Author Topic: चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita  (Read 5471 times)

Bhishma Kukreti

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हितकारी व अहितकारी भोजन चर्चा

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 25 th,  पचीसवां   अध्याय  (  यज: पुरुषीय     अध्याय   )   पद   ३२   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १९७
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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इन म ऋषि अग्निवेशन ऋषि आत्रेय तैं पूछ -हे भगवन १ कै प्रकार से हितकारी या अहितकारी आहार रूप पदार्थों तै बिना दोष जाण सकदा।  किलैकि हितकारी पदार्थ व अहितकारी पदार्थ मात्रा , काल, क्रिया , संस्कार , भूमि , देह , दोष अर पुरुष भेद से विपरीत , विरुद्ध गुण वळ हितकारी पदार्थ अहितकारी अर अहितकारी हितकारी बण जांदन। ९२। 
जु भोजन शारीरक धातु क प्रकृति अर्थात समानवस्था म रखद अर विषम धातु सम करदन वु हितकारी छन।  यांक विपरीत छन वो अहितकारी छन, हिट अर अहित कारी पदार्थो यु  लक्षण दोष  शून्य छन  । ३३।
 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २७८
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द

Bhishma Kukreti

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आहार का २० मुख्य प्रकार
 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 25 th,  पचीसवां   अध्याय  (  यज: पुरुषीय     अध्याय   )   पद ३४   बिटेन  ३६  तक
  अनुवाद भाग -  १९८
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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इनम  भगवन आत्रेय कुण अग्निवेशन बोलि - बस इथगा बुलण से सब वैद्य सब बात नि समज सकदन। 
तब भगवान आत्रेयन बोलि - जौं  वैद्यों तै आहारयोग्य पदार्थ गुण , कार कर्म , सब अवयव , मात्रा , पुरुष की अवस्था ज्ञान ह्वालु वी इ इथगा उपदेस तै समज सकदन।  जन बुलण से सब वैद्य सम्पूर्ण रूप से जाण सौकन वे इ प्रकार से मात्रा म मात्रा आदि उदाहरण सह बुले जाल।  यूंक भौत भेद हूंदन। आहार की ज्वा विशेष विधि च वै तै पैल साधारण विधि से बुले जाल तब उपरान्त विभाग पूर्वक बुले जाल। यथा आहारत्व गुण सामान हूण से सम्पूर्ण आहार  एकि च किलैकि अर्थ म क्वी भेद नी च।  ये आहारक द्वी उतपत्ति स्थान छन -जंगम व स्थावर।  ये आहार क द्वी प्रभाव छन -हितफलकजनक  व अहितफलकजनक।  इस आहार का चार प्रकार से उपयोग हूंद, यथा -पीण , अशन (दांतुन कटण  , भक्षण (चबाण ), अर लेह्य (चटण)।  ये आहारक छह रस या स्वाद हूण से रस भेद छह प्रकारक च किलैकि रस छह प्रकारक हूंदन ।  ये तरां से आहार बीस प्रकारक हूंद।  यथा -गुरु ,लघु , शीत , उष्ण ,स्निग्ध , रुखो , मंद , तीक्ष्ण , स्थिर , सर , मृदु , कठिन , विशद , पिछल , श्लक्ष्ण, खर , सूक्ष्म , स्थूल , सांद्र , द्रव भेद से।  द्रव्य , संयोग , संस्कार से मिलिक आहार असंख्य प्रकार का ह्वे  जांदन ।  ३४ -३६। 
 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २८० -२८१ 
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द

