Author Topic: Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख  (Read 1484018 times)

Bhishma Kukreti

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      Satire and Fatkar                                 
         
                           उत्तराखंड मा ह्युन्दो टैम पर चुनौ



                         भीष्म कुकरेती


         अच्काल उन त उत्तरखंड मा ह्यूंदो मौसम च, हाँ जी थ्वड़ा -थ्वडा  बरखा होणो मौसम च,

जख बरफ पोड़दो उख बर्फ पड़दो, जख नि पोड़दो उख नि पड़दो. बर्फ अपणी मर्जी

से कखिम बि नि पोडद  . बरफ मनिख नी च,  बर्फ पोड़णो नियम होन्दन अर मनिख

गां-गौळओ (सामाजिक) अर सम्वैधानिक नियम बणादो  इं इलै  च बल नियम

बणदा यि तोड़े जवान . हाँ त मि बुल णो छौ बल उत्तराखंड मा ह्युन्दो ,ठंड को, जडडू 

मौसम च पण चुनाव रूपी महाभारत से मौसम मा गर्मी ऐ गे.

        प्राकृतिक हिसाब से बर्फ पिघळणो टैम मार्च-अप्रैल मा होंद पण संवाददाता

खबर दीणा छन चुनावी तातोपन से अबि बिटेन  बर्फ पिघळण बिसे गे.


        अच्काल अबि इ उत्तराखंड का  विधायाकुं तैं याद आई बल पांच साल पैल

ओ विधायक बौणी छया.अब बिचारा विधायक ! ड्याराडूण राज्धानित्व का

सुख का गैरो तालाब  मा फंस्या रैन अर बिसरी गेन बल चुनाव त पाँच सालुं मा आन्द. अब बिचारा 

विधायक ! नक्शौं मा देखी देखी अपण चुनावी क्षेत्र को भूगोल याद करणु च .

इनी जु पैल्या दें चुनाव हारी गे छा ओ बि याद करणे कोशिश करणा छन, विश्लेसण, समीक्षा

अब इ   करणा छन  बल ऊंका हार की असली वजे क्या छे .


     क्त्त्युं पर जनसेवा क खज्जी होणी च, समाज सेवा की मर्च लगणी च वो चुनाव लड़णो ऐ गेन  ,

जौं तैं उत्तराखंड तैं सोराग बणोणे पीड़ा होणी च वो बि चुनाव मैदान मा आई गेन.

, क्त्त्युं तैं याद आई बल अबि तक  ड्याराडूण इ उत्तराखंड की राजधानी च अर

गैरसैण  अबि तक राजधानी नी बौण  त वो गैरसैण तैं राजधानी बणाणो 

चुनाव लड़णा छन. पता नी गैरसैण का ग्रहूँ मा राहू केतु की क्या दसा च धौं !

जब बि चुनाव आन्दन तबी लोकुं तैं गैरसैण याद आन्द.

     क्त्त्युं तैं पता च की वो   ये जनम त दूर वै जनम मा बि चुनाव नी जीत सकदन

पण वो चुनाव इलै लड़णा  छन की कै हैंक  उम्मेदवारो  पत्ता साफ़ ह्व़े जाओ. 


   अच्काल मिंडकूं समौ नी च ,  पण चुनावी महाभारत मा

अच्काल नेताओं का बोल मिंडकूं  टरटर्याट जन छन अर जन  मिंडकी मिंडकु तैं पटाणो बान

टर्र टर्र करदन उनि  अच्काल उमेदवार बि जनता पटाणो बान टरटराट करदन. दुयूंक टरटराट मा 

प्रेम होंद आशा होंद  .   


   अच्काल ह्युन्दुं मा गरम कपड़ों मौसम होंद थौ पण ये साल उत्तराखंड मा जनवरी तलक

पोस्टरूं  टुपला, पोस्टरूं मफलर, बैनरूं कोट, कुर्ता , सबि कुछ चुनावी बैनरूं का .इख तक की

ढिकाण-डिसाण बि चुनावी बैनरूं का ही होला.


       ये साल उत्तराखंड मा ढांडउन नी पोड़न . ये बरस त नेताओं का भाषणु  ग्व़ाल़ा पोडल.

ये साल बर्फन बि नी पोड़न  ये साल त नारेबाजी से उपजीं आश्वासन की बरखा होली .


  आप दिखदा होल्या किजादातर ह्यूंद मा इ तन्त्र मन्त्र कर्मकांड क पूजन हुंद पण ये साल

नेताओं का प्रपंची मन्त्र तन्त्र , काल़ो जादू  दिखणो मीलल. राजनीति का जादूगर

झूट तैं सच अर सच तैं झूट सिद्ध करण मा झाड़ ताड़ वालुं से जादा होस्यार होन्दन त तांत्रिक-मान्त्रिक

ये समौ  पर कूण्या चलि जाला.  झूट का भुज्यल , झूट का गिगुड़ ,चुनावी झाड़ ताड़ का ताम झाम होला. 


      मूस अर किरम्वळ जन अपणो डुडख्युं/दुंलुं  मा बगत कुबगतो बान खाणक पीणक जमा करदन

तन्नी छुटभया  नेता उमीदवारों से कमीसन लेकी अगला पाँच सालो खुणि अपण पुटकी भरणो इंतजाम करी

लीन्दन. प्रजातंत्र च त बड़ा नेता राजधानी मा मौज कारल त छुटभया बि अपण मेनत मजदूरी उगाला

कि ना ?


   उन त ह्युन्दुं मा पहाड़ कि नद्युं मा पाणी सुकी जान्द पण ये साल नदी, गाड, गदनु मा

पाणि ना शराब बौगलि. चुनावी मौसम शराब की कम्पन्यूँ  क प्रोडक्सन मा बढ़ोतरी को

बि मौसम च.

       चुनावी मौसम अखबार वाल़ू खुणि बि कमणो  मौसम च. भारत मा एक नयो बिजिनेस

इजाद ह्व़े गे अर ये बिजिनेस को नाम च 'पेड़ न्वूज ' . जी हाँ अच्काल 'पेड़ न्वूज' का

बिजिनेस मा उछला ऐ जालो.  प्रजातंत्र  मा भौं भौं नया नया  टुटब्याग की जै हो!.


             अच्काल ह्यूंदो  मौसम नी रै जालो .उन ह्यूंद मा सर्दी  जुकाम की बिमारी होन्दन

पण अच्काल त गढवाळ मा , कुमाऊं मा ' खब'  याने खश्या-बामण  नाम की उकै-उन्द,

 खश्या-बामण का दस्त, खश्या-बामण को खुर्या , खश्या-बामण बुखार जन मौसमी बीमारी

ऐ जाली. ख-ब की  बीमारी भौत पुराणी बीमारी  च अर बुल्दन बल कुमाओं-गढ़वाळ  मा गुरख्याणी 

औण मा भौत हड़ तक ख-ब बीमारी को बि हाथ छौ .


    पुराणा जमानो मा   ह्यूंद को मौसम मा लोक बल्दुं तैं नाळन तेल घी पिलान्दा छया ये चुनावी

मौसम मा   नेता जनता रूपी बल्दुं तैं  आश्वासन, अणभिग्य पण अभिनवी सुपिनो

पिलाली अर जनता भोट दीणे जाली बल सैत   च ये चुनाव मा जित्याँ नेता पहाडु 

बान कुछ सकारात्मक कदम उठाली . नेता कथगा बि कुकर्मी ह्व़े जाला, नेता लोक कथगा बि

कुनेथिक ह्व़े जाला, नेता लोक कथगा बि कुपाण इ (बुरी प्रवृति ) होला, पण   जनता त हमेसा से

 आशावान हुंदी अर या ही प्रजातंत्र की खूबी च. 


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कुछ  चबोड़   इ सै

                      इंटरनेटी जमाना मां सासूं की छ्वीं
(Garhwali Satire, Garhwali Humour, Garhwali wits)

                                         भीष्म कुकरेती
आज न भोळ  त हूणि  चा अर जादातर अरेन्जेड शादी ब्यौ इन्टरनेट का मार्फ़त ही होला .

दुन्या मां बदलाव कथगा  बी आला पण काट करण या  एक हैंका मां  अपनी खैरी लगान बंद नि होला .

इनी इन्टरनेट का जमाना मां सासू अपनी खैरी कन सुणाली  सुनाली या काट कनें कारली :

एक सासू: क्या बुन्न मेरी त मौ घाम इ लगी ही ग्याई  जन बुल्या !

हैंकि: क्या बुन. मेरी ब्वारी  अमेरिकन मैरिज़ डॉट वाली च. दस साल ब्यौ कर्याँ  होई गेन मूसो बी नि जनम !!

दूसरी : कनो नौनो मां खोट च या ब्वारी ही बांज च ?

 सासू: तन हुन्दो त भगवान् का नाम फर रुंदा हम . अमेरिकन स्टाइल वाली जी च ब्वारी . बोलणि  च बल मां बणणो  कु

दुःख, पीडा कैन सैणे ?. बुल नि रौंद बल बच्चा पैदा करण मा डौ होंद बल  ! द  बथावा इं अमेरिकन  शादी डॉट कॉम वाळी  तैं मां बणन कि पीडा नि सयाणी च ,

दरद नि चयाणो  च   . अपण त मवासी क्या सरा  साखी इ बांज पोडी ग्याई

हैंकी : ए भूली ! अरे ब्वारी त छें  च .कै दिन त कुछ त  होलू . एक मेरी भूलि  का नौनन अमेर्कन शादी डॉट वाली ल्हायी. सारा गाँव  एरिया मां मेरी भुली मुख दिखाण  लैकि नी रईं च.

पैली: कनो क्या व्हाई ?

वैइ : हूँ क्या छो मेरी भुली  का नौनु अमेरिकन डॉट कॉम बिटेन मोछ वळी  ब्वारी खुजेक ल्हेई ग्याई . ब्वाई बोलवां या ब्वारा ब्वालवां ?

उख बी मवासी त घाम अलग लग अर जग मा  बदनामी अलग हूणी  च

एक हैंकि  : ए भुली !! ओ द्याख च जमुना कि नौली नयी नयी ब्वारी . गौड़ी ,भैंसूं , बखरूं  त छ्वादों मूसों दगड बी अंगरेजी मां बचल्यांद ..

दूसरी : अब टाईम्स शादी डॉट कॉम वळी  होली त डाळ बूटों दगड बी अंगरेजी मां ही छ्वीं कारली कि ना ?

एक; हाँ भारत डॉट कॉम वाली होंद ता वा ब्वारी ना बहु ह्व़े जांद . त फिर ,  वहु त हिन्दी मां ही  बच्ल्याली, बात करली की ना?

