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Recall Moment of Uttarakhand State Struggle - राज्य के आन्दोलन के वो पल

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 20, 2010, 08:16:07 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


मुझे याद वो लम्हे, जब हम लोगो उत्तराखंड के विभिन्न जलूसों में भाग लिया करते थी! मुजफ्फर नगर काण्ड में मुलायम सरकार के हमने बहुत पुतले फूके थे!

मुजफ्फनगर के गुनेगारो के फासी की सजा मिलनी चाहिए !

Devbhoomi,Uttarakhand


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


आन्दोलन के दिनों, लगा था सारा उत्तराखंड जल था, हर जगह आन्दोलन की आग और सबके मन एक चाहत थी उत्तराखंड के निर्माण हो ! इसके लिए बहुत संगर्ष और कुर्वानी भी हमें देनी पड़ी 

Devbhoomi,Uttarakhand


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


दोस्तों

आप यहाँ पर उत्तराखंड आन्दोलन के वो पल शेयर कर सकते जब सारा पहाड़ एक तरह से आन्दोलन की आग में जल रहा था!

अलग राज्य का सपने लिए (विकास के लिए) लोगो ने अपना सब कुछ निछावर दिया था !

मुझे दिन याद है जब मुज़फ्फर नगर के घटना के बाद यह आग और भी तेज बड़ गयी थी, जगह पर मुलायम सिह सरकार के पुतले फूके जा रहे थे!

यह काला दिन इतिहास में अभी नहीं भूला जा सकता!


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Who can forget these moments of Uttarakhand State Struggle.



We can't forget Uttarakhand State Struggle Hero
Nirmal Pandit



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जिसने अपने गर्भ में न जाने कितने आंदोलनों को रखा तथा संघर्षरत होकर उन्हें जन्मा और जिया। उत्तराखंड में आजादी से पूर्व और बाद में भी जनता ने आंदोलनों में अपना अमूल्य योगदान दिया। इसका सबसे अतिस्मरणीय उदाहरण उत्तराखंड आंदोलन है।