Bhishma Kukreti

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१५२ विकार नाशी पदार्थ (अवश्य याद राखो )
 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 25 th,  पचीसवां   अध्याय  (  यज: पुरुषीय     अध्याय   )   पद  ३८   -३९ तक
  अनुवाद भाग -  २००
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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अब तक सब प्रकारौ हितकारी , अहितकारी  मुख्य द्रव्यों बाराम बुले गे।  अब अगनै वस्ति आदि कर्मों म अर औषधियोंम मुख्य रूप से अनुबंध  सहित द्रव्यों  व्याख्या करला-
शरीर की स्थिति करण वळ द्रव्यों मदे  अन्न सर्वश्रेष्ठ च।  धीरज , उलार -उछाह , पैदा करण वळ सब पदार्थों म जल , थकान   मिटाण वळ सब पदार्थों म शराब , जीवन दीण वळ पदार्थों म दूध, बृहण करण वळम मांश , अन्नद्रव म रूचि करण वळम लूण , हृदय तै पसंद आण वळो म अम्ल रस , बलकारक द्रव्यों म कुखुड़ , शुक्र वर्धक द्रव्यों म मकर/घड़ियाल  क वीर्य , कफ नाशक वस्तुओं म शहद , वातपित्तनाशक द्रव्यों म घी, वातकफनाशकों म तेल, कफनाशकों म विरेचन , वातनाशकों म वस्तिकर्म , कामलता करण वळोंम स्वेदन , स्थिरता पैदा करण वळोंम व्यायाम , पुरुषत्व नाश करण वळोंम क्षार , अन्न से अरुचि पैदा करण वळोंम तेन्दु , आवाज खराब करण वळोंम कच्चो कैथ , हृदय कुण अप्रिय , ग्लानि कारकों म ढिबरक घी;  शोधनाशक दूधौ  कुण हितकारी दोषनाशक , रक्त बंद करण वळोंम , रक्त पित्तनाशकों म बखरौ दूध , कफवर्धक द्रव्यों म मड़क दही , कमजोर करण वळोंम गवेधुक या बैजंती , कफ व पित्त बढ़ाण वळोंम ढिबराक दूध , निंद लाण वळुंम भैंसौ दूध , विरुक्षता  पैदा करण वळोंम बणकोदो , मूत लाणम गन्ना , मल लाणम वळोंम जौ , वात पैदा करण वळोंम फळिंड , कफ -पित्त पैदा करण वळम टिल क तेल म पकायां पकोड़ी , अम्ल पित्त पैदा करण वळोंम कुल्थी /गहथ , कफ पित्त करणम उड़द ; वमन , आस्थापन अर अनुवासन कुण मदे मैनफल , सुखपूर्वक विरेचन करणम निशोथ , मृदु विरोचकों म अमलतास , तीक्ष्ण विरोचकों म थोर  क दूध , शिरविरोचनों म चिरचिटा क चौंळ , कृमिनाशकों म वायविडिंग, विषनाशकों म सिरीस , कुष्ठ रोग नाशकों म खैर , वातनाशकों म रास्ना, आयु स्थिर करण  वळु म औंळा , पथ्य हितकारी वस्तुओं म हरड़ , वृष्य ,  वातनाशकों म वस्तुओं म अरंडी जड़ ; दीपन , पाचन , गुदा शोथम , बबासीर अर शूलनाशक वस्तुओं म चित्रक मूल; हिक्का , श्वास , कास अर  पार्श्वशूल नाशक द्रव्यों म पुष्करमूल ; संग्राहक , दीपन , पाचन वळ गुण वळि वस्तुओं म नागरमोथ ; दाह कम करण वळ , दीपन , पाचन , वमन , अतिसार खतम करण वळो म नेत्रबाला ; संग्राहक , पाचन , अर दीपनीय वस्तुओं म टेंटू ; संग्राहक , रक्तविनाशक , वस्तुओं म गिलोय ;  संग्राहक , दीपन ,  वातकफ नाशक वस्तुओं म बेलगिरी , दीपन , पाचन , संग्राहक सर्व दोष नाशकों म अतीस ; संग्राहक , रक्त पित्तनाशक वस्तुओं म नीलकमल , श्वेत कमल , कमल केशर ; पित्तकफ  नाशकोंम घमासा ; रक्त पित्तक अतियोग कम करण वळ वस्तुओं म घेउला ; रक्त-पित्त रक्त संग्राहक रक्त पित्त नाशकों  , शुष्क करण वळ वस्तुओं म कूड़े की छाल ; रक्तसंग्राहक , रक्त पित्त नाशकों म गंभारी फल ; संग्राहक , वातनाशक , दीपनीय अर शुक्राणुवर्धक वस्तुओं म पृश्निपर्णी ; वृष्य अर सर्व दोष नाशकों म खरैंटी; मूत्र कृच्छ्र , वायु नाशकों म गोखरु ; छेदनीय , दीपनीय , अनुलोमिक (मल मूत्रक लोमिक ) , वाट नाशक वस्तुओं म अम्लवेतस , मल निसारक , पाचनीय अर्श नाशक वस्तुओं म यवक्षार ; गृहणी दोष , अर्श , घृत जन्य रोगों म रोगुं शान्ति कुण , तक्र क सतत सेवन ; ग्रहणी , शोथ , अर्श नाशक वस्तुओं म व्याघ्र आदि मांश खाण वळ पशु मांश ; रसायनोंम दूध अर घीक सतत सेवन ; उदावर्तनाशक अर वृष्यकारक वस्तुओंम घी अर सत्तू बराबर खाण; दांतुं बल अर रुचि , चमक , कांटी पैदा करणम तेल से गागल करण ; जलन शांत करणों कुण चंदन अर गूलर लेप ; ठंड दूर करणों लेपुं मदे चंदन अर अगरक लेप ; जळण म त्वग रोग , पसीना दूर करणम क्त्रीण अर खस लेप; वातनाशक मर्दन अर लेपम कूट ; आंख्युं कुण हितकारी , वृष्य , केश्य कंठ का हितकारी वर्ण बल , रंग जनक , अर रोपण जनक म मुलैठी ; प्राण दिँदेर वस्तुओंम  वायु ;आम विकार , मल मूत्र अवरोध , ठंड , शूल , कम्पन दूर करणो आग  तपण ; स्तम्भक पदार्थों म जल ; तीस कम करणो कुण गरम पाणी  (गरम पत्थर  से बुझायुं पाणी ) पिलाण ;आम रोग कारकों म अधिक खाणा खाण ; अग्निवर्धकों म जठराग्नि  वृद्धि क वास्ता शरीर अनुसार  व प्रकृति अनुसार भोजन ;  आरोग्यकारकों म समय पर भोजन करण ; अनारोग्य उत्पादक पदार्थों म वेग रुकण (मल मूत्र , वीर्य ,  आदि रुकण ); मन की प्रसन्नता कारियोंम मद्य ; बुद्धि , धैर्य , स्मृति नाशकोंम मद्य को अधिक सेवन ; पचणम कठिन वस्तुओंम गुरु , गरिष्ठ भोजन ; सुगमता से पचण वळ वस्तुओंम एक समय भोजन करण ; शोथ (सूजन ) अर क्षय कारी वस्तुओंम  अधिक स्त्री संग; नपुंसक कारी वस्तुओं म वीर्य वेग रुकण ; अन्न म अश्रद्धा पैदा करणम बधस्थल ; वायु ह्रास कारणों म नि खाण ; क्षीण , निर्बल करण वळम कम खाण ; ग्रहणी रोग करण वलोंम भोजन का ऊपर भोजन करण; अग्नि तै विषम करणों कारणोंम समय पर नि खाण (कुसमय खाण ); कुष्ठ रोग पैदा करणम वीर्य विरुद्ध खाण (जन मछली अर दूध का सेवन ) का सेवन ; सब पथ्योंम शांति; सब अपथ्योंम थकान /परिश्रम ; व्याधियों म मुख्य वमन, विरेचन , आहारम मिथ्यायोग; दारिद्र या अमंगल कारणोंम रजस्वला स्त्री से संभोग; आयुवर्धक वस्तुओंम ब्रह्मचर्य; रोग वर्धकोंम शोग; वृष्य वस्तुओंम संकल्प ; अवृष्य वस्तुओं म मन की अप्रसन्नता; प्राणहारक कारणोंम सीमा से भैर कार्य करण; शर्म नाशकोंम नयाण ; पुष्टिकारक वस्तुओंम प्रसन्नता; सुकाण वळ वस्तुओंम सोग; पुष्टिकारकों म संतोष; नींद लाण वळुंम पुष्टि ; आलस्य करण वळोंम निंद ; बलकारी वस्तुओंम सब रसोंक हभ्यास; निर्बल करण वळ -एकि रस सेवन ; खैंचि निकळण वळ अयोग्य  वस्तुओंम गर्भ रुपी शल्य; भैर निकाळण वळ वस्तुओंम; कोमल औषधि उपचारम बालक ; याप्य रोगोंम बिर्ध ; तीक्ष्ण वेग की औषध अर व्यायाम त्यागण वळोंम गर्भवती; गर्भ स्थिर कराण वळोंम मन की प्रसन्नता; दुष्चिकत्स्य रोगों म सन्निपात जन्य रोग ; कठिन चिकित्सा म आम जन्य रोग ; सौब रोगोंम जौर ; दीर्घ रोगुंम कोढ़; रोग समूहोंम राज्य क्षमा , आनुषंगिक रोगुंम प्रमेह; अनुशास्त्रुंम , जोंकम  , तंत्रोंम , वस्ति: औषध भूमिम हिमालय; आरोग्य क्षेत्रोंम मरुभूमि ; अहितकारी देशोंम जल युक्त जलवायु ; रोगिक चारोंगुणों म  वैद्य आदेशानुसार काम करण; चिकित्सा क चरी अंगु म वैद्य ; स्वास्थ्य वस्तुओंम मस्तिष्क; दुखदायी कारणोंम लोभ ; अरिस्ट अर्थात मृत्यु कारणों म नि चलण; रोग लक्षणोंम मन दुश्चिंता; शोक , संदेह मिठाण वळुम वैद्य समूह; वैद्य का गुणोंम देस काल अनुसार चिकित्सा करण ; औषधियोंम यथार्थ ज्ञान ; ज्ञानसाधनोंम तर्क सहित शास्त्र; काल ज्ञान समयानुसार कार्य करण ; व्यवसाय नि करण ,समय क नाश करण वळो कारणोंम कर्म क दिखण संदेह मिटाण वळम ; भय करण वळ कार्योंम असामर्थ्य ; बुद्धि वृद्धि वळ कारणोंम विद्या जणगरुं दगड़ दगुड़  अर बातचीत ; शास्त्र का तत्व जणनो कुण  आचार्य; अमृतोंम आयुर्वेद; कर्तव्योंम सत्य वचन; सबसे अहितकारी वस्तुओंम असत्य  सेवन;  सौब प्रकारौ  सुखम संन्यास श्रेष्ठ तर या श्रेयकर हूंदन।  १३८।
ये प्रकारन १५२ (एक सौ बावन ) श्रेष्ठ पदार्थ बोल दिए गेन जु विकार समाप्त करदन ।  ३९। 
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २८२ -२८८
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द , गढ़वाली गद्य में बीमारियों का वर्णन , गढ़वाली गद्य में आरोग्य साहित्य

