Author Topic: भरत नाट्य शास्त्र का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Bharata Natya Shast  (Read 2513 times)

Bhishma Kukreti

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भरत नाट्य शास्त्र का चार रेचक
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग २४२    बिटेन   २५४  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२७
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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जु  नूपुरपाद चारी तै वेग से प्रदर्शित करे जाव अर हथों  तै खुटों  गति अनुसार रखदा  त्रिक तै घुमाव दे द्यां , फिर हथुं अर खुटुं  तै निकुट्टन  क्रिया से युक्त धरी एक एक कौरि  उरोमण्डल , करिहस्त ,अर कटिच्छिन्न करणो  प्रदर्शन ह्वावो त 'अर्द्धनिकुट्टक' नामौ अंगहार हूंद।
हे मुनिवरो ! ये अनुसार मीन बत्तीस अंगहार तुम तै बतैन। २४२ -२४४।
अब मी  तुम्हैं चार रेचक बतांदु।  यूं  तै बि  में से जाणो।  यूं  रेचकों म  पैलो   पादरेचक ,  दुसर   कटिरेचक ,तिसर  हस्तरेचक अर  चौथो ग्रीव रेचक  बुले जांदन। २४५ -२४६।
जु स्खलित गति वळ या द्वी भिन्न गति वळ  खुटों  तै  एक बाजू से दुसर  बाजू क तरफ विभिन्न गतियों से चलाये जाव तो ये तै 'पादरेचक' बुल्दन।  २४७-२४८।
जु त्रिक तैं मथ्या तरफ उठाये जाय या कटि तै एक चक्कर दिए जावो अर फिर वै  तै पैथर जीना हटा दिए जाय त 'कटिरेचक' जाणो। २४८ । 
जु हथों तै मथि उठाये जाय , फिंके जाय ,समिण  करे जाय , गोल चक्करदार घुमाये जाय या पैथर हटाण  तै 'हस्तिरेचक'  बुले जांद। २४९ -२५०। 
ग्रीवा /गौळ मथि जीना तानण या उठाण या झुकाण या बाजू से झुका दिए जाव या घुमाण  तै 'ग्रीवारेचक' हूंद। २५०-२५१।
यूं रेचक , अंगहारों युक्त  शिव तै नृनाच करद  देखि पररवतीन बि एक सुकुमार प्रयोगों से युक्त एक नाच नाच।  ये नाच म मृदंग , भेरीपटह ,भांड, डिंडिम ,गोमुख, अर दुर्दुर वाद्यों क संगत ह्वे। इन  हूणो उपरान्त दक्ष यज्ञ ध्वसंन  उपरान्त भगवान शिवन भौत सा लय व ताल अनुसार अंगहारों  से युक्त नाच करिन। २५१-२५४।