डा. अर्चना डिमरी

उत्तराखंड राज्य आंदोलन अगर सफल रहा तो इसका सबसे महत्पवूर्ण कारण इसमें महिलाओं की भागीदारी है। उत्तराखंड की महिलाएं यहां की धूरी हैं। पहाड़ की महिलाएं पूरे पहाड़ का बोझ अपने ऊपर ढोती हैं। कारण यह रहा कि पुरुषों के नौकरी हेतु पलायन के बाद पूरी जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर आ जाती है। पूर्व में हुए कई आंदोलनों में महिलाओं ने सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया फिर याहे वो विश्व विख्यात चि‍पको आंदोलन रहा हो या फिर शराब आंदोलन। वनों को बचाने हेतु चि‍पको १९७३ में गढवाल हिमालय से यह विचार एक आंदोलन के रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्‍तर पर विख्यात हुआ। रैणी गांव की एक साधारण परंतु असाधारण साहस का परचिय देते हुए 'गौरा देवी` २१ मार्च १९७४ को अपने गांव के पुरुषों की अनपुस्थिति में जिस सूझबूझ व साहस का परि‍चय दिया है। पचिको आंदोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होने के साथ ही अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। जब उन्होंने व विभाग के कर्मचारि‍यों ने पेड़ों को काटने का वि‍रोध किया और न मानने पर वो तकरीबन ३० अन्य महिलाओं के साथ पेड़ों पर चि‍पक गई जिससे पेड़ काटने वालों को उल्टे पैर वापस जाना पड़ा। इस घटना के बाद १९७५ में गोपेश्‍वरव १९७८ में बद्रीनाथ समेत अनेक क्षेत्रों में महिलाओं ने वि‍रोध कर जंगलों को काटने से बचाया।Andholan
शराब ने उत्तराखंड के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परि‍दृश्य को बूरी तरह प्रभावित किया है। उमेश डोभाल ने शराब के खिलाफ एक ऐसे आंदोलन की शुरूआत की जो राज्य की अन्य जनता के लिए भी ताकत बनी। उत्तराखंड में शराब के खिलाफ १९६२ से ही आंदोलन शुरू हो चुका था। इसके फलस्वरूप १९७० में टि‍हरी तथा पौड़ी में शराब बंद की गई। बाद में १९७७ में मोरारजी देसांई की सरकार ने जब शराब पर प्रतिबंध लगया तो शराब माफियाओं द्वारा एक नए तरीके को ईजाद किया और दवाईयों की शीशी में शराब पहुंचाई जाने लगी।
उत्तराखंड की स्थिति १९८३ तक आते-आते और भी खराब हो गई जब यहां के युवा व बच्चे भी दवाइयों की शीशियों में शराब पीते देखे गए। जहां सड़क, बिजली, पानी नहीं पहुंचा वहां भी शराब बड़ी सुगमता से पहुंचने लगी। ऐसी स्थिति में महिलाओं ने शराब वि‍रोधी आंदोलन के साथ ही नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन की शुरुआत की। एक माई ने एक शराब व्यापारी की दुकान में टिंरची (स्प्रिट) पीए एक आदमी को दयनीय एवं विभत्स अवस्था में देखा तो आहत होकर उस शराब की दुकान में आग लगा दी और खुद को कमिश्नर के हवाले कर दिया माई ने कहा 'मैं हमेशा ऐसा ही कदम उठाऊंगी।' तब से उन्हें टिंरची माई के नाम से जाना जाने लगा। उत्तराखंड में शराब आंदोलन फैल तो गया लेकिन जब इनके आंदोलन को सत्ता पक्ष द्वारा नजर अंदाज किया जाने लगा, तब अलग राज्य की मांग शुरू की गई १९९४ में आरक्षण के मुद्दे पर महिलाओं ने आगे आकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मशाल को जलाया।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की शुरूआत १९९४ में आरक्षण वि‍रोध के रूप में हुई। इसमें सर्वप्रथम बैठक पौड़ी में हुई और फि‍र अनशन किया गया। इसका समर्थन महिलाओं ने भी किया। देहरादून में सुशीला बलूनी कचहरी परि‍सद में अनशन पर बैठी, उधर कमला पंत ने प्रगतिशील महिला मंच के द्वारा अन्य महिलाओं के साथ मिल कर एक नारा प्रचलित किया। आरक्षण का एक इलाज पृथक राज्य पृथक राज्य। १७ अगस्त १९९४ को अलग राज्य की मांग लेकर महिलाओं की पहली विशाल रैली निकली। इसी बीच खटीमा व मसूरी कांड हुआ। मसूरी कांड में दो महिलाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसके बाद पूरे उत्तराखंड में महिलाओं ने आंदोलन और तेज कर दिया।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान सबसे भयानक घटना मुजफ्फरनगर कांड के रूप में सामने आई। स्वतंत्र भारत में अहिंसा का पालन करने वाली महिलाओं पर मुजफ्फरनगर में एक ऐसा हिंसक बर्ताव किया गया जिसकी चारों तरफ भर्त्सना हुई। मुजफ्फर नगर कांड ने महिलाओं को बूरी तरह से तोड़ दिया। उत्तराखंड की महिलाओं ने जल्द ही अपने आप को संभालते हुए राज्य की मांग को अपनी अस्मिता या प्रश्न बनाते हुए आंदोलन को जारी रखा और राज्य पाया। यह दुर्भाग्य ही है कि महिलाओं के इतने बड़े बलिदान के बाद भी वैसा राज्य नहीं मिला जिसके लिए इतना लंबा संघर्ष किया गया।