Bhishma Kukreti

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पथ्य व अपथ्य द्रव्यों म भेद

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 25 th,  पचीसवां   अध्याय  (  यज: पुरुषीय     अध्याय   )   पद  ४०  बिटेन  ४५  तक
  अनुवाद भाग -  २०१
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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जु  पदार्थ सरैलो दोष सामान करदन , या समन अवस्था म रण दींदन वो श्रेष्ठक लक्छण छन।  यूंक कार्य करणै शक्ति  से इ श्रेष्ठ अर हीं भेद करे गेन।  इनि वात , पित्त अर कफ नाशौ कुण जु वस्तु श्रेष्ठ च अर रग नाश करणम उत्तम च यूं तैं जाणि चिकित्सा शुरू करण चयेंद।  इन करण से वैद्य तै धर्म अर काम द्वी उद्देश्य प्राप्त हूंदन।  सरैल अर मन दुयुं कुण जु अप्रिय ह्वावन वो अपथ्य होवन ( यु जरूरी नी) इन नि समजण चयेंद । मात्रा (जनकि  उचित मात्रा घी पथ्य च किन्तु अधिक अपथ्य ) , काल (सर्दियों म पहाड़ों म सुबेर सुबेर दही खाण अपथ्य ) , क्रिया (घी विरुद्ध द्रव्य  घीयक दगड़ लीण ), भूमि (क्षेत्र ) , देह (स्थूल वळ कुण घी अपथ्य ), दोष (कफ म कच्चो घी खाण ) से भेद ह्वे जान्दन।  ये अनुसार विष बि पथ्य ह्वे जांद अर पथ्य वस्तु अपथ्य बण जांद ।  इलै यश चाही वैद्य तैं वस्तु क स्वाभाव , प्राकृतिक गुण , मात्रा , काल आदि कु विचार करण चयेंद।  ४० -४५।
 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २८८ -२८९
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
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Bhishma Kukreti

