Author Topic: Articles On Environment by Scientist Vijay Kumar Joshi- विजय कुमार जोशी जी  (Read 22080 times)

VK Joshi

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इस समय जब पूरी दुनिया "ग्लोबल वार्मिंग" की बहस में पड़ी हुई है, जोशी जी द्वारा उपलब्ध कराई गई यह मौलिक और आधारभूत जानकारी हमारे ज्ञानचक्षु खोलने में मददगार साबित हो रहे हैं. उत्तराखण्ड तो वैसे ही बहुत नाजुक भौगोलिक संरचना वाला राज्य हैं, इसके नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ-साथ पर्यावरण बचाने के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझना होगा. 

जोशी जी कृपया ’पहाड़ में नदियों पर संकट’ विषय पर भी कुछ प्रकाश डालने की कृपा करें..



Hem main paryavaran sey judey sabhi pahluon per lekh doonga-kareeb 900+ lekh hain merey pass-kuch prakashit kuch aprakashit. Unko serialised form mein laney mein thora samay lagega. Plus committed newspaper cols ko priority deni padti hai-isliye samay adhik lagta hai yahan per likhne mein. Global warming ka hawwa bana rakah hai hamarey so called environmentalists ney. Aret woh to 18000 varsh sey ho rahi hai-aur abhi aur badhegi.
Bhookamp key baad landslides per kuch lekh dunga-fir baat kerunga pani kee.
Dhanyavad Hem.

VK Joshi

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Jyun reya Rawat jyu. Majboori chu ki pahad mein nee rooneyi. Per pahadi hun to matrbhoomi key liye prem swabhavik hai. Zindagi bhar mainey pahad mein he kaam kiya-apney Uttarahand mein adhik nahi kiya per Himachal aur J&K mein bahut kaam kiya. Samasyayen paryavaran ki sab jagah ek see hain. Himachal ka vikaas baher sey bahut adhik dikhta hai-hua bhi hai, per dohan bhi bahut hua hai. Vikas sthayi ho is baat per mera zor rehta hai. Koshish rahegi ki pathakon ko adhik sey adhki jankaari dey sakun.

जोशी जी पैलाग |
आप
Dhanyavad.के लेखों को पढ़ाने का मौक़ा दिया आप और फोरम दोनों का मन से आभार / सच तो ये है जोशी जी आपके लेखों को हम कैसे पढ़ सकते थे अगर  म्यार पहाड़ फोरम  नहीं होता / मैं मानता हूँ कि इतनी अच्छी जानकारी और लेखों  से हम अनभिग्य रह जाते | आपका पहाड़ के प्रति प्रेम और उसकी चिंता आपके लेखों में  साफ झलकता है
मुझे गर्व हो रहा है कि हमारे बुद्धिजीवी वर्ग पहाड़ के लिए चिंतित है आशा करता हूँ भविष्य में भी आपके लेखों को पढ़ने का mauka मिलेगा |
पुन्ह धन्यबाद


