Author Topic: अरस्तु का पेरी पोएटिक्स का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of  Peri poietik  (Read 494 times)

Bhishma Kukreti

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     अरस्तु  का  पेरी पोएटिक्स का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of  Peri poietik

क्वी बि भाषा तब समग्र रूप म विकसित हूंद जब भाषाक साहित्य म बनि बनी प्रकार का साहित्य भंडार हो I एक साहित्य वो बि हूंद जु अन्तराष्ट्रीय स्तर का साहित्यकार , दार्शनिकों व आध्यामिक विचारकों ण रची हो . in विचारकों विचरो अनुवाद बि भाषा कुण आवश्यक हूंद . ये इ विषय तैं केंद्र म रखी मी इखम सुकरात का पेरी पोएटिक्स का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of  Peri poietik कु अनुवाद प्रस्तुत करणों छौन I तुम लोखुं प्रतिक्रिया आवश्क च . मैं पूरी आशा ch मी अपर उद्येश म सफल होलू .
प्रतिक्रिया अवश्य देण
तुमर ही
भीष्म कुकरेती

Bhishma Kukreti

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अरस्तु (एरिस्टोटल ) कु पेरी पोएटिक्स कु गढ़वाली अनुवाद ( शब्दानुवाद )
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(ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
[Garhwali Translation of Peri poietikes by Aristotle (on the Art of poetry )
Based on the Translation by INGRAM BYWATER (oxford 1920) ]
भाग - १
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
( (ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
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क्वी बि भाषा तब समग्र रूप म विकसित हूंद जब भाषाक साहित्य म बनि बनी प्रकार का साहित्य भंडार हो I एक साहित्य वो बि हूंद जु अन्तराष्ट्रीय स्तर का साहित्यकार , दार्शनिकों व आध्यामिक विचारकों ण रची हो . in विचारकों विचरो अनुवाद बि भाषा कुण आवश्यक हूंद . ये इ विषय तैं केंद्र म रखी मी इखम अरस्तु (एरिस्टोटल ) का पेरी पोएटिक्स का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Peri poietik कु अनुवाद प्रस्तुत करणों छौन I तुम लोखुं प्रतिक्रिया आवश्क च . मैं पूरी आशा ch मी अपर उद्येश म सफल होलू .
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----अरस्तु (एरिस्टोटल ) परिचय -
यूनानी दार्शनिक अरस्तु (एरिस्टोटल ) (३८४ - ३२२ BC ) प्लेटो क च्याला अर सिकंदरौ गुरु छौ। अरस्तु (एरिस्टोटल ) को साहित्यिक रचनाओं म वै बगतौ यूनानौ राजनैतिक वातावरणो क्वी विशेष छाप नि मिलदी।
सुकरातौ साहित्य कार्य (पेरी पोएटिक्स ३३० BC ) म राजनीति विषय नी च। ये ग्रंथ कु कुछ इ भाग बच्यूं च या मील। काव्य सिद्धांत प्लेटो तैं उत्तर च। वास्तव म सुकरातौ कविता सिद्धांत वैको अपण च। पेरी पोएटिक्स वास्तव म नाटक सबंधित च।
--- पेरी पोएटिक्स कु अनुवाद भाग १ -
