जांद।  १४२- १४३।
जु 'अतिक्रांत' चारी तै प्रदर्शित कौरि एक उछाळ  लेकि  तब स्थिर ह्वे  जावो अर  तब जंघा अंचित (सिकुड़ ) कौरि अळग उछाळे  जय त 'हरिणप्लुत ' करण  बुल्दन। १४३-१४४।
जब 'दोलापाद' चारी क प्रदर्श करी एक उछाळ  लेकि चरण तौळ पटके जाय अर  'त्रिक '  तैं एक घुमाव दिए जाय अर  तदनन्तर स्थिर ह्वे  जाय त 'प्रेखोलित' करण  हूंद ,१४४-१४५।
जु द्वी भुजाओं तै मुंड से मथि उठाये जाय , हथों अंगुळी तै समिणा ओर धरदा  'बद्धा' चारी तै खुट से प्रदर्शित करे जाय त 'नितम्ब' करण  जाणो।  १४५ -१४६।
जब खुटोंना 'दोलापाद' चारी प्रदर्शन कर 'रेचित' मुद्रा वळ को नाट्य प्रयोग अनुसार  चारी घुमा दिए जाय त 'स्खलित' करण  बुल्दन। १४६-१४७।

s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  १०९ 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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करिहस्त बटें निवेश करण   तक  चर्चा 
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग   १४७ - १४८     बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   ११८ 


s = आधा अ

 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जब  बैं  हथ  छति पर अर दैण  हथ की हथेली 'प्रोद्वेष्टित' म हो ,खुट  'अंचित' मुद्रा म  धर्यां ह्वावन  तब  'करिहस्त' करण  हूंद। १४७-१४८। 
जु  एक हथ 'रेचित' दुसर लता मुद्राम अर खुट 'तलंस' पर ह्वावन त वै  तैं  'प्रसर्पितक' करण  बुल्दन।  १४८-१४९।
जब  'अलात' चारी का प्रदर्शन उपरान्त  दुसर खुट द्रुत गति करदो हथों  तैं खुटों गति अनुसार रख्यावो  त ' सिंहविक्रांडित' करण जाणो।  १४९ -१५०। 
जु  एक खुट पैथर हटाये  जाय , हथ झुकैक /सिकोड़ी , शरीर एक घुमाव ले अर  जु  समिण अर पिछ्नै ओर सिकुड़न वळ हो त ये तै 'सिंहकर्षितक'  करण  जाणो। १५० -१५१।
जब हथ , खुट अर  शरीर तै अळग झटका से उछाळा   जाय गिर 'उद्वृत्त' चारी म शरीर स्थित रखे जाय तब 'उद्वृत' करण  जाणो।  १५१ -१५२। 
जु  खुटों   से 'आक्षिप्त' चारी प्रदर्शन करी हथ  तै वैकि स्तिथि अनुसार रखे जाव  अर  शरीर झुकायर जाय तो वै करण  तै 'उपसृतक' करण  बुल्दन।  १५२-१५३।
जब 'दोलापाद'   चारी तै प्रदर्शित करणों  उपरान्त द्वी हथुं तला (हथकुळि ) एक हैंक  तै मलदा धरे जाव , तब बैं  हथ 'रेचित' मुद्राम धरे  त 'तलसंघट्टित' करण  बुले जांद।  १५३-१५४। 
जु एक हथ छति पर अर दुसर झुल्दा धरे जाय अर  एक खुट 'अग्रतलसंचर' चारी प्रदर्शन करिन त 'जनित' करण  हूंद।  १५४-१५५।
जु 'जनित' करण तै प्रदर्शित करि द्वी हथ  तै एक हैंकाक समिण अंगुळी बताइक धीरे धीरे तौळ लिजाये  जाय तो वो करण 'अविहत्थक ' ह्वे  जांद।  १५५- १५६।
जु  द्वी हथुं तै 'निर्भुग्न' वक्षस्थल पर   धरी 'मंडलस्थानक' कु  प्रदर्शन कौर त  वै  तै 'निवेश करण  बुल्दन।  १५६-१५७। 


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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - १११  बटें -  ११३ तक   
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