तीसरी: ब्वारी ल़ाण   होऊ  त उत्तराखंड डॉट कोम  बिटेन ल़ाण  चयांदी

पैली:  हाँ उन त  उत्तराखंड डॉट कोम  की ब्वारी ठीकि होंदी . घर कु काम बी कॉरी लीन्दी पण राज्य का ओफिसरुं तरां जादा तर देहरादून ही पड़ीं रौंदी .

दूसरी : सबसे बढिया त अपन गढ़वाली ब्वौ डॉट कौम वळी  वाली बल  घर का कम बी करदन अर हम सासुं  का खुट बी पटके लीन्दन

चौथी : पण गढ़वाली शादी डॉट कोम वालिम सवोर , सगोर, एटीकेट  कुछ बी नि होंदी वी घर्या हिसाब  किताब ...

सबी: हाँ हमारो जमानो ही ठीक छायो जब ........



 Garhwali satire , Garhwali Humour, Garhwali wits to be continued in next.....

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Mangament Guru -36     

प्रबंध शास्त्री - 36                                                   

                                      इकुजीरो नोनाका; ज्ञान को निर्माण को धड्वे   

                          Ikujiro Nonaka : Famous for Knowledge Management                                  



(Notes on General management Guru, , Notes on Managemnt Thinkers and Bright Management Practices,
 
Management Gurus, Marketing management Guru, Qaulity Mangement Guru, Operation Managemnt Guru,

Human Resourse Development Management Guru, )
 


                                           Bhishm Kukreti

    इकुजीरो (१९३५) क जनम जापान मा ह्व़े जख वैन हितोत्सूबाशी वि.वि मा पढाई अर पैथराँ 

कैलिफोर्निया वि वि मा पढ़ाणो अमेरिका आई.



  इकुजीरो नोनाका अर हिरोताका न ज्ञान पर संसार तैं कथगा इ  नया विचार दिने .



                  द्वी तरां ज्ञान

१- स्पष्ट या भैरो ज्ञान : इकुजीरो नोनाका अर हिरोताका को मानण च बल पश्चमी ज्ञान औपचारिक, संदेहहीन,

सिस्टेमेटिक , वैज्ञानिक ढंग को होंद. अर जादातर डाटाउन पर निर्भर होंद

२- भीतरी ज्ञान  :   दुनिया क पूरबी खंड को ज्ञान अंतर्मन निर्भर, अनुपौचारिक, अस्पष्ट , होंद

दुयूं क मानण च बल द्वी ज्ञान एक हांका क सहायक छन जन कुंजी अर ताळउ

                       SECI मॉडल


इकुजीरो नोनाका अर हिरोताका न ज्ञान प्रबंधन क बारा मा एक मॉडल दे जो ज्ञान प्राप्ति अर ज्ञान तैं काम मा

ल़ाणो बान  भौत इ प्रिसद्ध मॉडल च

१-सामाजिकीकरण (socialization )

२-वाह्यीकरण (Externalization ) 

३- जुड़ण, मेल करण  (combination ) 

४- अंतरिकीकरण (Internalization )

         



                        Books by Ikujiro Nonaka

1- The Knowledge -Creating Company: how japanese Companies Create The Dynamics of Innovation

(with Hirotaka Takeuchi), 1995

Management Guru का बारा मा फड़कि -37 मा बाँचो
Management Guru, management Thinkers Series to be continued.......

 

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                   गढवाळ का नामी लोक अर ज़ात (मलारी जुग बिटेन अज्युं तलक ) - फड़की -54
       
                  गढ़वाल के विभूतियाँ व समाज (मलारी युग से वर्तमान तक) - भाग - 54



                     Great Garhwali Personalities (Malari era to till date ) Part -54

                           Bhishm Kukreti
 
                             गढ़वाळ  का भगवान्(स्वर्गीय)  पत्रकार/संपादक- १

                Great Jounalists/Editors of Garhwal of Past - 1

           गढवाळ पत्रकारिता क मामला मा सुभागी च . जब बिटेन भारत अर गढ़वाल मा
 
अखबार छपेण बिसेन गढ़वाळ की धरती मा नमी गिरामी  पत्रकार/संपादक पैदा ह्वेन .

१- नागेन्द्र उनियाल (असवाळस्यूं, पौ.ग,- स्वर्गवास-१९८१) : इन उना नौकरी क बाद 'धडकता

पहाड़ ' निकाळ . फिर कोटद्वार बिटेन 'जयंत' आठ्वाडा (साप्ताहिक) को प्रकाशन, संपादन  शुरू कार .
 
तेज तर्रार लिखणो बान प्रसिद्ध.

२- श्याम चरण काला (सुमाडी, पौ.ग,१९१०-१९८४):  काला जी टाइम्स ऑफ़ इंडिया , भारत का भौत का

रोजानौ  अखब़ारूं अर भैर देसु अखब़ारूं रैबार्या/ खबरची/संवाददाता रैन. भारतीय श्रमजीवी पत्रकार सम्मलेन,
 
योधा मा सम्मानित. जब  'श्रमजीवी पत्रकारूं  बान कोलोनी बौण त कोलोनी नाम

'श्यामाचरण  काला नगर' धरे गे.

३- सदा नन्द कुकरेती (ग्वील, मल्ला ढानगु, पौ.  १८८६-१९३७): पैल टीरी रियासत मा काम कार पण उख घूसखोरी
 
रास नि आये त पौड़ी आयें अर सन १९१३-१९१५ तक 'विशाल कीर्ति' का संपादन कार. लिखण मा चुटीली शैली

अर व्यंगात्मक ब्युंत का बान प्रसिद्ध. अख्बराऊ संपादकत्व मा अंग्रेजी हकुमत से झगड़ा बि ह्व़े. 
 
४- टेक चंद गुप्ता (देहरादून) : स्वतंत्रता से पैल 'देहरा पत्रिका' क संपादक रैन .


५-संपादक शिरोमणि विश्वम्बर दत्त चंदोला (थापळी,पौ.ग. १८७९ -१९७०) : कुछ दिन फ़ौजी दफ्तर मा

काम कार अर फिर १९०५ से 'गढवाळी पत्रिका' पत्रिका क संपादन अर प्रकाशन शुरू कार. टिहरी रियासत क
 
 रवाईं  कांड खबर छाप ण पर जेल (१९३३-१९३४) .


६- त्र्यम्बक चंदोला : पैल 'गढ़वाळी' हिंदी  साप्ताहिक का सह संपादक रैन फिर अंग्रेजी अखबार 'हिंदुस्तान टाइम्स '

 का ताउम्र संवाददाता रैन

७ ब्रज भूषण ( देहरादून १९१३-१९७७) ; स्वतंत्रता  सेनानी, कवि न साप्ताहिक 'दून घाटी' क संपादन कार .


८- व्याखान वाचस्पति विश्वम्बर  दत्त देवरानी (जेठो गाँव  पैनो); मालवीय जे क सेक्रेटरी संतान धर्म का प्रचारी बि छया .
 
अफ्रीका मा ऊंको बड़ो सम्मान थौ.  देवरानी जी न डिल्ली मा 'कर्मयोगी' क सम्पादन कार. ये लेखक तैं

अफ्रिका मा बस्यां गुजरात्युं द्वारा गुजराती मा छप्युं पम्फलेट दिख णो सौभाग्य बि हुयुं च जख मा

'महामहोपदेसक ' '  विश्वम्बर दत्त देवरानी क अफ्रिका मा प्रोग्राम क ब्यौरा च.


९- स्व दया नन्द थपलियाल (खैड़, पौ.ग.मावाळस्यूं) अंग्रेजी का पत्रकार जौन 'कोम्म्र्स एंड इंडस्ट्री ' अर 'थौट' क

संपादन बिभाग मा काम कार

१०- दामोदर प्रसाद थपलियाल (पालकोट, खात्स्युं, टि.ग, १९२३-१९७७) : गढवाली क साहित्यकार दामोदर प्रसाद

थपलियाळ न गढवाळी भाषा की 'फ्यूं ळी ' पत्रिका क संपादन कार .या पत्रिका धनाभाव से बन्द ह्व़े


११-महेशा नन्द थपलियाळ (टोलू, मन्यार स्यूं, पौ.ग. १९०१-१९६९) मेरठ बिटेन 'ह्रदय' हफ्तावार  अर 'आशा' मैनावार

पत्रिकाओं संपादन अर फिर पौड़ी बिटेन 'उत्तर भारत' एवम लैंसडाउन बिटेन 'नव भारत को संपादन


१२- देवकीनंदन ध्यानी (जखळ , सल्ट, अल्मोड़ा  , १९०७-१९३६ ); कवि देवकीनंदन न मुरादाबाद बिटेन 'विजय',

हल्द्वानी अर  पौड़ी बिटेन 'स्वर्ग भूमि' प्रकाशन अर संपादन 


१३- दयाधर धौल़ाखंडी (डुमैला, खाटली, पौ ग.  १९१९-१९४९): गढ़वाल साहित्य मंडल का कर्कर्ता अर

'गिरीश' पत्रिका डिल्ली क संपादक मंडल का सदस्य


१४-कोतवाल सिंग नेगी (कांडई , पौ. १९००-१९४८) कोतवाल सिंग जी न कानपूर बिटेन 'हिलमन' अर

पौड़ी बिटेन' क्षत्रिय वीर ' को संपादन कार


१५- गोविन्द सिंह नेगी ( दाल ढुंग, बडीयार गढ़ , टि.ग १९२८-१९७१) :  कति समाचार पत्रों मा संवाददाता रैन

'जीवन-पानी' अर 'दून अंचल ' का संपादन कार


१६- जोध सिंह नेगी (सुला, अस्वाल्स्युं, पौ.ग.१८६३-१९२५) ' क्षत्रिय वीर ' क संस्थापक


१७- प्रताप सिंह नेगी (नेग्याणा, गग्वाड़स्यूं ,पौ., १८७२-१९३५): 'क्षत्रिय वीर ' का संपादक अर प्रकाशक


१८- श्याम चन्द्र नेगी (बेलग्राम, अठुर, टि.ग १९१२-१९८२): अंग्रेजी समाचार पत्रुं  संवाददाता .

'नोर्दर्न टाइम्स ' का संदन बि कार


१९-महान संपादक  गिरिजा दत्त नैथाणी (नैथाणा ,मन्यार्स्युं , पौ. १८७२ -१९२७) गढवाळ   क्षेत्र का पैला

पत्रकार अर संपादक  १९०२-१९०४ तक ' गढ़वाल समाचार' (पैल लैंसडाउन अर फिर कोटद्वार ) का सम्पादन अर प्रकाशन.