हमर विषय कविता पोएट्री च। म्यार प्रस्ताव केवल साधारण रूपम कला से संबंधित नी च , अपितु यांक भौत सा उपश्रेणी अर ऊंको सक्यात /गुण पर बि : कथानकौ (muthos /plot ) संरचना कविता कुण आवश्यकता हूंद; कविता संरचनौ भागुं संख्या अर ऊंको प्रकृति; अर ये प्रकार से हौर विषय बि परखे जाल। आवा प्राकृतिक अनुक्रम तै दिखला अर पैल प्राथमिक तत्वों से शुरू करला।
महाकाव्य , त्रासदी , अर प्रहसन )कॉमेडी ) देव पूजा कविता बि , रौद्र स्तोत्र , विलाप जन सब छन , जु समग्र रूप से दिखे जाल, यी सब अनुकरण ( mimesis नाटक ) का साधन छन। ,अर दगड़म यी यी एक हैंक से तीन प्रकार से अलग छन, या तो अर्थ कु कारण विशेष /अलग छन या उद्देश्य का कारण विशेष / अलग छन या अनुरकरण से विशेष /अलग ह्वे जांदन।
जन कुछ रूप (form ) अर रंग तै साधन बणांदन , जु यूंको सहायता से अनुकरण ( नाटक , नकल करदन ) , या चित्रांकन करदन ,अर कुछ ध्वनि प्रयोग करदन; मथ्याक कला समोहः म बि , समग्र रूप से ऊंको साधन छन पद्य (rhymes ), भाषा अर राग (melody ) , यद्यपि इखुलि या दगड़ /जुंटा म। पद्य अर राग कु दगुड़ पाइप प्लेइंग कु साधन च अर गीत गाण या हौर कला बि ह्वे सकदन , उदाहरणार्थ अनुकरण वळ बांसुरी वादन। रागहीन पद्य नचाड़ कुण अनुकरणीय हूंद; इख तलक कि वेक व्यवहारौ तरंग, लोगुं स्वभावो प्रतिनिधित्व करद , इख तलक कि वु क्या करदन अर ऊंको दुःख (बि ) I यांसे अगनै , एक इन कला बि च जु केवल भाषा से इ अनुकरणीय )नकल ) हूंद , बिना राग का ,पद्य या गद्यम, अर जु कविता रुपम च त , कै क्वी एक रुपम या कई मीटरुं म । , यी अनुरक्त कला को आज क्वी नाम नी च (संभवतया तब यूनान म स्वांग या नाटक नाम नि छौ। )
हाँ अंतम , कुछ ऑवर कला छन जखम तुकबंदी वळ पद्य /rhymes, राग /melody अर कविताओं /verses प्रयोग करे जांद। अर्थात हमम उद्धत /dithyrambic अर आर्थिक।/नोमिक कविता, त्रासदी/tregedy , प्रहसन /comedy छन; विशेषता का दगड़ , तथापि, यी तीन प्रकारौ साधन कुछ स्थलों म इकदगड़ी , कुछ स्थलुं म अलग अलग, एक का पश्चात हैंक प्रयोग हूंदन। यी तत्व मथ्याक कलाउं म अलग हूंदन म्यर अर्थ च नकल /स्वांग / imitation करदा दैं
शेष अग्वाड़ी भागम
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती २०२१
First Authentic Garhwali Translation of Peri Poetikses by Aristotle, First Ever Translation of Peri Poetikses by Aristotle in Garhwali Language; First Ever Garhwali Translation of a Greece Classics; गढ़वाली भाषा में प्रथम बार अरस्तु (एरिस्टोटल ) /अरिस्टोटल के पेरी पोएटिक्स का सुगढ़ अनुवाद , यूनानी साहित्य का प्रथम बार गढ़वाली में अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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अरस्तु   कु  पेरी पोएटिक्स कु  गढ़वाली अनुवाद  ( शब्दानुवाद ) भाग - २

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(ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
[Garhwali Translation of  Peri poietikes  by  Aristotle (on  the Art of poetry )
Based on the Translation by INGRAM BYWATER (oxford 1920) ]