Bhishma Kukreti

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उद्वृत से  नागसर्पित 'करणों व्याख्या
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  १५७ -१५८  बिटेन  १६६- १६७  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   ११९
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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती    
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जु तलसंचर पाद  से एक उछाला लेकि भूमि पर आय अर  शरीर तै संकुचित करदा घुमाये त एलकाक्रीड़ित' करण  जाणो। १५७ -१५८।
जु  हथक  आवृत दशा म धारो फिर वै  तैं  झुकाइक उरु  पृष्ठभाग पर रखे अर जंघा तै अंचित अर  उद्वृत' मुद्रा म रखे जाय त 'उद्वृत' करण  बुल्दन। १५८-१५९।
जु द्वी हथों तैं तौळ  जिना हलांद धरे जाव , मस्तस्क तै 'परिवहित' मुद्रा मा अर  सीधा व बैं खुट वलित होवन आविद्ध चारी तै प्रदर्शित कारन त  'मदस्खलितक 'नामौ करण  बुल्दन। १५९-१६०। 
जब खुट अगनै  फैलैक अळग लिजान्द सिकोड़े जावन अर  द्वी हथ  रेचित ' मुद्रा म धर्यां  होवन त  'विष्णुक्रांत' बुले जांद १६०-१६१।
जु हथ व्यावर्तित का साथ उरु /जंघा पर सिकुड़दा रखे जावन अर उरु  तै 'आविद्धा' चारी से युक्त रखे जाय तो 'संभ्रांत; करण  बुले जांद।  १६१ -१६२।
 जु   हथ 'अपविद्ध' मुद्राम अर  खुट   सूची  युक्त चारी से युक्त हो 'निक्कुटित' (झुकीं ) दशा प्रदर्शित कार अर बैं  हथ छाती म हो त 'विष्कम्भ' करण  हूंद।  १६२ -१६३।
जब द्वी खुटों तै 'उद्भट्टिता' चारी अर हथों  तै 'तलसंघट्टित ' मुद्राम धरीकॉल ताऊ झुकाई ल्यावो त 'उद्भट्टित' करण  हूंद।  १६३-१६४।
जब 'अलात'चारी तै प्रदर्शित करी द्वी हथों तै 'रचित' मुद्राम करी फिर यूं तै 'कुंचित अर अंचित ' मुद्रम धरे जाय त 'वृषभक्रीडित' बुले जांद।  १६४-१६५।
जु द्वी हाथ 'अंचित' हाथ हाथ रचित मुद्राम रखे जावन अर मस्तस्क तै  ' लोलित' व 'वर्तित' मुद्रा म त ' ये तै 'लोलित'   करण जाणो।  १६५-१६६ '
जब द्वी खुटों  तै 'स्वस्तिक दशा म पैथर हटाए जाय, मस्तस्क 'परिवाहित' मुद्रा म अर हथ 'रेचित' मुद्राम रावो तो 'नागसर्पित' करण हूंद।  १६६-१६७
 

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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   ११३ - ११५
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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करण  व्याख्या अंत भाग
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  १६७ -१६८  बिटेन  १६९ -१७०  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग - १२०   


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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती    
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जु  स्थिर   बैठि  तल संचर चारीम  खुट फैलावन अर  छति  तैं 'उद्भाहित' दशा म रखे जाय त  वै तैं  'शकटास्य' करण  बुल्दन।  १६७- १६८।   
जु  द्वी खुट अपण  तल अर अंगुळ्यूं तै मथि  तरफ उठांद रखे जावन ,द्वी हथों तै भ्यूं पर त्रिपताक ' मुद्रा म  तौळ  जिना  पंजा टिकैक धरे जावन अर मुंड /मस्तस्क 'सन्नत' मुद्रा म हो (जां  से कमर  बिलकुल मुड़ी  जाय ) त  वै करण  तैं  'गंगावतरण' बुल्दन। १६८-१६९। 
ये हिसाबेन  मीन १०८ करणों  तै बतलायी।   अब मि  अंगहारों  लक्षण बतांदु १६९ - १७०। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -    ११५ - ११६
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


