Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 205399 times)

Bhishma Kukreti

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धर्मेन्द्र नेगी की गढवाली कविता


बुस्याणान हमुतैं हमारा हि अपणा
झुराणान हमुतैं हमारा हि अपणा
किलै दोष धरणा छां हम गंगा जी पर
डुबाणान हमुतैं हमारा हि अपणा
हमुन सच क खातिर यु जीवन लुटैदे
झुठ्याणान हमुतैं हमारा हि अपणा
हमारि अपणि धौण टकटकि करीं छै
नवाणान हमुतैं हमारा हि अपणा
भरोसो बि अब कै पर कन त कनुकै
ठगाणान हमुतैं हमारा हि अपणा
जिकुड़ि मा छ सेळी प्वड़ीं जळदरौं की
जळाणान हमुतैं हमारा हि अपणा
तमाशो हमारू बणाणा बजारम
नचाणान हमतैं हमारा हि अपणा
जु जणदा नि छन न्युतु हमतैं वु देणा
तिराणान हमतैं हमारा हि अपणा
जत्वड़ौ सि बागी हुयीं गत 'धरम' अब
कच्याणान हमुतैं हमारा हि अपणा
@धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी,रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ


Bhishma Kukreti

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धर्मेन्द्र नेगी की गढवाली कविता

बगत का दगड़ि अब लड़णु छोड़्यालि मिन
मौत देखी बि अब डरणु छोड़्यालि मिन
बाटु अपणूं बणाणु मि अब सीखिग्यो
दुन्य का दगड़ि अब हिटणु छोड़्यालि मिन
रैनिगै कैका दगड़ि व अपण्यांस अब
हिंगर अपणोंम अब गडणु छोड़्यालि मिन
गालि- टोकण मा सौ- स्वाद कख अब रयूं
छेड़ि जै कै दगड़ि लेणु छोड़्यालि मिन
भेद अपणा - पर्या मा नि जणदु कतैऽ
गैळु बैर्यूं से अब गढ़णु छोड़ियाल मिन
ल्यो न परहेज को नौ बि मेरा समणि
ज्यूंदु रैणा कु ज्यू मरणु छोड़्यालि मिन
रूड़्युं का उरड़ु सी ऐ छै ज्वानि 'धरम'
हौंस की आस अब पलणु छोड़्यालि मिन
@धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी ,रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ

Bhishma Kukreti

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इखारी किले याद आणा छवा
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कविता - मधुर वदनी तिवारी

(वियोग श्रृंगार/प्रेम रस की गढवाली कविता )


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इखारी किले याद आणा छवा
मीतें भण्डी सताणा छवा।
जुबड्याट कै लग्युं धाण अपणी
तुम मीते किले बिलमाणा छवा।
चुळा भबराणी भबराट करिक आग
खुट्यों पराज लगाणा छवा।
इतगा मयाळु न बणा दों लठ्यालों
तुमत अफु बि खुदांणा छवा।
खुद बिना भलु बि कुछ नि हौन्दु
पण तुम किले छक्या रौंणा छवा।
जिकुडी मा रन्दी 'मधुर' तुमारा
तुम किले घमतांणा छवा।
मधुरवादिनी तिवारी
6-03-2021

Bhishma Kukreti

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मेरा रीति रिवाज नि हरच्यां
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प्रेमलता सजवाण 
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मेरा  रीति रिवाज नि हरच्यां
रेडियो दगड़ सुणण चाणु छौ।
अपरा जरूरि सामान दगड़
रेडियो खुणे जगह बणाणु छौ।
टीवी मोबाइल जियो नेट दगड़
रेडियो अपरा दिल म बसाणु छौ।
भागदौड भरी जिन्दगी मा भटी
आपकु कीमती बक्त चाणू छौ ।
अपरी आवाज मा दगड्यों थे
बेट्युं की कविता सुणाणू छौ ।
क्वी नि छुट्या दगड्या भारे ..
सब्यूं थे हथ जोडी धै लगाणू छौ।


सर्वाधिकार @ प्रेमलता सजवाण...।

Bhishma Kukreti

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म्यारा पाडा़ का रीति रिवाज..

प्रेमलता सजवाण : कवित्री

म्यारा पाडा़ का रीति रिवाज..
लगान्दी धै अर मयल्दु आवाज..।
अपरी सानी बानी गैणा पाती..
कन सजी रन्दिन हमरी गाती. .।
फूल पाती अर हूण खाणी....
दूण कण्डी अर मिट्ठी बाणी.. ।
कलेयु अरसा अर घ्युं का डल्ला..
मंगल्येरो का मांगल गीत ब्वाला.. ।
गलद्येरो की गाली भी सुवाणी..
इन भली मेरी संस्कृति बच्याणी.. ।
आवाै म्यारा भै बन्दौ धै लगाणी..।
पाडा़ कु माटु , मिट्ठु नाज पाणी..।
Copyright@ प्रेमलता सजवाण..

मेरे पहाड़ की संस्कृति कविता , पहाड़ की संकृति संबंधी lok geet

Bhishma Kukreti

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डाला ब्वाटा जि हम लगान्दा..

कविइत्री – प्रेम लता सजवाण


डाला ब्वाटा जि हम लगान्दा..
ता किले इन मुक लुकान्दा ।
यु तढतुढु घाम की तिढ्वाक ला.
इन अफु थे किले तिढकान्दा ।।
अज्यू भि बगत रेन्दे बिजे जोला..
अपरा अपरा नौ की डाली लगोला ।
फूल पाती ता क्वी झप्न्यौला बुरांश..
डाली आम की,जु मा फलू की आस ।
बाटा बटोही खुणे,छैल ताजी सांस...
चखुला पन्छी खुणे दिन राति बास ।।
डाला ब्वाटु मा ही हमरु नाज पाणी.
यु के रैण से द्वी पैसों कि हुन्दी गाणी ।
माटु रोकदिन ये ,भ्याल नि रढकदा .
जख तख रूढ ना सूखा प्वढदा ।
यु की फौंकौ मा सौण का झूला ।
यु के परताप ला जलणा चुल्ला ।
आवा लगोला दग्डयो डाला ब्वाटा ।
अपरा प्राणी जाणी कि यूं थे नि काटा ।

 

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