khim


VK Joshi

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क्या आपके बच्चे सुरक्षित हैं?
जाड़ों की सुबह जो आनन्द रजाई में पूरा अंदर घुसकर दर तक सोने में आता है वह सब काफूर हो जाता है, जब इजा कहती है जल्दी नहालो स्कूल को देरी हो रही है. ना चाहते हुए भी उठाना पड़ता है और नहाना भी पड़ता है. बस जैसे ही नाश्ता पूरा होने को होता है तो साथी लोग आ जाते हैं, 'चलो आज टेस्ट है, देरी मत करो यार'. बस घर से बच्चा गया नहीं कि इजा ने चैन की सांस ली. पर चैन कहाँ-उसे तो अभी सारा काम करना है, पति को उठाना है, चाय देनी है, वगैरह वगैरह.
बच्चा स्कूल तो चला गया, पर कभी आपने सोचा है कि वह कितना सुरक्षित है वहां? मैं भूकंप से सुरक्षा की बात कर रहा हूँ, न कि अन्य किसी चीज़ से. हम यह मान लेते हैं कि स्कूल तो सबसे सुरक्षित स्थान है.
ऐसा ही कुछ मान बैठे थे ९०० से भी अधिक बच्चों के माता-पिता चीन के सिचुआन प्रान्त के दुजिआन्ग्यान नगर में. १२ मई २००८ को. इन बेचारों को तो पता ही नहीं था कि ज्युआन मिडिल स्कूल की भव्य तीन मंजिली ईमारत भरी दोपहर में भूकंप की मार न बर्दाश्त कर सकेगी और भरभरा कर ताश के महल की भांति ढह जाएगी! ऐसा ही कुछ हुआ पाठकों-वो ही नही उसके अतिरिक ५ अन्य स्कूलों की इमारतें भी ध्वस्त हो गयी. सोचिये जरा उन ९०० होनहारों के माता-पिताओं की तो उस दुर्घटना के बाद से ज़िन्दगी ही बदल गयी.
हाल के कुछ वर्षों में तुर्किस्तान (१९९९), गुजरात (२००१), अल्जीरिया (२००३), मोरोक्को (२००४) एवं मुज्जफराबाद -पाकिस्तान (२००५) में आये भूकम्पों से हजारों बच्चे बेमौत मारे गये. उनकी बदकिस्मती थी कि वे स्कूल में थे और भूकंप दिन में आये. यह एक संयोग है कि अक्सर भूकंप रात में ही आते हैं, पर ऐसा कोई नियम नहीं है-भूकंप कभी भी किसी भी स्थान पर बिना किसी पूर्व संकेत के आ सकते हैं. पर एक बात अच्छी है कि भूकंप आपद क्षेत्र हमारे देश में पहचाने जा चुके हैं. भूकंप की दृष्टि से हमारे हिमालयी क्षेत्र सर्वाधिक आपद क्षेत्र में आते हैं.
आपने कभी कार की टक्कर देखी है? जब जोर की टक्कर होती है तब आगे की सीट वाला अक्सर मारा जाता है. उत्तराखंड के भी कुछ जनपद भूकंप की दृष्टि से कार के आगे की सीट के समान हैं. हों भी क्यों नहीं चलायमान भारतीय प्लेट आज भी स्थिरप्रग्य तिब्बती प्लेट के साथ आज भी टक्करें मार रही है. चूंकि उत्तराखंड उत्तर में है और तिब्बती प्लेट के एकदम करीब है-उस क्षेत्र का अधिक प्रभावित होना लाजिमी है.
यही वजह है कि पूर्व में आये भूकम्पों के विवरणों को आधार मान मानकर भूकंप सुभेद्यता (वल्नेरेबिलिटी) के मानचित्र बनाये जाते हैं. इनमे सर्वाधिक परिमाण के भूकंप को आशंकित क्षेत्र के ज़ोन ५ में रखा जात है. यदि उत्तराखंड पर एक नजर डालें तो बागेश्वर और चमोली जनपद शतप्रतिशत इसी ज़ोन में आते हैं. इनके अतिरिक्त रुद्रप्रयाग जनपद का १८.३%, अल्मोड़ा का १८ एवं उत्तरकाशी का १७% क्षेत्र भी इसी ज़ोन में आता है. चम्पावत, हरिद्वार, नैनीताल, उधमसिंहनगर एवं देहरादून जनपद ज़ोन ४ में आते हैं. इसके अतिरिक्त गढ़वाल का १७%, टिहरी गढ़वाल का १६%, अल्मोड़ा का ८२% एवं उत्तरकाशी का ८३% क्षेत्र ज़ोन ४ में आता है.
