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Rudranath temple and Trek Uttarakhand- रुद्रनाथ मंदिर की पहाड़ियां की फोटो

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, March 03, 2010, 11:08:39 PM

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मध्य हिमालय में स्थित पंचकेदारों में द्वितीय केदार भगवान मद्दमहेश्वर और भगवान रुद्रनाथ के कपाट विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए है। अब छह माह तक भोले की पूजा अर्चना यहीं पर की जाएगी। रविवार सुबह आठ बजे द्वितीय केदार की उत्सव डोली गौंडार गांव से बणतौली, कटरा, नानू, मैखंडा होते हुए मद्दमहेश्वर धाम पहुंची।

मंदिर के धर्माधिकारी उमादत्त सेमवाल वेदपाठी विनोद जमलोकी व मद्दमहेश्वर मंदिर के पुजारी गंगाधर लिंग ने वैदिक पूजा-अर्चना के साथ उत्सव डोली से भगवान की मूर्ति को मंदिर के गर्भ ग्रह में स्थापित किया।पंचकेदारों में एक द्वितीय केदार भगवान मद्दमहेश्वर मंदिर में शिव के मध्य भाग नाभि की पूजा-अर्चना की जाती है।
चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ के कपाट विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद रविवार प्रात: 5:30 बजे दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए गए हैं। साढ़े बारह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित भगवान रुद्रनाथ की उत्सव डोली गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर से छह माह की शीतकालीन अवधि के बाद इस चतुर्थ केदार रुद्रनाथ को रवाना हुई थी।

सगर, गंगोलगांव, ग्वाड़, देवलधार व विश्व के खूबसूरत बुग्यालों में से एक पनार से होते हुए भगवान की उत्सव डोली शनिवार को रुद्रनाथ पहुंची थी। जिसका रविवार को वेदोच्चार और मंत्रोच्चारणों के साथ भगवान आसुतोष के अभिषेक के बाद श्रृंगार कर कपाटों को आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। छह माह की ग्रीष्मकालीन अवधि तक भगवान रुद्रनाथ के दर्शनों के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

कपाट खुलने के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक कर पुण्य लाभ अर्जित किए। रुद्रनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी प्रयागदत्त भट्ट ने कहा कि पुराणों में चतुर्थ केदार रुद्रनाथ के दर्शन करने मात्र से ही जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। नैसर्गिक छटाओं से आच्छादित यह पूरा क्षेत्र श्रद्धालुओं के लिए खास तौर पर आकर्षण का केंद्र रहा है, लेकिन 24 किलोमीटर की दुर्गम पैदल यात्रा जहां श्रद्धालुओं को थका देती है, वहीं पंचकेदारों में से एक महत्वपूर्ण केदार क्षेत्र में पहुंचने मात्र से ही श्रद्धालुओं की सारी थकान दूर हो जाती है

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गुहा मंदिर - रुद्रनाथ

मंदाकिनी व अलकनंदा जल-विभाजक की सीधी खड़ी चट्टान के पाद स्थल पर अवस्थित रुद्रनाथ गुहा मंदिर है। जहाँ कि गुहा को एक भित्ति बनाकर बंद कर दिया गया है।
आंतरिक भाग में मुखाकृतिक लिंग है, जिस पर गुहा से जल की बूँदें टपकती रहती हैं। यह शिव की भयावह आकृति है, जिसे वस्त्र द्वारा ढककर रख गया है, इसमें चाँदी की दो आँखें लगी हुई हैं। साथ ही लंबे केश व मूँछें बनाई गई हैं। सिर पर चाँदी का विशाल छत्र सुशोभित है।

रुद्रनाथ, गोपेश्वर से उत्तर पश्चिम दिशा में अवस्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए दो मुख्य मार्ग हैं। एक गोपेश्वर से व दूसरा मंडल होकर जाता है। गोपेश्वर से 16 किमी खड़ी चढ़ाई के पैदल मार्ग पर चलकर रुद्रनाथ पहुँचा जाता है। दूसरा रुद्रप्रयाग से ऊखीमठ, चोपटा होकर मंडल पहुँचा जाता है, तत्पश्चात 21 किमी. की पदयात्रा कर रुद्रनाथ पहुँचा जाता है।