१९०५-१९१० तक देहरादून  बिटेन 'गढवाली 'माववार क संपादन.

फिर दुगड्डा से '  गढ़वाल समाचार' (१९१२-१९१४० तक प्रकाशन अर संपादन.

फिर देहरादून क 'गढवाली' हफ्तावार पत्रिका क संपादन (१९१५-१९१६)

आखिरैं 'पुरुषार्थ' मासिक क प्रकाशन अर संपादन  (दुगड्डा  अर नैथाना ).


२०-मायादत्त नैथानी ( नैथान , मृत्यु १९७२) मुंबई का अंग्रेजी समाचार पत्रुं संवाददाता अर

सम्पादकीय मंडल सदस्य


२१-सत्यपाल पांधी (अमृतसर १९२३-१९८१): मस्सुरी मा रौंदा छा. कत्ति अंग्रेजी समाचार पत्रुं  मा

संवाददाता . मसूरी बिटेन अंग्रेजी साप्ताहिक 'मसूरी टाइम्स' को  संपादन कार .

फिर मसूरी बिटेन १९४९ मा,  अंग्रेजी साप्ताहिक 'हिमाचल टाइम्स' का प्रकाशन अर संपादन शुरू कार.

१९५३ मा हिंदी संस्करण शुरू. १९६९ मा ये पत्र क नाम 'हिमालय टाइम्स कार. १९६९ बिटेन दैनिक

अखबार 'हिमालय टाइम्स'  शुरू कार . १९७० बिटेन शिमला संस्करण शुरू.

उच्चस्तरीय तिमासी ' पेट्रोलियम एशिया' क प्रकाशन अर संपादन.


२२- जंगीलाल शाह 'श्रीबंधू' (चमोली, १९१४-१९८५ ): पत्रकार अर साप्ताहिक 'देवभूमि ' प्रकाशन मा अहम् भूमिका.


२३-अमीर चंद बम्बवाल (पेशावर , १८८६-१९७२) स्वतन्त्रता सेनानी . उर्दू अर अंग्रेजी का ज्ञानता. १९०५ मा पेशावर

बिटेन 'फ्रंटियर एडवोकेट' शुरू कार . १९०९--१९१० तक इलाहाबाद मा स्वराज' का संपादक.१९२८ मा फिर फ्रंतिया एडवोकेट

शुरू. १९३२ मा पश्तो भाषा मा पत्रिका प्रकाशन . पेशवर बिटेन 'अफगान' 'खुदाई खिदमतगार' अर द्विबशी फ्रंटियर

मेल' का प्रकाशन अर संपादन. 

भारत बिगल़ेणो परांत  देहरादून मा निवास अर फिर अंग्रेजी, हिंदी मा 'फ्रंटियर मेल' को प्रकाशन संपादन


२४- सतेन्द्र सिंह भंडारी (चौड़ीख , पौ.ग.स्वर्गवास - १९८३): डिल्ली मा फ्री लांसर जौर्नालिस्ट रैन.

१९६९ बिटेन पौड़ी बिटेन 'पौड़ी टाइम्स ' का संपादन अर प्रकाशन


२५-हुलास वर्मा (बिज्नौर, १८८७ -१९६०) देहरादून बिटेन पाक्षिक 'स्वराज्य सन्देश' क प्रकाशन


२६- स्वामी विचारानंद (प्रयाग,१९४०मा इहलोक वास  ) 'साप्ताहिक 'अभय' क संपादन, प्रकाशन.


२७-ठाकुर  चन्दन सिंह (1886 -१९६८ ( देहरादून मा 'नोर्दन टाइम्स' अर नोर्दन स्टार ' का

संपादन . फिर 'गोरखा संसार' अर स्वतंत्र नेपाली' क संपादन


२८- शहीद श्री देव सुमन (१९१५-१९४४) श्रीदेव सुमन न डिल्ली क साप्ताहिक 'हिंदु अर अंग्रेजी साप्ताहिक

'धर्म राज्य' क सम्पादकीय बिभाग मा काम करी


२९- कृपाराम मिश्र 'मनहर'  (सरूड़ा, १९०२-१९७५ ): गढ़ देश (१९२९-१९३०) को  प्रकाशन संपादन.

१९३४ मा फिर से प्रकाशन शुरू . १९४० मा साप्ताहिक 'सन्देश' को प्रकाशन शुरू पण जेल जाण से बंद.


३०-  हरिराम मिश्र (१९१८-१९८०) 'सन्देश' का सहकारी संपादक. १९५८ मा 'हिमालय की ललकार'.

हरिराम मिश्र 'चंचल' एक ओजस्वी पत्रकार छया.


३१- प्रताप सिंह नेगी (ढौरि, डबराल स्यूं, पौ.१८९७ -१९८०)स्वतंत्रता सेनानी , राजनीतिग्य, प्रताप सिंह नेगी अर

ज्योतिप्रसाद महेश्वरी न एक साप्ताहिक पत्र 'सन्देश' (१९३७) स्वतन्त्रता आन्दोलन तैं सब्बळ दीणो बान

शुरू कार.


३२- नरेंद्र सिंह भंडारी (जौरासी, चमोली, १९२०-१९८६) राजनैतिग्य लखनऊ मा 'कोंग्रेसी अखबार 'नया भारत' का संपादन कार


३३- प्रसिद्ध पत्रकार गोविन्द प्रसाद नौटियाल (नन्द प्रायद, चमोली,१९०१-१९८६(: अंग्रेजी अखब़ारूं जन की टाइम्स इंडिया,

स्टेट्स मैन , लीडर , हेराल्ड, हिंदुस्तान टाइम्स आदि का संवाददाता.


३४- शहीद उमेश डोभाल (सिरोली, इडवाळस्यूं, पौ.ग.१९५२-१९८८) बिजनौर टाइम्स, नव भारत टाइम्स, अमर उजाल़ा

आदि मा संवाददाता .

खोजी पत्रकारिता क वजे से शराब माफिया द्वारा  १९८८ मा ह्त्या


३५-संपादकाचार्य भैरव दत्त धुलिया (मदनपुर पौ.ग. , १९०१-१९८८): स्वतंत्रता सेनानी, विधयक,

जब 'कर्मभूमि' साप्ताहिक को जनम ह्व़े (लैंसडाउन १९३९) धुलिया जी अर भक्त दर्शन दुई संपादक छया .

फिर 'कर्म भूमि '  कोटद्वार आई अर १९८६ तलक भैरव दत्त धुलिया क संपादकत्व मा निरंतर छपणी रै


३६ पत्रकारिता का युग पुरुष ललिता प्रसाद नैथाणी (नैथाना , १९१३- १९८८) : पैल 'कर्मभूमि' क

संपादकमंडल मा काम कार. फिर 'सत्यपथ (१९५६) को प्रकाशन शुरू कार. सत्यपथ गढ़वाल को

नामी गिरामी, राष्ट्रवादी पत्र छौ 


३७- समाजसेवी, राज्नैतिग्य राम प्रसाद बहुगुणा (चमोली, १९२०-१९९०) १९५३ बिटेन साप्ताहिक 'देव भिमी' को प्रकाशन अर संपादन.

यू साप्ताहिक उत्तरी गढ़वाळ को बड़ो मशहूर  पत्र थौ.


३८- आचार्य गोपेश्वर कोठियाल (कूणजी . टि.ग.१९०९ -१९९९) युगवाणी का संपादक, प्रकाशक आचार्य गोपेश्वर जी '

युगवाणी' तैं शुरू करण वळ अर ये साप्ताहिक

तैं निरंतर चलाण वाळ छया. १९४७ बिटेन युगवाणी निरंतर छपेणी राई.  अब युगवाणी मासिक पत्र च


३९ धर्मानंद सेमवाल (रुद्रप्रयाग, १९५३-२००० ) धर्मानंद सेमवाल न पैल 'पर्वत मित्र' पाक्षिक अर फिर

'परिवहन मित्र' को प्रकाशन कार .


४०-  संघर्षशील पत्रकार मदन जोशी (सिंधार, पौ.ग १९५५-२००): पत्रकारिता मदन जोशी क हवस छे

पैल 'दून दर्पण' मा छई साल  काम कार.

१९८७ मा दयानंद अनंत क  'पर्वतीय टाइम्स'  मा ऐन. ओज्वासी लेख से युंकी प्रसिधी बढ़

१९९१-१९९२ तक आकशवाणी का उप संपादक रैन

१९९५-१९९६ से 'हिमालय दर्पण' देहरा दून मा उप संपादक रैन .

१९९६ मा दैनिक जागरण मा उपसंपादक रैन

४१- जुझारू मनिख स्वरुप ढौंडियाल (ढोड, पौ.ग १९३५-२००२)  हिंदी का प्रसिद्ध कथाकार, गढ़वा ळी नाटकूं

 लिख्वार स्वर्रोप ढौंडियाल न १९७३ बिटेन २००२ तक  'अलकनंदा' मासिक प्रकाशन अर सम्पादन कार .

४२- मुंबई क हिलांस अर्जुन सिंह गुसाईं ( ड़ान्गु , पौ.ग१९३४-२२००३) अर्जुन सिंग गुसाईं का नाम उत्तराखंडी

पत्रकारिता मा 'हिलांस ' (१९७८-१९९०, १९९२-१९९७) मासिक क कारण भौत प्रसिद्ध च . अपण टैम की या पत्रिका

साहित्यकारूं मा सम्माननीय पत्रिका रै.


४३- डा शिवा नन्द नौटियाल (कोठल़ा , पौ.ग.१९३६-२००४) प्रसिद्ध लोक साहित्य मर्मी , उत्तरप्रदेश का

भू.पू.उच्च शिक्षा मंत्री डा सिवा नन्द नौटिया न डिल्ली बिटेन १९६६ से  कुछ साल 'शैलोदय' पत्रिका का

संपादन /प्रकाशन बि कार


४४-धर्मानंद उनियाल (कफना, कड़ाकोट , टि.ग १९३६-२००९) धर्मानंद उनियाल की रिपोर्ट

स्थानीय अर राष्ट्रीय पत्रों मा छपदा छया


४५- पीताम्बर दत्त देवरानी (डुडेख , लंगूर, १९२५ -२००९) प्रसिद्ध मास्टर जी पीताम्बर दत्त जी न १९८६-१९८८ तक

साप्ताहिक 'कर्मभूमि क संपादन कार अर फिर १९८८-१९९४ तक 'सत्यपथ' क संपादन कार


४६ डा भक्त दर्शन ( भौरा ड, साबली, १९१७-१९९१)प्रसिद्ध राजनीतिग्य  भक्त दर्शन जी 'कर्मभूमि' का पैला संपादक छ्या.


