Author Topic: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख  (Read 21074 times)

Mani Ram Sharma

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CRUCIAL PROVISIONS MISSING FROM INDIAN RTI ACT
« Reply #60 on: August 23, 2013, 10:16:28 AM »
Please see the attchment

Mani Ram Sharma

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बंदर कहना महँगा पड़ा ...
« Reply #61 on: August 28, 2013, 05:12:39 PM »
[justify]ओंटारियो की एक कृषि फर्म को अपने एक कर्मचारी को बंदर कहना महँगा पडा जबकि वहां के मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने चर्चित प्रकरण एड्रिअन मोंरोसे बनाम डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड (2013 एच आर टी ओ 1273)  में दोषी पर भारी जुर्माना लगाया| किंग्सविले की एक टमाटर उत्पादक कंपनी डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड  को मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो (कनाडा)  ने शिकायतकर्ता एड्रिअन मोंरोसे को बकाया वेतन और गरिमा हनन के लिए कुल 23,500 पौंड क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिया है| 
तथ्य इस प्रकार हैं कि शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी संस्थान में प्रवासी मौसमी कृषि मजदूर के रूप में दिनांक 9.1.09 से कार्य प्रारंभ किया था| शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संस्थान के एक कर्मचारी करिरो ने चिल्लाते हुए मुझे कहा कि तुम पेड़ शाखा पर बंदर जैसे लगते हो और वह चला गया| मौसमी मजदूरों के करार के अनुसार उनके वेतन का पच्चीस प्रतिशत वेतन उन्हें बाद में भेजे जाने के लिए काटा जाता है किन्तु उसे समय पर भुगतान नहीं किया गया| आवेदक –शिकायतकर्ता-एड्रिअन मोंरोसे के अनुसार उसने यह मामला प्रतिवादी के समक्ष माह जनवरी व फरवरी 2009 में उठाया था| किन्तु उसकी  शिकायत के फलस्वरूप बदले की भावना से उसे नौकरी से ही निकाल दिया जिससे वह 5500 पौंड मजदूरी से वंचित हो गया| मामला जब ट्रिब्यूनल के सामने निर्णय हेतु आया तो ट्रिब्यूनल का यह विचार रहा कि क्षतिपूर्ति के उचित मूल्याङ्कन के लिए बदले की भावना से प्रेरित कार्यवाही से उसकी गरिमा, भावना और स्व-सम्मान को पहुंची ठेस के लिए प्रार्थी क्षतिपूर्ति का पात्र है| प्रार्थी  ने अपने देश वापिस भेज दिए जाने सहित मजदूरी के नुक्सान आदि इन सबके लिए कुल 30000 पौंड के हर्जाने की मांग की है| ओंटारियो मानवाधिकार संहिता की धारा 46.3 के अनुसार किसी संगठन के कर्मचारियों, अधिकारियों या एजेंटों द्वारा भेदभाव पूर्ण आचरण करने पर संस्था का प्रतिनिधित्मक दायित्व है, तदनुसार करेरो और मस्टरोनारडी के कृत्यों के लिए डबल डायमंड एकड़ लिमिटेड जिम्मेदार है|  ट्रिब्यूनल ने आवेदक को 15000 पौंड का हर्जाना बदले के भावना से हुए मानवाधिकार हनन के लिए स्वीकृत किया और मजदूरी के नुक्सान की भरपाई के लिए 5000 पौंड मय ब्याज के देने के आदेश दिए|
आवेदक ने यह भी मांग की कि प्रत्यर्थी अपने यहाँ मानवाधिकार नीति को लागू करने के लिए ओंटारियो मानवाधिकार आयोग से अनुमोदन करवाकर एक निश्चित प्रक्रिया लागू करे| इस पर ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया कि प्रत्यर्थी 120 दिन के भीतर मानवाधिकार कानून विशेषज्ञ की सहायता से एक व्यापक मानवाधिकार और भेदभाव विरोधी नीति विकसित करे व प्रत्यर्थी के सभी अधिकारी–कर्मचारी, जिन पर किसी भी प्रकार के पर्यवेक्षण का दयित्व हो वे, 101 मानवाधिकारों के विषय में 120  दिन के भीतर ऑनलाइन प्रशिक्षण प्राप्त करें |
वहीं भारतीय परिपेक्ष्य में मानवाधिकारों पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत दुखद कहानी कहती है| ओड़िसा में जुलाई 2008 में संजय दास को पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की निस्संकोच अवहेलना करते हुए गिरफ्तार कर लिया था अत: पुलिस की इस अनुचित कार्यवाही से व्यथित होकर पीड़ित ने वर्ष 2009 में उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल की| खेद का विषय है कि इस याचिका पर उच्च न्यायालय ने 4 वर्ष बाद अब वर्ष  2013 में सरकार से जवाबी हलफनामा दायर करने को कहा है|  प्रकरण में जवाब देते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक ने कहा है कि अब दोषी की पहचान करना कठिन है| वास्तव में देखा जाए तो भारत भूमि के अधिकाँश लोगों, चाहे वे कोई भी पद धारण करते हों, के चिंतन से लोकतंत्र का मूल दर्शन ही गायब है| विधायिकाएं आधे-अधूरे और जनविरोधी कानून बनाती हैं, न्यायपालिका उन्हें लागू करते हुए और भोंथरा बना देती परिणामत: पुलिस का मनोबल और दुस्साहस-दोनों इस वातावरण में मुक्त रूप से पनपते  रहते  है|   पुलिस द्वारा न केवल आम नागरिक के साथ अभद्र व्यवहार करने और सरे आम गाली गलोज करने के  मामले मानवाधिकार तंत्र के सक्रिय या निष्क्रिय सहयोग और सानिद्य में जारी हैं बल्कि हिंसा तक  बेहिचक की जाती है| देश की सवा अरब की आबादी  में ढूंढने से भी उदाहरण मिलना मुश्किल है जहां बीस लाख में से एक भी पुलिस वाले को अपशब्दों के लिए या मानव गरिमा हनन के लिए दण्डित किया गया हो|

