Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 205400 times)

Bhishma Kukreti

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छुणक्याली दथुड़ि ( गीत )
Musical shackle

[/color]-
प्रकृति बिम्ब पैदा करती गढ़वाली गीत
कवित्री – प्रेमलता  सजवाण
A Garhwali lyric of Nature Images
By Premlata sajwan
**************
भाना, ऐ जा तू सरासरि घास कटणा कु झम्म
छमाछम बजै दे स्या, छुणक्याली दथुड़ि झम्म।
रूढ़ प्वडि़ डांडि, सुख्यीं सारि, कख आणे झम्म
छुणक्याली दथुड़ि का छुणका टुटि गैनि झम्म।
स्यों बाना तू अफ म राखि बौण ऐ झट झम्म
मेरी तिसलि रुझ्यिं आँख्यु , तीस बुझै दे झम्म।
दथुड़ि मेरी खूण्डि हुयीं च,पल्योण त दे झम्म
कैबे नि कैर,आँख्यु म सुरमा लगाणि दे झम्म।
आख्युं सुरमा लगैकि नि ऐ त्वै सौं मेरी झम्म
दिन दुपरि राति ह्वै जाण,स्यू बाघे डैर झम्म ।
त्वे दगड़ मेरि पल्येईं दथुड़ि, गीत सुणालि झम्म
टुट्यां छुणकों थै दथुडि़ फर, गठ्याणि दे झम्म।
देर- अबेर मि सै ल्युलु,तू टक्क लगै कि ऐ झम्म
माया कि पुंगड़ि बयीं धर्यी,"प्रेम" बीज ब्वै दे झम्म।
प्रेमलता सजवाण..

Bhishma Kukreti

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प्रकृति की असलियत
गढवाली कविता
कवि – विवेका नन्द जखमोला

अज्यूं बि नि समझणु छै तु मेरु संदेश,
लगांद हि जाणु छै तु म्यारा जिकुड़ा फरै ठेस।।
कुन्नगस च त्वै खुणि हे मति का मर्यां मनखि।
त्वै समझाणा खातिर धरिन मिल कदगै हि वेश।।
कबि भोचाल, कबि केदारनाथ आपदा, कबि भयंकर सूखा त कबि विषाणु जनित रोगुं कु धरिन वेश।।
मिल सोचि इनि मा संभल़ि जैलु तु शैत।
प्ण तु त छै लगणु कुकरै सि डूंडि पूंछ।।
ढीठ न बण ऐजा अबि बि औख्यात पर।
निथर कै दीण मिल तेरु मटियामेट।।
सचेत कनु मेरु काम च दुन्या थैं 🌾 शैलेश 🌾 ।
मणदि छै त माणि जा निथर,
खै न जा यीं दुन्या थैं कखि कोरोना नामऽकु यु खबेश।।

Bhishma Kukreti

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--कोरोना जागरूकता-'---

गढ़वाली कविताएँ

अश्विनी गौड़
      ----- किस्त--1-----

सजग सतर्क रै तैं,
कोरोना दूर भगावा,
अफु भी बचा-
अर हौरुं बचैक,
फर्ज अपड़ु निभावा।

देशी परदेसी
घौर-गौं जु औंणा,
पैलि
जांच अपड़ि करावा!
अपडि माटी-थाति का
 भै-बंधो मा,
बीमारी ना फैलावा।

देश बिटि जब
घौर-गौं ऐगिन,
सबसे पैलि न्हयौंण,
खांसी-जुकाम अर बुखार
 जूं मनख्यूं
सि डाक्टर मा पौंछौंण।

हर यन लक्षण
जैमा दिखेंदा,
कोरोना त नी होलू?
ना,चिंता-फिकर कन
नी सरमाणू !
अस्पताळ चलि जांणू।

खांदि-पेंदि ,
उठदि-बैठदि दौं,
सेनिटाइजर लगावा,
जथ्या बगत भी ह्वे
सकदू त
हाथ सबुका धुलावा।

ब्यौ-बराती,
अर बर्थडे पार्टी,
भीड़ मा ना क्वच्यावा,
आलतू-फालतू, सैर-बजारु,
कुछ दिनों,
आणु-जांणू छोड़ी जावा।

भेंटण भी नी अर,
 हाथ नि मिलाणू!
नजीक सुदि,
 कैका भी नी जांणू,

जख तख थूकण,
नाक सिकन्न,
अर
खाँसदि दौं,रखा ध्यान,
रूमाल अपड़ि खीसी बै गाडी
गिच्ची पर टप्प लांण।