 अनुवादक  - भीष्म कुकरेती
( (ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
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 जु बि अनुकरणकार (कवि या स्वांगकार )  अनुकरण करद वो कार्य छन (actions )  I वु   [स्वांग (कार्य ) ]  का कर्ता क  कार्य  आवश्यक रूप से  भला  लोग ( संभवतया राजा या  भद्र /elite )  या बुरु (Bad, संभवतया दास  ) - सदा इ , मानवीय  स्वभाव की विविधता  ये प्राथमिक विशेषता  से  इ उपजदन, चूँकि पाप अर  पुण्य का भेद रेखा  सरा मानव जाति  क च।  इलै ध्यान दीण  वळि  बात च  , जु  लोग प्रतिनिधि  करदन वूं  तै भला से अळग  या तौळ  स्तर  पर हूण  चयेंद , या जन हम अछेकि छंवां (वास्तविक ) I पेंटिंग /चित्रांकन की तुलना कारो।  पोलिग्नोटिस का चित्रों  तै , चित्र म लोग हम से बच्छा छन, पाऊसन का वास्तविक से निकम छन , डाइनोसियस का चित्रों म  लोग हमर जन इ  छ्न।  यु स्पष्ट च बल  प्रत्येक अनुकरणौ अळगौ अभिरुप /रचना  उपरोक्त भेद तै स्वीकार कारल ( रचनाकार ग्रहण कारल ) , अर जब  क्वी माध्यम विशेष भेद प्रयोग करदन तो वो अलग प्रकार को अनुकरण  ह्वे जांद।  इख तक कि  नाच , बांसुरी वादन , गीत संगीत /गायन म बि   वा विविधता संभव च; अर  यो नामहीन कला म बि संभव च जखम भाषा , गद्य या   रागहीन  पद्य प्रयोग हूंद ,  यांको  अर्थ च; उदाहरणार्थ  होमर का चरित्र हमसे अच्छा छन; क्लेओफोन का चरित्र हमर स्तर का छन; अर  थासॉस का  ( रचयिता ) हेजेमोन,  पैरोडी का पैलो लिख्वार , अर  निकोचेरस  कु रास्कल्स'   महाकाव्य, यूंमाँ निम्न स्तर कु  च (मानव चरित्र चरित्रीकरण )।    वी  उत्स्व गीत व नामकरण गीत  पर  बि लागु हूंद; चरित्रों चरित्रीकरण  विशेष उदाहरण छन ( अध्याय लुप्त )  अर अरगस , अर  'साइक्लोप्सेस'  का (चरित्र ) टीमोथियस अर  फिलोजेनस।  यु भेद विलाप ( कला) अर प्रहसन  तै  बि अलग (पछ्याणक ) करदन; एक  बुरा से बुरा चरित्र अनुकरण  तै पसंद करदन अर दुसर (अनुकरणम )  आज का मनिखों से अच्छा (पसंद करदन ) । 

शेष अग्वाड़ी  भाग ३
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती २०२१ age., First Ever Garhwali Translation of a Greece Classics; गढ़वाली भाषा में प्रथम बार अरस्तु  /अरिस्टोटल के पेरी पोएटिक्स का सुगढ़ अनुवाद  , यूनानी साहित्य का प्रथम बार गढ़वाली में अनुवाद , 


Bhishma Kukreti

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अरस्तु   कु  पेरी पोएटिक्स कु  गढ़वाली अनुवाद  ( शब्दानुवाद )  भाग - ३

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(ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
[Garhwali Translation of  Peri poietikes  by  Aristotle (on  the Art of poetry )
Based on the Translation by INGRAM BYWATER (oxford 1920) ]