एक बार जब भारत ने मानवाधिकार संधि का अनुमोदन कर दिया तो उसके बाद सम्पूर्ण देश में मानवाधिकार की रक्षा करना, प्रोन्नति करना और उसका उल्लंघन रोकना सरकार का दायित्व हो जाता है – ऐसा उल्लंघन चाहे किसी सरकारी सेवक द्वारा किया जा रहा हो या किसी नीजि व्यक्ति द्वारा| सरकार मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई भेदभाव नहीं बरत सकती किन्तु भारत के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मात्र लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में ही आयोग द्वारा जांच का प्रावधान रखा गया है और इस प्रकार नीजि व्यक्तियों को मानवाधिकार उल्लंघन की खुली छूट दे दी गयी है कि उनके विरुद्ध शिकायतों पर आयोग कोई कार्यवाही नहीं करेगा| वहीं ओंटारियो राज्य ने अपने लिए एक विस्तृत और व्यापक मानवाधिकार संहिता बना रखी है| संहिता की धारा 29 में मानवाधिकार संरक्षण और प्रोन्नति के व्यापक प्रावधान है और यह कहा गया है कि आयोग का कार्य मानवाधिकारों (न केवल रक्षा करना बल्कि) के सम्मान को आगे बढ़ाना और प्रोन्नत करना आयोग का कार्य है तथा इसमें नीजि या सरकारी उल्लंघन के मध्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है| मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ओंटारियो न केवल अपने मुख्यालय पर बल्कि कैम्प लगाकर घटना स्थल के नजदीक सुनवाई का अवसर देता है ताकि पीड़ित पक्ष अपना दावा आसानी से प्रभावी ढंग प्रस्तुत कर सके| उक्त मामले से यह भी स्पष्ट है कि वर्ष 2009  के मामले में ओंटारियो के ट्रिब्यूनल ने अपना निर्णय सुना दिया है जबकि समान अवधि के मामले में ओड़िसा उच्च न्यायालय ने अभी सरकार से जवाब ही मांगा है, निर्णय  में लगने वाले समय और मिलने वाली राहत के विषय में कोई सुन्दर पूर्वानुमान  नहीं लगाया  जा सकता| उल्लेखनीय है कि भारत जब मानवप्राणी  के रूप में प्राप्त अधिकारों के विषय में कनाडा से इतना पीछे है तो नागरिक के तौर पर उपलब्ध मूल अधिकारों के विषय में अभी चर्चा करना ही अपरिपक्व होगा, चाहे कागजी तौर पर वे संविधान में सम्मिलित हों| यह भी ध्यान देने योग्य है कि कनाडा, ब्रिटिश संसद के नियंत्रण से वर्ष 1982 में ही अर्थात भारत से 35 वर्ष बाद पूरी तरह से मुक्त हुआ है| अब देश की जनता कर्णधारों से जवाब मांगती है कि इस अवधि में इन्होंने आम भारतीय के लिए अब तक क्या किया और भविष्य में जो करने जा रहे हैं उसकी रूप रेखा क्या है|   [/justify]

Mani Ram Sharma

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श्री मनमोहन सिंह जी,
प्रधान मंत्री,
भारत सरकार,
नई दिल्ली
 
मान्यवर, 
नीतिगत मामले : अधिकारों का प्रत्यायोजन एवं जन शिकायतों का निवारण

मैं आपको यह स्मरण करवाने की आवश्यकता नहीं समझता कि आपकी लोकप्रिय सरकार ने “शिकायत निवारण तंत्र लोक शिकायत निवारण 2010 हेतु दिशा-निर्देश” जारी किये हैं और इसकी अनुपालना में शिकायत निवारण अधिकारी भी नियुक्त कर रखें हैं जो प्रशासनिक शिकायतों का निवारण करने के लिए अधिकृत हैं| किन्तु “नीतिगत मामलों” की शिकायतें इसकी परिधि में नहीं आती हैं क्योंकि राष्ट्र द्वारा अपनाई गयी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में नीतिगत मामले मात्र जनप्रतिनिधियों के ही दायरे में आते हैं|अत: नीतिगत मामलों की शिकायतें इस पोर्टल पर “दायरे से बाहर” बताते हुए निरस्त कर दी जाती हैं| दूसरी ओर नीतिगत मामलों के सामान्य जन प्रतिवेदनों को जन प्रतिनिधियों के ध्यान में लाये बिना ही सचिवालय स्तर पर निरस्त कर लोकतंत्र को विफल किया जा रहा है|यह स्थिति अत्यंत दुखदायी है जहां सरकार द्वारा दोहरे मानदंड अपनाए जा रहे हैं|इस प्रकार नीतिगत मामलों में जनता को अपनी व्यथा जन प्रतिनिधियों तक पहुँचाने का कोई विकल्प ही उपलब्ध नहीं है और कहने को देश में लोकतंत्र है किन्तु इसमें आम नागरिक की कोई सक्रीय भागीदारी नहीं रह गयी है|

     
लोकतंत्र में सरकारी अधिकारी अपने विभाग प्रमुख के प्रति जवाबदेह हैं और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं| किसी भी नीतिगत मामले में हस्तक्षेप करने, संशोधन करने या स्वीकार करने का अधिकार मात्र जनप्रतिनिधियों को ही है| निश्चित रूप से जब किसी नीतिगत मामले को स्वीकार करने का किसी अधिकारी को कोई अधिकार नहीं है तो फिर उसे अस्वीकार करने का भी कोई अधिकार नहीं हो सकता| यदि अस्वीकार करने का अधिकार ही नीचे के स्तर पर दे दिया जाए या प्रयोग किया जाए तो फिर उच्च स्तर पर ऐसा कोई अधिकार अर्थहीन रह जाएगा| अतेव कृपया व्यवस्था करें कि समस्त अधिकारियों की शक्तियां सहज दृश्य रूप में प्रकाशित की जाती हैं और नीतिगत मामलों में कोई भी निर्णय, यथा स्थिति, सशक्त सम्बंधित मंत्री, समिति या अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं लिया जाये ताकि देश में वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो सके| आप द्वारा इस प्रसंग में की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इन्तजार रहेगा| 

सादर,

 भवनिष्ठ
 
मनीराम शर्मा                                       दिनांक: 01.09.2013
एडवोकेट
नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर-331403
जिला-चुरू(राज)