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८४ मुख्य आसव (वनस्पति  से निर्मित औषधि  ) 

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 25 th,  पचीसवां   अध्याय  (  यज: पुरुषीय     अध्याय   )   पद  ४६  बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  २०२
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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आत्रेय ऋषि बचन सूणी ऋषि अग्निवेशन पूछि - महाराज ! प्रतिष्ठानुसार  तुमन   पथ्य -अपथ्य क सम्पूर्ण रुप से प्रतिपादन कौर याल। अब तुमसे  द्रवों  विस्तृत जानकारी सुणन चाणा छा।  ४६।
भगवन आत्रेयन अग्निवेश तैं उत्तर दे - अग्निवेश ! संक्षेपम यूं सब्युं उतपति स्थान ९ छन -यथा - धान्य , फल , मूल , सार , पुष्प , काण्ड , पत्ती , बक्कल , अर शक्कर। यूंको मिश्रण , संयोग व करण (क्रिया ) से असंख्य आसव बणदन।  यूं मदे मुख्य हितकारी २४ चौबीस आसव इन छन -
सुरा , सौवीरक , तुषोदक , मैरेय  अर मेदक अर धान्याम्ल यी छै धान्य कांजी छन।  द्राक्षा , खजूर , गंभारी , धानन्य, खिरनी , केतकी, फालसा , हरड़ , औँळा , बयड़ , फळिंड, कैथ , बड़ो  बेर , छुट बेर  , झाडी क बेर , प्याल , कटहल , बौड़ , पिपुळ , तिमल ,कपीसन , पिलखन , जवाण , सिंघाड़ा , अर शंखनी यी उन्नीस फलासव छन।  शालपर्णी , अश्वगंधा, कृष्णगंधा , शतावरी , निशोथ , जमालघोटा ,मुगलाई  ऐरंड , बेलगिरी , ऐरंडमूल , अर चीतामूल अग्यारह मूल आसव छन। बड़ साल , अश्वकर्ण , चंदन,  तीनस , खैर , सफेद खैर , सलधन , अर्जुन , असन , विद खादिर , तिन्दुक , अपामार्ग , जंड, बेर , शीशम , सिरस , अशोक अर मुलैठी यी बीस सरासव' छन।  लाल आठ दल वळ पद्म , नीलकमल, कुमुद , सौगंधिक , पुण्डरीक , सफेद कमल , शतपत्र  कमल , महुआ पुष्प , प्रियंगु , धाय पुष्प यी दस पुष्पवासन छन।  गन्ना , गन्ना मथ्याक भाग , गन्ना जड़ , पौंडा  यी  चार कांडासव छन।  परवल अर ताड़क पत्ता द्वी 'पत्रासव' छन।  शाबर लोध , पठानी लोध , एलवालुक , क्रमुक यी चार 'त्वगासव ' छन। ये हिसाबेँ यी ८४ चौरासी आसव छन।  सत का खिंच्याण से युंकुन आसव बुल्दन।  द्रव्यों संयोग व विभागन   असंख्य  ह्वे जांदन।  आसव अपण अर संयोग अर संस्कार से कार्य करदन।  संयोग संस्कार अर्थात देश (भस्म  राशि , धान्य राशि ) काल, संधान अर  मात्रा हूंद।  कार्य की अपेक्षा से इ आसवों संयोग संस्कार रुपी कार्य करे जान्दन। ४७ । 
मन , शरीर , अग्नि तैं बल दीण वळ , निंद नि आण , शोक अर अरुचि मिठाण वळ , मन प्रसन्न करण वळ श्रेष्ठ चौरासी आसव बुले गेन।  शरीर अर रोगुं उतपत्ति , ऋषियों मत , आहारक हित -अहित विधि , का अंतिमसार , पथ्य -अपथ्य अर श्रेष्ठ आसव ये अध्याय म बुले गेन।  ४८ -४९।
II यज: पुरुष अध्याय , २५ वां अध्याय समाप्त ह्वे II
 