अनुवादक - भीष्म कुकरेती

( (ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
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यूं  कलाओं म एक तिसर  भिन्नता  बि हूंद ,  शैली  जैमा  कला   उद्देश्य प्रतिनिधित्व हूंद।    एक इ साधन अर अनुकरण कुण  एकि उद्देश्य  हूण पर या तो कथा द्वारा या चरित्र उदाहरण से व्यक्त कर सकद जन कि होमर करद , या सब स्थलों म  बिन परिवर्तन कु एक सामान रावो या  अनुकरणकर्ता /रचनाकार सरा कथा तैं  नाटकीय रूप म बताई /प्रतिनिधत्व सकद जन बुल्यां  यि  सच्ची ह्वे ह्वावन। 
       जनकि  पैली बतै  याल बल , इलै , यूं  अनुकरणों म  यी तीन भेद /विशेषता हूंदन - ऊंको  साधन , ऊंको उद्देश्य  अर ऊंकी  शैली।
  अतः  , अनुकरणकर्ता  (रचनाकार)  रूपमा  एक ओर सोफ़ोकलस च अर दुसर  ओर  होमर , द्वी भला लोगन चित्रण करदन , अर  दुसर ओर  अरिस्टोफोन्स च , चूंकि द्वी अपण चरित्रों तै इन प्रस्तुत करणा  छा जन  पाठ खिलण  हो /ऐक्टिंग हो अर कर्म।  वास्तवम, कुछुं अनुसार यो इ  कारण च बल क्रीड़ा तेन स्वांग /ड्रामा  बुले जांद,  किलैकि  प्ले म चरित्र कथा म जीवित हूंदन।  (charcters atc the  story )  I . इलै   ग्र्रीक का  द्वी  डोरियन्स  ट्रेजिडी अर  कॉमेडी  अपण  अन्वेषण बुल्दन तो मेगारियन कामदी पर स्वत्व बथान्दन , मेगारियन  सिसिलियन मेगारियन से अलग  प्रजातन्त्री  खंड ह्वे , अर ऊँन  बोली बल  कवि इपीकारमस  ऊंको  देस कु  च जु चिओनाइड्स अर मैग्नेस से पैल  छा; इख तलक कि  कुछ पेलेपोन्नेसिई  डोरियन्स बि त्रासदी पर स्वत्व बथांदन।  अपण  समर्थन म सि  लोक बुल्दन बल सि  दूरस्थ गाँव कुण 'कोमायी ' (komai ) बुल्दन , जब कि  ऐंथस  वळ 'डेमेस (demes, demoi  ) बुल्दन ,  अर्थात  प्रहसन कवि तै komoi  से नाम नि  मील , अपितु एक गांव से हैं गांव परिभ्र्रमण से मील, सि  अभिनय (act ) कुण 'ड्रान ' (dran, प्रहसन करण  ) बुल्दन तो एथेंस वळ प्राटेन (prattein,   ) बुल्दन।   
संख्या व प्रकृति अनुसार अनुकरण म भौत भेद हूंदन। 
शेष अग्वाड़ी  भाग - ४ म
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती २०२१
First Authentic Garhwali Translation of Peri Poetikses by Aristotle, First Ever Translation of   Peri Poetikses by Aristotle in Garhwali Language., First Ever Garhwali Translation of a Greece Classics; गढ़वाली भाषा में प्रथम बार अरस्तु  /अरिस्टोटल के पेरी पोएटिक्स का सुगढ़ अनुवाद  , यूनानी साहित्य का प्रथम बार गढ़वाली में अनुवाद , एक या तो


Bhishma Kukreti

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       कविता जन्म अर अनुक्रमण सिद्धांत

अरस्तु   कु  पेरी पोएटिक्स कु  गढ़वाली अनुवाद  ( शब्दानुवाद )  भाग -४

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(ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
[Garhwali Translation of  Peri poietikes  by  Aristotle (on  the Art of poetry )
Based on the Translation by INGRAM BYWATER (oxford 1920) ]
 