Mani Ram Sharma

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Mani Ram Sharma

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ब्रिटिश भारत में उच्चस्तरीय  सरकारी लोक सेवकों (राजपत्रित- जोकि प्रायः अंग्रेज ही हुआ करते थे )को संरक्षण दिया गया था ताकि वे ब्रिटिश खजाने को भरने में  अंग्रेजों की निर्भय मदद कर सकें , उन्हें किसी प्रकार की कानूनी कार्यवाही का कोई  भय न हो| अपने इस स्वार्थ पूर्ति के लिए उन्होंने दण्ड प्रक्रिया  संहिता, 1898  में धारा 197  में प्रावधान किया था कि ऐसे लोक सेवक जिन्हें सरकारी स्वीकृति के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता, के द्वारा शासकीय हैसियत में किये गए अपराधों  के लिए किसी भी न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान सरकार की  स्वीकृति के बिना नहीं लिया जायेगा| स्वस्पष्ट है कि साम्राज्यवादी  सरकार द्वारा  यह प्रावधान मात्र अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया गया था| यह भी स्मरणीय है कि तत्समय निचले स्तर के (भारतीय) सरकारी लोक सेवकों को यह संरक्षण प्राप्त नहीं था| उस समय बहुत कम संख्या में राजपत्रित सेवक हुआ करते थे तथा उनके नाम एवं छुटियाँ भी राजपत्र में प्रकाशित हुआ करती थी किन्तु आज स्थिति भिन्न है|
हमारी संविधान सभा के समक्ष भी यह विषय विचारणार्थ आया तथा उसने मात्र राष्ट्रपति और राज्यपाल को उनके कार्यकाल के दौरान ही अभियोजन से सुरक्षा देना उचित समझा जबकि लोक सेवकों को  लोक कृत्य के सम्बन्ध में दण्ड प्रक्रिया  संहिता,1973 की धारा 197 का उक्त संरक्षण हमेशा के लिए उपलब्ध है| आज भारतीय गणतंत्र में भी दण्ड प्रक्रिया  संहिता, 1973 की धारा 197 तथा अन्य कानूनों में यह  प्रावधान बदस्तूर जारी है जबकि पाश्चत्य देशों इंग्लॅण्ड , अमेरिका आदि के कानून में ऐसे प्रावधान नहीं हैं| 
अभियोजन स्वीकृति  का यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14  की भावना के विपरीत, अनावश्यक तथा लोक सेवकों में अपराध पनपाने की प्रवृति रखता है| यही नहीं यह प्रावधान लोक सेवकों के मध्य भी भेदभाव रखता है| निचले श्रेणी के लोक सेवक जिनका जनता से सीधा वास्ता हो सकता है अर्थात जिनकी नियुक्ति राज्यपाल या राष्ट्रपति की ओर से या उनके द्वारा नहीं की  जाती उन्हें यह संरक्षण उपलब्ध नहीं है| दूसरी ओर बराबर की श्रेणी ( ग्रेड ) के अधिकारी जो राजकीय उपक्रमों(जोकि संविधान के अनुसार राज्य है ) में नियुक्त हैं उन्हें यह सुरक्षा उपलब्ध नहीं होगी जबकि उसी ग्रेड के राज्य सेवा में प्रत्यक्ष तौर पर सेवारत सेवक को सुरक्षा उपलब्ध है| इसी प्रकार की विसंगति का एक उदाहारण तहसीलदार सेवा का है| तहसीलदार राजस्व मंडल द्वारा नियुक्त होने के कारण उसे धारा 197 का संरक्षण प्राप्त नहीं है जबकि उसी ग्रेड के सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी व अन्य अधिकारियों को संरक्षण उपलब्ध है| इसके अतिरिक्त जब एक ही अपराध में विभिन्न श्रेणी के लोक सेवक संलिप्त हों तो निचली श्रेणी के लोक सेवकों का अभियोजन कर दण्डित करना और मात्र उपरी श्रेणी के सेवकों का अपराधी होते हुए भी बच निकालना अनुच्छेद  14  का स्पष्ट उल्लंघन है| विधि का ऐसा अभिप्राय कभी नहीं रहा है कि एक ही अपराध के अपराधियों के साथ भिन्न भिन्न व्यवहार हो| सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय शोषित रेलवे कर्मचारी के मामले में कहा है कि असमानता दूर होनी चाहिए और विशेषाधिकार समाप्त होने चाहिए| इसी  प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने विनीत नारायण के मामले में भी कहा कि कानून अभियोजन एवं जांच के लिए अपराधियों को उनके जीवन स्तर के हिसाब से भेदभाव नहीं करता है| पी पी शर्मा के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहा गया है कि अभियोजन स्वीकृति के बिना आरोप पत्र दाखिल करना अवैध नहीं है| मानवाधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय घोषणा , जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किये हैं, के अनुच्छेद एक में कहा गया है कि गरिमा और अधिकारों की दृष्टि से सभी मानव प्राणी  जन्मजात स्वतंत्र तथा  समान हैं|
एक तरफ देश भ्रष्टाचार और राज्य आपराधिकरण की अमरबेल की मजबूत पकड़ में है तो दूसरी ओर अभियोजन स्वीकृति की औपचारिकता के अभाव में बहुत से प्रकरण बकाया पड़े हैं| सी बी आई के पास अभियोजन स्वीकृति की प्रतीक्षा में अभियोजन बकाया की लम्बी सूची है | ठीक इसी प्रकार भ्रष्टाचार के अभियोजन स्वीकृति की प्रतीक्षा में राज्यों की पास बकाया मामलों की भी लम्बी सूची है| इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि इन स्वीकृतियों को भी चुनौती देकर न्यायालयों से स्थगन प्राप्त कर विवाद को और लंबा खेंचा जा सकता है जबकि ऐसा करना कानूनन निषिद्ध है| फिर भी न्यायाधीश कुछ अपवित्र कारणों और जवाबदेही के अभाव के कारण यह सब निस्संकोच कर रहे हैं| कानून में अभियोजन स्वीकृति के लिए कोई समयावधि अथवा प्रक्रिया निर्धारित नहीं हैं| यह भी स्पष्ट नहीं है कि व्यक्तिगत परिवाद की स्थिति में यह स्वीकृति किस प्रकार और किसके द्वारा मांगी जायेगी| कुलमिलाकर स्थिति भ्रमपूर्ण एवं अपराधियों के लिए अनुकूल है| यद्यपि राजस्थान सरकार के पूर्व में प्रशासनिक आदेश थे कि अभियोजन स्वीकृति का निपटान 15 दिवस में कर दिया जावे| बाद में केंद्रीय सतर्कता आयोग ने 2  माह के भीतर अभियोजन स्वीकृति का निपटान करने के आदेश जारी किये हैं| किन्तु इन आदेशों की अनुपालना की वास्तविक  स्थिति  स्वस्पष्ट है|