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कठिन यात्रा है रुद्रनाथ की

रुद्रनाथ मंदिर भव्य प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है। रुद्रनाथमंदिर में भगवान शंकर के एकानन यानि मुख की पूजा की जाती है, जबकि संपूर्णशरीर की पूजा नेपाल की राजधानी काठमांडू के पशुपतिनाथ में की जाती है।रुद्रनाथ मंदिर के सामने से दिखाई देती नंदा देवी और त्रिशूल कीहिमाच्छादित चोटियां यहां का आकर्षण बढाती हैं।

इस स्थान की यात्रा के लिएसबसे पहले गोपेश्वर पहुंचना होता है जो कि चमोली जिले का मुख्यालय है।गोपेश्वर एक आकर्षक हिल स्टेशन है जहां पर ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर है। इसमंदिर का ऐतिहासिक लौह त्रिशूल भी आकर्षण का केंद्र है। गोपेश्वर पहुंचनेवाले यात्री गोपीनाथ मंदिर और लौह त्रिशूल के दर्शन करना नहीं भूलते।गोपेश्वर से करीब पांच किलोमीटर दूर है सगर गांव।

बस द्वारा रुद्रनाथयात्रा का यही अंतिम पडाव है। इसके बाद जिस दुरूह चढाई से यात्रियों औरसैलानियों का सामना होता है वो अकल्पनीय है। सगर गांव से करीब चारकिलोमीटर चढने के बाद यात्री पहुंचता है पुंग बुग्याल। यह लंबा चौडा घासका मैदान है जिसके ठीक सामने पहाडों की ऊंची चोटियों को देखने पर सर पररखी टोपी गिर जाती है।

गर्मियों में अपने पशुओं के साथ आस-पास के गांव केलोग यहां डेरा डालते हैं, जिन्हें पालसी कहा जाता है। अपनी थकान मिटाने केलिए थोडी देर यात्री यहां विश्राम करते हैं। ये पालसी थके हारे यात्रियोंको चाय आदि उपलब्ध कराते हैं। आगे की कठिन चढाई में जगह-जगह मिलने वालीचाय की यही चुस्की अमृत का काम करती है। पुंग बुग्याल में कुछ देर आरामकरने के बाद कलचात बुग्याल और फिर चक्रघनी की आठ किलोमीटर की खडी चढाई हीअसली परीक्षा होती है।

चक्रघनी जैसे कि नाम से प्रतीत होता है कि चक्र केसामान गोल। इस दुरूह चढाई को चढते-चढते यात्रियों का दम निकलने लगता है।चढते हुए मार्ग पर बांज, बुरांश, खर्सू, मोरु, फायनिट और थुनार के दुर्लभवृक्षों की घनी छाया यात्रियों को राहत देती रहती है। रास्ते में कहींकहीं पर मिलने वाले मीठे पानी की जलधाराएं यात्रियों के गले को तर करतीहैं। इस घुमावदार चढाई के बाद थका-हारा यात्री ल्वीटी बुग्याल पहुंचता हैजो समुद्र तल से करीब 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

ल्वीटी बुग्याल सेगापेश्वर और सगर का दृश्य तो देखने लायक है ही, साथ ही रात में दिखाई देतीदूर पौडी नगर की टिमटिमाती लाइटों का आकर्षण भी कमतर नहीं। ल्वीटी बुग्यालमें सगर और आसपास के गांव के लोग अपनी भेड-बकरियों के साथ छह महीने तकडेरा डालते हैं। अगर पूरी चढाई एक दिन में चढना कठिन लगे तो यहां इनपालसियों के साथ एक रात गुजारी जा सकती है। यहां की चट्टानों पर उगी घासऔर उस पर चरती बकरियों का दृश्य पर्यटकों को अलग ही दुनिया का अहसास कराताहै।