भूकंप की स्थिति में पिछले ३०० वर्षों में देखा गया है कि जिन स्थानों पर लोग एकत्रित होते हैं जैसे स्कूल, मन्दिर, मस्जिद, अस्पताल आदि में ईमारत ढहने की स्थति में सर्वाधिक मौतें होती हैं. विश्व भर में प्रयास किया जा रहा है कि इसे स्थानों को निरापद बनाया जाये. क्या ऐसा उत्तराखंड में भी हो रहा है? शायद नहीं.
उत्तराखंड में सौभाग्यवश विद्यालयों की कमी नहीं है. एक सर्वेक्षण के अनुसार इस प्रदेश के १३ जनपदों के मात्र ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्राईमरी, अपर प्राईमरी, सेकेंडरी एवं हायर सेकेंडरी स्तर के २०,००० से अधिक स्कूल हैं. यदि इन स्कूलों में शहरी क्षेत्र वाले स्कूल भी जोड़ दिए जाएँ तो यह संख्या २३, ००० के ऊपर चली जाती है. ज़ोन ५ के बागेश्वर एवं चमोली के ग्रामीण एवं श्श्री क्षेत्रों में ही २३५० स्कूल हैं.
इनके अतिरिक्त पोलीटेकनिक एवं अन्य वर्ग के कालेजों की संख्या भी कम नहीं है. दूसरे शब्दों में प्रतिदिन हजारों की संख्या में इन सभी शिक्षण संस्थानों में छात्र-छात्राएं एकत्रित होते हैं.
इधर हाल के कुछ वर्षों में भूकंप विज्ञान में काफी उन्नति हुई है. हिमालयी भूकंप हिमालय के गर्भ में पनप रहे तनाव के कारण होते हैं. जब तनाव सीमा से बाहर हो जाता है तब अचानक हुए कंपन से भूकंप आते हैं. अमरीकी भूकंप विज्ञानी रोगर बिल्हम के अनुसार इस समय भारत का केन्द्रीय कुमाऊँ सर्वाधिक तनाव वाला क्षेत्र है, त्तथा वहाँ बड़े भूकंप के आने की आशंका है. दुर्भाग्यवश यह कुमाऊँ का सर्वाधिक आबादी वाला क्षेत्र है.
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (भा भू स) के भूकंप विज्ञानी समय-समय पर इन क्षेत्रों का सर्वेक्षण करते रहते हैं. राष्ट्रीय आपद प्रबन्धन कार्यक्रम के निर्देशों के बावजूद भूकंप के ज़ोन ५ में अभी भी या तो पुराने 'मड प्लास्टर' से बने स्कूल भवन हैं या घटिया दर्जे के कंक्रीट से बनाये गए भवन हैं. भा भू स के उपमहानिदेशक एवं प्रसिद्ध भूकम्पविग्यानी डा प्रभास पांडे के अनुसार यह जीर्णशीण भवन ९ या उससे अधिक तीव्रता के भूकंप के झटके नहीं झेल सकते. यही हाल सारे हिमालयी क्षेत्र का है. जरा सोचिये कितने लाखों बच्चों का जीवन हमने उनके भरोसे छोड़ दिया है.
फ़्रांस में स्थित ३० देशों के संघ ओ पी ई डी ने सदस्य देशों के स्कूल भवनों में कुचल कर मारे जाने से बचाने के लिए पुराने भवनों को मजबूत (रेट्रोफिटिंग) कर भूकंप रोधी बनाया तथा आवश्यकतानुसार नये भूकंप रोधी भवन निर्मित किये. जो पुराने भवन रेट्रोफिटिंग के हथौड़े नहीं बर्दाश्त कर सकते थे उनके स्थान पर लकड़ी या अन्य सामान का प्रयोग  कर हल्के एवं सुरक्षित भवन बना लिए. अमरीकी पत्रकार एंड्रयू रेवकिन के अनुसार पुराने भवन की रेट्रोफिटिंग में ५% अतिरिक्त लागत आती है. इस मुहिम का नतीजा यह हुआ कि कैलिफोर्निया (अमेरिका) एवं जापान में बहुत अधिक भूकंप आने के बावजूद स्कूलों के ढहने का खतरा नहीं रहता-बच्चे सुरक्षित रहते हैं.
कब होंगे हमारे उत्तराखंड के बच्चे सुरक्षित?
जै हिंद.