 आपराधिक प्रकरणों में प्रसंज्ञान मात्र तभी लिया जाता है जब प्रथम दृष्टया मामला बनता हो अतः अनावश्यक परेशानी की आशंका निर्मूल है| इसका दूसरा अभिप्राय यह निकलता है कि न्यायालयों द्वारा प्रसंज्ञान प्रक्रिया में स्वयम राज्य के विश्वास का अभाव होना है तथा प्रसंज्ञान के न्यायिक निर्णय की प्रशासनिक पुनरीक्षा कर  एक वर्ग विशेष के अपराधियों के अभियोजन की स्वीकृति रोक कर न्यायिक अभियोजन के प्रयास को विफल करना है व आम नागरिक एवं वंचित श्रेणी के लोक सेवकों को ऐसी अविश्वसनीय न्यायिक प्रक्रिया द्वारा परेशान किये जाने हेतु खुला छोड़ना है|
एक सक्षम मजिस्ट्रेट को मामले का प्रसंज्ञान लेने की शक्ति है तथा अभियोजन स्वीकृति के अभाव में प्रसंज्ञान को बाधित करना उचित क्षेत्राधिकार के प्रयोग में अवरोध है| प्रायः अभियोजन स्वीकृति की अपेक्षा के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि यह लोक सेवकों को अनावश्यक परेशानी से बचाने के लिए उचित  है| जबकि निचले स्तर के लगभग 90% लोक सेवक, जिनका जनता से सीधा वास्ता पडता है और उनकी नियुक्ति राज्यपाल या राष्ट्रपति की अधिकृति के बिना की जाती है, को यह संरक्षण उपलब्ध नहीं है  तथा वे ऐसी सुरक्षा के बिना भी सेवाएं दे रहे हैं व जनता से सीधा संपर्क होने से उनके अभियोजन की संभावनाएं तथा जोखिम भी अधिक है| इसी प्रकार इंग्लॅण्ड , अमेरिका आदि देशों के सभी लोक सेवक भी ऐसी सुरक्षा के बिना सेवाएं दे रहे हैं तो हमारे देश में इस उपरी लोक सेवक वर्ग को ऐसी सुरक्षा का कोई औचित्य नहीं रह जाता है| फिर भी यदि अनुचित अभियोजन या परेशानी का अंदेशा हो व प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता हो तो उपरी स्तर के सक्षम लोक सेवक दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482  के अंतर्गत अन्य नागरिकों की तरह हाई कोर्ट से राहत प्राप्त कर सकते हैं|
उक्त प्रावधान का एक कानूनी पहलू यह भी है कि समस्त अपराधों का अभियोजन करना राज्य का कर्तव्य है और गोरे समिति (1970) ने भी यही सिफारिश की थी कि समस्त अपराधों का बिना किसी भेदभाव के अभियोजन राज्य ही करे|  अभियोजन का संचालन स्वयम राज्य करता है और उसके अभियोजन विभाग में आपराधिक कानून के विशेषज्ञ होते हैं अत: किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध आरोप पत्र पेश करने वाले इन विशेषज्ञों की राय को न मानना अपने आप में हास्यास्पद स्थिति बनती है| दूसरी ओर सरकारी विभाग कानूनी मुद्दों पर कानूनी विशेषज्ञों की राय के आधार पर ही अग्रिम कार्यवाही करते हैं अथवा न्यायालय में अपना बचाव प्रस्तुत करते हैं | विशेषज्ञों की राय को अपनी सुविधानुसार मानना या न मानना भी कोई औचित्यपूर्ण कदम नहीं है| कहने को तो सरकारी विभाग के आदेश के विरुद्ध अभियोजन द्वारा रिट याचिका दायर की जा सकती है किन्तु तकनीकि दृष्टि से देखा जाए तो यह अर्थ निकलता  सरकार स्वयम सरकार के विरुद्ध उपचार हेतु दावा करे| क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए स्वयं अपने ही विरुद्ध कोई दावा पेश करे? वास्तव में देखा जाए तो अभियोजन स्वीकृति के प्रावधान का सारत: यही अर्थ है कि जिस अपराधी राज्य अधिकारी को सरकार दण्डित नहीं करना चाहे उसके विरुद्ध भारत भूमि के कानून में कोई उपचार नहीं है| राज्य का कानूनी कर्तव्य भी अपराधों का अभियोजन करना है न कि उनका अनुचित बचाव| क्या अभियोजन स्वीकृति के उक्त प्रावधान को विवेक के धरातल पर किसी भी दृष्टिकोण से उचित व तर्कसंगत ठराया जा सकता है?     
दण्ड प्रक्रिया संहिता एक सारभूत या  मौलिक कानून न होकर प्रक्रियागत कानून है जिसका उद्देश्य सारभूत कानून को लागू करने में सहायता करना है जबकि अभियोजन स्वीकृति सम्बन्धित प्रावधान तो कानून लागू करने में बाधक साबित हो रहा है| इसलिए प्रक्रियागत कानूनों को आज्ञापक के बजाय निर्देशात्मक ही बताया गया है|  स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कैलाश बनाम ननकू के मामले में कहा है कि यद्यपि व्यवहार प्रक्रिया संहिता का आदेश 8 नियम 1 आज्ञापक प्रवृति का है किन्तु प्रक्रियागत कानून का भाग होने से यह निर्देशात्मक ही है| इस सिद्धांत को भी यदि समान रूप से  लागू किया जाय तो भी अभियोजन स्वीकृति मात्र एक रिक्त औपचारिकता ही हो सकती है अपरिहार्य नहीं|
उक्त तथ्यों को ध्यान रखते हुए राज्य सभा की 37 वीं रिपोर्ट दिनांक 09.03.10  में अनुशंसा की गयी  है कि अभियोजन स्वीकृति पर 15  दिवस के भीतर निर्णय कर लिया जाये अन्यथा उसे स्वतः ही  स्वीकृति मान लिया जावे| पर्यावरण संरक्षण अधिनियम ,1986  की धारा 19(1)(क) में प्रावधान है कि कोई भी न्यायालय इस अधिनयम के अंतर्गत अपराध का सरकार द्वारा शिकायत के बिना प्रसंज्ञान नहीं लेगा किन्तु उपधारा (ख) में यह भी प्रावधान किया गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा इस आशय का  ६०  दिन का नोटिस देने के पश्चात ऐसी कार्यवाही संस्थित की जा सकेगी| अधिक सुरक्षा के लिए ऐसा ही प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता में भी किया जा सकता है| यह भी स्मरणीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा द्वारा वर्ष 1985 में पारित प्रस्ताव के अनुसार भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए न्यायाधीशों को मात्र दीवानी अभियोजन से सुरक्षा की अनुशंसा की गयी है| अतः अभियोजन पूर्व स्वीकृति का प्रावधान किसी भी प्रकार  से अपेक्षित , तर्कसंगत, न्यायोचित एवं भारतीय गणराज्य में  संवैधानिक नहीं है- चाहे देश के न्यायविद इस पर कोई भी आवरण क्यों न चढ़ा दें  और उसे  हटाये  जाने की  आवश्यकता का अब संसद को मूल्यांकन करना चाहिए है| 