यहां पर कई दुर्लभ जडी-बूटियां भी मिलती हैं। ल्वीटी बुग्याल के बादकरीब तीन किलोमीटर की चढाई के बाद आता है पनार बुग्याल। दस हजार फीट कीऊंचाई पर स्थित पनार रुद्रनाथ यात्रा मार्ग का मध्य द्वार है जहां सेरुद्रनाथ की दूरी करीब ग्यारह किलोमीटर रह जाती है। यह ऐसा स्थान है जहांपर वृक्ष रेखा समाप्त हो जाती है और मखमली घास के मैदान यकायक सारे दृश्यको परिवर्तित कर देते हैं।

अलग-अलग किस्म की घास और फूलों से लकदक घाटियोंके नजारे यात्रियों को मोहपाश में बांधते चले जाते हैं। जैसे-जैसे यात्रीऊपर चढता रहता है प्रकृति का उतना ही खिला रूप उसे देखने को मिलता है।इतनी ऊंचाई पर इस सौंदर्य को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। पनारमें डुमुक और कठगोट गांव के लोग अपने पशुओं के साथ डेरा डाले रहते हैं।यहां पर ये लोग यात्रियों को चाय आदि उपलब्ध कराते हैं। पनार से हिमालय कीहिमाच्छादित चोटियों का जो विस्मयकारी दृश्य दिखाई देता है वो दूसरी जगहसे शायद ही दिखाई दे। नंदादेवी, कामेट, त्रिशूली, नंदाघुंटी आदि शिखरों कायहां बडा नजदीकी नजारा होता है।

पनार के आगे पित्रधार नामक स्थान हैपित्रधार में शिव, पार्वती और नारायण मंदिर हैं। यहां पर यात्री अपनेपितरों के नाम के पत्थर रखते हैं। यहां पर वन देवी के मंदिर भी हैं जहांपर यात्री श्रृंगार सामग्री के रूप में चूडी, बिंदी और चुनरी चढाते हैं।रुद्रनाथ की चढाई पित्रधार में खत्म हो जाती है और यहां से हल्की उतराईशुरू हो जाती है। रास्ते में तरह-तरह के फूलों की खुशबू यात्री को मदहोशकरती रहती है। यह भी फूलों की घाटी सा आभास देती है। पनार से पित्रधारहोते हुए करीब दस-ग्यारह किलोमीटर के सफर के बाद यात्री पहुंचता हैपंचकेदारों में चौथे केदार रुद्रनाथ में। यहां विशाल प्राकृतिक गुफा मेंबने मंदिर में शिव की दुर्लभ पाषाण मूर्ति है।

यहां शिवजी गर्दन टेढे किएहुए हैं। माना जाता है कि शिवजी की यह दुर्लभ मूर्ति स्वयंभू है यानी अपनेआप प्रकट हुई है। इसकी गहराई का भी पता नहीं है। मंदिर के पास वैतरणी कुंडमें शक्ति के रूप में पूजी जाने वाली शेषशायी विष्णु जी की मूर्ति भी है।मंदिर के एक ओर पांच पांडव, कुंती, द्रौपदी के साथ ही छोटे-छोटे मंदिरमौजूद हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पहले नारद कुंड है जिसमें यात्रीस्नान करके अपनी थकान मिटाता है और उसी के बाद मंदिर के दर्शन करनेपहुंचता है।

रुद्रनाथ का समूचा परिवेश इतना अलौकिक है कि यहां के सौदर्यको शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। शायद ही ऐसी कोई जगह हो जहां हरियाली नहो, फूल न खिले हों। रास्ते में हिमालयी मोर, मोनाल से लेकर थार, थुनार औरमृग जैसे जंगली जानवरों के दर्शन तो होते ही हैं, बिना पूंछ वाले शाकाहारीचूहे भी आपको रास्ते में फुदकते मिल जाएंगे। भोज पत्र के वृक्षों के अलावाब्रह्मकमल भी यहां की ऊंचाइयों में बहुतायत में मिलते हैं। यूं तो मंदिरसमिति के पुजारी यात्रियों की हर संभव मदद की कोशिश करते हैं।