Bhishma Kukreti

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  पिंडीबँधो व्याख्या

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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  २५४-२५५   बिटेन  २६३- २६५  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२८
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार   bhishma kukreti
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तब नंदी अर भद्र मुख प्रमृति गणोंन  पिंडीबंधको  तै देखि ऊंक  लक्षण अर  नाम  धर  देन। २५४-२५५। 
यि पिंडीबंध जौंक   नाम विभिन्न देवगण  व देवियों नाम पर धरे गेन  इन  छन - ईश्वर की पिंडी तै ईश्वरी ,नंदी क पट्टसी , चंडिका की (पिंडी )  सिंघवाहनी, विष्णु की तार्क्ष्य , स्वयम्भू  की पद्म ,शक्र  की ऐरावती ,काम की झप , कुमार /स्कन्द की शिखी ,श्री की रूप ,जान्हवी की धारा ,यम की पाश ,वरुण की नदी , कुबेर की याक्षी ,बलराम की हल्ली , भोगियों की सर्प ,गणों की दक्षयज्ञविमर्दनी नामौ महापिंडों अर भगवान शंकर जौन अंधकासुरौ बिणास कार - ऊंको  त्रिशूल की आकृति से अंकित रौद्री पिंडी हूंदी। इनि  अन्य देवो -देवी भी   ऊंको  चिन्हों से चिन्हित अर ऊंको  नामानुसार हूण  चयेंद। २५६ -२६१।
ये प्रकार भगवान शिवन रेचक , अंगहार अर पिण्डिबंधों  का सृजन कार्य पूरो करणो पश्चात वूं  तै तण्डु मुनि तै दे दिनी।  तब तण्डु  मुनिन ऊं तै गाणा , भांड वाद्य से संयुक्त करी जै  नृत्य की रचना करि वु 'तांडव' नृत्य नाम से प्रसिद्द ह्वे।  २६१- २६३।
ऋषिगणों प्रश्न -
जब अर्थों का (गीत अर  संवाद ) उपयोगा कुण विद्वानों 'अभिनय' की सृष्टि कर दे त  ये नृत्य की सर्जना कै उद्देश्य पूर्ति कुण  ह्वे ? अर प्रकृति (स्वरूप , स्थिति व लक्षण ) कै प्रकारन रखे गे ?
ये नृत्य की आसारित' गीतों से संबंद्ध करदा रचना किलै  ह्वे ? किलैकि यु ना तो गीतों ना ही संवांदों से संबद्ध च।  २६३-२६५। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   १३३ -१३६
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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देव , देवियों क नामौ   पिंडी बंधन
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  २५४ -२५५   बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२८
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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तब नंदी तथा मुद्रामुख प्रभृति गणों न पिंडीबंधों तै देखि  उन्क   लक्षण  अर  नाम रखिन।  २५४ -२५५
पिंडीबंधों  नाम अर  स्वरुप -
यी पिण्डीबन्ध - जौंक  नाम विभिन्न देव गण अर देव्युं  नाम पर रखे गेन।  वु इन  छन - ईश्वर की पिंडी नाम ईश्वरी , नंदी की पट्टसी चंडिका की पिंडी सिंहवाहनी ,  विष्णु की तार्क्ष्य ,स्वम्भू (ब्रह्मा) की पद्म ,शकर की ऐरावती ,मनमथ की झप ,कुमार (स्कंध ) की शिखी ,श्री की रूप (उलूक ?) ,जान्हवी की धारा ,यम की पाश ,वरुण की नदी , कुबेर की याक्षी ,बलराम की हलपिंडी ,भोगियों की सर्प ,गणों की दक्षयज्ञविमर्दनी नामौ महापिंडी अर  भगवान शंकर  जौं द्वारा अंधकासुरौ  बिणास करे  गे छौ उंक त्रिशूल की आकृति से चिन्हित  रौद्री नामौ  पिंडी हूंद।  इनि अन्य अवशिष्ट देवी देवों  की भी पिण्डि बि ऊंक चिन्हों से चिन्हित अर उंको नाम अनुसार हूण  चयेंद।  २५६- २६१। 

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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - १ 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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 नृत्य कखम  करे जांद 
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  २६५   बिटेन २६८   तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १२९
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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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-----------भरत उवाच /भरतन बोलि ---
भरत मुनिन उत्तर दे - ये विषयम आशंका छन। ऊंको विषयम बताये जाणु च।  यु जु  बुले गे बल 'नृत्त' कै  विशेष ै अभिवक्ति रहित च- यु ठीक च; किन्तु ये तै शोभा संयोजित जोड़नो हेतु बि  करे जांद। 
प्रायः सबि मनिखों प्रवृति स्वाभाविक रूप से नृत्य इष्ट।/ इच्छा च, अर मंगलप्रद  बि  च , इलै  एक सृजन करे गे। 
यु नृत ब्यौ , पुत्र जन्म ,जमाताक/ दामादक  बरातम उपस्थिति अवसर पर अर  विजय उपलक्ष्य पर अमोद प्रमोदौ  कुण  रचे गे  .२६५ -२६८। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  १३६ 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


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तांडव व वर्धमानक
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भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग  २६८ -२६९    बिटेन २७३    तक

