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Re: Information about Garhwali plays-विभिन्न गढ़वाली नाटकों का विवरण

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:

Dosto,


 हमारे वरिष्ट सदस्य श्री भीष्म कुकरेती जी ने विभिन्न गढ़वाली नाटको के बारे में एक कुछ विशेष जानकारी इक्कठा किया है जिसे कुकरेती जी मेरापहाड़ फोरम में प्रस्तुत कर रहे है! हमें उम्मीद है आपको भीष्म जी का यह प्रयास पसंद आएगा!
 
 एम् एस मेहता
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
इकीसवीं सदी क गढ़वाळी स्वांग/नाटक -२
 
 
 
गिरीश सुंदरियालौ नाटक 'असगार' मा चरित्र चित्रण - फाड़ी -१
 
                   Bhishm Kukreti
 
'असगार' गिरीश सुन्दरियालौ स्वांग खौळ 'असगार' मादे एक स्वांग च .
हाँ असगार मा चरित्र चित्रण से पैलि 'स्वांगु मा चरित्र चित्रण ' पर छ्वीं लगाण जरूरी ह्व़े जांद.
१- पुरातन चीनी सिद्धांत
२- पाश्चात्य सिद्धांत
३-- भारतीय सिद्धांत
४- मनोविज्ञानऔ ज्ञान
चीन मा स्वांग
चीन मां स्वांग भैर बिटेन आई . मंगोल स्वांग तैं चीन मा लैन पण चीन मा स्वांग बढण मा कन्फ्युसिस अर बुद्धौ सिधांत दगड़ी चलीन. इलै
चीन मा उद्येसात्म्क स्वांग जलदा मिल्दा छ्या
चीन मा क्वी भरत या अरस्तु जन क्वी नाट्य शास्त्री नि ह्व़े जैन क्वी किताब लेखी ह्वाओ . पण चीन का पुराणा स्टाइल च .
चीन मा आठवीं सदी पैथर इ नाटक जादा विकसित ह्व़े . अर इन बुले जान्द बल हरेक गाँ मा स्वांग खिले जांद छा.
पैल स्वान्गुं मा नाच अर गाणा जरुरी छ्या. स्वान्गुं मा प्रतीक को जादा इस्तेमाल हूंद छयो. 'टछौउएन खि' प्रकारौ (७०० -९०७ ई.) वीर रसौ स्वांग छ्या.
संग राज मा (९६०-१११९) स्वान्गु मा हौर विकास ह्व़े .अर ये जुगौ स्वांगु खुण 'हाई-खिओ' बुल्दन. ये जुग मा अब स्वान्गुं मा एक बड़ो महत्वपूर्ण चरित्र आई
जु गांदो बि छयो .
११२५ बिटेन १३६७ ई. क टैम चीनी स्वान्गुं खुण सौब से बढिया टैम बुले जान्द . ये बग तौ स्वान्गुं कुण -यूएन-पेन अर टसाकी बुले जांद यूएन-पेन
क छ्वटु रूप .कुण यें किया बुले जान्द.
ये बगत सैकड़ों स्वांग रचे गेन
काओ टोंग किया क स्वांग 'पी-पा-की' (१४ वीं सदी ) अबि तलक भौति रौन्स्दार स्वांगु मादे एक स्वांग माने जांद.ये स्वांग को मुख्य उदेश्य च चरित्रवानऔ गुण अर शिक्षा.