source : http://parvatjan.com/2010/03/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड आन्दोलन का अमर सपूत निर्मल पंडित
अलग उत्तराखंड राज्य के लिए पाँच दशक तक चले संघर्ष के यू तो हजारो सिपाही रहे है, जो समय- समय पर किसी न किसी रूप में अलग राज्य के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहे। लेकिन इनमे से कुछ नाम ऐसे है जिनके बिना इस लडाई की कहाणी कह पाना संभव नही है।निर्मल कुमार जोशी 'पंडित' एक ऐसा ही नाम है। निर्मल का जन्म सीमांत जनपद पिथोरागढ़ की गंगोलीहाट तहसील के पोखरी गाव में श्री इश्वरी दत्त जोशी व श्रीमती प्रेमा देवी के घर १९७० में हुआ था।
जैसा कि कहा जाता है पूत के पाव पालने में ही दिख जाते है, वैसा ही कुछ निर्मल के साथ भी था। उन्होंने छुटपन से ही जनान्दोलनों में भागीदारी शुरू कर दी थी। १९९४ में राज्य आन्दोलन में कूदने से पहले निर्मल शराब माफिया व भू माफिया के खिलाफ निरंतर संघर्ष कर रहे थे। लेकिन १९९४ में वे राज्य आन्दोलन के लिए सर पर कफ़न बांधकर निकल पड़े। राज्य आन्दोलन के दौरान निर्मल के सर पर बंधे लाल कपड़े को लोग कफ़न ही कहा करते थे। आंदोलनों में पले बड़े निर्मल ने १९९१-९२ में पहली बार पिथोरागढ़ महाविद्यालय में महासचिव का चुमाव लड़ा और विजयी हुए। इसके बाद निर्मल ने पीछे मूड कर नही देखा और लगातार तीन बार इसी पद पर जीत दर्ज की। तीन बार लगातार महासचिव चुने जाने वाले निर्मल संभवतः अकेले छात्र नेता है। छात्र हितों के प्रति उनके समर्पण का यही सबसे बड़ा सबूत है। इसके बाद वे पिथोरागढ़ महाविद्यालय के अध्यक्स भी चुने गए।
निर्मल ने १९९३ में नशामुक्ति के समर्थन में पिथोरागढ़ में एक एतिहासिक सम्मलेन करवाया था, यह सम्मलेन इतना सफल रहा था कि आज भी नशा मुक्ति आन्दोलन को आगे बड़ा रहे लोग इस सम्मलन कि नजीरेदेते है। १९९४ में निर्मल को मिले जनसमर्थन को देखकर शासन सत्ता भी सन्न रह गई थी, इस दुबली पतली साधारण काया से ढके असाधारण व्यक्तित्व के आह्वान पर पिथोरागढ़ ही नही पुरे राज्य के युवा आन्दोलन में कूद पड़े थे। पिथोरागढ़ में निर्मल पंडित का इतना प्रभाव था कि प्रशासनिक अधिकारी भी उनके सामने आने से कतराते थे। जनमुद्दों कि उपेक्षा करने वाले अधिकारी सार्वजनिक रूप से पंडित का कोपभाजन बनते थे।
राज्य आन्दोलन के दौरान उत्तराखंड के अन्य भागो कि तरह ही पिथोरागढ़ में भी एक सामानांतर सरकार का गठन किया गया था, जिसका नेतृत्व निर्मल ही कर रहे थे। कफ़न के रंग का वस्त्र पहने पंडित पुरे जिले में घूम घूम कर युवाओ में जोश भर रहे थे। राज्य आन्दोलन के प्रति निर्मल के संघर्ष से प्रभावित होकर केवल नौजवान ही नही बल्कि हजारो बुजुर्ग और महिलाए भी आन्दोलन में कुढ़ पड़ी, यहाँ तक कि रामलीला मंचो में जाकर भी वे लोगो को राज्य और आन्दोलन कि जरुरत समझाते थे। पिथोरागढ़ के थल, मुवानी, गंगोलीहाट, बेरीनाग, मुनस्यारी, मदकोट, कनालीछीना, धारचुला जैसे इलाके जो अक्सर जनान्दोलनों से अनजान रहते थे, राज्य आन्दोलन के दौरान यहाँ भी धरना प्रदर्शन और मशाल जुलूस निकलने लगे। इस विशाल होते आन्दोलन से घबराई सरकार ने निर्मल को गिरफ्तार कर फतेहपुर जेल भेज दिया। राज्य प्राप्ति के लिए चल रहा तीव्र आन्दोलन तो धीरे-धीरे ठंडा हो गया लेकिन जनता के लिए लड़ने की निर्मल कि आरजू कम नही हुई। इसी दौरान हुए जिला पंचायत चुनावों में निर्मल भी जिला पंचायत सदस्य चुने गए, राज्य आन्दोलन के लिए चल रहा जुझारू संघर्ष भले ही थोड़ा कम हो गया था लेकिन खनन और शराब माफिया के खिलाफ उनका संघर्ष निरंतर जारी था। २७ मार्च १९९८ को शराब की दुकानों के ख़िलाफ़ अपने पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार उन्होंने पिथोरागढ़ जिलाधिकारी कार्यालय के सामने आत्मदाह किया। बुरी तरह झुलसने पर कुछ दिनों पिथोरागढ़ में इलाज के बाद उन्हें दिल्ली ले जाया गया। लगभग दो महीने जिंदगी की ज़ंग लड़ने के बाद आख़िर निर्मल को हारना पड़ा, १६ माय १९९८ को उत्तराखंड का यह वीर सपूत हमारे बीच से विदा हो गया। निर्मल कि शहादत के बाद हालाँकि यह सवाल अभी जिन्दा है कि क्या उसे बचाया जाती सकता था। सवाल इसलिए भी कि क्योकि यह आत्मदाह पूर्व घोषित था।
निर्भीकता और जुझारूपन निर्मल पंडित के बुनियादी तत्व थे, उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन माफिया के ख़िलाफ़ समर्पित कर दिया, वे कभी जुकने को राजी नही हुए, यही जुझारूपन अंत में उनकी शहीदी का भी कारण बना। अब जबकि ९ नवम्बर २००० को अलग राज्य उत्तराखंड का गठन भी हो चुका है। जिस राज्य के गठन का सपना लेकर निर्मल शहीद हो गए वही राज्य अब माफिया के लिए स्वर्ग साबित हो रहा है। शराब और खननं माफिया तो पहले से ही पहाढ़ को लूट रहे थे अब जमीन माफिया नाम का नया अवतार राज्य को खोखला कर रहा है। इसे में भला निर्मल की याद नही आएगी तो कौन याद आएगा। निर्मल का जीवन उत्तराखंड के युवाओं के लिए हमेशा ही प्रेरणा स्रोत रहेगा

