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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
Dosto,

We will be posting here poem by various Poet written in Kumauni & Garhwali language only.

The first poem by Hem Lohni


ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे
 
 तेरी काथ तेरी बात, बेडूक रोट पिनाऊक साग
 तेरी माया तेरी ममता , परदेश में ऊनी याद
 ....ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे, परदेशा में बाटुई लाग्गे 
 
 भ्योव पड्यू हाथ टूटो, कर्नेछी मैं उत्पात
 पीड़ म्यरा हाथम हेरे, तू मार्नेछी दाड़
 ....ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे, परदेशा में बाटुई लाग्गे
 
 ढुंग मार दाड़िम पेड़म,  फूटो जोश्ज्युक कपाव
 म्योर भाऊ सिद साद,  त्यूल दिखाय ज्योश्याणीके ताव
 ....ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे, परदेशा में बाटुई लाग्गे
 
 बोज्यूल गौरुक गोठ गोठ्याय,  बंद करो खाण भात
 त्यूले चुपचाप दीदी भेजी,  घ्यूँ चुपोड़ी रोटक साथ
 ....ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे, परदेशा में बाटुई लाग्गे
 
 धिर्कनुछ्यू  यो धार ऊ धार,  दिनभर दगडूओक साथ
 खुटम जब खवाई पड़ी,  सेकणछि तू आदुक रात   
 ....ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे, परदेशा में बाटुई लाग्गे
 
 बाटम जब द्यो पड़ो,  और टना टन डाव
 आपुणे तू भीजी गछी,  म्यर लिजी आन्चेल्की छाव
 ....ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे, परदेशा में बाटुई लाग्गे
 
 त्यारा भजन सुणि ऊठ्छ्यू,  सितण  काथेक बाद
 त्यरा किस्स कहानी में,  म्यरी दूणी म्यरी सौगात 
 ....ओ ईजा तेरी नरे लाग्गे, परदेशा में बाटुई लाग्गे
                                                            भारत लोहनीBy: Bharat Lohani


M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
बुरुंश

सार जंगल में त्वे ज,
क्वे न्हां रे क्वे न्हां,
फूलन छै के बुरुंश,
जंगल जस जलि जां।
सल्ल छ, दयार छ,
पय्यां छ, अयांर छ,
सबनांक फाड़न में,
पुंनक भार छ।
पै त्वै में दिलैकि आग,
तै में ज्वानिक फाग,
रंगन में त्यार ले छ,
’प्यारक’ खुमार छ॥
प्रस्तुत रचना प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रा जी की अपनी मातृ बोली कुमाऊनी की एक मात्र कविता है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
एक दिन

इका्र सांस लै ला्गि सकूं
ना्ड़ि लै हरै सकें,
दिन छनै-
 का्इ रात !
 कब्बै न सकीणीं
 का्इ रात लै
 है सकें।
 
 छ्यूल निमणि सकनीं
 जून जै सकें,
 भितेरौ्क भितेरै •
 गोठा्ैक गोठै •
 भकारौ्क भकारूनै
 सा्रौक सा्रै
 उजड़ि सकूं।
 सा्रि दुनीं रुकि सकें
 ज्यूनि निमड़ि सकें
 ज्यान लै जै सकें।
  पर एक चीज
 जो कदिनै लै
 न निमड़णि चैंनि
 जो रूंण चैं
 हमेशा जिंदि
 उ छू- उमींद
 किलैकी-
 जतू सांचि छु
 रात हुंण
 उतुकै सांचि छु
 रात ब्यांण लै।
 
हिन्दी भावानुवाद: उम्मीद
 
 एक दिन
 इकतरफा सांस (मृत्यु के करीब की) शुरू हो सकती है
 नाड़ियां खो सकती हैं
 दिन में ही-
 काली रात !
 कभी समाप्त न होने वाली
 काली रात
 हो सकती है।
 
 दिऐ बुझ सकते हैं
 चांदनी भी ओझल हो सकती है
 भीतर का भीतर ही
 निचले तल (में बंधने में बंधने वाले पशु) निचले तल में ही
 भण्डार में रखा (अनाज या धन) भण्डार में ही
 खेतों का (अनाज) खेतों में ही
 उजड़ सकता है।
 