असल मा यू ड्रामा दुस्चरित्र वळा स्वांगु विरुद्ध लिखे गे छौ अर भाती पोपुलर ह्व़े. याने कि चीनी ड्रामा मा शिक्षा अर चरित्रवान गुण पैलो शर्त माने गे .
शास्त्रीय चीनी स्वान्गुं मा चरित्र वान, सीख अर उदेश्य होण जरुरी छौ.
चीन मा बि भारतौं तरां नाटकों तैं पाश्चात्य जन खाली ट्रेजिडी अर कौमेडी मा नि बंटे गे. चीन मा विसयुं क हिसाब से बारा तरां शास्त्रीय स्वांग होन्दन
चीन स्वांगु मा धार्मिक प्रवृति -धर्म पर विश्वास, भगवत कृपा, दैवीय शक्ति , त्याग भावना, (बुद्धौ नियम आदि) ,
ऐतिहासिक नाटक बि शास्त्रीय स्वांगु मा मिल्दन ट ऐतिहासिक चरित्र बि चीनी स्वांगु मा चीन मा मिल्दन.
अपराधी चीनी स्वांग बि भौत छन अर यूँ स्वांगु खासियत च - पापी/पाप कि खोज अर निर्दोष तैं न्याय-निसाब.
चीन मा प्रेम युक्त -हंसदर्या ड्रामा बि मिल्दन
जन कि चीन मा भारत जन जाति हिसाब नि होंद त नाटकों मा बि जात क हिसाब से स्वांग चरित्र नि रचे जान्दन.
शास्त्रीय चीनी स्वान्गु मा चरित्र पद का हिसाब से रचे जान्दन. स्वान्गुं कथों मा पद पर जोर होंद
भौत सा सीन अर चरित्र केवल प्रतीकुं से चित्रित होन्दन.
चीनी नाटकूं मा जनान्यूँ चरित्र प्रकार भौत छन- उच्च पदासीन से जुड़ी , त्यागी जनानी से नौकर्याण तक
सौत्या डाह आदि बि खूब मिल्द.
चीनी नाटकूं मा अंक अर सीन होन्दन अर पैल त विषय भौति लम्बा होंदा छ्या त चरित्र चित्रण बि वनी होंदा छ्या.
तौ ळ का कुछ विषय चरित्र चित्रण औ अन्थाज लगाणो बान काफी छन
-दर्शकुं समणि भुक डुबण, विष से, फांसी से, त्रास आदि से मिरत्यु
-अचरज/आश्चर्य
-जादू/जादूगरी
-भूत/पिचासुं से बदला लीण या भूतुं से न्याय दिलाण
-भौं भौं किस्मौ ब्यौ
-पैत्रिक सत्ता क वर्चव्स
-राजा तैं महान बथाण
चीन का पुराणा स्वान्गु एक बडी खासियत छे - लेखक इ मुख्य कैरेक्टर अर मुख्य वक्ता बि होंद छौ.
-नाटक मा गितांग होण जरूरी छौ, माना कि गितांग को चरित्र नाटक मा मोरी जान्दो त फिर दुसर चरित्र गाणा गालो
-प्रतीक अर अलंकृत भाषाऔ भरमार होंदी छे
चीनी ड्रामा दर्शकुं रूचि हिसाब से इ रचे जांद छ्या याने कि ड्रामों मा पॉप-कल्चर छौ , याने कि मौज -मस्ती क बान ड्रामा रचे जान्द छ्या ( संस्कृत मा इन नि छौ, ड्रामा शास्त्रीय हिसाब से लिखे जांद छ्या जन कि कालिदास का स्वांग)