VK Joshi

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मित्रों फ्रीलांसिंग की एक समस्या होती है अचानक कार्य मिल जाना. ऐसा ही कुछ मेरे साथ हो गया है-साथ में यहाँ की प्रचंड गर्मी-दोनों के कारण कुछ समय के लिए मेरी पोस्ट पर व्यवधान आ गया है. शीघ्र दूर हो जायेगा और आप को फिर से मेरे लेख पढने को मिलने लगेंगे. बस धैर्य रखिये.
जय हिंद

VK Joshi

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प्यासे पर्वत

अभी चंद रोज़ पहले अल्मोड़ा से खबर आई कि मोहल्ला बक्शी खोला जल कर ख़ाक हो गया. फिर २-३ दिन बाद टी वी में देखा कि चीना खान में आग लगी. अनेक मित्र एवं बन्धुगण उत्तराखंड के विभिन्न भागों से समाचार देते हैं कि वनों में जगह जगह आग लगी है? पानी का बुरा हाल है, न पीने को है और ना खेती को. जब भी ऐसी आपद आतीं हैं तो सरकार को कोस लेना स्वाभाविक है, सरकार मौसम को कोस लेती है या अपोजीशन को और बात खत्म हो जाती है. कुमाऊनी में कहावत है 'ससुल ब्वारी थे कै, ब्वारील कुकुर थें, कुकुरल पुछडी हिले दी'- सास ने बहू से कुछ काम कहा, बहू ने कुत्ते से कह दिया, कुत्ते ने पूँछ हिला दी. इस प्रकार तो समस्याओं का हल नहीं होता. छोडिये जरा टटोल कर देखें कि पानी की समस्या है किसलिए और क्या निदान है?

अपने बचपन में मुझे भली-भाँती याद है कि नानी लोग भारी-भारी 'तौले, कसेरे, गगरियाँ लादे घर से नीचे (लगभग ३०० मीटर) एक कि मी दूर 'धारे से सुबह-शाम पानी ढो कर लाते थे. जरा से बादल उमड़े नहीं कि 'ठुलीजा' की 'ह्काहाक' लगती 'बारिष होने वाले है, 'बंधारे' के नीचे बर्तन लगाओ'. छत की स्लेट के किनारे एक टीन का आधा कटा पाईप चारों ओर लगा होता था (मेरे घर में अभी भी है), बारिष का पानी उस पाईप से सीधा नीचे एक धार में गिरता था-जिसे एकत्रित कर कपड़े धोने के काम में लाया जाता था. दूसरे शब्दों में आज जो सरकार 'रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग' की बात करती है, वो तो हम लोग एक ज़माने से करते आ रहे थे. फर्क इतना ही हुआ कि प्लेन्स की टोंटी खोल कर पानी पा जाने की होड़ में हम कुछ बुनियादी बाते भूल गये. यह ध्यान रखिये कि मेरा मतलब यह कतई नहीं है कि फिर से नानियाँ सर पर धारे से पानी ढो कर लायें-क्योंकि अब अगर वो चाहें तो भी नहीं कर सकती-ना तो धारे हैं और ना ही नौले और रहा सवाल नाना-नानियों का तो वो तो बेचारे जोड़ों के रोगों से लगभग अपाहिज हो चुके हैं...

पानी जब तक 'सन्जैती' अर्थात सबकी जायजाद था तब तक उसकी कद्र थी. दिक्कत प्रारम्भ हुई जल के सरकारीकरण से. लोगों को लगने लगा 'फ्री' का माल है जैसे चाहे प्रयोग करो/बर्बाद करो. अल्मोड़ा में  मटेला (कोसी) से पानी पम्प कर नगर तक लाने कि परियोजना का उदघाटन तत्कालीन मुख्य मंत्री स्व पं गोविन्द बल्लभ पन्त जी ने किया था. उस जमाने में वह परियोजना दस लाख रूपये में बनी थी. उस दिन लोगों की मुख्य चर्चा का विषय था कि 'अब naule या धारे तक हमारी महिलाओं को नहीं जाना पड़ेगा. पर लोग यह भूल गये कि जहाँ नौले से भर कर लाई गगरी के एक एक बूँद पानी का हिसाब रखा जाता था, वहीं घर के नल से बहते पानी को हम लोग प्राक्रतिक 'धरा' मान बैठे और जी भर कर हमने पानी बर्बाद किया.

