Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 74426 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सुद्दी रकोड़ा रकोड़
रचना --दिनेश ध्यानी

सुद्दी
रकोडा रकोड
बिना बाती
चबोड़
क्यांकू इत्गा
घमंड त्वे अरे तु बि मनखी ही त छै।

कै थैं
कुछ नि
समझदी
कैकु ब्व्ल्यू
तु नि मन्दी
अफ्वी तैं
भारी चितौंदी.

निरबै- निरसा
माटी मनखि छै
निवसे कि रैदी
अगास जनै
देखी की
नि खौलेदि।

करम गति
अरे
विचार से होंद
मनखि बडु
जरा यीं बातौ
विचार कै लेह्दी । … दिनेश ध्यानी १७/७/१५

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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शान्ति प्रकाश जिज्ञासु की द्वी पंगत वळि छिटगा

१- प्यार
प्यार करण वळु कैकु बुरु नि सोच सकदू
आंसू अपड़ा बगै सकदू कैका dekh नि सकदू
२-घ्यू
द्वी रूप्या सेर घ्यू खै अब सौ रूप्या कु भी नी च
खाण वळा आज भी छन पर ऊ घ्यू नी च .
३- सारु
कैकु तै तुमारो नौ कु सारु नी च
मंगदरा तै आग क्या खारु नी च
४- सौतेलु
आज जाणी मिन सौतेलु कन हूंद
बुबाई जगा छोडि बिस्वम कूड़ी बणान्द
५- पंछी
पंछ्युंन ऊन घरूं ऐकी क्या कन्न
जौं घरूं बैठ णु चौक नि छन
६- भूख
इन लगणु यू कळजुगौ आख़री रूप च
अपड़ा फैदा तै फंसाण कै निठुरो की भूख च .
७- पता च
तिन हूण अबि और बडू त्वे पता च
वां का बा द तिन मै मा आण मै पता च

छिटगा कविता गढवाली कवितौं एक शैली च . छिटगा माने छिटक या छिटग मतबल ड्रौप (Drops ), माने - छींटे. गढवळि साहित्यौ नामी सुकट्वा (समालोचक, समीक्षक ) वीरेंद्र पंवार लिखदन बल - " छिटगा पाण्या बि ह्व़े सकदन अर कछीला (क्जीर, कीचड) बि ह्व़े सकदन.मेरी नजर मा छिटगौं का कुछ रूप यू छन एक भड़कदी रूड्यू छिटाञद बरखा का, एक कछीला (कजीर) छिटगा , एक आग बुझाणो पाण्या छिटगा ,एक मुजदी आग सुल्काणो घी का छिटगा, एक कोरा भात भपाण्यो पाण्या छिटगा, एक वेसुध पड्या मनिख तैं होश मा ल्हौणू पाण्या छिटगा. इन माणे जांद बल छिटगा , अपणी छाप जरूर छोड़दन. साहित्य मनिख तै बिजाळणो काम करदु. इलै जब वे पर छिटगा मनन होऊ त इना होण चेंदन जु ताडौं काम कन्नु. वै तै जज लै ड्यों, आँखा-कन्दूड़ खोळ दयावान".
छिटगा कविता द्वी पंगत की या चार पंगत की होन्दन अर यूंक असर भौत जादा होंद जन कि कवि विहारी क क्विताऊ मा होंद - गागर मा समोदर . छिटगा अर दोहा मा भेद च कि दोहा क अपण मीटर/सिलेबस का नियम छन पण नियमों से छिटगा मुक्त च
छिटगा मुक्तक काव्य च. गढवाली मा शान्ति प्रकाश जिज्ञासु न सबसे जादा छिटगा कविता लेखिन या छपैन. कुछ उदाहरण \
Copyright@ Shanti Prakash J igyasu

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आप कै कै , कन कन, कळजुग्युं तै जाणदवां ?

कळजुगी -गढ़वाली कविता

भवानीदत्त थपलियाल (1867 -1932 ,खैड़ु मवाळ स्यूं , पौड़ी गढ़वाल )

सुळबुळ संध्या नौ चुळ पाणी , देवता पित्रु की निर्वीजि लाणी
घर घर अंधाधुन्द मचाणी , धर्म कर्म की जड़ उकटाणी
जैकी देखि हूणी खाणी , झटपट तख आग लगाणी
भैला मन ते बात बणाणी ,भितल्या मन ते कर्द चलाणी
पांच सात की सभा बणाणी , फुन्द्या बणिक बात बुजाणी
जब जाणी सब लाइ गैन बाणी , सबकी रकम हजम करि जाणी
कैमु कदापि सच्च नि लगाणी , झूट सदा सब बात बणाणी
अफु नि देणी कै तै , हैकाकी मऊ चट करि जाणी

Presented on Internet -Bhishma Kukreti 17 /7 /15

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सुद्दी रकोड़ा रकोड़
रचना --दिनेश ध्यानी

सुद्दी
रकोडा रकोड
बिना बाती
चबोड़
क्यांकू इत्गा
घमंड त्वे अरे तु बि मनखी ही त छै।

कै थैं
कुछ नि
समझदी
कैकु ब्व्ल्यू
तु नि मन्दी
अफ्वी तैं
भारी चितौंदी.