चीन मा पाठ खिलण वाळ तैं ट्रेनिंग मा भौत मेनत करण पड़दो छौ. नाट्य गुरु दर्शकुं समणि इ वैकी (च्याला) परीक्षा लीन्दा छ्या
चीनी नाटकूं मा चरित्र /पाठ खिलण वाळ तैं यूँ चीजुं पर ध्यान दीण पड़दो छौ
१- वाच/स्पीचअर गीत गाणो ढंग /गीतुं मा माहरथ
२- चलणो ढंग
३- सरैल से पाठ खिलण याने बौडी लैंगवेज को स्वांग मा महत्व
४-कपड़ा, मेक अप, स्टेज कि जानकारी
चीनी नाटकों मा मास्क /मुखौटों महत्व अर मुखौटों प्रतीक chhan
१- सुफेद मुखौटा - पापी, दोषी, राक्षस , कुमति , धोकेबाज, घुन्ना, अण-अंथंजण्या याने कि विलियन या प्रतिनायक
२-हौरू मुखौटा - भिरंगी, दौन्कार/ गुस्सैल् , टणक्या, जु अफु पर काबू नि कौर सकदो
३- लाल मुखौटा - भड़ , वीर, भक्त . समर्पित
४-काळो मुखौटा - जडबडो, बबर, खरो
५-पिंगुळ मुखौटा - महत्वाकांक्षी , बबर, ठंडो-दिमागौ
६-नीलू मुखौटा - इरादा पक्को , अडिग निष्ठावान
सन्दर्भ -१- भारत नाट्य शाश्त्र अर भौं भौं आलोचकुं मीमांशा
२- भौं भौं उपनिषद
३- शंकर की आत्मा की कवितानुमा प्रार्थना ४-और्बास , एरिक , १९४६ , मिमेसिस
५- अरस्तु क पोएटिक्स
६- प्लेटो क रिपब्लिक
७-काव्यप्रकाश, ध्वन्यालोक ,
८- इम्मैनुअल कांट को साहित्य
९- हेनरिक इब्सन क नाटकूं पर विचार १०- डा हरद्वारी लाल शर्मा
११ - ड्रामा लिटरेचर
१२ - डा सूरज कांत शर्मा
१३- इरविंग वार्डले, थियेटर क्रिटीसिज्म
१४- भीष्म कुकरेती क लेख
१५- डा दाताराम पुरोहित क लेख १६- अबोध बंधु बहुगुणा अर डा हरि दत्त भट्ट शैलेश का लेख
१७- शंकर भाष्य
१८- मारजोरी बौल्टन, १९६०. ऐनोटोमी ऑफ़ ड्रामा
१९- अल्लार्ड़ैस निकोल
२० -डा डी. एन श्रीवास्तव, व्यवहारिक मनोविज्ञान
२१- डा. कृष्ण चन्द्र शर्मा , एकांकी संकलन मा भूमिका
२२- ए सी.स्कौट, १९५७, द क्लासिकल थियेटर ऑफ़ चाइना
बकै अग्वाड़ी क सोळियूँ मा......
फाड़ी -१
१- नरेंद्र कठैत का नाटक डा ' आशाराम ' मा भाव
२- गिरीश सुंदरियाल क नाटक 'असगार' मा चरित्र चित्रण
३- भीष्म कुकरेती क नाटक ' बखरौं ग्वेर स्याळ ' मा वार्तालाप/डाइलोग
५- कुलानंद घनसाला औ नाटक संसार
६- दिनेश भारद्वाज अर रमण कुकरेती औ स्वांग बुड्या लापता क खासियत
फाड़ी -२
१-ललित मोहन थपलियालौ खाडू लापता
२-स्वरूप ढौंडियालौ मंगतू बौळया
३- स्वरूप ढौंडियालौ अदालत
Copyright@ Bhishm Kukreti