४७- परुसराम नौटियाल : मुंबई बिटेन परुशराम नौटियाल न १९५२ मा 'नव भारत' का नाम से एक पत्रिका

प्रकाशित करी.


४८- शकुन्त जोशी : शकुन्त जोशी क गढ़वाळी मासिक 'रैबार' देहरादून बिटेन छपद छौ (कुछ समु तक इ)


४९-सतेश्वर आजाद  न पौड़ी बिटेन गढवाली पत्रिका क कुछ समौ तक प्रकाशन अर संपादन कार


५०- विनोद उनियाल (अमोल्डा, डबराल स्यूं) न डिल्ली बिटेन कुछ समौ तक 'मंडाण' अखबार

को प्रकाशन अर संपादन कार.   


५१- योगेश्वर धुलिया (मदनपुर) स्व. योगेश्वर धुलिया ण पैल कर्मभूमि मा काम कार

अर फिर १९७५ बिटेन 'तरुण हिंद' साप्ताहिक को प्रकाशन कुछ सालुं तक कार

५२-  हीरा लाल बडोला (ठनठोली, मल्ला ढान्गु १९३०-२००८) हीरा  बडोला न १९५५ से

 कुछ समौ तक   'उत्तराखंड' साप्ताहिक छाप अर संपादन कार

५३- प्रसिद्ध कलाविद स्व. बैरिस्टर  मुकंदी लाल न ' सन १९२२ मा कोटद्वार से ' तरुण कुमाओं' क प्रकाशन कार



Great Jounalists/Editors of Garhwal to be continued ....



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गढवाळी कवियुं रचना करणों ढौळ/ब्युंत -2 :



           गढवाळी क युवा कवि श्री जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" से भीष्म कुकरेती क छ्वीं





(ये वार्तालाप मा मीन पता लगाणे कोशिश कार कि कवि कविता गंठयांद दें कौं मनोस्थिति अर

कौं कौं भौतिक स्तिथियुं मा कविता करदन. आज गढवाळी का उभरदा युवा श्री जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" कवि से छ्वीं)



भीष्म कुकरेती को सवाल : आप कविता क्षेत्र मा किलै ऐन ?

 

"जिज्ञासु": गढ़वाली कविता लिखणु मेरु शौक छ अर पहाड़ सी प्यार, मन मा प्रवास की पीड़ा पैदा होण का कारण गढ़वाली कविता लेखन शुरू करी.
 
भी.कु.: आपकी कविता पर कौं कौं कवियुं प्रभाव च ?

 

"जिज्ञासु" : कै भी कवियौं कू प्रभाव निछ, स्व. कुंवर चन्द्र बर्त्वाल जी, घनश्याम सैलानी जी, जीवानंद श्रीयाल जी अर गिर्दा जी मेरा आदर्श छन.
 भी.कु: आपका लेखन मा भौतिक वातावरण याने लिखनो टेबल, खुर्सी, पेन, इकुलास, आदि को कथगा महत्व च ?

 

"जिज्ञासु": मेरा लेखन फर इकुलांस अर स्वछंद वातावरण कू प्रभाव छ.



भी.कु:: आप पेन से लिख्दान या पेन्सिल से या कम्पुटर मा ? कन टाइप का कागज़ आप तैं सूट करदन मतबल कनु कागज आप तैं कविता लिखण मा माफिक आन्दन?

 

"जिज्ञासु": मैं पेन सी अर कंप्यूटर मा कविता लिख्दु छौं. कविता लेखन का खातिर लाइन वाळी नोट बुक ज्यादा पसंद करदु छौं.



भी.कु: जब आप अपण डेस्क या टेबले से दूर रौंदा अर क्वी विषय दिमाग मा ऐ जाओ त क्या आप क्वी नॉट बुक दगड मा रखदां ?

 

"जिज्ञासु": मेरा दिमाग मा बाटा हिटदु या डेस्क सी दूर जब क्वी भाव पैदा होंदु त कोशिश करदु छौं नोट बुक फर नोट कन्न की.
 


भी.कु: माना की कैबरी आप का दिमाग मा क्वी खास विचार ऐ जवान अर वै बगत आप उन विचारूं तैं लेखी नि सकद्वां त आप पर क्या बितदी ? अर फिर क्या करदा ?

 

"जिज्ञासु": मेरा मन मा जब क्वी विचार पैदा होंदु अर मैं नोट नि करि सकदु त मन मा कसक सी पैदा होंदी छ.

 

भी.कु:: आप अपण कविता तैं कथगा दें रिवाइज करदां ?
 


"जिज्ञासु": मैं अपणि कविताओं कू जब सृजन करदु छौं त दुबारा रिविजन भौत कम ही करदु छौं.

 

भी.कु:आपन कविता गढ़णो बान क्वी औपचारिक (formal ) प्रशिक्षण ल़े च ?
 


"जिज्ञासु": मैन कविता गढ़ण कू क्वी औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नि करि.

 

भी.कु: हिंदी साहित्यिक आलोचना से आप की कवितौं या कवित्व पर क्या प्रभौ च... क्वी उदहारण ?
 


"जिज्ञासु": मैं मन सी गढ़वाळि कविता लेखन ही करदु छौं. पहाड़ फर कुछ हिंदी कविताओं कू सृजन भी करदू छौं.



हिंदी साहित्यक आलोचना की तरफ मैं ध्यान नि देन्दु अर मेरी कवितों फर क्वी प्रभाव निछ.


भी.कु:: आप का कवित्व जीवन मा रचनात्मक सुखो बि आई होलो त वै रचनात्मक सुखा तैं ख़तम करणों आपन क्या कौर ?
 


"जिज्ञासु": मेरा कवित्व जीवन मा रचनात्मक सुख औन्दु छ अर मैं प्रयास करदु छौं ऊकेन्न कू.





भी.कु:: कविता घड़याण मा, गंठयाण मा , रिवाइज करण मा इकुलास की जरुरत आप तैं कथगा हूंद ?

 

"जिज्ञासु":कविता गढ़ण अर गंठ्याण का खातिर यकुलांस की पूरी जरूरत होंदी छ. यकुलांस ही कविता सृजन की सीढ़ी छ.
 



भी.कु: : इकुलास मा जाण या इकुलासी मनोगति से आपक पारिवारिक जीवन या सामाजिक जीवन पर क्या फ़रक पोडद ?

इकुलासी मनोगति से आपक काम (कार्यालय ) पर कथगा फ़रक पोडद
 
"

जिज्ञासु":इकुलासी मनोगति का कारण मेरा पारिवारिक अर सामाजिक जीवन फर क्वी प्रभाव नि पड़दु अर कार्यालयी काम काज फर भी प्रभवित नि हौंदु. मेरु कविमन छ अर इकुलास ही भलु लगदु कविता सृजन का खातिर।



भी.कु:: कबि इन हूंद आप एक कविता क बान क्वी पंगती लिख्दां पं फिर वो पंगती वीं कविता मा प्रयोग नि

करदा त फिर वूं पंगत्यूं क्या कर्द्वां ?

 

"जिज्ञासु": कविता सृजन का बाना जब मैं क्वी पंक्ति लिख्दु छौं त कविता पूरी ही करदु. जब क्वी सज्जन क्वी बात बोल्दु छ त मेरा मन मा विचार औन्दु ये विषय फर कविता लिखी जै सकदी त कागज फर नोट करदु छौं.
 




भी.कु: जब कबि आप सीण इ वाळ हवेल्या या सियाँ रैल्या अर चट चटाक से क्वी कविता लैन/विषय आदि मन मा ऐ जाओ त क्या करदवां ?

 

"जिज्ञासु":जी, जब मन मा क्वी कविता कू विषय पैदा हौंदु त तुरंत लिख्दु छौं, चाहे आधी रात किले न हो.



भी.कु: आप को को शब्दकोश अपण दगड रख्दां ?
 


"जिज्ञासु": क्वी शब्दकोश नि रखदु.


 

भी.कु: हिंदी आलोचना तैं क्या बराबर बांचणा रौंदवां ?
 




"जिज्ञासु": ना का बराबर.

भी.कु: : गढवाळी समालोचना से बि आपको कवित्व पर फ़रक पोडद ?
 


"जिज्ञासु":गढ़वाळि समालोचना सी मेरा कवित्व फर क्वी फेर नि पड़दु. मेरी सोच छ, जू भी गढ़वाळि मा लिखणु छ भलु प्रयास छ.

 

भी.कु:: भारत मा गैर हिंदी भाषाओं वर्तमान काव्य की जानकारी बान आप क्या करदवां ? या, आप यां से बेफिक्र रौंदवां ?

 



"जिज्ञासु":मैं बेफिक्र ह्वैक गढ़वाली कविता लेखन करदु अर पसंद करदु छौं. हिंदी काव्य साहित्य मा कुछ सुन्दर बात छ त अनुसरण करदु छौं.

भी.कु: : अंग्रेजी मा वर्तमान काव्य की जानकारी बान क्या करदवां आप?
 
"जिज्ञासु": अंग्रेजी मा वर्तमान काव्य की जानकारी मैकु निछ, न ही मेरी जानकारी की इच्छा छ. गढ़वाली कविता लेखन मेरी प्रार्थमिकता छ अर प्रयास करदु गढ़वाली का प्यारा प्यारा शब्द का प्रयोग कू.



भी.कु: भैर देसूं गैर अंगरेजी क वर्तमान साहित्य की जानकारी क बान क्या करदवां ?

 

"जिज्ञासु": हरेक देश कू साहित्य सुन्दर हौंदु पर ज्यादा जानकारी नि रखदु.



भी.कु: आपन बचपन मा को को वाद्य यंत्र बजैन ?

 



"जिज्ञासु": बचपन सी आजतक मैकु बांसुरी सी भौत लगाव छ. आज भी बड़ा शौक सी बजौंदु छौं गढ़वाली गीतू की धुन, बिना गुरु ज्ञान का.
 



भी.कु: आप संस्कृत , हिंदी, अंग्रेजी, भारतीय भाषाओँ क, होरी भासों क कौं कौं कवितौं क अनुवाद गढवाळी मा करण चैल्या ?