बीमारी का जाळ मा,
 दुनिया फंसी च,
मनखि लग्यां,
सुद्दि मन्न पर,
थोड़ा सजग,
सतर्क रैक सबि
लग्यां रौला कुछ कन्न पर।

एकमुट्ठ सोचि ,
बिचारि हमुन अब,
मन मा ठांणी द्यौंण,
साफ सफै करी,
जागरूक रैक
कोरोना हरौंण

---अश्विनी गौड़ ---दानकोट अगस्त्यमुनि ----



-----कोरोना जागरूकता-'---

      ----- किस्त--2-----
       "जु दिन रात जतन करी
          लग्यां कोरोना हरौण मा
        तौंकी मैनत सि,खारू बणौणा
        जु बेमतलब घौर बै भेर औणा"
                   --------@--अश्विनी गौड

-----कोरोना जागरूकता-'---

      ----- किस्त--3-----

तु  तखि रौ
मैं यखि छूं
नाता रिश्ता
माया पिरेम
बाद मा सुखिळा
दिनों मा निभौला
चल दगड्या
कुछ दिनों टुप्प-टप्प
अपडाअपडा भितरै रौला
चला ईं जंग मा,
सरकारों साथ निभौला,
कोरोना तै हरोला
चला कोरोना तै हरोला
-----------@अश्विनी गौड़

-----'कोरोना जागरूकता-'------
      ----- किस्त-4----
       माना!
दम त भौत घुट्यण लग्यूं,
हम सबुकु ईं ब्यवस्था मा,
-----पर !
सरकार भी त मजबूर ह्वयीं,
आज कोरोनै ईं अवस्था मा।

जु भी निर्णय ह्वोंण लग्यां,
तौंमा जनहित ही सर्वोपरि च,
ईं पिडांदि घड़ी मा सैरी दुन्यां,
 कोरोना से बिजां डरीं च!

इटली चीन जन देशों मा
मरदा मनखि 'थम्यें नी थम्यैंणा'
तैंईं दिशा मा जाण से बचणौं,
हम किलै नी समझणां ?
   ------@अश्विनी गौड़


-----कोरोना जागरूकता-'---
     
      ----- किस्त-5---
     भौत जरूरी इमरजेंसी ह्वोंदि,
      डेळि बे खुटि भैर तबे धन्नी,
      नतरि संकल्प प्रण करि द्या!
       होरू भी ईं बात समझे जा,
                   बस!
        कुछ दिनों खै द्या, खैरि,
        तभी हारलू कोरोना बैरी।

--------------------@अश्विनी गौड़👏


कोरोना जागरूकता किस्त -6

"चै हम स्वस्थ छां
    चलण फिरण मा
       मस्त छां
         तब भी
    सतर्क सजग रावा
    कोरोना से बचणा
          खातिर
      आजकल सबुसे
        दूरी बणांवा।
    ----------@अश्विनी गौड़

कोरोना जागरूकता
           --- किस्त-7---
       'कूड़ि पर कांड़ा लगण'
              से पैलि
       'चौद करम ह्वोण'
              से पैलि
    कैका 'भकळौंण मा बिरड्न्न'
             से पैलि
     कोरोना बीमारी का डसण
            से पैलि,
    'मवासी घाम लगण'
            से पैलि
   टैम पर लाॅग डाउन ह्वे जा,
       चुचौ समझि जा  !
                अर!
अफु दगडि अपड़ौं तै भी बचा👏
     -----------------------------------@अश्विनी गौड़

Bhishma Kukreti

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     प्यार कु कीलू
-]-----------------
जुयाल हरीश की हास्य व्यंग्य की गढवाली कविता[/b][/font]
-

पैनी आँख्याेंल मेरी जिकुड़ि खैंडिगे तू।
म्यारु दिल मा प्यार कु कीलू घैंटिगे तू ॥

चिंचड़ी बणिकि चिपटीं छाइ चड़घंडी फर ।
जुगराज रैइ अब अट्टा बणिकि झैड़िगे तू ॥

जबरि त्वै दगड़ माया ब्वटणे छाइ ।
उबरि म्यारा पिंड ब्वटण बैठिगे तू ॥

जंगळी मुर्गा बण्यूं छाइ मि त्यारा बान।
सीस्त लगैकि धड़म फैर कैरिगे तू ॥

प्यार कि कचब्वळि खवाणी रै तु हौर्यूं तै ।
मेरी देळिम फग्गल चोलिकि धैरिगे तू ॥

' जुयाळ' त्यारू प्यार फर कीड़ा पोड़गिन I
सड्यूं प्यार करदा- करदा सैड़िगे तू ॥

Copyright Harish Juyal Kutaj

Bhishma Kukreti

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गढ़देश ...(गजल)
-
Garhwali Gazal by Premlata Sajwan
-