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कुछ अंगहारुं   व्याख्या 
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग १७०   बिटेन १८१   तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२१
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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती    
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स्थिरहस्त
द्वी हथों तैं अळगा  तरफ फैलैक 'उत्क्षिप्त'  करे जाय अर 'समपाद' स्थानो प्रदर्शन करेजाव, बैं हथ  तै अळगै तरफ 'व्यंसित' अर 'अपव्यंसित' अवस्था म फैलाये जाय फिर 'प्रत्यालीढ़'  म स्थित ह्वेका 'निकुट्टित', उरुद्वृत्त 'आक्षिप्त, स्वस्तिक, नितम्ब,करि हस्त  अर कटिच्छिन्न करणों  तै   क्रमश: प्रदर्शित करे जाव तो 'स्थिरहस्त'नामौ  अंगहार बण जान्दन। यु भगवान शिव तै बड़ो प्रिय च।   १७० -१७३।
पर्यस्तक -
जु 'तलपुष्पपुट' अपविद्ध,अर वर्तित अर  निकुट्टित करणो  तै क्रमश: प्रदर्शित करे जाय फिर प्रत्यालोढ़ ,अर निकुट्ट को  तथा उरुद्वृत्त , आक्षिप्त,उरोमण्डल ,करिहस्त अर कटिच्छिन्न ,करणो तै क्रमश प्रदर्शन करे जाव त 'सूचिविद्ध' अंगहार हूंद। १७३ -१७५।
हथों से अलपल्ल्व अर  सूची मुद्राओं प्रदर्शन का उपरान्त जुकि क्रमशः करे जांद फिर विक्षिप्त ,आवर्तित , निकुट्टक , उरद्वृत्त ,आक्षिप्त ,उरोमण्डल,करिहस्त ,कटिच्छिन्न ,करणो क्रमश प्रदर्शन करण पर 'सूचीवृद्ध'' अंगहार हूंद। १७५- १७७।
(सर्वप्रथम  ) अपविद्ध,ार सूचीविद्ध करणो प्रदर्शन कौरी  फिर हथों  से उद्वेष्टित करण का प्रदर्शन करे जय जु हथ  अर त्रिक  को एक घुमाव दींद फिर उरोमण्डल मुद्रा म हस्तों तै स्थिर कर कटिच्छिन्न करणो प्रदर्शन करे जाव तो 'अपविद्ध' नामो अंगहार हूंद। १७७-१७९.
आक्षिप्तक -
सर्वपर्थम ,नुपुर करणो  प्रदर्शन कौरि फिर विक्षिप्त ,अलातक ,आक्षिप्त ,उरोमण्डल ,नितम्ब ,करिहस्त ,अर कटिच्छिन्न करणों क्रमशः प्रदर्शन करे जाय त 'आक्षिप्तक' अंगहार हूंद।  १७९ - १८१।
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  ११६  -११८
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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  उद्भट्टित  अर  विष्कम्भ ' अंगहार 
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  १८१ - १ ८२  बिटेन  १८६  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  १२२
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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जु दैण हथ  तै उद्वेष्टित अर अपविद्ध हस्त मुद्राओं म दैण  खुट  तै 'निकुट्टक मुद्रा म ,  बैं -दैं  प्रदर्शन करदा द्वी  हथों  तै उरोमंडल मुद्रा म धरे जाय ,फिर नितम्ब , करिहस्त,अर कटिच्छिन्न करणो क्रमश: प्रदर्शन करे जाय त ' उद्धट्टित' अंगहार हूंद।  १८१-१८३। 
जु  द्वी हथ  क्रमशः 'उद्वेष्टित' अर खुट ' निकुट्टक मुद्राम रखि फिर सिकुड़े अर घुमाये जाय फिर उरुद्वृत करणा प्रदर्शन करदा हथुं  तै चतुरस्र अर खुटों तै निकुट्टक मुद्रा म धरे जाय ,फिर भुजंगत्रासित करण हथों तै उद्वेष्टित मुद्रा म धौर।  तब 'छिन्न' अर 'अभ्रमरक'करणों प्रदर्शन करदा ट्रिक घुमाएं ,अर  फिर करिहस्त अर कटिच्छिन्न करणो प्रदर्शन ह्वावो त 'विष्कम्भ' अंगहार हूंद। १८४- १८६। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   ११९
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद

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भरत , नाट्य शास्त्रम     कुछ अंगहार व्याख्या    
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग १८७   बिटेन   २०१  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२३
s = आधा अ
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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अपराजित -
जु दंडपाद'  करण का प्रदर्शन पैथर हथों तै विक्षिप्त अर आक्षिप्त क्रिया से युक्त रखे जाय। फिर व्याक्षिप्त करण को प्रदर्शन करे जाय ,जैमा बैं  हथ खुट दगड़ -दगड़  गतिशील  रैन ,फिर भुजंगत्रासित करण का प्रदर्शन करे जाय ,अर  हथ  उद्वेष्टित मुद्रा म रखे जाय व तब चातुर्यपूर्ण द्वी निकुट्टकों अर  अर्धनिकुट्टकों , आक्षिप्त ,उरोमण्डल ,करिहस्त,अर कटिच्छिन्न  करणों प्रदर्शन कर्या जाव तो 'अपराजित' अंगहार जाणो। १८७-१८९
विस्कंभापसूत'-
जु कुट्टित अर  भुजंगत्रासित करणों प्रदर्शन करि फिर रेचित  हथन 'पताक' मुद्रा क प्रदर्शन करे जाय ,फिर क्रमशः आक्षिप्तक , उरोमण्डल  करणों का  अर लताहस्त म कटिच्छिन्न करणका प्रदर्शन हो तो ' विष्कंभापसृत' अंगहार हूंद।  १८९-१९१।
मत्ताक्रीड -
जु  त्रिकतै एक सुंदर घुमाव देकि 'नुपुर' करण  को प्रदर्शन हो फिर भुजंगत्रासित अर वैशाखरेचित करणों प्रदर्शन होव्।  फिर क्रमशः ध्यानपूर्वक या चतुराई म आक्षिप्त ,छिन्न ,बाह्यभ्र्मरक ,उरोमण्डल ,नितम्ब ,करिहस्त , अर कटिच्छिन्न  करणों प्रदर्शन हो तो भगवान शिव प्रिय 'मत्ताक्रीड' अंगहार हूंद।  १९१-१९४। 
स्वस्तिकरेचित -
जो हथ  अर खुटों तै रेचित  मुद्राम धरि  वृश्चिक करणो प्रदर्शन करे जाव अर  ये यी करण की हथ  व खुटों क्रियाओं योग द्वारा आवृति करे जाय। फिर निकुट्टक को क्रमशः सीधो अर  बैं अंगोन प्रदर्शन करे जाव्।   फिर कटिच्छेद  करणो लताहस्त का दगड़ प्रदर्शन करे जाव त 'स्वस्तिकरेचित' अंगहार हूंद। १९४-१९६।
पार्श्वस्वस्तिक अंगहार -
जु एक पार्श्व बिटेन 'दिक्स्वस्तिक ' अर  फिर अर्द्धनिकुट्टक को प्रदर्शन करि यूं तै इ दुसर पार्श्व से पुनः आवृत करे जाय।  फिर हथ  तै आवृत मुद्राम धरि  कटि प्रदेशम स्थापित करे ,अर क्रमशः उरुद्वृत्त , आक्षिप्त ,नितम्ब ,करिहस्त,अर कटिछिन्न करणों प्रदर्शन  ततपरता से ह्वावो  त 'पार्श्वस्वस्तिक' अंगहार हूंद। १९६- १९९।
वृ'श्चिकापमृत'
जु वृश्चिक करणो प्रदर्शन करी हथ तै लतामुद्रा म धरिक फिर वींइ  मुद्राक हथों  तै नाक का बरोबर लेजैक झुका दिए जाय अर फिर वी हथ उद्वेलित मुद्रा म रखि कमर कु गोल घुमाव लिए जाय ,फिर ततपरता पूर्वक क्रमशः करिहस्त ,अर कटिच्छिन्न करणो प्रदर्श करे जाओ तो ' वृश्चिकापसृत' अंगहार हूंद। १९९-२०१। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  १२०  -१२२
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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कुछ  हौर अंगहार व्याख्या
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग   २०१ -२०३  बिटेन  २११- २१५ तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२४
s = आधा अ
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जु नूपुरपाद चारी  का पैथर आक्षिप्तक ,कटिच्छिन्न ,सूचीपाद ,नितम्ब ,करिहस्त ,उरोमण्डल अर कटिच्छिन्न करणों  क्रमशः प्रदर्शन  करे जाय तो  वो भ्र्मर अंगहार हूंद। २०१-२०३।
जु मत्तल्लि  करण तै प्रदर्शित करि दैं  हथ तै एक गोल घुमाव देकि फिर झुकैकि कोपल प्रदेशम बरोबर रखव जाय। फिर क्रमशः अपविद्ध,तलसंस्फोटित,करिहस्त अर कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन हुवावो तो वु 'मत्तस्खलितक ' अंगहार हूंद। २०३-२०५।
जु  द्वी हथ  हलांद  दोला मुद्राम अर खुटों  तै स्वस्तिकाप सृत  करे जावन अर  हथों तै अंचित , वलित अर तलसंघट्टित मुद्रा म सहित करे जाय।  फिर तत्प्रतापूर्वक क्रमशः निकुट्टक ,उरुद्वृत्त , करिहस्त अर कटिच्छिन्न  करणो प्रदर्शन  ह्वावो त  'मदविलसित; अंगहार बुले जांद। २०५-२०७।
जु मण्डलस्थानौ  प्रदर्शन कौरि द्वी हथुं  तैं  रेचित मुद्राम अर खुटों  तैं  उद्भटित  मुद्राम धरे जाव।  फिर क्रमशः मत्तिल्ल ,आक्षिप्त ,उरोमण्डल ,अर कटिछिन्न करणों प्रदर्शन करे जाव त 'गतिमंडल' नामौ  अंगहार हूंद।  २०७-२०९। 
जु समपाद स्थान तैं प्रदर्शन करि 'परिछिन्न' करणा प्रदर्शन ह्वावो अर तब आविद्ध खुट द्वारा भ्र्मरी, का प्रदर्शन ह्वावो अर  बैं खुटन सूची चारीन  अर्धसूची करण को फिर क्रमशः अतिक्रांत ,भुजंगत्रासित,करिहस्त ,अर कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'परिच्छिन्न' अंगहार हूंद। २०९ -२११। 
द्वी हथों  तै मस्तस्क म ढेला धरी स्थापित करे जाव , फिर बैं  हथ रेचित  करदा   शरीर झुका ल्या ,फिर शरीर तै अळग जीना तानि हथ  तै रेचित मुद्रा धरि ,फिर से  द्वी  हथुंन लता मुद्राक प्रदर्शन करे जाव। फिर क्रमशः वृश्चिक ,रेचित ,करिहस्त,भुजङ्गत्रासित ,आक्षिप्तक करणों प्रदर्शन करे जावो।  फिर स्वस्तिक पाद तै धरदा उक्त विधान तै दुबर उल्टो घुमाव क दगड़  आवृत करे जाव।  अर अंतम करिहस्त अर कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो तो 'परिवृत्तक -रेचित ' अंगहार हूंद। २११-२१५।   
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  १२३  -१२५ 
 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद- अंगहार  व्याख्या  , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद- अंगहार  व्याख्या  , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  Anghar  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद- अंगहार  व्याख्या    , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद- अंगहार  व्याख्या  ,