निरबै- निरसा
माटी मनखि छै
निवसे कि रैदी
अगास जनै
देखी की
नि खौलेदि।

करम गति
अरे
विचार से होंद
मनखि बडु
जरा यीं बातौ
विचार कै लेह्दी । … दिनेश ध्यानी १७/७/१५

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सतपुळी मोटर बौगिन खास

(इंटरनेट प्रस्तुति एवं व्याखा : भीष्म कुकरेती )
(सन्दर्भ:डा शिव प्रसाद नैथाणी लोक संस्कृति , उद्गाता , 2011, पृष्ट 87 -118 )

सतपुळी मोटर बौगिन खास

द्वि हजार आठ भादों का मास,
सतपुळी मोटर बौगिन खास ।
औडर आये कि जाँच होली,
पुर्जा दिखण कु जांच होली।
अपणी मोटर साथ लावो,
भोळ जांच होलि अब सोई जावो।
सेइ जौंला भै बंधो बरखा ऐगे,
गिड़ गिड़ थड़ थड़ सुणेण लैगे।
गाड़ी छत मा अब पाणी ऐगे,
जिकुड़ि डमडम कमण लैगे।
या पाणी नयार कन आये मैकु,
जिया ब्वे बोलणु नी रोणु मैकु।
जिया ब्वे बोलणु नी रोणु मैकु।।
द्वि हजार आठ भादों का मास,
सतपुळी मोटर बौगिन खास ।
It was August - September 1951.
The Motors washed away by flood.
There was order that the officer would check the motors.
There was order that the officer would check the components of motors
There was to bring all motors.
The officers informed that there would be checking next day.
He advised to sleep.
While we were sleeping, there was a heavy rain.
The rain water reached up to roof of motors.
We were afraid.
The Nayar River flood washed away all motors.
O mother! Don’t weep for me.

The said folk song is still popular in Garhwal.

Copyright (Interpretation) @ Bhishma Kukreti, 25/06/2013

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhishma Kukreti
17 hrs ·

गढ़वाळ का सच्चा कवियों से प्रार्थना (1920 से पहले की कविता )

रचयिता -- चंद्रमोहन रतूड़ी (गोदी , टिहरी 1880 -1920 )

क्या हम कवि पुत्र सरस्वती का
ब्रह्मा की अंधी अर काळि सृष्टि
का आँख मुखीर स्वयं विधाता -
क्या हमन कैकि करणी अपेक्षा ?
क्या छन स्त्रियों का मुख नेत्र पद्म,
बिना हमारी प्रतिभा की किरणयों ?
क्या बीरू का कर्म विचित्र अद्भुत,
बिना हमारी फिरदार बाणी ?
हे नी छ क्या या प्रकृति ही सारी,
निर्जीव बेढंग अर शून्य जंगळ
देवत्व , सौंदर्य , सहानुभूति -
संचारणी शक्ति बिना हमारी ?
तजिक तब सब ग्लानि , लीक बाणी की बीणा
प्रमुदित मन से आपुच्च स्वरसे ही अपणा
परबत बण गंगा बद्री केदार राजा
सब भड़ गढ़ का यै देश की कीर्ति गायैं। .
(चंद्रमोहन रतूड़ी जीक कविता क्लिष्ट ही छन )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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बालकृष्ण डी ध्यानी
18 hrs ·

अय रियली मिस यु मय उत्तराखंड

उत्तराखंड को लगे आज
सवेरे सवेरे भूकंप के झटके
पहाड़ मेरा बेचारा
यंह इस तरह ही रोज खाये लचके

देखो बादल फटे कभी
भूस्खलन के यंहा बड़े नखरे
सड़क फटे कभी बीच से यूँ ही
नदियों के वो उलझते रिश्ते

करोड़ों रूपये यंहा बस इस तरह जलते
एक पल भी ना जाने वो क्यों ना टिकते
कल ही बना पुल आज बह जाये हँसते
उत्तराखंडी देखता रह जाये बस तरसते

देख तकलीफों को वो भी यंहा से खिसके
ऐसे हैं मेर पास कितने बड़े बड़े भगोड़ों के किस्से
करते हैं तंज अपने पर ही यूँ वो इस तरह
पूछ ले कोई उन्हें शर्म आती खुद को पहाड़ी कहने से