अल्मोड़ा को जब (१५६३) चंद राजा ने राजधानी बनाया उस समय इसको चुनने के दो कारण मुझे समझ में आते हैं. एक 'रिज' के ऊपर होने से वहां से दूर-दूर तक देखा जा सकता है-अर्थात दुश्मन को आते दूर से ही देखा जा सकता था, दूसरे वहाँ विद्यमान स्वच्छ जल के नौले व धारे -अर्थात जल की कोई कमी नहीं. ना जाने कितने मोहल्ले  नौलों व धारों के किनारे मोहल्ले बसे और उनके नाम भी उसी हिसाब से रखे गये. इन धारों व नौलों का रखरखाव मोहल्ले वाले खुद करते थे. अल्मोड़ा या उत्तराखंड ही नहीं बल्कि सभी पर्वतीय क्षेत्रों में इनका रखरखाव समाज के जिम्मे था. हिमाचल प्रदेश में तो नौलों को मन्दिर का रूप दे दिया जाता था, ताकि लोग उनको गंदा न करें.

समस्या का प्रारम्भ उस दिन से हुआ जिस दिन से जल को 'स्टेट सब्जेक्ट' बना दिया गया. लोग यह समझने लगे सरकारी माल तो फ्री का होता है, तथा पानी मुहय्या करना तो सरकार का काम है. पर लोग यह भूल गये कि पानी जितना उपलब्ध है उतना हे तो सरकार दे सकती है! दूसरे जिसको मौका लगा उसने जल की चोरी में कसर नहीं छोडी.
फलस्वरूप नौले व धारे तो इस्तेमाल न होने से गंदे होते गये. मकान बनाने कि होड़ में उनमे आने वाले जल के मार्ग अवरुद्ध होते गये. लिहाजा एक एक कर सब सूखते गये. अल्मोड़ा में २००० में शहरीकरण एवं नगर के दूरगामी विकास योजना पर चर्चा के लिए मुझे बुलाया गया था. मुझे भली भांति याद है कि ११ अगस्त को जबर्दस्त वर्षा के कारण काठगोदाम से अल्मोड़ा पहुँचने में १० घंटे लगे-जगह जगह मार्ग अवरुद्ध था. रास्ते भर लगता था कि पहाड़ों से पानी फट कर आ रहा हो. पर अल्मोड़ा में बारिष के बावजूद ढलान सूखे थे. सारे नौले व धारे यथावत सूखे थे. दूसरे दिन एक सर्वेक्षण के दौरान मैने देखा कि अल्मोड़ा के उत्तरी ढलानों पर भीतर से जल धाराएं फूट कर आ रहीं हैं. जितनी धारे थे वे इसी जल से बने थे, पर  उन तक पहुँचने का जल का मार्ग तो हमने स्वयं बंद कर दिया-अब दोष सरकार को देन या प्रकृति को?

आज इतना ही. पानी के बारे में आप सब से बहुत बात करनी है. आप अपने विचार मुझे लिखें अच लगेगा-शायद कोई उपाय निकल आये जो सबकी प्यास बुझा सके-वरना अपना 'मिनरल वाटर' तो है ही..

जय हिंद

खीमसिंह रावत

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जोशी नमस्कार
पानी पर आपका लेख पढ़ा अति सुन्दर | मैंने सुना है और देखा भी है की बांज के जंगल में मिलाने वाला पानी बहुत ही ठंडा होता है फिर  सरकार या पहाड़ की जनता ने चौड़ी पत्ती वाले पेड़ो को लगाने में रूचि नहीं दिखाई इसका क्या कारण हो सकते है|

Khim Singh Rawat

VK Joshi

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रावत जी नमस्कार,
बांज के पेड़ एक विशिष्ट ऊंचाई एवं नमी वाले स्थानों पर उगते हैं. जैसे नैनीताल के निकट तो अभी भी कुछ बांज के पेड़ मिल जाते हैं पर अल्मोड़ा के आस पास नहीं. दूसरा कारण है हम लोग-बांज का कोयला बढ़िया माना जाता है-हमने जी भर के पेड़ काटे और जलाए-अब किसको दोष दें! ब्रिटिश हुकूमत ने वनों को सरकारी सम्पत्ति बना दिया-पर उन्होंने वन काटे भी पर लगाये भी हकीकत में. आजादी के बाद से वन फाईलों में खूब लगे पर हकीकत में बहुत कम. यदि ५० वर्षों के लिए जनता व समाज दोनों ईमानदार हो जाएँ तो अपना उत्तराखंड पुनः वनाच्छादित हो जायेगा! क्या ऐसा सम्भव है?   