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
इकीसवीं सदी क गढ़वाळी स्वांग/नाटक -3
गिरीश सुंदरियालौ नाटक 'असगार' मा चरित्र चित्रण - फाड़ी -2
                            भीष्म कुकरेती
 
स्वांगूं पच्छमी सिद्धांत
 
                  १- अरस्तु सिद्धांत
 
पच्छमी देसूं मा काव्य अर स्वान्गू पर सबसे पैल कलम अरस्तु (३८४-३२२ ई.) की चौल.
अरस्तु से उन्नीसवीं सदी आखिरैं तलक पच्छमी देसूं मा नाटकों द्वी ही प्रकार माने गेन- ट्रेजिडी/त्रासदी अर कोमेडी (हौंस आदि )
अरस्तू न स्वान्गुं बारा मा इन बोली छौ -
अ- धारणा -
 
अरस्तु बिटेन इ ए विवादोऊ पर्वाण लग बल नाटकुं मा व्यक्ति की महत्ता होण चयेंद या वस्तु की.
१- अरस्तु हिसाब से कथा अर कार्य नाटकुं चरित्र या चरित्र्य से जादा कामौ ( महत्वपूर्ण ) च
२- कार्य, कथा या कथावस्तु ही तरास/ट्रेजिडी क लक्ष हों चयेंद याने कि कार्य आदि क उदेश्य ट्रेजिडी प्राप्ति च
३- असल मा चरित्र कार्य व्यौहार कु भुर्त्या च
४- चरित्रौ नि होंण से बि तरस / ट्रेजिडी ऐ सकद च पन कथा/कार्य व्यौपार बगैर कबि बि ट्रेजिडी नि ऐ सकदी
५- कथानक ट्रेजिडी कि आत्मा च. कथानक/कार्य व्यौपार को स्थान पैलो च अर चरित्रौ जगा दुसर च
६- घटना सन्गठन कु अळगौ स्थान च
 
ब- कार्य व्यौपार अर चरित्र -
 
काम द्वी तरां होन्दन
 
१- जाणि बूजिक क्र्याँ करतब
२- अजाणि मा हुयाँ काम या परिस्थिति दबाब मा कर्याँ काज
अरस्तु क मनण छौ बल अजाणि मा हुयाँ या परिस्थिति क दबाब मा कर्या काम ट्रेजिडी लांदन
स- त्रासिदी क नाट्य पात्र
१- त्रासदी नायक तैं पूरो सदाचारी नि होण चयेंद
२- त्रासदी क पात्र पूरो दुराचारी बि नि होण चयेंद
३- इख तलक कि खल नायक तैं बि पूरो दुराचारी नि होण चयेंद
द- त्रासदी क नायक
१- नायक तैं पूरो सत्चरित्र नि होण चयेंद
२- खलपात्र त्रासदी नायक नि ह्व़े सकद
३-नायक तैं ह्म्जन /सहज इ होण चयेंद
४- नायक तैं ऊँचो कुलौ / उच्च कुलीन (पद) अर नामी होण चयेंद
५-नायकु पतन स्वाभावौ कमजोरी होण चयेंद ना कि घड़यूँ धुर्यापन /विचारयुक्त दुष्टता
इ- चरित्र चित्रण अर चरित्र्य क सिद्धांत
१- चरित्र तैं भद्र होण चयेंद
२- औचित्य जरुरी च (तर्क /कुतर्क अर वितर्क मा भेद)
३-चरित्र जिन्दगी नजीक होण चयेंद
४-चरित्र मा इक्सारिपन होण चयेंद . बिंडीरुपुं तैं इकरुपी बणावो
५- चरित्र दिखाण मा समभावना होण चयेंद
६- श्रेष्ठता को बखान होण चयेंद
होरेस (६५-८ ई.) कु औचित्य सिधांत
काव्य समीक्षक होरेस क बुलण च बल
१- हरेक चरित्र औ चर्रित्र चित्रण वैकी अवस्था क हिसाबन होण चयेंद
२-डाइरेक्टर आदि तैं कला, या नाटक तैं तागत दीणो बान छूट मिलण चयेंद
३- पात्रुं बचळयात (सम्वाद) पात्रुं सामाजिक पद, जगा, मनस्थिति , ज़ात, रंग, रौणै जगा,
अर लिँग औ हिसाबन होण चएंद
४- नाटक तैं सम्पूर्ण अर सौष्ठव पूर्ण होण चएंद
नामी गिरामी नौर्वे बासिन्दा , स्वांगकार हेनरिक जौन इब्सन (१८२८-१९०६) का ख़याल
१- स्वांग लिख्वार तैं पात्र अर पात्रुं क चारित्रिक खूबी क तलक जाण जरूरी च
२-नाटककार तैं चरित्रुं बारा मा पैल सुचण चएंद अर शब्दुं बारा मा पैथर सुचण चएंद
३-नाटककार तैं आपन पात्र अर ऊं पात्रुं मनोविज्ञान - समाजिक स्तिथियौ पूरी जानकारी होण चएंद
 
                 विलियम आर्चर (स्कौटलैंड १८५६-१९२४ )
 