http://praveenbh.blogspot.com/2009/02/blog-post_06.html

Quote from: Devbhoomi,Uttarakhand on January 20, 2010, 08:24:45 AM
KAISE BHOOL JAYEN HUM IN ANDOLANKARIYON KO INHONE APNI JAAPAR KHELKAR HAMEN YE DEVBHOOMI DILAAI



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड .राज्य .आन्दोलन .तीन.अंतिम.देहरादून

1994 उत्तराखंड राज्य एवं आरक्षण को लेकर छात्रों नेसामूहिक रूप से आन्दोलन किया 1 मुलायम सिंह यादव के उत्तराखंड विरोधी वक्तब्य से क्षेत्र में आन्दोलन तेज हो गया 1 उत्तराखंड क्रांतिदल के नेताओं ने अनशन किया 1 उत्तराखंड में सरकारी कर्मचारी [^]  पृथक राज्य की मांग के समर्थन में लगातार तीन महीने तक हड़ताल पर रहे तथा उत्तराखंड में चक्काजाम और पुलिस फायरिंग की घटनाएं हुइ 1 उत्तराखंड आन्दोलनकारियों पर मसूरी और खटीमा में पुलिस द्वारा गोलियां चलायीं गयीं 1 संयुक्त मोर्चा के तत्वाधान में दो अक्टूबर 1994 को दिल्ली में भारी प्रदर्शन किया गया 1 इस संघर्ष में भाग लेने के लिये उत्तराखंड से हजारों लोगों की भागेदारी हुयी 1 प्रदर्शन में भाग लेने जा रहे आन्दोलनकारियों को मुजफ्फर नगर में काफी पेरशान किया गया और उन पर पुलिस ने फायिरिंग की और लाठिया बरसायीं तथा महिलाओं के साथ अश्लील व्यहार और अभद्रता की गयी 1इसमें अनेक लोग हताहत और घायल हुये1इस घटना ने उत्तराखंड आन्दोलन की आग में घी का काम किया 1अगले दिन तीन अक्टूबर को इस घटना के विरोध में उत्तराखंड बंद का आह्वान किया गया जिसमें तोड़फोड़ गोलाबारी तथा अनेक मौतें हुयीं 1 सात अक्टूबर 1994 को देहरादून में एक महिला आन्दोलनकारी की मृत्यु हो गयी इसके विरोध में आन्दोलनकारियों ने पुलिस चौकी पर उपद्रव किया 1 पन्द्रह अक्टूबर को देहरादून में कफ्र्यू लग गया उसी दिन एक आन्दोलनकारी शहीद हो गया 1 27अक्टूबर 1994 को देश के तत्कालीन गृहमंत्री राजेश पायलट की आन्दोलनकारियों की वार्ता हुयी 1इसी बीच श्रीनगर [^] में श्रीयंत्र टापू में अनशनकारियों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक प्रहार किया जिसमें अनेक आन्दोलनकारी शहीद हो गये 1 पन्द्रह अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने उत्तराखंड राज्य की घोषणा लालकिले से की 1सन् 1998 में केन्द्र की भाजपा गठबंधन सरकार ने पहली बार राष्ट्रपति के माध्यम से उ.प्र. विधानसभा को उत्तरांचल विधेयक भेजा 1 उ.प्र. सरकार ने 26 संशोधनों के साथ उत्तरांचल राज्य विधेयक विधान सभा में पारित करवाकर केन्द्र सरकार को भेजा 1 केन्द्र सरकार ने 27 जुलाई 200 0को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 200 0 को लोकसभा [^] मेंे प्रस्तुत किया जो 01 अगस्त 2000 को लोक सभा [^] में तथा 10 अगस्त को राज्यसभा में पारित हो गया 1 भारत के राष्ट्रपति ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक को 28 अगस्त को अपनी स्वीकृति दे दी

इसके बाद यह विधेयक अधिनियम में बदल गया और इसके साथ ही 09 नवंबर 2000 को उत्तरांचल राज्य अस्तित्व मे आया जो अब उत्तराखंड नाम से अस्तित्व में है

http://thatshindi.oneindia.in/news/2007/11/09/2007110914780200.html