पंकज सिंह महर

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बहुत सही बात कही जोशी जी आपने, पानी की समस्या हमने खुद खड़ी की है। सरकारी नलों की टोटियां जिन गांवों तक पहुंची, वहीं पर पानी की समस्या सर उठाये खड़ी है। जहां नल नहीं पहुंचे वहां पर नौले-धारे-गधेरे बचे हैं और वहां के लोग उनके प्रति जागरुक भी है और उनको बचाने के लिये समय-समय पर उनकी प्राकृतिक मेंटेनेंस करते रहते हैं।
मुझे याद है, जब हमारे गांव में पानी का नल आया तो लोगों ने नौले जाना छोड़ दिया और चूंकि नौले के पानी को देवजल माना जाता है, इसलिये वह अपवित्र न हो, इसके लिये उसमें पत्थर भर दिये गये। जब कि उससे पहले लोग नौले में उतर कर कटोरों से काई और मिट्टी कओ साफ किया करते थे, आस-पास की सफाई करते थे और पेड़-पौधे लगाते थे। आज वहां पर यह हालत है कि वह नौला, जिससे मेरे परदादा, लकड़दादा ने भी पानी पिया था, वह देख-रेख के अभाव में सूख गया। आज हालत यह है कि गांव के सरकारी नल में पानी नहीं आता, नौला हमने खुद सूखा लिया....अब तीन किलोमीटर दूर धारे से पानी ला रहे हैं।
आखिर अपने विनाश के जिम्मेदार तो हम ही हैं।

VK Joshi

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Even now it is not late Pankaj ji. Lots of NGOs are working in Uttarakhand or people can for their own groups and contact the geohydrologists in IIT Roorkee or contact the Chairman CGWB to seek technical expertise to rejuvenate the springs. If we wait for the govt to do it, then pl remember the govt is interested in 'new schemes' only and not in making the traditional sources of water work again. If contacting these authorities or taking their help is not possible, then people can use just common sense to locate where the rain water goes after rains. For ex in Almora I noticed tht watever water used to come out of Naula and Gadhera in town had escaped towards north and was gushing out of the hill on the road to Chitayi. This is bec due to our apathy the old springs have been made redundant. But one can always either make them work again or start using the new ones.
Sorry for reply in english today-I am in a hurry bec my mother got severely burnt day before yesterday from Puja-diya.

Devbhoomi,Uttarakhand

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जोशी जी सदर चरण स्पर्स प्रणाम , जोशी आपके लेख पड़कर बहुत ही अच्छा लगा और कफ्ही कुछ जानकारी हुई है की हमरी इस देवभूमि मैं क्या-क्या हो रहा है और क्या क्या घटनाएं हो,और  परेशानी हो रही हैं उत्तराखंड के पहाड़ी गाँवों में,इन सभी परेशानी का जिम्मेदार कौन हैं? इसका ज्म्मेंदार हम लोग ही हैं! जो की यहाँ रहते हैं और  उत्तराखंड में केवल पानी की ही नहीं बल्कि बहुत सारी परेशानियां है ,जैसे उत्तराखंड के पहाड़ों में रहने वाले लोगों को पानी,बिजली ,और सड़क सभी की जरूरत है,हम इन आव्स्य्कताओं के लिए धरना देते हैं!