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २८९ - २९१
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शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द

Bhishma Kukreti

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रसों का प्रकार पर चर्चा - १
 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   १ पद   बिटेन ८   तक
  अनुवाद भाग -  २०३
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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अब भद्र काप्यीय अध्याय कु व्याख्यान करला जन कि भगवन आत्रेय बोलि छौ।  १-२। 
आत्रेय , भद्र काप्यीय , शाकुन्तलेय, पूर्वाक्ष , मौदगल्य, हिरण्याक्ष, कौशिक , भरद्वाज , कुमारशिर, वार्योविद , वैदेह महाराज , निमि , महाराज वडिश , श्रेष्ठ ब्रह्विक , कंकायन क वववृद्ध अर जितेन्द्रिय महर्षि चैत्र रथ नामौ सुंदर वन म विहार करणा छा।  तब उख रस द्वारा आहार का निर्णय करण पर चर्चा ह्वे।  ३ -७।
 भद्र काप्यन बोलि - रस एकि च जैतै पाँचों इन्द्रियों का विषयों मदे एक जीबक विषय बुल्दां , यु रस जल से अभिन्न च अर एकि च । 
शाकुंतलेय ब्राह्मणन बोलि - रस द्वी छन एक छेदनीय अर दुसर उपशमनीय।
पूर्वाक्ष मौदगल्य ऋषिन बोलि - रस तीन छन यथा -छेदनीय , उपशमनीय अर अर्थात साधारण। 
हिरण्याक्ष कौशिकन बोलि -रस चार छन।  स्वादु  (प्रिय ) हितकारी , स्वादु अहितकारी , अस्वादु हित अर अस्वादु अहित। 
कुमारशिरा भरद्वाजन बोलि - रस पांच हूंदन।  पृथ्वीका , पाणीका , तेजका , वायुका , आकाशका।
राजर्षि वारयोविदन बोलि - रस छै हूंदन।  गुरु , लघु , शीत , उष्ण , स्निग्ध अर रुक्ष।
वदेह निमिन बोलि - रस सात छन -मधुर , अम्ल , लवण , तिक्त , कटु , कसाव अर क्षार।
धाभार्गव बडिन बोलि - रस आठ छन - मधुर , अम्ल , लवण , तिक्त , कटु , कसाव,  क्षार अर अव्यक्त।
कंकायनन बोलि - गुण , कर्म संस्वाद भेदों से रस अगणित ह्वे जांदन।  ८। 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २९२  -२९३
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द