"जिज्ञासु": मैं गढ़वाली कवियौं की हिंदी मा लिखीं कविताओं कू अनुवाद गढ़वाली मा कन्नु पसंद करलु.
 




http://jagmohansinghjayarajigyansu.blogspot.com/2011/12/blog-post_26.html
 
www.pahafirorum.net

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Mangament Guru -37
प्रबंध शास्त्री - 37     

                           केनइची ओमाए : जापानी ब्यापार कला को प्रसारक

                Kenichi Ohmae : Famous For The Art Of Japanese Business

 

 (Notes on General management Guru, , Notes on Managemnt Thinkers and Bright Management Practices,

Management Gurus, Marketing management Guru, Qaulity Mangement Guru, Operation Managemnt Guru,

Human Resourse Development Management Guru, )



                            Bhishm Kukreti



केन इची को जनम १९४३ मा जापान मा ह्व़े, इखी केन इची न बी.एस. अर टोकियो इंस्टीच्यूट  ऑफ़ टेक्नौलोजी बिटेन

एम्.एस. कार.मसासुसेट इंस्टीच्यूट बिटेन नुक्लियर इंजीनियरिंग क डिग्री ल़े

पैल हिताची मा काम कार फिर मक्किंसी कंसल्टिंग कम्पनी मा भागीदार बौण .

केन इची न अपण किताबुं माध्यम से  जापानी प्रबंधन सिधांत को बड़ो प्रचार कार


                             तीन क  सिधांत (3  C )                     

 केन इची ओमाए ण बताई की रंनेती कारुं तैं टीक क पर ध्यान दीं चएंद

१-कोर्पोरेसन (कम्पनी )

२- कस्टमर (गाहक)

३- कम्पिटिटर्स (प्रतिस्पर्धी ) 


                  M आकार कु समाज


केन इची ओमाए क मनण च बल धीरे धीरे मिड्डल क्लास ख़तम ह्व़े जाल अर

सिर्फ द्वीई क्लास रै जाला अति धनि (UPPER CLASS )अर तौळी क्लास (LOWER CLASS ) .

शिक्षा होण पर बि लोअर क्लास वाळ  अळगो क्लास मा ग आई नि सकदन 


                   Books by Kenichi Ohmae

1- The Mind of Strategist, 1982

2-Japanese Business : Obstacles and Opportunities, 1983

3-Traid Power: The Coming Shape of Global Competition, 1985

4-the Borderless World : Power and Straegy in the Interlinked Economy, 1990

5- The End of the Nation State: The Rise of Regional Economics, 1995

 

Management Guru का बारा मा फड़कि -38 मा बाँचो
Management Guru, management Thinkers Series to be continued.......



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गढ़वाल के विभूतियाँ व समाज (मलारी युग से वर्तमान तक) - भाग - 54



Great Garhwali Personalities (Malari era to till date ) Part -54


                             Bhishm Kukreti

 

                         गढ़वाळ का नामी-गिरामी पत्रकार/संपादक -2



                                    Great Jounalists/Editors of Garhwal - 2



सौ साल का जवान कुंवर सिंह नेगी "कर्मठ' : गढ़वाळ अर गढ़वाळी प्रति समर्पित जुझारू व्यक्तित्व



            सौ साल का कुंवर सिंह नेगी क स्वास्थ्य, प्रतिभा अर व्यक्तित्व बिलखणि च. कर्मठ जी एक स्वार्थहीन सामाजिक कार्यकर्ता.

गढवाळी साहित्य का प्रकाशक , लगन शील लेखक अर जीवट का संपादक छन. अच्काल इन व्यक्तित्व को सर्वथा

अकाळ पड्यूँ च .

        कुंवर सिंह कर्मठ को जनम सन उन्नीस सौ बारा मा पांग गौं , तहसील पौड़ी मा ह्व़े छौ.

              पैल पैल १९३६ मा पैमैस क टैम पर पेपर कु ठेका लीण से कुंवर सिंह उर्फ़ 'कर्मठ' जी 'हिल पेपर कोंट्रेकटर ' का

नाम से प्रसिद्ध ह्वेन. कुछ समौ परांत कर्मठ जी न कालेश्वर प्रेस की स्थापना कार जख बिटेन भक्त दर्शन जी

अर भैरव दत्त धुलिया जे क संपादकत्व मा 'कर्मभूमि' साप्ताहिक छ्पदो थौ.

    सन  1942   मा भक्त दर्शन जी अर धुलिया जीक जेल जाण मा 'कर्मभूमि' क संपादन को काम

 कर्मठ जी न सम्बाळ.

                     पैथर कुंवर सिंग नेगी जी कालेश्वर प्रेस तैं कोटद्वार लै गेन. सनै सनै कौरिक कालेश्वर प्रेस

कोटद्वार मा छपण वाळ पत्र-पत्रिकाओं जन कि कर्मभूमि, सत्यपथ, हितैषी , क्षत्रिय वीर,

देव भूमि, हिमालय की ललकार, अर 'आवाज' क मुद्रक बौणि गे . लैंसडौन अर श्रीनगर मा बि कालेश्वर प्रेस के

ब्रांच रैन .

                     सन १९७६ मा कर्मठ जीन 'गढ़ गौरव मासिक' पत्रिका क प्रकाशन अर सपादन शुरू का. 'गढ़ गौरव '

पत्रिका सन १९७६ बिटेन आज तक छपेणि रौंदी .


           कर्मठ जी न गढवाली कथामाला , जैलाल वर्मा क 'गढवाली शब्दकोश, वेताल पचीसी , अर

अदित्य्राम दुधपूड़ी क भौत सी किताब क आलावा ग्ध्वालियों का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान,

डा पीताम्बर दत्त बडथ्वाळ क साहित्यिक जीवनी जन किताबुं प्रकाशन कार .


              भौत सी संस्थाओं न सौ साल कु जवान कुंवर सिंह नेगी ji  क सम्मान कार.


                 कुंवर सिंह नेगी 'कर्मठ' जी कोटद्वार मा रौंदन .



Great Jounalists/Editors of Garhwal to be continued ....

 

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           Pando Nach ma Kunti Gainda Katha : A Story of Rhinoceros in Pando Folk dance


(Garhwali folk Dance Songs, Kumauni Folk Dance, Kumauni Folk Songs Uttarakhandi Folk Dance- Songs,
Himalayan Folk Dance-Songs)

                          Bhishm Kukreti

    There are tens of story sung at the time of Pando Folk Dance of Garhwal and Kumaun regions by Aujees.
There is one very peculiar story of Gainda or rhinoceros in Pando folk dance-song of Kumaun and Garhwal.
 Kunti, the mother of Pandavas sees a dream that instruct her to bring the skin of rhinoceros for the annual Shradh performance of her husband King Pandu .
Kunti orders five Pandavas to bring the skin of rhinoceros. Pnadavas become ready for bringing the skin of rhinoceros.
In the mean time, Draupadi the wife of all Pandvas also become ready with them to help them in case of
hunger, thirst, rough roads etc. However, Pandavas tell her that since, she does not have dress and ornaments as a queen should have she should not company her.
 When Pandvas come to Hariyali tal forest, they sees a Sitarami rhinoceros. The rhinoceros was a female rhinoceros and she tells them that her husband is in Gagal forest. Pandavas goes to Gagal forest and they kill the rhinoceros and bring skin of rhinoceros for the ritual of Shradh of thei father Pandu as instructed by mother Kunti.
  There is contrast in the story that queen Draupadi becomes ready to share the pain of her husbands Pnadvas  and the wife of rhinoceros Sitarami tells the secret of her husband’ whereabouts. Here, in the story, there is no mention that Pandavas threatened  Sitarami .
 The songs have various emotions woven into it. There is curiosity for audience whether Pandavas would be successful or not. The sacrifice of Draupadi and the deceptive nature of female rhinoceros bring different emotions.
  The folk song is proof that folk song creator were master of psychology besides being master of form of poetries.

पंडो नृत्य मा कुंती माता अर गैंडा क कथा

कोंती माता सुपिनो ह्व़े गे , ताछुम ताछुम
पांडु का सराध कु चैन्द गैंडो , ताछुम ताछुम
ओड़ू आवा नेडू आवा मेरा पांच पंडाउ, ताछुम ताछुम
तुम जावा पंडउ गैंडा कि खोज, ताछुम ताछुम
सरध क चैन्द पंडो गैंडा की खाल , ताछुम ताछुम
तब पैट्या , पंडो , गैंडो की खाल ,ताछुम ताछुम
नारी दुरपता तप कना बैन बोदा, ताछुम ताछुम
मी बि मेरा स्वामी स्न्ग्मांग औंदु , ताछुम ताछुम
भूक लागलि मै भोजन ह्व़े जौलू , ताछुम ताछुम
तीस लगली मी पाणि ह्व़े जौलू , ताछुम ताछुम
उकाळ लगली मै लाठी बणी जौलो, ताछुम ताछुम
पसीना होलू मै साफा ह्व़े जौलू , ताछुम ताछुम
सेज की बगत मै नारी ह्व़े जौलू, ताछुम ताछुम
जुद्ध लगलो मै कालिका ह्व़े जौलू ,ताछुम ताछुम
त्वेकू होलू मेरी नारी , भूषण बिस्तर ,ताछुम ताछुम
तू घर रैली बैठीं दुरपता . ताछुम ताछुम
तब घुमदा गें पंडाउ गैंडा की खोज, ताछुम ताछुम
ऐ गेन पंडौ हरियाली की ताल, ताछुम ताछुम
वख देखी तौंन सीतारामी गैंडो, ताछुम ताछुम
मै छऊँ पंडो , जनानी जात ,ताछुम ताछुम
में मारिक काम नि होण क्वी , ताछुम ताछुम
तुम जावा पंडो , गागळी का बौण , ताछुम ताछुम
मेरा स्वामी रैन्दो , वख स्वामिपाल, ताछुम ताछुम
तब गैन पंडो गागळी क बण, ताछुम ताछुम ,
गैंडा का ग्वेर छयो नागार्जुन , ताछुम ताछुम
माल़ू ग्वीराळ म्यारो गैंडा नि खांदो, ताछुम ताछुम
पीली छंचरी मेरो गैंडा को चैन्दो , ताछुम ताछुम
तब मारे पंडो न स्वामीपाल गैंडो , ताछुम ताछुम
तब गडी पंडो न गैंडो की खगोती ,ताछुम ताछुम

Source Dr Goivind Chatak and Dr.Shiva Nand Nautiyal

Garhwali folk Dance Songs, Uttarakhandi Folk Dance- Songs, Himalayan Folk dance-Songs to be continued in next page……

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Satirical Artical

चबोड़ इ चबोड़ मा


              म्यारो नातिक रिटायरमेंट प्लानिंग

 

                 भीष्म कुकरेती
 

        हम सबी ड्रवाइंग कम डाईनिंग रूम, म्यार बेडरूम जादा  मा बैठयाँ छया कि

अपण बेडरूम कम स्टडी रूम कम भौं भौं रूम बिटेन म्यारो दस सालौ नाती खुसी मा

चिल्लान्द चिल्लान्द आई . अर बुलण  बिस्याई , " आइ गौट  इट .आई  फिनिश्ड इट.."