(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १३०
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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इले भूतगण  समूहन  ये म  संयोजित प्रतिक्षेपों /आघातों  की प्रशंसा की।  या प्रवर्त्तना  की - जु नृत  का ठीक प्रकारन विभाजन करि  गीतक प्रारम्भम प्रयुक्त करे जांद। २६८-२६९। 
भगवान शंकरन बि ये तांडव तै तण्डु बतांद बोलि बल -ये तै गीतों दगड़ संबद्ध करदा इ  प्रयोग करे जा। 
 प्रायः तांडव नृत्य देव वंदना कुण  इ करे जांद पर यी श्रृंगार रस युक्त या वैसे उद्भूत सुकुमार भावों प्रयोग से संबंद्ध बि  ह्वे सकद।  २६९-२७१। 
अब मि तण्डु मुनि द्वारा अभिहित तांडव की , वर्धमानक , लक्षणक संग संयोजन विधि या लक्षण बतांदु।  किलैकि या कला , मात्रा ,लय ,अर अक्षरों वृद्धि करद।  इलै  इ वर्धमानक ' बुले जांद।  २७१ २७३। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - १३७  -१३८ 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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    नर्तकी क रंगमंच प्रवेश नियम

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )   २७३ -२७४  , पद /गद्य भाग   बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १३२
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 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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हे मुनियो ! यथोपयुक्त संगीत वाद्यों की व्यस्था /स्थापना करणो पश्चात सूत्रधार का प्रयोग कारो।
तब वीणा अर  गीतों से युक्त उपोहन का प्रयोग करणो उपरान्त नर्तकी तै रंगमंच म प्रवेश करण /छिरण  चयेंद जु भांड  वाद्य क वादन का दगड़  हो।  २७३- २७५।
ये समय प्रयुक्त संगीत विशुद्ध करणों व जातियों से युक्त हों अर दगड़म वाद्य क वादन बि हो। फिर ताल अनुसार गति प्रदर्शन करद  फिर नर्तकी चारि तरफ प्रदर्शन करे। 
नर्तकी ' तै बैशाखस्थान ' द्वारा सबि  रेचकों से युक्त गति क प्रदर्शन करे अर अंजलि म पुष्प लेकि मंच पर प्रवेश करण  चयेंद।  २७५-२७६। 
देवगण हेतु अर गोळ चक्कर लगांद अपण  हथों से वैतै हथों से रंगमंच पर विकीर्ण कौरि दिबतौं  तै प्रणाम कौरि फिर विभिन्न गीत अर मुद्राओं प्रदर्शन दगड़ अभिनय शरू करण  चयेंद।  २७७ -२७८।


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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  १३८  -१३९
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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 नर्तकी प्रवेश व भैर होण
  भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  चौथो ४ (ताँडव लक्षण )    , पद /गद्य भाग २७८ - २७९   बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १३३
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गढ़वळिम सर्वाधिक  पढ़े जण वळ  एक मात्र लिख्वार -आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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जब अभिनय तै कै गीत अनुसार प्रदर्शन हूणु ह्वावो तब वैक दगड़ वाद्य संगीत की संगत नि  हूण चयेंद, किन्तु अंगहारों क प्रयोग दशा म भांड वाद्य (मृदंग आदि ) की संगत अवश्य हो।  २७८-२७९। 
तांडव म जै वाद्य की संगत  ह्वावो वु  वाद्य सम , रक्त , विभक्त व स्फुट ह्वावो , अर  स्पष्ट प्रहारों से शुद्ध ताल उतपन्न करदा नृत्य क विभागों तै यथोचित बतलाण  वळ  ह्वावो।  २७९-२८०
ये प्रकार से गीतुं वाद्यों दगड़ प्रदर्शन कौरि नर्तकी रंगमंच से भैर  आवो व इनि  ऑवर नर्तकी बि  प्रवेश कारन।
यी नर्तकी क्रमश: येयी विधान अनुसार तब तक 'पिण्डीबन्ध' क रचना या प्रदर्शन न करिन जब तक सबि क्रमश: अपण प्रदर्शन पुअर नि कर ल्यावन। यांक बाद 'पर्यस्तक 'तै प्रदर्शन करण शुरू कर दे अर 'पिंडबंधन ' क प्रयोग हूणो उपरान्त ही यी नर्तकी भैर जवन।  २८० -२८२। 

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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  १३९ 
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


 

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