Bhishma Kukreti

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केवल अर  केवल छै रस

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  काप्यीय  अध्याय   )   पद  ९ 
  अनुवाद भाग -  २०४
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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यां  पर पुनर्वसु भगवान आत्रेयन बोलि - रस छै इ हूंदन। यथा - मधुर , अम्ल , लवण , कटु , तिक्त , अर कसाय। यूं छै रसों उतपति स्थान पाणि इ च।  छेदन अर उप शमन यि द्वी कर्म छन।  यूं दुयूं मिलण से साधारण ह्वे जांदन।  स्वादु अर अस्वादु रूचि छन।  हित अर अहित  प्रभाव छन।  पंच महाभूत विकार छन।  यी रसक  आश्रय  स्थान छन अर यि रस नि छन।  गुरु,  लघु , शीत , उष्ण , स्निग्ध , रुक्ष द्रव्यों म आश्रित गुण छन जु प्रकृति (स्वभाव से इ मूंग मधुर तो लघु  ) विकृति (चौंळुं से बणयु खील अर सत्तू बड़ा भारी छन ) विचार (द्रव्यान्तरमेल जनकि मधु अर घीक मेल विष बण जांद  ) , देस (द्वी प्रकारौ जन भूमि व रोगी ), भूमि जनकि श्वेतकपोती विषहरी हूंद तो हिमाला की औषधि बिंडी गुण वळ हूंदन , शरीर देस जन टांगक मांश कंधा मांश से गुरु हूंद , अर समय यूंको भेद से उपजद ।  क्षार। खार रस नी च।  किलैकि क्षरण हूण से भौत सा पदार्थों से उतपन्न हूणो कारण अनेक रस हूण से , कटुक ,लवण आदि रसुं अनुभव हूण से क्षार म स्पर्श अर गंद हूण से यु द्रव्य च, रस नी अर अन्य कारणम भष्म आदि से निर्मित हूण से रस नी  ।  अव्यक्त बि रस नी किलैकि अव्यक्ता त कारणम इ च।  यांक अलावा अनुरसम अव्यक्तिभाव हूंद।  रस क पैथर जो रस हूंद वू अनुरस च।  जनकि -रुक्ष कसायानुरसो मधुर:कफपित्तहा।  यथा अनुरस म अव्यक्ता हूंद।  अर जु बुले गे बल रसों क आश्रय बिंडी हूण से रस असंख्य छन वक्तव्य ठीक नी।  किलैकि एक एक रस यूं आश्रय रुपी भावों मंगन कै एक भाव का आश्रय लेकि विशेष रुप से रौंद।  (जनकि मूंग , चौंळ , दूध , घी म मधुर रस आश्रय अलग अलग हूण पर बि मधुर रस  इकजनि   च। जनकि दूध बगुला , कपास म आश्रय अलग अलग हूण पर बि रंग सफेद इकजनि च।  आश्रय असंख्य छन किन्तु रस छै से भिन्न हूण असंभव च।  अर बुले जावो कि भिन्न भिन्न रसुं मिलण से रस असंख्य छन भी सही वक्तव्य नी च।  किलैकि दगड़म मिलण पर बि यूंक गुरु , लघु , आदि गुण या मधुर आदि स्वभाव असंख्य ह्वे जांदन।  किन्तु इखम बि मधुर आदिक प्रकृति ही त मिल्दन।  अर्थात रस मिलण से रस असंख्य नि ह्वे जांदन।  इलै मिल्यां रसुं करमुं उपदेश बुद्धिमान नि करदन।  इलै प्रत्येक रस का लक्षण अलग अलग हि बुले जाल।   
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १९३ - २९४
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
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  आयुर्वेदिक द्रव्यों लक्षण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  १० 
  अनुवाद भाग -  २०५
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एक अगनै आयुर्वेद का उपयोगी द्रव्य भेद पर बुले जाल - इखम ज्वी बि द्रव्यों बारा म बुले जाल सब पंच महाभूत से बण्यां  छन। यी द्वी प्रकारै छन।  चेतना युक्त अर अचेतन।  ये द्रव्यका  जख शब्दादि गुण छन उख गुरु आदि  बीस गुण छन।  द्रव्य क पांच कर्म हूंदन।  यथा -वमन ,विरेचन , शिरोविरेचन , आस्थापन अर अनुवासन।  यूं द्रव्योंम जु पृथ्वीजन्य छन वु  प्रायः गुरु , कर्कश, कठोर, धीमा , स्थिर , अलग -अलग , सांद्र , स्थूल , अर गंद युक्त गुण वळ हूंदन।  