   मीन पूछ , ' छौनु! क्या ह्व़े ? तीन क्वी कठण  सवाल पूरो कौरी दे क्या?"

 छौनु (प्यारो नाम) न झिड़काई,"  कमौन  ग्रैंड पा ! आप बि उनीसवीं  सेंचुरी  मा छंवां क्या ! जब

विद्यार्थी अपण सवाल खुद करदा छया . अब त ड्यारम, पैरेंट्स होम वर्क करदन

ना कि स्टुडेंट्स."

  " ये छौनु !  त फिर, तू  ख़ुशी मा इथगा किलै कुतकुणु छे रे?"मेरी ब्व़े न पूछ

 छौनु न जबाब दे , " ग्रेट ग्रैंड मौम ! आप यीं बात तैं नि बींगी सकदवां. यू कांट जस्ट

अंडरस्टैंड ग्रेट ग्रैंड मौम. इट्स जस्ट फंटास्टिक, इट्स जस्ट ग्रेट ! अहा मजा आई गे    ."

  " ह्यां ! बिजोग पोड़ीन  ये जमानो पर. अरे ! बिंगैल त किलै नि बिंगुल  मि .." मेरी ब्व़े

क बुलण छौ.

मीन बि ब्व़े क बुल्यां पर हाँ हाँ मिलाई,' अरे फैंटास्टिक क्या ह्व़े? ग्रेट क्या ह्व़े ?"

छौनु न  अति उलार/उत्साह मा जबाब दे , " मि सुबेर बिटेन दिमाग खपाणु छौ अर

अब जैक मेरो रिटायरमेंट प्लान पूरो ह्व़े . "

 छौनु क जबाब सुणिक हम सबि अचिते सी गेवां  .

मीन पूछ , " रिटायर्मेंट प्लान?"

 छौनु न जबाब दे , ' एस!  ग्रांड पा ! आई हैव कम्पलीटेड माई  रिटायरमेंट प्लान."

मेरी ब्व़ेन पूछ, " ये क्या बुलणो छे रे ? क्या च रै वै प्लान मा ?"

म्यार दस सालौ नाती न जबाब दे , ' ओह! ग्रेट ग्रैंड मौम ! यू पक्को प्लान च.

रिटायरमेंट क बाद म्यार द्वी घौर याने फ़ार्म हाउस ह्वाल . एक मैदानी गाँव मा .इख सब कुछ ह्वालू

जडडू मा मि मैदानी गौं क फ़ार्म हॉउस मा रौलू. आराम से . म्यार हिसाब से

गोआ क गाँव ठीक रालों . उख ना त जादा गर्मी होंद अर ना ही जादा जडडू.

नेट मा मीन पौड़ बल गोवा  क गाँव बि शहरूं  बराबरी करदन.टु स्पेंड लाइफ इन

 अर्बन विलेज  वाह ! मजा इ कुछ हौर ह्वालू . सुबेर बिजलू उठिक बस ..अपण जिमनास्ट  हॉउस मा कुछ बर्जिस....

  नास्ता मा कोंटीनेंटल नास्ता करलू , फिर मि समोदर मा स्विमिंग को जौंलू . एक ठंडी बियर मारलू .

या कबि कबि गोवा की लोकल फेनी प्योलू .हमेसा इ नौन वेजिटेरियन लंच खौंलू .

फिर फकोरिक से जौंलू .स्याम दें  समोदरौ छाल पर  घुमणो जौलू . घुमणो परांत  क्लब मा जौलू .

उख द्वी चार पैग मारलु अर फिर डयार एका पक्को वेजिटेरियन डिनर ल्योलू, नेट मा

लिख्युं च बल डिनर वेजिटेरियन इ ठीक होंद. फिर फकोरिक से जौलू . मजेदार

गोवा मा जिंदगी ... अर गर्म्युं खुणि कै पहाड़ी गाँव मा फार्म हॉउस ..."

 छौनु कुछ बोल्दु कि मीन पूछी दे, "  ओ ! त अपण गां जसपुर मा फार्म हॉउस बणेल  हैं? वेरी गुड

छौनु , जु काम मीन नि कौर साक ओ म्यार नाती पुरो कारल . इट्स वेरी गुड़ एंड नोबल  आइडिया

तो हैव रिटायर्मेंट हॉउस इन नेटिव विलेज . वाह! .."

झट से बिच इ मा मेरी ब्व़े न बोली, " नागर्जा सुफल ह्वेन. भुम्या सुफल ह्वेन. पितर कुड़ी

सैकीं (संभाली हुयी) राली. त्यरा ददा अर बुबा न त पितर कुड़ी बचाणो  कुछ नि कार पण त्वी ल़े सै ..! "

  छौनु  न चिरडेक  ब्वाल, " ग्रैंड पा ! आप बि ना ! चलो बूड दादी की बात तो ठीक है, जसपुर,ढान्गु  या

अपण पितर कुड़ी की बात करना . पण आप बी नही सुधरे . पैंतालीस  साल ह्व़े गेन आप तैं मुंबई मा 

पण अबि बी जसपुर, ढान्गु , गाँव, पितर कुड़ी, कंडाळी , फाणु -बाड़ी से बाहर नही आये. ..

आपने मेरा अच्छा खासा मूड खराब कर दिया . कथगा बढ़िया रिटायरमेंट प्लान बणे छौ ..सब ..बस ."

 छौनु  कि ददि याने  मेरी घरवाळी न मेखुणि  आँख घुरैक डांट , " तुमर ! सद्यनी यी हाल रैन. पैल बच्चों

कि बात पूरी नि सुणदा छया  अर बिच इ मा जसपुर, ढान्गू .गाँ मा  पितर कूड़ी,  की बात कनि  बी

लै आन्द छया. अर अब नाती तैं बी जसपुर, ढान्गु, गाँव क बातुं से बोर करणा रौंदा  .. हाँ बोल म्यरो छौनु .

तेरो समर  हॉउस कख होलू ?"छौनु न बोली, " थैंक यू ग्रांड मौम ! यू ऑलवेज इनकरेज मी ..अदरवाइज .

.हाँ त ! मेरो रिटायर्मेंट कु दुसरो फ़ार्म हॉउस कै पहाड़ी गाँव मा होलू. वै फ़ार्म हॉउस मा सौब फैसीलिटि

होली . अब जन की जिम कु  इंतजाम, मेडीटेसन रूम ,ड्रिंक  बार , स्विमिंग पूल सबी कुछ ह्वालू.

पूरो समर का वास्ता व्हिस्की, वाइन, जिन ,  बियर को पुरो इंतजाम रालों. पण ग्रैंड मौम ..एक बात च मुंबई ..!"

 " क्या मुंबई मा क्या ?' मेरी ब्व़े न पूछ

छौनु न बोली, " मी कबि कबि मुंबई बि आणु रौलू . बरसात क बान , मुंबई मा बि एक बड़ो फ़्लैट रालो."

मीन पूछ, " ये छौनु ! अरे रिटायरमेंट  प्लान छोड़ अर अपण पड़णो अर अग्वाड़ी नौकरी , ब्यवसाय की सोच .

पैल वांक प्लान बणादी. "

छौनु कु जबाब थौ, " ओ ! डियर ग्रैंड पा ! मेरी पढ़ाई अर नौकरी की प्लानिंग त पैरेंट्स कारल.

मी त अपणो  असली भविष्य की प्लानिंग करल़ू . ओल्ड एज इज रियल  एज टु  फौलो ." 

मेरी ब्व़े की अबि बि ल्हाल्सा बचीं छे , त ब्व़े न पूछ ," ह्यां ! यि, पहाड़ी गां कख स्वाच तीन ?"

छौनु क जबाब छौ, " अं.अं.अं मेरी समज से मसूरी तौळ  इ कें जगा मा फ़ार्म हॉउस ठीक रालो.

मीन नेट मा पौड़  बल द प्लेस बेलो मसूरी इज  अर्बन एंड रुरल एज  वेल ."

मीन बोल," मतबल जसपुर का फिर बि भाग  नि खुलल. हैं ?"

यां मा मेरी घरवाळी  पर डौंड्या नरसिंग चौढी गे. वींन डांटि क ब्वाल," तुम तैं कथगा दें

 समजाण बल बच्चों न   त   तुमारि जसपुर, घर कूड़ी क बात सुणी याल, सुणी याल . पण अब

नात्युं तैं त चैन से रौणी द्याओ " 

मेरी ब्व़े न पूछ , " ए छौनु ! त रुड़ी, बरखा ,  ह्यूंद , मा तू अपण ब्व़े बुबा तैं बि अटकाणु रैली हैं ?'

छौनु  क जबाब छौ, " व्ह्ट परेंट्स!  नो वे. मी कैक पैरेंट्स उरेंट्स क दगड  रौण वाळ नि छौं. आई  श्यल

लिव माई ओन लाइफ. नो डिस्टरबेन्स  फ्रॉम पैरेंट्स ऐट ऑल."   
 
अबे दै मेरी घरवाळी पर रैणी पोड़ अर वींन पूछ , " मतलब तू अपण ब्व़े बुबा क दगड नि रैली क्या ?'

छौनु क जबाब छौ, " ओ ग्रैंड मोंम ! ग्रेट ग्रैंड पा अर ग्रैंड पा न त अपण रिटायरमेंट प्लान नि

बणायि त हम सब्युं तैं दगड मा रौण पड़णु च. बट आई एम् स्योर कि  ममी  अर पापा  न

अपणो  रिटायर्मेंट प्लान बणे याल होलू. वो अपणी जिन्दगी जियेंगे मै अपनी जिंदगी का

लुत्फ़ उठाउंगा."

मेरी घर्वाळी न पूछ, "  अर  नौनि-नौन्यळ ?"

छौनु क जबाब छौ , " व्हट ! नौनी -नौन्याळ. दसवीं के बाद मै उनको बैक से एज्युकेसन लोन

दिलाई द्योलू . नौनी या नौनु नौकरी मिलदी  लोन भरणा राल. हम द्वी झण त जिंदगी का मजा ल्योला !"

  मेरी ब्वें से नि रये ग्याई, " ह्यां ! ए छौनु ! यीं उमर मा तीन इथगा कखन सीख ?"

छौनु न घमंड मा ब्वाल, ' ग्रैंड मौम ! मीन य़ी सौब इंटरनेट से सीख.'