अनुवादक - भीष्म कुकरेती

( (ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
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यु स्पष्ट च बल कविता जन्म द्वी कारणों से ह्वे,   ऊं  मध्ये प्रत्येक मनिख- प्रकृति  भाग च।  बचपन से इ अनुकरण करण मनिखौ प्रकृति म हूंद , हमम निम्न स्तर का  प्राणियों तुलना म एक सुविधा च  बल  संसारम  हम सर्वाधिक अनुकरण करण वळ प्राणी छंवा अरहम अनुकरण से इ पैल-पैल सिखदा I अर यु बि हम कुण एक प्राकृतिक  (घटना ) च बल हम तै अनुकरण कार्य म आनन्द आंदो /मिल्दो I दुसर बिंदु तै अनुभव से बताये जै सक्यांद, यद्यपि क्वी  विषय या वस्तु  वास्तविक धरातल म दुखदायी ह्वावन, किन्तु जब यूँ तै वास्तविक रूपम  कै अन्य कला म दिखाए जान्दं तो हम आनन्दित हूंदा जनकि निम्न स्तरीय जन्तु या  मुर्दा I यांको स्पष्टीकरण अग्वाड़ी का तर्कों म बि मिल सकद;  जकि सिखणम सबसे बिंडी आनन्द आंदो , ना केवल दार्शनिकों तै किन्तु साधरण  मनुष्य तैं बि, हालांकि कम ही संख्या सै I चित्र  दिखण म आनन्द को  एक कारण च बल दिखणो अतिरिक्त हम वस्तु क अर्थ बि सिखदा छा, उदाहरणार्थ , वो मनिख इन तन च (या स्यु स्यु च ) I जु कैन व वस्तु पैल नि देखि हो,  वैक आनन्द अनुकरणकरण  रूपम  चित्र म नि होलू  ( आनन्द नि मीलल ) अपितु रंग या  इनि इकजनी   कारकों से  होलू  I अनुकरण, तब , हमकूण प्राकृतिक हूंद , जन – मेलोडी/मधुर गीत या मधुर कविता /गीत, अवश्य ही छंद मीटर  गीत का इ  ह्वाल,  मूल कौशलम, अर  कई  क्रमगत  प्रयत्नों द्वारा  सुधार /विकास से, कई , अर्थात कविता की रचना सुधार से ही हून्दी I
  कविता , तथापि , शीघ्र इ ,  कवियों मनोदशा अनुसार द्वी भागों म बंट जांदी; ऊं मध्ये अधिक गंभीर (कवि ) भद्र कार्य का प्रतिनिधित्व करदन,  अर  शैली भद्र व अधम कार्यो  छंटनी   करद। पैल  पैल अभद्र प्रतिनिधि  न अपशब्द युक्त /  गाली गलौज वळि  अभद्र कविता रच, जन हौरुंन गेय कविता या चारण कविता। हम तै  होमरक निम्न स्तरै   कविता , यद्यपि संभवतया  तन  कवि भौत संख्या म छया; उदाहरण होमर का  पैथर   मिल जाला, जन कि वैक (Margites) अर इनि  हौरुं  कविता। इन अपशब्द युक्त कविताओंम  लघुचरण युक्त मीटर  (दुहराव ) प्रयोग करे गे ;  इलै हमर वर्तमान ढांचो लघु गुरु चरण युक्त मीटर (दुहराव )  ऊंको  मीटर छौ जु  अपण  लघु गुरु चरण युक्त मीटर दुसरों विरुद्ध प्रयोग करदा छा।  