Mani Ram Sharma

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फांसी की सजा के विषय में हमेशा से ही विवाद बना रहा है| कुछ उदारवादी लोगों का कहना है कि जब जीवन देना मनुष्य के वश में नहीं है तो जीवन लेने का अधिकार भी नहीं है | ऐसी परिस्थितियों में फांसी की सजा या मृत्यु दण्ड का औचित्य नहीं रह जाता है| किन्तु इस विषय का दूसरा पहलू  यह भी है कि  हमारे दण्ड कानून में भी बड़ी उदारता है और मृत्यु दण्ड केवल आपवादिक परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है अर्थात मृत्यु दण्ड की सजा देने के लिए न्यायाधीश को पर्याप्त कारण बताने पड़ते हैं कि अमुक प्रकरण में मृत्यु दण्ड ही क्यों दिया जावे| भारतीय कानून में कारावास भुगत रहे व्यक्ति द्वारा जेल के स्टाफ पर प्राण घातक हमला करने पर मात्र फांसी की सजा का ही प्रावधान था किन्तु इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक ठराया जा चुका है| यह प्रावधान तो अंग्रेजों ने अपने हित सुरक्षित करने के लिए किया था|
फांसी की सजा की संवैधानिकता पर भी कई बार प्रश्न उठें हैं किन्तु इसे संवैधानिक ही ठहराया गया| इस प्रकरण का दूसरा चिंताजनक पहलू यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा फांसी की सजा को अंतिम कर दिए जाने के बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की जा सकती है और दया याचिकाओं को सरकार द्वारा रहस्यमय करणों से  लंबे समय तक विचाराधीन रखा जाता है| इस अवधि में दोष सिद्ध व्यक्ति जीवन और मृत्यु के बीच संघर्षरत और संतप्त रहता है| राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका का अधिकतम 6 माह की अवधि में निपटारा कर दिया जाना चाहिए | अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह रह जाता है कि न्यायालय ने तो ऐसे व्यक्ति को मात्र मृत्यु दण्ड की सजा दी थी किन्तु सरकार और उसके अधिकारियों की अकर्मण्यता के कारण उसने लंबा कारावास अतिरिक्त भुगता है जो कि विधिसम्मत नहीं है | ऐसी स्थिति में इस अतिरिक्त कारावास के लिए जिम्मेदार अधिकारी की पहचान कर उस पर भी उपयुक्त कार्यवाही होनी चाहिए| गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में मृत्यु दंड से दंडादिष्ट 477 व्यक्ति प्रतीक्षारत हैं जबकि गत 8 वर्षों में मात्र 1 व्यक्ति को ही मृत्यु दंड से वास्तव में दण्डित किया गया है|ऐसी स्थिति में मृत्यु दंड दिया जाना अपने आप में  एक पहेली मात्र है| 

हमारे विधानमंडलों द्वारा समय समय पर भावुकतावश  एवं सस्ती लोकप्रियता के लिए सर्वसम्मति से अनुचित निर्णय लिया जाना कोई आश्चर्यजनक बात  नहीं है| मैंने विदेशी कानूनों एवं विदेशी विधायिकाओं के कृत्यों का भी अध्यन किया है| दुर्भाग्य से हमारे राजनैतिक चिंतन में गंभीरता का अभाव है और यहाँ वोट बैंक की राजनीति का स्थान राष्ट्रीय हित से ऊपर रहता है| पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल  बिहारी वाजपेयी ने “पायोनियर” को दिए गए एक साक्षात्कार में भी कहा था कि  विधायी कार्य को जिस सीमा तक सक्षमता या प्रतिबद्धता से करना चाहिए  न तो संसद, न ही राज्य विधान सभाएं कर रहीं है। उनके अनुसार, कुछ अपवादों को छोड़कर जो लोग इन लोकतांत्रिक  संस्थानों के लिए चुने जाते है, वे औपचारिक या अनौपचारिक रूप से विधि-निर्माण में न तो प्रशिक्षित हैं और न ही अपने पेशे में सक्षमता और आवश्यक ज्ञान का विकास करने में प्रवृत प्रतीत होते हैं। समाज के वे लोग जो मतदाताओं की सेवा में सामान्यतः रूचि रखते हैं और विधायी कार्य कर रहे हैं, आज की मतदान प्रणाली में सफलता प्राप्त करना कठिन पाते हैं और मतदान प्रणाली धन-बल, भुज-बल और जाति व समुदाय आधारित वोट बैंक द्वारा लगभग विध्वंस की जा चुकी है। श्री वाजपेयी के अनुसार शासन के ढांचे में भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र के सार-मताधिकार- को ही जंग लगा दिया है ।
 तमिलनाडु विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव को भी इसी श्रेणी में माना जा सकता है| कुछ समय पूर्व पंजाब विधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से अन्य राज्यों को पानी नहीं देने का प्रस्ताव पारित किया गया था| किन्तु एक तरफ पंजाब का पडौसी राजस्थान जैसा राज्य है जहाँ पीने के पानी का संकट है और दूसरी ओर  पंजाब अपनी खेती के लिए सारा पानी उपयोग करना चाहता है| संविधान के अनुसार भी  जल राष्ट्रीय सम्पदा है| मात्र संवैधानिक ही नहीं मानवीय दृष्टिकोण से भी किसी को पेय जल से वंचित करना न्यायोचित नहीं है |