मेरी ब्वें न ब्वाल," काण्ड लगल ईं सीख परे , बुरळ पोड़ल इन सीख पर  जै  सीख मा  दूसरों जुमेवारी क

बात त भौत होंदी च पण अपण जुमेदारी क क्वी बात इ नि होंदी. कुजाण भै कुजाण  "



Satire, Satirical articles  to be continued......

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Bhishma Kukreti

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                     गढवाळी क उर्जावान अर युवा  कवि  गीतेश नेगी दगड भीष्म कुकरेतीs  छ्वीं

 

भीष्म कुकरेती कु सवाल : आप कविता क्षेत्र मा किलै ऐन  ?

 


 म्यार  ख्याल  से  कबिता  विचारौं  और भाव्नौं कु उम्माल च ,गद्न च  जैकू  मूल स्रोत मिखुंण पहाड़ च ,हमर समाज च और हर वा घटना च जू  मनख्यात से जुड़ीं च | कवि बणणा  की  या साहित्य जगत मा आणा की कभी नी सोची , यीं पुंगडि मा आणु संजोग और म्यारू अहोभाग्य ही समझा ,आज कविता मेरु पहलु प्रेम  "पहाड़ " से , पहाड़ का लोगौं से संबाद कु एक सशक्त   माध्यम चा ,
अब कबिता लिख्याँ बिना मज्जा नी आन्दु ,अब त यु मी मा एक ऐब सी व्हे  ग्या

 

 

 

भीष्म कुकरेती कु  सवाल: आपकी कविता पर कौं कौं कवियुं प्रभाव च ?

 

कबियुं कु त नी बोल सकदु पर हाँ मेरी कबितौं मा  पहाड़ और पहाड़ी जीवन से जुडी हर समस्या ,हर सुख दुःख कु असर दिख्येन्द  आप बोल सक्दो की प्रकृति और समाज , गोर - गुठियार ,हैल निसुडा ,समस्यौं से संघर्ष  करदा मनखी  ,पलायन ,भ्रस्टाचार ,राजनैतिक  अपंगता ,त कखिम संस्कृति  और  भाषा से प्रेम और कक्खी मुख लुक्कै और नारी की पीड़ा यी ही मेरी कबिता और गीतों का   का मूल छी ,मूल किरदार छीं   और सबसे  ज्यादा  प्रभाव युन्कू ही  च मेरी कबितौं मा ,हां म्यार स्वर्गीय दाजी श्री भूपाल  सिंह नेगी जी (ग्राम महर गावं मल्ला ,पट्टी कोलागाड )   जरूर म्यार एक बहुत बड़ा प्रेरणा स्रोत छीं म्यार लेखन मा , और जत्गा बगत भी प्रवास  मा आण से पहली और वेक बाद  मी उन दगड रहौं छुटम,वू बगत  सयेद मेरी आज तकक की सबसे बड़ी सम्लौंण च मी खूण |

 

 नरेंदर सिंह नेगी जी और  चन्द्र सिंह राही जी और " गिर्दा " का गीत मिथय  ऊर्जा दिन्दीन ,गढ़वाली साहित्य  मा ढंडरियाल जी , भजनसिंह सिंह जी ,चातक जी और अबोध बंधू बहुगुणा जी  का  भागीरथ कार्यौं से प्रभावित छोवं | प्रीतम भेज्जी  का जागर गीत मिथय भोत पसंद अन्दीन ,यूँ सब्युन का बिना म्यार दिंन पुरु नी हुंदू


 


 

भी.कु क सवाल : आपका लेखन मा  भौतिक वातावरण याने लिखनो टेबल, खुर्सी, पेन, इकुलास, आदि को कथगा  महत्व च ?

 

ज्यादातर भंयाँ   कागज़ और पेन से ही लिख्दु ,कुछ रचना बस मा और ट्रेन या हवाई यात्रा का लम्बा सफ़र मा भी 
  लिखीं  कबिता त़ा भाव विचार और भावनौं कु समोदर  च वेल  त हर  हाल मा खतेणू  च ,पर हां इकुलास  भाव विचार और भावनौं की अभिव्यक्ति खूण और अपडा कबिता का किरदारौं दगडी संबाद का वास्ता जरूरी च , यु दुनिया  खूण  इकुलास व्हेय सकद पर असल मा एक कवि और साहित्याकर खूण त़ यु संगम और सहवास और असल  साधना  कु बगत हुन्द


 

 

भी.कु क सवाल: आप पेन से लिख्दान या पेन्सिल से या कम्पुटर मा ? कन टाइप का कागज़ आप तैं सूट करदन मतबल कनु  कागज आप तैं कविता लिखण मा माफिक आन्दन?

 

पहली दा पेन से ही लिख्दु ,फिर कबिता पूरी हूँण फरजब भी बगत मिलद ,  कम्पुटर से ब्लॉग मा  शेयर कैर दिंदु

 

 

 

 भी.कु क सवाल: जब आप अपण डेस्क या टेबले से दूर रौंदा अर क्वी विषय दिमाग मा ऐ जाओ त क्या आप क्वी नॉट बुक दगड मा रखदां   ?

 

 म्यार झोंल़ा मा  पेन कागज़ सदनी रैन्द ,अगर बगत नी मिलदु ता मी एक द्वी पंगत/ लेंन और मूल भाव लेखी की धैर दिंदु ,फिर बगत  मिलण  फर देख्दु ,पर इन्न बगत कम  ही आन्द किल्लैकी  वैसे पैल्ली तबरी  नै विषय और नै किरदार दिमाग मा घपरोल शुरु कै दिंदिं



भी.कु क सवाल: माना की कैबरी आप का दिमाग मा क्वी खास विचार ऐ जाव  अर वै बगत आप उन विचारूं तैं लेखी नि सकद्वां त आप पर क्या बितदी ? अर फिर  क्या करदा   ?

 

कैबरी जु एक अच्छु विषय बिसरी  जान्द मगर अगर याद राई त़ा बाद म तुरंत  दुबर कबिता तयार  व्हेय जान्द पर सदनी इन्न नी हन्दू

  कत्गे  बार  नी भी हुन्दी या फिर हुन्दी भी च त़ा ढंग बिचोल सी व्हेय जान्द किल्लेकी वेमा पहली सुवा जंण प्रेम रस नी आन्दु ,कबहि कबहि  वू  दुसर ब्या जंण  सी  व्हेय जान्द  इल्लैय   मी दुबर कम ही  लेख्दु 




 


सवाल: आप अपण कविता तैं कथगा दें रिवाइज  करदां ?

 

मी कबिता थैं  लेख्यंण   का बाद  द्वी - तीन बार रिवाइज करदू ,शब्दौं  फर मी ध्यान दीणा की पूरी कोशिश करदू ,कुई शब्द  अगर ठीक  नी लगदु त़ा मी कबि कबि   अपड़ी ददी  या ब्वे  से फ़ोन मा चर्चा करदू , फिर वेक सुधार और अवलोकन का वास्ता मी ब्लॉग या इन्टरनेट मा गढ़- कुमौनी साहित्य प्रेमी लोगौं  दगड शेयर कैर दिन्दू , रिवीज करणु गढ़वाली शब्दावली ,छंद ,अलंकार और रस मा गुणवत्ता और ज्ञान का वास्ता भोत जरूरी चा 


 


 

सवाल: क्या कबि आपन कविता वर्कशॉप  क बारा मा बि स्वाच? नई छिंवाळ तैं गढवाळी कविता गढ़णो  को प्रासिक्ष्ण  बारा मा क्या हूण चएंद /

आपन कविता गढ़णो बान क्वी औपचारिक (formal ) प्रशिक्षण ल़े च ?

 

कबिता  वर्कशाप की  त नी सोची पर हाँ मंन  मा  एक इच्छा च की कबि  बगत गाडीक   की गढ़ कुमौनी कबियुं की रचना और उन्का   बारामा मा नए नवांण तै  जानकारी मिलींण / उपलब्ध कैरे  जाण चैन्द  , ये  काम मा गढ़ -कुमौनी सामजिक संगठन  अच्छी भूमिका निभा सक्दिन और सैद निभाणा  भी होला  कक्खी |

रै बात प्रशिक्षण  की त म्यार ख्याल से कवि हुण खूण या कविता गढ़ना खूण बस भाव -रस ,छंद ,अलंकार और शब्दावली  कु ज्ञान हूँण  चैन्द ,ये खूण कै औपचारिक  प्रशिक्षण  की विशेष आवश्यकता नी च पर अगर मिलदी च त  लींण मा कुई बुरैयी भी नी  च ,
साहित्य मा नै नै  प्रयोग करणा भी जरूरी छिन्न , नै नै बिम्ब ,नै नै विषय और नै नै भाव और उनकी अभिव्यक्ति की  नै नै तरकीब रचना थेय सार्थक करदीं
गढ़वाली कबिता और साहित्य मा पाठक की रूचि और नै ज़माना की बेकग्रौंड कु भी ख्याल रखंण प्व़ाड़ल़ू  ,२१ वी सदी मा  ६ वी सदी        की बेक ग्रौंड का ऐतिहासिक नाटक ही लिखें जा सक्दीन कविता ना  |
गढ़वाली भाषा  और साहित्या मा रचना करण से ज्यादा जरूरी मी भाषा थेय बोलंण   बच्यांण  मा ल्याणा   कु  पक्षधर छोवं ,गढ़वाली मा लेखिक क्या फैयदा  जब हम गढ़वाली मा बच्याणा नी छोव् 

 

 

 

सवाल: हिंदी साहित्यिक आलोचना से आप की कवितौं या कवित्व  पर क्या प्रभौ च . क्वी उदहारण  ?

गी.ने.  साहित्यिक आलोचना साहित्या का पतल मा ठुंगार जन हुन्द ,आलोचना से रचना की गुणवत्ता की परख त़ा हुन्दी च

        अगर वे थेय सकारात्मक ढंग से लिये जाव त़ा साहित्य कु सतत विकास  भी  हुन्द ,याँ से साहित्य मा भल्ली बान  आन्द

         साहित्या की आलोचना से ही आलोचक की अक्षमता कु ज्ञान हुन्द  दगडा दगड़ लेखण वलल  काव्यांगो कु

        कक्ख  और कन्नू कन्नू प्रयोग कार , वांकु बच्नैरू  का दिमाग फर क्या असर प्वाड यु पता  चलद , आलोचना करणु

        हर कैक्का  बसकी बात नी च यु अनुभव से आन्द ,म्यार ख्याल से नै नवांण  थेय अच्छी और निष्पक्ष साहित्यिक आलोचना

        जरूर देखण चैन्द याँ से  ऊंका  बिम्ब मजबूत व्हाला  और साहित्या थैं  धार मिला ली ,इन्न समझा  की  आलोचना   

         मी  खूण अपड़ी कलम प्ल्याणा की चीज च 


 


 

 

सवाल : आप का कवित्व जीवन मा रचनात्मक सुखो बि आई होलो त वै रचनात्मक सुखा तैं ख़तम करणों आपन क्या कौर ?