तिथै बुलाणु च,मिथै बुलाणु च
गढदेश हमरु --- धै लगाणु च।
गढ़देश....
बिरढ़ि ग्यों जों बाटो थैं हम
वख डामरि सड़क बणाणु च।
गढदेश....
भूख थै हराणा खुणे, हथ्यार
दथुड्यूं, कुटल्युं पल्याणु च।
गढदेश...
गंगाजि भागीरथि थै खुज्याणि
कु भैर ऐकि हरिद्वार नहाणु च।
गढ़देश...
जब पंच बदरि, पंच केदार यख
कु मुण्ड नवाणे लंका जाणु च।
गढदेश...
डालि हैंसणि,बुथ्याणि अफुथै
गुयेर दुर परदेश भटि आणु च।
गढदेश...
झल हेरि जाणु बसंत गौं जने
फुल पाति खुदेड़ खिलाणु च।
गढदेश..
हिर्रर हूणि गात द्येल्युं मोर्युं कि
तालों कि कुंजि, को खुज्याणु च।
गढदेश .....
जैढि बूटि यख ताजि हव्वा पाणि
स्यखुन्द त खबेश, वाडु सराणु च
गढदेश....
सम्भलि जा अज्युं अबेर नि ह्वाई
बगत ब्वनु, जु ल्यो आँसू रुवाणु च ।

कुयेढि़ कभि जरूर छंट्यालि "प्रेम"
बदल्युं सरग खरैकि मुस्कराणु च ।
गढदेश हमरु....।

प्रेमलता सजवाण..

Bhishma Kukreti

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उड्यार
-

कवित्री – प्रेमलता  सजवाण


A Philosophical or spiritual Garhwali Poem
By Premlata Sajwan
*****
अन्ध्यर उड्यार भटि, उदंकार तर्फां
अपणो भैर मुक करण चाणि छन।

छ्वटि ठुमठमि सि लपाग धैरि कि,
खैरि विपदा बिसरण चाणि छन ।

दुख्यरा पराणु का पैंछा मंग्या
सुखिला सुण्यां द्यखण चाणि छन।

अपड़ा बांठा व्यथा पीड़ भुगति
मुक्ति कु रस्ता ह्यरण चाणि छन।

पुर्ख्यों जलड़ौ म आस्था राखिकि
शक्ति जौत बणि जलण चाणि छन।

साख्यूं की कथा कथगुळ्यूंम रै कि
लिखित इत्यास बणण चाणि छन।

जिमदरु को बिसौ नि बिसै जौंल
ल्वै दगड़ी पस्यौ स्वरण चाणि छन ।

कटगुड़ु सरैल ज़िकुड़ु सकत कैरि
धरति आगास एक करण चाणि छन ।

अबट्यों पैटि गिन जु कुंगलि खुट्टि
वूं खुणे सै बाटु ख्वजण चाणि छन।

उड्यार अंध्यरों गैल हुयी बाच थै
ठोकबजै कि बच्याण चाणि छन।

कुछ ना बस द्वि आखर "प्रेम" का
ज़िकुड़ि का भैर खतण चाणि छन।
प्रेमलता सजवाण..

Bhishma Kukreti

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धन्य छन वू वीर जू देश का खातिर पराण निछावर कर दिंदिन.....
-
कमल जखमोला की गढवाली कविता