समाज में स्थिरता बनाये रखने के लिए सजा दिया जाना भी आवश्यक है अन्यथा दण्ड के भय बिना सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायेगी और अराजकता अपने पांव पसार लेगी|यदि बड़ा दण्ड किसी को दिया ही न जाये तो छोटे अपराधी भी गंभीर अपराध करने को प्रवृत और लालायित हो सकते हैं| इसी प्रकार गंभीर और खूंखार अपराधियों जिनमें सुधार की संभावनाएं नगण्य हैं को मृत्यु दण्ड दिया जाना उचित ही है | मृत्यु दण्ड सबसे बड़ा दण्ड है अतः समान रूप से यह भी आवश्यक है कि गंभीर अपराधियों को बड़ा दण्ड दिया जाये चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, संप्रदाय या स्थान का निवासी हो  अन्यथा छोटे और बड़े अपराधी दोनों को यदि समान दण्ड दिया जाता है तो यह कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद 14 का सपष्ट उल्लंघन होगा |

Mani Ram Sharma

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देश आयातित नीतियों पर चल रहा है
« Reply #66 on: September 22, 2013, 09:52:58 PM »
मनीराम शर्मा
अध्यक्ष, इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन , चुरू प्रसंग
रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर  331403
दिनांक 21.09.13
माननीय अध्यक्ष महोदय,
कार्मिक, जनशिकायत, विधि एवं न्याय समिति,
राज्य सभा,
नई दिल्ली   
महोदय,
रिजर्व बैंक का समाजवादीकरण 
आपको ज्ञात ही है कि देश के संविधान में यद्यपि समाजवाद का समावेश अवश्य है किन्तु देश के सर्वोच्च वितीय संस्थान रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में ऐसे सदस्यों के चयन में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है जिनकी समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि अथवा कार्यों से कभी भी वास्ता रहा है| सर्व प्रथम तो बोर्ड के अधिकाँश सदस्य निजी उद्योगपति – पूंजीपति हैं| जिन सदस्यों को उद्योगपतियों के लिए निर्धारित कोटे के अतिरिक्त -  समाज सेवा , पत्रकारिता आदि क्षेत्रों से चुना जाता है वे भी समाज सेवा, पत्रकारिता आदि का मात्र चोगा पहने हुए होते हैं व वास्तव में वे किसी न किसी  औद्योगिक घराने से जुड़े हुए हैं| एक उद्योगपति का स्पष्ट झुकाव स्वाभाविक रूप से व्यापार के हित में नीति निर्माण में होगा| इससे भी अधिक दुखदायी तथ्य यह है कि  केन्द्रीय बोर्ड के 80% से अधिक सदस्य विदेशों से शिक्षा प्राप्त हैं फलत: उन्हें जमीनी स्तर की भारतीय परिस्थितियों का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है अपितु उन्होंने तो “इंडिया” को मात्र पुस्तकों  में पढ़ा है| ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक बोर्ड द्वारा नीति निर्माण में संविधान सम्मत और जनोन्मुख नीतियों की अपेक्षा करना ही निरर्थक है| रिजर्व बैंक, स्वतन्त्रता पूर्व 1934 के अधिनियम से स्थापित एक बैंक है अत: उसकी स्थापना में संवैधानिक समाजवाद के स्थान पर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की बू आना स्वाभाविक  है| देश के 65% गरीब, वंचित और अशिक्षित वर्ग का रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में वास्तव में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है और देश आयातित नीतियों पर चल रहा है| दूसरी ओर भारत से 14 वर्ष बाद 1961 में स्वतंत्र हुए दक्षिण अफ्रिका के रिजर्व बैंक के निदेशकों में से एक कृषि व एक श्रम क्षेत्र से होता है| हमारे पडौसी देश पाकिस्तान के केन्द्रीय बैंक में निदेशक मंडल में प्रत्येक राज्य से न्यूनतम एक निदेशक अवश्य होता है जबकि हमारे देश में ऐसे  प्रावधान का नितांत अभाव है|
अत: रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन कर इसे समाजवादी बनाया जाये और यह सुनिश्चित किया जाए कि उसके निदेशक/शासकीय मंडल में  कृषक, मजदूर वर्ग तथा समस्त राज्यों का समुचित प्रतिनिधित्व हो| इस प्रसंग में आप द्वारा की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इंतज़ार रहेगा|
भवनिष्ठ
मनीराम शर्मा 
 

Mani Ram Sharma

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[justify]भारतीय न्याय प्रणाली के विकास में  आदि काल से मनुस्मृति, मृछ्कटीकम का उल्लेख किया जा सकता है यद्यपि विधि व्यवसाय की वर्तमान शिक्षा में इनका कोई अध्ययन शामिल नहीं है| ये ग्रन्थ मात्र विधि के प्रामाणिक ग्रन्थ ही नहीं हैं अपितु नीति पर व्याख्याएं भी हैं| महाभारत को भी आदर्श नीति ग्रन्थ मना गया है और कहा गया है कि महाभारत पांचवां वेद है| कालांतर में मुस्लिम शासकों ने कुरान व हिदाया आदि पर आधारित मुस्लिम विधि को भारत में लागू किया| मुगलों के बाद देश में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थापित हो गया और उसने भारत के संसाधनों का अधिकाधिक दोहन  करने के अनुकूल कानून बनाये औए उनको इस देश की जनता पर थोपा गया| हमारी न्यायप्रणाली पर आज भी उर्दू व अंग्रेजी  भाषाओं का प्रभाव है| जिन न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी नहीं है उनमें परिपाटी के आधार पर प्रायः उर्दू शब्दावली का प्रयोग होता है| यद्यपि इन न्यायालयों के कार्मिकों, न्यायाधीशों अथवा वकीलों –किसी- ने भी उर्दू भाषा की शिक्षा नहीं ले रखी है|

सन 1857 में हुई क्रांति ने इस दिशा में परिवर्तन किया और देश के शासन की बागडोर को ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ में ले लिया व अब कानून बनाने का अधिकार ब्रिटिश संसद के पास था| भारत के लिए कानून बनाते समय विद्रोह की उठाने वाली आग  या स्वतंत्रता के पक्ष में उठने वाले प्रत्येक स्वर को दबाना लक्ष्य समक्ष रहता था| इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लोर्ड मैकाले ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 का निर्माण किया जिसमें लोक सेवकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई विशेष प्रावधान शामिल किये गए| लोक सेवकों के विरुद्ध अपराध आदि विशेष अध्याय इसी कड़ी का एक भाग हैं| लोक सेवकों पर हमला आदि को अलग से परिभाषित किया गया और इन अधिकांश अपराधों को संज्ञेय घोषित किया गया| इसी प्रकार राज कार्य में बाधा जैसे अस्पष्ट किन्तु संज्ञेय अपराध भी इसमें शमिल कर पुलिस सहित समस्त लोक सेवकों की सुरक्षा की सुनिश्चित व्यवस्था की गयी| यही नहीं इन राजपुरुष-लोक सेवकों के अभियोजन से पूर्व स्वीकृति का प्रावधान जोड़कर उन्हें पूर्ण अभय दान दे दिया गया जो आज लोकतान्त्रिक व्यवस्था में भी बदस्तूर जारी है| आज विकसित राष्ट्रों में इस प्रकार के मनमाने कानूनों को कोई स्थान नहीं हैं और वहाँ लोक सेवकों के अधिकारों के बजाय उनके कर्तव्यों पर बल दिया जाताहै | हमारी शासन और न्याय व्यवस्था में आज भी राजतन्त्र की बू आती है और नागरिकों को आहूत करने के लिए पुलिस और अन्य राज्याधिकारी ‘सुनिश्चित करने’ के स्थान पर “पाबंद करें” जैसे अनधिकृत शब्दों का प्रयोग करते हैं| वे सम्भवतया  भूल जाते हैं कि वे इस लोकतान्त्रिक  व्यवस्था के स्वामी न होकर सेवक ही हैं|