 और रैलियां निकालते हैं! लेकिन सायद हमें ये पता नहीं है कि ये तीनों अवास्कतायें कभी भी एक साथ पूरी नहीं हो सकती हैं क्यों कि ७० और ८० में जब मेरे गाँव में जब बिजली और सड़क नहीं थी तो वहां कभी पानी कि कोई कमी नहीं हुई ,चाहे कितनी भी कड़ाके कि गर्मी पड़ी हो लेकिन वहां का पानी कभी नहीं सूखा,लेकिन जब धीरे-धीरे वहां बिजली और सड़क का निर्माण होने शुरू हुवा तो वैसे वहां के पानी के धारे गाड-गधेरे सब सूखने शुरू हो गए हैं आजा आप वहां जायेंगे तो आपको पानी तो क्या पता भी नहीं चलता है हैं कभी ४५% की गर्मी में  भी पानी रहता होगा !

 धीरे-धीरे जैसा इन्वार्मेंट बदल रहा है वैसे -वैसे प्रकीर्ति की स्रोत भी गायब होते जा रहे हैं और लोगों को आज पानी की परेशानियों से झूझना पद रहा है एक तरफ तो हम कहतें हैं की हमारे गाँव में सडक और बिजली चाहिए ,और दूसरी तरफ हम लोग पानी के लिए तडपते हैं !

 मुझे लगता है की सायद ही इन तीनों समस्याओं का हल एक साथ नहीं हो सकता है क्योंकि अगर किसी जगह पर बार्मासी है और वहां सडक नहीं तो जैसे ही वहां सडक पहुंचेगी तो वहां का पानी गायब हो जायेगा ,क्योंकि सड़कों को बनाने के लिए पहाड़ों की और पेड़ों दोनों की कटाई करनी पड़ती हैं और अगर पहाड़ और पैड दोनों काटे जांएगे तो पानी अप्निआप ही गायब हो जाएगा !
 मैंने उत्तराखंड के कई गावों आज भी देखा है जहाँ की आज भी पानी के धारे है लेकिन वहाँ सड़क और बिजली नहीं है और वहाँ आज तक कभी पानी की कमी नहीं हुई है लेकिन वहां कमी हैं तो सिर्फ बिजली और सड़क की ,जैसे वहां सडक का निर्माण होगा वैसे वहां का पानी गायब हो जायेगा ! मुझे तो लगता नहीं कि उत्तराखंड में सायद ही ऐसी कोई जगह या गाँव होगा जहाँ कि ये तीनों ,बिजली पानी और सड़क कि सम्स्यान्यें न हो !

 और ये तीनों समस्याओं का हल कभी भी एक साथ नहीं हो सकता है,अगर हमारे गान में बिजली और सडक है तो वहां का पानी सूख जाता है और उत्तराखंड में पानी के स्रोतों को खत्म करने वाला कौन है ?वो हैं हम लोग यानी जनता ,हम लोग ही जंगलों को काटकर,प्रकीर्ति के स्रोतों का विनास करते हैं कभी कोई जगलों में आग लगा देते हैं !
 उत्तराखंड में पानी बिजली और सडक ये तीनों एक दुसरे के विनाशकारी हैं ,अगर ओप्को उत्तराखंड के पहाड़ों में बिजली पहुंचानी हो तो आपको वहां के पेड़ों को काटना पड़ेगा और इस्नके साथ-साथ जमीन कि खुदाई भी करनी पड़ेगी ,तभी हमारे गाँव में बिजली पहुच सकती है !

 और सडक चाहिए तो पहाड़ों और पेड़ों कि कटाई करनी पड़ेगी और उत्तराखंड में पानी के स्रोत ही पहाड़ और पेड हैं ,उत्तराखंड की सरकार भी इतनी भी जारुक नहीं हैं की वो हरगांव में या सहर में पानी के नल या हैण्ड पम्प लावाए ,आज तक उत्तराखंड में जितने भी पानी के हैण्ड पम्प लगे हैं ,उनमें से सायद ही १०० में से ५ हैण्ड पम्पों पर पानी आता है !

 अगर हमें उत्तराखंड में पानी समस्याओं का समाधान हम सबको एक साथ मिलकर लोगों को जागरूक करना होगा ,उत्तराखंड जलनिगम तो बहुत बड़ा चोर है ये कोग तो सरकारी नलों को या तो बेच देते हैं और नकली नलों को प्रयोग करते हैं जो कि एक साल के अन्दर कि साद जाते हैं और एक साल के अन्दर ही नल का पानी भी गायब हो जाता है !

 

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