यी पार्थिव पदार्थ उपचय संघात , भारीपन , अर स्थिरता करदन।  जलीय पदार्थ तरल , स्निग्ध , शीत , मंद , पिच्छिल , जलीयगुण युक्त हूंदन।  यी द्रव्य नम , स्नेह , बंधन , परस्पर मिलाण वळ , कोमलता , प्रल्हाद शरीर इन्द्रियों तर्पण करण वळ छन।  आग्नेय द्रव्य गरम , तीक्ष्ण , सूक्ष्म , लघु , रखा , विशद , अर अग्निवत हूंदन।  यी द्रव्य जळाण , पकाणा , कांति , प्रकाश , रंग उतपन्न करदन।  वायवीय पदार्थ लघु ,शीत , रुखो , खर , सूक्ष्म , स्पर्श गुण वळ हूंदन।  यी शरीर म ग्लानि , रुखोपन , निर्मलता अर लघुता उतपन्न करदन।  आकाश गुण वळ द्रव्य मृदु , लघु , सूक्ष्म , स्रोतोंम पौंचाण वळ , चिपुळ ,शब्दगुण , वळ हूंदन।  यि सरैल म मृदुता , छिद्राधिक्य अर लघुता उतपन्न करदन। १०।   
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २९५
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औषधि द्रव्यों का प्रकार
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 खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ११   बिटेन  १२  तक
  अनुवाद भाग -  २०६
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उपरोक्त द्वारा जगत म जु बि द्रव्य मिल्दन सौब उपाय , प्रयोजन उद्देश्य से  वूं  तईं औषध समजण चयेंद, अर्थात यि सौब दोष नाशी छन , निरुपयोगी नि छन ।  पार्थिवादि द्रव्य केवल गुरु या खर आदि गुणों से औषध या दोष नष्टि नि बण जांदन किन्तु द्रव्य द्रव्य क प्रभाव से , गुण क प्रभाव से , द्रव्य अर गुण दुयूं प्रभाव से वै वै समयम , वै अधिष्ठानक आसरो   लेकि वै योजना अर प्रयोजन तैं लक्ष्य कौरि जु करे जांद वु कर्म च , जनद्रव्य क प्रभास से दन्ती (जमाल गोटा ) विरेचक च , मणि धारण करण विष दूर करद।  गुणक प्रभाव से -जौरम तिक्त   रस , ठंड म आग।  द्रव्य अर गुणक प्रभावन जनकि -काळो  मृगछाला।  इखम मृगछाला द्रव्य च अर काळो गुण।  यांपर जु काम करदन जनकि शिरोविरेचक द्रव्य शिरोविरेचन करदन जु कर्म च।  जैक द्वारा उष्ण द्वारा शिर विरेचन अर यु वीर्य शक्ति च ।  जख कर्म करे जांद वु अधिकरण च जन शिर ।  जब करे जांद वु 'काल ' च , जन करे जांद वु उपाय च।  अर इनम जु प्राप्त हूंद /सिद्ध हूंद वु फल च।  ११।
रसोंक भेद - यूं छै रसों क  द्रव्य प्रभाव से जनकि हिमाला का दाड़िम अर अंगूर मिठ हूंदन अर हौर जगाक खट्टा।  समय प्रभाव से यथा - कच्चो आम कसैला , कुछ समय बाद खट्टो अर फिर मिट्ठो।  या हेमंत म औषधि मिठी अर बरखाम खट्टी।  इनमा भेद ६३ ह्वे जांदन।  १२।   -
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २९६
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
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द्वि रस योगिक १५ प्रकारा रस
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद १३ 
  अनुवाद भाग -  २०७
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द्वी रस वळुं पंदरा भेद छन - मधुर अर अम्लक योग से पांच , अम्ल अर लवणक योग से चार , लवण अर कटुक योग से तीन, कटु  अर कषायक योग से द्वी  अर कषाय अर टिकट योग से एक रस बणद।  यथा
१- मधुराम्ल, २- मधुरलवण , ३- मधुरकटु , ४- मधुरतिक्त ,५-  मधुरकषाय ६- अम्ललवण, ७- अम्लकटु ८- अम्लतिक्त ९- अम्लकषाय १०-लवणकटु ११- लवणतिक्त १२- लवणकषाय १३- कटुतिक्त १४- कटुकषाय १५- तिक्तकषाय।  १३। 
 
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ २९६   
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