कालांतर में ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 पारित किया था जो कि मूलतः हमारे वर्तमान संविधान से मिलता जुलता ही है चाहे हम हमारे संविधान पर गर्व करते हों किन्तु वास्तिविक स्थिति यही है| यह अधिनयम भी हमारी सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है| अब ब्रिटिश संसद ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 को हाल ही दिनांक 19.11.1998 को निरस्त कर दिया है| इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता को मात्र एक सत्ता हस्तांतरण ही कहा जाय तो ज्यादा सही व उपयुक्त है| वर्तमान में देश में पांच शक्तिशाली तत्वों – धनाढ्य वर्ग, बाहुबलियों, राजनेताओं, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों तथा न्यायिक अधिकारियों का वर्चस्व है और इस लोक तंत्र में इन पांच समानांतर सरकारों के मध्य लोक का कोई स्वर सुनाई नहीं देता| आधी रात रामलीला  मैदान में आज भी प्रशासन के इशारे पर पुलिस रावणलीला खेल सकती है और न्यायालय भी उन खिलाडियों का अंततोगत्वा कुछ भी नहीं बिगाडेंगे| यद्यपि लोकप्रदर्शन के लिए यह न्यायिक अभ्यास कुछ समय के लिए जारी रह सकता है किन्तु इतिहास साक्षी है कि स्वतंत्र भारत में यद्यपि शक्तिसम्पन्न लोगों द्वारा अपराध के कई मामले प्रकाश में आये किन्तु मुश्किल से ही  किसी को कोई सजा हुई है| न्यायतंत्र से जुड़े लोग इस स्थिति के लिए विद्यमान  प्रक्रिया को व एक दूसरे को इसके लिए दोषी ठहराते रहते हैं और मिलीभगत की कुश्तियां इन दंगलों में चलती रहती हैं|

कालांतर में राजशाही के कारण आई इन विकृतियों को दूर करने के लिए आवश्यक है कि हम हमारी सांस्कृतिक विरासत को संभालें और मनुस्मृति, मृछ्कटीकम, महाभारत जैसे नीतिग्रंथों के  चुनिदां अंशों को विधि शिक्षा में शामिल करें| जो कानून एक नागरिक पर हमले पर लागू होता है वही कानून एक लोक सेवक पर हमले का भी उपचार प्रदान कर सकता है| देश में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना के लिए आवश्यक है कि राजतान्त्रिक शब्दावली और कानूनों का पूर्ण सफाया कर जनता के लिए अनुकूल कानूनों का निर्माण करें तथा समस्त  राजशाही कानूनों को (तुर्की की तरह) निरस्त कर उनके अवशेषों को समाप्त करें| हमारी आने वाली पीढ़ियों को यह सन्देश नहीं मिलना चाहिए कि हम 500 वर्षों तक मुगलों और अंग्रेजों के गुलाम रहे थे| लोकतंत्र मात्र तभी मजबूत बन सकेगा|

जय भारत !
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Mani Ram Sharma

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[justify]हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सुरेशकुमार शर्मा को अवैध हिरासत में रखने के प्रकरण में राज्य सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने और घटना में संलिप्त आई ए एस अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को 3 माह की अवधि में निपटाने के निर्देश दिए हैं| न्यायाधिपति राजीव शर्मा ने सुरेश कुमार शर्मा की रिट याचिका पर हिमाचल राज्य  को दिनांक 2.9.13 को  यह आदेश दिया है| स्मरण रहे कि न्यायालय ने पूर्व में ही दिनांक  23.05.13 को सुनवाई कर अंतरिम आदेश दिया था कि चूँकि आई ए एस - बी आर कमल और तहसीलदार सिद्धार्थ आचार्य ने याची की स्वतंत्रता का हनन विधि विरुद्ध रूप से किया है अत: उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की जाये और उन्हें निलंबित कर दिया जाए| साथ ही न्यायालय ने यह भी आदेश दिया था कि सरकार हर्जाने के लिए रुपये दो लाख न्यायालय में अग्रिम जमा करवाएं |
  याची सुरेश कुमार शर्मा ने उपखंड मजिस्ट्रेट के दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 151 ( जिसका आम तौर पर दुरूपयोग किया जाता है) के अंतर्गत उसकी गिरफ्तारी के आदेश को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अनुचित हनन हुआ है व उसे 72 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखा गया और जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया गया| याचिका में आरोप लगाए गए हैं कि याची ने उसके गाँव के दो व्यक्तियों द्वारा 60 बीघा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के विषय में उसने कई शिकायतें की थी| यद्यपि अतिक्रमण हटा दिया गया किन्तु अप्रसन्न होकर उसे झूठे मामले में फंसा दिया गया|  नतीजन रोहरू के उपखंड मजिस्ट्रेट बी आर कमल ने अतिक्रमियों की झूठी शिकायत पर दिनांक 7.7.09 को याची की गिरफ्तारी के आदेश जारी किये और उसे तीन बाद गिरफ्तार किया गया और तत्कालीन कार्यवाहक उपखंड मजिस्ट्रेट तहसीलदार जुब्बल सिद्धार्थ आचार्य ने उसका जमानत मुचलका स्वीकार नहीं किया| याची को दिनांक 13.07.09 को मुक्त किया गया और बाद में कार्यवाही बंद कर दी गयी |