यांक फल यु ह्वे बल यूं  पुरण लिख्वारों मादे कुछ ओजपूर्ण /वीर रसौ लिख्वार  ह्वेन तो बाकि अपशब्दों साहित्यो  लिख्वार ह्वेन।  होमर की स्तिथि , तथापि ,  बिगळीं च: जन कि वैकि शैली  गंभीर  छे , कवियों का कवि,  वु केवल साहित्यिक श्रेष्टता म सबसे बिगळ्यूं /अलग  नि छौ, किन्तु अनुकरणम बि  नाटकीयता वळ  छौ, अर  वी हम कुण   प्रहसनौ शैली बि लै , जो अपशब्दों नाटकीयता प्रयोग से ना अपितु बेतुका नाटकीयतौ प्रयोग से; वैक  Margites हमर प्रहसन म ऊनि च जन हमर करुणा (tragedy ) म Iliad अर Odyssey  छन।  जनि , तथापि , त्रासदी अर प्रहसन  धरातल म पसर , ऊंन  एक पंक्ति का कवियों तै आकर्षित कार अर एक पंक्ति का लिख्वार लघु गुरु छोड़ि  प्रहसन का रचनाकार  ह्वे गेन अर  महाकव्य का स्थान पर हौर त्रासदी म आकर्षित ह्वे गेन, किलैकि यी द्वी नया कला माध्यम पुरण  कला माध्यम  से   अधिक सुंदर व अधिक सम्मानजनक छा। 
अब जु पूछे जाल बल रचनात्मक दृष्टि से त्रासदी कन  च तो नाटकीयता दृष्टि से दिखण पोड़ल।
जन कि प्रहसन म बि  ह्वे , त्रासदी बि कामचलाऊ व्यवस्था (आशु रचना ) से शुरू ह्वे अर प्रहसन व चारण गीतों रचनाकारों दगड़ लैंगिक  गीत जो अबि   बि हमर संस्थाओं म  नगरों म ज़िंदा च ।   फिर यांक विकास धीरे धीरे , जु  बी ऊंम छा (प्राचीन ) म  हर कदम पर सुधार करिक  ह्वे। वास्तव म लम्बो अवधि म परिवर्तन से पुराणी  त्रासदी रुक अर आजौ प्राकृतिक रूप प्राप्त ह्वे।  अस्चाइल्स द्वारा रंगमंच कलाकारों संख्या एक   से द्वी कराई गे अर सामूहिक गान तै छुट/सीमित   कौरिक  मुख्य कलाकार कुण  वार्तालाप   पक्का करे गे।  सोफ़ोकलस  की दृश्य अर तिसरु  कलाकार च।  त्रासदी न महत्ता बि पायी।  छुटि कथाओं अर  आकर्षक स्थान पर  व्यंग्यत्मक मंच न स्थान पायी, विकासौ पैंथरौ   भाग म अर द्विमात्रिक चतुष्पदी से लघु गुरु चरण वळम  परिवर्तन ह्वे  ।  चतुष्पदिक प्रयोग को मुख्य कारण छौ बल या काव्य शैली व्यंग्यौ  कुण उपयुक्त छे अर  नाचौ  कुण उपयक्त छे ।  जनि वाच्य माध्यम से जुड़ तनि प्राकृतिक रूप से यु सही उपयुक्त  मीटर आयी।  लघु गुरु चरण युक्त कविता सबसे अधिक वाच्य माध्यम च, ार हम आम बोल चल म बि प्रयोग करदां , जबकि हम भौत कम इ हेक्जामीटर (षट्पदी ) म बचल्यांदा , वो बि जब आवाज म परिवर्तन करदां । हैंको परिवर्तन छै श्रृंखला /episode म संख्या वृद्धि  का।  अलंकरण जुड़न, प्रवेश  क  विषय बड़ो च ार विस्तार की आवश्यकता च ।
चौथो भाग समाप्त
     