१- नाटक मा चरित इ जादा महत्वपूर्ण छन
२-चमत्कारिक परिवर्तन (अचाणचको बदलौ ) सिद्धांत माने होंद चरित्र विकास पर ध्यान.
                            लाजम एग्री
 
अ- चरित्रों महत्व
चरित्रुं गुण अथाअ छन , बगैर चरित्रौ क्वी स्वांग ना त खिल्याई च ना इ कबि लिख्याल
ब- नायक अर खलनायक
नायक नाटकौ केंद्र हूंद अर खलनायक नायकु बरोबर को इ होण चयेंद
स- पात्रुं त्रिआयामी गुण
१- सरैल-लिंग, आयु, ऊँचै , वजन, रंग, आंखि, बाळ, हौ भौ, गातौ हिसाब किताब(मुंड, मुख, अंगुळ जन बात)
दोष (जन्मजाति रोग, कुरूपता, ) वंश/खार ,
२- सामाजिक -जात, भुर्त्या, नेगिचारी(सेवक) , रज़ा, अर बीचौ
३- चाकरी ( काम, कामौ समौ, सक्यात), पढाई लिखै ,गिरस्थी, धर्म, पंथ, देस, भाषा, राजनैतिक पौंच ,
टैम बिताणो /मनोविनोद का साधन आदि
द- मन सम्बन्धी सिद्धांत
१-यौन सम्बन्ध, नैतिकता
३-आकांक्षा , गाणि -स्याणि , महत्वाकांक्षा
४-निरासा
५-सुभौ
६-जिन्दगी दिखणो ढर्रा
७- - जटिलताएं, परेशानी, संघर्ष
८- विश्वास अर अंधविश्वास
९- अंतर्मुखी या बहिर्मुखी या घुन्ना
१०- शक्यात /योग्यता
११- गुण, सुचणो तागत, कल्पना शक्ति, निर्णै लीणै कुवत, रूचि-अरुचि, क्याँ से प्रेम-क्याँ से घीण
मारेन एलवुड
१- चरित्र तैं जीवंत बणाण जरूरी च
२- क्वी कठण अळजाट/ महत्व पूर्ण समस्या हूणि चयेंद
३- तर्क
४-चरित्रुं मा विश्सनीयता अर प्रभावित करणै तागत हूण चयेंद
५- चरित्र निर्माण मा चरित्रुं क्वी ना क्वी छवि दिखणेरूं मगज मा हूण चयेंद
६- हरेक पात्रौ काम मा वजह अर अवस्था क वजूद/उपस्थिति/एक्जिसटेंस हूण जरूरी च
 
                ई.एम् फ्रोस्टर
द्वी किस्मौ चरित्र होन्दन - सरल अर जटिल
                  नाटक शिक्षक सुसान पैटीसनऔ पाठ
 
नाटककार तैं चरित्र निर्माण मा तौळौ हिदैत ध्यान मा धरण चयेन्दन
१- चरित्रौ पूरी कल्पना
२- चरित्रुं बारा मा जनता मा ख़याल, जणगरूं ख़याल अर दुयूं खयालूं मा क्या भेद च
३- चरित्रौ इतियास क्या च
४- चरित्रौ नाटक मा पिछलो कथा क्या च
५- चरित्रौ हौरुं दगड क्या क्या रिश्ता च
६-चरित्रौ नाटक मा जरुरत इ किलै च ?
७-चरित्रुं आपस मा संघर्ष /तनातनी
८- चरित्र निर्माण मा चरित्रौ भूतकाल को योगदान
९- चरित्रौ समणि आण अर नाटक मा पूरो कामकी कल्पना