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107  में यह प्रावधान है कि पर्याप्त आधार होने पर मजिस्ट्रेट सम्बद्ध व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए मुचलका प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकता है| धारा 109 में मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को प्राप्त सूचना का सार, मुचलका की रकम, प्रतिभुओं  की संख्या, प्रकार और वर्ग बताते हुए  कारण दर्शित करने  की अपेक्षा करेगा| न्यायालय में ऐसा व्यक्ति उपस्थित होने की दशा में उसे यह सार बताया जाएगा| धारा 113 के अनुसार ऐसे व्यक्ति की उपस्थति के लिए समन जारी किया जाएगा और गिरफ्तारी का वारंट केवल अत्यावश्यक परिस्थितियों में ही जारी किया जाएगा | समन या वारंट के साथ ऐसे आदेश की प्रति गिरफ्तार व्यक्ति को दी  जायेगी| धारा 116(1) के  अनुसार ऐसे व्यक्ति के उपस्थित होने पर शिकायत की सत्यता की जांच  की जाएगी और उचित होने पर अतिरिक्त साक्ष्य लिया जाएगा| धारा 116 (3) के परंतुक के अनुसार, धारा 108, 109 या 110 के अलावा,  जांच किये बिना अंतरिम अवधि के लिए मुचलका के लिए निर्देश नहीं दिए जा सकते| जबकि प्रकरण में पुलिस अधिकारी के बुलाये जाने पर याची उपस्थित हुआ और उसे गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया| उसके द्वारा प्रस्तुत व्यक्तिगत मुचलका और उसके पिता द्वारा प्रस्तुत मुचलका को  भी इस बनावटी आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि उसमें सम्पति के विवरण नहीं हैं| बाद में सम्पति के विवरण सहित आवेदन प्रस्तुत करने पर ही उसे रिहा किया गया|
याची को कानूनन एक बार में 24 घंटे से अधिक अवधि के लिए हिरासत में नहीं भेजा जा सकता था  किन्तु उसे दिनांक 10.07.09 से 13.07.09 तक 72 घंटे हिरासत में भेजने का अवैध आदेश दिया गया| यदि याची द्वारा प्रस्तुत मुचलका में सम्पति का पूर्ण विवरण नहीं था तो उसे तीन दिन बाद के स्थान पर उसी दिन विवरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जा सकती थी| लेखक का विनम्र मत है कि मजिस्ट्रेट 24 घंटे ड्यूटी पर होता है तथा बिना अनुमति व वैकल्पिक व्यवस्था के वह मुख्यालय भी नहीं छोड़ सकता| इसी दृष्टिकोण से दंड प्रक्रिया संहिता में “मजिस्ट्रेट न्यायालय” शब्द के स्थान पर मात्र “मजिस्ट्रेट” शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही करने के लिए न्यायालय लगा होना आवश्यक नहीं है क्योंकि न्यायालय का निर्धारित समय और छुट्टियां होती हैं जबकि ये मजिस्ट्रेट पर लागू नहीं होती| जब मजिस्ट्रेट छुट्टी के समय या दिन शांति रखने के लिए आदेश दे सकता है तो फिर वह जनता का सेवक होते होते हुए जमानत के लिए मना कैसे कर सकता है|

याचिका की सुनवाई के समय न्यायालय ने पाया कि याची की गिरफ्तारी की सम्पूर्ण प्रक्रिया में निर्धारित आवश्यक कानून की अनुपालना नहीं की गयी है और इसमें दुर्भावाना की बू आती है| यह सम्पूर्ण कार्यवाही सरकारी भूमि पर अतिक्रमियों की सह पर की गयी है| याची के विरुद्ध उक्त अनुचित कार्यवाही को निरस्त करते हुए न्यायालय ने आगे आदेश दिया कि सरकार याची को दो लाख रूपये का हर्जाना दे व सरकार चाहे तो हर्जाने की राशि की वसूली आई ए एस और तहसीलदार से कर सकती है तथा उनके विरुद्ध प्रारंभ की गयी अनुशासनिक कार्यवाही को तीन माह की अवधि में निपटा दिया जाये| न्यायालय ने आगे यह भी आदिष्ट किया है कि  सरस्वतीनगर पुलिस चौकी के सहायक उप निरीक्षक ओम प्रकाश, जोकि उक्त गिरफ्तारी में संलिप्त रहा है, को भी समान रूप से निलंबित किया जाए और उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही को भी 3 माह की अवधि में निपटाया जाय| सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही की जाये|
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Mani Ram Sharma

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मनीराम शर्मा
अध्यक्ष, इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन , चुरू प्रसंग
रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर  331403
दिनांक 29.09.13
मो- 9460605417
ईमेल- maniramsharma@gmail.com



मीडिया समुदाय से
विनम्र अनुरोध

महोदय,
गिरफ्तारी के समाचारों में चित्रों  का प्रकाशन 

किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के समाचारों का अवलोकन करते समय ध्यान में आया है कि उसके साथ (विशेषत: इलेक्ट्रोनिक मीडिया) गिरफ्तारी का कोई अन्य चित्र प्रकाशित करते हैं| इस चित्र में प्राय: गिरफ्तार व्यक्ति के अमानवीय ढंग से हथकड़ियां लगाई हुई और पीछे की ओर हाथ बंधे हुए दिखाए जाते हैं| इस प्रकार के काल्पनिक चित्रों से पाठकों में मन में यह गलत धारणा बैठती है कि पुलिस गिरफ्तारी के समय हथकड़ियां लगा सकती है और पुलिस द्वारा हथकड़ियां लगाना वैध है| वहीँ इस प्रकार अमानवीय दशा में हथकड़ियां लगे चित्र देखने से आम व्यक्ति के मन में पुलिस के प्रति अनावश्यक घृणा उपजती है और पुलिस की गलत छवि झलकती है|


दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट और कानून द्वारा हथकड़ियों व बेड़ियों के प्रयोग पर भारत में काफी समय से प्रतिबन्ध है तथा विशेष परिस्थितियों में  पुलिस  इनका उपयोग मजिस्ट्रेट की अनुमति से ही कर सकती है| अत: आपसे सादर अनुरोध है कि गिरफ्तारी के समाचार के साथ हथकड़ी लगे किसी काल्पनिक चित्र को प्रकाशित नहीं करें|

सादर ,

इस प्रसंग में आप द्वारा की गयी कार्यवाही का जनता को उत्सुकता से इंतज़ार रहेगा|
 
आपका शुभेच्छु

मनीराम शर्मा   



 

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