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कुछ महत्वपूर्ण अंगहार
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग २१५- २१८    बिटेन  २२८ -२३०  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२५
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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जु  शरीरा  संग द्वी  हथों तै रेचित कौरि 'अपविद्ध' मुद्राम धारो अर फिर शरीर राइ झुकान्द पुनः उनि  आवृत करे जाय फिर 'नूपूर' अर  भुजंगत्रासित' रेचित  अर मंडलस्वस्तिक' करणो  प्रदर्शन हो अर  बाहु व मस्तक तै सिकुड़णो  पश्चात अरुद्वृत्त ,आक्षिप्तक ,उरोमंडल ,करिहस्त अर  कटिच्छिन्न करणों  प्रदर्शन ह्वावो तो 'बैशाखरेचित' अंगहार हूंद। २१५ - २१८। 
सबसे पािल जनित' करण कु  प्रदर्शन करि  एक खुट तै अगवाड़ी फैलाये ,फिर 'अलात' करणो प्रदर्शन करे जाय , त्रिक  तै घुमाव देकि फिर बैं  हथ तै झुकैक गंडस्थल पर कुट्टन करे जाय अर कटिच्छिन्न का प्रदर्श हो तो वो 'परावृत्त' नामौ अंगहार हूंद।  २१८-२२०।
जु 'स्वस्तिक ' करण  तै प्रदर्शित करि द्वी हथों तै  व्यंसित रखे जाव ,फिर क्रमशः  अलातक ,ऊर्घ्वजानु ,निकुंचित ,अर्धसूची ,विक्षिप्त,उद्वृत ,आक्षिप्त,करिहस्त, अर कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'ालातक' अंगहार बुले जांद। २२०-२२२।
जु  निकुट्टित ' मुद्रा वळ  हथों  तै बक्षस्थल म धरे जाव  अर उर्घ्वजानु ,आकषिप , स्वस्तिक करणुं  प्रदर्शन करणों बाद त्रिक  तै एक घुमाव देकि  तब  इकै  कौरी उरोमण्डल ,नितम्ब , करिहस्त अर कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो  'पार्श्वछेद' अंगहार हूंद। २२२ -२२४।
पैल 'बैं  खुट द्वारा सूची चारी का प्रदर्शन कर तब दैं  खुट द्वारा 'विद्युद्भ्रांत'   अर  बैं खुटन  विद्युभ्रांत   करण का प्रदर्शन करे जाय।  तब छिन्न करण प्रदर्शित करि त्रिक  तै  घुमाव  देकि तलाहस्त का दगड़ लतावृश्चिक अर बादम कटिच्छिन्न करणो  प्रदर्शन करे जाव तो विद्युद्भ्रांत' अंगहार हूंद। २२४  -२२५। 
जु नूपूरपाद चारि तैं दैण  अर  बैं  हथ  तैं  एक एक कौरि झुलान्द  प्रदर्शन हो ,तब द्वी  हथों  तै ऊनि प्रदर्शन करि विक्षिप करणो  प्रदर्शन ह्वावो ,फिर  उनि  हथों से सूची ' करणो  प्रदर्शन करे जावो ,अर  त्रिक  तैं  एक घुमाव दिए जाय तन लतावृश्चिक अर  कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'उद्वृत्तक' अंगहार हूंद। २२६ - २२८।
जब  'आलोढ़'  स्थान का साथ 'व्यंसित' करण को प्रदर्शन करदा  द्वी हथुं  बाहुओं का कूण पर पीटो /फटकाये ,फिर बैं खुट से नूपुर करण तै अर  दैं खुट से अलात करणो प्रदर्शन करे जावो अर  वां  इ  से फिर आक्षिप्तक करण बि  प्रदर्शित ह्वावो। ततपश्चात द्वी हथों द्वारा उरोमण्डल मुद्रा प्रदर्शन करदा  करिहस्त अर  कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'आलीढ़'  अंगहार हूंद। २२८ -२३०।
 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   १२५ बिटेन  १२८