सन्दर्भ -१- भारत नाट्य शाश्त्र अर भौं भौं आलोचकुं मीमांशा
२- भौं भौं उपनिषद
३- शंकर की आत्मा की कवितानुमा प्रार्थना
४-और्बास , एरिक , १९४६ , मिमेसिस
५- अरस्तु क पोएटिक्स
६- प्लेटो क रिपब्लिक
७-काव्यप्रकाश, ध्वन्यालोक ,
८- इम्मैनुअल कांट को साहित्य
९- हेनरिक इब्सन क नाटकूं पर विचार १०- डा हरद्वारी लाल शर्मा
११ - ड्रामा लिटरेचर
१२ - डा सूरज कांत शर्मा
१३- इरविंग वार्डले, थियेटर क्रिटीसिज्म
१४- भीष्म कुकरेती क लेख
१५- डा दाताराम पुरोहित क लेख
१६- अबोध बंधु बहुगुणा अर डा हरि दत्त भट्ट शैलेश का लेख
१७- शंकर भाष्य
१८- मारजोरी बौल्टन, १९६०. ऐनोटोमी ऑफ़ ड्रामा
१९- अल्लार्ड़ैस निकोल
२० -डा डी. एन श्रीवास्तव, व्यवहारिक मनोविज्ञान
२१- डा. कृष्ण चन्द्र शर्मा , एकांकी संकलन मा भूमिका
२२- ए सी.स्कौट, १९५७, द क्लासिकल थियेटर ऑफ़ चाइना
२३-मारेन एलवुड ,१९४९, कैरेकटर्स मेक युअर स्टोरी
बकै अग्वाड़ी क सोळियूँ मा......
फाड़ी -१
१- नरेंद्र कठैत का नाटक डा ' आशाराम ' मा भाव
२- गिरीश सुंदरियाल क नाटक 'असगार' मा चरित्र चित्रण
३- भीष्म कुकरेती क नाटक ' बखरौं ग्वेर स्याळ ' मा वार्तालाप/डाइलोग
५- कुलानंद घनसाला औ नाटक संसार
६- दिनेश भारद्वाज अर रमण कुकरेती औ स्वांग बुड्या लापता क खासियत
फाड़ी -२
१-ललित मोहन थपलियालौ खाडू लापता
२-स्वरूप ढौंडियालौ मंगतू बौळया
३- स्वरूप ढौंडियालौ अदालत
Copyright@ Bhishm Kukreti

Bhishma Kukreti:
Hundred Years of Modern Garhwali Drama

                    Samaj: A Garhwali drama about Social problems
(Information about ‘Samaj’ a Garhwali drama by Ghana Nand Bahuguna)
(Notes on Garhwali Dramas, Kumauni Dramas, Uttarakhandi Dramas, Himalayan Dramas)

                                              Bhishm Kukreti

                 There is less information available about a Garhwali drama ‘Samaj’.
            Abodh Bandhu Bahuguna (1976) stated that after Bhavani Datt Thapliyal (1900-1940), most of the contributors of Garhwali literature contributed for Garhwali poetry.   Mostly, Garhwalis preferred contributing to Hindi prose than Garhwali language prose. Bahuguna further said that a couple of Garhwali creative came in the field of Garhwali prose as Ghana Nand Bahuguna. Ghana Nand Bahuguna published ‘Samaj’ drama from Ganga Pustakmala Karyalay, Luchnow in the month February of 1930. The drama ’Samaj’ has a significant place in the field of Garhwali prose. ‘Samaj’ has been the instruments in stopping de-growth /de-generation of Garhwali prose. Bahuguna further narrated ‘Raula ki Khaulyau dekhik I gad ko pata chald . The said statement of Abodh Bandhu Bahuguna appreciated Ghana Nand Bahuguna for his contribution in Garhwali prose and the subject of ‘Samaj’ drama too.
          It is clear that the subject of ‘Samaj’ is about social problems and social reforms.
         Dr Hari Datt Bhatt Shailesh (1986) informed in his research article ‘Garhwali Natak evam Rangmanch: Ek Vihngam Avlokan ‘that Ghanannand Bahguna published a Garhwali drama ‘ Samaj’ in 1930. Dr Bhatt further states that this way there was initiation of Garhwali drama  (Bhakt Prahlad) and it gets continuous development (about ‘Samaj’).
            Dr Bhakt Darshan (1986) provided the following briefing about ‘Samaj’ a Garhwali drama that Ghana nand Bahuguna was born in village Pokhari, Chalansyun (great Sanskrit scholar Meghakar Bahuguna’s great grandchild) of district Pauri Garhwal.  Ghana Nand Bahuguna had been famous advocate f in Pauri. Ghana Nand Bahuguna was prolific writer of Garhwali, English and Hindi languages. Ghana Nand Bahuguna expired on 13th February 1964 in Pauri.  Bahuguna was also an active social worker of Pauri who published a Garhwali drama ‘Samaj’.     
 (Recently, this author came in contact with the grand son (who is an advocate too) of Shri Ghana Nand Bahuguna through facebook . He wanted the copy of book where his life sketch is published and this author wanted the copy of ‘Samaj’ drama. However, the contact is broken due to mail pouring in my inbox. )