 गी.ने: जवाबदारी अर  व्यस्तता का कारण   विश्वविदालय कु  एम  .टेक  कु अंतिम वर्ष म्यार रचना क्रम मा  सुखो जन  रै पर फिर मुंबई मा तीन बर्ष और सिंगापूर प्रवास का ग्याँ साल  मा मिल खूब  ल्याख ,सिंगापूर मा जैकी अच्छु बगत मिल त मिल गढ़वली साहित्य अध्ययन  और लेखन मा वांकु पुरु फैदा  उठाई और   "घुर घुगुती घुर " काव्य संग्रह पुरु कैर दये , ये बीच मा मिल गढ़वली गीत संग्रह  और कथा संग्रह भी शुरु कार जेमा  अज्जी भी  रचनाक्रम जारी च


 

 

सवाल: कविता घड़याण मा,  गंठयाण मा , रिवाइज करण मा इकुलास की जरुरत आप तैं कथगा  हूंद ?


 गी.ने: गुरु जी बगत चैन्द बस बगत ,भूभौतिक अन्वेषण क्षेत्र मा हूँण से और वेक बाद थोडा बहुत सामाजिक जुड़ाव और फिर अध्ययन का बीच मा कबही कबही कबिता खूण टेम बचाणु मुश्किल व्हेय जान्द ,किटाश सी व्हेय जान्द कबिता खूण कबही कबही     





 

सवाल : इकुलास मा जाण या इकुलासी मनोगति से आपक पारिवारिक जीवन या सामाजिक जीवन पर क्या फ़रक पोडद ?

इकुलासी मनोगति से आपक काम  (कार्यालय ) पर कथगा फ़रक पोडद

 

  गी.ने: कबिता से सामाजिक जीवन फर नकारात्मक असर त नी हुन्द बल्कि समाज से आप अच्छा तरीका से जुड़याँ रन्दो , पारिवारिक

 गी.ने: जीवन मा भी सब कबिता से सब खुश ही लग्दीन ,कैल घार मा  कबही मी फर लेख्यंण पढ़ण मा ,या म्यार शौक -सुभाव मा मी फर  रोक  टोक नी कै ,सच बोलंण  त मिल कबही घार वलू थेय शियायत कु मौका ही नी देय ये   मामला मा ,


कबिता वाली बात  घार मा पता भी देर से ही चाल वू भी हिंदी कबिता फर राज्यपाल से इनाम मिलण फर ,वेक बाद मी हॉस्टल मा चली गयुं

 अब त  ब्वे और ददी फ़ोन फर भी गढ़वली कबिता  और गीत का बार  मा पूछणा रैंदी और अच्छी रचना फर खुश  भी हुन्दी ,

घार जन्दू त़ा एक घडी दद्दी और मा  दगड एक  अच्छी कछ्डी लगद और मी अपड़ी कबितौं और गीतौं की सार्या सालिक  फंची उन्मा लगा दिन्दू ,या मा मीथय  भी अच्छी अनुभूति हुन्द  और उन्थेय भी , मी सदनी  कोशिश करदू की म्यार शौक और मेरी जवाबदारी  (जॉब ,पारिवारिक ,सामाजिक ) मा मी एक संतुलन लेकी चलूँ  याँ से सब निभ जान्द ,कुछ खास परेशानी नी हुन्दी ,मी जबरदस्ती नी लेख सकदु और अपनाप थेय लेखन  से जबरदस्ती रोक भी नी सकदु

 

 

 

सवाल:  कबि इन हूंद आप एक कविता क बान  क्वी पंगती लिख्दां पं फिर वो पंगती वीं कविता मा प्रयोग नि

करदा त फिर वूं  पंगत्यूं क्या कर्द्वां ?

 


 गी.ने: हाँ वू पंगती बस लिखीं रै जन्दी झोला मा ,कबही कबही प्रयोग मा ऐय भी जान्द पर इन् कम ही हुन्द


 


 

सवाल : जब कबि आप सीण इ वाळ हवेल्या या   सियाँ रैल्या अर चट चटाक से क्वी कविता लैन/विषय आदि  मन मा ऐ जाओ त क्या करदवां ?


 


उठिक चट चटाक से लेकिख आराम से पोड जन्दू  ,फिर हैंक दिंन जांच परिखिक पोस्ट कैर दिन्दू


 

 


सवाल: आप को को शब्दकोश अपण दगड  रख्दां  ?



 


 गी.ने: अंग्रेजी -हिंदी का  का द्वी शब्दकोष ,संस्कृत- हिंदी -अंग्रेजी ,फ्रेंच भाषा कु एक शब्दकोष ,एक गढ़वली शब्दकोष       

 

 


 


सवाल: हिंदी आलोचना तैं क्या बराबर बांचणा रौंदवां ?



 


थोडा थोडा बगत मिलण फर


 

सवाल : गढवाळी समालोचना से बि आपको कवित्व पर फ़रक पोडद ?


 


उत्गा ही जत्गा आलोचना से ,  दुया जरूरी छीं ,दुयुं से लेख्यंण मा खुराक मिलद पर इन्न भी नी च की आलोचना और समालोचना नी होली  त़ा लेख्यंण वला ल कलम छोड़ दिंण ,वू आलोचक  और समालोचक  कु काम च ,लेख्यंण  वाला कु काम नी च , म्यार लेखन दुयुं से मजबूत  हुन्द


 


 

सवाल: भारत मा गैर हिंदी भाषाओं आजौ / वर्तमान काव्य की जानकारी बान आप क्या करदवां  ? या, आप यां से निस्फिकर  रौंदवां



 


  गी.ने: निस्फिकर  त नी रैंदु ,उर्दू ,भोजपुरी ,बंगला और संस्कृत (अनुवाद ) देखुणु   रैंदु


 


सवाल : अंग्रेजी मा वर्तमान काव्य की जानकारी बान क्या करदवां आप?



 


 गी.ने: मी अंग्रेजी मा  कुछ एक  नै  ज़माना का कब्युं थेय छोड़िक ज्यादातर पुरणा कवियुं थेय पढ़दु

           मिल्टन ,विलियम वोर्ड्स वोर्थ ,रुडयार्ड ,शैल्ली आदि की रचना मिथय स्कूल का दिनों से ही पसंद  रैं 


 


 

सवाल: भैर देसूं गैर अंगरेजी क वर्तमान साहित्य की जानकारी क बान क्या करदवां ?



 


  गी.ने: कुछ ख़ास ऩा ,वामा अनुदित संग्रह तक ही सिमित छोवं बस ,वू  भी भोत कम

 


सवाल: आपन बचपन मा को को वाद्य यंत्र बजैन   ?



 


 गी.ने:  बांसोल ,पिपरी (पत्ता वल्ली ) , ढोलकी ,बाद बाद मा जागर गीतौं मा रूचि का कारण से थोडा थोडा ढोल ढ्मो ,डोरं थकुलू या हुड़का

           सिखणा  की बम्बे मा कत्गे बार  भारी इच्छा व्हाई पर वक्ख बगत और अनुभवी गुरु  दुया नी मिला

 





सवाल: आप संस्कृत , हिंदी, अंग्रेजी, भारतीय भाषाओँ क, होरी भासों  क कौं कौं कवितौं क अनुवाद गढवाळी मा करण चैल्या ?


 


 गी.ने: अनुवाद  का बार मा अबही नी स्वाचु ,पर हां बगत आण फर देखलू  जरूर  ,बीच मा मी संस्कृत का कुछ  नाटक  और काव्य संग्रह मा दिलचस्पी लींण बैठी गयुं फिर  शब्दकोष और व्याकरण मा ज्ञान  वर्धन मा ही लग्युं रै गयुं ,पर अनुवाद हूँण  चैन्द


  प्रतिक्रिया :  अपड़ी भाषा - अपड़ी संस्कृति कु  सम्मान और संवर्धन भोत जरूरी च , दुसरी भाषा हम्थेय भैरा   की दुन्या  से जोड़दिं  मगर हमरी गढ़वली      कुमौनी भाषा हम थेय हमारा अपडा पहाड़  से अपड़ी  जैड    से जोड़दिं इल्लैकी जत्गा व्हेय सक्क गढ़ -कुमौनी  मा बच्याव ,भाषा  कु संकट अफ्फी ख़तम व्हेय  जालू  ,

बाकी गुरु जी आपक दगडी छुईं  बता  लगाकी त मिथय सदनी परम आनदं की अनुभूति हुन्द ,मेरी गढ़वली बोल्णा की भूख -तिस त़ा आप जना जंण गुरु और
गढ़वली का प्रेमी मन्खियुं का दर्शन कैरिक ही बुझद ,आपल मिथय मेरी छवीं बत्तौं की गेढ -फंची खोलणा  कु अवसर देय वाखुंण आपक आभार ,परमात्मा आप्थेय
सदनी राजी ख़ुशी  रख्यां  और नै नवांण थेय आपकू मार्गदर्शी स्नेह आशीष इनन्ही   मिलदा रयां ,आशा करदू की जल्द आपक दर्शन व्होला ,आप्थेय नै बरस   की
शुभकामना

  अपडा एक गीत की यूँ पंगतियुं का दगड  अब आपसे आज्ञा ल्युन्लू और अपड़ी विचार बाणी थेय अब विराम दियुन्लू




यूँ  रौंस्ल्युं का बीच मी ,करुलू तेरु सिंगार माँ

तू आश ना छोड़ी मेरी ,राक्खी कैरी  जग्वाल  माँ

जू भूली गयें त्वे थेय हे  ब्वे ,ल्यौन्लू उं बोट्टी अंग्वाल  माँ 

तू आश ना छोड़ी मेरी ,राक्खी कैरी  जग्वाल  माँ

 


हे डालियूँ-बोटियूँ ,हे फूल -पातियौं ,राख्यां तुम भी ख्याल हाँ

हे गाड-गदिनियौं ,धार पन्देरौं,सों सजाकी रख्यां मेरी रोलयुं हाँ

यूँ  रौंस्ल्युं का बीच मी ,करुलू तेरु सिंगार माँ

तू आश ना छोड़ी मेरी ,राक्खी कैरी  जग्वाल  माँ ..............

 

 

 
आपकू स्नेही
 
     गीतेश  सिंह  नेगी
     भूभौतिकविद
Seabird Exploration (Norway )
    M/V Hugin Explorer
 
    Current Location :Mumbai High

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