 सारी दुनिया रुक सकती है
 जिन्दगी समाप्त हो सकती है
 जान जा भी सकती है।
 
 पर एक चीज
 जो कभी भी
 नहीं समाप्त होनी चाहिऐ
 जो रहनी चाहिऐ
 हमेशा जीवित-जीवन्त
 वह है-उम्मीद
 क्योंकि-
 जितना सच है
 रात होना
 उतना ही सच है
 सुबह होना भी।
  प्रस्तुतकर्ता नवीन जोशी   पर

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
 उदंकार     उदंकार-
 [/size]जैगड़ियोंक,
 [/size]ग्यसौक-छिलुका्क रां्फनौक
 [/size]ट्वालनौंक और
 [/size]जूनौक जस
 [/size]ज्ञानौक
 [/size]जब तलक
 [/size]न हुंन,
 [/size]तब तलक-
 [/size]लागूं अन्यारै उज्यावा्क न्यांत
 [/size]
 [/size]क्वे-क्वे
 [/size]आं्खन तांणि
 [/size]हतपलास लगै
 [/size]हात-खुटन
 [/size]आं्ख ज्यड़नैकि
 [/size]कोशिश करनीं,
 [/size]
 [/size]फिर लै
 [/size]को् कै सकूं-
 [/size]खुट कच्यारा्क
 [/size]खत्त में
 [/size]नि जा्ल,
 [/size]हि्य कैं
 [/size]क्वे डर
 [/size]न डराल कै।
 [/size]
 [/size]हिन्दी भावानुवाद : उजाला[/b]
 
 उजाला-
 जुगनुओं का,
 गैस का-छिलकों की ज्वाला का
 भुतहा रोशनियों और
 चांदनी की तरह
 ज्ञान का
 जब तक
 नहीं होता
 तब तक
 अंधेरा ही लगता है उजाले जैसा।
 
 कोई-कोई
 आंखों को तान कर
 हाथों से टटोल कर
 हाथ-पैरों में
 आंखें जोड़कर
 कोशिश करते हैं,
 
 फिर भी
 कौन कह सकता है (पूरे विश्वास से)
 पांव कीचड़ के
 गड्ढे में
 नहीं सनेंगे,
 दिल को कोई डर
 नहीं डरा सकेगा।   प्रस्तुतकर्ता नवीन जोशी   पर

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
लड़ैं
लड़ैं -
बेई तलक छी बिदेशियों दगै
आज छु पड़ोसियों दगै
भो हुं ह्वेलि घर भितरियों दगै।


लड़ैं -
बेई तलक छी चुई-धोतिक लिजी
आज छु दाव-रोटिक लिजी
भो हुं ह्वेलि लंगोटिक लिजी।


लड़ैं -
बेई तलक हुंछी सामुणि बै
आज छु मान्थि-मुंणि बै
भो हुं ह्वेलि पुठ पिछाड़ि बै।


लड़ैं -
बेई तलक हुंछी तीर-तल्वारोंल
आज हुंण्ौ तोप- मोर्टारोंल
भो हुं ह्वेलि परमाणु हथ्यारोंल।

लड़ैं -
बेई तलक छी राष्ट्रत्वैकि
आज छु व्यक्तित्वैकि
भो हुं ह्वेलि अस्तित्वैकि।


हिन्दी भावानुवाद : लड़ाई


लड़ाई-
कल तक थी विदेशियों के साथ
आज है पड़ोसियों के साथ
कल होगी घर के भीतर वालों के साथ।


लड़ाई-
कल तक थी चोटी और धोती (बड़ी-छोटी) के लिए
आज है पड़ोसियों के साथ दाल-रोटी के लिए
कल होगी लंगोटी के लिए।


लड़ाई-
कल तक होती थी सामने से
आज होती है ऊपर-नींचे (जल-थल) से
कल होगी पीठ के पीछे से।


लड़ाई-
कल तक होती थी तीर-तलवारों से
आज होती है तोप और मोर्टारों से
कल होगी परमाणु हथियारों से।


लड़ाई-
कल तक थी राष्ट्रत्व के लिए
आज है व्यक्तित्व के लिए
कल होगी अस्तित्व के लिए।

प्रस्तुतकर्ता नवीन जोशी पर

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