पलायन के मगर बने खूब पक्के रस्ते
एक गया भी नहीं दुसरा चल दिया उसी रस्ते
फिर जाके वो भी मजबूरी में कह देते हैं दूर से
अय रियली मिस यु मय उत्तराखंड

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

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भगवान सिंह जयाड़ा's photo.
भगवान सिंह जयाड़ा

-----सौण की कुरेड़ी------
-----------------------------------------
डांडी कांठ्यों मां प्यारी कुरेड़ी छैगी ,
झम झम बरखा अब बसगाळ लैगी ,

सूखी धरती माँ अब हरयाली छैगी ,
डाली बुटल्यों मां कन मौल्यार ऐगी ,

कुरेड़ी लौंकणी छ गाड़ गद्न्यों बीच ,
कभी छैं जांदी ऊँची डांड्यों का ऐंच ,

सौंण कुरेड़ी देखि डरदु जिया मेरू ,
डरूदु मन देखि ,बिकराल रूप तेरु ,

पहाड़ का लोगु मां अब दहसत व्हेगी ,
पिछली आपदा कु डर दिलु मां रैगी ,

अबकी ना बरखी यन हे बरखा राणी ,
सभी लोगु लाज राखी और बात माणी ,

ऐंसु बसगाळ यनि अनहोणी ना होऊ ,
पहाड़ मेरा अबकी शुख शान्ति रौऊ ,

देवी देबतौ अब तुम राख्यान ध्यान ,
ये बसगाळ पहाड़ मां शुख शांति रान ,

बिपदा पैली जन अब कभी नि आऊ ,
जन जीवन सदानि यख खुशहाल रौउ ,

डांडी कांठ्यों मां प्यारी कुरेड़ी छैगी ,
झम झम बरखा अब बसगाळ लैगी ,
------------------------------------------
द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनाक >१८/०७/२०१४
सर्ब अधिकार सुरक्षित @
http://pahadidagadyaa.blogspot.com/

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अंतस से जुड़ीं याद गुरूजी आपक् अवलोकन का वास्ता
******मेरु सौण******
डांडा छान्यों मा रंगत ऐे होळी
एक तरफ बल्दों की लड़े
दुसर तरफ बखरों की टोली।

गिचा कताड़ी ब्वे धै लगाणी
भितर ल्यो भैंसा तें थ्वोरु बिब्लाणी।

सुरुजु देखा रंगमत हुयुं च
चौ चक्की खेलण मा धै नि सुणु च।

पार डांडा देखा बरखाक् भिभ्डाट्
छिड़ा गदनो कु छिड़-छिछड़ाट।

पुंगडा पातळा लकदक होला
काखड़ी मुंगरि आलू छैमुला।

बस्ग्याली ब्यखुन्दा आनंद-आनंद
घ्यू दूधे रेलम-पैल रोज सग्रांद।

दिन मा गोरु दगड़ जाणे रोंस लगीं च
पल्या गों की गोरी कु स्वाल अयुं च।

भ्वौल, वल छाला अपणा गोरु लियाँन
सेणां तमलों बैठी त्वे दगड़ छ्वीं लगाण।

कनु निर्मल जीवन छै निश्चल माया छै
आजक फिकर ना भ्वोळक चिन्ता छै।

बरखा का छीड़ मा लतर-पतर् गात
ड़ाला ऐथर धर्युं रेन्दु हाथ मा हाथ।

सरूली गौड़ी पुछै्यड़ी खड़ा करि दनकणी
धौल्या, कल्या बल्दों तें खूब सन्काणी।

सैद यु काल नि रयूँ अब समय नि रयूँ
यादों की थैला की ‪#‎अडिग‬ तेरी कल्पना रयीं।

भैतिकताक भोग, डांडा-मरूड़ा भी चड़िग्ये
आपार सुख देणु वाळू जीवन अब नि रै ग्ये।

कुछ भी ब्वाला भैजी भुलाओ
ठण्डु माठु करि ज्यु जगाओ।

जै जीवन मा ज्यादा तीस-तृष्णा नि रौंदी
वु ही जीवन सच-मुच कु बैकुण्ड माण्येन्दु।

द्वी गत्ये सौण बि. सम. 2072

रचना:- बलबीर राणा "अडिग"
@ सर्वाधिकार सुरक्षित।
मेरु ब्लॉग उदंकार मा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
14 hrs ·

मेरी गढवाळि कविता (खाज) कू एक अंश।

खाज.....

उठिं छ,
सब्‍यौं फर आज,
सवाल छ,
क्‍या होन्‍दु खान्‍दु ह्वैग्‍ाि,
हमारु समाज....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 23.7.2015

 

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