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Hill Station Chamba Tehri Garhwal Uttarakhand-चम्बा टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, March 10, 2010, 11:00:06 PM

Devbhoomi,Uttarakhand

                                      सुरकंडा देवी मंदिर

धनौल्टी जाने वाले पर्यटकों को पास ही स्थित सुरकंडा देवी के दर्शन भी जरूर करने चाहिए। धनौल्टी से सिर्फ सात किलोमीटर आगे स्थित है सुरकंडा देवी मंदिर। समुद तट से १०,००० फुट की ऊंचाई पर स्थित इस प्रसिद्ध मंदिर की बहुत मान्यता है।

लोग दूर-दूर से मां के दर्शन के लिए यहां आते हैं। मंदिर पहुंचने के लिए अंतिम डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई पैदल ही पूरी करनी पड़ती है। मईर्-जून में गंगा दशहरे के अवसर पर यहां बड़ा मेला लगता है। इसमें श्रद्धालु दूर-दूर से देवी मां के दर्शन के लिए आते हैं।




http://www.merapahad.com/forum/religious-places-of-uttarakhand/surkanda-devi-temple-uttaranchal-%28-%29/

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इतिहास में बावन गढ़ों के नाम से प्रसिद्ध गढ़वाल के वीरों की गाथाएं प्रदेश और देश की सीमाओं में नहीं बंधी हैं। गढ़ योद्धाओं की वीरता की गूंज फ्रास के न्यू चैपल समेत इटली से लेकर ईरान तक सुनी जा सकती है। क्रूर मौसम भले ही खेत में खड़ी फसलों को चौपट कर दे, लेकिन रणबाकुरों की फसल से यहा की धरती हमेशा ही लहलहाती रही है।

उत्तराखंड के टिहरी जिले के चंबा ब्लाक के गावों की भूमि इसकी तस्दीक करती है कि दुनिया के इतिहास को बदलने में इनकी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही वह भूमि है जहा प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान न्यू चैपल के नायक रहे विक्टोरिया क्रास विजेता शहीद गबर सिंह ने जन्म लिया था। चंबा कस्बे से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर बसे स्यूटा गाव को ही लें। यहा के रणबाकुरे लगभग एक सदी से लगातार विजय की नई इबारत लिख रहे हैं।

प्रथम विश्व युद्ध में गाव से 36 जाबाज शामिल हुए, जिसमें से चार शहीद हो गए थे। तब से लेकर आज तक इस गाव के अधिकाश युवक सेना में रहकर देश की सेवा में लगे हैं। वैसे तो गढ़वाल के कई क्षेत्रों से लोग प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आजाद हिंद फौज और देश स्वतंत्र होने के बाद सेना में शामिल होकर देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन स्यूटा गाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि एक ही गाव से एक बार में इतनी बड़ी संख्या में लोग युद्ध में शामिल नहीं हुए।

प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए न्यू चैपल लैंड में गाव के जगतार सिंह, छोटा सिंह, बगतवार सिंह और काना सिंह शहीद हो गए। इस गाव के जाबाज सिपाहियों ने प्रथम ही नहीं द्वितीय विश्व युद्ध में भी जर्मन सेना को धूल चटाने में कोई कमी नहीं रखी। इस युद्ध में भी स्यूटा के 10 जवान शामिल हुए, जिसमें से बैशाख सिंह और लाभ सिंह रणभूमि में काम आए।

यह सिलसिला यहीं नहीं रुका, 1962 के भारत-चीन युद्ध में शामिल होने वाले यहा के जाबाजों की संख्या 40 तक पहुंच गई थी। इस लड़ाई में सते सिंह पुंडीर शहीद हुए। अस्सी के दशक में तो 132 परिवार वाले गाव में हर परिवार से औसतन एक सदस्य सेना में था।

आज भी गाव में 45 लोग सेना के पेंशनर हैं और 25 लोग सेना और दूसरे सुरक्षा बलों में सिपाही से लेकर डीआईजी तक हैं। गाव के प्रधान रहे सेवानिवृत्त 80 वर्षीय कैप्टन पीरत सिंह पुंडीर बताते हैं कि 1946 में जब वे सेना में शामिल हुए तो तब तक द्वितीय विश्व युद्घ समाप्त हो चुका था। उन्होंने 1962, 1965 और 1971 की लड़ाई लड़ी और इसमें भी गाव के कई लोग शामिल हुए। स्यूटा गाव से लगे मंजूड़ गाव के भी 11 जाबाज प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुए।