References:
1-Dr Anil Dabral, Garhwali Gady Parampara
2-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
3-Dr Sudharani, Garhwal ka  Rangmanch
4-Drama special issue of Chitthi Patri magazine
5- Dr Hari Datt Bhatt Shailesh, Garhwali Natak evam Rangmanch: Ek Vihngam Avlokan
6-Dr Bhakt Darshan: Barrister Mukandi Lal Srmriti Granth

Copyright@ Bhishm Kukreti
bckukreti@gmail.com

Bhishma Kukreti:
                                   Bhakt Prahlad: The First Modern Garhwali Drama

           (Review on a Garhwali Drama ‘Bhakt Prahlad’ by Bhavani Datt Thapliyal)
(Notes on Garhwali Stage Plays, Kumauni Stage Plays, Uttarakhandi Stage Plays, Himalayan Stage Plays)

                                  Bhishm Kukreti

                 Bhakt Prahlad is the first published modern Garhwali drama by Bhavani Datt Thapliyal (Khaid, Mavalsyun, Pauri Garhwal, 1867-1932) in 1914 from Calcutta. However, Bhavani Datt Thapliyal wrote Jay-Vijay a Garhwali drama before Bhakt Prahlad but due to technical problem he could publish Jay-Vijay drama after Bhakt Prahlad.  Jay-Vijay is based on well known folk Garhwali story and poem-Daint-Sanghar.  Jay-Vijay drama is the foundation for Bhakt Prahlad drama.  In Hindi drama scene, it was the transit period between Bhartendu Harish Chandra and Jay Shankar Prasad. The creation period of ‘Dhrub Swamini’ by Jay Shankar Prasad is same as of Bhakt Prahlad’.
  Parsi theatre style (initiated in 1853) was dominating dramas of Indian vernacular languages. The form of Parsi theatre was highly electric and stories were taken from epics as Mahabharata.  In the same period,  Sankardas Swamigal had been initiating Tamil dramas for modernization and bringing professionalism from at the end  of  nineteenth century; D.L .Roy was accelerating the work of  Golak Nath Das in the beginning of twentieth century ; C.V Raman Pillai wrote modern Malayalam drama ‘Kuruppillakkalari(1908) and Pandate Panchan introduced it in 1908’; in Telugu drama world, Chandala keshav Das’s ‘Kanak Tara’,  Pundit K.Subramanya Sastri’s ‘Shir Krishna lilau (1914), Shrimula Sachidanand sastri’s ‘Savitri’(1915) dramas were staged and various regional groups staged mythological and social based dramas in Kannada too. 
               Jag Mohan Lala is the father of modern Oriya theatre (1875) who also wrote first Oriya play ‘Baba ji’.
        In Marathi theatre, the era from 1882-1920 is called one of the productive eras. Around 1894-1928, Shripad Krishna Kolhatkar dominated Marathi drama world as his 12 plays were staged. There is similarity between the themes of ‘Bhakt Prahlad’ a Garhwali drama by Bhavani Datt Thapliyal and ‘ Kanchangadchi Mohana’  (1897) a Marathi drama by  Krishnaji Prabhakar Khadilkar that both dramas were based on the well known mythological stories but both the dramas were full of contemporary relevancies. While Khadilkar the Marathi playwright created a Prataprao for propagating notion of independence in Kanchangadchi Mohana’ and Bhavani Datt Thapliyal created many new  characters as Kaljugyanand a Guru who is a corrupt Guru, Gunda, Bhakunda, Durmati  for attacking on political and social wrong -happenings . No doubt, Bhavani Datt Thapliyal dedicated the drama to George pancham but the drama criticized and make ridicules of British raj in the drama 9a dialogue- Amto Mister ho gaya ab yurpo jana mangta..”. Shenoi Goembab (1877-1946) played major role in developing Konkani dramas in this period. However, Shenoi Goembab adapted western dramas for Konkani.