 
 
 
शेष अग्वाड़ी  भाग - म 
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती २०२१
First Authentic Garhwali Translation of Peri Poetikses by Aristotle, First Ever Translation of   Peri Poetikses by Aristotle in Garhwali Language., First Ever Garhwali Translation of a Greece Classics; गढ़वाली भाषा में प्रथम बार अरस्तु  /अरिस्टोटल के पेरी पोएटिक्स का सुगढ़ अनुवाद  , यूनानी साहित्य का प्रथम बार गढ़वाली में अनुवाद ,
 


Bhishma Kukreti

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 प्रहसन /कौमदी  अर  त्रासदी - महाकाव्य म भेद  पर अरस्तु विचार

अरस्तु   कु  पेरी पोएटिक्स कु  गढ़वाली अनुवाद  ( शब्दानुवाद )  भाग - 5
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(ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
[Garhwali Translation of  Peri poietikes  by  Aristotle (on  the Art of poetry )
Based on the Translation by INGRAM BYWATER (oxford 1920) ]

अनुवादक - भीष्म कुकरेती
( (ईरानी, अरबी उर्दू शब्दों क वर्जना को प्रयत्न करे गे )
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जख तलक कौमदी /प्रहसनौ प्रश्न च , यो  (अवलोकन करे गे )  औसत मनिखों से बि   निकृष्ट  व्यक्तियों  कु अनुकरण च; निष्कृष्ट , तथापि , प्रत्येक हीनतर नि छा , हाँ एक विशेष प्रकारौ उपहास की बात च , जु भद्दो जाति क च ।  उपहास  परिभासित करे सक्यांद  बल अशुद्ध या विकृत , जु   दुःख जन्मदाता नी   या दूसरौ कुण हानिकारक नी च, मुखौटा /उपमुखम , उदाहरणार्थ , जु हंसी की तीब्रता वृद्धि करद , जु कुछ भद्दो हूंद  अर बिन दुःख दियां विकृत हूंद। 
  उन त , त्रासदी म क्रमगत परिवर्तन का लिख्वार जण्यां पछयणां  छन , कौमदी /प्रहसन /चबोड़ / चखन्यौ का बारा म हम इन नि  बोल सकदा, यांक प्रथम काल अज्ञात इ राई, किलैकि अबि तक बि  (ईं विधा )  तै गंभीरता से नि लिए गे । यांक विकास कु  पैथरो भागम अर्कोनोंन कौमदी कलाकारों  अनुदान दे या कदर कार या पछ्याणक दे (granted by archon  ); वो बि बस स्वेच्छिक छा (volunteers )  (अर्थात  कौमदी कोरसौ प्रायोजक नि  रै होला ) ।  जब यूं  प्रहसनों क रिकॉर्ड /अभिलेखीकरण शुरू ह्वे त  अवश्य इ कौमदी /प्रहसन कु  कुछ निश्चर रूप ऐ गे छौ अर प्रहसन कवियों न   निश्चित शब्द प्रयोग शुरू कर याल छौ ।   यु  उत्तरहीन इ च कि कौंन मुखौटा/उपमुख दे , प्रस्ताव कैन दे , या कलाकारूँ भीड़ दे (तब नाटक कोर्स /कलाकारों भीड़  युक्त म  खिले जांद छा) ।  तथापि , प्लाट कु जन्म सिसली म  ऐंठन का एपिचारमस  अर फार्मस कवियों से ,  ह्वे , क्रेटस न व्यक्तिगत गाळी से प्रहसन शुरू कार अर व्यक्तिगत व अव्यक्तिगत वृति क हास्य /प्रहसन कथौं ढांचा तयार कार ,  दुसर  शब्दों म  प्लाट।   ( बाइवाटर कु नोट -  क्रेट्स  से पैल  राजनैतिक व्यक्तियों कु चबोड़ करे जांद छौ , क्रेट्स अरस्तु से पैलक लिख्वार च , क्रेट्सन मिथ आधारित प्रहसन शुरू कार।  यु एक दिशा इंगित करदो बल राजनीतिज्ञों राजनीतिज्ञों पर भद्दा चबोड़ रुकवाई )  ।
महाकाव्य , तब ,  इख तलक कि  त्रासदी दगड स्वीकृत ह्वे ,  याने   गंभीर   विषयों काव्यात्मक  भव्य अनुकरण (Imitation )  । यूंमा भेद छन ,  तथापि , १ - वेमा एक प्रकार की कविता म अर लम्बी कथा , २ - लंबै - इलैकि क्रियाओं म समय  प्रतिबंध नई हूंद, जबकि  त्रासदी म  समय   सीमा नि हूंदी , जबकि  त्रासदी म सीमा  सीमित  हूंद , सूरज उगण से अछल्याण तक , या  थोड़ा भौत   यांक न्याड़  -ध्वार ।  यु , म्यार विचार से एक भेद च , यद्यपि पैल  व्यवहारम  ये  विषयम  महाकाव्य अर त्रासदी इकसनि  छा।  वूंमा  एक हैंको  भेद  च ३ - घटकों म अंतर, कुछ दुयुं म सामान हूंदन, कुछ महाकाव्यों म विशेष हूंदन -इलै  भलो या बुरो महाकव्य कु आलोचक (न्यायकर्ता ) बि  त्रासदी आलोचक हूंद।  महाकाव्य का अभी घटक /अंग त्रासदी म हूंदन किन्तु सबि त्रासदी अंग महाकाव्य म नि मिल्दन। 

शेष अग्वाड़ी  भाग - म
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती २०२१
First Authentic Garhwali Translation of Peri Poetikses by Aristotle, First Ever Translation of   Peri Poetikses by Aristotle in Garhwali Language., First Ever Garhwali Translation of a Greece Classics; गढ़वाली भाषा में प्रथम बार अरस्तु  /अरिस्टोटल के पेरी पोएटिक्स का सुगढ़ अनुवाद  , यूनानी साहित्य का प्रथम बार गढ़वाली में अनुवाद ,   

 

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