विक्टोरिया क्रास विजेता गबर सिंह नेगी इसी गाव के थे। इसी तरह से स्यूटा से कुछ ही दूर पर स्थित बमुंड पट्टी के जड़दार गाव के 16 रणबाकुरे प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुए थे। इसलिए स्यूटा गाव को लोग आज भी फौजी गाव भी कहते हैं।

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चंबा। प्रथम विश्व युद्ध के नायक रहे विक्टोरिया क्रॉस विजेता गब्बर सिंह को गढ़वाल राइफल के जवान हर वर्ष उनके स्मारक पर आकर रितलिंग परेड देकर उनका स6मान बढ़ाने के साथ ही उनके संघर्षों को याद करते आए थे। लेकिन इस बार गढ़वाल राइफल द्वारा यह परंपरा भी नहीं निभाई गई। २१ अप्रैल १८९५ को चंबा के मज्यूड़ गांव में जन्मे इस रणबांकुरे ने प्रथम विश्व युद्ध में जर्मन सेना के जिस दुर्ग को ब्रिटिश सेना नहीं भेद पाई उस पर अपनी युद्ध कौशलता से क4जा दिला दिया था। मरणोंपरांत उन्हें ब्रिटिश सेना के सर्वोच्च वि1टोरिया क्रॉस मेडल से नवाजा गया। तब से २१ अप्रैल को उनके चंबा स्थित स्मारक पर गढ़वाल राइफल द्वारा रेतलिंग परेड कर उन्हें सलामी दी जाती रही है। लेकिन इस बार सेना से कोई भी उन्हें याद करने नहीं पहुंचा। जिस पर लोगों ने काफी नाराजगी व्य1त की।वीसी ग4बर सिंह मेले में उमड़े लोगचंबा। वि1टोरिया क्रॉस विजेता वीसी ग4बर सिंह नेगी की याद में हर वर्ष लगने वाले मेले में लोगों की खूब भीड़ रही। सुबह से ही गांवों से बच्चे और महिलाएं बड़ी उत्सुकता के साथ मेले में पहुंचने लगे थे। गढ़वाल राइफल का नाम विश्वभर में रोशन करने वाले ग4बर सिंह की कुर्बानी को याद करते हुए क्षेेत्र के लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके संघर्षों को याद किया। उनकी याद में यहां लगने वाले मेले में खूब भी़ड रही। महिलाओं और बच्चों ने खरीदारी की। वीसी ग4बर सिंह चौक से लेकर मसूरी रोड, गुल्डी रोड, गजा रोड और पुरानी टिहरी रोड मेलार्थियों के हुजूम से खचाखच 5ारी रही।

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चंबा में खुला संगीत का स्कूल
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श्रीदेव सुमन संगीत अकादमी ने नगर क्षेत्र में संगीत विद्यालय का शुभारंभ किया गया है। जिसमें शास्त्रीय संगीत, गायन, वादन और नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस मौके पर संगीत अकादमी के अध्यक्ष व लोक गायक पदम गुसाईं ने कहा संगीत में भी करियर बनाया जा सकता है। क्षेत्र में कई ऐसे युवा है, जिनकी संगीत में काफी रुचि है। इसलिए लंबे समय से संगीत प्रशिक्षण केंद्र की जरूरत महसूस की जा रही थी।

अध्यक्ष ने बताया छात्रों को एक वर्ष, तीन वर्ष में संगीत भूषण तथा पांच वर्ष में संगीत विशारद की डिग्री और डिप्लोमा शास्त्रीय संगीत का प्राचीन कला केंद्र चंडीगढ़ द्वारा दिया जाएगा। सचिव रवि गुसाईं ने कहा प्रशिक्षण केंद्र में तबला, ढोलक, बांसुरी, गिटार और हारमोनियम सहित कई वाद्य यंत्रों की शिक्षा दी जाएगी।

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