 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


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   भरत नाट्य शास्त्र म अन्य अंगहार चर्चा
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग २३१   बिटेन  २४२  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२६
s = आधा अ
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जु रेचित  हथ तै बाजुम  लिजैक रेचित  अवस्था  नमाये जाय  फिर  वै  रेचित  अवस्था म सरा शरीर तै नमाते  प्रदर्शित  करे जाव  अर  नूपुरपाद , भुजंगत्रासित,रेचित उरोमण्डल , कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन करे जाव  फिर रेचित , उरोमण्डल , अर कटिच्छिन्न  करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'रेचित' अंगहार हूंद।  २३० -२३२।
जु नूपुर ' करण तै प्रदर्शन करि त्रिक  तै एक घुमाव दिए जा फिर बैं  खुटन 'अलातक' करण प्रदर्शन करि सूची , करिहस्त ,अर कटिच्छिन करणों प्रदर्शन ह्वा  त 'आच्छुरित' अंगहार हूंद।  २३२- २३४।
जु  द्वी  स्वस्तिक पाद रेचित ह्वावन अर  इनि स्वस्तिक हथ  बि रेचित  रावो फिर रेचित क्रिया से इ अलग होवन अर  फिर रेचित क्रिया द्वारा वूं  तै मथ्या तरफ उछाळे जाव ; तब उद्वृत , आक्षिप्तक , उरोमण्डल ,नितम्ब , , करिहस्त , कटिच्छिन्न को क्रमशः प्रदर्शन ह्वा  त  आक्षिप्तरेचित' अंगहार हूंद। २३४ -२३७।
जब विक्षप्त करण तै प्रदर्शित करि  द्वी हथ -खूट तैं  मुखा तरफां अनुगामनी स्तिथि म रखदा बैं  हथ तै सूची मुद्रा म विक्षिप करे जाव अर दैं हथ  तैं वक्षस्थल म धरिक  फिर त्रिक  तै एक घुमाव द्यावो।  फिर एक एक कौरि नूपर ,आक्षिप्तक , अर्ध स्वस्तिक , नितम्ब , करिहस्त, उरोमण्डल ,अर कटिच्छिन्न करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'संभ्रांत' अंगहार हूंद।  २३७ -२४०। 
जब अपक्रान्त' करण कु  प्रदर्शन करदा व्यंसित करणो केवल हथों से प्रदर्शन ह्वावो अर हथों तै  उद्वेष्टित मुद्राम कम्पित करदा फिर अधिसूची विक्षिप्त , कटिच्छिन्न , उद्वृत ,आक्षिप्तिक , करिहस्त, अर कटिच्छिन करणों प्रदर्शन ह्वावो त 'अपसर्पितक ' अंगहार हूंद।  २४० -२४२। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   १२९  - १३१
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


 

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