             In the same period, Jivan Jha wrote first modern Maithili plays –‘Sundarsanyoga’ (1904) and ‘Narmada Sagar’ (1906), both were social dramas and were staged in Varansi . Munsi raghunandan das wrote ‘Maithili’ and staged ‘Maithili’ play in Maithili area in 1910.
            Shiv Charan Bhartiya was first Rajashthani dramatist published ‘Kesharvilas’ in 1900. The drama is a social drama and influenced by Parsi theatre.
 The first Mizo drama written in Mizo script is ‘Krista pallai’(19340 directed by Chauwngzika.
   Sorokhaibam lalit is called father figure of modern Manipuri drama. First modern Assamese drama is ‘Ramnavami’ by Gunabhiram  Barua (1857). The drama is about widow remarriage. The mythological subjects with social messages dominated Assamese dramas from 1857-1920. Dhanbir Mukhiya staged a complete Nepali language drama in 1909 in Darjiling. Pahalaman Singh swar  is credited for publishing first ever modern drama in Nepali  language ‘Atalbahadur’ . the said drama was published from varansi in 1906,
          Santan dharma Natak Samaj initiated staging mythological and moralistic Dogri plays from 1914 in Jammu. 
         Dip Cand bahman is called as ‘Kalidas of modern Haryanvi dramas who polished old folk theater style in Haryana around First World War.
           By studying the various plays of various Indian languages, it is obvious that in the period 1880-1925, the Indian playwrights tried to infuse social messages into mythological subject. Mythology was serving two purposes that audience was easily involved with the drama and there was less censorship problem with British authority.
               The theme of ‘Bhakt Prahlad’ is based on the story of Bhakt Prahlad of Hari Vishnu Puran. There are 28 acts in ‘Bhakt Prahlad’. Hirankashyapu is depicted as British Raj indirectly. Many characters in the drama represent the people of society and government administration.
            The dialogues are the major elements of this drama for being very enjoyable. As –
Kaljugyanand – maraj mi par gusa ni howan sarkaar – mi t sab tadna kari chuki ye par bar bar –aur guru ji n bi ye tain dekhaye khoob dhudhkaar fatkar –parantu yel jara bhar ni chhodi bolano narayan hari katari –ya te mahaprabhu ! kuchh aap hi karan ye ko vichar –ham to hoi gayan ye tain bilkul lachaar
  Though, there is less difference in languages spoken by various characters but the dialogues create the desired image of each character.
Jimidar – bin pani huye baanji saar, beej bi khaayiyan kistmar
Gothun goru gay gothyar , mai jimidar ji main jimidar ji
          The dialogues create characterization and attack on wrong happenings either in the society or in state administration.
   There are relevant lyrics in the drama. According to eminent Garhwali prose research scholar Dr Anil Dabral, the lyrics are very sharp and accelerate the speed of the drama.
  The play is still relevant and the play has potentiality for making a feature film too. Bhavani Datt Thapliyal created a drama culture for modern Garhwali language. Bhavani Datt proved that drama is the best medium for showing the good and bad happening in the society.

Copyright@ Bhishm Kukreti
Notes on Garhwali Stage Plays, Kumauni Stage Plays, Uttarakhandi Stage Plays, Himalayan Stage Plays to be continued …..

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