माँ जी मी तेरो लाड़ो,सै ग्यों बिना बुथैईं
एगे निंद सदानी को बिना तेरा गीत लगैईं
देखी छौ,सुप्नि मा सियूँ छौं खुच्ली मा तेरी
सैई ग्यों धरती माँ की खुच्ली,माँजी हे मेरी
ज़िद छोड़ी दे दूर राणा की माँजी अब मिन
ख़यालों मा रोल़ू सदानी,नी खुद्याण माँ तिन
कबि चौक दिखेलू,डंड्याली मी कबि भगलू
एकटक ह्वैकी कब्बि रुट्टि पकांद तै दिखलू
दणमण दणमण नी रोई,है माँ जी तू मेरी
मै से नी दिखे जैली,माँ जी तेरी वा खैरी
फूलों सजी,झंड़ा पैहरी मी घार आणू छौउं
दगड़ियों भेंटि बुलैई,दूर फिर मी जाणूं छौउं
घार जब ओल़ू मी तो मेरी भुक्की पैई
जी भोरी भिटैई,पर आँसू एक न तू र्वैई
तेरी दूधी की लाज माँ मिन जाण नी दैई
मेरी लाज राखी माँजी मै देखी आज तू न र्वैई
मै देखी आज तू न र्वैई......मै देखी......
.......कमल जखमोला

Bhishma Kukreti

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जीवन जीणो आस..........
-
प्रेरक गढवाली कविता –रमाकांत ध्यानी

-
सुनसान सड़क,
दिन भर डैर,
खैरी की कटेणी,
अंधेरी रात।
बिनसिरी म,
चखलों चुंच्याट,
भौंरा-पुतल्यों गुणमुणाट,
सूणी।
मिलद,
जीवन जीणो आस..........
*सुप्रभात*
@रामकांत ध्यानी

Bhishma Kukreti

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" करुण रस की ग़ज़ल "

करूण रसयुक्त गढवाली गजल

गजलकार – दिवाकर बुडाकोटी

-
कना निरास हुयाँ छन लोग।
पट्ट हतास हुयाँ छन लोग।।
छौंदा यार -तंगारु का बि ।
यकुलांस हुयां छन लोग ।।
कनि - कमाणि कुछ नि राई।
उदास हुयाँ छन लोग।।
झूठा - मक्कार गलादरौं का।
खासम-खास हुयाँ छन लोग।।
चुसणा छन अपणौ कु ल्वै ।
ग्वर्या डांस हुयाँ छन लोग।।
जिंदगी का इम्तयान दियाँ बगैर।
टॉप पास हुयाँ छन लोग।।
द्वी घड़ि कि मैमान च दुन्या ।
इख़रि सांस हुयाँ छन लोग ।।
सामर्थ नि रईं कै पर बि ।
ज्यूंदि लांस हुयां छन लोग ।।
सज्याणा छन दुन्या कि सांग ।
बबुलु - बाँस हुयाँ छन लोग।।
-दिवाकर बुड़ाकोटी
खुदेड़ लोक गीत , करुणा  से भरी  लोक कविता , त्रासदी दुःख की गढवाली गजल


Bhishma Kukreti

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घुघती*
गढवाल में सामजिक व सांस्कृतिक परिवर्तन की छटपटाहट दर्शाती गढवाली कविता
कवि – सुरेश स्नेही

-
वा घुघती यख अब नी रयीं,
जू ब्वेकु रैबार लौन्दी छैई,
मैत्यूंकि छ्वीं बतैकी हमेश,
खुदेड़ बेटी ब्वारयूं बुथ्यौन्दी छैई।
कै मील उड़ीतैं औन्दी छै ज्वा दूर,
बासौं रैकि तैं जान्दी छैई,
बेटी ब्वारयूं कु रंत रैबार,
वींका मैत्यूंमु पौछौन्दी छैई।
अब ना उ बेटी ब्वारी रैगिन जौतैं,
खुद लगो अपणा मैतै की,
घुघती जगा मोबाइलून लेली,
जू सैदा लगौन्दिन सब्यूं की।
डाली बोटी, घौर बौण सैरी,
काटि लीन गौमा मनख्यून,
जख बणौन्दा छा घोळ अपणा स्यू
यून सैरा जगैकि फूकिलीन।
घुघती कि घूर घूर अब कखि सुणेन्दी नी,
घुघती बासुती बाळौ तैंं सिखायेन्दी नी,
चौक तिवारी सैरी बॉजा पड़ी छन,
बिसगूण खान्दी घुघती कखी दिखेन्दी नी।
घुघत्यून बि अपणू रैबासू बदलीयाली,
डॉडी काठ्यूं छोड़ी सैरू तिरपॉ उडणै सोच्याली,
अणमिलौ ह्वेगिन मनख्यू दगड़ी सीबि यख,
जिद्द अर हींसा ठींसा यूनबि सिख्याली।
*सुरेश स्नेही,*


 

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