लेकिन यहांखाने-पीने और रहने की व्यवस्था स्वयं करनी पडती है। जैसे कि रात में रुकनेके लिए टेंट हो और खाने के लिए डिब्बाबंद भोजन या अन्य चीजें। रुद्रनाथ केकपाट परंपरा के अनुसार खुलते-बंद होते हैं। शीतकाल में छह माह के लिएरुद्रनाथ की गद्दी गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर में लाई जाती है जहां परशीतकाल के दौरान रुद्रनाथ की पूजा होती है। आप जिस हद तक प्रकृति कीखूबसूरती का अंदाजा लगा सकते है, यकीन मानिए यह जगह उससे ज्यादा खूबसूरतहै।

रविशंकर जुगरान रुद्रनाथ यात्रा: अन्य जानकारियां कैसे पहुंचेदेश के किसी कोने से आपको पहले ऋषिकेश पहुंचना होगा। ऋषिकेश से ठीक पहलेतीर्थनगरी हरिद्वार दिल्ली, हावडा से बडी रेल लाइन से जुडी है। देहरादूनके निकट जौली ग्रांट में हवाईअड्डा भी है जहां दिल्ली से सीधी उडानें हैं।हरिद्वार या ऋषिकेश से आपको चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर का रुख करनाहोगा जो ऋषिकेश से करीब 212 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

ऋषिकेश सेगोपेश्वर पहुंचने के लिए आपको बस या टैक्सी आसानी से उपलब्ध हो जाती है।एक रात गोपेश्वर में रुकने के बाद अगले दिन आप अपनी यात्रा शुरू कर सकतेहैं। कहां ठहरें गोपेश्वर में टूरिस्ट रेस्ट हाउस, पीडब्ल्यूडी बंगले केअलावा छोटे होटल और लॉज आसानी से मिल जाते हैं। गोपेश्वर से करीब पांचकिलोमीटर ऊपर सगर नामक स्थान तक आप बस की सवारी कर सकते हैं। इसके बादरुद्रनाथ पहुंचने के लिए यात्रियों को करीब 22 किलोमीटर की खडी चढाई चढनीहोती है।

यही चढाई श्रद्धालुओं की असली परीक्षा और ट्रैकिंग के शौकीनों केलिए चुनौती होती है। रास्ता पूरा जंगल का है लिहाजा यात्रियों को अपने साथपूरा इंतजाम करके चलना होता है। यानी खाने-पीने की चीज से लेकर गर्म कपडेहरदम साथ हों। बारिश व हवा से बचाव के लिए बरसाती पास होनी चाहिए क्योंकिमौसम के मिजाज का यहां कुछ पता नहीं चलता।

पैदल रास्ते में तो पालसी मिलजाते हैं लेकिन रुद्रनाथ में रुकना हो तो इंतजाम के बारे में सोचकर चलें।कब जाएं यूं तो मई के महीने में जब रुद्रनाथ के कपाट खुलते हैं तभी सेयहां से यात्रा शुरू हो जाती लेकिन अगस्त सितंबर के महीने में यहां खिलेफूलों से लकदक घाटियां लोगों का मन मोह लेती हैं। ये महीने ट्रेकिंग केशौकीन के लिए सबसे उपयुक्त हैं। गोपेश्वर में आपको स्थानीय गाइड और पोर्टरआसानी से मिल जाते हैं।

पोर्टर आप न भी लेना चाहें लेकिन यदि पहली बार जारहे हैं तो गाइड जरूर साथ रखें क्योंकि यात्रा मार्ग पर यात्रियों केमार्गदर्शन के लिए कोई साइन बोर्ड या चिह्न नहीं हैं। पहाडी रास्तों मेंभटकने का डर रहता है। एक बार आप भटक जाएं तो सही रास्ते पर आना बिना मददके मुश्किल हो जाता है।